दरअसल : सेंसर बोर्ड की सावधानियां

-अजय ब्रह्मात्‍मज    


फिल्मों के विषय, संवाद और रेफरेंस के संबंध में पैदा हो रहे नित नए विवादों के मद्देनजर सेंसर बोर्ड कुछ ज्यादा ही सावधान हो गया है। जब भी किसी फिल्म के प्रसंग में कोई आपत्ति उठती है, तो सेंसर बोर्ड को भी अनायास कठघरे में खड़ा किया जाता है। सवाल पूछे जाते हैं कि सेंसर बोर्ड के सदस्यों ने क्यों ध्यान नहीं दिया? बार-बार की जवाबदेही से बचने के लिए सेंसर बोर्ड के सदस्य एहतियातन विवादास्पद दृश्य और संवादों को पहले ही कटवा देते हैं। थोड़ी भी शंका होने पर वे निर्माता पर दबाव डालते हैं। इन दिनों फिल्में जिस जल्दबाजी और हड़बड़ी में रिलीज की जा रही हैं, उसमें समय की कमी और दांव पर लगे पैसे को ध्यान में रखते हुए निर्माता आनाकानी नहीं करता। निर्देशक ने ना-नुकुर की, तो उस पर दबाव डाला जाता है। सेंसर के सुझाव के मुताबिक दृश्य काट कर, संवाद बदल कर या शब्दों को ब्लिप कर फिल्में रिलीज हो रही हैं। पिछले दिनों विशाल भारद्वाज, दिबाकर बनर्जी, संजय गुप्ता जैसे निर्माता-निर्देशक सेंसर बोर्ड की इन सावधानियों के शिकार हुए। विशाल भारद्वाज के कमीने में उत्तर प्रदेश के एक शहर का नाम बदल कर कुछ और करना पड़ा था। उन्हें अभिषेक चौबे की फिल्म इश्किया में भी संवाद ब्लिप करने पड़े और शब्द काटने पड़े। दिबाकर की हाल में रिलीज हुई एलएसडी की पहली कहानी में जातिबोधक सरनेम हटाने की सलाह मिली। रिलीज की तारीख और सेंसर की आपत्ति के बीच का वक्त इतना कम था कि दिबाकर को सेंसरबोर्ड की हिदायत माननी पड़ी। इस वजह से फिल्म की पहली कहानी का इंपैक्ट ही बदल गया या यह कहें कि निर्देशक की बात सही परिप्रेक्ष्य में व्यक्त नहीं हो सकी। नाम, जाति और प्रतिष्ठा के नाम पर हो रही प्रेमी युगलों की हत्या के चित्रण द्वारा दिबाकर कथित रूप से विकसित समाज की विसंगतियों और विद्रूपताओं की ओर इंगित कर रहे थे। फिल्म में यह इशारा तो समझ में आता है, लेकिन उसका संदर्भ खो जाता है।

सेंसर बोर्ड सचेत रहे, लेकिन उसे ऐसे महत्वपूर्ण विषय, तथ्य और चित्रणों के प्रति उदार और संवेदनशील रवैया अपनाना चाहिए। ठीक है कि समाज में सहिष्णुता खत्म हो गई है और जरा सी बात से किसी के भी अहं को ठेस लग जाती है। हर व्यक्ति, समुदाय और समाज मूल्यों के रक्षक के तौर पर नजर आता है और सेंसर द्वारा प्रमाणित फिल्म का प्रदर्शन रोक देने की खुली चुनौती दे देता है। कानून-व्यवस्था इतनी कमजोर और ढीली हो गई है कि प्रशासन जल्दी से समर्पण कर देता है और चाहता है कि विवाद में उलझी पार्टियां खुद ही बीच का रास्ता खोज लें। ऐसे में क्रिएटिविटी पर अंकुश बढ़ता जा रहा है। इस दमघोटू माहौल में लेखक और निर्देशक पहले से ही सावधान रहते हैं। नतीजा यह हो रहा है कि कई आवश्यक विषय पर्दे पर नहीं आ पा रहे हैं। प्रयोगशील निर्देशक किसी भी विवाद की संभावना से फिल्म की रिलीज बाधित होने से बचने के लिए सुरक्षित रास्ता अपना रहे हैं। वे सामान्य और रेगुलर फिल्में बना रहे हैं। एक युवा निर्देशक की बनी-बनाई फिल्म एक बड़ी कारपोरेट कंपनी ने खरीदी। बाद में उसे देखने पर उन्हें लगा कि उक्त फिल्म उनके बिजनेस हितों के खिलाफ जा सकती है, क्योंकि उसमें कुछ ऐसे मुद्दे हैं। उन्होंने उस फिल्म को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। युवा निर्देशक को नहीं मालूम कि वह फिल्म कभी रिलीज भी हो पाएगी या नहीं?

Comments

महत्वपूर्ण और चिंतनीय मुद्दा। यह विषय लगभग तभी से चर्चा का विषय है जब से सेंसर बोर्ड बना है। फिल्मों में प्रयोगधर्मिता बढने के साथ यह विषय जटिल रूप लेता जा रहा है। रचनात्मक स्वतंत्रता एक ऐसा शब्दजाल है जिसके पक्ष-विपक्ष में जबरदस्त दलीलें हैं। रसूख वाले फिर भी अपनी मनवा ही ले जाते हैं। यदि आस्था किसी नए निर्माता की फिल्म होती तो क्या उसी रूप में रिलीज हो पाती?

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