अपने सपनों को जी लो - रणबीर कपूर


-अजय ब्रह्मात्मज 

रणबीर कपूर मिलते ही कहते हैं कि अभी तक मेरी तीन फिल्में लगातार फ्लॉप हुई हैं। जब फ्लॉप की संख्या पांच हो जाएगी तब मुझे सोचना पड़ेगा। फ़िलहाल पिछली बातों को भूल कर मैं 'तमाश' के लिए तैयार हूँ। इम्तियाज अली के साथ यह मेरी दूसरी फिल्म है। सभी जानते हैं क़ि इम्तियाज़ कैसे फिल्मकार हैं। उन्होंने मुझे 'रॉकस्टार' जैसी  है। उस फिल्म के दौरान मैंने एक्टिंग और ज़िन्दगी के बारे में बहुत कुछ सीखा। 'तमाशा' ने मुझे अधिक जागरूक बना दिया है। इसमें मैं वेद वर्धन का किरदार निभा रहा हूँ। 

-वेद का परिचय दें।  वह कौन है?
० वेद आम बच्चों की तरह स्कूल जाता है। उसका दिमाग गणित से ज्यादा किस्से-कहानियों में लगता है। उसके शहर में एक किस्सागो है, वेद कहानियां सुनने उसके पास जाया करता है। वह किस्सागो पैसे लेकर कहानियां सुनाता है। वेद कहानियां सुनने के लिए पैसे इधर-उधर से जमा करता है। वेद कहानियों की दुनिया में गुम होना पसंद करता है। बड़े होने पर देश के दुसरे बच्चों की तरह उस पर भी माता-पिता और समाज का दबाव बढ़ता है कि क्या बनना है? इंजीनियर या मार्केटिंग गुरु के प्रोटोटाइप में से एक चुनना है। इम्तियाज़ खुले तौर पर यह बताना चाह रहे हैं कि  हम सभी रोबोट बन गए हैं। देखें तो हम सभी की ज़िन्दगी में एक जोकर ज़रूर रहना चाहिए। 
- लेकिन समाज और परिवार तो प्रोटोटाइप ही चाहता है?
० सही बात है। इम्तियाज़ यही कह रहे हैं  कि हम  अपने मन का काम करना चाहिए। माता-पिता या परिवार के दबाव में आकर बेमन से कुछ नहीं करना चाहिए। कोई चाहत दबी रह जाए तो वह गंदे तरीके से उभर कर सामने आएगी। हमारे अंदर कटुता भर जाएगी। वेद की ज़िन्दगी यह बताती है  कि अपने सपनों के पीछे ही चलना चाहिए। समाज के सपनों पर चलेंगे तो हम कहीं नहीं पहुंचेंगे। 
-वेद पूरी तरह से इम्तियाज़ की सोच का एक किरदार और व्यक्ति है। वेद अपने रचयिता के बारे में क्या सोचता है? क्या वह खुश है अपने सर्जक से?
० बिल्कुल… मैं कहूँ तो इम्तियाज़ खुद ही वेद हैं। वेद के रास्तों से वे गुजर चुके हैं। यूँ भी कह सकते हैं की वेद का रास्ता इम्तियाज़ का चला हुआ है। मैं खुद एक फ़िल्मी परिवार से हूँ.\ . मेरे ऊपर कभी कोई दबाव नहीं रहा। मेरे माता-पिता मॉडर्न सोच के हैं।  मुझे आर्थिक या पारिवारिक दबाव में नहीं रहन पड़ा। आम हिंदुस्तानी नौजवान बहुत दबाव में रहता है। इम्तियाज़ की ज़िन्दगी देखें. वे तीन भाइयों में सबसे बड़े हैं। जमशेदपुर में पले-बढे। वे एकदम से अपने घर में नहीं कह सके  कि मुंबई जाकर फिल्मों में कोशिश करेंगे। कोई जरिया नहीं था। उनकी ज़िन्दगी और वेद की ज़िन्दगी में अनेक समानताएं हैं। ऐसे और भी लोग मिल सकते हैं। ज़िन्दगी ज़द्दोज़हद में हम भूल जाते हैं  कि हम कौन हैं? कभी कोई दोस्त हमें याद दिलाता है  कि हम कोई और हैं। उस और को हम समय रहते पहचान लें तो खिल उठेंगे। 
-वेद की अपनी पहचान क्या है/
० वह शिमला का है।  उसके पूर्वज पार्टीशन के समय पेशावर से आये थे।  किस्सागोई का रिवाज़ उसके परिवार में रहा है। उसके दादा ने सब कुछ भूल कर परिवार के  हैं।वेद के पिता  कि पारिवारिक पेशे में ही रहते हैं। जब वेद की बारी आती है तो  वेद से भी यही उम्मीद की जाती है। वह पारिवारिक रिवाज़ीं में फंसता है। उसे निकलने में वक़्त लगता है। बैकड्रॉप में पार्टीशन है।  वेद के पिता एक बार समझते हैं  कि अगर दादा जी ने तो परिवार को संभाला।  अगर उस समय वे बांसुरी बजाने लगते तो क्या होता? सभी सड़क पर आ जाते। ज़िन्दगी अपनी मर्जी से नहीं चलती।  अपनी ख्वाहिशों को मारना होता है।वेद सब समझता है। जब वह उसकी ज़िन्दगी में आती है और झिंझोरती है तब उसे लगता है  कि ज़िन्दगी में कुछ और करना है। वह मेडियोकर इंसान बन चुका है।
-क्या यह भी 'रॉकस्टार' की तरह इंटेन्स फिल्म है?
०  ना ना… यह हल्की-फुल्की फिल्म है। लव स्टोरी है। एक सोशल मैसेज भी है। मैसेज है कि अपने मन का काम करो।  इमोशनल स्टोरी है। मैं कहूँगा  कि इसमें सोशल कन्वर्सेशन है। 
- फिल्म कैसे चुनते हैं?
० इम्तियाज़ की फ़िल्में सही जगह से आती है। ईमानदार होती हैं। इम्तियाज़ हिंदी बेल्ट के मूल्यों को जानते हैं। उनकी फिल्मों में अपने समाज की तकलीफ जाहिर होती है।  इम्तियाज़ मध्यवर्गीय युवकों की भावनाओं को स्वर देता है। मुझे उनके साथ इसे समझने और दिखाने में अच्छा लगता है। इम्तियाज़ इस फिल्म के जरिए याद दिल रहे हैं  कि अभी भी वक़्त है। दुनिया बदल चुकी है।  आप अपनी मर्जी का पेशा चुन सकते हैं।  सपनों को दबाए नहीं।  कोशिश ज़रूर करें। यह हिंदी मशाला फिल्म है,लेकिन एक संदेश भी है। मुमकिन है कि हमारी फिल्म से किसी की लाइफ बदल जाए। 
-क्या वेद से आप जुड़ाव महसूस करते हैं/
० इम्तियाज़ ने साफ़ कहा था  कि मुझे रणबीर कपूर नहीं चाहिए।  मुझे साधारण युवक चाहिए,जिसका आत्मविश्वास हिला हुआ है। वेद हीरो नहीं है।  वह देश का एक साधारण युवक है। मुझे औसत युवक दिखना था।  अगर ग्रुप में मेरी तस्वीर ली जाए तो कोई पहचान  भी नहीं पाए। 
- क्या आप ने हाल-फिलहाल में देश के साधारण नागरिक जैसा कोई काम किया है?
० मेरी ज़िन्दगी साधारण ही है। मेरे लिए अपनी ज़िन्दगी ही कॉमन है। मैं वह सब कुछ करता हूँ जो मेरी उम्र के युवक करते हैं। फिल्मों में आने के पहले यह ज़िन्दगी जी है।  अमेरिका में पढ़ाई के समय साधारण ही था।  मैंने अनुभव के लिए गरीबी नहीं ओढ़ी है। 
-क्या आप पर्स लेकर चलते हैं और अपनी ज़रूरतों के लिए पैसे खर्च करते हैं?
०हाँ पर्स रहता है मेरे पास।  नगद पैसे भी रहते हैं।  

Comments

Rishabh Shukla said…
सुन्दर रचना,

आप सभी का स्वागत है मेरे इस #ब्लॉग #हिन्दी #कविता #मंच के नये #पोस्ट #मिट्टीकेदिये पर | ब्लॉग पर आये और अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें |

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