दरअसल:फिसलन भी है कामयाबी

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-अजय ब्रह्मात्मज


स्कूल के दिनों में कहीं पढ़ा था, मैं नियम पर चलता हूं, इसलिए रोज नियम बदलता हूं। जिस दिन जो करने का मन हो, वैसा ही नियम बना लो। कहने के लिए हो गया कि नियमनिष्ठ हैं और मन मर्जी भी पूरी हो गई। अपने फिल्म सितारों के लिए कुछ वैसी ही बात कही जा सकती है। कभी कोई फिल्म फ्लॉप होती है, तो सितारे कहते हैं, फिल्म नहीं चल पाई, लेकिन मेरे काम की सराहना हुई। फिर फिल्म बुरी होने के बावजूद हिट हो जाए, तो सितारों के चेहरे पर मुस्कराहट आ जाती है और उनका बयान होता है, समीक्षक कुछ भी लिखें, दर्शकों ने फिल्म पसंद की है न? हिट और फ्लॉप दोनों ही स्थितियों में खुद को संतुष्ट करते हुए दर्शकों को मुगालते में रखने की यह कोशिश स्टारडम का हिस्सा हो गया है। सितारे अपने इस अंतर्विरोध को समझते हैं, लेकिन यह स्वीकार नहीं कर पाते कि उनसे भूल हुई है।
अक्षय कुमार आज कल ऐसे ही अंतद्र्वद्व और संशय से गुजर रहे हैं। चांदनी चौक टू चाइना और 8-10 तस्वीर के फ्लॉप होने के बाद उनकी कमबख्त इश्क हिट हुई है। अगर तीनों फिल्मों की तुलना करें, तो किसी को भी श्रेष्ठ फिल्म की श्रेणी में नहीं डाल सकते, लेकिन कमबख्त इश्क का स्तर और नीचे है। इसमें स्त्री और पुरुषों को लेकर जिस प्रकार से गालियां दी गई हैं और संवाद में सीधे-सीधे अश्लील भावार्थ डाले गए हैं, उनकी वजह से यह फिल्म साधारण से भी नीचे चली गई है। यह अलग बात है कि फिल्म का हश्र अक्षय की पिछली दोनों फ्लॉप फिल्मों की तरह नहीं हुआ। फिल्म चली है। फिल्म के प्रमुख वितरक और ट्रेड विश्लेषकों की बात मानें, तो यह बड़ी हिट साबित होगी। फिल्म के कलेक्शन और आय पर अभी ट्रेड सर्किल एकमत नहीं हैं। तय नहीं है कि यह कितनी बड़ी हिट है। फिर भी अक्षय के फिसलते करियर को कमबख्त इश्क से एक जीवन मिल गया है।
जाहिर-सी बात है कि अक्षय उत्साह में हैं। वे और उनके करीबी फिल्म की खराबियों और कमजोरियों पर बिल्कुल गौर नहीं कर रहे हैं। उनकी नजर तो बॉक्स ऑफिस कलेक्शन पर लगी है। अक्षय ने बयान देना आरंभ कर दिया है, मेरे लिए बॉक्स ऑफिस और दर्शक खास महत्व रखते हैं। दर्शक मेरी जैसी फिल्मों से खुश होंगे, मैं वैसी ही फिल्में करता रहूंगा। ऐसी सोच और कामयाबी किसी भी स्टार को फिसलन ही देती है। यह लोकप्रियता आखिरकार गुमनामी की अंधेरी सुरंग में समाप्त होती है। याद करें, तो अमिताभ बच्चन, धर्मेद्र और विनोद खन्ना जैसे सितारों की लोकप्रियता के दौर में जीतेंद्र ने एक अलग छवि और फिल्मों से अपनी मजबूत जगह बना ली थी। अक्षय भी वैसी ही स्थिति में हैं। लोकप्रिय और प्रचलित हीरो से अलग किस्म की फिल्मों से उन्होंने यह लोकप्रियता हासिल की है। इसमें लंबा वक्त लगा है। अब वे अपनी कामयाबी को बनाए रखने के लिए आजमाए हुए टोटकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। फूहड़, अश्लील और निम्नस्तरीय फिल्मों से कामयाबी मिलती है, तो वही सही, लेकिन अक्षय को याद रखना चाहिए कि वर्तमान की कामयाबी और लोकप्रियता भविष्य में तभी ठोस छवि और पहचान देती है, जब कुछ उल्लेखनीय और सार्थक फिल्में करियर की झोली में हों। अन्यथा सितारा डूबते ही सब कुछ गुम हो जाता है।
मालूम नहीं कि अक्षय के मन में भविष्य का यह संशय कभी पैदा होता है या नहीं? हिंदी फिल्मों में सफलता एक दुर्ग का निर्माण करती है, जिसके चौकीदार चापलूस और मतलबी लोग होते हैं। वे अपने स्वार्थ में स्टार को यथार्थ की वास्तविक जानकारी नहीं देते। कमबख्त इश्क की ताजा कामयाबी के बावजूद फिल्म के कॉन्टेंट के कारण अक्षय के वफादार दर्शक निराश हैं। उन्हें डर है कि अक्षय ऐसे परिणामों से भटकते और फिसलते ही जाएंगे।

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