फिल्म समीक्षा : काला करिकालन

फिल्म समीक्षा 
लिए लुकाठी हाथ 
काला करिकालन 
-अजय ब्रह्मात्मज 
'पा रंजीत निर्देशित 'काला करिकालन' के क्लाइमेक्स के ठीक पहले के दृश्यों में दो बार रजनीकांत हाथ में लुकाठी लिए माफिया को चुनौती देने के अंदाज में धारावी में खड़े दिखते हैं। पृष्ठभूमि में आग लगी हुई है।  सब कुछ धू-धू कर जल रहा है। यह आग बस्ती खाली करवाने के लिए हरि दादा (नाना पाटेकर) ने लगवाई है। फिल्म झोंपड़पट्टी और लैंड माफिया की परिचित कहानी पर है,लेकिन पा रंजीत के दृश्यबंध और संवाद इसे पहले की फिल्मों से अलग और विशेष बना देते हैं। उन्होंने राम और रावण के रूपक का फिल्म में इस्तेमाल किया है।  दक्षिण के ही निर्देशक मणि रत्नम ने 'रावण' में रामायण के मिथक का अलग चित्रांकन किया था।  रंजीत के रूपक में उनकी पक्षधरता स्पष्ट प्रतीकों में नज़र आती है।  
'ज़मीन.... मानव सभ्यता के विकास में ज़मीन की अहम् भूमिका रही है। जैसे-जैसे सभ्यता की विकास हुआ,अपनी फसल उपजाने के लिए जंगलों को काट कर उस ज़मीन को खेती करने के लायक बनाया। उसे अपने चेतना का मूल हिस्सा बनाया। उसकी मेहनत से ज़मीन को भगवन का दर्जा मिला। ज़मीन उनके धर्म और जाति से जुड़ गयी। ज़मीन अधिकार में बदल गयी। हमारी पौराणिक कथाओं और काव्यों से लेकर आ तक अपनी ताकत और सीमाओं को बढ़ने के लिएजितने भी युद्ध हुए हैं,उसमें हरने वाले को गुलाम बना लिया जाता है। 
आज के स्वाधीन भारत में किस के पास ज़मीन है ,किस के पास ज़मीन नहीं है,उसकी समाज में क्या हैसियत है?सदियों बाद भी हमारे शहरों और गांवों में यह नहीं बदला।  शहरों में बहुत सारी ज़मीन झोंपड़पट्टी में रहने वालों के पास है ,जिन्होंने अपने मेहनतऔर तादाद से इसे हासिल किया है। इन्हें हम अर्बन पुअर कहते हैं। इस देश में उनलोगों पर बहुत अत्याचार हो रहे हैं। कॉर्पोरेट कंपनी और लैंड माफिया कहते हैं कि ये कमज़ोर और लचर लोग शहर की खूबसूरती को बर्बाद कर रहे हैं। ये गन्दगी करते हैं। क्रिमिनल पैदा करते हैं। इन्हें शहर से बहार फ़ेंक देना चाहिए। उन्हें बहुत बेरहमी से उनके घरों से हटाया जा रहा है। उन्हें या तो शहर से बहार फ़ेंक देते हैं या फिर माचिस के डिब्बों जैसी बिलिंगों में उन्हें बेघर कर दिया जाता है. मरने के बाद उन्हें ६ गज ज़मीन भी नहीं मिलती।  ये सब हमारे शहरों में हमारी आँखों के सामने हो रहा है। इंडिया के फाइनेंसियल कैपिटल मुंबई में भी ऐसे ही हालात हैं।'
यह पा रंजीत की फिल्म 'काला करिकालन' का प्राक्कथन है। यही कथा का प्रस्थान और सार है। फिल्म में यह झोंपड़पट्टी धारावी है। धारावी पर नेता और लैंड माफिया हरि दादा की नज़र है। 'प्योर इंडिया' के अपने खवाब में निहित स्वार्थ के लिए वह झोंपड़पट्टी की जगह बिल्डिंग बनाना चाहता है ताकि शहर खूबसूरत लगे। काला धारावी में गरीबों का नेता है। वह घरेलु किस्म का सहज और सामान्य व्यक्ति है,जो क्रिकेट खेलते समय एक बच्चे के गेंद पर आउट हो जाता है। उसे अन्याय और अत्याचार बिलकुल पसंद नहीं है। किसी भी अन्याय के खिलाफ वह आक्रामक और क्रोधित हो जाता है। उसकी ताकत धारावी के लोग हैं,जिनके लिए वह मसीहा से कम नहीं है।उसने अपने एक बेटे का नाम लेनिन रखा है। लेनिन की प्रेमिका तूफानी है,जो अपने हक़ के लिए जूझना जानती है। काल की बीवी सेल्वी जानती है कि उसका पति परोपकार और परमार्थ के लिए किसी भी हद को पार कर सकता है। वह उसे झिड़कती भी रहती है,लेकिन बेइंतहा प्यार करती है। 
पा रंजीत की 'काला करिकालन' की प्रस्तुति झकझोर देती है। रंजीत ने रजनीकांत की कद्दावर छवि को बरकरार रखते हुए उनसे एक राजनीतिक फिल्म करवा ली है। यह फिल्म खुले रूप से दक्षिणपंथी राजनीति के विरोध में कड़ी होती है। रंजीत ने बेलाग तरीके से वर्तमान और अतीत के दक्षिणपंथी नेताओं के करतूतों और सिद्धांतों को मिश्रित कर हरि दादा को गढ़ा है। सफ़ेद दीवारों और सफ़ेद फर्नीचर के बीच झक्क सफ़ेद कपड़ों में सजा यह किरदार समाज के उच्च वर्ग और जाति से आता है,जबकि फिल्म का नायक काले लिबास में रहता है। मैली-कुचैली धूसर बस्ती के इस किरदार का नाम भी काला है। फिल्मों और जीवन ें काला बुरे और सफ़ेद अच्छे का प्रतिक रंग है,लेकिन रंजीत की फिल्म में इन रंगो का अभिप्राय प्रचलित धरना के विपरीत है। 
फिल्म के क्लाइमेक्स के पहले हरि दादा पोती से बात करते हुए कला को रावण कहते हैं तो पोती की सहज जिज्ञाषा होती है की फिर तो राम उसे मार देंगे। हरि दादा कहते हैं बाल्मीकि ने लिखा है तो राम रावण को मारेंगे। फिल्म के क्लाइमेक्स में रावण वध की कथा चल रही है और काला पर प्राणघातक हमले हो रहे हैं। रंजीत ने काल को दलित नायक और रावण के रूप में पेश किया है। उसका सर कटता तो है,लेकिन फिर लौट आता है। रंजीत ने बेहिचक दलित चेतना से जुड़े आंबेडकर और बुद्ध ढ छवियों और वचनों का प्रयोग किया है। 
मूल तमिल में बानी इस फिल्म के दलित पाठ को गंभीरता से पढ़ना और देखना चाहिए। यह फिल्म हिंदी फिल्मों के निर्देशकों के लिए सबक भी हो सकती है कि कैसे किसी स्टार का कमर्शियल फिल्म में जनपक्ष में उपयोग किया जा सकता है?
अवधि : १४६ मिनट
***१/२ साढ़े तीन स्टार

Comments

BIBHAS said…
आपकी समीक्षा पढ़कर फ़िल्म देखने की इच्छा जग गई है। दक्षिणपंथ के ख़िलाफ़ फ़िल्म को जिस तरह से स्वागत हुआ है आशा जगती है।
फिल्म देखदे की जिज्ञासा जगती है।

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