फिल्म समीक्षा : गो गोवा गॉन

movie review : go goa gone-अजय ब्रह्मात्मज
हिंदी फिल्मों में इन दिनों अनोखे प्रयोग हो रहे हैं। अच्छी बात तो ये है कि उन्हें समर्थन भी मिल रहा है। निर्माता और दर्शकों के बीच इस नए रिश्ते को प्रयोगवादी निर्देशक मजबूत कर रहे हैं। युवा निर्देशकों की जोड़ी राज-डीके जैसे निर्देशक हैं। अपनी नई कोशिश में उन्होंने जोमकॉम पेश किया है। जोम्बी और कॉमेडी के मिश्रण से तैयार यह फिल्म भारत के लिए नई है। अभी तक हम भूत,प्रेत,चुड़ैल और डायन की फिल्मों से रोमांचित होते रहे हैं। लेकिन अब राज-डीके जोम्बी लेकर आए हैं। विदेशों में जोम्बी फिल्में खूब बनती और चलती हैं। जोम्बी अजीब किस्म के प्राणि होते हैं। देखने में वे आदमी की तरह ही लगते हैं,लेकिन संवेदना शून्य और रक्तपिपासु होते हैं। उन्हें विदेशी जोम्बी फिल्मों में विभिन्न रूपों में दिखाया गया है। राज-डीके की गो गोवा गॉन में ड्रग्स के ओवरडोज से आम इंसान जोम्बी में तब्दील होता है। और फिर कोई जोम्बी किसी सामान्य व्यक्ति को काट खाए तो वह भी जोम्बी बन जाता है। जोम्बी मतलब जिंदा लाशें ़ ़ ़
हार्दिक,लव और बन्नी तीन दोस्त हैं। तीनों नई नौकरियों में कार्यरत हैं। आज के कुछ युवकों की तरह उन्हें भी नशे का शौक है। जीवन में एक्साइटमेंट के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं। तीनों दोस्त एक-दूसरे के पूरक और सहायक हैं। एक बार तीनों गोवा जाते हैं। वहां एक लड़की के चक्कर में वे एक द्वीप पर चल रहकुी गुप्त रेव पार्टी में शामिल होते हैं। शुरू में सब ठीक रहता है। सुबह नशा टूटने और जागने पर उन्हें अपने आसपास अजीब किस्म की हरकतें दिखाई पड़ती हैं। बाद में उन्हें पता चलता है कि वे जोम्बी के बीच फंस गए हैं। बोरिस उन्हें इस बात की जानकारी देता है। भारतीय मूल का बोरिस ड्रग माफिया है। ड्रग के कारोबार में उसने रूसी पहचान हासिल कर ली है। वही तीनों दोस्तों की जान भी बचाता है।
राज-डीके ने एक अविश्वसनीय सी कहानी को रोचक और विश्वसनीय बनाने की सफल कोशिश की है। ऊपरी तौर पर यह फिजूल सी फिल्म लगती है,लेकिन अपने कथ्य और प्रस्तुति में यह पूरी तरह से समकालीन फिल्म है। शहरी युवकों के बीच ऐसे किस्से सुने जाते हैं। सच्चाई नहीं होने पर भी किसी फैंटेसी की तरह यह मोहक और उत्तेजक होता है। रात-डीके ने महानगरीय किशोर और युवा दर्शकों के लिए लिए यह फिल्म सोची है। राज-डीके का ह्यूमर कभी-कभी ब्लैक कॉमेडी के करीब जाता है। इस फिल्म के कुछ दृश्यों में भी इसकी झलक मिलती है। हार्दिक,लव और बिन्नी की स्थिति प्रकारांतर से देश के शहरी युवकों के भटकाव और अनिश्चितता को जाहिर करती है। उनकी बातचीत,सपनों और आकांक्षाओं में केवल वर्तमान को भोगने की लालसा है। इस लालसा के दुष्परिणाम से वे नावाकिफ है। अंत तक आते-आते फिल्म संदेश भी दे जाती है।
सैफ अली खान गहरे आत्मविश्वास के साथ सहयोगी किरदार निभाते हैं। फिल्म तीन दोस्तों के सहारे आगे बढ़ती है। लेखक-निर्देशक ने हार्दिक और लव को अधिक तवज्जो दी है,लेकिन अपने भोलेपन से बन्नी से हंसाता है। बन्नी की भूमिका में आनंद तिवारी उल्लेखनीय अभिनय किया है। कुणाल खेमु और वीर दास की जोड़ी की केमिस्ट्री देखते ही बनती है। अभिनेत्रियों के लिए अधिक दृश्य नहीं हैं।
अवधि- 110 मिनट
ढाई स्टार

Comments

aamirpasha said…
mere ko nhi lagta ye movie chalegi
kriti said…
thanks
kriti
http://kritisansar.noblogs.org/

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