मुझे फिल्मों में ही आना था- राज कुमार


-अजय ब्रह्मात्मज
उन्होंने अपने नाम से यादव हटा दिया है। आगामी फिल्मों में राज कुमार यादव का नाम अब सिर्फ राज कुमार दिखेगा। इसकी वजह वे बताते हैं, ‘पूरा नाम लिखने पर नाम स्क्रीन के बाहर जाने लगता है या फिर उसके फॉन्ट छोटे करने पड़ते हैं। इसी वजह से मैंने राज कुमार लिखना ही तय किया है। इसके अलावा और कोई बात नहीं है।’ राज कुमार की ताजा फिल्म ‘शाहिद’ इस साल टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में दिखाई गई। पिछले दिनों अनुराग कश्यप की फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर-2’ में उन्होंने शमशाद की जीवंत भूमिका निभाई। उनकी ‘चिटगांव’ जल्दी ही रिलीज होगी। एफटीआईआई से एक्टिंग में ग्रेजुएट राज कुमार ने चंद फिल्मों से ही, अपनी खास पहचान बना ली है। इन दिनों वे ‘काए पो चे’ और ‘क्वीन’ की शूटिंग कर रहे हैं।
    -आप एफटीआईआई के ग्रेजुएट हैं, लेकिन आप की पहचान मुख्य रूप से थिएटर एक्टर की है। ऐसा माना जाता है कि आप भी एनएसडी से आए हैं?
0 इस गलतफहमी से मुझे कोई दिक्कत नहीं होती। दरअसल शुरू में लोग पूछते थे कि आप ने फिल्मों से पहले क्या किया है, तो मेरा जवाब थिएटर होता था। फिल्मों में लोग थिएटर का मतलब एनएसडी ही समझते हैं, इसलिए यह गलतफहमी है। अब धीरे-धीरे लोगों को मालूम हो रहा है कि मैं एफटीआईआई से आया हूं। पिछले दो-तीन सालों में और भी कुछ छात्र आए हैं।
    - एक जमाने में एफटीआईआई से एक्टर की पूरी जमात आई थी। वे सभी आज मशहूर हैं। एक अंतराल के बाद आप लोग उस ट्रेडिशन को आगे बढ़ा रहे हैं। अभी कैसी फैकल्टी है और वहां पढऩे का क्या लाभ हुआ?
0 पेंटल साहब हमारे हेड थे। फैकल्टी काफी अच्छी थी। दो सालों की पढ़ाई में उनलोगों ने एक्टिंग की बारीकियां सिखाईं। वहां थोड़ी आजादी भी दी जाती है। आप ने सही कहा। एक समय एफटीआईआई से काफी एक्टर हिंदी फिल्मों में आए। उन्होंने हिंदी फिल्मों की एक्टिंग को नई दिशा दी। बीच में वहां एक्टिंग की पढ़ाई बंद हो गई थी। अब शुरू हुई है। धीरे-धीरे हमारी तादाद बढ़ेगी।
    - आप ने एफटीआईआई जाने की जरूरत क्यों महसूस की? आप के पहले नसीरुद्दीन शाह और ओम पुरी ने एनएसडी से पढ़ाई पूरी करने के बाद एफटीआईआई से भी अभिनय का प्रशिक्षण लिया। क्या एफटीआईआई में फिल्म एक्टिंग की खास पढ़ाई होती है?
0 मैं दिल्ली में थिएटर कर रहा था। वहां श्रीराम सेंटर से जुड़ा हुआ था। 2004 में जब एफटीआईआई में एक्टिंग का कोर्स चालू हुआ तो एक मित्र वहां गए। उनके बारे में सुनने और जानने के बाद मैंने भी एफटीआईआई में ही जाना उचित समझा। एनएसडी का ख्याल मुझे कभी नहीं आया। मुझे थिएटर करना ही नहीं था। शुरू से स्पष्ट था कि मुझे फिल्मों में एक्टिंग करनी है। मेरे दिमाग में यह बात थी कि एफटीआईआई मुंबई के नजदीक है। एफटीआईआई से निकले काफी लोग फिल्म इंडस्ट्री में सक्रिय हैं। मुझे लगा कि उससे थोड़ी सहूलियत होगी।
    -फिल्मों में एक्टिंग करने का फैसला कब लिया आप ने?
0 सच कहूं तो स्कूल के दिनों में सोच लिया था। स्कूल के वार्षिक समारोहों और सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा लिया करता था। दोस्तों और शिक्षकों की प्रशंसा से लगा कि मैं कुछ कर सकता हूं। उन्हीं दिनों यह ख्वाब पैदा हुआ। बाद में डांस सीखा, थिएटर किया, नाटक पढ़े, फिल्में देखी.. और खुद को फिल्मों के लिए तैयार किया।
    - अपनी पृष्ठभूमि के बारे में बताएं?
0 मैं गुडग़ांव का हूं। उस गुडग़ांव का, जो एक गांव हुआ करता था। अभी तो वह सिंगापुर का मुकाबला कर रहा है। हम रात में छतों पर चादर बिछाकर सोया करते थे। ऊपर तारों से सजा आकाश होता था। वहीं कुछ सपने देखे थे। मेरे पिता पटवारी थे। उन्होंने ईमानदार जिंदगी जी और उसी की सीख दी। मैं तीन भाइयों में सबसे छोटा हूं। दोनों बड़े भाई भी एक्टिंग और डांसिंग के शौकीन थे। फिलहाल वे नौकरी कर रहे हैं। मुझे पर्दे पर देखकर उन्हें सबसे ज्यादा खुशी होती है। शायद मैं उनके अधूरे ख्वाबों को भी जी रहा हूं। बहुत संबल मिलता है। बतौर एक्टर मुझे बचपन की सरल और साधारण जिंदगी बहुत मदद करती है। मैंने चेहरे और किरदार पढ़े हैं। वे सभी मेरे अंदर जिंदा हैं। मैंअपने परिवार और परिवेश का शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने मुझे बचपन में ही अनौपचारिक ट्रेनिंग दे दी। मैं संयुक्त परिवार से आता हूं। रिश्तों की रेस्पेक्ट जानता हूं। रहते हम लोग गुडग़ांव में थे, लेकिन दिल्ली आना-जाना लगा रहता था। मुझे एक साथ गांव और शहर दोनों को समझने और जीने का मौका मिला।
    - परिवार का माहौल कैसा था? फिल्मों के प्रति मां-बाप की रुचि थी या नहीं?
0 फिल्मों के प्रति बहुत ज्यादा रूझान नहीं था, लेकिन मेरी मां अमिताभ बच्चन की जबरदस्त प्रशंसक हैं। पिताजी को राजेश खन्ना ज्यादा पसंद थे। उनके गाने वे आज भी गुनगुनाया करते हैं। भाइयों को फिल्मों का शौक था। उन्हीं के साथ मुझे भी फिल्में देखने को मिल जाती थी। मुझे बचपन से पूरी आजादी मिली। फिल्में देखने पर कोई पाबंदी नहीं थी, लेकिन मैंने कभी इसका नाजायज फायदा नहीं उठाया। मेरे ऊपर 90 प्रतिशत अंक लाने का या डॉक्टर-इंजीनियर बनने का दवाब नहीं था। मैं ठीक-ठाक छात्र रहा हूं। परीक्षा के समय पढक़र फस्र्ट क्लास लाया करता था। पिताजी ने बताया था कि वे परीक्षा के दिनों में फिल्में जरूर देखते थे। उनसे यह आदत मैंने भी सीख ली।
    -फिल्मों में काम मिलने में कितनी दिक्कतें हुईं? संघर्ष कितना लंबा और कठिन रहा?
0 मुझे लगभग एक साल कथित स्ट्रगल करना पड़ा। आने के बाद मैंने भी वही तरीका अपनाया कि प्रोडक्शन हाउस में जाकर अपनी तस्वीर छोड़ो और फिर उनके फोन का इंतजार करो। ज्यादातर निराशा ही हाथ लगती थी। मैंने उन्हीं दिनों दोस्तों की मदद से अपना एक शोरील बनाया। डीवीडी के ऊपर अपनी तस्वीर चिपकाई और किसी प्रोफेशनल एक्टर की तरह उन्हें प्रोडक्शन के दफ्तरों में छोड़ा। फिर कहीं अखबार में पढ़ा कि दिबाकर बनर्जी को   ‘लव सेक्स और धोखा’ के लिए नए कलाकार चाहिए। मुझे यकीन हो गया कि मेरे लिए ही उन्होंने यह शर्त रखी है। मैंने उनके कास्टिंग डायरेक्टर से संपर्क किया। संयोग देखें कि मेरा चुनाव हो भी गया। उस एक फिल्म ने हिंदी फिल्मों में मेरा प्रवेश आसान कर दिया। उसके तुरंत बाद  ‘रागिनी एमएमएस’ मिल गई। वैसे  ‘लव सेक्स और धोखा’ की शूटिंग के बाद ही मैंने  ‘चिटगांव’ की शूटिंग शुरू कर दी थी और  ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर 2’ के लिए हां कह दिया था। फिर विजॉय नांबियार ने  ‘शैतान’ में छोटा सा अपीयरेंस दिया। अभी तक के अपने काम से संतुष्ट हूं और मुझे लग रहा है कि सही दिशा में बढ़ रहा हूं।
    -अपनी फिल्म  ‘शाहिद’ के बारे में बताएं?
0 यह मुंबई के वकील शाहिद आजमी के जीवन पर आधारित है। वे ऐसे निर्दोष व्यक्तियों की वकालत करते थे, जिन्हें किसी गलतफहमी या साजिश के तहत गंभीर अपराधों के लिए गिरफ्तार कर लिया गया था। उन्होंने कई निरपराध आरोपियों को बरी कराया। उनके इस रवैए से परेशान होकर असामाजिक तत्वों ने राजनीतिक कारणों से उनकी हत्या कर दी। हंसल मेहता ने उनकी जिंदगी पर बहुत ही संवेदनशील फिल्म बनाई है। मुझे पूरा विश्वास है कि यह फिल्म मेरी क्षमताओं से दर्शकों और समीक्षकों को परिचित कराएगी।
    -आप का करियर अच्छा और सीधा ऊंचाई की ओर बढ़ रहा है। अभी तक की फिल्मों में किस अभिनेता या अभिनेत्री के साथ एक फ्रेम में आने की सबसे ज्यादा खुशी हुई? भविष्य में और किस के साथ आना चाहेंगे?
0  ‘चिटगांव’ में मनोज बाजपेयी के साथ आना मेरे लिए गर्व की बात थी। उनके साथ एक कनेक्शन महसूस करता हूं। वे भी दिल्ली से थिएटर कर मुंबई आए। मैं उन्हीं के पद्चिह्नों पर चल रहा हूं। उसके बाद  ‘तलाश’ की शूटिंग में आमिर खान के साथ काम करने का मौका मिला। आमिर बड़े ही सहज और डेमोक्रेटिक स्टार हैं। उन्होंने फिल्म एक्टिंग की बारीकियां बातों-बातों में सिखा दीं। भविष्य में चाहूंगा कि कभी इरफान के साथ काम करने का मौका मिले। मुझे डर है कि शायद मैं सहज नहीं रह पाऊंगा। मैं उनका बहुत सम्मान करता हूं और उनके प्रभामंडल से प्रभावित हूं। उन्होंने हिंदी फिल्मों में एक्टिंग की नई परिभाषा गढ़ी है।

Comments

Popular posts from this blog

संस्‍मरण : विरेन्‍द्र वर्मा,कुर्सियां और स्‍टार

फिल्‍म समीक्षा : एंग्री इंडियन गॉडेसेस

Gr8 Marketing turns Worst Movies into HITs-goutam mishra