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Showing posts from September, 2012

फिल्‍म समीक्षा : ओह माय गॉड

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प्रपंच तोड़ती, आस्था जगाती -अजय ब्रह्मात्मज परेश रावल गुजराती और हिंदी में 'कांजी वर्सेस कांजी' नाट सालों से करते आए हैं। उनके शो में हमेशा भीड़ रहती है। हर शो में वे कुछ नया जोड़ते हैं। उसे अद्यतन करत रहते हैं। अब उस पर 'ओह माय गॉड' फिल्म बन गई। इसे उमेश शुक्ला ने निर्देशित किया है। फिल्म की जरूरत के हिसाब से स्क्रिप्ट में थोड़ी तब्दीली की गई है। नाटक देख चुके दर्शकों को फिल्म का अंत अलग लगेगा। वैसे नाटक में इस अंत की संभावना जाहिर की गई है। उमेश शुक्ल के साथ परेश रावल और अक्षय कुमार के लिए 'ओह माय गॉड' पर फिल्म बनाना साहसी फैसला है। धर्मभीरू देश केदर्शकों के बीच ईश्वर से संबंधित विषयों पर प्रश्नचिह्न लगाना आसान नहीं है। फिल्म बड़े सटीक तरीके से किसी भी धर्म की आस्था पर चोट किए बगैर अपनी बात कहती है। फिल्म का सारा फोकस ईश्वर के नाम पर चल रहे ताम-झाम और ढोंग पर है। धर्मगुरू बने मठाधीशों के धार्मिक प्रपंच को उजागर करती हुई 'ओह माय गॉड' दर्शकों को स्पष्ट संदेश देती है कि ईश्वर की आराधना की रुढि़यों और विधि-विधानों से निकलने की जरूरत है।

ईश्वर है तो झगड़े-फसाद क्यों?

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-अजय ब्रह्मात्मज भावेश मांडलिया के नाटक ‘कांजी वर्सेज कांजी’ नाटक पर आधारित उमेश शुक्ला की फिल्म ‘ओह माय गॉड’ में परेश रावल और अक्षय कुमार फिर से साथ आ रहे हैं। दोनों ने अभी तक 32 फिल्मों में एक साथ काम किया है। दोनों की केमिस्ट्री देखते ही बनती है। ‘ओह माय गॉड’ के संदर्भ में अक्षय कुमार ने स्वयं परेश रावल से इस फिल्म के बारे में बात की। कुछ सवाल परेश ने भी अक्षय से पूछे। अक्षय- परेश, आप को इस नाटक में ऐसी क्या खास बात दिखी कि आपने इसके इतने मंचन किए और अब फिल्म आ रही है? परेश-बहुत कम मैटेरियल ऐसे होते हैं, जो सोचने पर मजबूर करते हैं। मनोरंजन की दुनिया में हमलोग लोगों को हंसाने-रूलाने का काम करते रहते हैं। यह नाटक और अब फिल्म लोगों को उससे आगे जाकर सोचने पर मजबूर करेगी। इस नाटक के मंचन में मैंने हमेशा कुछ नया जोड़ा है। अभी पिछले शो में एक महत्वपूर्ण दर्शक ने कहा कि मंदिर का मतलब क्या होता है? जो मन के अंदर है, वही मंदिर है। अक्षय- सही कह रहे हो। जो मन के अंदर है वही मंदिर है। भगवान तो हमारे अंदर बैठा हुआ है। परेश, आप का नाटक देखने के बाद मैंने भगवान को ज्यादा अच्छी तरह समझा। अ

धार्मिक प्रतीकों को दोहन

-अजय ब्रह्मात्मज गणेश भक्त मधुर भंडारकर हमेशा मुंबई के सिद्धिविनायक मंदिर और गणपति पूजा के समय पंडालों में नजर आते हैं। इस बार ‘हीरोइन’ की रिलीज के पहले करीना कपूर के साथ गणपति का आशीर्वाद लेने वे कुछ पंडालों में गए। उन्होंने अपनी फिल्म का म्यूजिक भी सिद्धिविनायक मंदिर में रिलीज किया था। किसी निर्माता-निर्देशक या कलाकार की धार्मिक अभिरुचि से कोई शिकायत नहीं हो सकती, लेकिन जब उसका इस्तेमाल प्रचार और दर्शकों को प्रभावित करने के लिए किया जाने लगे तो कहीं न कहीं इस पूरी प्रक्रिया का पाखंड सामने आ जाता है। सिर्फ मधुर भंडारकर ही नहीं, दूसरे निर्माता-निर्देशक और कलाकार भी आए दिन अपनी निजी धार्मिक भावनाओं का सार्वजनिक प्रदर्शन करते हैं। साथ ही उनकी कोशिश रहती है कि ऐसे इवेंट की तस्वीरें मुख्य पत्र-पत्रिकाओं में जरूर छपें। अभी तक किसी ने धार्मिक प्रतीकों और व्यवहार से प्रभावित हुए दर्शकों का आकलन और अध्ययन नहीं किया है। फिर भी यह कहा जा सकता है कि देश के धर्मभीरू दर्शक ऐसे प्रचार से प्रभावित होते हैं।     फिल्मों के प्रचार-प्रसार और कंटेंट में धार्मिक प्रतीकों का शुरू से ही इस्तेमाल होता र

रानी मुखर्जी का दिलखोल इंटरव्‍यू

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-अजय ब्रह्मात्मज -‘अय्या’के फर्स्‍ट   लुक को लोगों ने काफी पसंद किया है।आप को कैसी प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं? 0 फर्स्‍ट लुक आने के बाद से मेरे दोनों मोबाइल फोन लगातार बज रहे हैं। फिल्म इंडस्ट्री और देश-विदेश से दोस्तों और परिचितों के फोन आ रहे हैं। वे चीख-चीखकर बता रहे हैं कि उन्हें बहुत हंसी आई। बहुत कम ऐसा होता है कि ट्रेलर देखकर इतना आनंद आए। मेरे दोस्तों ने तो कहा कि उन्होंने लुप में ‘अय्या’ के ट्रेलर देखे। मुझे अभी तक काफी पॉजीटिव रिस्पॉन्स मिले हैं। मीडिया बिरादरी के कई लोगों ने फोन किया। मैंने देखा है कि जब मीडिया के लोग पॉजीटिव रिस्पॉन्स देते हैं, तो फिल्म में कुछ खास बात होती है। ऐसा लग रहा है कि सभी मेरी फिल्म के इंतजार में थे। सोशल नेटवर्किंग साइट पर भी मैंने आम दर्शकों के रिएक्शन देखे। दो प्रतिशत लोगों ने मेरी आलोचना की है। बाकी 98 प्रतिशत को फस्र्ट लुक अच्छा लगा। - इस पॉजीटिव रिएक्शन की वजह क्या मानते हैं? यह सिर्फ फर्स्‍ट  लुक का कमाल है या रानी मुखर्जी के प्रति लोगों का प्रेम? सलमान खान ने एक बार कहा था कि मेरी फिल्म की झलक देखते समय भी दर्शकों के दिमागमें मेरी पू

सिनेमा सोल्यूशन नहीं सोच दे सकता है: टीम चक्रव्यूह

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- दुर्गेश सिंह निर्देशक प्रकाश झा ताजातरीन मुद्दों पर आधारित फिल्में बनाने के लिए जाने जाते रहे हैं। जल्द ही वे दर्शकों के सामने नक्सल समस्या पर आधारित फिल्म चक्रव्यूह लेकर हाजिर हो रहे हैं। फिल्म में अर्जुन रामपाल पुलिस अधिकारी की भूमिका में हैं तो अभय देओल और मनोज वाजपेयी नक्सल कमांडर की भूमिका में। फिल्म की लीड स्टारकास्ट से लेकर निर्देशक प्रकाश झा से पैनल बातचीत: अभय देओल मैं अपने करियर की शुरुआत से ही ऐक्शन भूमिकाएं निभाना चाहता था लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा कोई किरदार मुझे नहीं मिला। यदि मिला भी तो उसमें ऐक्शन भूमिका का वह स्तर नहीं था। हिंदी सिनेमा में अक्सर ऐसा होता है कि लोग ऐक्शन के बहाने में कहानी लिखते हैं और उसको ऐक्शन फिल्म का नाम दे देते हैं। मुझे ऐसा किरदार बिल्कुल ही नहीं निभाना था। चक्रव्यूह में कहानी के साथ ऐक्शन गूंथा हुआ है। मुझे अभिनय का स्केल भी यहां अन्य फिल्मों से अलग लगा। मुझे यह नहीं पता था कि मेरा लुक कैसा होने वाला है। मैंने कई बार सोचा कि अगर नक्सल बनने वाला हूं तो कौन सी वर्दी पहनूंगा और कितनी फटी हुई होगी। फिर यहीं पर प्रकाश जी अन्य निर्देशकों से

फिल्‍म समीक्षा : हीरोइन

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-अजय ब्रह्मात्‍मज कल तक हीरोइन की हर तरफ चर्चा थी। निर्माण के पहले हीरोइनों की अदला-बदली से विवादों में आ जाने की वजह से फिल्म के प्रति जिज्ञासा भी बढ़ गई थी। और फिर करीना कपूर जिस तरह से जी-जान से फिल्म के प्रचार में जुटी थीं, उस से तो यही लग रहा था कि उन्होंने भी कुछ भांप लिया है। रिलीज के बाद से सारी जिज्ञासाएं काफूर हो गई हैं। मधुर भंडारकर की हीरोइन साधारण और औसत फिल्म निकली। हीरोइन उनकी पिछली फिल्मों की तुलना में कमजोर और एकांगी है। मधुर भंडारकर के विषय भले ही अलग हों,पर उनकी विशेषता ही अब उनकी सीमा बन गई है। वे अपनी बनाई रुढि़यों में ही फस गए हैं। सतही और ऊपरी तौर पर हीरोइन में भी रोमांच और आकर्षण है,लेकिन लेखक-निर्देशक ने गहरे पैठने की कोशिश नहीं की है। हीरोइनों से संबंधित छिटपुट सच्चाईयां हम अन्य फिल्मों में भी देखते रहे हैं। यह फिल्म हीरोइन पर एकाग्र होने के बावजूद हमें उनसे ज्यादा कुछ नहीं बता या दिखा पाती। हीरोइन कामयाब स्टार माही अरोड़ा की कहानी है। माही मशहूर हैं। शोहरत, ग्लैमर और फिल्मों से भरपूर माही की जिंदगी में कायदे से उलझनें नहीं होनी चाहिए। हमें एक फिल्म पत्

सिंगर प्रियंका चोपड़ा

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- अजय ब्रह्मात्मज फिल्म पत्रकारिता में स्टारों, निर्देशकों और तकनीशियनों से बार-बार की मुलाकात में कुछ आप के प्रिय हो जाते हैं। प्रियंका चोपड़ा उनमें से एक हैं। राज कंवर ने मिस वल्र्ड प्रियंका चोपड़ा और मिस यूनिवर्स लारा दत्ता के साथ ‘अंदाज’ शुरू की थी। उसमें उनके हीरो अक्षय कुमार थे। फिल्मालय स्टूडियो में इस फिल्म के सेट पर उन दिनों प्रियंका चोपड़ा अपने माता-पिता के साथ आती थीं। उनके माता-पिता ने बेटी के करियर के लिए बड़ा फैसला लिया था। वे बेटी को सहारा और आसरा देने के लिए सब कुछ छोडक़र मुंबई आ गए थे।     उस पहली मुलाकात में ही प्रियंका चोपड़ा ने प्रभावित किया था। एक लगाव सा महसूस हुआ  था। मिडिल क्लास मूल्यों की प्रियंका चोपड़ा की बातों में छोटे शहरों में बिताए दिनों की प्रतिध्वनि सुनी जा सकती थी। मिस वल्र्ड खिताब से मिले एक्सपोजर और अमेरिका में स्कूल की पढ़ाई करने के बाद भी प्रियंका चोपड़ा में एक कस्बाई लडक़ी थी। इसे आप देख सकते हैं। बातें करने, इठलाने, मुस्कुराने, झेंपने, खिलखिलाने और एहसास में उत्फुल्लता नजर आती है। प्रियंका चोपड़ा ने गिरते-पड़ते और आगे बढ़ते हुए ‘बर्फी’ तक का

आइटम नंबर भी गाएंगे : रूना लैला व आबिदा परवीन

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-अमित कर्ण बांग्लादेश की प्रख्यात गायिका रूना लैला और पाकिस्तान की अजीमो-शान आबिदा परवीन अगले कुछ महीनों तक भारत में नजर आने वाली हैं। कलर्स के सिंगिंग रिएलिटी शो ‘सुर-क्षेत्र’ में दोनों आशा भोंसले के संग जज की भूमिका में हैं। इस शो में भारत और पाकिस्तान के प्रतिभागी हिस्सा ले रहे हैं। दोनों का मानना है कि इन दिनों आइटम नंबर का जलवा है, लेकिन लंबी रेस में मेलोडी ही सस्टेन करेगी। -संगीत क्या है? रूना:- यह इबादत का, प्यार का पैगाम फैलाने का सबसे नायाब जरिया है। यह समाज, राष्ट्र और दुनिया को जोडऩे वाली कड़ी है। म्यूजिक प्रिचेज लव। इस शो में भी हम वही रखने की कोशिश कर रहे हैं। मौसिकी के जरिए हम सब एक हो सकते हैं। इसकी मिसाल भी क्रॉस-बॉर्डर शो में देखने को मिलते हैं। वहां विभिन्न मुल्कों के प्रतिभागी साथ गा रहे हैं। खाना खा रहे हैं। हंसी-मजाक करते हैं। कोई अंतर महसूस नहीं होता। मेरे ख्याल से संगीत के जरिए हम आपसी कड़वाहट कम कर सकते हैं। सियासी लोगों से एक ही दरख्वास्त है कि संगीत को संगीत ही रहने दें, इसे सियासत का नाम न दें। आबिदा:- यह मेरे लिए परवरदिगार की ईजाद है। इसके चलते पूरी

मुझे फिल्मों में ही आना था- राज कुमार

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-अजय ब्रह्मात्मज उन्होंने अपने नाम से यादव हटा दिया है। आगामी फिल्मों में राज कुमार यादव का नाम अब सिर्फ राज कुमार दिखेगा। इसकी वजह वे बताते हैं, ‘पूरा नाम लिखने पर नाम स्क्रीन के बाहर जाने लगता है या फिर उसके फॉन्ट छोटे करने पड़ते हैं। इसी वजह से मैंने राज कुमार लिखना ही तय किया है। इसके अलावा और कोई बात नहीं है।’ राज कुमार की ताजा फिल्म ‘शाहिद’ इस साल टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में दिखाई गई। पिछले दिनों अनुराग कश्यप की फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर-2’ में उन्होंने शमशाद की जीवंत भूमिका निभाई। उनकी ‘चिटगांव’ जल्दी ही रिलीज होगी। एफटीआईआई से एक्टिंग में ग्रेजुएट राज कुमार ने चंद फिल्मों से ही, अपनी खास पहचान बना ली है। इन दिनों वे ‘काए पो चे’ और ‘क्वीन’ की शूटिंग कर रहे हैं।     -आप एफटीआईआई के ग्रेजुएट हैं, लेकिन आप की पहचान मुख्य रूप से थिएटर एक्टर की है। ऐसा माना जाता है कि आप भी एनएसडी से आए हैं? 0 इस गलतफहमी से मुझे कोई दिक्कत नहीं होती। दरअसल शुरू में लोग पूछते थे कि आप ने फिल्मों से पहले क्या किया है, तो मेरा जवाब थिएटर होता था। फिल्मों में लोग थिएटर का मतलब एनएसडी ही समझते हैं, इसल

हां हिंदी,ना हिंदी

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-अजय ब्रह्मात्मज   आज हिंदी दिवस है। देश-विदेश की अनेक बैठकों और सभाओं में फिल्मों के संदर्भ में हिंदी की बात होगी। बताया जाएगा कि हिंदी के विकास में हिंदी फिल्मों की बड़ी भूमिका है। जो काम हिंदी के शिक्षक, अध्यापक और प्रचारक नहीं कर पाए, वह काम हिंदी फिल्मों ने कर दिया। ऊपरी तौर पर इसमें पूरी सच्चाई है। पिछले 70 सालों में हिंदी फिल्मों के संवाद और गाने सुनकर अनेक विदेशी और गैर हिंदी भाषियों ने हिंदी समझनी शुरू कर दी है। हिंदी फिल्मों से हिंदी के प्रति उनकी रुचि जागी और उनमें से कुछ आज हिंदी के क˜र समर्थक हैं। उन्होंने अपने हिंदी ज्ञान का श्रेय भी हिंदी फिल्मों को दिया है। हिंदी फिल्मों की भाषा ऐसी हिंदी होती है जिसे देश के किसी भी कोने में बैठा दर्शक समझ सके। हिंदी फिल्मों की भाषा वर्गीय दीवारों को तोड़ती है। वह हर तबके के दर्शकों के लिए एक सी होती है। फिल्मों में आवाज आने के साथ संवादों का चलन हुआ और इन संवादों की भाषा को सरल और बोधगम्य बनाने की हर कोशिश की गई। शुरू में रंगमंच और पारसी थिएटर से आए लेखकों ने इसका स्वरूप तय किया। फिर समाज के विकास के साथ भाषायी

फिल्‍म समीक्षा : बर्फी

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निश्छल प्रेम सी मीठी बर्फी  -अजय ब्रह्मात्मज  अगर फिल्म के शुरू में कही गई पंक्तियों को गौर से सुन लें तो अनुराग बसु की बर्फी को सही संदर्भ और अर्थ में समझने में मदद मिलेगी। चुटीले शब्दों में हिदायत देने के बाद कहा गया है..आज का प्यार ऐसा,टू मिनट नूडल्स जैसा,फेसबुक पर पैदा हुआ,कार में हुआ ये जवां,कोर्ट में जाकर गया मर..आज के प्रेम की शहरी सच्चाई बताने के बाद फिल्म मिसेज सेनगुप्ता के साथ दार्जीलिंग पहुंच जाती है। मिसेज सेनगुप्ता श्रुति हैं। वह बर्फी की कहानी सुनाती हैं। कभी दार्जीलिंग में बर्फी ने पहाड़ी झरने सी अपनी कलकल मासूमियत से उन्हें मोह लिया था। मां के दबाव और प्रभाव में उन्होंने मिस्टर सेनगुप्ता से शादी जरूर कर ली,लेकिन बर्फी का खयाल दिल से कभी नहीं निकाल सकीं। अपने रोमांस के साथ जब वह बर्फी की कहानी सुनाती हैं तो हमारे दिलों की धड़कन भी सामान्य नहीं रह जाती। कभी आंखें भर आती हैं तो कभी हंसी आ जाती है। बर्फी गूंगा-बहरा है। स्वानंद किरकिरे की पंक्तियों और गायकी आला बर्फी के साथ इंट्रोड्यूस होते ही बर्फी हमारा प्रिय हो जाता है। वह हमें रिझा लेता है। उसके

दोहरी खुशी का वक्त है-प्रियंका चोपड़ा

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-अजय ब्रह्मात्मज -आप की ‘बर्फी’ और म्यूजिक सिंगल लगभग साथ-साथ आ रहा है। क्या कहना चाहेंगी? ‘बर्फी’ मेरे करियर की बेहतरीन फिल्मों में से एक है। परफॉरमेंस के लिहाज से सबसे मुश्किल फिल्म होगी। मैं एक ऑटिस्टिक लडक़ी का रोल प्ले कर रही हूं। बहुत सारे लोग ऑटिस्टिक लोगों के बारे में नहीं जानते हैं।वे बहुत सिंपल,निर्दोष और अपनी दुनिया में मस्त रहते हैं।   मैंने बहुत  संजीदगी से इस रोल को प्ले किया है। मेरे लिए यह बहुत मुश्किल था, लेकिन अनुराग बसु ने यह रोल करवाने में मेरी बहुत मदद की है। उनके पैरों पर मैं इस फिल्म में खड़ी हूं। उम्मीद करती हूं कि यह लोगों को बहुत पसंद आएगा। जहां तक ‘सिंगल’ का सवाल है, तो वह भी नया है। मैंने अपने पैरों पर खड़े होकर परफार्म किया है। मैंने पहले कभी गाया नहीं है। यह अंग्रेजी में होगा। अमेरिका के ब्लैक आइड पीज ग्रुप के साथ मैंने यह गाना गाया है। गाने के बोल हैं, ‘इन माय सिटी’। दरसअल, मैं बचपन से बहुत सारे शहरों को अपने पालन-पोषण का श्रेय देती हूं। बरेली हो, लखनऊ हो, लद्दाख या पुणे और मुंबई। या अमेरिका में बोस्टन हो, न्यूयॉर्क हो, जहां मैं पली-बढ़ी हूं। इसलिए

प्रेम देने में माहिर है बर्फी-रणबीर कपूर

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-अजय ब्रह्मात्मज -कल आप की फिल्म रिलीज हो रही है। क्या कहना चाहेंगे? 0 मैं क्या कहूं? फिल्म के ट्रेलर और गाने बहुत कुछ बोल-बता रहे हैं। यह फिल्म आप को हंसाने और रुलाने के साथ एक नजरिया भी देगी जिंदगी का। अभी इतना ही कह सकता हूं।दर्शक बताएंगे कि पैसा वसूल फिल्म हो पाई कि नहीं? -बर्फी का किरदार क्या है? 0 मैं गुगा-बहरा हूं,लेकिन दस मिनट के अंदर आप किरदार के साथ हो जाएंगे। हम ने उसके गूंगे-बहरे होने पर ज्यादा जोर नहीं दिया है। बर्फी चालू चैप्लिन है। चार्ली चैप्लिन और मिस्टर बिन हमारी प्रेरणा रहे हैं। इस किरदार को अनुराग बसु ने ऐसे ढाला है कि दर्शकों को वह अपना लगे। हम गूंगे-बहरे होने के तकनीकी और मेडिकल तथ्यों में नहीं उलझे हैं। मुझे भाव-भंगिमाएं बनानी पड़ी हैं। बर्फी के एहसास दर्शक महसूस करेंगे। -डोंट वरी,बी बर्फी का क्या तुक है? 0 एक मशहूर गीत है ़ ़  ड़ोंट वरी,बी हैप्पी। हमलोगों ने हैप्पी की जगह बर्फी कर दिया है। बर्फी भी खुशी की तरह का सनसाइन है। वह हमेशा खुशी बांटता है। वह प्यार देने में माहिर है। अगर उसे कोई वापस प्यार नहीं करता तो भी उसका दिल नहीं टूटता। वह मुस्कराता रहता

संग संग: संजय चौहान और सरिता चौहान

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संघर्षो के बीच बढ़ता रहा प्यार स्क्रिप्ट राइटर  संजय चौहान का करियर  शुरू हुआ था पत्रकारिता से। धीरे-धीरे टीवी की दुनिया में और फिर बॉलीवुड में उन्होंने कदम बढाए। उनकी चर्चित फिल्में, पान सिंह तोमर, आई एम कलाम, साहब-बीबी और गैंगस्टर हैं। चित्रकार सरिता से उनकी मुलाकात 20 साल पहले जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली में हुई थी। सरिता की कूची और संजय की कलम की जुगलबंदी जल्दी ही हो गई और दोनों ने मुलाकात के दो वर्ष बाद ही शादी कर ली। रचनात्मकता, रिश्तों की शुरुआत और रोज्ाी-रोज्ागार के संघर्ष को लेकर उनसे हुई लंबी बातचीत। दिल्ली-भोपाल मेल संजय :  मैं भोपाल का हूं और सरिता दिल्ली की ठेठ पंजाबी। हमारी लव स्टोरी में ट्रेजिक एंगल था कि यहां कोई विरोधी नहीं था। लोग उम्मीद से हमें देखते थे। उन्हें लगता था कि हम दोनों समझदार हैं, परिवार का भरण-पोषण तो कर ही लेंगे। सरिता के एक मामा को अलबत्ता कुछ आपत्ति थी। पंजाबी शादी में मामा का होना ज्ारूरी होता है, लिहाज्ा उन्हें मनाने के लिए काफी पापड बेलने पडे। मैं लगभग बेरोज्ागार था उस समय, लेकिन इनके घर वालों को इससे कोई फर्क

फिल्‍म समीक्षा : राज 3

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  डर के आगे मोहब्बत है   -अजय ब्रह्मात्मज      अच्छी बात है कि इस बार विक्रम भट्ट ने 3डी के जादुई प्रभाव को दिखाने के बजाए एक भावनापूर्ण कहानी चुनी है। इस कहानी में छल-कपट, ईष्र्या, घृणा, बदला और मोहब्बत के साथ काला जादू है। काला जादू के बहाने विक्रम भट्ट ने डर क्रिएट किया है, लेकिन दो प्रेमी (खासकर हीरो) डर से आगे निकल कर मोहब्बत हासिल करता है। कल तक टॉप पर रही फिल्म स्टार सनाया शेखर अपने स्थान से फिसल चुकी हैं। संजना कृष्ण पिछले दो साल से बेस्ट एक्ट्रेस का अवार्ड ले रही हैं। सनाया किसी भी तरह अपनी खोई हुई पोजीशन हासिल करना चाहती है। पहले तो भगवान और मंत्र के जरिए वह यह कोशिश करती है। सफल नहीं होने पर वह काला जादू और तंत्र के चक्कर में आ जाती है। काला जादू राज-3 में एक तरकीब है डर पैदा करने का, खौफ बढ़ाने का। काला जादू के असर और डर से पैदा खौफनाक और अविश्वसनीय दृश्यों को छोड़ दें, तो यह प्रेमत्रिकोण की भावनात्मक कहानी है। फिसलती और उभरती दो अभिनेत्रियों के बीच फंसा हुआ है निर्देशक आदित्य अरोड़ा। वह सनाया के एहसानों तले दबा है। वह पहले तो उसकी मदद करता है, लेक

अय्या का पोस्‍टर

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सचिन कुंदालकर की पहली फिल्‍म है 'अय्या'। इस फिल्‍म का निर्माण अनुराग कश्‍यप ने किया है। फिल्‍म में रानी मुखर्जी मराठी लड़की  की भूमिका में हैं और पृथ्‍वीराज ने मलयाली लड़केका किरदार निभाया है।

हंगल की अंतिम यात्रा का सन्नाटा

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-अजय ब्रह्मात्मज खूब लिखा गया। अखबारों,चैनलों और सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा इस तथ्य को रेखांकित किया गया कि एके अवतार कृष्ण हंगल की अंतिम यात्रा में फिल्म इंडस्ट्री की नामचीन हस्तियां नहीं आईं। संकेतों में कुछ नामों की तरफ इशारा किया गया। सभी की शिकायत थी कि  जिस कलाकार ने अपनी जिंदगी के लगभग 50 साल इंडस्ट्री को दिए और 200 से अधिक फिल्में कीें। उसकी अंतिम यात्रा के लिए उसकी ही बिरादरी के गणमान्य सदस्यों को फुर्सत नहीं मिल सकी। यह शिकायत उचित होने के बावजूद निरर्थक है। हमें दिवंगत व्यक्ति की जिंदगी पर गौर करना चाहिए। अगर दिवगंत व्यक्ति के करीबी नहीं आते तो सोचने की जरूरत थी। इंडस्ट्री में हर व्यक्ति के निधन पर सभी महत्वपूर्ण व्यक्तियों की मौजूदगी की चाहत वास्तव में इलेक्ट्रानिक मीडिया की जरूरतों से उपजी है। उन्हें अपने चैनलों पर दिखाने के लिए कुछ बड़े नाम,नाटकीय और भव्य अंतिम यात्रा और रंगीन-विवादास्पद जिंदगी चाहिए। उन्हें लगता है कि इससे दर्शकता बढ़ती है। टीवी पर चल रही शिकायतों को देख कर ही पत्र-पत्रिकाओं और सोशल मीडिया नेटवर्क पर सन्नाटे का जिक्र हुआ। इस सन्नाटे के एहसास का एक सं

सलमा आगा की बेटी साशा दिखेंगी औरंगजेब में

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निकाह से मशहूर हुई सलमा आगा फिलहाल गुमनाम हैं। वे काफी दिनों से अपनी बेटी को लेकर मुंबई में हैं। एक ही इच्छा थी कि बेटी साशा किसी प्रकार हिंदी फिल्म में लांच हो जाएं। आखिरकार उनकी मुराद पूरी हो गई। उनकी बेटी साशा आगा यशराज फिल्म्स की औरंगजेब में अर्जुन कपूर केआपोजिट लांच होंगी। औरंगजेब के निर्माता आदित्य चोपड़ा और निर्देशक अतुल सभरवाल हैं। इस फिल्म में पृथ्वीराज एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। फिल्म के अन्य किरदारों के लिए जैकी श्राफ, ऋषि कपूर और अमृता सिंह को चुना गया है। साशा और कोई नहीं, जारा आगा हैं। कुछ समय पहले रुसलान मुमताज के साथ उनका एक एमएमएस चर्चा में आया था। उस बदनामी से बचने के लिए सलमा आगा ने बेटी का नाम जारा से बदलकर साशा कर दिया है। वैसे, इंडस्ट्री में शाहिद कपूर केकरीबी उन्हें साशा नाम से ही बुलाते हैं। यह उनका निकनेम है।

दो तस्‍वीरें : अंजलि पाटिल

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मैं जिन पर भरोसा करता हूं,वैसे कलाकरों और तकनीशियनों ने अंजलि पाटिल की तारीफ की है। उम्‍मीद है एनएसडी की स्‍नातक अंजलि पाटिल जल्‍दी ही हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में अपनी जगह बनाने में कामयाब होंगी। उनकी 'देल्‍ही इन अ डे'आकर जा चुकी और 'चक्रव्‍यूह' अगले महीने रिलीज होगी।

जिंदगी का जश्न है ‘बर्फी’-अनुराग बसु

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-अजय ब्रह्मात्मज अनुराग बसु की ‘बर्फी’ आम हिंदी फिल्मों से अलग दिख रही है। स्वयं अनुराग बसु की पिछली फिल्मों से इसकी जमीन अलग है और किरदार भी। अनुराग बसु खुद बता रहे हैं ‘बर्फी’ के बारे में ़ ़ ़ पहला ट्रेलर आया ताक लगाा कि यह सायलेंट फिल्म है। फिल्म में ताजगी और उल्लास है। गानों के आने के बाद जिज्ञासाएं और बढ़ गईं हैं। क्या है यह फिल्म? ट्रेलर में फिल्म की सारी बातें क्लियर नहीं की जा सकतीं। एक ही कोशिश रहती है कि फिल्म का सही इमोशन दर्शकों में जेनरेट हो जाए और एक इंटरेस्ट रहे। यह सायलेंट फिल्म तो नहीं है, लेकिन संवाद बहुत कम हैं। मेरी फिल्मों में आप कई बार ऐसे लंबे दृश्य देखेंगे, जिनमें कोई संवाद नहीं होता। ‘गैंगस्टर’ में 20 मिनट का एक ऐसा ही सीन था। ‘बर्फी’ की कहानी लिखते समय चुनौती रही कि कैसे बगैर संवादों को बातें रखी जाए। इसका अलग मजा और नशा है। शब्दों को भाव और एक्सप्रेशन में बदल देना। रणबीर के होने की वजह से मुझे सुविधा हुई। वे कमाल के एक्टर हैं। उनका कैरेक्टर ट्रेलर में भी समझ में आता है। झिलमिल (प्रियंका चोपड़ा) को ऑटिज्म है। वह दुनिया को एकदम अलग तरीके से देखती है।

फिल्‍म समीक्षा : जलपरी

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  मुद्दे पर बनी मनोरंजक फिल्म   -अजय ब्रह्मात्‍मज नीला माधब पांडा की जलपरी श्रेया (लहर खान) के माध्यम से एक सोए हुए गांव की संकीर्णताओं और जड़ मान्यताओं को उजागर करती है। पांडा ने इसे रोचक और मनोरंजक तरीके से पेश किया है। पिछले साल आई उनकी फिल्म आई एम कलाम की तरह इस बार भी फिल्म के मुख्य किरदार बच्चे हैं, लेकिन यह बच्चों की फिल्म नहीं है। देव(प्रवीण डबास) अपने बेटे-बेटी के साथ शहर में रहते हैं। पत्‍‌नी के निधन के बाद वे अकेले ही बच्चों को पाल रहे हैं। उन्होंने अपने बच्चों पर किसी प्रकार की पाबंदी नहीं लगाई है। उनकी बेटी श्रेया अपनी उम्र के हिसाब से दबंग किस्म की लड़की है। अपनी शैतानियों की वजह से स्कूल और घर में उसे बार-बार फटकार मिलती है, लेकिन उसे पिता देव से छूट मिली हुई है। दरअसल, देव नहीं चाहते कि उनकी बेटी या बेटे किसी प्रकार का अंकुश महसूस करें। देव अपने पैतृक गांव में पत्‍‌नी के नाम पर एक अस्पताल खोलना चाहते हैं। उन्हें पंचायत और सरपंच की रजामंदी मिल गई है, लेकिन गांव के पारंपरिक हकीम को यह बात नागवार गुजरती है। बहरहाल, श्रेया अपने छोटे भाई सैम(कृष्णांग त