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Showing posts with the label सुधीर मिश्र

फिल्‍म समीक्षा : इंकार

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-अजय ब्रह्मात्‍मज  सुधीर मिश्र ने 'इंकार' में ऑफिस के परिवेश में 'यौन उत्पीड़न' का विषय चुना है। हर दफ्तर में यौन उत्पीड़न के कुछ किस्से होते हैं, जिन्हें आफिस, व्यक्ति या किसी और बदनामी की वजह से दबा दिया जाता है। चूंकि हम पुरुष प्रधान समाज में रहते हैं, इसलिए 'यौन उत्पीड़न' के ज्यादातर मामलों में स्त्री शिकार होती है और पुरुष पर इल्जाम लगते हैं। इस पृष्ठभूमि में सहारनपुर (उत्तरप्रदेश) के राहुल और सोलन (हिमाचल प्रदेश) की माया की मुलाकात होती है। दोनों एक ऐड एजेंसी में काम करते हैं। राहुल ऐड व‌र्ल्ड का विख्यात नाम है। एक इवेंट में हुई मुलाकात नजदीकी में बढ़ती है। प्रतिभाशाली माया को राहुल ग्रुम करता है। अपने अनुभव और ज्ञान से धार देकर वह उसे तीक्ष्ण बना देता है। माया सफलता की सीढि़यां चढ़ती जाती है और फिर ऐसा वक्त आता है, जब वह राहुल के मुकाबले में उसके समकक्ष नजर आती है। काम के सिलसिले में लंबे प्रवास और साथ की वजह से उनके बीच शारीरिक संबंध भी बनता है। सब कुछ तब तक सामान्य तरीके से चलता रहता है, जब तक माया राहुल की सहायिका बनी रहती है। जैसे ही

भविष्य का सिनेमा

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  -अजय ब्रह्मात्‍मज दिल्ली में मोहल्ला लाइव द्वारा आयोजित सिने बहस तलब में विमर्श का एक विषय रखा गया था -अगले सौ साल का एजेंडा। इस विमर्श में अनुराग कश्यप, हंसल मेहता, स्वरा भास्कर और सुधीर मिश्र मौजूद थे। अनुराग और सुधीर दोनों ने कहा कि हम उस इंडस्ट्री के संदर्भ में अगले सौ सालों के बारे में कैसे बातें कर सकते हैं जो अगले कुछ सालों की तो छोडि़ए, अगले साल के बारे में भी आश्वस्त नहीं हैं कि वह किस दिशा में मुड़ेगी या बढ़ेगी? तात्कालिक लाभ में यकीन करने वाली हिंदी फिल्म इंडस्ट्री हमेशा पिछली कामयाबी को दोहराने मे लगी रहती है। अचानक कभी एक निर्देशक कोई प्रयोग करने में सफल होता है और फिर उसकी नकल आरंभ हो जाती है। धीरे-धीरे एक ट्रेंड बन जाता है और कहा जाने लगता है कि दर्शक यही चाहते हैं। इसी एकरूपता में परिव‌र्त्तन चलता रहता है। सुधीर मिश्र ने जोर देकर कहा कि तकनीक की प्रगति से सिनेमा पारंपरिक हद से निकल रहा है। सिनेमा का स्क्रीन छोटा होता जा रहा है। फिल्म देखने का आनंद आज भी थिएटरों में ही आता है, लेकिन उसे दोबारा-तिबारा या अपनी सुविधा से देखने का आनंद कुछ और होता

'खोया खोया चांद' - रिलीज से ठीक पहले

(सुधीर मिश्र ने यह पोस्ट खोया खोया चांद की रिलीज से एक दिन पहले पैशन फॉर सिनेमा पर लिखा था.चवन्नी चाहता है कि उसके पाठक और सिनेमा के आम दर्शक इसे पढें और खोया खोया चांद देखें.निर्देशक सुधीर मिश्र के इस आलेख से फिल्म की मंशा समझ में आती है। ) इसके पहले के पोस्ट में मैंने 'खोया खोया चांद' बनाने के कुछ कारणों की बात की थी. उस पोस्ट के टिप्पणीकारों के साथ ईमेल पर मेरा संपर्क रहा है. कल मेरी फिल्म रिलीज हो रही है. इस फिल्म के बारे में मेरे कुछ और विचार... 'खोया खोया चांद' में मैंने एक ऐसी कहानी ली है, जिसे छठे दशक का कोई भी फिल्मकार बना सकता था. हां, मैं उस समय की नैतिकता और तकनीक से प्रभावित नहीं हूं. इसलिए हर सीन में मैं थोड़ा लंबा गया हूं, जबकि उस दौर के फिल्मकार थोड़ा पहले कट बोल देते. मेरे खयाल में आप तभी ईमानदारी से फिल्म बना सकते हैं, जब उनके साथ घटी घटनाओं में खुद को रख कर देखें... आप क्या करते? क्योंकि आप केवल खुद को ही सबसे अच्छी तरह जानते हैं. 'हजारों ख्वाहिशें ऐसी' में वस्तुगत सत्य का चित्रण था. इस फिल्म में अंतर का सत्य है. उनमें से अधिकांश अपने

क्यों अपने आप से खफ़ा खफ़ा जरा जरा सा नाराज़ है दिल

आज शब जो चांद ने है रुठने की ठान ली गर्दिशों में हैं सितारे बात हम ने मान ली अंधेरी स्याह ज़िन्दगी को सूझती नहीं गली कि आज हाथ थाम लो एक हाथ की कमी खली क्यों खोया खोया चांद की फ़िराक में तलाश में उदास है दिल क्यों अपने आप से खफ़ा खफ़ा जरा जरा सा नाराज़ है दिल ये मन्ज़िले भी खुद ही तय करे ये रास्ते भी खुद ही तय करे क्यों तो रास्तों पे फिर सहम सहम के संभल संभल के चलता है ये दिल क्यों खोया खोया चांद की फ़िराक में तलाश में उदास है दिल क्या आप इन पंक्तियों को सुन चुके हैं.सुधीर मिश्र की नयी फिल्म खोया खोया चाँद का यह गीत खूब पसंद किया जा रहा है.इसे स्वानंद किरकिरे ने लिखा है और संगीत शांतनु मोइत्रा का है.अगर आप पूरा गीत पढना चाहते हैं तो बताएं.चवन्नी शाम तक यह भी करेगा.सुधीर मिश्र की फिल्म छठे दशक की याद दिलाएगी.शांतनु ने संगीत और स्वानंद ने शब्दों से उस दशक को जिंदा कर दिया है.फिल्म इंडस्ट्री के इन जवान प्रतिभाओं को सलाम.शांतनु बनारस से ताल्लुक रखते हैं तो स्वानंद इंदौर के हैं। सुधीर मिश्र ने इन्हें हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी... में मौका दिया था .तब से दोनों लगातार आगे ही बढ़ते जा रहे हैं.शुक्र है

खोया खोया चांद और सुधीर भाई - 4

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सुधीर भाई की फिल्मों में पीरियड रहता है, लेकिन भावनाएं और प्रतिक्रियाएं समकालीन रहती हैं. सबसे अधिक उल्लेखनीय है उनकी फिल्मों का पॉलिटिकल अंडरटोन ... उनकी हर फिल्म में राजनीतिक विचार रहते हैं. हां, जरूरी नहीं कि उनकी व्याख्या या परसेप्शन से अ।प सहमत हों. उनकी 'हजारों ख्वाहिशें ऐसी' रियलिज्म और संवेदना के स्तर पर काफी सराही गयी है और हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के अधिकांश लोग बगैर फिल्म के मर्म को समझे ही उसकी तारीफ में लगे रहते हैं. होता यों है कि सफल, चर्चित और कल्ट फिल्मों के प्रति सर्वमान्य धारणाओं के खिलाफ कोई नहीं जाना चाहता. दूसरी तरफ इस तथ्य का दूसरा सच है कि अधिकांश लोग उन धारणाओं को ही ओढ़ लेते हैं. एक बार चवन्नी की मुलाकात किसी सिनेप्रेमी से हो गयी. जोश और उत्साह से लबालब वह महत्वाकांक्षी युवक फिल्मों में घुसने की कोशिश में है. वह गुरुदत्त, राजकपूर और बिमल राय का नाम लेते नहीं थ कता. चवन्नी ने उस से गुरुदत्त की फिल्मों के बारे में पूछा तो उसने 'कागज के फूल' का नाम लिया. 'कागज के फूल' का उल्लेख हर कोई करता है. चवन्नी ने सहज जिज्ञासा रखी, 'क्या अ।पने '

खोया खोया चांद और सुधीर भाई-३

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अपनी बात कहने के बाद सुधीर भाई मुस्कुराते हैं तो रूकते हैं... उनकी मुस्कराहट ठहर जाती है ... उन क्षणों में वह आपको समय देते हैं कि उनकी कही बातों को अ।प अपने दिमाग में प्रिंट कर लें. बोलते समय उनकी पुतलियां नाचती रहती हैं, लेकिन बातें मुद्दे पर ही टिकी रहती हैं. यह कला उन्होंने बोलते-बोलते सीख ली है. मीडिया विस्फोट के इस दौर में सुधीर भाई जैसे फिल्मकार टीवी चैनलों के लिए अत्यंत उपययोगी होते हैं, क्योंकि वे मुंह के करीब माइक अ।ते ही बोलना शुरू कर देते हैं. आप इसे कतई किसी अवगुण के रूप में न लें. यह खूबी बहुत कम लोगों में हैं. चवन्नी अपने अनुभवों से कह सकता है कि यह खूबी श्याम बेनेगल में है, महेश भट्ट में है, सुधीर मिश्र में हैं और नयी पीढ़ी के अनुराग कश्यप में है. ये सभी फिल्म पर सामाजिक.राजनीतिक ... और किसी भी ... इक के परिप्रेक्ष्य से बोल सकते हैं. सुधीर भाई 'खोया खोया चांद' को अपनी खास फिल्म मानते हैं. उनकी नजर में, 'यह फिल्म हमारी इंडस्ट्री के उन अनछुए पहलुओं और कोणों को प्रकाशित करेगी, जिनके बारे में हम फिल्मी पत्रिकाऔं के 'गपशप' कॉलमों में चटकारे लेकर प

खोया खोया चांद और सुधीर भाई-२

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सुधीर मिश्र को सभी सुधीर भाई कहना पसंद करते हैं. उन्हें भी शायद यह संबोधन अच्छा लगता है. कद में लंबे और छरहरे सुधीर भाई लंबे डग भरते हैं. वे चलते हैं तो उनके छेहर हो गए लंबे बाल हवा में अयाल की तरह लहराते हैं. प्रभावशाली और आकर्षक होता है उनका आगमन और चूंकि वह परिचित चेहरा हैं, इसलिए लोगों को वह तत्क्षण आकृष्ट कर लेते हैं. सुधीर भाई की खूबी है कि वह बेबाक और बेलाग बोलते हैं और हमेशा बोलने के लिए तैयार रहते हैं. सुधीर भाई खुद को फिल्म इंडस्ट्री के बाहर का व्यकित मानते हैं. कहते भी हैं, 'मेरे बाप-दादा ने कोई फिल्म नहीं बनायी और न ही मेरे लिए फिल्मों की कमाई (धन और यश) छोड़ी. हमें तो जिंदगी ने उछाल कर यहां पहुंचा दिया. हमें तो हादसों ने पाला और तूफानों ने संभाला है. ऐसे जीवट के व्यक्ति का निर्भीक होना स्वाभाविक है. एक तरह से सुधीर भाई के पास खोने के लिए कुछ है भी नहीं... हां तो उस दिन पंचसितारा होटल के काफी शॉप में वह 'खोया खोया चांद' के बारे में बताने लगे. उन्होंने बताया, 'मुझे छठे-सातवें दशक के उपर एक फिल्म बनानी थी. उस दौर की उत्कृष्ट फिल्मों और फिल्मकारों को इसे मेरी

खोया खोया चांद और सुधीर भाई -१

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चवन्नी को सुधीर मिश्र की फिल्म 'खोया खोया चांद' का बेसब्री से इंतजार है.सुधीर मिश्र ने इस फिल्म में हिंदी सिनेमा के स्वर्ण काल के कई पहलुओं को आज के संदर्भ में चित्रित किया है.सुधीर मिश्र से चवन्नी की मुलाकातें होती रही हैं.चवन्नी सुधीर मिश्र को हिंदी फिल्मों की मुख्यधारा का विरोधी स्वर मानता रहा है.चवन्नी को हमेशा वे जुझारू और कभी-कभी झगड़ालू फिल्मकार के तौर पर दिखे.चवन्नी को याद है एक मुलाकात...मुंबई के एक पंचसितारा होटल में किसी फिल्मी कार्यक्रम का अायोजन था.होटल की लॉबी में ही चवन्नी उनसे टकरा गया.न जान! उस दिन सुधीर मिश्र किस मूड में थे...उन्होंने कॉफी के लिए ऑफर किया...सकुचाता हुआ चवन्नी उनके साथ लग गया...बात 'खोया खोया चांद' पर होने लगी.कुछ दिनों पहले ही चवन्नी गोरेगांव में फिल्मिस्तान स्टूडियो में लगे उनकी फिल्म के सेट पर गया था.सुधीर मिश्र हमेशा बड़े आवेश में बातें करते हैं...उनके भाव और स्वभाव से ऐसा लगता है कि आप को उनसे सहमत होना ही होगा.वे कंधे पर हाथ रख देते हैं...अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से को विस्फारित कर आप के मन में प्रश्न पैदा करते हैं और फिर मौका मिलते ह