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आज परिवार के साथ रहेंगी विद्या बालन

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- अजय ब्रह्मात्मज             विद्या बालन इन दिनों मोहित सूरी निर्देशित ‘ हमारी अधूरी कहानी ’ की शूटिंग कर रही हैं। मुंबई में शूटिंग करने से घर लौट आने की सुविधा मिलती है। वैसे नाइट शिफ्ट की अपनी दिक्कतें होती हैं। विद्या मानती हैं कि इस फिल्म के लिए चुने जाने से वे बेहद खुश हैं। इच्छा थी कि कभी महेश भट्ट के साथ काम करने का मौका मिले। वे डायरेक्शन से रिटायर हो चुके हैं , इसलिए वह इच्छा तो पूरी नहीं हो सकती। लिहाजा विद्या बालन ने उनकी लिखी फिल्म में काम करने से संतोष किया। विद्या मानती हैं कि भट्ट साहब खुले स्वभाव के व्यक्ति हैं। द़निया के तमाम विषयों पर उनका अलग नजरिया रहता है। उनके साथ बैठने और बातें करने से बहुत कुछ सीखने को मिलता है।             ‘ हमारी अधूरी कहानी ’ महेश भट्ट के माता-पिता करी प्रेमकहानी से प्रेरित है। महेश भट्ट ने अपनी आत्कथात्मक फिल्मों में उनकी जिंदगी की झलकियां दिखाई हैं। इस बार उस प्रेमकहानी का संदर्भ रहेगा , जो अधूरी सी रह गई। फिल्म के बारे में अभी कुछ भी जाहिर करने से संकोच करती हैं विद्या। वह कहती हैं ,‘ अभी तो हम शूटिंग ही कर रहे हैं। फिल्म रि

फिल्‍म समीक्षा : बॉबी जासूस

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-अजय ब्रह्मात्‍मज    इरादे की ईमानदारी फिल्म में झलकती है। 'बॉबी जासूस' का निर्माण दिया मिर्जा ने किया है। निर्देशक समर शेख हैं। यह उनकी पहली फिल्म है। उनकी मूल कहानी को ही संयुक्ता चावला शेख ने पटकथा का रूप दिया है। पति-पत्नी की पहनी कोशिश उम्मीद जगाती है। उन्हें विद्या बालन का भरपूर सहयोग और दिया मिर्जा का पुरजोर समर्थन मिला है। हैदराबाद के मुगलपुरा मोहल्ले के बिल्किश की यह कहानी किसी भी शहर के मध्यवर्गीय मोहल्ले में घटती दिखाई पड़ सकती है। हैदराबाद छोटा शहर नहीं है, लेकिन उसके कोने-अंतरों के मोहल्लों में आज भी छोटे शहरों की ठहरी हुई जिंदगी है। इस जिंदगी के बीच कुलबुलाती और अपनी पहचान को आतुर अनेक बिल्किशें मिल जाएंगी, जो बॉबी जासूस बनना चाहती हैं। मध्यवर्गीय परिवार अपनी बेटियों को लेकर इतने चिंतित और परेशान रहते हैं कि उम्र बढ़ते ही उनकी शादी कर वे निश्चिंत हो लेते हैं। बेटियों के सपने खिलने के पहले ही कुचल दिए जाते हैं। 'बॉबी जासूस' ऐसे ही सपनों और शान की ईमानदार फिल्म है। बिल्किश अपने परिवार की बड़ी बेटी है। उसका एक ही सपना है कि मोहल्ले

किरदार में डूब कर मिलती है कामयाबी : विद्या

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सशक्त अभिनेत्रियों की फेहरिस्त में विद्या बालन अग्रिम कतार में आती हैं। उनकी हालिया फिल्म ‘शादी के साइड इफेक्ट्स’ बॉक्स ऑफिस चमक बिखेर नहीं सकी, मगर वे जल्द ‘बॉबी जासूस’ से वापसी करने की तैयारी में हैं। उनके करियर को रवानगी प्रदान करने में ‘कहानी’ और ‘द डर्टी पिक्चर’ की अहम भूमिका रही है। अदाकारी को लेकर उनका अप्रोच जरा हटके है। वे साझा कर रही हैं अपनी कार्यप्रणाली     मैं किरदार की आत्मा में उतरने के लिए आमतौर पर स्क्रिप्ट को बड़े ध्यान से सुनती और पढ़ती हूं। मैं किरदार की अपनी पृष्ठभूमि तैयार करती हूं। अक्सर किरदार से प्यार करने लग जाती हूं और फिर उसे पोट्रे करती हूं। उस लिहाज से मेरे करियर में ‘कहानी’ सबसे चुनौतीपूर्ण फिल्म रही है। विद्या बागची को मुझे कैसे पेश करना है, वह मेरी समझ में परे था। सुजॉय घोष ने भी मुझे पूरी स्क्रिप्ट नहीं सुनाई थी। उन्होंने मुझे बस उसकी एक लाइन सुनाई। उसके आगे विद्या बागची के किरदार की कहानी बस कहानी थी। उसका एक फायदा यह हुआ कि मैं विद्या बागची के चेहरे पर असमंजस भाव लगातार कायम रख सकी। मैं उसे परफॉरमेंस नहीं कहूंगी। मैंने उस किरदार को जिया। उसे नि

विद्या बालन के अंदाज

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फिल्‍म समीक्षा : शादी के साइड इफेक्‍टृस

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पति,पत्‍नी और इच्‍छाएं  -अजय ब्रह्मात्‍मज  न तो फरहान अख्तर और न विद्या बालन,दोनों में से कोई भी कामेडी के लिए चर्चित नहीं रहा। निर्देशक साकेत चौधरी ने उन्हें शादी के साइड इफेक्ट्स में एक साथ पेश करने का जोखिम उठाया है। फरहान अख्तर की पिछली फिल्म 'भाग मिल्खा भाग' रही है। उसके पहले भी वे अपनी अदाकारी में हंसी-मजाक से दूर रहे हैं। विद्या बालन ने अवश्य घनचक्कर में एक कोशिश की थी,जो अधिकांश दर्शकों और समीक्षकों के सिर के ऊपर से निकल गई थी। साकेत चौधरी ने शादी के साइड इफेक्ट्स में दोनों को परिचित किरदार दिए हैं और उनका परिवेश घरेलू रखा है। इन दिनों ज्यादातर नवदंपति सिड और तृषा की तरह रिलेशनशिप में तनाव,दबाव और मुश्किलें महसूस कर रहे हैं। सभी शिक्षा और समानता के साथ निजी स्पेस और आजादी की चाहत रखते हैं। कई बा लगता है पति या पत्‍‌नी की वजह से जिंदगी संकुचित और सीमित हो रही है। निदान कहीं और नहीं है। परस्पर समझदारी से ही इसे हासिल किया जा सकता है,क्योंकि हर दंपति की शादीशुदा जिंदगी के अनुभव अलग होते हैं। सिड और तृषा अपनी शादीशुदा जिंदगी में ताजगी बनाए रखने के लिए न

स्क्रिप्‍ट चुन लेती है मुझे-विद्या बालन

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-अजय ब्रह्मात्मज     नए साल के शुरू में दस दिनों की छुट्टी लेने के बाद विद्या बालन फिर से कैमरे के सामने आ गई हैं। पिछले दिनों वह हैदराबाद में अपनी अगली फिल्म ‘बॉबी जासूस’ की शूटिंग कर रही थीं। पहाडिय़ों पर बने गोलकुंडा किले में वह एक गाने की शूटिंग कर रही थीं। उन्होंने सपनों में आ रही औरत के सपनीले परिधान पहन रखे थे। जब मालूम हुआ कि किले में ऊपर के हिस्से की तरफ जाना है तो उन्होंने झट से सैंडिल उतारा और स्पोटर््स शूज पहन कर चलने को तैयार हो गईं। इस फिल्म में वह हैदराबाद के मध्यवर्गीय मोहल्ले की उम्रदराज लडक़ी बिल्किश उर्फ बॉबी जासूस बनी हैं। विद्या की आंखें हमेशा चमकती रहती है। सवाल पूछने पर उनकी आंखों की चमक और बढ़ जाती है। वह बात शुरू करती हैं ‘मुश्किल से दस दिनों के आराम के बाद फिर से काम पर लौट आई हूं। एक महीने के शेडयूल के बाद नए साल के मौके पर ब्रेक लिया था। आज से फिर वही दौड़-धूप जारी है।’     जब पड़ी भिखारी की डांट  दीया मिर्जा और साहिल संघा की फिल्म ‘बॉबी जासूस’ की जिज्ञासा का जवाब देती हैं विद्या बालन, ‘इस फिल्म का फस्र्ट लुक सभी को पसंद आया। मेकअप करते समय ही सभी को एह

निर्माता बन कर खुश हैं दीया मिर्जा

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-अजय ब्रह्मात्मज     फिल्म निर्माण में सक्रिय दीया मिर्जा मानती हैं कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में निर्माता की छवि किसी सेठ जैसी हो गई है। ऐसा लगता है कि उसका काम केवल चेक काटना भर है। वह फिल्म निर्माण को अपने सपनों का ही विस्तार मानती हैं। उनकी दूसरी फिल्म ‘बॉबी जासूस’ इन दिनों हैदराबाद में शूट हो रही है। इस फिल्म में विद्या बालन फिल्म की शीर्षक भूमिका निभा रही हैं।     दीया कहती हैं, ‘मैं फिल्म निर्माण को एक ऐसे बड़े मौके के तौर पर देखती हूं, जब आप अपनी पसंद की कहानियां फिल्मों में बदल सकते हैं। कैमरे के सामने एक्ट करने से यह बड़ी और जिम्मेदार भूमिका होती है। फिल्म की स्क्रिप्ट के पहले शब्द से लेकर उसके थिएटर में लगने तक की प्रक्रिया का हिस्सा बनना बहुत ही रोचक और क्रिएटिव होता है। फिल्म देख कर दर्शकों की प्रतिक्रिया से सुख मिलता है। मैं इसे एक चुनौती के रूप में लेती हूं। इस चुनौती का आनंद एक बार उठा चुकी हूं। इस बार और ज्यादा मजा आ रहा है।’     वह आगे बताती हैं, ‘लोग मुझ से हमेशा पूछते हैं कि कैमरे के आगे और पीछे में मुझे कहां अधिक आनंद आता है? मेरे ख्याल से दोनों ही अलग दुनिया है

फिल्‍म समीक्षा : घनचक्‍कर

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  -अजय ब्रह्मात्मज                      जब भी कोई निर्देशक अपनी बनाई लीक से ही अलग चलने की कोशिश में नई विधा की राह चुनता है तो हम पहले से ही सवाल करने लगते हैं-क्या जरूरत थी? हमारी आदत है न तो हम खुद देखी हुई राह छोड़ते हैं और न अपने प्रिय फिल्मकारों की सोच, शैली और विषय में कोई परिव‌र्त्तन चाहते हैं। राजकुमार गुप्ता की 'घनचक्कर' ऐसी ही शंकाओं से घिरी है। उन्होंने साहसी कदम उठाया है और अपने दो पुराने मौलिक प्रयासों की तरह इस बार भी सफल कोशिश की है? कॉमेडी का मतलब हमने बेमतलब की हंसी या फिर स्थितियों में फंसी कहानी ही समझ रखा है। 'घनचक्कर' 21वीं सदी की न्यू एज कामेडी है। किरदार, स्थितियों, निर्वाह और निरूपण में परंपरा से अलग और समकालीन 'घनचक्कर' से राजकुमार गुप्ता ने दर्शाया है कि हिंदी सिनेमा नए विस्तार की ओर अग्रसर है।                         सामान्य सी कहानी है। मराठी संजय आत्रेय (इमरान हाशमी) और नीतू (विद्या बालन ) पति-पत्‍‌नी हैं। दोनों की असमान्य शादी है। उसकी वजह से उनमें अनबन बनी रहती है। दोनों एक-दूसरे की ज्यादतियों को बर्दाश्त करते हुए

है सुकून विद्या बालन की जिंदगी में

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-अजय ब्रह्मात्मज     विद्या बालन की शादी हो चुकी है। वह अपने पति सिद्धार्थ राय कपूर के साथ जुहू में समुद्र किनारे के एक अपार्टमेंट में रहती हैं। घर बसाने के बाद वह घर सजा रही हैं। यह उनका अपना बसेरा है। इस बसेरे में सुकून है। अब वह यहीं रहती है। शादी के बाद जिंदगी बदल रही है। रूटीन बदल रहा है। मां-बहन की सिखायी सुनायी बातों के अर्थ अब खुल रहे हैं। किसी और के साथ होने से सोच बदलती है। और उसी के साथ रहने से बहुत कुछ बदल जाता है। आचार, व्यवहार, सोना, जागना, खाना-पीना और भी बहुत कुछ। अभी तक भारतीय समाज में लड़कियां ही अपना घर छोड़ती हैं। एक नए परिवार के साथ रिश्ते बनाती हैं। अगर नवदंपति ने स्वतंत्र और परिवार से अलग रिहाइश रखी तो भी लडक़े के परिवार से अधिक करीबी और भागीदारी होती है। धीरे-धीरे मायका छूट जाता है। लडक़ी एक नए परिवार में प्रत्यारोपित हो जाती है। आरंभिक उलझनों और सामंजस्य के बाद जीवन का नया अध्याय आरंभ होता है।     विद्या बालन के जीवन का नया अध्याय आरंभ हो चुका है। अब वह नए बसेरे से ही शूटिंग, इवेंट और मेलजोल के लिए निकलती हैं और फिर लौट कर यहीं आती हैं। कुंवारी जिंदगी बंद कमर

क्या करीना और विद्या की लोकप्रियता बनी रहेगी?

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शादी के साइड इफेक्ट्स -अजय ब्रह्मात्मज     करीना कपूर और विद्या बालन की शादी के बाद उनके प्रशंसकों के मन को यह प्रश्न मथ रहा होगा कि क्या दोनों पहले की तरह फिल्मों में काम करती रहेंगी? अगर उनका फैसला हुआ तो क्या उन्हें पहले की तरह दमदार और केंद्रीय भूमिकाएं मिलती रहेंगी? सच कहें तो दर्शकों के स्वीकार-अस्वीकार के पहले फिल्म इंडस्ट्री के निर्माता-निर्देशक ही शादीशुदा अभिनेत्रियों से कन्नी काटने लगते हैं। सीधे व्यावसायिक कारण हैं। पहला, शादी के बाद न जाने कब ये अभिनेत्रियां मां बन जाएंगी और उनकी फिल्में कुछ महीनों के लिए अटक जाएंगी। दूसरा, शादी के बाद उनके पति (फिल्मी और गैरफिल्मी दोनों) उनकी दिनचर्या और प्राथमिकता को प्रभावित करेंगे। परिवार और पति की जिम्मेदारियों की वजह से वे शूटिंग में अनियमित हो जाएंगी। तीसरा, कहा जाता है कि शादीशुदा अभिनेत्रियों में दर्शकों की रुचि खत्म हो जाती है। वे अपने सपनों में शादीशुदा अभिनेत्रियों को नहीं चाहते। उनकी चाहत खत्म होने से निर्माता शादीशुदा अभिनेत्रियों को फिल्में देने से बचते हैं।     तीनों कारणों की जड़ में जाएं तो यह हिंदी फिल्म इंडस्ट्री मे

हौले-हौले बदल रही है औरतों की छवि और भूमिका

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महिला दिवस विशेष -अजय ब्रह्मात्मज     पहले ‘द डर्टी पिक्चर’ और फिर ‘कहानी’ की कामयाबी और स्वीकृति से विद्या बालन को खास पहचान मिली। पुरुष-प्रधान हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में दशकों से हीरो की तूती बोलती है। माना जाता है कि हीरो के कंधे पर ही फिल्मों की कामयाबी टिकी रहती है। विद्या बालन की दोनों फिल्मों से साबित हुआ कि हीरोइनें भी कामयाबी का जुआ अपने कंधे पर ले सकती हैं। पिछले साल आई श्रीदेवी की ‘इंग्लिश विंग्लिश’ भी इस बदलते ट्रेंड को पुष्ट करती है। गौरी शिंदे के निर्देशन में लंबे समय के बाद लौटीं श्रीदेवी की यह फिल्म उम्रदराज अभिनेत्री और किरदार के कई पहलुओं को उद्घाटित करती है। ‘इंग्लिश विंग्लिश’ का स्वर आक्रामक नहीं है, लेकिन चेतना नारी अधिकार और स्वतंत्रता की है। अपनी अस्मिता की तलाश की है। रानी मुखर्जी की ‘अय्या’ और करीना कपूर की ‘हीरोइन’ बाक्स आफिस पर कमाल नहीं दिखा सकीं, फिर भी दोनों फिल्में नायिका प्रधान हैं। दोनों में नायक गौण हैं और पुरुषों की भूमिका भी हाशिए पर है। लेकिन इनके साथ ही ‘कॉकटेल’ जैसी फिल्में भी आती हैं, जहां प्रेम हासिल करने के लिए आजादख्याल की वेरोनिका को अप

प्रभावशाली फिल्‍मी हस्तियां : विद्या बालन,आमिर खान और रणबीर कपूर

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विद्या बालन चूंकि खान हिंदी फिल्मों में कामयाबी के पर्याय माने जाते हैं,इसलिए विद्या बालन की अप्रतिम कामयाबी के मद्देनजर उन्हें ‘लेडी खान’ टायटल से नवाजा गया। तब विद्या बालन ने मजाक में ही एक सच कहा था कि अब औरों की कामयाबी विद्या बालन से आंकी जानी चाहिए।बहरहाल,‘किस्मत कनेक्शन’ के समय चौतरफा विध्वंसात्मक आलोचना और छींटाकशी के केंद्र में आई दक्षिण भारतीय मूल की इस मिडिल क्लास लडक़ी ने साड़ी पहनने के साथ लक्ष्य साधा और फिर ‘इश्किया’ से अपने कदम बढ़ा दिए।हिंदी फिल्मों की निर्बंध नायिका विद्या बालन ने उसके बाद हर नई फिल्म से खास मुकाम हासिल किया। पहले ‘डर्टी पिक्चर’ और फिर ‘कहानी’ उन्होंने इस कथित सच को झुठला दिया कि हिंदी फिल्में सिर्फ हीरो के दम पर चलती हैं और हीरोइनें तो केवल नाच-गाने के लिए होती हैं। नाच-गानों से विद्या बालन को परहेज नहीं है। वह इनके साथ ही चरित्रों की गहराई में उतरना जानती हैं। वह उन्हें विश्वसनीय और प्रभावपूर्ण बना देती हैं। अभिनय के साथ उनमें आम भारतीय महिला का लावण्य है। उन्होंने सबसे पहले नायिकाओं केलिए जरूरी ‘जीरो साइज’ का मिथक तोड़ा। अपनी जोरदार कामयाबी से उन्ह

महिला दिवस: औरत से डर लगता है

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-अजय ब्रह्मात्‍मज उनके ठुमकों पर मरता है, पर ठोस अभिनय से डरती है फिल्‍म इंडस्‍ट्री। आखिर क्या वजह है कि उम्दा अभिनेत्रियों को नहीं मिलता उनके मुताबिक नाम, काम और दाम... विद्या बालन की 'द डर्टी पिक्चर' की कामयाबी का यह असर हुआ है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में महिला प्रधान [वीमेन सेंट्रिक] फिल्मों की संभावना तलाशी जा रही है। निर्माताओं को लगने लगा है कि अगर हीरोइनों को सेंट्रल रोल देकर फिल्में बनाई जाएं तो उन्हें देखने दर्शक आ सकते हैं। सभी को विद्या बालन की 'कहानी' का इंतजार है। इस फिल्म के बाक्स आफिस कलेक्शन पर बहुत कुछ निर्भर करता है। स्वयं विद्या बालन ने राजकुमार गुप्ता की 'घनचक्कर' साइन कर ली है, जिसमें वह एक महत्वाकांक्षी गृहणी की भूमिका निभा रही हैं। पिछले दिनों विद्या बालन ने स्पष्ट शब्दों में कहा था, 'मैं हमेशा इस बात पर जोर देती हूं कि किसी फिल्म की कामयाबी टीमवर्क से होती है। चूंकि मैं 'द डर्टी पिक्चर' की नायिका थी, इसलिए सारा क्रेडिट मुझे मिल रहा है। मैं फिर से कहना चाहती हूं कि मिलन लुथरिया और रजत अरोड़ा के सहयोग और सोच के बिना मुझे इतने प

फिल्‍म समीक्षा : द डर्टी पिक्‍चर

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-अजय ब्रह्मात्‍मज गांव से भागकर मद्रास आई रेशमा की ख्वाहिश है कि वह भी फिल्मों में काम करे। यह किसी भी सामान्य किशोरी की ख्वाहिश हो सकती है। फर्क यह है कि निरंतर छंटनी से रेशमा की समझ में आ जाता है कि उसमें कुछ खास बात होनी चाहिए। जल्दी ही उसे पता चल जाता है कि पुरुषों की इस दुनिया में कामयाब होने के लिए उसके पास एक अस्त्र है.. उसकी अपनी देह। इस एहसास के बाद वह हर शर्म तोड़ देती है। रेशमा से सिल्क बनने में उसे समय नहीं लगता। पुरुषों में अंतर्निहित तन और धन की लोलुपता को वह खूब समझती है। सफलता की सीढि़यां चढ़ती हुई फिल्मों का अनिवार्य हिस्सा बन जाती है। निर्माता, निर्देशक, स्टार और दर्शक सभी की चहेती सिल्क अपनी कामयाबी के यथार्थ को भी समझती है। उसके अंदर कोई अपराध बोध नहीं है, लेकिन जब मां उसके मुंह पर दरवाजा बंद कर देती है और उसका प्रेमी स्टार अचानक बीवी के आ टपकने पर उसे बाथरूम में भेज देता है तो उसे अपने दोयम दर्जे का भी एहसास होता है। सिल्क के बहाने द डर्टी पिक्चर फिल्म इंडस्ट्री के एक दौर के पाखंड को उजागर करती है। साथ ही डांसिंग गर्ल में मौजूद औरत के दर्द को भी जाहिर करती

आफ़त होती है औरत-विद्या बालन

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-अजय ब्रह्मात्‍मज डांसिंग गर्ल सिल्क स्मिता के जीवन से प्रेरित फिल्म ‘ द डर्टी पिक्चर ’ में सिल्क की भूमिका निभाने की प्रक्रिया में विद्या बालन में अलग किस्म का निखार आया है। इस फिल्म ने उन्हें शरीर के प्रति जागृत , सेक्स के प्रति समझदार और अभिनय के प्रति ओपन कर दिया है। ‘ द डर्टी पिक्चर ’ के सेट पर ही उनसे यह बातचीत हुई। - चौंकाने जा रही हैं आप ? पर्दे पर अधिक बोल्ड और थोड़ी बदतमीज संवाद बोलते नजर आ रही हैं। क्या देखने जा रहे हम ? 0 बदतमीज तो नहीं कहूंगी। यह एक बेबाक लडक़ी का किरदार है। पर्दे पर उसे दिखाने का कोई शॉर्टकट नहीं है। उसकी पर्सनैलिटी को सही कंटेक्स्ट में दिखाने के लिए ऐसा चित्रण जरूरी है। वह निडर लडक़ी थी। मैं नहीं कहूंगी कि यह सिल्क स्मिता के ही जीवन से प्रेरित फिल्म है। उस वक्त ढेर सारी डांसिंग गर्ल थीं। उनके बगैर कोई फिल्म पूरी नहीं हो पाती थी। उनके डेट्स के लिए काफी टशन रहती थी। हीरो-हीरोइन के डेट्स मिल जाते थे , लेकिन उनके गाने और समय के लिए फिल्मों की शूटिंग रुक जाती थी। - हिंदी फिल्मों में डांसिंग गर्ल की परंपरा रही है। कुक्कू , हेलन आदि... सिल्क स्म

ये पिक्चर फिल्मी है!

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-अजय ब्रह्मात्‍मज कुछ हफ्ते पहले डर्टी पिक्चर की छवियां और ट्रेलर दर्शकों के बीच आए, तो विद्या बालन की मादक अदाओं को देख कर सभी चौंके। यह फिल्म नौवें दशक की दक्षिण की अभिनेत्री सिल्क स्मिता के जीवन से रेफरेंस लेकर बनी है। भारतीय सिनेमा में वह एक ऐसा दौर था, जब सेक्सी और कामुक किस्म की अभिनेत्रियों के साथ फिल्में बनाई जा रही थीं। हिंदी और दक्षिण भारतीय भाषाओं में ऐसी अभिनेत्रियों को पर्याप्त फिल्में मिल रही थीं। सिल्क स्मिता, डिस्को शांति, नलिनी और दूसरी अभिनेत्रियों ने इस दौर में खूब नाम कमाया। नौवें दशक की ऐसी अभिनेत्रियों को ध्यान में रख कर ही मिलन लुथरिया ने डर्टी पिक्चर की कल्पना की। डर्टी पिक्चर का निर्माण बालाजी टेलीफिल्म कर रही है। इस प्रोडक्शन कंपनी के प्रभारी तनुज गर्ग स्पष्ट कहते हैं, ''हमारी फिल्म पूरी तरह से कल्पना है। यह किसी अभिनेत्री के जीवन पर आधारित नहीं है। हम ने नौवें दशक की फिल्म इंडस्ट्री की पृष्ठभूमि में एक फिल्म की कल्पना की है। इसमें मुख्य भूमिका में विद्या बालन को इसलिए चुना है कि आम दर्शक इसे फूहड़ या घटिया प्रयास न समझें।'' विद्या बालन की वजह