फिल्‍म समीक्षा : राइट या रांग,न घर के न घाट के,हाइड एंड सीक

-अजय ब्रह्मात्‍मज

राइट या रांग


पुरानी शैली का अपना आकर्षण होता है। हम आज भी पुरानी फिल्में पसंद करते हैं। उन्हें देखते हैं। ठीक उसी तरह पुरानी शैली में बनी नई फिल्म भी पसंद आ सकती है। नीरज पाठक ने कसी हुई स्क्रिप्ट लिखी है। वे दर्शकों को कुछ और सोचने का मौका नहीं देते, इसी वजह से कुर्सी पर लाचार बैठे सनी देओल को देखकर भी कोफ्त नहीं होती। इंटरवल में हाल से बाहर निकलने और फिर लौटने के बीच हम आगे की कहानी बुनते हैं, लेकिन नीरज पाठक रोमांचक झटका देते हैं। फिल्म एक नया मोड़ लेती है, जिसमें राइट और रॉन्ग के बीच का फर्क मिटने लगता है।

अजय और विनय की इस कहानी में अजय की बीवी, विनय की बहन और अजय का कजिन शामिल हैं। ईमानदार, जांबाज और विलपावर का धनी अजय रिश्तों के पेंच से टूट जाता है। वह एक फूलप्रूफ व्यूह रचता है। बदला लेने के बाद सभी की आंखों में धूल झोंक कर कोर्ट से बाइज्जत बरी हो जाता है, लेकिन वह अपने राइट दोस्त को रॉन्ग होते नहीं देख पाता। उसे सच बता देता है। दोस्ती, प्रतिद्वंद्विता, छल, विवाहेतर संबंध, लोभ, वासना और पिता-पुत्र के रिश्तों को समेटती राइट या रॉन्ग आखिर तक दिलचस्प बनी रहती है।

ईषा कोप्पिकर के लिए यह चुनौतीपूर्ण भूमिका थी, लेकिन लेखक उनके किरदार को गहराई और विस्तार नहीं दे पाए हैं। पूरी फिल्म मुख्य रूप से अजय और एक सीमा तक विनय पर निर्भर करती है। अजय और विनय की भूमिकाओं में सनी देओल और इरफान निराश नहीं करते। इरफान मामूली दृश्यों में भी अनोखे अंदाज से दर्शकों को लुभा ले जाते हैं। सनी देओल अपनी छवि से आज भी नहीं निकल पा रहे हैं। उनकी पिस्तौल से निकली गोली लगती है तो आदमी हवा में लहरा जाता है। कभी लगता है कि पीछे दीवार न हो तो वह कहां जाकर गिरेगा? कोंकणा सेन शर्मा को मिली भूमिका इंटरवल के बाद जोड़ी गई लगती है।

राइट या रॉन्ग की खूबी उसका लेखन है। निश्चित ही इसके लिए नीरज पाठक और उनके सहयोगी गिरीश धमीजा और संजय चौहान बधाई के पात्र हैं।

*** तीन स्टार



न घर के न घाट के

हिंदी सिनेमा का एक पहलू न घर के न घाट के है। ऐसी फिल्में इन दिनों लगभग नहीं बनती हैं। गांव से शहर आए मासूम हीरो की कहानी में मुंबई के निर्देशकों की रुचि नहीं रही। राहुल अग्रवाल ने हिंदी सिनेमा के उन दर्शकों को तोहफा दिया है, जो सरल गंवई किरदारों की कहानियां देखना पसंद करते हैं।

देवकी नंदन त्रिपाठी को मुंबई में नौकरी मिलती है। वे अपना टीनहा बक्सा और अचार-पकवान लेकर मुंबई पहुंच जाते हैं। मुंबई में एक टपोरी मदन खचाक के साथ उनके रहने का जुगाड ़ बैठता है। बाद में माता-पिता उनकी बीवी को लेकर मुंबई आते हैं। पुलिस धोखे से उनकी बीवी को बार गर्ल समझकर गिरफ्तार कर लेती है। देवकी को कहा जाता है कि वह प्रूफ करे कि मिथिलेश कुमार उसकी पत्‍‌नी हैं। सत्यापन के कई मजेदार प्रसंगों से गुजरने के बाद फिल्म एक संदेश भी देती है कि विवाह का प्रमाणपत्र अवश्य बनवा लेना चाहिए।

मुंबई के समंदर में गांव की नइया के हिचकोलों में आनंद है। यह फिल्म शहर बनाम गांव पर नहीं है। दो सोच, लाइफ स्टाइल, आदतों और जरूरतों को लेकर बनी न घर के न घाट के गांव के सरल जीवन की मासूमियत के साथ शहरी जीवन की हकीकत का बयान करती है। दोनों के बीच भेद है। कोई टकराहट नहीं है।

इस फिल्म की जान रवि किशन हैं। उन्होंने मदन खचाक के किरदार को फूहड़ और अश्लील नहीं होने दिया है। भाषा और तहजीब में टपोरी होने के बाद भी रिश्तों और भावनाओं के प्रति मदन संवेदनशील है। लेखक ने बड़ी होशियारी से नए अभिनेता राहुल अग्रवाल को परेश रावल, ओमपुरी या रवि किशन के साथ जोड़कर दृश्यों को सरस बनाए रखा है। हालांकि ओम पुरी और परेश रावल की मौजूदगी फिल्म को रोचक बनाती है, लेकिन वे अपनी तरफ से फिल्म में कुछ नहीं जोड़ते हैं।

मल्टीप्लेक्स के दर्शकों के बीच जगह बनाने की होड़ में फंसी यह फिल्म उन्हें कम पसंद आएगी। सिंगल थिएटर और छोटे शहरों के दर्शकों के लिए यह मनोरंजक फिल्म है।

**1/2 ढाई स्टार


हाइड एंड सीक

शॉन आरान्हा की हाइड एंड सीक साइकोलोजिकल सस्पेंस थ्रिलर है। कुछ परिचित और कुछ अपरिचित कलाकारों के साथ बनी इस फिल्म की यही विशेषता है कि इसमें नयापन शॉन ने अलग किस्म की रोमांचक कहानी चुनी है। उसे नए तरीके से फिल्मांकित भी किया है।

बारह सालों के बाद कुछ किरदार एक शापिंग माल में बेहोशी से जगते हैं। उन्हें किसी ने बंद शापिंग माल में डाल दिया है। रात के अंधेरे में उन पर हमले होते हैं और एक-एक कर चार किरदारों की मौत होती है। सिर्फ दो बचे रह जाते हैं। उनमें से एक ने ही यह साजिश रची है। फिल्म की खूबी है कि अंत तक सस्पेंस बना रहता है।

सस्पेंस फिल्मों के शौकीन दर्शकों को यह फिल्म रोचक लग सकती है। कलाकारों में अर्जन बाजवा, पूरब कोहली, मृणालिनी शर्मा और अमृता पटकी ने सुंदर अभिनय किया है।

** दो स्टार


Comments

बढिया समीक्षा है।

न घर के न घाट के फिल्म की स्टोरी तो मस्त लग रही है। देखनी पडेगी।

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