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Tuesday, September 17, 2019

सिनेमालोक : थिएटर से आए एक्टर


सिनेमालोक
थिएटर से आए एक्टर
पारसी थियेटर के दिनों से फिल्मों में थिएटर से एक्टर आते रहे हैं. आज भी एनएसडी, बीएनए और अन्य नाट्य संस्थाओं और समूहों से एक्टरों की जमात आती रहती है. ड्रामा और थिएटर किसी भी एक्टर के लिए बेहतरीन ट्रेनिंग ग्राउंड हैं. ये कलाकारों को हर लिहाज से अभिनय के लिए तैयार करते हैं. थिएटर के  प्रशिक्षण और अभ्यास से एक्टिंग की बारीकियां समझ में आती हैं. हम देख रहे हैं कि हिंदी फिल्मों में थिएटर से आये एक्टर टिके हुए हैं. वे लंबी पारियां खेल रहे हैं. लोकप्रिय स्टारों को भी अपने कैरियर में थिएटर से आये एक्टर की सोहबत करनी पड़ती है. लॉन्चिंग से पहले थिएटर एक्टर ही  स्टारकिड को सिखाते, दिखाते और पढ़ाते हैं,
आमिर खान चाहते थे कि उनके भांजे इमरान खान फिल्मों की शूटिंग आरंभ करने से पहले रंगकर्मियों के साथ कुछ समय बिताएं. वे चाहते थे कि लखनऊ के राज बिसारिया की टीम के साथ वे कुछ समय रहें और उनकी टीम के साथ आम रंगकर्मी का जीवन जियें. फिल्मों में आ जाने के बाद किसी भी कलाकार/स्टार के लिए साधारण जीवन और नियमित प्रशिक्षण मुश्किल हो जाता है. अपनी बातचीत में आमिर खान ने हमेशा ही अफसोस जाहिर किया है कि अपनी लोकप्रियता की वजह से वह देश के विभिन्न शहरों के रंगकर्मियों और संस्कृतिकर्मियों के साथ बेहिचक समय नहीं बिता पाते. उनके पास साधन और सुविधाएं हैं, इसलिए अपनी हर फिल्म की खास तैयारी करते हुए वे संबंधित प्रशिक्षकों को मुंबई बुला लेते हैं. उनके साथ समय बिताते हैं. आमिर को कभी रंगमंच में विधिवत सक्रिय होने का मौका नहीं मिला, लेकिन उन्होंने कोशिश जरूर की थी.
एक्टर होने का मतलब सिर्फ नाचना, गाना और एक्शन करना नहीं होता, फिल्मों में एक्टर के परीक्षा उन दृश्यों में होती है, जब वे अन्य पात्रों के साथ दृश्य का हिस्सा होते हैं, क्लोजअप और मोनोलॉग में हाव-भाव और संवाद के बीच सामंजस्य और संतुलन बिठाने में उनके प्रतिभा की झलक मिलती है, पिछले 10-20 सालों की फिल्मों पर गौर करें तो पाएंगे कि फिल्मों में थिएटर से आये एक्टरों की आमद बढ़ी है. पारसी थियेटर,इप्टा,एनएसडी,एक्ट वन, अस्मिता और दूसरे छोटे -बड़े थिएटर ग्रुप से एक्टर फिल्मों में आते रहे हैं. पृथ्वीराज कपूर, बलराज साहनी, ओम शिवपुरी, प्यारे मोहन सहाय, मनोहर सिंह, सुरेखा सीकरी, अनुपम खेर,परेश रावल, नीना गुप्ता, ओम पुरी, इरफान, मनोज बाजपेयी, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, रघुवीर यादव और राजपाल यादव जैसे कलाकारों की लम्बी फेहरिश्त तैयार की जा सकती है. इन सभी की मौजूदगी ने गहरा प्रभाव डाला है.
21वीं सदी में फिल्मों का अभिनय बिल्कुल बदल चुका है. अब स्टाइल से अधिक जोर नेचुरल होने पर दिया जा रहा है. कलाकारों के ऑर्गेनिक एक्सप्रेशन की मांग बढ़ रही है. निर्देशक थिएटर से आए एक्टर से अपेक्षा करते हैं कि वे कुछ नया करेंगे. उनकी वजह से फिल्मों में जान आ जाती है. एक थिएटर एक्टर ने बहुत पहले बताया था कि उनके जैसे एक्टर ही किसी फिल्म के स्तंभ होते हैं. स्टार तो दमकते कंगूरे होते हैं. फिल्में उन पर नहीं टिकी रहती है, लेकिन चमक-दमक के कारण वे ही दर्शकों की निगाह में रहते हैं. फिल्मों की सराहना और समीक्षा में सहयोगी कलाकारों के योगदान पर अधिक बल और ध्यान नहीं दिया जाता. सच्चाई तो यह है कि सहयोगी भूमिकाओं में सक्षम कलाकार हों तो फिल्म के हीरो/स्टार को बड़ा सहारा मिल जाता है. सहयोगी कलाकारों का सदुपयोग करने में आमिर खान सबसे होशियार हैं. ‘लगान’ के बाद उनकी हर फिल्म में सहयोगी कलाकारों की खास भूमिका रही है.
थिएटर से आये एक्टर ने हिंदी फिल्मों की एक्टिंग बदल दि है. यकीन ना हो तो कुछ दशक पहले की फिल्में देखें और अभी की फिल्में देखें. तुलना करने पर आप पाएंगे कि थिएटर एक्टरों के संसर्ग में आने के बाद मेनस्ट्रीम फिल्मों के स्टार की शैली और अभिव्यक्ति में गुणात्मक बदलाव आ जाता है. इसके अलावा एक और बात है. आम पाठक और दर्शक नहीं जानते होंगे कि किसी भी नए कलाकार/स्टारकिड की ट्रेनिंग के लिए थिएटर से आये एक्टर को ही हायर किया जाता है. शूटिंग आरंभ होने से पहले वे इन्हें प्रशिक्षित करते हैं. संवाद अदायगी से लेकर विभिन्न इमोशन के एक्सप्रेशन के गुर सिखाते हैं. वे उनकी प्रतिभा सींचते और निखारते हैं.


संडे नवजीवन : हिंदी दर्शक.साहो और प्रभास


संडे नवजीवन
हिंदी दर्शक.साहो और प्रभास
-अजय ब्रह्मात्मज
एस राजामौली की फिल्म बाहुबली से विख्यात हुए प्रभास की ताजा फिल्म साहो’  को दर्शकों-समीक्षकों की मिश्रित प्रतिक्रिया मिली है. यह फिल्म अधिकांश समीक्षकों को पसंद नहीं आई, लेकिन फिल्म ने पहले वीकेंड में 79 करोड़ से अधिक का कलेक्शन कर जता दिया है कि दर्शकों की राय समीक्षकों से थोड़ी अलग है. ‘साहो’ का हिंदी संस्करण उत्तर भारत के हिंदी दर्शकों के बीच लोकप्रिय हुआ है. अगर यह फिल्म तेलुगू मलयालम और तमिल में नहीं होती. पूरे भारत में सिर्फ हिंदी में रिलीज हुई होती तो वीकेंड कलेक्शन 100 करोड़ से अधिक हो गया होता. वैसे तेलुगू,हिंदी,तमिल और मलयालम का कुल कलेक्शन मिला दें तो फिल्म की कमाई संतोषजनक कही जा सकती है.
बाहुबली के बाद प्रभास देश भर के परिचित स्टार हो गए. फिर साहो’ की घोषणा हुई और एक साथ चार भाषाओं में इसके निर्माण की योजना बनी. तभी से दर्शकों का उत्साह नजर आने लगा था. इस फिल्म के निर्माण के पीछे एक अघोषित मकसद यह भी रहा कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में प्रभास के प्रयाण को सुगम बनाया जाए. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से जैकी श्रॉफ और श्रद्धा कपूर को इसी उद्देश्य से फिल्म में जोड़ा गया. बड़े पैमाने पर बन रही इस फिल्म के एक्शन की चर्चा पहले से आरंभ हो गई थी. रिलीज के समय प्रभास और श्रद्धा कपूर की रोमांटिक छवि आई तो कन्फ्यूजन हो गया. खुद प्रभास ने भी रिलीज के समय प्रमोशन के दौरान लगातार इसकी लागत और एक्शन पर हुए खर्च की बात की. सभी दर्शक जानते हैं कि 350 करोड़ की लागत से बनी इस फिल्म में 150 करोड़ तो सिर्फ एक्शन पर खर्च हुआ है. यह अलग मुद्दा है कि क्या अधिक लागत से फिल्म बेहतरीन हो जाती है?
दर्शकों को यही भ्रम होगा कि ‘साहो’ की लागत 350 करोड़ है. किसी भी इंटरव्यू में न तो प्रभास ने बताया और ना ही किसी पत्रकार ने स्पष्ट किया कि 350 करोड़ में चार भाषाओं में यह फिल्म बनी है. इस हिसाब से प्रति फिल्म लागत 87.5 करोड़ ठहरती है. आजकल थोड़ी बड़ी फिल्म के लिए इतनी लागत तो आम बात है. बहरहाल, 350 करोड़ की लागत से बनी यह फिल्म प्रभास की ‘बाहुबली’ की लोकप्रियता का सहारा लेकर रिलीज की गई. दर्शकों को ‘बाहुबली 1-2’ के प्रभास याद रहे. उन्होंने इस फिल्म के हिंदी संस्करण को समर्थन दिया. हिंदी में यह फिल्म मेट्रो शहरों और मल्टीप्लेक्स से अधिक छोटे शहरों और सिंगल स्क्रीन में चल रही है. इसके बावजूद यह नहीं कहा जा सकता कि हिंदी फिल्मों इन्दुस्त्र खुली बाँहों से प्रभास का स्वागत करने के लिए तैयार है.
बहुत पीछे ना जाएँ तो भी याद कर लें कि तेलुगू फिल्म इंडस्ट्री से चिरंजीवी, नागार्जुन और पवन कल्याण ने हिंदी फिल्मों में पहले दस्तक दी है. इनमें चिरंजीवी और नागार्जुन की खास पहचान भी बनी है, लेकिन इनमें से कोई अभी तक हिंदी दर्शकों के बीच तमिल फिल्म इंडस्ट्री के स्टार रजनीकांत और कमल हसन जैसी ऊंची लोकप्रियता नहीं छू सका. बाद में रामचरण और राना डग्गुबाती भी हिंदी फिल्मों में आए. तेलुगू समेत सभी दक्षिण भारतीय भाषाओं के फेमस कलाकार अपनी लोकप्रियता और प्रतिष्ठा के विस्तार के लिए हिंदी फिल्मों में कदम रखते हैं. इससे उन्हें अखिल भारतीय पहचान मिलती है. उम्मीद थी कि प्रभास के आगमन की धमक हिंदी फिल्म इंडस्ट्री महसूस करेगी, लेकिन ऐसा कोई हंगामा नहीं हुआ. फिल्म की रिलीज से पहले या बाद में प्रभास की किसी हिंदी फिल्म की घोषणा नहीं हुई है. ‘साहो’ से उनकी लोकप्रियता में कोई खास इजाफा भी नहीं हो सका. ‘बाहुबली’ से मिली पहचान ही बनी हुई है.
वास्तव में ‘बाहुबली’ के पहले प्रभास को बड़ी कामयाबी नहीं मिली थी. सन 2002 में वह ‘ईश्वर’ में दिखे थे, लेकिन उस फिल्म पर किसी का ध्यान नहीं दिया था. तीसरी फिल्म ‘वर्षम’ से उन्हें थोड़ी पहचान मिली. इस फिल्म से ‘बाहुबली’ तक के सफर में प्रभास की सफलता का अनुपात कम ही रहा है. उनकी एक फिल्म हिट हो जाती थी और फिर अगली हिट के पहले तीन-चार फिल्में फ्लॉप हो जाती थीं. हां, एक अच्छी बात रही कि उनकी हिट फिल्मों ने हमेशा नए रिकॉर्ड बनाए. तेलुगू के मशहूर डायरेक्टर एस राजामौली और पूरी जगन्नाथ के साथ कुछ फिल्मों में उन्हें बड़ी कामयाबी मिली. उन्हीं दिनों उनकी फिल्म ‘डार्लिंग’ आई थी. इस फिल्म में उनका किरदार दर्शकों को इतना पसंद आया कि उन्होंने प्रभास को ‘डार्लिंग स्टार’ का नाम दे दिया. तेलुगू फिल्म इंडस्ट्री में लोकप्रिय मेल स्टारों को ‘मेगा पावर स्टार’,’स्टाइलिश स्टार’ और ‘पॉवर स्टार’ जैसे नाम मिले हैं. प्रभास को ‘डार्लिंग स्टार’ के नाम से लोग जानते हैं.
कह सकते हैं कि 10 जुलाई 2015 से प्रभास की जिंदगी और फिल्म कैरियर में बड़ा बदलाव आया. ‘बाहुबली - द बिगिनिंग’ रिलीज़ हुई और प्रभास की राष्ट्रीय पहचान की शुरुआत हुई. इस फिल्म ने प्रभास के धैर्य और त्याग की भी परीक्षा ली थी. एस राजामौली ने उन्हें निर्देश दिया था कि ‘बाहुबली’ के दोनों भाग प्रदर्शित होने तक वे कोई और फिल्म नहीं करेंगे और ना श्री व् लुक में कोई बदलाव करेंगे. इन दोनों फिल्मों के निर्माण में 5 साल लगे. फिल्म इंडस्ट्री में जहां हर शुक्रवार को स्टार के भाग्य और भविष्य बदल जाते हैं, वहां प्रभास ने 5 सालों का समय सिर्फ एक फिल्म के लिए समर्पित कर दिया था. इस समर्पण का उन्हें भरपूर लाभ मिला. वह राष्ट्रीय पहचान के साथ उभरे. याद करें तो ‘साहो’ की घोषणा के समय से ही हिंदी के दर्शकों के बीच उनके प्रयास और अवतार को देखने इंतजार बढ गया था.
‘साहो’ के प्रमोशन के दौरान प्रभास ने संकेत तो दिया था कि मुंबई के दो-तीन निर्माताओं के साथ हिंदी फिल्मों के लिए बातें चल रही हैं,लेकिन निर्माताओं या फिल्मों के नाम नहीं बताये थे. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का अनोखा रिवाज है. किसी बड़ी संभावना की भनक लगते ही निर्माता नए सितारों से मिलने-मिलाने लगते हैं. उनसे नए प्रोजेक्ट की सहमति ले लेते हैं. उन्हें एडवांस और साइनिंग के तौर पर एक राशि भी दे दी जाती है. संभावना को सफलता मिली तो सब कुछ आरंभ हो जाता है, अन्यथा निर्माता पुरानी संभावना को भूल जाते हैं. अभी तक तो प्रभास की किसी फिल्म की अधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन ट्रेड विशेषज्ञ बताते हैं कि हिंदी या तेलुगू फिल्म का कोई निर्माता द्विभाषी पर विचार कर सकता है. ‘सहो’ का ही सन्दर्भ लें तो यह फिल्म हिंदी से बेहतर कमाई तेलुगू में कर रही है. दो भाषाओं के दर्शकों के बीच लोकप्रिय स्टार पर कोई भी निर्माता दांव लगाने को तैयार हो जायेगा.
‘बाहुबली’ में प्रभास के हिंदी संवाद शरद केलकर ने डब की थी. ‘साहो’ में उन्होंने अपने संवाद खुद बोले. उनकी हिंदी में तेलुगू का लहजा है.. जैसे कमल हसन की हिंदी में तमिल का लहजा रहता है. दर्शकों को इससे अधिक फर्क नहीं पड़ता बशर्ते उनका मनोरंजन हो रहा हो. प्रभास ने ‘साहो’ में सही उच्चारण के साथ हिंदी बोलने के लिए डायलॉग कोच भी रखा था. कमाल अहमद ने उनकी मदद की थी. अब यह देखना रोचक होगा कि हिंदी फिल्मों के उभरते लोकप्रिय सितारों के बीच प्रभाव हिंदी फिल्मों के आकाश में कैसे अपनी जगह बना पाते हैं?


Tuesday, September 10, 2019

सिनेमालोक : करण देओल की लॉचिंग


सिनेमालोक
करण देओल की लॉचिंग
-अजय ब्रह्मात्मज
अगले हफ्ते सनी देओल के बेटे और धर्मेंद्र के पोते करण देओल की पहली फिल्म ‘पल पल दिल के पास’ रिलीज होगी. इसका निर्माण और निर्देशन खुद सनी देओल ने किया है. शुरू में खबर आई थी कि इम्तियाज अली या राहुल रवैल इस फिल्म का निर्देशन करेंगे, लेकिन सनी देओल ने बेटे की लॉचिंग की कमान किसी और को नहीं सौंपी. जब उनसे पूछा गया कि किसी और को निर्देशन की जिम्मेदारी क्यों नहीं दी तो उनका जवाब था कि मैं खुद निर्देशक हूं. सच्ची, इस तथ्य से कौन इंकार कर सकता है, लेकिन यह बात तो जहन में आती है कि सनी देओल निर्देशित फिल्मों का क्या हश्र हु? पुत्रमोह में सब कुछ अपनी मुट्ठी में रखना हो तो कोई भी कारण, प्रश्न या तर्क समझ में नहीं आएगा,
इस फिल्म के ट्रेलर और गानों से यह एहसास तो हो रहा है कि ‘पल पल दिल के पास’ खूबसूरत लोकेशन पर बनी फिल्म है’ इस फिल्म की शूटिंग के लिए पूरी यूनिट ने दुर्गम घाटियों की चढ़ाई की. करण देवल और सहर बांबा ने मुश्किल स्टंट किए. फिल्म एक्शन और रोमांस से भरपूर है. कोशिश है कि दादा धर्मेंद्र और पिता सनी देओल की अभिनय छटा और छवि के साथ करण देओल को पेश किया जाए. सनी देओल ने नयनाभिरामी लोकेशन के साथ दिल दहला देने वाले एक्शन को जोड़ा है. यह फिल्म दादा-पिता के भाव और अंदाज को साथ लेकर चलती है. ट्रेलर में ही दिख रहा है कि करण देओल को भी पिता की तरह चीखने के दृश्य दिए गए हैं. फिलहाल ढाई किलो का मुक्का तो नहीं दिख रहा है,लेकिन मुक्का  है और उसकी गूंज भी सुनाई पड़ती है.
‘पल पल दिल के पास’ टाइटल धर्मेंद्र की फिल्म ‘ब्लैकमेल’ के गीत से लिया गया है’ इस गीत में राखी और धर्मेंद्र के रोमांटिक खयालों के दृश्य में अद्भुत आकर्षण है’ पहाड़ी लोकेशन पर शूट किए गए इस गीत में धर्मेंद्र के प्यार को शब्द दिए गए हैं. उसी रोमांस को दोहराने और धर्मेंद्र के साथ जोड़ने के लिए फिल्म का टाइटल चुना गया. इस फिल्म का नाम सुनते ही धर्मेंद्र का ध्यान आता है. उनके साथ करण देओल का रिश्ता उनकी लोकप्रियता को ताजा कर देता है. सनी देओल ने सोच-समझकर ही यह रोमांटिक टाइटल चुना है. वे अपने पिता से मिली विरासत से बेटे को रुपहले पर्दे पर जोड़ रहे हैं. करण देओल के प्रति जो भी उत्साह बनाया वह सिर्फ और सिर्फ धर्मेंद्र और सनी देओल की वजह से है. रिलीज होने के बाद पता चलेगा कि यह फिल्म दर्शकों के दिल के पास टिकती है या नहीं?
हिंदी फिल्मों में नेपोटिज्म की चर्चा जोरों पर है. यही सच्चाई है कि स्टार और डायरेक्टर अपने बच्चों के लिए प्लेटफार्म बनाते रहेंगे. सामंती समाज के हिंदी दर्शक दादा और पिता से बेटे को सहज ही जोड़ लेते हैं. हिंदी फिल्मों में आए और आ रहे आउटसाइडर ईर्ष्या करते रहें और भिन्नाते रहें. नेपोटिज्म का सिलसिला चलता रहेगा. आने वाले सालों में और भी स्टारकिड लॉन्च किए जाएंगे. उनकी लॉचिंग को वाजिब ठहराने की कोशिश भी की जाएगी. इस सिलसिले और तरकीब के बावजूद हमें या नहीं भूलना चाहिए कि दर्शक आखिरकार खुद फैसला लेते हैं और चुनते हैं. उन्होंने सनी देओल को प्यार दिया लेकिन बॉबी देओल को भूल गए. कपूर खानदान और सलमान खान के परिवार में भी हम इसके उदाहरण देख सकते हैं. प्रचार के बाद भी चलता वही है जिसमें सार हो. दर्शक थोथी प्रतिभाओं को उड़ा देते हैं.
‘पल पल दिल के पास’ में सनी देओल ने और भी पुरानी तरकीब इस्तेमाल की है. गौर किया होगा कि फिल्म के मुख्य किरदारों के नाम करण और सहर ही हैं. उनके सरनेम भले ही सिंह और सेठी कर दिए गए हों. ‘बेताब’ में सनी देओल का नाम सनी ही रखा गया था. किरदार को कलाकार का नाम देने के पीछे यही यत्न रहता है कि नए कलाकार का नाम दर्शकों को बार-बार सुनाया और बताया जाए. करण देओल और सहर बांबा अभी पूरे आत्मविश्वास में नहीं दिख रहे हैं. विभिन्न चैनलों पर आये इंटरव्यू में वे दोनों सनी देओल के साथ ही दिखे. हर इंटरव्यू में सनी देओल ही बोलते रहे. करण देओल ने कम बातें कीं और सहर बांबा ने तो और भी कम. ना तो पत्रकारों के पास करण देओल के लिए नए सवाल थे और न करण के जवाबों में कोई नवीनता सुनाई पड़ी.
अब देखना है कि अगले हफ्ते दर्शक क्या फैसला सुना रहे हैं?


Tuesday, September 3, 2019

सिनेमालोक : लागत और कमाई की बातें


सिनेमालोक
लागत और कमाई की बातें
-अजय ब्रह्मात्मज

निश्चित ही हम जिस उपभोक्ता समाज में रह रहे हैं, उसमें कमाई, आमदनी, वेतन आदि का महत्व बहुत ज्यादा बढ़ गया है, काम से पहले दाम की बात होती है, सालाना पैकेज पर चर्चा होती है, जी हां, पहले हर नौकरी का मासिक वेतन हुआ करता था. अब यह वार्षिक वेतन हो चुका है. समाज के इस ट्रेंड का असर फिल्म इंडस्ट्री पर भी पड़ा है. आये दिन फिल्मों के 100 करोड़ी होने की खबर इसका नमूना है. अब तो मामला कमाई से आगे बढ़कर लागत तक आ गया है. निर्माता बताने लगे हैं कि फलां सीन, फला गाने और फला फिल्म में कितना खर्च किया गया?
कुछ महीने पहले खबर आई थी कि साजिद नाडियाडवाला की नितेश तिवारी निर्देशित ‘छिछोरे’ के एक गाने के लिए 9 करोड़ का सेट तैयार किया गया था. फिल्म देखने के बाद ही पता चलेगा कि सेट की वजह से उक्त गाना कितना मनोरंजक या प्रभावशाली बन पाया? फिलहाल 9 करोड़ की लागत अखबार की सुर्खियों के काम आ गई. सोशल मीडिया. ऑनलाइन और दैनिक अखबारों ने इस खबर को प्रमुखता से छापा. मीडिया के व्यापक कवरेज से फिल्म के प्रति जिज्ञासा बढ़ ही गई होगी. जाहिर सी बात है कि सामान्य से अधिक लागत का जिक्र करने से निर्माताओं को फायदा ही होता है,इसलिए वे इस पर जोर देने लगे हैं.

Sunday, September 1, 2019

फिल्म लॉन्ड्री : कैसे और क्यों अपने ही देश में पहचान खोकर हम पराए और शरणार्थी हो गए - संजय सूरी


कैसे और क्यों अपने ही देश में पहचान खोकर हम पराए और शरणार्थी हो गए - संजय सूरी
अजय ब्रह्मात्मज
देखते-देखते 20 साल हो गए. 25 जून 1999 को संजय सूरी कि पहली फिल्म ‘प्यार में कभी कभी’ रिलीज़ हुई थी. तब से वह लगातार एक खास लय और गति से हिंदी फिल्मों में दिख रहे हैं.
संजय सूरी बताते हैं,’ सच कहूं तो बचपन में कोई प्लानिंग नहीं थी. शौक था फिल्मों का. सवाल उठता था मन में फ़िल्में कैसे बनती हैं? कहां बनती हैं? यह पता चला कि फ़िल्में मुंबई में बनती हैं. मुझे याद है ‘मिस्टर नटवरलाल’ की जब शूटिंग चल रही थी तो उसके गाने ‘मेरे पास आओ मेरे दोस्तों’ में हम लोगों ने हिस्सा लिया था. बच्चों के क्राउड में मैं भी हूं. मेरी बहन भी हैं. मैं उस गाने में नहीं दिखाई पड़ता हूं. मेरी सिस्टर दिखाई पड़ती है. मेरी आंख में चोट लग गई थी तो मैं एक पेड़ के पीछे छुप गया था. रो रहा था. श्रीनगर में फिल्में आती थी तो मैं देखने जरूर जाता था. तब तो हमारा ऐसा माहौल था कि सोच ही नहीं सकते थे कि कभी निकलेंगे यहां से...’



संडे नवजीवन : घर-घर में होगा फर्स्ट डे फर्स्ट शो


संडे नवजीवन
घर-घर में होगा फर्स्ट डे फर्स्ट शो
-अजय ब्रह्मात्मज

सिनेमा देखने का शौक बहुत तेजी से फैल रहा है. अब जरूरी नहीं रह गया है कि सिनेमा देखने के लिए सिनेमाघर ही जाएँ. पहले टीवी और बाद में वीडियो के जरिए यह घर-घर में पहुंचा. और फिर मोबाइल के आविष्कार के बाद यह हमारी मुट्ठी में आ चुका है. उंगलियों के स्पर्श मात्र से हमारे स्मार्ट फोन पर फिल्में चलने लगती है. वक्त-बेवक्त हम कहीं भी और कभी भी सिनेमा देख सकते हैं. एक दिक्कत रही है कि किसी भी फिल्म के रिलीज के दो महीनों (कम से कम 8 हफ्तों) के बाद ही हम घर में सिनेमा देख सकते हैं. पिछले दिनों खबर आई कि अब दर्शकों को आठ हफ्तों का इंतजार नहीं करना होगा. अगर सब कुछ योजना के मुताबिक चलता रहा तो बगैर सिनेमाघर गए देश के दर्शक ‘फर्स्ट डे फर्स्ट शो’ देख सकेंगे.
पिछले दिनों जियो टेलीकॉम के सर्वेसर्वा ने अपनी कंपनी की जीबीएम में घोषणा कर दी कि 2020 के मध्य तक वे अपने उपभोक्ताओं को ‘फर्स्ट डे फर्स्ट शो’ की सुविधा दे देंगे. दरअसल, जियो ब्रॉडबैंड की विस्तार योजनाओं की दिशा में यह पहल की जा रही है. दावा है कि पूरी तरह से एक्टिव होने के बाद जियो ब्रॉडबैंड अपने उपभोक्ताओं को बेहिसाब फिल्में देखने की सुविधा देगा. इसमें सबसे बड़ी सुविधा ‘फर्स्ट डे,फर्स्ट शो’ की होगी. हम सभी जानते हैं कि देश में सिनेमाघरों की संख्या लगातार कम हुई है. इससे संबंधित चिंताएं और बहसें तो सुनने को मिलती हैं, लेकिन टूट रहे सिंगल स्क्रीन की भरपाई नहीं हो पा रही है. शहरों में मेट्रो में मल्टीप्लेक्स तो हैं, लेकिन उनके प्रवेश दर(टिकट) इतने महंगे हैं कि आम दर्शक चाहने के बावजूद फिल्में नहीं देख पाते. नतीजा यह होता है कि वे फिल्में देखने के अवैध तरीकों का उपयोग करते हैं छोटे शहरों और कस्बों की तो वास्तविक मजबूरी है. बड़ी से बड़ी फिल्में भी छोटे शहरों और कस्बों में नहीं पहुंच पाती. उन्हें अपने आसपास के जिला शहरों में जाकर फ़िल्में देखनी पड़ती है. जाहिर सी बात है कि यात्रा व्यय की वजह से इन फिल्मों को देखने का खर्च बढ़ जाता है. ऐसी स्थिति में ज्यादातर दर्शक 10-20 रुपयों पायरेटेड फिल्म खरीदते हैं और आपस में बांटकर देखते हैं.
मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु जैसे मेट्रो शेरोन में भी फिल्म की रिलीज के दिन ही लोकल ट्रेन, मेट्रो ट्रेन और पब्लिक ट्रांसपोर्ट में सफर कर रहे शहरी आराम से मोबाइल पर ताजा फिल्में देख रहे होते हैं. वेरोक यह सब चल रहा है. फिर भी निर्माताओं के लिए थिएटर बहुत बड़ा सहारा है. फिल्मों के हिट-फ्लॉप का पैमाना बॉक्स ऑफिस ही है. फिक्की की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक 2018 में भारतीय फिल्मों का कुल कारोबार 175 अरब अमेरिकी डॉलर था, जिसमें से 75% कमाई थिएटर के जरिए आई थी. पिछले कुछ सालों में डिजिटल प्लेटफॉर्म तेजी से बढ़े हैं; दर्शकों की फिल्म देखने की प्रवृत्ति में बदलाव आ रहा है. इसके अलावा कुछ दर्शकों के लिए परदे का आकार ज्यादा मायने नहीं रखता. वे सिंपल मोबाइल के रसीदी टिकट साइज के परदे पर भीफिल्म देखने का आनंद उठा लेते हैं. इन सबके लिए ‘फर्स्ट डे,फर्स्ट शो’ किसी लॉटरी से कम नहीं होगी.
पिछले दिनों पीवीआर, आईनॉक्स और कार्निवाल मल्टीप्लेक्स चेन ने आधिकारिक विज्ञप्ति जारी की. विज्ञप्ति में आसन्न संकट के साथ फिल्मों के सामूहिक दर्शन के आनंद की वकालत की गई है. बताया गया है कि समूह में ही फिल्म देखी जानी चाहिए. थिएटर की तकनीकी सुविधाओं से फिल्म के सौंदर्य, रस, दृश्य, आदि का भरपूर आस्वादन लिया जा सकता है. इन तथ्यों से इंकार नहीं किया जा सकता, लेकिन आभाव में जी रहा दर्शक फिल्म की तकनीकी खूबियों से अधिक दृश्य और संवादों तक ही सीमित रहता है. उनके लिए संवादों के जरिए उद्घाटित हो रही कहानी ही पर्याप्त होती है. सिनेमाघरों में जाकर फिल्में देख रहे दर्शकों में बहुत कम ही मानक प्रोजेक्शन से परिचित होते हैं. मेट्रो से लेकर छोटे शहरों तक में सिनेमाघरों के मालिक प्रोजेक्शन की क्वालिटी में कटौती कर मामूली पैसे बचाते हैं. क्वालिटी से अपरिचित दर्शक खराब साउंड और प्रोजेक्शन से ही आनंदित हो जाता है. कमियों और सीमाओं के बावजूद दर्शक यूट्यूब और दूसरे स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म से प्रसारित शो और फ़िल्में देख कर क्वालिटी के प्रति सजग हो रहे हैं, उनके पास फिल्में देखने की सुविधाएं नहीं पहुंच पा रही हैं. अगर उन्हें फाइबर के जरिए ब्रॉडबैंड के माध्यम से एचडी क्वालिटी की वीडियो और 5.1 ऑडियो सम्पान सिनेमा मिलेगा तो वे क्यों न टूट पड़ेंगे? अब कमाई में कटौती की आशंका बढ़ी है तो मल्टीप्लेक्स मालिकों को दर्शकों की चिंता सताने लगी है. वे उन्हें आनंद के तरीके समझाने और बताने लगे हैं.
असल दुविधा, मुश्किल और चिंता इस बात की होगी कि कितने निर्माता-निर्देशक ‘फर्स्ट डे,फर्स्ट शो’ स्कीम के लिए अपनी फिल्में देने के लिए राजी होंगे? इन फिल्मों के प्रसारण अधिकार का मूल्य निर्धारण कैसे होगा? अभी तक फिल्म के प्रचार, फिल्म के स्टार और फिल्म के कारोबार की संभावना के आधार पर सारी चीजें तय होती रही हैं. अब पहले की तरह टेरिटरी के आधार पर मूल्य निर्धारण नहीं होता. अभी तो केवल कारोबार की संभावना के आधार पर स्क्रीन की संख्या तय की जाती है. यह 500 से 5000 के बीच कुछ भी हो सकती है. प्रतिदिन के कलेक्शन के आधार पर फिल्म के हिट या फ्लॉप का निर्धारण होता है. ‘फर्स्ट डे,फर्स्ट शो’ का अधिकार देने के पहले किस आधार पर पैसे तय किए जाएंगे? अभी तक का घोषित-अघोषित नियम है कि थिएटर रिलीज के 8 हफ्तों के बाद ही टीवी, डिजिटल, वीडियो और सेटेलाइट आदि के प्रसारण अधिकार दिए जाएं. ‘राजमा चावल’ और ‘लव पर स्क्वायर फीट’ जैसी फिल्में सीधे स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म पर आईं. उनके प्रति दर्शकों का उत्साह थोड़ा कम ही दिखा. ओटीटी प्लेटफॉर्म ने अपने मिजाज के अनुरूप वेब सीरीज का मीडियम विकसित कर लिया है. वहां 8 हफ्ते के बाद फिल्में भी आ जाती हैं, जिन्हें दर्शक अपनी सुविधा से देख लेता है, ‘फर्स्ट डे,फर्स्ट शो’ की संभावना नियम, पाबंदी और दूसरों अवरोधों को तोड़ने की एकबारगी उम्मीद    दे दी है. दर्शक हर लिहाज से फायदे में रहेगा. परेशानी प्रदर्शकों की बढ़ रही है और निर्माता असमंजस में है.
मनोरंजन के कारोबारी और विशेषज्ञ कोई राह निकाल ही लेंगे. नई तकनीक को रोका नहीं जा सकता. सिनेमा पर ऐसे अस्थायी संकट आते रहे हैं. टीवी आया तो सिनेमा खत्म हो रहा था. वीडियो सिनेमा के लिए मौत के फंदे की तरह आया था. डिजिटल क्रांति के बाद सिनेमा के दम घुटने की बातें की जाने लगी. फिर भी हम देख रहे हैं कि कारोबारी और दर्शक अपने लिए राह निकाल लेते हैं और सिनेमा सरवाइव कर रहा है. नई संभावना के मध्य यह भी कहा जा रहा है कि अगर फिल्में मिलने में दिक्कतें हुई तो ब्रॉडबैंड कंपनी खुद ही निर्माता-निर्देशकों को फिल्में बनाने का ऑफर देंगी और साल भर का कैटलॉग तैयार कर लेंगी इस विकल्प के बावजूद हम जानते हैं कि भारतीय सिनेमा में रुचि-अभिरुचि फिल्म सितारों और खासकर लोकप्रिय सितारों की वजह से होती है. अगर चोटी के लोकप्रिय स्टारों की फिल्में ‘फर्स्ट डे, फर्स्ट शो’ में उपलब्ध नहीं होंगी तो दर्शक आरंभिक उत्साह के बाद उदासीन हो जाएंगे.
देखना यह है कि मनोरंजन की इस रस्साकशी में कौन विजयी होता है? दर्शक तो हर हाल में फायदे में रहेगा. उसे कम फीस देकर अधिक फिल्में देखने को मिलेंगी. ऊपर से ‘फर्स्ट डे,फर्स्ट शो’ का बोनस मिल गया तो हर शुक्रवार सुहाना और गुलजार हो उठेगा. यह बहुत दूर की संभावना है, लेकिन यह हो भी सकता है कि देश में साप्ताहिक अवकाश का दिन रविवार के बजाय शुक्रवार हो जाए, क्योंकि नई फिल्में शुक्रवार को घर-घर में उपलब्ध होंगी. सिनेमा घर में आ जाएगा तो सिनेमाघर जाने की जहमत कौन उठाएगा?


Tuesday, August 27, 2019

सिनेमालोक : गेट बचा रहेगा आरके का


सिनेमालोक
गेट बचा रहेगा आरके का
-अजय ब्रह्मात्मज
दो साल पहले 16 सितंबर 2017 को आरके स्टूडियो में भयंकर आग लगी थी. इस घटना के बाद कपूर खानदान के वारिसों में तय किया कि वे इसे बेच देंगे. इसे संभालना, संरक्षित करना या चालू रखने की बात हमेशा के लिए समाप्त हो गई. आग लगने के दिन तक वहां शूटिंग चल रही थी. यह आग एक रियलिटी शो के शूटिंग फ्लोर पर लगी थी. देखते ही देखते आरके की यादें जलकर खाक हो गईं. कोई कुछ भी सफाई दे, लेकिन कपूर खानदान के वारिसों की लापरवाही को नहीं भुलाया जा सकता. स्मृति के तौर पर रखी आरके की फिल्मों से संबंधित तमाम सामग्रियां इस आगजनी में स्वाहा हो गईं. अगर ढंग से रखरखाव किया गया रहता और समय से बाकी इंतजाम कर दिया गया होता तो आग नहीं लगती. आरके स्टूडियो की यादों के साक्ष्य के रूप में मौजूद संरचना, इमारतें,स्मृति चिह्न और शूटिंग फ्लोर सब कुछ बचा रहता.
पिछले हफ्ते खबर आई कि आरके स्टूडियो खरीद चुकी गोदरेज प्रॉपर्टीज कंपनी ने तय किया है कि इस परिसर के अंदर में जो भी कंस्ट्रक्शन हो इसके बाहरी रूप में बदलाव् नहीं किया जाएगा. आरके स्टूडियो का गेट जस का तस बना रहेगा. कहा यह भी जा रहा है कि इस प्रावधान से इस परिसर के दर्शकों, पर्यटकों और रहिवासियों को आरके की याद दिलाता रहेगा. चेम्बूर से गुजर रहे राहगीर इसे अपनी सवारियों से ही देख सकेंगे. पूरा मामला कुछ यूं है कि आरके स्टूडियो की यादों को दरबान बना दिया जाएगा. प्रेम पत्र के लिफाफे में बिजली बिल रखने जैसा इंतजाम है यह. राज कपूर के बेटे रणधीर कपूर ने इस प्रावधान पर खुशी जाहिर की है. राज कपूर के बेटों की मजबूरी रही होगी, लेकिन भारत और महाराष्ट्र सरकार इस दिशा में पहल कर सकती थी. पूरे भूभाग को खरीदकर राज कपूर समेत हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के संग्रहालय के रूप में इसे विकसित किया जा सकता था. अभी पेडर रोड पर फिल्म्स डिवीजन के प्रांगण में भारतीय सिनेमा का राष्ट्रीय संग्रहालय खोला गया है. उसके लिए या एक मुनासिब और यादगार जगह होती’
याद करें तो राज कपूर ने 1948 में आरके स्टूडियो के स्थापना की थी. उस दौर में स्टूडियो सिस्टम का बोलबाला था. इरादों के पक्के राज कपूर ने पहली फिल्म का प्रोडक्शन अपने बैनर से ही किया. उनकी पहली फिल्म ‘आग’ ज्यादा नहीं चल पाई थी, लेकिन दूसरी फिल्म ‘बरसात’ की कामयाबी ने राज कपूर को हौसला दिया. ‘बरसात’ के एक रोमांटिक दृश्य को राज कपूर ने आरके फिल्म्स स्टूडियो का लोगो बना दिया. ‘बरसात’ के उस दृश्य में नरगिस मस्ती भरे अंदाज में राज कपूर की दाहिनी बांह में झूल रही हैं और आज कपूर के बाएं हाथ में वायलिन है. यह युगल दशकों से राज कपूर के प्रशंसकों को लुभाती रही है,
राज कपूर के निधन के बाद उनके तीनों बेटों ने मिलजुल कर स्टूडियो को संभाला. राज कपूर के मशहूर कॉटेज, नरगिस के मेकअप रूम और बाकी स्ट्रक्चर को समय के साथ नया रूप-रंग भी दिया गया. लंबे समय तक बेटे बताते रहे कि वे आरके फिल्म्स के लिए फिल्मों का निर्माण और निर्देशन करेंगे. बेटों ने आरंभिक प्रयासों के बाद कुछ नहीं किया. फिर राज कपूर के पोते रणबीर कपूर मशहूर हुए तो उनसे यह सवाल पूछा जाने लगा कि क्या वे आरके के लिए फिल्मों का निर्माण और निर्देशन करेंगे? रणबीर कपूर ने हमेशा हां कहा, लेकिन कोई निश्चित तारीख या योजना नहीं बताई. मजेदार तथ्य है कि यह सवाल कभी करिश्मा कपूर या करीना कपूर से नहीं पूछा गया. आखिर उत्तराधिकारी तो पुरुष ही होता है? 
आरके स्टूडियो का पटाक्षेप होने के बाद मुंबई में उस दौर के तीन स्टूडियो बच गए हैं. महबूब स्टूडियो, फिल्मिस्तान और फिल्मालय. फिल्मालय का एक हिस्सा मॉल और कुछ हिस्सा अपार्टमेंट में तब्दील हो चुका है. फिल्मिस्तान में बदलाव हुआ है. महबूब स्टूडियो पर भी दबाव है. सूचना और प्रसारण मंत्रालय को निजी पहल से इन स्टूडियो के रखरखाव और संरक्षण की व्यवस्था करनी चाहिए. हम एक-एक कर अपनी फिल्म विरासत को नष्ट करते जा रहे हैं. दरअसल, भारतीय समाज और सरकार के पास फिल्मी विरासत के संरक्षण और संभाल की कोई स्कीम ही नहीं है.



Tuesday, August 20, 2019

सिनेमालोक : अभिनेत्रियों की तू तू... मैं मैं...

सिनेमालोक
अभिनेत्रियों की तू तू... मैं मैं...
-अजय ब्रह्मात्मज
निश्चित ही वे हंस रहे होंगे. उनके लिए यह मौज-मस्ती और परनिंदा का विषय बन गया होगा. ‘जजमेंटल है क्या’ की रिलीज के कुछ पहले से अभिनेत्रियों के बीच टिप्पणियों की धींगामुश्तीआरंभ हुई है. यह खत्म होने का नाम नहीं ले रही है. कंगना रनोट और तापसी पन्नू आमने-सामने हैं. दोनों की तरफ से टिप्पणियां चल रही है. एक दूसरे में कमियां निकालने का क्रम जारी है. कहीं न कहीं इस अनावश्यक विवाद से दोनों को लाभ ही हो रहा है. दोनों चर्चा में हैं. सामने से मीडिया और पीछे से इंडस्ट्री का खास तबका मजे ले रहा है. दो बिल्लियों की लड़ाई चल रही है और बाकी उनकी ‘म्याऊं-म्याऊं’ पर सीटी और ताली बजा रहे हैं.
‘जजमेंटल है क्या’ की रिलीज के पहले तापसी पन्नू के ट्वीट का संदर्भ लेते हुए कंगना रनोट की बहन रंगोली चंदेल ने तापसी पन्नू पर टिप्पणी करते हुए उन्हें अपनी बहन की ‘सस्ती कॉपी’ कह दिया. उनकी इस टिप्पणी पर अनुराग कश्यप ने ‘प्रतिटिप्पणी’ की तो रंगोली चंदेल उन पर भी टूट पड़ीं. मामला आगे बढ़ा और ‘जजमेंटल है क्या’ के प्रमोशन के समय कंगना रनोट के हर इंटरव्यू में दो-चार सवाल इस कथित विवाद पर पूछे ही गए. कंगना रनोट ने अपना पक्ष रखा और जवाब देने के लहजे में मखौल और छींटाकशी का टोन रखा. उन्होंने यह भी कहा कि अगर आप किसी पर टिप्पणी करती हैं तो आपको खुद भी टिप्पणियों के लिए तैयार रहना चाहिए. सही बात है, लेकिन इस मामले में दोनों ‘आउटसाइडर’ अभिनेत्रियों को सोचना चाहिए कि इस ‘तू-तू मैं- मैं’ में वे खुद को हास्यास्पद स्थितियों में डाल रही हैं.
इस विवाद की पृष्ठभूमि है. ‘मनमर्जियां’ के प्रमोशन के समय एक रैपिड फायर स्टेशन में कंगना रनोट के लिए सलाह के सवाल पर तापसी पन्नू ने कह दिया था कि उन्हें कुछ भी बोलने के पहले ‘डबल फिल्टर’ का इस्तेमाल करना चाहिए. तात्पर्य था कि बयानबाजी में कंगना रनोट संयम से काम लें. यह बिन मांगी रंगोली चंदेल और कंगना रनोट दोनों को नागवार गुजरी थी. दोनों बहनें मौके की तलाश में थीं. उन्हें मौका मिला तो उन्होंने तापसी पन्नू के लिए ‘पलट टिप्पणी’ कर दी और फिर मामले ने तूल पकड़ लिया’ ‘सस्ती कॉपी’ की टिप्पणी तापसी पन्नू को सबक सिखाने के लिए की गई थी. ऐसा कंगना रनोट ने अपने एक इंटरव्यू में भी कहा.
यूं हीरोइनों की आपसी खटपट देविका रानी के जमाने से चली आ रही है. कामयाबी की राह में आगे बढ़ति अभिनेत्रियां साथ चलते-चलते कई बार अपनी गति और चाल बढ़ाने के लिए हमसफर अभिनेत्रियों पर इस तरह की टिप्पणियां कर देती हैं. पहले यह दबे-ढके और गुटबाजी के तौर पर होता था. द्वंद्व और द्वेष में भी लिहाज रखा जाता था. अब ऐसा नहीं होता. करीना कपूर, रानी मुखर्जी और प्रीति जिंटा के सक्रिय दौर में इंटरव्यू और बातचीत में उनकी परस्पर भद्दी टिप्पणियां चलती रहती थीं. कुछ लोगों को याद होगा कि जब बिपाशा बसु आई ही थीं और उनकी लोकप्रियता बढ़ रही थी तो इंडस्ट्री से आई एक अभिनेत्री ने उन पर अशोभनीय टिप्पणी की थी. श्रीदेवी और माधुरी दीक्षित के प्रतियोगी सालों में भी ऐसा होता रहा था.
प्रकृति का नियम है कि हमेशा नई पौध ज्यादा तेजी से लहलहाती है. उससे स्थापित और थोड़ी पुरानी हो चुकी प्रतिभाओं को अनजान खतरा महसूस होता है. पहले तो एक प्रतियोगी अभिनेत्रि को कोई निर्माता-निर्देशक अतिरिक्त भाव दे दे तो दूसरी अभिनेत्रि रूठ जाती थी. फिल्म अटका देती थी. कई बार छोड़ भी देती थी. ताजा मामले में देखें तो कंगना रनोट निजी मेहनत और निर्देशकों के सहयोग से आगे बढ़ी हैं. उन्हें दर्शकों और समीक्षकों का प्यार मिला है, लेकिन ‘मणिकर्णिका’ पर फिल्म इंडस्ट्री और समीक्षकों से अपेक्षित प्रशंसा और सहयोग न मिलने से वह ज्यादा संवेदनशील हो गई हैं. पिनक जाती हैं. दूसरी तरफ सलीके से आगे बढ़ रही तापसी पन्नू जिस तरह दर्शकों और निर्देशकों का ध्यान खींच रही हैं, उससे थोड़ी सीनियर अभिनेत्रियों में खलबली मची हुई है. अभिनेत्रियों के बीच मौखिक झडपें होती हैं तो मीडिया को चटकारे लेने का मौका मिल जाता है और फिर चालू होता है तमाशा...


Tuesday, August 13, 2019

सिनेमालोक : लोकेशन मात्र नहीं है कश्मीर


सिनेमालोक
लोकेशन मात्र नहीं है कश्मीर
--अजय ब्रह्मात्मज
कश्मीर पृष्ठभूमि, लोकेशन और विषय के तौर पर हिंदी फिल्मों में आता रहा है. देश के किसी और राज्य को हिंदी फिल्मों में यह दर्जा और महत्व हासिल नहीं हो सका है. याद करें तो कुछ गाने भी मिल जाएंगे हिंदी फिल्मों के, जिनमें कश्मीर के नजारो और खूबसूरती की बातें की गई हैं. कश्मीर की वादियों की तुलना स्वर्ग से की जाती है. अमीर खुसरो से लेकर हिंदी फिल्मों के गीतकरों तक ने कश्मीर को जन्नत कहा है. कश्मीर का प्राकृतिक सौंदर्य हर पहलू से फिल्मकारों को आकर्षित करता रहा है. 1990 के पहले की हिंदी फिल्मों में यह मुख्य रूप से लोकेशन के तौर पर ही इस्तेमाल होता रहा है. ‘जब जब फूल खिले’ जैसी दो-चार फिल्मों में वहां के किरदार दिखे थे.
अभी हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के फिल्मकारों से आग्रह किया है कि वे जम्मू, कश्मीर और लद्दाख में अपनी फिल्मों की शूटिंग करें, इससे वहां के लोगों को रोजगार के अवसर मिलेंगे, फिल्मों की शूटिंग से कुछ हफ्तों और महीनों के लिए स्थानीय लोगों को अनेक तरह के रोजगार मिल जाते हैं, अगर फिल्म लोकप्रिय हो जाए तो बाद में टूरिज्म से उस इलाके का फायदा होता है. कश्मीर घूम चुके हुए लोगों को मालूम होगा कि वहां एक ‘बेताब वैली’ है. कश्मीर के हालात बिगड़ने से पहले देश के संपन्न मद्य्वार्गीय नवदंपतियों के हनीमून का एक ठिकाना कश्मीर हुआ करता था. वहां जाकर कश्मीरी लबादे में तस्वीरें खिंचवाना, शिकारे पर सैर करते हुए शम्मी कपूर के अंदाज में झटकेदार पोज की पिक्चर उतारना और उसे एल्बम में संजोकर रखना. आज भी कुछ घरों में पूर्वजों के एल्बमों में कश्मीर इन तस्वीरों में सुरक्षित है.
‘जंगली’, ‘जानवर’,’कश्मीर की कली’, ‘आरजू और’ ‘जब जब फूल खिले’ जैसी लोकप्रिय फिल्मों ने देश के दर्शकों को कश्मीर जाने के लिए प्रेरित किया’ वहां की बर्फीली वादियों में घूमने का अलग रोमांच हुआ करता था’ बताते हैं कि 1947 के अक्टूबर महीने में भारत में शामिल होने के फैसले के बाद राजा हरि सिंह ने फिल्मकारों से कश्मीर आने का व्यक्तिगत आग्रह किया था’ उनके आग्रह को राज कपूर ने अधिक गंभीरता से स्वीकार किया. ‘बरसात’ से लेकर ‘हिना’ तक वह अपनी फिल्मों में किसी न किसी बहाने कश्मीर को लाते रहे’ उनकी फिल्म ‘हिना’ में तो किरदार भी कश्मीर के थे’ कश्मीर में पैदा हुई दिक्कतों के बाद हिंदी फिल्मों को स्विट्जरलैंड का चस्का लगा’ कुछ मजबूरी और कुछ वहां मिल रही सुविधाओं ने यश चोपड़ा समेत अनेक फिल्मकारों को खींच लिया’ कश्मीर में शूट की गई हिंदी फिल्मों की सूची बनाएं तो गिनती 60-75 के आसपास होगी.
कश्मीर के अंदरूनी हलचल की जानकारी पहली बार मणि रत्नम की फिल्म ‘रोजा’ में मिलती है. इस फिल्म में मणि रत्नम ने सबसे पहले कश्मीर की वास्तविक स्थिति के बारे में बताया और दिखाया. ऊपर से दिख रही खूबसूरती की तह में लहूलुहान स्थितियां है. ‘रोजा’ में पड़ोसी देश को नाम और चेहरे के साथ रेखांकित किया गया. उसके बाद तो विलेन का कॉस्ट्यूम ही पठानी सूट हो गया. कई सालों के बाद विधु विनोद चोपड़ा ने ‘मिशन कश्मीर’ में वहां की वास्तविक कठिनाइयों और विरोधाभासों को फिल्म के कथानक में प्रस्तुत किया. उसके बाद से लगातार आतंकवाद के साए में जी रहे कश्मीरियों की कहानियां अलग-अलग दृष्टिकोण से पर्दे पर आती रहीं हैं. कभी किसी ने आतंकवाद को उचित नहीं ठहराया, लेकिन प्रशासन और सैनिकों की मौजूदगी से कश्मीर की आम जिंदगी में पड़ी खलल पर अधिकांश ने उंगली उठाई. ‘हैदर’ में विशाल भारद्वाज ने गंभीरता से कश्मीरियत के सवाल को छुआ और फिल्म के कुछ पर्संग और दृश्य में इसे ‘चुत्स्पा शब्द से अभिव्यक्त किया’
पिछले साल कश्मीर की तकलीफों को लेकर तीन फिल्में आयीं- ‘नोटबुक’, ‘नो फादर्स इन कश्मीर’ और ‘हामिद’. इनमें से हामिद को 2018 का श्रेष्ठ उर्दू फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला. ‘मिशन कश्मीर’ की तरह ही पिछले साल की तीनों फिल्मों में वहां के किरदारों के जरिए फिल्मकारों ने स्थानीय व्यथा का वृत्तांत सुनाया, सुजीत सरकार की ‘यहां’, ओनीर की ‘आई एम...’ और संतोष सिवन की ‘तहान’ आदि फिल्मों में हम वहां के दर्द को देख-सुन सकते हैं’ दरअसल, कश्मीर सिर्फ लोकेशन मात्र नहीं है. थोड़ा गहरे उतरने पर हिंदी फिल्मों के तमाम मसाले वहां मौजूद मिलेंगे. कश्मीर में इमोशन, एक्शन, ड्रामा, ट्रेजडी और प्रहसन सब कुछ है. कोई फिल्मकार हमदर्दी के साथ कश्मीर जाए तो दिल दहला देने वाली कहानियां लेकर लौटेगा. आने वाले सालों में कुछ और दर्दनाक कहानियां वहां से आएंगी. उसके साथ ही कोशिश रहेगी कि खुशहाल कश्मीर के मुस्कुराते चेहरों को भी हिंदी फिल्मों के परदे पर लाया जाए.
पिक्चर अभी बाकी है...


Monday, August 12, 2019

फिल्म लॉन्ड्री : ‘बेइज्जती’ सहो, उन्हें स्वीकार करो, कभी रिएक्ट मत करो और खुद में सुधार करो - दीपक डोबरियाल


फिल्म लॉन्ड्री
‘बेइज्जती’ सहो, उन्हें स्वीकार करो, कभी रिएक्ट मत करो और खुद में सुधार करो - दीपक डोबरियाल
अजय ब्रह्मात्मज
2003 में आई विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘मकबूल’ में थापा का किरदार निभाने के पहले दीपक डोबरियाल ने अनुराग कश्यप की ‘गुलाल’ में राजेंद्र भाटी और  अमृत सागर की ‘1971 में फ्लाइट लेफ्टिनेंट गुर्टू की भूमिकाएं निभा ली थीं. कैमरे से उनका सामना हो चूका था. संयोग कुछ ऐसा बना कि इन दोनों फिल्मों से पहले विशाल भारद्वाज की ‘ओमकारा’ रिलीज हो गई. इस फिल्म में लंगड़ा त्यागी(सैफ अली खान) के साथ वह राजेश तिवारी की भूमिका में दिखे. इस भूमिका में उन्हें भरपूर सराहना और फिल्म फेयर का स्पेशल अवॉर्ड मिला. ‘ओमकारा’ में उनके नाम के पहले ‘इंट्रोड्यूसिंग’ लिखा गया था, जिसे देखकर अनुराग कश्यप ने अफसोस और खुशी जाहिर की थी. दरअसल, ‘गुलाल’ नहीं अटकती और समय पर रिलीज हो जाती तो दीपक डोबरियाल को’ इंट्रोड्यूस’ करने का श्रेय अनुराग कश्यप को मिल जाता.
बहरहाल, ‘ओमकारा’ ने उत्तराखंड के गढ़वाल जिले के कबरा गांव में जन्मे दीपक डोबरियाल के कैरियर को आवश्यक गति दे दी. इस फिल्म के लिए मिली सराहना और पुरस्कार के बावजूद बड़ी पहचान बनाने में दीपक डोबरियाल को चार साल लग गए. 2010 में दीपक डोबरियाल को बेला नेगी के निर्देशन में आई ‘बाएं और दाएं’ में नायक रमेश मजीलता और ‘तनु वेड्स मनु’ में पप्पी की भूमिकाएं मिलीं. पहली फिल्म में वह नायक थे, लेकिन ‘बाएं और दाएं’ सीमित रिलीज की वजह से कम देखी गई. वहीं आनंद राय की ‘तनु वेड्स मनु’ की लोकप्रियता ने पप्पी को दर्शकों का प्रिय बना दिया. पप्पी को बहुत पसंद किया गया. पांच सालों के बाद ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ में फिर से पप्पी की भूमिका ने दीपक डोबरियाल को दोहरी ख्याति के  के साथ छवि का शिकंजा भी दिया. उन्हें कॉमिक रोल के कलाकार के पाश में बांधने की कोशिश की गयी. वे सचेत रहें उन्होंने प्रसिद्धि कायम रखने की आसान राह नहीं चुनी. दुनियावी तौर पर खुद का नुकसान सहा और बेहतरीन किरदार के इंतजार में रहे. मुहावरों में ही ‘सब्र का फल मीठा’ नहीं होता. इंतजार और लगन से जिंदगी में भी मिठास आती है. ‘हिंदी मीडियम’ में दीपक डोबरियाल को अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन का बड़ा मौका दिया. साथ में इरफ़ान थे तो समुचित और समक्ष परफॉर्मेंस के लिए उत्साह भी रहा. इरफ़ान ने सहअभिनेता को प्रदर्शन का पूरा मौका दिया. इस फिल्म में उनका किरदार श्याम प्रकाश कोरी निखर कर दर्शकों के बीच पहुंचा और सहानुभूति व सराहना ले गया. सभी ने माना कि दीपक ने इरफ़ान को टक्कर दी. दीपक मानते हैं कि इरफ़ान भाई से सीखने का मौका मिला.
‘बाबा’ की रिलीज के पहले दीपक डोबरियाल फिर से इरफान के साथ ‘अंग्रेजी मीडियम’ की शूटिंग कर रहे थे. कैंसर की बीमारी से स्वस्थ होकर लौटे इरफान ने ‘अंग्रेजी मीडियम’ के लिए हामी भरी तो उनके प्रशंसकों को सुकून के साथ खुशी मिली. दीपक डोबरियाल और इरफान की केमिस्ट्री फिर से इस फिल्म में दिखेगी. दीपक इस फिल्म के बारे में बताते हुए भावुक हो जाते हैं. उनके लिए एक फ्रेम में इरफान के साथ आना किसी ने नेमत से कम नहीं है. दीपक बताते हैं,’ उन्होंने पूरे फन और एनर्जी के साथ काम किया. इस बार उनका सुर अलग ही दर्जे का है. कहीं भी नहीं लगता कि वे किसी चीज से जूझ रहे हैं. थोड़े दार्शनिक भाव में रहते हैं और शांत हो गए हैं. उन्होंने हमें इतना केयर और प्यार दिया. सेट पर हंसी-खुशी का माहौल रहता था. शॉट लेने से पहले हमारी बैठकी में हंसी-मजाक के फव्वारे फूटते थे. सभी उस में भीग जाते थे. माहौल बन जाता था. मेरी तो यही दुआ है कि वे जल्दी से जल्दी पहले की तरह एक्टिव हो जाएं. दर्शकों को उनका अंदाज दिखे.’ दीपक डोबरियाल इरफ़ान को ‘बाबा’ दिखाना चाहते हैं. इरफ़ान की  प्रतिक्रिया और सराहना की उम्मीद से अधिक दीपक को विश्वास है कि ‘मेरी फिल्म देखकर वे बहुत खुश होंगे. वे मुझे इतना मानते और स्नेह देते हैं कि उनकी खुशी की कल्पना से ही मैं अभिभूत रहता हूं.
‘हिंदी मीडियम’ के बाद दीपक डोबरियाल ‘लखनऊ सेंट्रल’, ‘कालाकांडी’ और  ‘बागी 2 में दिखे. पिछले साल उनकी ‘कुलदीप पटवाल आई डिड नॉट डू इट’ आई थी. भूमिका बड़ी थी,फिल्म छोटी थी. बड़ी रिलीज नहीं मिलने से यह अधिक दर्शकों तक नहीं पहुंच सकी. इस बीच राज गुप्ता ने उनसे मिलने और ‘बाबा’ की स्क्रिप्ट सुनाने की अनेक कोशिशें कीं. दीपक के डेढ़ महीने के टालमटोल को समझते हुए एक दिन राज ने सीधे शब्दों में कह दिया, ‘आपको मना ही तो करना है. एक बार सुन लो.’ दीपक बताते हैं,’ राज की यह बात मुझे चुभ गई. मुझे लगा कि नया लड़का है. जरूर कोई बात होगी. मैंने स्क्रिप्ट सुनी और फिर अभी फिल्म सभी के सामने है. अब तो मैंने तय कर लिया है कि कोई भी स्क्रिप्ट हो. मैं सुनूंगा जरूर. नए बंदों को भी अनदेखा नहीं करूंगा.’ दीपक यारी रोड के एक कैफ़े में नितमित रूप से से नए कलाकारों से मिलते हैं और उन्हें गाइड करते हैं.
दीपक नहीं चाहते कि नए लड़के अनावश्यक झेंप और संकोच में न रहें . फिल्म इंडस्ट्री के भौकाल से ना डरें.
बातचीत के मुख्या अंश
‘बाबा’ में नायक की भूमिका है आपकी. इस फिल्म की रिलीज को अपनी उपलब्धि के तौर पर लेंगे या सिर्फ आंतरिक खुशी मिली है कुछ कर पाने की?
मेरे लिए आंतरिक खुशी का वक्त है. हमें और आपको मालूम है कि इंडस्ट्री में हमारे जैसे कलाकारों को कैसे रोल मिलेंगे? इस कमरे से उस कमरे में जाते हुए मैं कभी सोचता और विजुलाइज करता हूं कि क्या कोई मेरे मुताबिक रोल ले आएगा. मराठी फिल्म ‘बाबा’ में मुझे मेरी सोच और कल्पना का रोल मिल गया है. मैं खुद को सौभाग्यवान मान रहा हूं कि यह स्क्रिप्ट मेरे पास आई.
उत्तराखंड के कबरा गांव से मुंबई के यारी रोड तक के सफर को पलट कर देखें तो क्या एहसास पनपते हैं?
शुरू में तो कुछ सोच ही नहीं पाता था. तब केवल काम चाहिए था. थोड़ा काम मिला... बाद में कुछ और काम मिला. तब एक एहसास और गर्व होता था कि मैं आगे आया हूं. कबरा गांव से यहां तक आ गया. मेरी ही तरह मेरे गांव और दिल्ली के दोस्तों को लगता होगा कि मेरी तरक्की हो रही है, लेकिन सच कहूं तो यही लगता है कि असली खुशी छोड़ आई जगहों में रह गयी है. आगे बढ़ने और पीछे रह जाने के भेद से मैं निकल चुका हूं. अब मुझे छूट गई चीजों की कदर पता चलने लगी है. अभी पिछले दिनों गांव गया तो झड़ते पहाड़ों को देखकर दुख हुआ. वहां पलायन जारी है. स्खलन से पहाड़ नंगे हो रहे हैं. मेरे घर के पास का 800 साल पुराना पेड़ गिर गया. मैंने वहां एक पेड़ लगाया. उसका लहलहाना देख कर जोश आया और मैंने डेढ़ सौ पेड़ लगाए. आम. लीची. आडू, कटहल के पेड़ लगाए हैं. अपने गांव से फिर से जुड़ गया हूं. कुछ और स्थिरता आ जाये तो तीन-चार महीने वहीँ रहूँगा.
फिर भी दुनियावी पहचान और कामयाबी तो आगे बढ़ना है ही....
कहां सर? अभी मैंने लंदन में वैन गॉग की पेंटिंग ‘स्टारी नाइट’ देखि. देखकर दंग रह गया. वह पेंटिंग हिप्नोटाइज कर लेती है. उसे देखते हुए लगा कि मैं किस बात पर इतरा रहा हूं. अभी मैंने किया ही क्या है. यहां फिल्म के दिग्गजों का काम देख कर एहसास ए कमतरी होती है. मीडिया और अखबार दिखला रहे हैं कि आज के लोकप्रिय स्टार/एक्टर फलां हैं. लेकिन एक एक्टर के तौर पर मुझे तो दिख ही जाता है कि कौन क्या है? बलराज साहनी को ले लें. उन्होंने किस डिग्निटी के साथ ‘गर्म हवा’ की भूमिका निभाई है? उन्होंने कैसे निभाई होगी? फिर उन्हीं को आप ‘दो बीघा जमीन’ में देखते हैं. गंवई किसान और रिक्शावाला के रूप में.. और फिर ‘वक्त’ में उनका अंदाज देख लें. मुझे मालूम है कि मेरे जैसा कौन खाता था? यहां तो स्टार को एसिडिटी हो रखी है और वह चौड़े होकर चला जा रहा है. उधार की उर्जा लेकर आगे नहीं बढ़ना चाहता मैं. 10 सालों के बाद यह एहसास नहीं चाहता कि अरे मैं तो भटक गया था. मैं अपनी कमजोरी, आकांक्षा, समाज के जोर से अनचाहे रास्ते पर नहीं जाऊंगा. इरफान भाई को देख लें. उन्हें लंबा वक्त लगा, लेकिन उन्होंने हिला कर रख दिया, एक बार उनसे मैंने पूछ दिया कि अपनी ‘बेइज़्ज़तियों’ के बारे में बताइए. वे खूब हंसे मेरे सवाल पर. उन्होंने मजे लेकर कई किस्से सुनाए.
इरफान की ‘बेइज्ज़ती’ तो आप नहीं बताएंगे. अपनी बताएं. आपकी कैसी और कब ‘बेइज्जती’ हुई?
मेरे भी कई किस्से हैं. एक तो शुरुआती दिनों का है. दिल्ली के सराय रोहिल्ला में ‘एक्टिंग सीखो’ बोर्ड लगा हुआ था. उसे देख कर मैं उनके यहां पहुंचा. पता किया तो मालूम हुआ कि हर महीने 150 रुपये देने होंगे और छह महीने के बाद नाटक होगा तो रोल मिलेगा. छह महीनों तक मैं डेढ़ सौ रुपये’ देता रहा. फिर नाटक हुआ तो मुझे पांच दिनों पहले बताया गया कि तुम इसमें शैतान का रोल कर रहे हो. और तुम्हारे दाएं बाएं दो गुर्गे होंगे. मेरा रोल हिंदू-मुसलमान में भेद डालकर दंगा करवाने का था. ऐवान ए गलिन  में शो था. मैंने दोस्तों को बता दिया. वे नाटक देखने आये.  मुझे स्टेज पर देखकर वे सभी हंसते हुए पागल होते रहे. नाटक ख़त्म होने के बाद मैंने अपने काम के बारे में पूछा तो सब ने मेरा मजाक उड़ाया और हँसे. उनकी हंसी मेरे दिल में चुभ गई. बड़ी बेइज्जती महसूस हुई. वहां से मैं सीधे मंडी हाउस गया. पहले अरविंद गौड़ और फिर एक्ट वन में मैंने काम किया. दोनों जगहों पर मेर ट्रेनिंग हुई. ढाई सालों के बाद पुराने दोस्तों में से दो ने किसी पोस्टर पर मुझे देखा तो नाटक देखने आए. नाटक देख कर दोनों अचंभे में रह गए..फिर एक संतुष्टि हुई. मैंने तभी सीख लिया कि ‘बेइज्जती’ सहो, उन्हें स्वीकार करो, कभी रिएक्ट मत करो और खुद में सुधार करो. मुंबई की हर ‘बेइज्ज़ती’ को अपनी असफलता मानकर मैंने सीखने की कोशिश की. महंगाई और प्रतियोगिता के इस शहर में कुढ़ने से काम नहीं चलेगा. अपने अनुभव नए लोगों में बाँटता हूं. उन्हें बताता हूं कि संकोच ना करो. मैं इंडस्ट्री का हौआ शांत कर देता हूं. मुझे ऐसा कोई नहीं मिल पाया था. बाकी ‘बेइज्ज़ती’ के कितने किस्से सुनाऊं? अपनी फिल्म के प्रीमियर पर रोक दिया गया हूं. अपमानित होता रहा हूँ.
दिल्ली में रंगमंच की सक्रियता के दिनों में किन लोगों ने आप को तराशा?
सबसे पहले अरविंद गौड़ का नाम लूंगा. फिर एनके शर्मा, पियूष मिश्रा, शाहिद अनवर(अब नहीं रहे). शाहिद भाई से मेरा याराना था. उन्होंने शायरी और किताबों से प्रेम करना सिखाया. वह हमेशा साथ रहे. एनएसडी के राम गोपाल बजाज रोबिन दास, प्रसन्ना... प्रसन्ना के साथ मैं काम नहीं कर पाया. सीनियर और अनुभवी के साथ रहो तो एनर्जी बचती है. खुद खोजने और सोचने में वक्त बिताने से बेहतर है कि गुरुओं से पूछ लो. उनसे निर्देश ले लो. संगत का बहुत असर रहा है मुझ पर.
ऐक्टर होने के आरंभिक तैयारी के पाठ क्या थे?
परस्पर ऑब्जर्वेशन... मैं तो नाटक देख कर ही सीखता गया. एनएसडी के प्ले नहीं छोड़ता था. बाकी थिएटर ग्रुप के भी नाटक देखा करता था. यशपाल शर्मा, चितरंजन गिरि, मुकेश तिवारी, विजय राज आदि से काफी कुछ सीखा, हम कलाकारों ने आपसी विवाद और विमर्श से बहुत कुछ सीखा और खुद को सुधारा. समीक्षकों की भाषा अधिक समझ में नहीं आती थी. जो समझ में नहीं आता था उसके बारे में पता करता था. अब जैसे रोबिन दास ने एक बार कहा कि कलाकारों को ‘कलात्मक पूर्वाग्रह’ छोड़ना चाहिए. मुझे लगा कि हम भी कलाकार हैं तो हमें यह छोड़ना चाहिए, लेकिन समझ में नहीं आया कि क्या छोड़ना है? तो उनसे ही पूछने चला गया. दिल्ली के दिनों में फिल्मों में आने की बात सोची भी नहीं थी मैंने.
आपने रंगमंच से अभिनय सीखा. फिर आप फिल्मों में आ.ए फिल्मों का अभिनय थोड़ा अलग होता है. क्या और कैसे बदलना पड़ा खुद को?
नाटक में प्रोजेक्शन पर जोर रहता है. फिल्मों में रिएक्शन का खयाल रखना पड़ता है. बारीक़ फर्क है, लेकिन कैमरा बहुत संवेदनशील होता है. बारीक से बारीक रिएक्शन भी पकड़ लेता है. फिल्म का अभिनय किफायती होता है. मुझे लगता है कि फिल्मों में आने और निरंतर काम से भी अभिनय में सुधार और निखार आता है. फिल्मों में अभिनय की निजी शैली विकसित हो जाती है. वह ज़रूरी है. सिनेमा के अभिनय में शब्दों के दृश्य साहचर्य को समझना बहुत जरूरी है.
शुरुआती दिनों में कैसी दिक्कतें रहीं? मुंबई आ रहे हैं कलाकारों को अपने अनुभव से क्या बताना चाहेंगे? क्या मंत्र देंगे?
कोई मंत्र पर काम नहीं आता. सभी अपनी यात्रा तय करते हैं. फिर भी मुझे लगता है कि बाहर से आए कलाकारों को ‘कस्बाई संकोच’ छोड़ देना चाहिए. यहां आने पर मेरे दोस्त कहते थे कि दिल्ली के परिचितों को फोन कर... जाकर मिल. मैं संकोच में नहीं जाता था. मुझे लगता है कि ‘कस्बाई संकोच’ नहीं रहना चाहिए. विनम्र भाव से अप्रोच करने में दिक्कत नहीं है. ज्यादा से ज्यादा इंकार ही तो मिलेगा. हां,बदतमीजी नहीं होनी चाहिए. बाहर से आए लोगों में एक फालतू अकड़ भी रहती है. मुझे चार साल लगे. संघर्ष के दिनों में एक कमरे में हम छह लोग साथ रहते थे. एक ही बिस्तर था कोई एक करवट बदलता था तो बाकी पांच को भी करवट बदलनी पड़ती थी. बिस्तर पर करवट की लहर चलती थी समुद्र की लहरों की तरह.
उस दौर का कोई प्यारा और सुखी अनुभव भी तो रहा होगा?
क्या बताऊं? ‘ओमकारा’ के लिए फिल्म फेयर का विशेष पुरस्कार मिला तो सारे खोए-बिछड़े दोस्त मिल गए. सभी अपने संघर्ष और सफलता के बिलों से निकलकर मिलने आए. उन्होंने पार्टी और सेलिब्रेशन के लिए अपने डेबिट और क्रेडिट कार्ड मुझे दे दिए. ऐसी दरियादिली कहां मिल सकती है? आज भी सोचता हूं तो आंखें नम हो जाती हैं. वह सुख और वह प्यार ही तो पूंजी है.
इस सफर में किन फिल्मों का उल्लेख करना चाहेंगे?
सबसे पहले ‘ओमकारा’.... इस फिल्म ने तो पूरी जिंदगी बदल दी. इस फिल्म ने मुझे बताओ एक्टर और इंसान...मेरी जिंदगी... सब कुछ ही बदल दिया. ‘तनु वेड्स मनु’ से पॉपुलर पहचान बनी, लेकिन ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ के बाद यही पहचान फांस बन गई. इंडस्ट्री और प्रशंसकों ने बतौर एक्टर बांधने की कोशिश की. पप्पी की छवि से निकलना जरूरी हो गया था. ‘हिंदी मीडियम’ से यह मुमकिन हुआ. उस फिल्म से आदर और सम्मान मिला. इरफान भाई के साथ आना बड़ी बात रही. उन्होंने बहुत मदद की. उस रोल को निभाने में मजदूरों के बीच में किए नाटक और उनसे मेल-मुलाकात का अनुभव काम आया. ‘बाबा’ में मेरा काम लोगों को पसंद आ रहा है. इस फिल्म के लिए मैंने विराम लिया था और लगभग दो सालों का इंतजार किया. तीन-चार चालू किस्म की फिल्में छोडीं और आर्थिक नुकसान सहा. 
‘बाबा’ की भूमिका निभाते समय क्या कभी संजीव कुमार और नाना पाटेकर की फिल्मों की याद आई. उनके प्रभाव या उनसे बचाव की कोई कोशिश करनी पड़ी?
हर भूमिका निभाते समय सामान्य बातें तो एक ही तरीके से जहन में आती हैं. हमें अपनी भाषा तय करनी होती है. संजीव कुमार के साथ गुलजार साहब ने और नाना पाटेकर के साथ संजय लीला भंसाली ने अपने समय के मूक-वधिर की कहानी कही. मुझे राज गुप्ता के मूक-वधिर को पर्दे पर लाना था. हमारे फिल्मकारों ने मूक-वधिरों की अधिक कहानी नहीं कही. गिनती की फिल्में आ पाई हैं. प्रभाव का बोझ नहीं लेता मैं. इस फिल्म के लिए राज गुप्ता से बातचीत में तय हुआ कि माधव इतना गरीब है कि वह साइन लैंग्वेज भी नहीं सीख सकता. हमें इस किरदार को पर्दे पर थोड़े अलग भाव और अंदाज में पेश करना पड़ा.

पुनःश्च : शब्दों का दृश्य साहचर्य
इस बातचीत में दीपक ने शब्दों के दृश्य साहचर्य(विजूअल) की बात की है. इसके उदहारण के रूप में उन्होंने पानी का उल्लेख किया. संवाद में या जीवन में पानी बोलते समय आज के शहरी या मुंबई में पले-बढे कलाकार  के मानस में बोतल.नल और समंदर के पानी का दृश्य साहचर्य होगा. मैं पहाड़ से आता हूँ. मेरे लिए पानी के साथ झरना,वेगवती नदी.शांत नदी,तालाब,लोटे,बाल्टी और कुंए’ के पानी का दृश्य साहचर्य बनेगा. उससे पानी बोलते समय मेरा अनुभव कुच्छ और होगा. कलाकार की इन्द्रियां कितनी जागृत हैं और आप ने कितना पढ़ा या देखा है? इनसे बहुत फर्क पड़ता है.