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Thursday, May 8, 2014

चौंकना और चौंकाना चाहती हूं-माही गिल


-अजय ब्रह्मात्मज
- किस मानसिक अवस्था में हैं अभी आप?
0 अभी मैं केवल घर के बारे में सोच रही हूं। पिछले कुछ समय से कोई शूटिंग नहीं की है। जहां रहती हूं, उसे सुंदर बनाने पर ध्यान दे रही हूं। यों भी फिल्मों की रिलीज के बाद मैं अक्सर गायब हो जाती हूं। जल्दी ही कहीं लंबी यात्रा पर निकलूंगी।
- अभी तक के फिल्मी सफर को किसी रूप में देखती हैं?
0 मैं सही समय पर फिल्मों में आई। इन दिनों दर्शक नए प्रयोग पसंद कर रहे हैं। मैंने कुछ फिल्में कर ली हैं, लेकिन अभी बहुत करना बाकी है। अलग-अलग जोनर की फिल्में करूंगी। मैंने अभी तक ढंग से रोमांस नहीं किया है। हॉरर और एक्शन बाकी है। कॉमेडी फिल्म भी करनी है।
- इस सफर में क्या सीखा और आत्मसात किया?
0 कई एक्टर और डायरेक्टर मिले। उनसे सीखा और समझा। अनुराग कश्यप में बच्चों जैसा उत्साह है। वे प्रेरित करते हैं। तिग्मांशु धूलिया खुद बहुत अच्छे अभिनेता हैं। वे आपकी तैयारी को परिमार्जित कर देते हैं। उनके सुझाव इंटरेस्टिंग होते हैं। रामगोपाल वर्मा के प्रयोगों में मजा आया। सतीश कौशिक के साथ पुराने समय और तरीके को समझा।
- ‘देव डी’  में आप के आगमन ने चौंका दिया था। बाद की फिल्मों में कौन सी भूमिका आपको पसंद है?
0 मैं फिर से चौंकाना चाहती हूं। लोग तारीफ करते हैं, लेकिन ऐसी स्क्रिप्ट नहीं मिल रही है जो मुझे और दर्शकों को झनझना दे। इंतजार है। चाहूं तो रोज दो फिल्में साइन कर सकती हूं, लेकिन दोहराव अच्छा नहीं लगता। अगर हर कोई विवाहेतर संबंध रखनेवाली बीवी या रेड लाइट एरिया की लडक़ी के ही रोल देगा तो कैसे कर सकती हूं? एक्साइटिंग काम न हो तो घर बैठना अच्छा है। एक अच्छी फिल्म आएगी तो वापस सब कुछ ठीक हो जाएगा। पारो के अलावा ‘साहब बीवी और गैंगस्टर’ और ‘साहब बीवी और गैंगस्टर रिटन्र्स’ की बीवी पसंद है। मुझे पार्ट टू की बीवी ज्यादा अच्छी लगी। वह खतरनाक बीवी थी। वह पूरी तरह पागल या खराब नहीं है। उसमें सब कुछ अधूरा है। ह इम्परफैक्ट है। ऐसे किरदार को निभाना चैलेंज था। वह विभिन्न मनोभावों का मिश्रण थी।
- घर बैठने पर खाली समय का क्या उपयोग करती हैं?
0 मुझे ट्रैवलिंग का बहुत शौक है। घर के लिए चीजें खरीदना अच्छा लगता है। रोड ट्रिप में मजा आता है फूड ट्रिप भी करती हूं। कई बार खुद ही ड्राइव पर निकल जाती हूं। दो-चार दोस्तों को साथ ले लेती हूं।
- फिल्मों की इस यात्रा में खुद को कहां पाती हंै?
0 मुझ से ढेर सारी गलतियां हुई हैं। मैं आउटगोइंग नेचर की नहीं हूं। प्रायवेट पर्सन हूं। अगर लोगों के पास एक काम के लिए जाऊं तो स्थिति कुछ अलग होगी। अनुराग कश्यप और तिग्मांशु धूलिया को भी फोन नहीं करती। मुझे लगता है कि वे खुद व्यस्त होंगे तो उन्हें क्यों परेशान करूं? सभी कहते हैं कि मुझे अपनी झिझक खत्म करनी चाहिए। कम फिल्मों के बावजूद मुझे बहुत आदर और प्यार मिलता है। यही काफी है कि लोग अच्छी अभिनेत्री के तौर पर याद रखें। यही मेरी उपलब्धि होगी।
- फिल्म अभिनेत्री होने का आनंद क्या है?
0 हर तरह के किरदार निभा सकती हूं। इज्जत, शोहरत और पैसे मिलते है। सभी पलकों पर बिठाए रखते हैं। घूमन कऔर देखने को नई जगहें मिलती हैं। अपनी जेब से एक पैसा खर्च नहीं होता। क्रिएटिवली हम अलग-अलग चरित्रों को जी लेते हैं। उन चरित्रों के जरिए हम अपनी मनोग्रंथियां दूर कर लेते हैं। मजेदार है न कि आप एक ग्रंथि से मुक्त हो रहे हो और दर्शक उसके लिए पैसे भी दे रहे हैं। रो भी लिए और पैसे भी कमा लिए।
- फिल्मों में आयटम करने की क्या जरूरत पड़ गई?
0 बतौर एक्टर सब कुछ करने का मन करता है। जिन फिल्मों के साथ हम बड़े हुए है, उनकी नायिकाओं की छवियां अभी तक दिमाग में हैं। नाचना-गाना तो मेरा पैशन है। सबसे बड़ी बात है कि आप के पास कुछ डांस नंबर हो जाते हैं। उस से स्टेज शो मिलते हैं। लोग मेरी परफारमेंस देखने आते हैं। मुझे मालूम है कि कुछ प्रशंसक नाखुश हुए, लेकिन मुझे भी मजा लेने का हक है न?
- क्या माही गिल खुद के साथ रह लेती है?
0 हां, मुझे एकाकीपन पसंद है। मैं अकेली रह सकती हूं। पहाड़ी पर किसी मनोरम घाटी के सामने घंटों बैठी रह सकती हूं। खुद के साथ समय बिताना अच्छा लगता है। कई बार हफ्तों घर से नीचे नहीं उतरती।
- मशहूर होने के बाद कैसी मुश्किलें बढ़ी हैं?
0 बस थोड़ी सचेत हो गई हूं। बाहर निकले पर सज-धज की अनिवार्यता से दिक्कत होती है। अगर राह चलते कोई पहचानता है तो अच्छा लगता है। आटोग्राफ और फोटेग्राफ देने में मेरा मन लगता है। मशहूर होना सुखद है।
- कब महसूस हुआ कि आप मशहूर हो गई हैं?
0 ‘देव डी’ की रिलीज के बाद जनपथ में स्ट्रीट शॉपिंग कर रही थी। वहां पहले एक लडक़ी ने पहचाना। फिर तो सब जमा हो गए। वे मुझे छूने और पकडऩे लगे। वहां से मुझे भागना पड़ा, लेकिन यही बात अच्छी लगी।
- इस दरम्यान आशिक प्रशंसकों से भी पाला पड़ा होगा?
0 चि_ियां और उपहार तो मिलते ही हैं। एक बार तो एक प्रशंसक घर आ गया। यहां आकर रोने लगा। उसने अपनी मां से मेरी बात करवाई। पहले वह दिल्ली में मिला था तो मेरे सामने शेर-ओ-शायरी करने लगा था। बाकी सभी का व्यवहार अच्छा लगता है। मैं अपने प्रशंसकों को पूरी तरजीह देती हूं।
- पुराने दोस्तों में कोई ईष्र्या भी करता है क्या?
0 ईष्र्या करेगा तो दोस्त कैसे रहेगा? मेरे दोस्त मेरे काम से खुश होते हैं। कभी कुछ पसंद नहीं आता तो जम कर आलोचना करते हैं। मैं अपना पक्ष रखती हूं। बहस करती हूं। जल्दी मान जाऊं तो कैसे चलेगा? दोस्त मेरे संबल हैं। उनके काम का प्रचार भी करती हूं। दोस्तों पर गर्व होना चाहिए।
- घर के साथ कैसा रिश्ता है?
0 मैं घर से ज्यादा     जुड़ी नहीं हूं। भाई अमेरिका में है। मां चंडीगढ़ में रहती हैं। सभी से अच्छे संबंध हैं। वे खुश भी होते हैं, लेकिन दिन-रात का संपर्क नहीं रखती। कोई दुराव नहीं है, लेकिन अतिरिक्त लगाव भी नहीं है। मम्मी ने मेरी फिल्में तक नहीं देखी हैं। परिवार के सदस्यों का मेरी लाइफ और करिअर में इन्वॉल्वमेंट नहीं रहता। मैंने कभी अपने माता-पिता से पैसों की मदद नहीं ली। मैंने सब कुछ खुद ही अर्जित किया है।
- आप अभिनेत्री है, लेकिन एक अकेली लडक़ी की अपनी समस्याएं भी हो सकती हैं। मुंबई जैसे शहर में टिके रहना भी आसान नहीं है। कैसे संभव होता है सब कुछ?
0 दोस्त हैं। वे हर वक्त मेरी मदद करते हैं। वे बहुत ज्यादा ख्याल रखते हैं। बस, आप सचेत रहे तो आप से कोई अनावश्यक लाभ नहीं उठा सकता। दोस्तों और परिवार का समर्थन चाहिए। मैं मुंबई या किसी भी शहर में कुछ पाने-कमाने आई लड़कियों से यही कहूंगी कि कभी हार हो तो सीधे घर लौटें। शर्म या झेंप में कोई गलत राह न चुन लें।

Friday, September 6, 2013

फिल्‍म समीक्षा : जंजीर

Zanjeer-अजय ब्रह्मात्‍मज 
हालांकि अपूर्वा लाखिया की 'जंजीर' अमिताभ बच्चन की 'जंजीर' की आधिकारिक रीमेक है, लेकिन इसे देखते समय पुरानी फिल्म का स्मरण न करें तो बेहतर है। अमिताभ बच्चन की प्रकाश मेहरा निर्देशित 'जंजीर' का ऐतिहासिक महत्व है। उस फिल्म से अमिताभ बच्चन की पहचान बनी थी। उन्हें एंग्री यंग मैन की इमेज मिली थी। इस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में अपूर्वा लाखिया की 'जंजीर' एक साधारण फिल्म लगती है। राम चरण के लिए हिंदी फिल्मों की यह शुरुआत है।
कहानी और किरदारों के बीज वहीं से लिए गए हैं, लेकिन उन्हें स्टूडियो में विशेष निगरानी के साथ सींचा गया है, इसलिए पुरानी फिल्म की नैसर्गिकता चली गई है। वैसे भी अब शहरी जीवन में प्राकृतिक फूलों और पौधों की जगह कृत्रिम फूलों और पौधों ने ले ली है। उसी प्रकार की कृत्रिमता का एहसास 'जंजीर' देख कर हो सकता है। हां, अगर पुराने अनुभव और ज्ञान से वंचित या परिचित दर्शकों के लिए 'जंजीर' आज की फिल्म है। मल्टीप्लेक्स के दर्शकों को मजा भी आएगा। फिल्म में आज के कंसर्न के साथ आधुनिक किरदार हैं। सब कुछ बदल चुका है। नई 'जंजीर' का तेजा पुरानी 'जंजीर' देखता है और मोना डार्लिग कहती है कि तुम भी तो तेजा (अजीत) जैसे ही हो। फिल्म की रीमेक फिल्म में आए किरदार मूल फिल्म के किरदार की नकल ही लगते हैं। यह अजीब सा दौर है, जहां फिल्मों के किरदारों से प्रेरित होकर नए किरदार रचे जा रहे हैं। ऐसे किरदारों में जीवन की महक और ठसक मिलना मुश्किल है।
अपूर्वा लाखिया की 'जंजीर' स्टूडियो लैब में तैयार की गई फिल्म है। उन्होंने लेखकों की नई टीम के साथ पुराने किरदारों की बिल्कुल नए तरीके से रच डाला है। पुरानी फिल्म को हू-ब-हू नहीं उतारा जा सकता था, लेकिन आज के संदर्भ में मौलिकता का पुनर्चित्रण तो किया जा सकता था।
स्वतंत्र फिल्म के तौर पर 'जंजीर' औसत फिल्म है। राम चरण सधे हुए अभिनेता हैं। उन्होंने विजय खन्ना के किरदार को लेखक-निर्देशक की कल्पना से निभाया है। उनमें अमिताभ बच्चन को खोजना ज्यादती होगी, क्योंकि नई 'जंजीर' सलीम-जावेद की स्क्रिप्ट पर नहीं बनी है। प्राण की शेर खान की भूमिका यहां संजय दत्त ने निभाई है। वे कद-काठी में तो शेर खान लगते हैं, लेकिन पुरानी फिल्म की तुलना में यह चरित्र ही कमजोर है। न आंखों में वह तुर्सी है और न जबान पर वे तेजाब। दोनों की यारी ईमान और जिंदगी का पर्याय नहीं बन पाती।
माला के किरदार को एनआरआई बनाने का तुक समझ में नहीं आता। प्रियंका चोपड़ा दिए गए किरदार में सहज और चपल और प्रभावशाली लगती हैं। समस्या माला के किरदार की है। पूरी फिल्म में उसका स्थान निश्चित नहीं हो पाता। तेजा के रूप में प्रकाश राज अचानक दो दशक पहले की वेशभूषा और आचरण में दिखते हैं। उनका चित्रण असंगत है। मोना डार्लिग के रूप माही गिल को विस्तार मिला है। वह अपने किरदार को निभा ले जाती हैं।
फिल्म में अनेक गाने हैं, किंतु कहानी से उनका तालमेल नहीं बैठ पाता। सारे गाने आयटम ही नजर आते हैं।
अवधि - 137 मिनट
** 1/2 ढाई स्‍टार

Saturday, March 3, 2012

महिला दिवस: औरत से डर लगता है

-अजय ब्रह्मात्‍मज

उनके ठुमकों पर मरता है, पर ठोस अभिनय से डरती है फिल्‍म इंडस्‍ट्री। आखिर क्या वजह है कि उम्दा अभिनेत्रियों को नहीं मिलता उनके मुताबिक नाम, काम और दाम...

विद्या बालन की 'द डर्टी पिक्चर' की कामयाबी का यह असर हुआ है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में महिला प्रधान [वीमेन सेंट्रिक] फिल्मों की संभावना तलाशी जा रही है। निर्माताओं को लगने लगा है कि अगर हीरोइनों को सेंट्रल रोल देकर फिल्में बनाई जाएं तो उन्हें देखने दर्शक आ सकते हैं। सभी को विद्या बालन की 'कहानी' का इंतजार है। इस फिल्म के बाक्स आफिस कलेक्शन पर बहुत कुछ निर्भर करता है। स्वयं विद्या बालन ने राजकुमार गुप्ता की 'घनचक्कर' साइन कर ली है, जिसमें वह एक महत्वाकांक्षी गृहणी की भूमिका निभा रही हैं। पिछले दिनों विद्या बालन ने स्पष्ट शब्दों में कहा था, 'मैं हमेशा इस बात पर जोर देती हूं कि किसी फिल्म की कामयाबी टीमवर्क से होती है। चूंकि मैं 'द डर्टी पिक्चर' की नायिका थी, इसलिए सारा क्रेडिट मुझे मिल रहा है। मैं फिर से कहना चाहती हूं कि मिलन लुथरिया और रजत अरोड़ा के सहयोग और सोच के बिना मुझे इतने पुरस्कार नहीं मिलते। मुझे इतना क्रेडिट दिया जा सकता है कि मैंने मिले हुए मौके को नहीं गंवाया और उनके गढ़े किरदार को पर्दे पर उतारा। अभी लोग मुझसे पूछते हैं कि आगे क्या करूंगी? उम्मीद है कि लेखक और निर्देशक मेरे लिए फिल्में लिख रहे होंगे। मुझे फिल्में मिलती रहेंगी।'

महिला प्रधान फिल्मों की हमारी सामान्य धारणा हिंदी फिल्मों से ही बनी हुई है। अगर किसी फिल्म में महिला किरदार थोड़ा मजबूत और स्वतंत्र स्वभाव का दिखे तो हम उसे महिला प्रधान फिल्म की संज्ञा दे देते हैं। पैरेलल सिनेमा के दौर में इसी आधार पर हम मानते रहे कि महिला प्रधान फिल्में बन रही हैं। कुछ महिला निर्देशको की फिल्में नारी अस्मिता के सवालों को उठाती नजर आई, लेकिन समय के साथ कमशिर्यल सिनेमा ने सभी को निगल लिया। फिल्मों में महिलाओं को फिर से नाचने-गाने या शो पीस की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा। श्याम बेनेगल साफ शब्दों मे कहते हैं, 'समाज में महिलाओं की जैसी स्थिति रहेगी, वैसा ही चित्रण फिल्मों में देखने को मिलेगा। अगर किसी साहसी महिला पर कोई फिल्म आयी है तो वह एक अपवाद होता है। सामान्य फिल्मों में महिलाओं के चित्रण से आप तय करें कि कोई निर्देशक उन्हें कितना महत्व देता है।' फेमिनिस्ट फ्रिक्वेंसी नामक वेबसाइट चला रहीं अनिता सरकीसियन मीडिया और मूवी में महिलाओं के चित्रण का सिलेसिलेवार अध्ययन करती हैं। किसी भी फिल्म को महिला प्रधान कहने के पहले वे बेकडेल टेस्ट करने की बात कहती हैं। बेकडेल टेस्ट में तीन टेस्ट हैं।

1. क्या उस फिल्म में दो महिला किरदार हैं और उनके नाम भी हैं

2. क्या दोनों महिलाएं आपस में बात करती हैं?

3. क्या उनकी बातचीत में मर्दों के अलावा दूसरे मुद्दे भी रहते हैं।

किसी फिल्म और रचना में इन तीन टेस्ट के जरिए महिलाओं के महत्व को आंका जा सकता है। हिंदी की ज्यादातर कथित महिला प्रधान फिल्में इस टेस्ट पर खरी नहीं उतरेंगी। हिंदी फिल्मों में हमेशा से पुरुष प्रधानता रही है। 'द डर्टी पिक्चर' समेत अधिकांश फिल्मों में पुरुषों के दृष्टिकोण से ही महिलाओं का चित्रण रहता है। एक महिला निर्देशक ने जोर देकर कहा कि कि अगर इस फिल्म की निर्देशक कोई महिला रहती तो सिल्क आत्महत्या नहीं करती। वह इमरान हाशमी और नसीरूद्दीन शाह को उनकी औकात पर ले आती। अनुराग कश्यप की फिल्म 'देव डी' में शादीशुदा पारो देव के साथ हमबिस्तर होती है और फिर कहती है कि मैं तुम्हें तुम्हारी औकात बताने आई थी।

प्रियंका चोपड़ा सोलह साल की उम्र से काम कर रही हैं और हिंदी फिल्मों में खास स्थान रखती हैं। महिला प्रधान फिल्मों और हीरो से बराबरी के सवाल पर कहती हैं, 'हम लाख प्रयत्न कर लें, लेकिन हमें हीरो का दर्जा नहीं मिल सकता। मुझे अपनी स्थिति मालूम है। ज्यादा कुछ सोचकर निराश होने की जरूरत नहीं है। मुझे मालूम है कि हीरो के बराबर मुझे पैसे नहीं मिल सकते।' समान पारिश्रमिक की बात पूछने पर विद्या बालन हंसने लगती हैं, 'क्या बात करते हैं? मेरे बारे में लिखा जा रहा है कि मैं सात करोड़ की मांग कर रही हूं। ऐसा हो सकता है क्या? अगर मुझे सात करोड़ मिलेंगे तो हीरो की फीस 30 से 70 करोड़ के बीच होगी।' क्या महिला समुदाय की सदस्य होने के नाते इस असमानता पर उन्हें गुस्सा नहीं आता? 'नहीं आता, खुद को समझा लिया है। एक कंडीशनिंग हो जाती है।' कहती हैं विद्या बालन। इस कंडीशनिंग को अन्य अभिनेत्रियों ने भी भिन्न शब्दों में स्वीकार किया।

हीरो-हीरोइन के महत्व, सम्मान और पारिश्रमिक का यह फर्क हिंदी फिल्मों की शुरुआत से चला आ रहा है। समाज के दूसरे क्षेत्रों में कार्य और पारिश्रमिक के अनुपात में समानता सी दिखती है, लेकिन हिंदी फिल्मों में ऐसी समानता अभी एक सपना है।

नई अभिनेत्रियों में माही गिल अपनी अदाकारी और स्वतंत्रता के लिए पहचानी जाती हैं। महिला प्रधान फिल्मों के प्रसंग में उनकी राय है, 'महिला किरदारों को लेकर नए निर्देशक संवेदनशील हैं। अपने छोटे अनुभव में मैंने देखा कि अनुराग कश्यप और तिग्मांशु धूलिया समाज में औरतों के महत्व को समझते हैं। सबसे बड़ी बात है कि वे खुद औरतों की इज्जत करते हैं। मैं फिल्में चुनते समय थोड़ा ख्याल रखती हूं कि अपने किरदारों की अहमियत देख लूं।'

करीना कपूर महिला प्रधान फिल्मों की अलहदा कैटगरी के सवाल को सिरे से खारिज कर देती हैं। अपनी राय देते हुए वह कहती हैं, 'मैं ऐसे नाम और भेद में यकीन नहीं करती। मैं हर तरह की फिल्में करती हूं। मैंने 'चमेली' और 'ओमकारा' जैसी फिल्में कीं, लेकिन मुझे 'गोलमाल' और 'बॉडीगार्ड' करने में भी दिक्कत नहीं होती। मेरा काम हर प्रकार के दर्शकों को खुश रखना है।'

हिंदी फिल्मों में दुर्भाग्य की बात है कि गंभीर और उम्दा अभिनेत्रियों को अधिक काम नहीं मिलते। अगर किसी ने अपनी दक्षता साबित कर दी तो उसे दरकिनार कर दिया जाता है। शबाना आजमी, तब्बू, विद्या बालन जैसे अनेक नाम गिनाए जा सकते हैं। इन्होंने मिले अवसरों का उचित उपयोग कर अपनी योग्यता साबित की। इसके बावजूद इन सभी अभिनेत्रियों को पर्याप्त अवसर नहीं मिलते। याद करें कि आपने आखिरी बार तब्बू को पर्दे पर कब देखा था?

Friday, February 6, 2009

फ़िल्म समीक्षा:देव डी


आत्मलिप्त युवक की पतनगाथा
-अजय ब्रह्मात्मज

घिसे-पिटे फार्मूले और रंग-ढंग में एक जैसी लगने वाली हिंदी फिल्मों से उकता चुके दर्शकों को देव डी राहत दे सकती है। हिंदी फिल्मों में शिल्प और सजावट में आ चुके बदलाव का सबूत है देव डी। यह फिल्म आनंद और रसास्वादन की पारंपरिक प्रक्रिया को झकझोरती है। कुछ छवियां, दृश्य, बंध और चरित्रों की प्रतिक्रियाएं चौंका भी सकती हैं। अनुराग कश्यप ने बहाना शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के देवदास का लिया है, लेकिन उनकी फिल्म के किरदार आज के हैं। हम ऐसे किरदारों से अपरिचित नहीं हैं, लेकिन दिखावटी समाज में सतह से एक परत नीचे जी रहे इन किरदारों के बारे में हम बातें नहीं करते। चूंकि ये आदर्श नहीं हो सकते, इसलिए हम इनकी चर्चा नहीं करते। अनुराग कश्यप की फिल्म में देव, पारो, चंदा और चुन्नी के रूप में वे हमें दिखते हैं।
देव डी का ढांचा देवदास का ही है। बचपन की दोस्ती बड़े होने पर प्रेम में बदलती है। एक गलतफहमी से देव और पारो के रास्ते अलग होते हैं। अहंकारी और आत्मकेंद्रित देव बर्दाश्त नहीं कर पाता कि पारो उसे यों अपने जीवन से धकेल देगी। देव शराब, नशा, ड्रग्स, सेक्स वर्कर और दलाल के संसर्ग में आता है। वह चैन की तलाश में बेचैन है। उसकी मुलाकात चंदा से होती है तो उसे थोड़ा सुकून मिलता है। उसे लगता है कि कोई उसकी परवाह करता है। चंदा भी महसूस करती है कि देव खुद के अलावा किसी और से प्रेम नहीं करता। देव अमीर परिवार का बिगड़ैल बेटा है, जो भावनात्मक असुरक्षा के कारण भटकता हुआ पतन के गर्त में पहुंचता है। यही कारण है कि उसकी बेबसी और लाचारगी सहानुभूति नहीं पैदा करती। उसके जीवन में आए पारो, चंदा और रसिका रियल, स्मार्ट और आधुनिक हैं। वे भी उसकी हकीकत समझते हैं और दया नहीं दिखाते। देव डी का देव कमजोर, असुरक्षित, भावुक, आत्मलिप्त और अनिश्चित व्यक्ति है। बाह्य परिस्थितियों से ज्यादा वह खुद के अनिश्चय और भटकाव का शिकार है।
अनुराग कश्यप ने देव डी में चंदा की पृष्ठभूमि की खोज की है। सेक्स वर्कर बनने की विवशता की कहानी मार्मिक है। अनजाने में एमएमएस कांड में फंस गई लेनी परिवार और समाज से बहिष्कृत होने के बाद वह चुन्नी की मदद से दिल्ली के पहाड़गंज में शरण पाती है और अपना नाम चंद्रमुखी रखती है। कुल्टा समझी गई चंदा मानती है कि समाज का अधिक हिस्सा कुत्सित ओर गंदी चीजें देखने में रस लेता है। जिस समाज ने उसे बहिष्कृत किया, उसी समाज ने उसके एमएमएस को देखा। देव डी की पारो साहसी, आधुनिक और व्यावहारिक है। देव से अलग होने के बाद वह बिसूरती नहीं। दोबारा मिलने पर वह देव को अपनी अंतरंगता से तृप्त करती है, लेकिन देव के प्रति वह किसी किस्म की भावुकता नहीं दिखाती। वह अपने परिवार में रच-बस चुकी है। इस फिल्म को निर्देशित करते समय अनुराग के मानस में पुरानी देवदास मंडराती रही है। लेनी तो अपना नाम चंद्रमुखी देवदास की माधुरी दीक्षित के कारण रखती है। देव डी में चित्रित प्रेम, सेक्स, रिश्ते और भावनाओं को आज के संदर्भ में ही समझा जा सकता है। देव डी एक प्रस्थान है, जो प्रेम के पारंपरिक चित्रण के बजाए 21वीं सदी के शहरी और समृद्ध भारत के युवा वर्ग के बदलते प्रेमबोध को प्रस्तुत करती है। अनुराग कश्यप ने क्रिएटिव साहस का परिचय दिया है। उन्होंने फिल्म के नए शिल्प के हिसाब से पटकथा लिखी है। पारो, देव और चंदा के चरित्रों को स्थापित करने के बाद वे इंटरवल के पश्चात रिश्तों की पेंचीदगियों में उतरते हैं। दृश्य, प्रसंग, बिंब और रंग में नवीनता है। फिल्मांकन की प्रचलित शैली से अलग जाकर अनुराग ने नए प्रयोग किए हैं। ये प्रयोग फिल्म के कथ्य और उद्देश्य के मेल में हैं। अनुराग के शिल्प पर समकालीन विदेशी प्रभाव दिख सकता है।
अभय देओल स्वाभाविक अभिनेता हैं। उन्होंने देव के जटिल चरित्र को सहजता से निभाया है। मुश्किल दृश्यों में उनकी अभिव्यक्ति, भाव मुद्राएं और आंगिक क्रियाएं किरदार के मनोभाव को प्रभावशाली तरीके से जाहिर करती हैं। अभय अपनी पीढ़ी के निर्भीक अभिनेता हैं। माही और कल्कि में माही ने अपने किरदार को समझा और बखूबी निभाया है। माही के अभिनय में सादगी है। कल्कि को दृश्य अच्छे मिले हैं, किंतु वह चरित्र की संश्लिष्टता को चेहरे पर नहीं ला पातीं। चुन्नी की भूमिका में दिब्येन्दु भट्टाचार्य ध्यान खींचते हैं। इस किरदार को अनावश्यक तरीके से सीमित कर दिया गया है।
देव डी की विशेषता इसका संगीत है। फिल्म में गीत-संगीत इस खूबसूरती से पिरोया गया है कि पता ही नहीं चलता कि फिल्म खत्म होने तक हम अठारह गाने सुन चुके हैं। गीतों का ऐसा फिल्मांकन रंग दे बसंती के बाद दिखा है। अमिताभ भट्टाचार्य, शैली और अमित त्रिवेदी की टीम ने मधुर और भावपूर्ण सुर, स्वर और शब्द रचे हैं।
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