मटरू की बिजली का मन्डोला का नामकरण

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
विशाल भारद्वाज ने मकड़ी,मकबूल और ओमकारा के बाद पहली बार सात खून माफ में तीन शब्दों का टायटल चुना था। इस बार उनकी फिल्म के टायटल में पांच शब्द हैं-मटरू की बिजली का मन्डोला। फिल्म के नाम की पहली घोषणा के बाद से ही इस फिल्म के टाश्टल को लेकर कानाफूसी चालू हो गई थी। एक तो यह हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के अंगेजीदां सदस्यों के लिए टंग ट्विस्टर थ और दूसरे इसका मानी नहीं समझ में आ रहा था। बहुत समय तक कुछ लोग मटरू को मातृ और मन्डोला को मन डोला पढ़ते रहे। विशाल भारद्वाज ने इस फिल्म के टायटल की वजह बताने के पहले एक किस्सा सुनाया। जावेद अख्तर को यह टायटल पसंद नहीं आया था। उनहोंने विशाल से कहा भी कि यह कोई नाम हुआ। उनकी आपत्ति पर गौर करते हुए विशाल ने फिल्म का नाम खामखां कर दिया। वे अभी नए टायटल की घोषणा करते इसके पहले ही विशाल के पास जावेद साहब का फोन आया- आप ने खामखां नाम जाहिर तो नहीं किया है। मुझे पहला टायटल ही अच्छा लग रहा है। किसी मंत्र का असर है उसमें। आप तो मटरू की बिजली का मन्डोला टायटल ही रखो। इस फिल्म के गीत के लिए जब विशाल अपने गुरू और गॉडफादर गुलजार से मिले तो वे भी चौंके,लेकिन शब्दों के कारीगर को यह टायटल बहुत पसंद आया। उन्होंने तुरंत जोड़ा-पहले मैं बोला,फिर वो बोला,मटरू की बिजली का मन्डोला। अभी यह गीत बन गया है। विशाल ने बताया कि उन्होंने हरियाण में एक दुकान पर मटरू नाम देख था और बिजली शब्द तो उन्हें इतना प्रिय है कि उन्हें बेटी होती तो वे उसका नाम बिजली हीे रखते। हरियाणा में  मन्डोला नाम का एक गांव है। इस तरह विशाल की अगली फिल्म का नाम मटरू की बिजली का मन्डोला पड़ा। और एक खास बात विशाल ने पोस्टर पर केवल नागरी लिपि में यानी हिंदी में फिल्म का नाम डाला है। इस फिल्म में मटरू इमरान खान है और बिजली अनुष्का शर्मा। 

Comments

sanjeev5 said…
पता नहीं इन निर्देशकों को क्या हो रहा है. इस फिल्म के बारे में की उनहोंने नाम ही ऐसा रखा है की उम्मीद बढ़ गयी है. ओमकारा के बाद उनका स्तर गिर रहा है. हर फिल्म में पंकज कपूर को ले कर ना जाने कौन सी दोस्ती निभा रहे हैं? फिल्म जो उनकी अच्छी थीं बस मकबूल और ओंकारा. दोनों ही ये फ़िल्में शेक्सपीर की कहानी पर आधारित थीं. जब अपने दिमाग को इस्तेमाल करना पड़ा तो वही ढाक के तीन पात. कुछ उम्मीद है की संगीत ठीक होगा. अब तो रहमान साहेब भी कुछ अटपटा संगीत ही बना रहे हैं, तो बाकियों से क्या उम्मीद रखें. प्रसिद्धि शायद विशाल के लिए उन्हें अब बांधे हुए है और अब वो समय ही कहाँ है की एक अच्छी स्क्रिप्ट लिख पायें. बेहद अफ़सोस है की एक अच्छा फिल्मकार साधारण फ़िल्में बना रहा है. पंकज कपूर को ऑफिस ऑफिस में ही रहने दो....

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