भविष्य का सिनेमा मुंबई का नहीं


जयपुर. हिंदी सिनेमा केवल मुंबई की बपौती नहीं है और मैं मानता हूं कि हर प्रदेश का अपना सिनेमा होना चाहिए। यह सिनेमा के विकास के लिए जरूरी है। यह बात जाने माने फिल्म पत्रकार अजय बत्मज ने ‘समय, समाज और सिनेमा’ विषय पर हुए संवाद में कही। जेकेके के कृष्णायान सभागार में शनिवार को जवाहर कला केन्द्र और भारतेन्दु हरीश चन्द्र संस्था की ओर से आयोजित चर्चा में उन्होने सिनेमा के जाने अनजाने पहलुओं को छूने की कोशिश की।
उन्होने कहा कि मुझे उस समय बहुत खुशी होती है जब मैं सुनता हूं कि जयपुर ,भोपाल या लखनऊ का कोई सिनेमा प्रेमी संसाधन जुटा कर अपनी किस्म की फिल्म बना रहा है। सिनेमा के विकास के लिए उसका मुंबई से बाहर निकलना जरूरी है। साथ ही उन्होने यह बात भी कही कि महाराष्ट्र में जहां मराठी फिल्म बनाने वाले फिल्मकारों को 15 से 60 लाख तक की सब्सिडी दी जाती है मगर राजस्थान जैसे प्रदेश में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है।
वह कहते हैं कि मुझे आशा है कि भविष्य का सिनेमा मुंबई का नहीं होगा। आज के सिनेमा की दशा और दिशा के प्रति आशान्वित अजय ने कहा कि सबसे अच्छी बात जो आज के सिनेमा में देखने को मिल रही है वह यह कि पिछले पांच सालों में जो भी निर्देशक आए हें वह मुंबई से बाहर के हैं। उन्होने इंडस्ट्री के पुराने दिग्गजों पर अपना कलात्मक क्षमता से इतना दबाव बना दिया कि ‘कभी खुशी कभी गम’ बनाने वाले ‘माय नेम इज खान’ जैसी फिल्में बनाने लगे।
बकौल अजय हिंदी सिनेमा कभी नहीं मर सकता। अब तो सिनेमा बनाना आसान हो गया है और यही वजह है कि अब मोबाइल पर भी फिल्में बनाई जा रही हैं। डिजीटल कैमरे पर बनी फिल्में ऑल इंडिया रिलीज हो रही हैं।

सिनेमा एक प्रोडक्ट
सिनेमा एक प्रोडक्ट है जो हिंदी में बनाया तो जाता है मगर यह जरूरी नहीं कि उसको देखने वाले भी हिंदी भाषी ही हों। वैसे भी अब फिल्मकारों का फोकस इस पर नहीं है कि उनकी फिल्म को कितने लोग देख रहे हैं बल्कि उनका ध्यान इस बात पर रहता है कि जितने लोगों ने देखा उनसे कितना पैसा आया।
सिनेमा के बदलते मानदंडों पर बात करते हुए उन्होने कहा कि ‘थ्री इडियट्स’ फिल्म ने 400 करोड़ का मुनाफा कमाया। अब फिल्मकारों का लक्ष्य उस आकंड़े को छूना है। अब सिनेमा अमीरों के लिए बन रहा है। किसी को इससे सरोकार नहीं है कि जो सिंगल स्क्रीन में सिनेमा देखता था अब वह कहां सिनेमा देखेगा। सबकी निगाहें अमीर दर्शकों पर है और उन्हीं को फोकस कर फिल्में बनाई जा रही हैं।


अभाव में प्रयोग होते हैं
उन्होने कहा कि जिन सफल प्रयोगवादी फिल्मों की चर्चा की जाती है उसके पीछे कारण यह रहता है कि अभावों में प्रयोग होते हैं और गरीब लोग ज्यादा प्रखर होते हैं। यही वजह है कि वह लोग कम बजट में भी बेहतर सिनेमा बनाने में कामयाब रहते हैं...

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एक और सूचना, जो इस ख़बर में शामिल नहीं है...
अजय ब्रह्मात्मज से बातचीत की युवा ब्लॉगर, फिल्मकार और शिल्पकार निधि सक्सेना व जयपुर के पत्रकार रामकुमार ने। कार्यक्रम का संचालन डेली न्यूज़ के सप्लिमेंट हमलोग के प्रभारी डॉ. दुष्यंत ने किया.

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वरिष्ठ फिल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज से जयपुर के जवाहर कला केंद्र में आत्मीय बातचीत का ब्योरा....


सौजन्य से...दैनिक भास्कर, जयपुर

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अच्छा है कि आपने मजबूती से इस बात के संकेत के बाहर भी सिनेमा का भविष्य है नहीं तो लोगों का आधे से ज्यादा समय तो मुंबई का होने में ही खपकर रह जाता है।..

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