दरअसल: किताब के रूप में 3 इडियट्स की मूल पटकथा

-अजय ब्रह्मात्‍मज

विधु विनोद चोपड़ा ने एक और बढि़या काम किया। उन्होंने 3 इडियट्स की मूल पटकथा को किताब के रूप में प्रकाशित किया है। मूल पटकथा के साथ फिल्म के लेखक और स्टारों की सोच और बातें भी हैं। अगर कोई दर्शक, फिल्मप्रेमी, फिल्म शोधार्थी 3 इडियट्स के बारे में गहन अध्ययन करना चाहता है, तो उसे इस किताब से निश्चित रूप से मदद मिलेगी। 20-25 साल पहले हिंद पॉकेट बुक्स ने गुलजार और राजेन्द्र सिंह बेदी की लिखी पटकथाओं को किताबों के रूप में छापा था। उसके बाद पटकथाएं छपनी बंद हो गई।

पाठक और दर्शकों को लग सकता है कि प्रकाशकों की पटकथाओं में रुचि खत्म हो गई होगी। सच्चाई यह है कि एक लंबा दौर ऐसी हिंदी फिल्मों का रहा है, जहां कथा-पटकथा जैसी चीजें होती ही नहीं थीं। यकीन करें, हिंदी फिल्मों में फिर से कहानी लौटी है। पटकथाएं लिखी जा रही हैं। उन्हें मुकम्मल करने के बाद ही फिल्म की शूटिंग आरंभ होती है।

इधर हिंदी सिनेमा पर चल रहे शोध और अध्ययन का विस्तार हुआ है। लंबे समय तक केवल अंग्रेजीदां लेखक और पश्चिम के सौंदर्यशास्त्री और लोकप्रिय संस्कृति के अध्येता ही हिंदी फिल्मों पर शोध कर रहे थे। उनकी छिटपुट कोशिश का भी गहरा असर हुआ। अब भारत में भी संस्थान, विश्वविद्यालय और अकादमियों ने हिंदी फिल्मों में रुचि ली है। समस्या यह है कि अपने यहां फिल्मों के दस्तावेजीकरण का चलन नहीं है। निर्माता-निर्देशकों में अपनी फिल्मों को संरक्षित करने का आग्रह नहीं दिखता। कभी किसी निर्माता से उनकी फिल्मों की रिलीज की तारीख और साल पूछ लें, तो वे बगलें झांकने लगते हैं। हालांकि इंटरनेट पर आई सूचनाओं की बाढ़ से बेसिक जानकारियां मिल जाती हैं, लेकिन विस्तार में जाने पर वहां भी कुछ हाथ नहीं आता। इस संदर्भ में 3 इडियट्स की पटकथा का किताब में आना स्वागत योग्य कदम है। विधु विनोद चोपड़ा ने कहा है कि वे अपनी फिल्मों के साथ ही क्लासिक फिल्मों की पटकथा भी प्रकाशित करवाएंगे। इस दिशा में सबसे पहले गुरुदत्त की फिल्मों पर काम चल रहा है। फिल्में देख कर संवाद और दृश्य लिखना थोड़ा मुश्किल काम होता है। यह उल्टी प्रक्रिया है, इसलिए इसमें मूल का आनंद नहीं मिल सकता। फिर भी जहां कुछ मौजूद नहीं है, वहां इस तरह की हर कोशिश महत्वपूर्ण हो जाती है। गुरुदत्त के साथ हिंदी के सभी महत्वपूर्ण निर्देशकों की फिल्मों से संबंधित सामग्रियों का दस्तावेजीकरण होना चाहिए। फिल्मों के प्रचार में करोड़ों झोंक देने वाले निर्माता और कारपोरेट हाउस अपनी फिल्म की एक प्रिंट भी संरक्षण नेशनल फिल्म आर्काइव को नहीं भेज पाते। उन्हें इस संदर्भ में भी सोचना चाहिए।

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को अपने स्तर पर भी यह कोशिश करनी चाहिए। अगर हम अपनी आने वाली पीढि़यों को सिने साक्षर बनाना चाहते हैं और यह उम्मीद करते हैं कि भविष्य का सिनेमा अधिक उपयोगी और सार्थक होगा, तो हमें इस दिशा में अभी से पहल करनी चाहिए। फिल्मों से संबंधित सामग्रियों का संकलन और संग्रह मुश्किल काम नहीं है। फिल्म की रिलीज के साथ-साथ यह कर लिया जाए, तो अधिक यत्न भी नहीं करना पड़ेगा। इधर अमिताभ बच्चन खुद से संबंधित हर तरह की सामग्रियों का संग्रह कर रहे हैं। मालूम नहीं कि उन सामग्रियों के सार्वजनिक उपयोग की वे अनुमति देंगे या नहीं, लेकिन इतना निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि वे अकेले ऐसे स्टार हैं, जिनसे संबंधित अधिकांश सामग्रियों का दस्तावेजीकरण चल रहा है। अब तो उनके बेटे अभिषेक बच्चन ने भी इसे अपना लिया है। 3 इडियट्स के किताब के रूप में आने की खुशी के बावजूद एक शिकायत है कि इसे हिंदी में लाने के बारे क्यों नहीं सोचा गया? अभी जरूरत है कि हम उत्तर भारत के हिंदीभाषी पाठकों और दर्शकों के बीच ऐसी किताबें ले जाएं। वे भविष्य के हिंदी सिनेमा के ठोस दर्शक बनेंगे और उनके बीच से ही भविष्य के निर्देशक निकलेंगे।


Comments

Udan Tashtari said…
अच्छा विचार!
रंजन said…
देखे इसमें कितना कोपी पेस्ट है... चेतन भगत आते होगें..

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