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Friday, October 15, 2010

मुंबई आए रजनीकांत

मुंबई आए रजनीकांत


मुंबई आए रजनीकांत

तमिल, तेलुगू और हिंदी तीनों ही भाषाओं में मणि शंकर निर्देशित रजनीकांत की रोबोट दर्शकों को भा रही है। पिछली फिल्म शिवाजी के बाद रजनीकांत के दर्शकों में भारी इजाफा हुआ है। अब वे केवल तमिल तक सीमित नहीं रह गए हैं। निश्चित रूप से भारतीय फिल्म स्टारों की अग्रिम पंक्ति में खड़े रजनीकांत को सभी भाषाओं के दर्शक देखना चाहते हैं। मुझे लगता है कि जिन भाषाओं में उनकी फिल्म डब नहीं हुई है और जो दर्शक तमिल, तेलुगू और हिंदी नहीं जानते, वे किस कदर 21वीं सदी के इस फेनोमेना से वंचित हैं। पॉपुलर कल्चर के अध्येताओं को रजनीकांत की लोकप्रियता के कारणों पर शोध और विमर्श करना चाहिए कि आखिर कैसे 61 साल का बुजुर्ग अभिनेता किसी भी जवान स्टार से अधिक लोकप्रिय हो गया?

पिछले हफ्ते रजनीकांत मुंबई आए। यहां उन्होंने अपनी फिल्म का विशेष शो रखा था, जिसमें हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की सभी हस्तियों को आमंत्रित किया गया था। आमिर खान और अमिताभ बच्चन समेत सभी उनसे मिलने और उनकी फिल्म देखने गए और अभिभूत होकर लौटे। दक्षिण के इस स्टार का जादू मुंबई के स्टारों के सिर चढ़ कर बोल रहा है। खुद को नेशनल स्टार समझने वाले विस्मित हैं कि तमिल के रजनीकांत ने लोकप्रियता और बॉक्स ऑफिस कलेक्शन में अखिल भारतीय स्तर पर उन्हें पीछे छोड़ दिया है। गौरतलब है कि रोबोट पहले शाहरुख खान को ऑफर की गई थी। उनके मना करने के बाद रजनीकांत रोबोट के लिए राजी हुए थे। आज शाहरुख खान अफसोस कर रहे होंगे।

रोबोट शंकर की विस्मयकारी कल्पना है। उन्होंने वीएफएक्स के जरिए अपनी कल्पना को साकार किया है। उन्होंने विदेशी तकनीशियनों और नो हाउ का सहारा लेकर अकल्पनीय दृश्यों का सृजन किया है। इस फिल्म में रजनीकांत की चमत्कारी लोकप्रियता के साथ स्पेशल इफेक्ट का भी जादू चला है। दर्शक सम्मोहित होकर बैठे रहते हैं और पूरे स्क्रीन पर कुछ आकृतियां विभिन्न रूपों और आकारों में पल-पल बदल रही होती हैं। यह फिल्म अद्भुत ढंग से बांधती है। इंटरवल के पहले ऐश्वर्या राय से छेड़छाड़ कर रहे गुंडों से जूझने के दरम्यान जब रोबोट की बैट्री कमजोर पड़ती है और वह चलती ट्रेन से नीचे गिरता है, तो हम चौंकते हैं और अगले सीन के बारे में सोच नहीं पाते। शंकर ने तकनीक के साथ भारतीय इमोशन का सुंदर इस्तेमाल किया है। निश्चित ही यह फिल्म भारतीय सिनेमा को विस्तार देती है, लेकिन क्या रजनीकांत के बगैर भी ऐसी फिल्म की योजना बनाई जा सकती है। मुझे लगता है कि नहीं, कम लोकप्रिय अभिनेता के साथ कोई भी निर्माता-निर्देशक इतना बड़ा जोखिम नहीं उठा पाएगा।

मुंबई प्रवास के दौरान रजनीकांत शिवसेना के प्रमुख बाला साहेब ठाकरे से भी मिले। अगले दिन सभी अखबारों में गलबहियां डाले दोनों की तस्वीरें छपीं। उनकी तस्वीरों के आगे रोबोट के स्पेशल शो में स्टारों के संग की रजनीकांत की ही तस्वीरें फीकी लग रही थीं, क्योंकि बाला साहेब ठाकरे के साथ की तस्वीर खबर के रूप में आई। इस खबर में रजनीकांत ने उन्हें भगवान कहा। देश का लोकप्रिय स्टार एक राजनीतिक पार्टी के प्रमुख को अगर भगवान कहता है, तो उसके कई निहितार्थ निकलते हैं। निश्चित ही रजनीकांत को ऐसे बयान से बचना चाहिए था। वे मूल रूप से मराठी मानुस हैं और शिवसेना और बाल ठाकरे से खुद को जोड़े रखने का उनका प्रादेशिक दबाव समझा जा सकता है, लेकिन ऐसी स्वीकृति उनके बाकी प्रशंसकों को संशय में डाल देती है। रजनीकांत ने किसी खास अभिप्राय से उन्हें भगवान नहीं कहा होगा, लेकिन आम दर्शक तो उनके बयानों से प्रेरित और प्रभावित होते हैं। यह भी शोध का विषय हो सकता है कि बाला साहेब ठाकरे और रजनीकांत की मुलाकात महज औपचारिकता थी या इसके पीछे कोई दूसरा आशय है..।


Sunday, October 10, 2010

अमिताभ बच्‍चन : हो जाए डबल आपकी खुशी -सौम्‍या अपराजिता /अजय ब्रह्मात्‍मज

कल 11 अक्टूबर को अमिताभ बच्चन का 68वां जन्मदिन है और कल ही शुरू हो रहा है 'कौन बनेगा करोड़पति' का चौथा संस्करण। इस अवसर पर उनसे एक विशेष साक्षात्कार के अंश..

[कल आपका जन्मदिन है। प्रशंसकों को क्या रिटर्न गिफ्ट दे रहे हैं?]

उम्मीद करता हूं कि मेरा जन्मदिन मेरे चाहने वालों के लिए खुशियों की डबल डुबकी हो। जन्मदिन तो आते रहते हैं, पर इस बार कौन बनेगा करोड़पति मेरे जन्मदिन पर शुरू हो रहा है, यह मेरे लिए बड़े सौभाग्य की बात है। अभी तक मैंने जितने भी एपिसोड की शूटिंग की है, उसमें ज्यादातर प्रतियोगी छोटे शहरों और गांवों के लोग हैं। इंटरनेट और कंप्यूटराइजेशन की वजह से उनके पास भी बहुत सारा ज्ञान है। वे सब जानते हैं, पर धनराशि के अभाव में वे प्राइमरी एजुकेशन के बाद ज्यादा नहीं पढ़ पाते हैं। कई ऐसे प्रतियोगी केबीसी में आए हैं, जिन्होंने मुझे बताया कि मेरे पास पचास हजार रुपए नहीं थे, इसलिए मैं एमबीए नहीं कर पाया। सिविल सर्विसेज की तैयारी करनी थी, पर पैसे नहीं थे, तो आम लोगों के लिए यह एक अच्छा अवसर है। अभी कौन बनेगा करोड़पति शुरू होगा उसके बाद फिल्में होगी, जो अगले साल प्रदर्शित होंगी। राज कुमार संतोषी की पावर होगी। तेलुगू के पुरी जगन्नाथ की बुड्ढा, प्रकाश झा की आरक्षण, राकेश मेहरा के एक सहायक की फिल्म भी है।

[1990 में आई 'अग्निपथ' के लिए 48 की उम्र में आपको दूसरा राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। 'सात हिंदुस्तानी' के लिए मिले पहले पुरस्कार को छोड़ रहा हूं। इस बीच आप 'एंग्री यंग मैन' की इमेज के साथ उभरे, लेकिन आपकी इस लोकप्रिय छवि को कभी कोई पुरस्कार नहीं मिला। 'अग्निपथ' ,फिर 'ब्लैक' और अब 'पा', आखिर क्यों आप हमेशा छवि से भिन्न भूमिकाओं के लिए पुरस्कृत हुए?]

यह तो पुरस्कार देने वाली संस्थाओं का दृष्टिकोण है। वे किस वजह से और क्यों पुरस्कार देती हैं? इसकी मुझे जानकारी नहीं है। सही मायने में आपके सवाल में सच्चाई है। जिन फिल्मों को आइडेंटिफाई किया गया था मेरी छवि से उनको पुरस्कार नहीं मिला। जिस एंग्री यंग मैन को जंजीर में रूप दिया गया, उसे पुरस्कार नहीं मिला। न ही दीवार में मिला, न त्रिशूल में मिला ़ ़ ़ काला पत्थर, शोले, मुकद्दर का सिकंदर में भी नहीं मिला ़ ़ ़ मिला अमर अकबर एंथनी के लिए फिल्मफेअर का पुरस्कार।

इस पुरस्कार के अगले दिन या दो दिनों के बाद मैं वर्ली में शूटिंग कर रहा था। उस जमाने में ट्रेलर और वैनिटी वैन नहीं होती थी। किसी के घर में एक कमरा ले लिया जाता था आग्रह कर ़ ़ ़ उन्होंने जिस मकान में कमरा रखा था कपड़ा-वपड़ा बदली करने के लिए ़ ़ ़ उसकी मालकिन ज्यूरी में थीं। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं ज्यूरी में थी। मैंने पूछा भी कि अमर अकबर एंथनी में ऐसा क्या दिखा कि आप ने उसके लिए पुरस्कार दिया? उन्होंने कहा कि आप एंग्री यंग मैन तो हैं, लेकिन पहली बार कामेडी किया तो हमने दिया। मैंने पूछा भी कि लेकिन 'एंग्री यंग मैन' के लिए क्यों नहीं दिया?

यह प्रश्न हमारे सामने हमेशा रहा है। मैं यह समझता हूं कि ज्यूरी का अपना दृष्टिकोण होता है। अब दे दिया गया है तो उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। मेरे हिसाब से सबसे बड़ा पुरस्कार जनता का प्यार है। वे जब हमारी फिल्म देखने जाते हैं और भारी तादाद में देखने जाते हैं, तब हमें जो पुरस्कार मिलता है उसके मुकाबले कोई पुरस्कार नहीं होता। आज जंजीर, दीवार, त्रिशूल और मुकद्दर का सिकंदर का जिक्र आप पुरस्कार नहीं मिलने पर भी करते हैं तो यही हमारे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है।

[आप अपनी उपलब्धियों को ज्यादा महत्व नहीं देते,जबकि दूसरों के लिए वे ईष्र्या का विषय हैं। आप इन उपलब्धियों का श्रेय अनुभव, अभ्यास और अभिनय में किसे देंगे?]

अंदर से बात आनी चाहिए और थोड़ा-बहुत अभ्यास करना होता है। क्रिएटिव फील्ड में लगातार अभ्यास होना चाहिए। न केवल अभ्यास, बल्कि अन्य लोगों का काम देखना ़ ़ ़ सभी पर विस्तार से नजर रखना कि क्या चल रहा है, क्या हो रहा है ़ ़ ़ उससे अवगत रहना। कलाकार के लिए यह जरूरी है। आप लेखक हैं तो दूसरों की किताबें पढ़ते हैं ़ ़ ़ पेंटर हैं तो विख्यात चित्रकारों की पेंटिंग्स देखते हैं कि कैसे रंग इस्तेमाल हुए हैं? कलाकार की जिंदगी में यह जरूरी है कि साथ के कलाकारों का काम देखे ताकि उनसे सीख सके। बदलती पीढ़ी के साथ काम मिलता रहे तो हमें भी एक अवसर मिलता है कि उनकी सोच से हमारी सोच मिले। जब मैं सेट पर जाता हूं तो मेरी उम्र नई पीढ़ी के कलाकारों की औैसत उम्र से 30-40 साल ज्यादा होती है। अच्छा लगता है कि मैं भी नौजवान पीढ़ी के साथ शामिल हूं। उनकी बातें सुनता हूं। उनका नजरिया सुनता हूं। मैंने कभी यह प्रयत्न नहीं किया कि अपना नजरिया उनके ऊपर थोपूं। मैं ऐसा मानता हूं कि नई पीढ़ी पिछली पीढ़ी को पीछे छोड़ देगी। यह तो जीवन है ़ ़ ़ इसमें क्या बुराई है। मान लेना चाहिए कि अब आप उस जगह नहीं हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं है कि उस जगह नहीं हैं तो घर पर बैठें। आप काम करना चाहते हैं तो इस मंशा से काम करें कि आप को पुरानी चीज नहीं मिलने वाली है। इसे स्वीकार कर लें।

[क्या अभी भी पुरस्कार मिलने पर ऐसा लगता है कि आपने कोई परीक्षा उत्ताीर्ण की हो?]

पुरस्कारों का मैं कभी निरादर नहीं करता। उतनी ही उत्सुकता से स्वीकार करता हूं जैसे कि स्कूल की परीक्षा में पास या फेल हो गए। ऐसा सोचना मैंने बंद कर दिया है कि बहुत पुरस्कार मिल चुके हैं, अब लेकर क्या करेंगे? ऐसा सोचना पुरस्कार देने वालों का निरादर करना है।

[आप की सक्रिय महत्वाकांक्षा के प्रेरक कौन हैं, दर्शक, आलोचक या आप स्वयं?]

तीनों चीजें हैं। हमारे अंदर काम करने की इच्छा होनी चाहिए। हम ऐसा काम कर रहे हैं, जिसमें प्राथमिकता दर्शक को मिलती है। दर्शक तय करते हैं कि आपका काम उन्हें अच्छा लग रहा है कि बुरा लग रहा है। अगर आप इसे स्वीकार नहीं करना चाहते हैं तो इस लाइन से हट जाइए। जाहिर है कि हर काम अच्छा नहीं होगा। कुछ में त्रुटियां और कमियां होंगी। ये त्रुटियां और कमियां आपको स्वयं न दिखें, लेकिन जो देख रहे हैं, पैसे खर्च कर रहे हैं, आप के लिए अपना समय दे रहे हैं, उन्हें तो दिख रही हैं। उनके निर्णय से हमें सीखना होगा। इस व्यवसाय में दर्शक बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। उनकी प्रतिक्रिया और आलोचना महत्वपूर्ण है। उनसे हम सीखते हैं। यह नहीं मान लेना चाहिए कि हम ने तो ऐसा किया, ये ऐसा क्यों बोल रहे हैं ़ ़ ़ ये गलत बोल रहे हैं। यह गलत हो जाएगा। यह भी हो सकता है कि एक समय वे आप से कहें कि अब आप काम मत कीजिए, क्योंकि अब जो कुछ भी आप कह रहे हैं, उसमें हमारी रुचि नहीं है तो उसे भी सुनना चाहिए। अब या तो चुनौती समझ कर हम कुछ अलग काम करें या उसे मान लें, यह व्यक्तिगत निर्णय होगा। अभी मैं ट्विटर और ब्लॉग पर हूं, वहां लोग अपने विचार डालते हैं। अब यह जरूरी थोड़े ही है कि सभी लोग अच्छी बातें करें। गालियां भी पड़ती हैं, विरोध भी होता है। कई लोग ऐसे भी कहते हैं कि बुढ़ाए गए हो यार, अब छोड़ो। हम भी पढ़ते हैं ़ ़ ़ हमें ज्ञात होता है कि हर व्यक्ति हम से प्रसन्न नहीं हैं। कहीं न कहीं यह बात दिमाग में रहती है। नया काम हाथ में लेते समय यह ध्यान में रहता है कि उस आदमी ने ऐसा कहा था, उसे ध्यान में रखना चाहिए।

[विज्ञापन, टीवी शो या फिल्म ़ ़ आप जो भी करें, उसकी गरिमा बढ़ जाती है। मार्केट बढ़ जाता है। ट्विटर या ब्लॉग, सभी जगह आप पॉपुलर हैं। दर्शकों की मनोभावना को समझना एक चुनौती है। कई कलाकार इसमें चूक जाते हैं। आप कैसे इसे सिद्ध करते हैं?]

यह मेरा अपना दृष्टिकोण है। मैं ऐसा मानता हूं कि आपको जनता ने बनाया और संवारा है। उनकी वजह से आप पनपे हैं ़ ़ ़आपको आदर-सम्मान मिलता है, लेकिन इसके साथ कहीं न कहीं आपका भी श्रेय है कि आप उनको क्या दे रहे हैं? यह मुझे निर्णय लेना होगा कि मैं कैसे अपने आपको जनता के सामने पेश करूं। मैंने हमेशा यह माना है कि मुझे कोई ऐसा काम नहीं करना है, जिसके लिए बाबूजी उठ कर सामने खड़े हों और कहें कि बेटा तुम ने यह गलत काम किया। उनके साक्ष्य से यह मेरा कर्तव्य बनता है कि मैं जीवन में जो कुछ भी करूं या मेरे परिवार के सदस्य जो कुछ भी जीवन में करें ़ ़ ़ हर जगह मां-बाबूजी सामने रहें। उन्होंने जैसे पाला-पोसा, उसमें किसी प्रकार का क्लेश न हो।

हम भाग्यशाली हैं कि जनता ने हमें स्वीकार कर लिया है। कभी कुछ विपरीत किया हो तो जनता हमें बोल देती है कि आपने सही नहीं किया है। हम उसे ठीक करने या उन्हें समझाने की कोशिश करते हैं कि हमने यह किस वजह से किया और आप को क्यों स्वीकार करना चाहिए। अगर वे फिर भी नहीं स्वीकार करते तो हाथ जोड़ कर क्षमा मांग लेते हैं!


Thursday, October 7, 2010

दबंग देखने लौटे दर्शक

दबंग देखने लौटे दर्शक-अजय ब्रह्मात्‍मज

पटना, मुजफ्फरपुर, दरभंगा और मधुबनी..। पिछले दिनों इन चार शहरों से गुजरने का मौका मिला। हर शहर में दबंग की एक जैसी स्थिति नजर आई। अभिनव सिंह कश्यप की यह फिल्म जबरदस्त हिट साबित हुई है। तीन हफ्तों के बाद भी इनके दर्शकों में भारी गिरावट नहीं आई है। बिहार के वितरक और प्रदर्शकों से लग रहा है कि दबंग सलमान खान की ही पिछली फिल्म वांटेड से ज्यादा बिजनेस करेगी। उल्लेखनीय है कि बिहार में वांटेड का कारोबार 3 इडियट्स से अधिक था और सलमान खान बिहार में सर्वाधिक लोकप्रिय स्टार हैं।

पटना में फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम दबंग की कामयाबी से बहुत अधिक चकित नहीं हैं। बातचीत के क्रम में उन्होंने अपनी एक राय जाहिर की, गौर से देखें तो दबंग हिंदी में बनी भोजपुरी फिल्म है। यही कारण है कि पिछले दस सालों में हिंदी सिनेमा से उपेक्षित हो चुके दर्शकों ने इसे हाथोंहाथ अपनाया। पिछले दस सालों में भोजपुरी सिनेमा ने उत्तर भारत और खासकर बिहार और पूर्वी यूपी में दर्शकों के मनोरंजन की जरूरतें पूरी की है। उनकी रुचि और पसंद पर दबंग खरी उतरी है।

विनोद अनुपम की राय में सच्चाई है। दबंग में हिंदी सिनेमा में पिछले दस-पंद्रह सालों में बढे़ नकली और शहरी अभिजात्य का अंतर नहीं है। यह फिल्म किसी विदेशी लोकेशन में नहीं जाती। कलाकारों का पहनावा-ओढ़ावा भी उत्तर भारतीय है। सालों बाद हिंदी सिनेमा में यह परिवेश और परिधान दिखा है। फिल्म में बड़ी होशियारी के साथ संवादों में भोजपुरी का टच दिया गया है। यह अभिताभ बच्चन के समय के पुरबिया टच से अलग है। व्यक्तिगत स्तर पर मुझे दबंग की शैली और अभिप्राय से आपत्ति हो सकती है, लेकिन इस फिल्म ने सालों बाद हिंदी प्रदेश के दर्शकों के साथ जो क्नेक्ट स्थापित किया है, वह अतुलनीय है। दबंग में सलमान की लोकप्रियता की दबंगई ने सोने पर सुहागा का काम किया है। अगर बिहार और पूर्वी यूपी में दबंग के सितारों पर नजर डालें, तो पाएंगे कि यह फिल्म उन सभी सिनेमाघरों पर पिछले तीन हफ्तों में काबिज है, जिनमें कुछ सालों से केवल भोजपुरी फिल्में चल रही थीं, हिंदी सिनेमा में दबंग की इस उपलब्धि पर मुंबई के ट्रेड पंडितों की भले ही नजर पड़े या वे इसे नजरंदाज करें, किंतु यह सच है कि इस फिल्म ने हिंदी प्रदेश के पारंपरिक दर्शकों का मनोरंजन किया है और उन्हें सिनेमाघरों में आने के लिए उकसाया है। यह केवल मुन्नीबाई बदनाम हुई.. का जलवा या सलमान का जादू भर नहीं है। दबंग पूरी तरह से चटनी छाप दर्शकों को संतुष्ट करती है। अभिनव सिंह कश्यप किसी प्रकार का आग्रह या दंभ लेकर नहीं चलते।

दरअसल, हिंदी सिनेमा के भविष्य के लिए दबंग जैसी फिल्मों की जरूरत है। इस फिल्म ने दर्शकों को उनके घरों से खींचा है और फिर से सिनेमाघरों में बैठने के लिए मजबूर किया है। हम इंटरनेशनल सिनेमा के साथ कदमताल अवश्य करें लेकिन अपने आम दर्शकों को तो न भूलें। हमें उनकी जरूरतों और अपेक्षाओं का भी ध्यान रखना चाहिए। हमें उनका भी मनोरंजन करना चाहिए।


नेहा शर्मा

पटना से अपनी फिल्म क्रुक का प्रचार कर के लौटी नेहा शर्मा को खुशी है कि उन्हें उनके गृह राज्य में लोगों ने इतना प्यार दिया। भागलपुर और दिल्ली में पली-बढ़ी नेहा शर्मा ने सोचा नहीं था कि वह फिल्मों में आएंगी। वह तो फैशन डिजायनिंग का कोर्स करने दिल्ली गई थीं। पढ़ाई के दौरान ही उन्हें तेलुगू फिल्म कुराडो मिल गई। चूंकि चिरंजीवी के बेटे राम चरण की भी वह पहली फिल्म थी, इसलिए अच्छा प्रचार मिला। अनायास मिले इस मौके का नेहा ने सदुपयोग किया और फिल्मों में कॅरियर बनाने का फैसला कर लिया।

उत्तर भारत से दक्षिण भारत और फिर वहां से हिंदी फिल्मों में प्रवेश के रास्ते में कई बाधाएं आती हैं। नेहा इन सभी के लिए तैयार थीं। उन्हें पता चला कि विशेष फिल्म्स को अपनी नई फिल्म के लिए एक नयी हीरोइन की जरूरत है। उन्होंने कोशिश की। कोशिश कामयाब हुई, क्योंकि क्रुक के निर्देशक मोहित सूरी ने उनकी तेलुगू फिल्में देख रखी थीं। एक ऑडिशन हुआ और नेहा शर्मा को क्रुक में सुहानी की भूमिका के लिए चुन लिया गया। इसमें वह आस्ट्रेलिया में पली-बढ़ी एक लड़की का किरदार निभा रही हैं।

भागलपुर जैसे स्माल टाउन से ग्लैमर की राजधानी मुंबई तक के सफर में नेहा शर्मा का आत्मविश्वास ही उनका साथी रहा। वह बताती हैं, 'परवरिश और परिवेश का असर परफॉर्मेस पर पड़ता है। मैं छोटे शहर के मध्यवर्गीय परिवार की लड़की हूं और भारतीय मूल्यों के बीच पली हूं। शहर की लड़कियां जिन मूल्यों और भावों को भूल चुकी हैं, वही मेरी पूंजी है और उसी के दम पर मैं किसी भी परफार्मेस में बेहतर करने के लिए तैयार हूं।' नेहा शर्मा को अपने बिहारी होने पर गर्व है। वह आगे कहती हैं, 'कुछ समय पहले तक बिहार और यूपी की लड़कियों को पिछड़ा और दकियानूस माना जाता था। गौर करें तो हम अपनी संस्कृति में रची-बसी आधुनिक लड़किया हैं, जो किसी भी चुनौती के लिए तैयार हैं। मैं तो पूरे उत्तर भारत में एक नई स्फूर्ति और जोश देख रही हूं। मुझे लगता है कि आने वाला वक्त हमारा है।'

नेहा इस मामले में खुद को लकी मानती हैं कि उन्हें हिंदी की पहली फिल्म में ही महेश भट्ट के साथ काम करने का अवसर मिला। वह उत्साहित स्वर में बताती हैं, 'इतने सीनियर और अनुभवी होने के बावजूद भट्ट साहब बड़े प्यार से समझाते हैं। खास कर फीलिंग को समझना और उसे बॉडी लैंग्वेज से जाहिर करना, तो उन्होंने ही बताया और सिखाया।' नेहा को महेश भट्ट की 'दिल है कि मानता नहीं' बहुत पसंद है। वह चाहती है कि उन्हें भी कभी वैसी फिल्म मिले। नेहा तीन भाई-बहन हैं। छोटी बहन और भाई दिल्ली में ही रहते हैं। पिता का भागलपुर में अपना बिजनेस है। उन्हें अपने परिवार का भरपूर समर्थन मिला है। कभी किसी ने फिल्म इंडस्ट्री को संदेह की नजर से नहीं देखा और नेहा की ख्वाहिशों को हमेशा बढ़ावा दिया।


Tuesday, October 5, 2010

गुलज़ार :गीत यात्रा के पांच दशक-अमितेश कुमार

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गंगा आये कहां से’ ‘काबुलीवाला के इस गीत के साथ गुलजार का पदार्पण फ़िल्मी गीतों के क्षेत्र में हुआ था। बंदिनी के गीत ‘मोरा गोरा अंग लईले’ से गुलज़ार फ़िल्म जगत में प्रसिद्धी पा गये। लगभग पांच दशकों से वे लगातार दर्शकों को अपनी लेखनी से मंत्रमुग्ध किये हुए हैं। इस सफ़लता और लोकप्रियता को पांच दशकों तक कायम रखना निश्चय ही उनकी असाधारण प्रतिभा का परिचय़ देता है। इस बीच में उनकी प्रतिस्पर्धा भी कमजोर लोगो से नहीं रही। जनता और प्रबुद्ध दोनों वर्गों मे उनके गीत लोकप्रिय हुए। उनका गीत देश की सीमाओं को लांघ कर विदेश पहुंचा और उसने आस्कर पुरस्कार को भी मोहित कर लिया और ग्रैमी को भी |

गुलज़ार बहुआयामी प्रतिभा के धनी हैं। फ़िल्मों मे निर्देशन, संवाद और गीत लेखन के साथ अदबी जगत में भी सक्रिय हैं। गुलज़ार का फ़िल्मकार रूप मुझे हमेशा आकर्षित करता रहा है। लोकप्रिय सिनेमा की सरंचना में रहते हुए उन्होंने सार्थक फ़िल्में बनाई हैं। उनके द्वारा निर्देशित फ़िल्मों की सिनेमा के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण जगह है। मेरे अपने, कोशिश, मौसम, आंधी, खुशबु, परिचय, इजाजत, माचिस इत्यादि उनके द्वारा निर्देशित फ़िल्में एक व्यवस्थित और विस्तृत अध्ययन की मांग करती हैं। मेरा ध्यान इस वक्त सिर्फ़ उनके गीतों और वो भी फ़िल्मों में लिखे गीतों पर केंद्रित है।

गुलज़ार के गीतों की तह में जाने से पहले कुछ सूचनात्मक जानकारियां बांट ली जाये। गुलज़ार ने अब तक लगभग सौ फ़िल्मों के लिये गीत लिखें हैं और बाइस फ़िल्में निर्देशित की हैं। कुछ फ़िल्मों के लिये संवाद भी लिखे हैं जिसमें आनंद, नमकहराम, माचिस ,साथियां इत्यादि हैं।

गुलज़ार अब तक सात राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके हैं। सर्वश्रेष्ठ निर्देशन - मौसम, सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म - माचिस, सर्वश्रेष्ठ गीत - मेरा कुछ सामान (इजाजत), यारा सीली सीली (लेकिन), सर्वश्रेष्ठ पटकथा - कोशिश, सर्वश्रेष्ठ वृतचित्र - पं भीमसेन जोशी और उस्ताद अमजद अली खान। गीतों के लिये गुलज़ार को नौ फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड मिला। निर्देशन के लिए एक (मौसम), कहानी के लिये एक (माचिस), फ़िल्म के लिये एक (आंधी ,समीक्षक) और संवाद के लिये चार (आनंद, नमकहराम, मचिस और साथिया।) फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड मिला है।

उनके कहानी संग्रह धुआं के लिये 2003 में उन्हें साहित्य अकादमी अवार्ड मिला और 2004 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भुषण से समानित किया।

जारी...

आत्‍म परिचय-

अपनी तारीफ़ उलझा हुआ दिखता हुं शायद सुलझा हुं। अपने बारे में, अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में हमेशा परेशानी होती है। सलाह अच्छी देता हुं, राजदार अच्छा हुं, इस्लिये कुछ लोगों के अंतरंग का गवाह हूं। किताब, क्रिकेट, सिनेमा, नाटक, संगीत और प्रेम में गहरी दिलचस्पी है। घर में सबसे आलसी, लापरवाह और नालायक (वैसे ये विशेषण मेरे एक दोस्त का दिया है) हूं। गप्प करने की क्षमता असाधारण है अगर मंडली मन माफ़िक हो। उम्र में बडो की संगती भाती है। जो लोग मुझ नहीं पहचान पाते है उनके लिये रुड, घमंडी, एरोगेंट हूं। अपने इर्द गिर्द एक दीवार बनाये हुए हूं जिसमे घुसने की इजाजत कुछ ही लोगो को है। अगम्भीर किस्म का गम्भीर इन्सान हूं। अपने व्यवहार का आकलन करने के बाद इतना ही जान पाया हूं बाकि मेरे मित्र और घर के लोग बता पायेंगे। किताबों के बाहर की दुनिया में सीखने कि लिये ज्यादा कुछ है…ऐसा मानना है। क्या कर रहा हूं ये बताने मुझे मजा नहीं आता…और जिस काम में मजा नहीं आता वो करता नहीं हूं इसलिये इतना ही….

आन बान और खान-सौम्‍या अपराजिता/रघुवेंद्र सिंह

देखते ही देखते सलमान खान की दबंग ने आमिर खान की 3 इडियट के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन को पीछे छोड़ दिया। दबंग ने पहले हफ्ते में 81 करोड़ रुपए से अधिक का व्यवसाय किया, जबकि 3 इडियट ने 80 करोड़ रुपए की कमाई की थी। बॉक्स ऑफिस पर इस नए रिकॉर्ड को कायम कर सलमान ने आमिर से बाजी मारते हुए शाहरुख के लिए चुनौती पेश की है। रा.वन फिल्म से अब इस चुनौती पर खरा उतरना शाहरुख खान की आन, बान और शान के लिए जरूरी हो गया है। उनके सामने पहले ही हफ्ते में 80-81 करोड़ रुपए से अधिक कमाई करने की चुनौती रहेगी।

[स्टार पॉवर की होगी परीक्षा]

''दबंग के रिकॉर्ड को शाहरुख अवश्य चुनौती के रूप में लेंगे। यह उनकी फितरत है। वे हर चीज को चुनौती के रूप में लेते हैं'', वरिष्ठ फिल्म पत्रकार मीना अय्यर के इस कथन से ज्ञात होता है कि दबंग से मिली चुनौती से शाहरुख खान भली-भांति वाकिफ हैं। जब भी सलमान या आमिर की कोई फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफलता के नए सोपान छूती है, तब उनके स्टार पॉवर की परीक्षा की घड़ी आ जाती है। ऐसा ही कुछ दबंग की रिलीज के बाद हो रहा है। ट्रेड व‌र्ल्ड एवं फिल्म इंडस्ट्री में इस बात पर बहस छिड़ चुकी है कि क्या शाहरुख रा.वन से दबंग के बॉक्स ऑफिस रिकॉर्ड को तोड़ेंगे? रा.वन अभी निर्माणाधीन है, लेकिन ट्रेड व‌र्ल्ड ने अभी से शाहरुख पर अप्रत्यक्ष रूप से दबाव डालना शुरू कर दिया है। ट्रेड विशेषज्ञ तरण आदर्श कहते हैं, ''शाहरुख टॉप के एक्टर हैं, इसलिए उनसे और उनकी फिल्म से उम्मीदें लाजमी हैं। यदि शाहरुख सलमान से बाजी मारते हैं, तो यह इंडस्ट्री के लिए अच्छा होगा।'' ट्रेड विशेषज्ञ अमोद मेहरा इसे शाहरुख की स्टार पॉवर की परीक्षा मानते हैं। वे कहते हैं, ''अब शाहरुख खान की स्टार पॉवर की परीक्षा होगी। सलमान ने शाहरुख के सामने हंड्रेड पर्सेट चुनौती खड़ी कर दी है।''

[इस बार नहीं दोस्तों का साथ]

शाहरुख खान के लिए इस बड़ी चुनौती पर खरा उतरना आसान नहीं है, क्योंकि इस बार करीबी मित्र भी उनके साथ नहीं होंगे। यदि शाहरुख खान की अब तक की सुपरहिट फिल्मों पर नजर डालें तो ज्यादातर फिल्मों के निर्देशक या निर्माता उनके करीबी मित्र रहे हैं, जिनमें आदित्य चोपड़ा, करण जौहर और फराह खान उल्लेखनीय हैं। रा.वन में शाहरुख पहली बार निर्देशक अनुभव सिन्हा से जुड़े हैं साथ ही रा.वन का सुपरहीरो उनकी अभी तक की रोमांटिक हीरो की छवि से जुदा है। जहां 3 इडियट और दबंग पारंपरिक हिंदी सिनेमा के ढांचे पर आधारित थीं, वहीं रा.वन हिंदी फिल्मों के लिए नया प्रयोग है। मीना अय्यर कहती हैं, ''माय नेम इज खान और रा.वन के बीच एक साल का गैप होगा। रा.वन अगले साल जून में रिलीज हो रही है। शाहरुख के इस प्रयोग को देखने लोग थिएटर में जरूर आएंगे।''

[आमिर-सलमान गठजोड़ से दिक्कत]

मिस्टर परफेक्शनिस्ट आमिर खान और मिस्टर कूल सलमान खान की दोस्ती भी शाहरुख खान की फिल्म के लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है। सर्वविदित है कि आमिर और सलमान दोनों ने एक-दूसरे की फिल्मों को प्रमोट किया था। दोनों ने एक-दूसरे की फिल्में देखीं और एक-दूसरे की जमकर तारीफ की। परिणाम यह हुआ कि सलमान खान के प्रशंसक 3 इडियट देखने थिएटर पहुंचे और दबंग देखने के लिए आमिर खान के प्रशंसक भी सिनेमाघरों में भीड़ जुटा रहे हैं। इस लिहाज से शाहरुख खान का पलड़ा हल्का नजर आ रहा है। उनके सामने सलमान खान और आमिर खान के प्रशंसकों को खींचने की चुनौती होगी। कॉलेज स्टूडेंट अमूल्य के अनुसार, ''3 इडियट अपने कंटेंट के कारण सुपरहिट हुई, जबकि दबंग सिर्फ सलमान खान के कारण चल रही है। जहां तक रा.वन का सवाल है, तो मुझे लगता है कि इस समय शाहरुख खान को लेकर वैसा क्रेज नहीं है।''

[तीन वर्गो में बंटे प्रशंसक]

खान त्रयी के मामले में दिलचस्प बात यह है कि उनके प्रशंसक तीन वर्गो में बंटे नजर आते हैं। जहां आमिर खान के प्रशंसकों में सुधी दर्शकों की संख्या ज्यादा है, वहीं सलमान खान के चाहने वालों में सिंगल थिएटर के दर्शक ज्यादा हैं, जबकि शाहरुख की रोमांटिक छवि पर आम और खास दोनों वर्ग के दर्शक फिदा हैं। साठ साल से हिंदी फिल्मों के निर्माण में सक्रिय योगदान दे रही रैमनार्ड लैब के मालिक मनोज कुमार सेकसरिया कहते हैं, ''अर्से बाद दबंग ने देश के छोटे शहरों के दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित किया है। अब शाहरुख खान को रा.वन से साबित करना होगा कि वे ग्रामीण भारत का दिल जीत सकते हैं।''

[तूफान से पहले की खामोशी]

फिल्म इंडस्ट्री और ट्रेड व‌र्ल्ड में चल रही इस गुफ्तगू से वाकिफ होते हुए भी शाहरुख बेफिक्र हैं। वे अपने होम प्रोडक्शन के बैनर तले बन रही इस सबसे महत्वाकांक्षी फिल्म के निर्माण में व्यस्त हैं। कहा जा रहा है कि सलमान खान की दबंग ने अभी तक जितनी कमाई की है उससे ज्यादा पूंजी निवेश से रा.वन निर्मित हो रही है। किंग खान चाहते हैं कि रा.वन के रिलीज होने पर दर्शकों को सुखद आश्चर्य हो कि हिंदी सिनेमा में अंतरराष्ट्रीय स्तर की ऐसी फिल्म भी बन सकती है। अपनी पूरी टीम के साथ शाहरुख रचनात्मक मांद में घुस गए हैं, जहां मीडिया का पहुंचना मुश्किल है। संभवत: शाहरुख की यह चुप्पी तूफान के आने से पहले की खामोशी है!


Sunday, October 3, 2010

बी आर चोपड़ा का सफ़र-प्रकाश के रे

भाग-7

नया दौर (1957) बी आर चोपड़ा की सबसे लोकप्रिय फ़िल्म है. इस फ़िल्म को न सिर्फ़ आजतक पसंद किया जाता है, बल्कि इसके बारे में सबसे ज़्यादा बात भी की जाती है. नेहरु युग के सिनेमाई प्रतिनिधि के आदर्श उदाहरण के रूप में भी इस फ़िल्म का ज़िक्र होता है. पंडित नेहरु ने भी इस फ़िल्म को बहुत पसंद किया था. लेकिन इस फ़िल्म को ख़ालिस नेहरूवादी मान लेना उचित नहीं है. जैसा कि हम जानते हैं नेहरु औद्योगिकीकरण के कट्टर समर्थक थे और बड़े उद्योगों को 'आधुनिक मंदिर' मानते थे, लेकिन यह फ़िल्म अंधाधुंध मशीनीकरण पर सवाल उठती है. और यही कारण है कि इसकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है. बरसों बाद एक साक्षात्कार में चोपड़ा ने कहा था कि तब बड़े स्तर पर मशीनें लायी जा रही थीं और किसी को यह चिंता न थी कि इसका आम आदमी की ज़िंदगी पर क्या असर होगा. प्रगति के चक्के के नीचे पिसते आदमी की फ़िक्र ने उन्हें यह फ़िल्म बनाने के लिये उकसाया.

फ़िल्म की शुरुआत महात्मा गांधी के दो कथनों से होती है जिसमें कहा गया गया है कि मशीन मनुष्य के श्रम को विस्थापित करने और ताक़त को कुछ लोगों तक सीमित कर देने मात्र का साधन नहीं होनी चाहिए. उसका उपयोग मनुष्य की मदद करने और उसकी कोशिश को आसान बनाने के लिये होना चाहिए. नेहरु के विचार इस सन्दर्भ में गांधी के उलट थे और दोनों ध्रुवों के बीच आज़ादी की लड़ाई के दौरान लगातार बहस होती रही थी. नेहरु ने एक बार कहा था कि अक्सर हम उनके (गांधी) विचारों पर बात करते हैं और हँसी-मजाक में कहते हैं कि आज़ादी के बाद उनकी 'सनक' को तरज़ीह नहीं दी जायेगी. पूरी फ़िल्म इन दो विचारों के बीच बहस करती चलती है. आश्चर्य है कि बी आर चोपड़ा नेहरु के समर्थक थे किन्तु इस फ़िल्म में 'खलनायक' का चरित्र काफी हद तक नेहरूवादी है. यह भी एक दिलचस्प संयोग है कि जिस वर्ष यह फ़िल्म प्रदर्शित होती है उसी वर्ष यानि 1957 में नेहरु उद्योग-समर्थक अपने कट्टर विचारों में संशोधन कर रहे थे. इंदौर में उस वर्ष 4 जनवरी को कॉंग्रेस की एक बैठक में उनका वक्तव्य उल्लेखनीय है: "योजना मूलतः संतुलन है- उद्योग और कृषि के बीच संतुलन, भारी उद्योग और लघु उद्योग के बीच संतुलन, कुटीर और अन्य उद्योगों के बीच संतुलन. अगर इनमें से एक के साथ गड़बड़ी होगी तो पूरी अर्थव्यवस्था पर बुरा असर होगा". तबतक 'सामुदायिक विकास' की अवधारणा भी लायी जा चुकी थी जिसके मुताबिक गाँव में ही रोज़गार के अवसर पैदा करने की कोशिश होनी थी. दूसरी पञ्च-वर्षीय योजना में लघु और कुटीर उद्योगों पर ख़ासा ध्यान दिया गया था.

फ़िल्म का अंत इसी तर्ज़ पर होता है और इस हिसाब से, और सिर्फ़ इसी हिसाब से, यह फ़िल्म नेहरूवादी कही जा सकती है. हालाँकि अंत पर भी गांधी की छाप है जहाँ उद्योगों के विभिन्न रूपों, पूंजी और श्रम के साझे की बात कही गयी है. लेकिन यह अंत ऐसा भी नहीं है कि इसे पूरी तरह से सुखांत कहा जाये. शंकर के तांगे से हारा कुंदन कहता है- "ये गाँव बरबाद होके रहेगा. आज जिन मशीनों को तुम ठुकरा रहे हो, देखना, एक दिन उन्हीं मशीनों का एक रेला उठेगा और तुम सब कुचल के रख दिए जाओगे". ये धमकी-भरे शब्द फ़ायदे के भूखे भारतीय बुर्ज़ुवा के थे जो ग्रामीण ज़मींदारों के साथ साथ-गाँठ कर अगले पचास सालों तक बड़े उद्योगों का जाल बिछानेवाला था जिसका परिणति भयानक ग़रीबी, पलायन और सामाजिक असंतोष के रूप में होनी थी. और यह सब होना था समाजवादी भारतीय राज्य के बड़े-बड़े दावों के बावज़ूद. नया दौर के तेवर और उसकी बहुआयामी राजनीति उन समझदारियों को ख़ारिज़ करते हैं जिनका मानना है कि मेलोड्रामाई पॉपुलर सिनेमा अराजनीतिक होता है और पारंपरिक मूल्यों को अपने स्टिरीयो-टाइप फॉर्मूले में ढोता है.

1957 का साल हिन्दुस्तानी सिनेमा के इतिहास में एक मील का पत्थर है. इस साल नया दौर के अतिरिक्त प्यासा (गुरु दत्त), मदर इंडिया (महबूब खान), दो आँखें बारह हाथ (व्ही शांताराम) जैसी फ़िल्में आयीं थीं जिन्होंने व्यावसायिक सफलता के साथ साथ फ़िल्मों के दार्शनिक-सामाजिक महत्व को एक बारफ़िर स्थापित किया. इतना ही नहीं, इन फ़िल्मों ने फ़िल्म-निर्माण के शिल्प और कौशल के मानक भी गढ़े. 1950 का दशक बंबई सिनेमा का स्वर्ण युग है तो 1957 का साल उस स्वर्ण युग का कोहिनूर है. इन क्लासिकल फ़िल्मों के अतिरिक्त उस वर्ष की अन्य सफल फ़िल्में भी उल्लेखनीय हैं. नासिर हुसैन कीतुमसा नहीं देखा ने शम्मी कपूर जैसा सितारा पैदा किया. देव आनंद और नूतन की पेईंग गेस्ट (सुबोध मुखर्जी), किशोर कुमार और वैजयंती माला कीआशा (एम वी रमण), बलराज सहनी और नंदा की भाभी (आर कृष्णन व एस पंजू), राज कपूर और मीना कुमारी की शारदा (एल वी प्रसाद) और दिलीप कुमार, किशोर कुमार एवं सुचित्रा सेन की मुसाफ़िर (ऋषिकेश मुखर्जी) इस साल की सफलतम फ़िल्मों में शुमार थीं. मुसाफ़िर बतौर निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी की पहली फ़िल्म थी और इसे ऋत्विक घटक ने लिखा था. इन सारी फ़िल्मों का उल्लेख ज़रूरी है क्योंकि इनके बीच बी आर चोपड़ा की नया दौर ने सफलता के मुकाम चढ़े और मदर इंडिया के बाद यह साल के सबसे बड़ी फ़िल्म थी. नया दौर बी आर फ़िल्म्स के बैनर तले बनने वाली दूसरी फ़िल्म थी.

ज़ारी....

..और भी फिल्में हुई हैं 50 की

-सौम्‍या अपराजिता

इन दिनों मुगलेआजम के प्रदर्शन की स्वर्णजयंती मनायी जा रही है। हर तरफ इस फिल्म की भव्यता, आकर्षण और महत्ता की चर्चा हो रही है, पर क्या आपको पता है कि वर्ष 1960 में मुगलेआजम के साथ-साथ कई और क्लासिक फिल्मों के प्रदर्शन ने हिंदी सिनेमा को समृद्ध बनाया था। बंबई का बाबू, चौदहवीं का चांद, छलिया, बरसात की रात, अनुराधा और काला बाजार जैसी फिल्मों ने मधुर संगीत और शानदार कथ्य से दर्शकों का दिल जीत लिया था। आज भी जब ये फिल्में टेलीविजन चैनलों पर दिखायी जाती हैं, तो दर्शक इन क्लासिक फिल्मों के मोहपाश में बंध से जाते हैं।

'छलिया मेरा नाम.हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई सबको मेरा सलाम' इस गीत से बढ़कर सांप्रदायिक सौहा‌र्द्र का संदेश क्या हो सकता है? एक साधारण इंसान के असाधारण सफर की कहानी बयां करती छलिया को राज कपूर, नूतन और प्राण ने अपने बेहतरीन अभिनय और मनमोहन देसाई ने सधे निर्देशन से यादगार फिल्मों में शुमार कर दिया।

प्रयोगशील सिनेमा की तरफ राज कपूर के झुकाव की एक और बानगी उसी वर्ष जिस देश में गंगा बहती है में दिखी। राज कपूर-पद्मिनी अभिनीत और राधु करमाकर निर्देशित इस फिल्म को उस वर्ष की सर्वश्रेष्ठ फिल्म के फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सर्वश्रेष्ठ संपादन और सर्वश्रेष्ठ कला निर्देशन का भी फिल्मफेयर पुरस्कार इस फिल्म को मिला। राज कपूर को उनके स्वाभाविक और संवेदनशील अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

राज कपूर के समकालीन अभिनेता देव आनंद की दो यादगार फिल्में बंबई का बाबू और काला बाजार भी इसी वर्ष प्रदर्शित हुई थीं। प्रेम, स्नेह और दोस्ती के धागे को मजबूत करती बंबई का बाबू में बंगाली फिल्मों की मशहूर अभिनेत्री सुचित्रा सेन ने अपने आकर्षण से हिंदी फिल्मी दर्शकों को भी मंत्रमुग्ध कर दिया। देव आनंद के साथ ने सुचित्रा सेन के आत्मविश्वास को और भी बढ़ा दिया। राज खोंसला निर्देशित बंबई का बाबू में दो प्रेमियों के वियोग की पीड़ा को बखूबी चित्रित किया गया था। विवाह के बाद विदाई की ड्योढ़ी पर खड़ी युवती के हाल-ए-दिल को बयां करते गीत 'चल री सजनी अब क्या सोचें' आज भी जब कानों में गूंजता है, तो आंखें भर जाती हैं। मजरूह सुल्तानपुरी के कलम से निकले गीतों को एस. डी. बर्मन ने अपनी मधुर धुनों में सजाकर बंबई का बाबू के संगीत को यादगार बना दिया। इस फिल्म में जहां देव आनंद ने पारंपरिक नायक की भूमिका निभायी वहीं, काला बाजार में वे एंटी हीरो की भूमिका में नजर आए। वहीदा रहमान और नंदा काला बाजार में देव आनंद की नायिकाएं थीं। सचिन देब बर्मन के संगीत से सजी काला बाजार के मधुर संगीत की बानगी 'खोया खोया चांद, खुला आसमान', 'अपनी तो हर सांस एक तूफान है', 'रिमझिम के तराने लेकर आयी बरसात' जैसे कर्णप्रिय गीतों में मिल जाती है।

वर्ष 1960 में जब देव आनंद का आकर्षण चरम पर था, तब गुरूदत्ता ने भी चौदहवीं का चांद में अपनी बोलती आंखों और गजब के अभिनय से दर्शकों को सम्मोहित किया था। 'चौदहवीं का चांद हो या आफताब हो' किसी प्रेमिका के लिए इससे बेहतर तारीफ के बोल क्या हो सकते हैं? वहीदा रहमान की खूबसूरती में डूबे गुरूदत्ता को देखने के लिए दर्शकों की बेचैनी को आज के युवा दर्शक भी समझ सकते हैं। निर्देशक मुहम्मद सादिक ने चौदहवीं का चांद की कहानी को लखनऊ की नवाबी शानौशौकत की पृष्ठभूमि में ढाल कर और भी यादगार बना दिया।

गुरूदत्ता यदि वहीदा रहमान के हुस्न के आगोश में खोए थे, तो दूसरी तरफ भारत भूषण भी उसी वर्ष प्रदर्शित हुई बरसात की रात में मधुबाला के साथ प्रेम-गीत गा रहे थे। जब सिल्वर स्क्रीन पर प्यार-मुहब्बत और जीवन के दु:ख-दर्द की कहानी कही जा रही थी, तभी रहस्य और रोमांच से भरपूर फिल्म प्रदर्शित हुई कानून। कानून के लिए बी. आर. चोपड़ा को उस वर्ष सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला था। वर्ष 1960 में प्रदर्शित हुई मुख्य धारा की यादगार फिल्मों में सबसे उल्लेखनीय है अनुराधा। सर्वश्रेष्ठ फिल्म के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित होने के साथ-साथ अनुराधा बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में गोल्डेन बियर अवार्ड के लिए भी नामांकित की गयी। लीला नायडू और बलराज साहनी अभिनीत यह फिल्म अपनी कलात्मकता के लिए आज भी याद की जाती है!


Saturday, October 2, 2010

लाइट और ग्रीन रूम की खुशबू खींचती थी मुझे: संजय लीला भंसाली

खूबसूरत सोच और छवियों के निर्देशक संजय लीला भंसाली की शैली में गुरुदत्त और बिमल राय की शैलियों का प्रभाव और मिश्रण है। हिंदी फिल्मों के कथ्य और प्रस्तुति में आ रहे बदलाव के दौर में भी संजय पारंपरिक नैरेटिव का सुंदर व परफेक्ट इस्तेमाल करते हैं। उनकी फिल्मों में उदात्तता, भव्यता, सुंदरता दिखती है। उनके किरदार वास्तविक नहीं लगते, लेकिन मन मोहते हैं। उनकी अगली फिल्म गुजारिश जल्द ही रिलीज होगी। उसमें रितिक रोशन व ऐश्वर्या राय प्रमुख भूमिकाओं में हैं। आज के संजय लीला भंसाली को सभी जानते हैं। हम उन्हें यादों की गलियों में अपने साथ उनकी पहली फिल्म खामोशी से भी पहले के सफर पर ले गए।

बचपन कहां बीता? कहां पले-बढे?

बचपन मुंबई में ही बीता। सी पी टैंक, भुलेश्वर के पास रहते थे।

किस ढंग का इलाका था?

मम्मी-डैडी के अलावा मैं, बहन व दादी थे। वार्म एरिया था। चॉल लाइफ थी, लेकिन अच्छी थी। आजकल हम जहां रहते हैं, वहां नीचे कौन रहता है इसका भी पता नहीं होता। वहां पूरे मोहल्ले में, रास्ते में, गली में सब एक-दूसरे को जानते थे।

स्कूलिंग कैसी हुई? अंग्रेजी माध्यम, हिंदी या गुजराती में?

इंग्लिश मीडियम स्कूल था। चर्चगेट में सेंट जेवियर्स एकेडमी नाम का स्कूल था। थर्ड क्लास स्टूडेंट कम ही हुआ करते थे। क्लास में तीस से ज्यादा स्टूडेंट नहीं होते थे। अच्छा स्कूल और अच्छी टीचर्स..। स्कूल में प्ले और म्यूजिक वगैरह बहुत होता था।

तब की पढाई कैसी थी? आजकल तो बच्चे स्ट्रेस में रहते हैं।

स्पो‌र्ट्स या किसी अन्य एक्टिविटीज में इंटरेस्ट नहींथा। प्ले भी अच्छे नहीं लगते थे। 8मुझे तो फिल्ममेकर ही बनना था। स्कूल में सिर्फ प्ले होते हैं, जिसमें एक्ट करना होता है या डायरेक्ट करना होता है। म्यूजिक में कभी-कभी इंटरेस्ट आता था। तब स्ट्रेसफुल नहीं थी पढाई। गणित थोडा बोझिल लगता था। वैसे मैं अच्छा स्टूडेंट था। मुझे लगता था कि पिता के पास उतने पैसे नहीं थे कि और अच्छे स्कूल में भेज सकें।

दोस्तों के साथ मौज-मस्ती करते थे?

नहीं। मैं चाहता था कि केवल स्कूल में सभी से मिलूं। दोस्तों को घर बुलाना, उनके घर जाना पसंद नहीं था। घर में भी अकेले रहना अच्छा लगता था। रिश्तेदारों के घर आना-जाना या बर्थडे पार्टी में जाना पसंद नहीं था। मुझे अपने टू इन वन के साथ रहना भाता था।

बेला आपसे कितनी छोटी या बडी हैं?

बडी बहन हैं वह। उनके साथ काफी झगडे होते थे। मेरे अंदर डायरेक्टर पहले से ही था। मैं जो कहूं वो सब मानें। बेला के साथ करीबी रिश्ता रहा। जैसे खुद के साथ होता है, वैसा ही। झगडे भी हुए हैं, लेकिन नापसंद जैसी बात नहीं रही। भाई-बहन या बहन-भाई, इतना पता ही नहीं था तब।

क्या वह हमेशा बडी बहन के रोल में रहती थीं कि संजय को संभाल कर रखना है, संजय को कुछ हो न जाए?

मेरा भाई सबसे बेस्ट, बस इतना ही था। फिल्म इंस्टीट्यूट गई तो मैंने भी दो साल बाद इंस्टीट्यूट जॉइन किया। वहां से उन्होंने विधु विनोद चोपडा को जॉइन किया तो दो साल बाद मैंने भी उन्हीं को जॉइन किया। वह रिश्ते बनाती गई, मैं उन्हें फॉलो करता गया। एक-दूसरे के लिए अंडरस्टैंडिंग अच्छी थी। वह तब भी कहती थीं विनोद को, देखो तुम्हें परिंदा के गाने करने हैं। मेरा भाई म्यूजिक की अच्छी समझ रखता है। तब विनोद ने मेरा शूट लिया और रेणु सलूजा को दिखाया। रेणु सलूजा ने गाने की तारीफ की, तो विनोद ने मुझे बुलाया। मैं आज बेला की वजह से हूं। अगर वह रेणु को बुलाती नहीं और रेणु विनोद को नहीं कहते, विनोद मुझे नहीं बुलाते तो..आज यहां न होता। उन्होंने मेरे प्रति हमेशा अपनी जिम्मेदारी समझी।

बचपन में फिल्म देखने का जो सिलसिला था, वह क्या फैमिली आउटिंग होती थी या आप अकेले जाते थे।

साल में दो-तीन फिल्मों से ज्यादा नहीं देखता था। सिल्वर जुबली होती थी उस जमाने में। आज सिल्वर जुबली कोई जानता ही नहीं। जो पिक्चर दस हफ्ते से ज्यादा होती, उसे जरूर देखते थे। जैसे आपकी कसम, आराधना जैसी फिल्म। राजेश खन्ना, मुमताज, हेमा मालिनी, जीनत अमान की फिल्में बहुत पसंद थीं। जिस फिल्म में हेलन हों, वो देखता ही था। साल में तीन-चार पिक्चर देखनी हो तो जिसमें हेलन हों, उसी को पहले देखते थे। मुझे उनका बिग स्क्रीन पर आना अच्छा लगता था। वह डांस करती थींतो अंदर से खुश दिखती थीं। लगता था कि वह जो चाहती हैं, वह कर रही हैं। उनके डांस में ख्वाब व खुशी का अजीब मिश्रण था, जो मैंने आज तक किसी दूसरे आर्टिस्ट में नहीं देखा। जो हम कर रहे हैं, उसके साथ कनेक्ट करके सभी को खुशी देना। कोई खुद को इस हद तक एंजॉय करे तो। उनके डांस में नंगापन कभी महसूस नहीं हुआ। वह अलग ही लेवल पर लेकर जाती हैं।

पहली फिल्म कौन सी होगी, जिसकी इमेजेज अब तक याद हों?

जब जब फूल खिले शशि कपूर और नंदा की। कहां देखी थी, याद नहीं।

क्या चीज याद रह गई? उसके गाने या कश्मीर का बैकड्रॉप?

इतना ही याद है कि कश्मीर का शिकारा था। किसी ने दूसरी फिल्म देखने को कहा और मैंने जिद पकड ली कि दिखानी है तो यही फिल्म दिखाओ। इस फिल्म का रिदम पसंद आया। शायद वह मेरी जिंदगी की पहली फिल्म है।

फिल्में क्यों अच्छी लगती थीं? पलट कर खूबसूरत जवाब दिए जा सकते हैं, लेकिन अतीत में लौट कर बता सकें जो सही हो।

लोकेशन बडी वजह थी। तब हम फायनेंशियली मजबूत नहीं थे। चॉल में रहते थे। हॉलीडे में घूमने नहीं जाते थे। फिल्मों में सुंदर लोकेशन, कश्मीर, ऊटी या दूसरे हिल स्टेशन दिख जाते थे। खूबसूरत वादियों में हीरो-हीरोइन का गाना और रोमांस अच्छा लगता था।

और क्या शौक थे तब, जिन्हें क्रिएटिविटी की पृष्ठभूमि मान सकें?

म्यूजिक। स्कूल से आते ही रेडियो बजाना मेरी आदत थी। किसी के घर रिकॉर्ड बज रहा हो तो सुनना अच्छा लगता था। नीचे चाचा रहते थे। उनके यहां कुछ बजता तो मैं सीढियों पर बैठ कर सुनता था। मैं फिल्मों में भी गाने की शूटिंग और फिल्मांकन पर गौर करता था। डांस फॉर्म, परफार्मेस, या सिंगिंग क्वॉलिटी, इन चीजों के प्रति खिंचता था। जॉनी मेरा नाम में पद्मा खन्ना का डांस लाउड था मेरे हिसाब से, लेकिन गाना सुंदर था। फिल्म में अच्छी-अच्छी चीजें ढूंढता था। कहानी भूल जाता और अपनी तरफ से कुछ इंपोज करके उसे खोजता और आनंदित होता था। मेरे स्कूल के बच्चे अंग्रेजी फिल्में देखते थे। उन्हें हिंदी फिल्में समझ में नहीं आती थीं। पिताजी को भी म्यूजिक पसंद था। वे कहते थे, रोशन आरा को सुनो, गुलाम अली साहब को सुनो.., बडे गुलाम अली खां को सुनने के लिए उन्होंने पंद्रह-सोलह बार मुगले आजम दिखाई। मेरे चचेरे भाई इंग्लिश फिल्में देखते थे और मैं ओपेरा हाउस में रोटी कपडा और मकान देख कर खुश होता था। हमारा पूरा मोहल्ला कंजरवेटिव था। फिल्मों में काम करना अच्छा नहीं माना जाता था।

आपके परिवार की क्या सोच थी?

मम्मी क्लासिकल डांसर थीं। पृथ्वीराज कपूर के जमाने में वह डांस करती थीं। मोहल्ले के लोग मानते थे कि मेरा परिवार फिल्मी है। स्कूल के रास्ते में एक थिएटर पडता था। मैं जाकर वहां खडा होता था। मन करता कि पेन फेंक कर पियानो बजाऊं। ग्रीन रूम के सामने खडा रहूं, लेकिन परिवार अफोर्ड नहीं कर सकता था। सभी कॉमर्स पढने और किसी बैंक में नौकरी करने पर जोर देते थे। स्कूल-कॉलेज में मेरा दम घुटता था, लेकिन एफटीआईआई के लिए ग्रेजुएशन जरूरी था, इसलिए पढाई की।

किन विषयों की पढाई में मन लगता था?

मैथ्स व कॉमर्स समझ नहीं आता था। म्यूजिक, डांस व थिएटर अच्छा लगता था। हिंदी फिल्मों में कोई लॉजिक नहीं होता और मैं भी कन्फ्यूज व्यक्ति था। कभी-कभी साहित्य भाता था। कॉमर्स का डेबिट-क्रेडिट समझ में नहीं आता था। आर्टिस्ट की लाइफ में हिसाब-किताब तो होता नहीं है। लाला लाजपत राय कॉलेज में पांच साल बर्बाद किए, किसी को असिस्ट करता तो ज्यादा सीखता। लाइट और ग्रीन रूम की खुशबू मुझे खींचती थी। लगता था, उसी के लिए पैदा हुआ हूं।

सिनेमा के लिए मां-पिता से कितनी मदद मिली?

पिता जी फिल्मों की खूबसूरती के बारे में बताते थे। अच्छे सिनेमा और संगीत की गहरी जानकारी रखते थे। रोजमर्रा की जिंदगी में खूबसूरत चीजों के इस्तेमाल पर जोर देते थे। मम्मी डांस सीखती थीं तो उन्हें तसवीरें दिखाते थे। उन्होंने मेरी बहन बेला और मुझे एफटीआईआई भेजा। पापा बी और सी ग्रेड की फिल्में बनाते थे। पाक दामन, जहाजी लुटेरा जैसी फिल्में उन्होंने बनाई थीं। उनके नेगेटिव भी नहीं मिलते। कुछ ब्रोशर कहीं रखे हैं। हमने कभी कुछ देखा ही नहीं?

आपने नहीं देखींपिताजी की फिल्में? कैसे व्यक्ति थे वह? उनका नाम क्या था?

नवीन भंसाली। उनकी फिल्में मैं भी ढूंढ रहा हूं। वे अलग किस्म के इंसान थे। अपनी पसंद में रॉयल व रंगीन किस्म के पावरफुल इंसान थे। मैं उनके सामने मध्य वर्ग का आम आदमी था, वह बहुत सोशल और फ्रेंडली नहीं थे।

ट्रेनिंग का अनुभव कैसा रहा?

एफटीआईआई मेरे लिए दुनिया की सबसे अच्छी जगह है। मुझसे पूछें-पेरिस जाएंगे या एफटीआईआई तो जवाब होगा-एफटीआईआई। वहां से अजीब लगाव था। बचपन से जो खुशबू खोज रहा था, वह वहां जाकर मिली। साउंड स्टूडियो, फिल्म स्टूडियो.. बहुत सुकून मिला। वहां जाने के बाद लगा कि जिंदा हूं।

ट्रेनिंग का फायदा होता है क्या?

मेरा मानना है कि फिल्म-मेकिंग कुदरती चीज है। नैचरल समझ को ट्रेनिंग से फाइन ट्यून किया जाता है। ट्रेनिंग तो मुझे डेबिट-क्रेडिट की भी दी गई, लेकिन नहीं सीख सका। किसी भी फील्ड के लिए स्वाभाविक नजरिया होना चाहिए। कॉमर्स, डांस, म्यूजिक सभी विषयों के साथ यही बात होती है। इंस्टीट्यूट में सही डायरेक्शन मिलता है। क्राफ्ट समझ में आता है, लेकिन लगाव सबसे ज्यादा जरूरी है।

लोग कहते हैं कि हर फिल्मकार की सोच और शैली पर सोशल बैकग्राउंड, पढाई-लिखाई और परवरिश का असर होता है। मुझे लगता है कि कला और विज्ञान के मूल हमारे अंदर होते हैं। बीज होते हैं, वही सही परिवेश में अंकुरित होते हैं। लता जी कहां से आई हैं? मैं कहां से आया हूं? आप कहां से आए? आप लिख सकते हैं, इसलिए लिखते हैं। मुझे नहीं मालूम कि आपके परिवार में और कौन लिखता है? आपका रिश्ता शब्दों से है। मैं चाहूं भी तो आपकी तरह नहीं लिख सकता। कितने अनपढ रायटर और डायरेक्टर हैं देश में? उन्होंने कितने उल्लेखनीय काम किए हैं?

महबूब खान सबसे बडे उदाहरण हैं..

वे सूरत से आए जूनियर आर्टिस्ट थे और उन्होंने मदर इंडिया बनाई। कहां से आई इतनी मेधा? कुदरत की ताकत को हम नहीं समझ सकते।

एफटीआईआई से निकलने के बाद..?

अनिश्चित था। मालूम नहीं था कि कहां से फिल्म मिलेगी? आज की तरह रोज डायरेक्टर पैदा नहीं होते थे। मैं 1987-88-89 की बात कर रहा हूं। वैसे अनिश्चित होने पर ही हम कहीं पहुंचते हैं। जो निश्चित रहते हैं, वे निश्चिंत हो जाते हैं और भटक जाते हैं। आते ही विधु विनोद चोपडा के लिए एक गाना प्यार के मोड पर शूट किया। बेला के पति दीपक सहगल के साथ डिस्कवरी ऑफ इंडिया की एडिटिंग में बैठने लगा। डेढ साल वहां रहा। 1942 लव स्टोरी का काम शुरू हुआ तो विनोद के साथ स्क्रीन प्ले लिखा। उसी दौरान खामोशी लिखी।

खामोशी की स्क्रिप्ट सबको पसंद आई या किसी ने इसकी आलोचना भी की? पहली फिल्म के तौर पर इसका चुनाव सचमुच साहसी फैसला लगता है।

सलमान खान ने कहा कि यह सुसाइडल फिल्म होगी, दूसरी बनाओ। गूंगों-बहरों की पिक्चर कहां चलेगी। मैंने कहा कि जो दिल को अच्छा लगता है, वही करूंगा। पैसे बनाने के लिए फिल्म नहीं बना रहा हूं। खामोशी की स्क्रिप्ट पहले विनोद को दी थी, लेकिन उन्होंने कहा, तुमने लिखी है, तुम ही बनाओ।

किन लोगों ने सपोर्ट किया?

सलमान, विनोद, नाना और मनीषा ने। डिंपल कपाडिया ने मना कर दिया था। माधुरी दीक्षित और काजोल ने भी मना कर दिया था।

नए व युवा डायरेक्टरों को क्या कहेंगे?

सबसे पहले अपने पोटेंशियल को परखें। क्या आप कोई नई बात कहना चाहते हैं? डायरेक्टर बनने के लिए काफी-कुछ झेलना पडता है। पहले किसी के असिस्टेंट बनें। नैचरल टैलेंट के बाद सही टाइम पर सही जगह पहुंच जाएं। अपनी स्क्रिप्ट भी तैयार रखें। फिल्म खामोशी मैंने अपनी हैंडरायटिंग में तीन बार लिखी। दिन में विनोद के साथ काम करता था, रात में लिखता था। कमिटमेंट, हार्ड वर्क के साथ नया कहने की हिम्मत हो। टैलेंट ही सबसे जरूरी चीज है।



लाइट और ग्रीन रूम की खुशबू खींचती थी मुझे: संजय लीला भंसाली

Friday, October 1, 2010

दिब्येन्दु को मिली पहचान

दिब्येन्दु को मिली पहचान


दिब्येन्दु को मिली पहचानयह तय था कि सिद्धार्थ श्रीनिवासन की फिल्म पैरों तले का व‌र्ल्ड प्रीमियर टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में होगा। इस फिल्म में दिब्येन्दु भट्टाचार्य शीर्ष भूमिका में हैं। उन्होंने दीन-हीन चौकीदार का रोल बखूबी निभाया है, जो मौका आने पर उठ खड़ा होता है। वह जाहिर करता है कि सालों की गुलामी के बावजूद उसके अंदर का इंसान जिंदा है, जो अच्छे-बुरे और सच्चे-झूठे के बीच का फर्क जानता है।

पैरों तले ने दिब्येन्दु को इंटरनेशनल पहचान दी है। टोरंटो में भारत की चार फिल्मों में से एक पैरों तले को फिल्म फेस्टिवल के दर्शकों ने खूब सराहा और दिब्येन्दु के स्वाभाविक अभिनय की तारीफ की। इंटरनेशनल समीक्षकों ने आश्चर्य व्यक्त किया कि इतने उम्दा ऐक्टर की भारत में कोई खास पहचान नहीं है। एनएसडी से स्नातक दिब्येन्दु भट्टाचार्य ने मानसून वेडिंग से फिल्मों में काम आरंभ कर दिया था। मीरा नायर की उस फिल्म में वे चंद सेकेंड के लिए दिखे थे। इस फिल्म के अनुभव के बाद ही उन्होंने फिल्मों में आने का इरादा किया और फिर मुंबई आए। राजपाल यादव के सहपाठी रहे दिब्येन्दु ने मुंबई आने में थोड़ी देर की और उनका करियर भी धीमी गति से आगे बढ़ा। वे हिंदी फिल्मकारों के पूर्वाग्रह और धारणाओं के शिकार रहे। फिर भी वे निराश नहीं हुए और उन्होंने अपनी यात्रा जारी रखी। कहना मुश्किल है कि पैरों तले की इंटरनेशनल पहचान के बाद भी उन्हें कॉमर्शियल हिंदी फिल्में मिल पाएंगी या नहीं? हिंदी फिल्मों में काम पाने की शर्ते बिल्कुल अलग होती हैं। मुंबई आने के बाद उन्होंने छोटी-बड़ी अनेक फिल्मों में काम किया। उनके हुनर से प्रभावित फिल्मकारों ने हमेशा उन्हें बड़ी भूमिकाओं के लिए आश्वस्त किया, लेकिन छोटी भूमिकाएं देकर फुसलाते रहे। फिर भी उन्होंने कोई शिकायत नहीं की। वे कभी टीवी सीरियल, तो कभी कारपोरेट फिल्मों से खुद को संतुष्ट करते रहे। उन्होंने काम पाने की कोशिश में प्रशिक्षित अभिनेता की गरिमा को ताक पर नहीं रखा। कई फिल्मकारों से पैसे और रोल के मुद्दे पर उनकी अनबन हो गई। उनकी फिल्में छूट गई, लेकिन उन्होंने समझौता करना जरूरी नहीं समझा। आत्मविश्वास के धनी दिब्येन्दु को फिल्में मिलती रहीं, फिर भी वे हिंदी फिल्मों के कॉमर्शियल सीन से गायब रहे। इस वजह से दर्शकों के बीच उनकी पहचान नहीं बन पाई।

कोलकाता निवासी दिब्येन्दु का रंग गहरा सांवला है। कई फिल्मकारों ने ऑफ रिकॉर्ड कहा है कि अगर उनका रंग थोड़ा साफ होता। उनका कद पांच फीट छह इंच से ज्यादा होता और वे बांग्लाभाषी नहीं होते, तो उनके पास अनेक फिल्में होतीं। उनकी अभिनय क्षमता में भरोसा रखने पर भी ये फिल्मकार उन्हें काम नहीं दे पाते, क्योंकि उन्हें भी हिंदी फिल्मों के बने-बनाए सेटअप में काम करना पड़ता है। हिंदी फिल्मों के सभी कलाकारों के लिए जरूरी हो गया है कि उनका रंग गोरा और कद-काठी खास किस्म की हो। कौन कहता है कि भारत में सभी को रोजगार और काम के समान अवसर मिलते हैं? अभिनेता होने की सामान्य शर्त से अलग होने पर केवल युक्तियों, संयोगों और अवसर से फिल्में मिल पाती हैं। उनमें राजपाल यादव जैसे अपवाद भी होते हैं, जो अपनी शारीरिक बनावट को ही विशेषता बना कर एक नई जगह बना लेते हैं।

हिंदी फिल्में तेजी से बदल रही हैं। पैरेलल सिनेमा की तरह वास्तविक फिल्मों की समांतर दुनिया विकसित हो रही है। ऐसी फिल्मों में भिन्न किस्म के नेचुरल अभिनेताओं को काम मिल रहा है। दिब्येन्दु की पैरों तले ऐसी ही फिल्म है। ऐसी फिल्मों को सामान्य दर्शक नहीं मिल पाते, क्योंकि वितरकों और प्रदर्शकों का हुजूम ऐसी फिल्मों में स्टार वैल्यू नहीं देख पाता। अभी तक ऐसी छोटी और वास्तविक फिल्मों का प्रदर्शन आम नहीं हो पाया है। आम दर्शकों के बीच पहचान हासिल करने में उन्हें अभी वक्त लगेगा। टोरंटो में मिली तारीफ के बाद दिब्येन्दु ने बताया कि कुछ विदेशी फिल्मकारों ने उनके काम में इंटरेस्ट दिखाया है। वे इन दिनों टोरंटो शहर में ही इंटरनेशनल स्तर पर बन रही एक फिल्म की शूटिंग कर रहे हैं। दिब्येन्दु मानते हैं, सच्चे कलाकारों को देर-सवेर काम जरूर मिलता है।