दरअसल :घनघोर प्रचार के बावजूद

-अजय ब्रह्मात्‍मज

फिल्म रामगोपाल वर्मा की आग के फ्लॉप होने की पुष्टि के बाद भी राम गोपाल वर्मा यह मानने को तैयार नहीं थे कि दर्शकों को उनकी फिल्म बुरी लगी। उनका तर्क था कि अच्छी या बुरी लगने का सवाल तो फिल्म देखने के बाद आता है। मेरी फिल्म दर्शकों ने देखी ही नहीं, तो फिर उसे बुरी कैसे कहा जा सकता है? अपनी फिल्म के प्रति लगाव की वजह से ज्यादातर फिल्मकार ऐसे ही तर्क देते हैं। फिर भी सच है कि कुछ फिल्में रिलीज के पहले ही दर्शक खो देती हैं। उन्हें देखने दर्शक सिनेमाघरों में नहीं जाते। उनका मौखिक प्रचार नहीं होता। सिनेमाघरों से आरंभिक शो देख कर निकले दर्शकों की प्रतिक्रियाएं और पत्र-पत्रिकाओं में आए रिव्यू भी ऐसी फिल्में नहीं देखने के लिए दर्शकों को प्रेरित करते हैं।

पिछले महीने में आई दो बड़ी फिल्मों काइट्स और रावण के प्रति दर्शकों के रवैये से इसे समझा जा सकता है। दोनों ही फिल्में स्टार कास्ट, डायरेक्टर और प्रोडक्शन हाउस की वजह से ए प्लस श्रेणी की थीं। दोनों फिल्मों का जमकर प्रचार किया गया। दर्शकों को लुभाने की हर कोशिश की गई। तमाम प्रचार के बावजूद काइट्स को आरंभिक शो में पर्याप्त दर्शक नहीं मिले। रावण को तो काइट्स जैसी ओपनिंग भी नहीं मिल पाई। चूंकि निर्माताओं का सारा जोर इन दिनों वीकएंड बिजनेस पर रहता है, इसलिए दोनों फिल्मों के 2000 से अधिक प्रिंट लगाए गए। फिल्म न चलने पर घाटा भी प्रिंट के अनुपात में बढ़ गया। दोनों फिल्मों का नुकसान सौ करोड़ रुपयों से ज्यादा आंका जा रहा है।

इन दोनों के साथ फ्लॉप हुई फिल्मों का लोग अध्ययन करें, तो पाएंगे कि ज्यादातर फिल्में दर्शकों का मनोरंजन करने में विफल रहीं। शायद ही कभी अच्छी और रोचक फिल्म असफल होती है। दर्शक मनोरंजन की उम्मीद में फिल्में देखने जाते हैं। फिल्म रोचक और बांधने लायक हुई, तो उसे दर्शक मिलते हैं। वीकएंड में ये दर्शक मौखिक प्रचार से बढ़ते हैं। आश्चर्य तो तब होता है, जब दर्शक पहले से भांप लेते हैं और सिनेमाघरों का रुख ही नहीं करते। काइट्स और रावण के संदर्भ में तो उम्मीद पूरी नहीं होने या निगेटिव बातें सुनने के आधार पर दर्शक एडवांस टिकट के बावजूद सिनेमाघरों में नहीं जाते। बड़े शहरों में उनका तर्क होता है कि चलो पैसे ही बर्बाद हुए, समय तो बच गया। बाहर बुरी फिल्म देखने में तीन घंटे बर्बाद करने और उसे कोसने से बेहतर है कि घर में बैठकर टीवी देखो या कुछ और करो। यही कारण है कि एडवांस लगने के बाद भी थिएटर खाली दिखाई पड़ते हैं। मल्टीप्लेक्स दर्शकों का यह नया ट्रेंड निर्माताओं को जबरदस्त धोखा दे रहा है।

कई बार कहा जाता है कि आक्रामक प्रचार से फिल्में चल जाती हैं। आमिर खान और शाहरुख खान का उदाहरण दिया जाता है। अमिताभ बच्चन ने भी पा की रिलीज के समय स्वीकार किया था कि इन दिनों सिनेमाघरों में दर्शकों को लाने के लिए फिल्म के बारे में अधिक से अधिक बातें करना जरूरी हो गया है। प्रचार और ध्यान आकर्षित करने के नए रास्ते भी खोज जा रहे हैं। हर निर्माता और प्रोडक्शन हाउस अपनी नई फिल्म से बेमिसाल कामयाबी की उम्मीद रखता है। यह उम्मीद तभी संभव है, जब फिल्म रोचक और मनोरंजक होगी। वर्ना लाख प्रचार कर लें, नतीजा ठन-ठन गोपाल होगा।

निर्माताओं को फिल्म की लागत का 15-25 प्रतिशत प्रचार पर खर्च करने के पहले 5 से 10 प्रतिशत उसके लेखन पर खर्च करना चाहिए। स्क्रिप्ट दमदार होगी, तभी फिल्म रोचक और मजेदार होगी। कन्टेंट के अभाव में दर्शक संतुष्ट नहीं होता। उसे तो अपने पैसों के बदले मनोरंजन चाहिए। अगर हिंदी फिल्में निराश करेंगी, तो वह अंग्रेजी फिल्में देखेगा। फिल्में नहीं मिलेंगी, तो किसी और तरीके से अपना टाइम पास करेगा।


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किसी फिल्‍म के चलने के लिए उसका रोचक और मनोरंजक होना तो पहली शर्त है !!
सही कहा आपने

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