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Thursday, November 28, 2019

सिनेमालोक : सेंसर नहीं होगी वेब सीरीज


                                                                                                           
सिनेमालोक
सेंसर नहीं होगी वेब सीरीज
-अजय ब्रह्मात्मज
ऑनलाइन स्ट्रीमिंग की तकनीक के प्रसार और ओटीटी प्लेटफॉर्म के पॉपुलर होने के साथ नैतिकता, राष्ट्रीयता और शुद्धता के पहरुए जाग गए हैं. लगातार सरकार पर दबाव डाला जा रहा है कि वेब सीरीज और दूसरे मनोरंजक स्ट्रीमिंग कंटेंट की निगरानी की जाए. उनका आग्रह है कि वेब सीरीज में गाली-गलौज और अश्लीलता बढ़ती जा रही है. राष्ट्रीय हितों का ख्याल नहीं रखा जा रहा है. दक्षिणपंथी सोच के स्तंभकार और लेखक-पत्रकार चाहते हैं कि वेब सीरीज को भी सेंसरशिप के घेरे में लाया जाए. उनकी आपत्ति है कि कई बार इन वेब सीरीज में राष्ट्र विरोधी बातें होती है. उनकी बातों का विश्लेषण करें तो पाएंगे कि वे सत्ताधारी पार्टी की सोच की विरोधी टिप्पणी और विचार पर पाबंदी चाहते हैं. वे नहीं चाहते कि सरकार विरोधी बातों पर आधारित संवाद हो.
मामला कोर्ट में भी गया है. कोर्ट ने भी पाबंदी या सेंसरशिप से  सहमति नहीं दिखाई. पिछले दिनों चल रहे विचार-विमर्श में इस मुद्दे पर गंभीर चर्चाएं हुईं. शुद्धतावादियों के आग्रह को स्वीकार नहीं किया गया. पिछले दिनों एक ज़िम्मेदार सरकारी अधिकारी ने बताया कि फिलहाल ओटीटी प्लेटफॉर्म के कार्यक्रमों को सेंसरशिप के दायरे में लाने की जरूरत नहीं है. हाँ, कुछ नियम और शर्तें जरूर होनी चाहिए, जिनका सभी पालन करें. जैसे भारत का गलत मानचित्र नहीं दिखाया जाए. राष्ट्रीय झंडे का अपमान नहीं हो. औरतों को अश्लील तरीके से पेश करने पर भी आपत्ति रही है. सरकारी अधिकारी ने सेल्फ सेंसरशिप की बात जरूर कही है. सेल्फ सेंसरशिप के मुद्दे पर ओटीटी प्लेटफार्म के एक संगठन ने पहले ही अपने लिए कुछ नियम तय कर लिए हैं. अमेजॉन अभी तक सेल्फ सेंसरशिप के तर्क से सहमत नहीं है.
दर्शकों का बड़ा हिस्सा और वेब सीरीज से जुड़े निर्माता, निर्देशक और कलाकारों में से अधिकांश किसी प्रकार की सेंसरशिप नहीं चाहते. हिंदी फिल्मों में जिस तरह की अघोषित सेंसरशिप चलती है, वैसी सेंसरशिप की भी हिमायत कोई नहीं करता. वास्तव में फिल्मों के लिए भी सेंसरशिप नहीं है. हम जिसे सेंसर बोर्ड के नाम से जानते हैं, वह वास्तव में सीबीएफ़सी(सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन) है. इस बोर्ड का काम फिल्म देख कर यू,ए या यूए प्रमाण पत्र देना है. अगर निर्माता ए प्रमाण पत्र मिली फिल्म के लिए यू या यूए प्रमाण पत्र चाहता है तो बोर्ड के सदस्य कुछ दृश्यों को काटने या छोटा करने की सलाह देते हैं.  पहलाज निहलानी जब सेंसर बोर्ड के प्रमुख थे तब इस तरह की सेंसरशिप पर कई विवाद हुए. अभी प्रसून जोशी सीबीएफसी के उच्च अधिकारी हैं. उनके नेतृत्व में बोर्ड के सदस्य शुद्धतावादियों की तरह कार्य नहीं करते हैं. वे केवल राजनीतिक खासकर सत्ताधारी पार्टी की राजनीति के हितों का जरूर ख्याल रखा जाता हैं.
वैसे भी वेब सीरीज के प्रसार के इस दौर में फिल्मों का असर तेजी से हुआ है. ओरिजिनल वेब सीरीज तो गिनती के ही बने हैं. ज्यादातर पोपुलर वेब सीरीज विदेशी हैं या विदेशों के पॉपुलर वेब सीरीज का भारतीयकरण हो रहा है. इन दिनों हिंदी फिल्मों में देशभक्ति और राष्ट्रवाद का ज्वर और ज्वार चढ़ा हुआ है. वेब सीरीज भी इससे अप्रभावित नहीं रहे. रोमांच के साथ राष्ट्रवाद का अच्छा मेल हो जाता है. वेब सीरीज के निर्देशन में आ रहे निर्देशकों के लिए यह युक्ति काम की होती है. वे ऐसे विषयों की खोज और चुनाव में लगे हैं, जिनमें राष्ट्रीय भावना पर पारोसी जा सके. गाली-गलौज और अश्लीलता तो दर्शकों को रिझाने का आसान तरीका हो गया है. अब तो नाटकों और साहित्य में भी धड़ल्ले से गालियां दी जा रही है और अश्लीलता परोसी जा रही है. यह भी एक फेज है, जो कुछ समय के बाद खुद ही उतर या बदल जाएगा