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Friday, July 28, 2017

फिल्‍म समीक्षा : पर्दे पर इतिहास के पन्‍ने



फिल्‍म रिव्‍यू
पर्दे पर इतिहास के पन्‍ने
राग देश
-अजय ब्रह्मात्‍मज

तिग्‍मांशु घूलिया की राग देश का बनना और सिनेमाघरों में रिलीज होना ही एक घटना है। राज्‍य सभा टीवी की इस पहल की तारीफ करनी चाहिए कि उन्‍होंने समकालीन इतिहास के एक अध्‍याय को फिल्‍म के रूप में पेश करने के बारे में सोचा। तिग्‍मांशु धूलिया ने आजाद हिंदी फौज के मेजर जनरल शाहनवाज खान,लेफिटनेंट कर्नल गुरबख्‍श सिहं ढिल्‍लों और लेफिटनेंट कर्नल प्रेम सहगल पर लाल किले में चले मुकदमे पर ही फिल्‍म केंद्रित की है। उस मुकदमें के बहाने आजादी की लड़ाई सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज की भूमिका से भी हम परिचित होते हैं। इतिहास के पन्‍ने दृश्‍यों में सज कर पर्दे पर आते हैं और हम उस दौर की घटनाओं को देख पाते हें। तिग्‍मांशु धूलिया ने मुख्‍य रूप से वास्‍तविक किरदारों और मुकदमें के इर्द-गिर्द ही कहानी रखी है। उन्‍होंने कथा बुनने के लिए कुछ किरदार जोड़े हैं। उन पर अधिक फोकस नहीं किया है।
द्वितीय विशव युद्ध में जापना और जर्मनी की हार और ब्रिटेन की जीत के बाद आजाद हिंद फौज के सैनिकों को समर्पण करना पड़ा था। युद्धबंदी के तौर पर उन सैनिकों को देश के अलग-अलग जेलों में रखा गया था। आजाद हिंद फौज का नूतृत्‍व कर रहे शाहनवा,ढिलों और सहगल पर राष्‍ट्रद्रोह का मुकदमा चला था। इस मुकदमें का दस्‍तावेजीकरण तो हुआ है कि इस ऐतिहासिक घटना के बारे में इतिहास में नहीं पढ़ाया जाता। दरअसल,देश के स्‍वाधीनता आंदोलन में गांधी और नेहरु के नेतृत्‍व में कांगेस की भूमिका ही रेखांकित हो पाई है। कांग्रेस के आंदोलन और अभियानों के साथ भगत सिहं और सुभाष चंद्र बोस जैसे का्रतिकारियों और सेनानियों का भी योगदान रहा है। भगत सिंह को देश एक शहीद के रूप में याद करता है,लेकिन बोस को लेकर आम सहमति नहीं बन पाई है। आजादी के बाद सुभाष चंद्र बोस को किंवदंती और रहस्‍यपूर्ण व्‍यक्ति के रूप में तो पेश किया गया,लेकिन उनकी भूमिका का उचित मूल्‍यांकन नहीं हो सका। यह भी लगता है कि तत्‍कालीन संदर्भ में सुभाष चंद्र बोस की भूमिका देशहित में रही हो,लेकिन इतिहास ने साबित किया कि जर्मनी और जापान से मदद लेने का उनका फैसला ऐतिहासिक रूप से गलत रहा। दोनों ही देश द्वितीय विश्‍वयुद्ध के खलनायक बन गए। खलनायकों का साथ लेने की वजह से सुभाष चंद्र बोस भी नायक नहीं रह गए। दूसरे कांग्रेस के शासन काल में कभी सुभाष चंद्र बोस की भूमिका और योगदान को रेखांकित नहीं किया गया।
राग देश प्रकारांतर से सुभाष चंद्र बोस को एक संदर्भ देती है। मुकदमें के बहाने आजादी की लड़ाई में आजाद हिंद फौज की मंशा और मिशन की बातें उद्घाटित होती हैं। हमें यह भी पता चलता है कि उस समय देश के नेता और जनता की क्‍या सोच थी। तिग्‍मांशु धूलिया की ईमानदार कोशिश राग देश अतिहस के अनछुए प्रसंग को विश्‍वसनीयता के साथ पेश करती है। बजट की सीमाओं के कारण युद्ध के दृश्‍यों में रोमांच नहीं उभर पाया है। दूसरे यह भी चुनौती रही है कि मूल रूप से एक-एक घंटे के 6 एपीसोड के रूप में सोची और लिखी सामग्री से काट-छांट कर एक फिल्‍म निकालना। इस वजह से फिल्‍म कहीं-कहीं डीली और बिखरी नजर आती है। तारतम्‍य भी टूटता है।
कलाकारों में अमित साध ढिलों की अपनी भूमिका और आक्रामक किरदार की वजह से ज्‍यादा आकर्षित करते हैं। शाहनवाज खान की भूमिका में कुणाल कपूर मेहनत के बावजूद प्रभाव नहीं पैदा कर पाते। मोहित मारवाह की मौजूदगी पुरअसर है। लक्ष्‍मी की भूमिका में आई अभिनेत्री एक्‍सप्रेसिव और प्रभावशाली है। भूला भाई देसााई के रूप में केनी देसाई याद रह जाते हैं। इस फिल्‍म का कमजोर पक्ष कलाकारों का अभिनय है। मुमकिन है वे टीवी शो के विस्‍तार में सहयोगी किरदारों के साथ जंचते हों।
अवधि-137 मिनट
*** तीन स्‍टार

Monday, July 4, 2016

गिटार मास्‍टर हैं तिग्मांशु : संजय चौहान


हिंदी सिनेमा में बदलाव के प्रणेताओं में तिग्‍मांशु धूलिया का नाम भी शुमार होता है। वह लेखक, निर्देशक, अभिनेता, निर्माता और कास्टिंग डायरेक्‍टर हैं। ‘हासिल’, ‘पान सिंह तोमर’, और ‘साहब बीवी और गैंग्‍स्‍टर’ जैसी उम्‍दा फिल्‍में तिग्‍मांशु धूलिया की देन हैं। तीन जुलाई को तिग्‍मांशु का जन्‍मदिन है। संजय चौहान उनके करीबी दोस्‍त हैं। पेश है तिग्‍मांशु के व्‍यक्तित्‍व की कहानी संजय की जुबानी :
यह कहना गलत नहीं होगा कि तिग्मांशु धूलिया , जिन्हें हम दोस्त प्यार से तीशू कहकर बुलाते हैं, से मेरी मुलाकात बिज्जी (प्रख्यात कहानीकार विजन दान देथा) के जरिए हुई थी। जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय (जेएनयू) से मैंने बिज्जी की कहानियों पर एम फिल की थी। मुंबई आने के बाद मैं टीवी सीरियल लिख रहा था। उन दिनों स्टार बेस्ट सेलर सीरीज के तहत कई निर्देशक अलग-अलग कहानियां कर रहे थे। उनमें से कई आज नामी निर्देशक हो चुके हैं। मसलन श्रीराम राघवन, इम्तियाज अली, अनुराग कश्यप और तिशु। बिज्जी राजस्थान की एक बोली मारवाठी में लिखते थे। उनकी एक कहानी अलेखुन हिटलर के हिंदी अनुवाद अनेकों हिटलर को तिशु ने इसी सीरीज के पर्दे पर कमाल तरीके से उतारा था और मुझे लगा वह बेहद सुलझे व्‍यक्ति है। वरना बिज्जी की कहानी खोजकर पर्दे पर लाने का जोखिम नहीं उठाते।
तिशु से मेरी पहली मुलाकात सडक़ पर हुई थी। ‘हासिल’ फिल्म को रिलीज हुए एक साल से ज्यादा हो चुका था, मुझे वह फिल्म बेहद पसंद आई थी। मुझे लगा था कि सुधीर मिश्रा की ‘ये वो मंजिल तो नहीं’ के बाद छात्र राजनीति पर इससे बेहतरीन फिल्म नहीं बन सकती है। हम दोनों की पहली मुलाकात भी बड़ी दिलचस्‍प रही है। मैं मुंबई के सात बंग्लो इलाके से गुजर रहा था और वहीं तिशु से टकरा गया। मैंने उनसे कहा ‘हासिल’ कमाल की फिल्म है। वह हौले से मुस्कुराए शुक्रिया कहा और हम अपनी-अपनी राह हो लिए। तब तक शायद वह यह सुन-सुन कर बोर हो चुके होंगे और उन्होंने संवाद की जरुरत नहीं समझी होगी। मुझे भी कुछ बुरा नहीं लगा। 
उसके बाद तिशु की फिल्म ‘चरस’ आई और मैं बहुत दुखी हो गया। मुझे लगा यार उन्हें क्या हुआ है? ‘हासिल’ के बाद वही शख्स ऐसी फिल्म बना सकता है। वर्षो बाद जब हम अच्छे दोस्त हो चुके थे हमारी इस बात पर बहस हो गई थी। वह मानने को तैयार नहीं थे कि ‘चरस’ खराब फिल्म थी। शायद उनकी कल्पना की फिल्म और बनी फिल्म की दूरी बहुत ज्यादा हो गई थी और अभी भी उनके दिमाग में वही फिल्म चल रही थी जो उन्होंने संजोयी थी।
तिशु से सीधे-सीधे परिचय उस वक्त हुआ जब मैं के सेरा सेरा प्रोडक्शन हाउस के लिए फिल्म लिख रहा था और उसी कंपनी के लिए तिशु एक और फिल्म निर्देशित करने वाले थे। तब बात हुई नंबरों की अदला-बदली हुई। एक दिन तिशु का फोन आया। हम मिले। तिशु ‘घायल’ फिल्म का सीक्वेल सोच रहे थे। उन्होंने कहा साथ मिलकर लिखते हैं। मेरी पहली प्रतिक्रिया थीतुम खुद इतने उम्दा लेखक हो, मेरी क्या जरूरत?  उन्होंने कहा करते हैं मिलकर। हम लोग चार बार मिले। कहानी आगे नहीं बढ़ी और बात वहीं रह गई।
फिर लगभग दो साल बाद फिर तिशु का फोन आया। हम मिले और तिशु ने एक अखबार में छपा ‘पान सिंह तोमर’ पर लिखा एक पेज का लेख साझा किया। यह स्पष्ट था कि न तो गूगल न विकिपीडिया पर इसकी कोई जानकारी थी। इसलिए गहन रिसर्च की जरूरत होगी, लेकिन प्रोड्यूसर यूटीवी स्पॉट ब्वॉय इसके लिए तैयार था। तब दो साल की रिसर्च और एक साल स्क्रिप्ट लिखने के दौरान तिशु को नजदीक से जानने का मौका मिला।
और जब ‘पान सिंह तोमर’ बन के अटकी रही तब हमने तय किया किया कि एक ऐसी फिल्म बनाई जाए जिसके रिलीज के लिए किसी की बाट न जोहनी पड़े। मेरी पसंदीदा फिल्मों में से एक फिल्म ‘साहब बीबी और गुलाम’ है, जिसे मैंने हजारों बार देखा होगा। मुझे लगा आज के टाइम कोई साहब वैसा साहेब नहीं, बीवी वैसी नहीं जो अय्याश पति के चरणों में पड़ी रहे और गुलाम तो कोई नहीं । हिंदी फिल्मों के रामू काका कब के गुजर गए। यह आइडिया मैंने तिग्मांशु को सुझाया सबको पसंद आया और मैं पहला डाफ्ट लिखने बैठ गया। हम दोनों ने उसमें रंग भरे और वह ‘साहब बीवी और गैंग्‍स्‍टर’ फटाफट बनकर तैयार हुई और हिट हुई। उसकी सफलता ने पान सिंह तोमर की रिलीज के दरवाजे खोल दिए। बाकी की कहानी सभी को पता है। शायद बहुत कम लोगों को पता होगा कि इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ते हुए तिशु और उनके दोस्तों का एक बैंड था, जिसमें तिशु गिटार बजाया करते थे। अक्सर कई शाम वह गिटार उठाते और गाने की महफिल जम जाती।
बहरहाल, अगर आपको उनके नजदीक जाना है तो खाने का शौकीन होना बहुत जरूरी है। तिशु खाने पीने के बेहद शौकीन है। वह विभिन्न डिश, उसके बनाने की विधि और बारीकियों पर घंटों बातें कर सकते हैं। वह खुद भी बेहतरीन कुक हैं। मुझे लगता है कि आज के दौर में मुकम्मल कहानी कहने और गढऩे वाले बेहतरीन निर्देशकों में से तिशु एक हैं। जन्मदिन पर मैं उन्हें ढेर सारी शुभकामनाएं देता हूं।
स्मिता श्रीवास्‍तव

Sunday, June 1, 2014

अनुराग कश्‍यप का युद्ध

तिग्‍मांशु धूलिया- ये क्षेत्र जो है ,हमारा है। यहां पर आप को हमारे तरीके से रहना होगा।
अमिताभ बच्‍चन- ये खेल अब आप को मेरी तरह ही खेलना होगा।
सोनी टीवी के आगामी धारावाहिक 'युद्ध' के संवाद...इसे अनुराग कश्‍यन निर्देशित कर रहे है। इसमें नवाज और केके भी है।

Sunday, May 18, 2014

किस्‍मत पर कम हुआ यकीन-तिग्‍मांशु धूलिया

-अजय ब्रह्मात्मज
    निर्देशक तिग्मांशु धूलिया इन दिनों एक्टिंग कर रहे हैं। ‘बुलेट राजा’ के बाद उनकी कोई फिल्म फ्लोर पर नहीं गई है। खाली समय में वे एक्टिंग के ऑफर स्वीकार कर रहे हैं। यहां तक कि अपनी आगामी फिल्म ‘यारा’ में भी वे इरफान के साथ नजर आएंगे। पिछले दिनों उनसे इस अभिनय प्रसंग पर बातें हुई।
-अभिनय में आप की सक्रियता बढ़ गई है इन दिनों। कोई खास वजह?
0 ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के बाद लोगों का ध्यान गया कि मैं एक्टिंग भी कर सकता हूं। अभी तक इसे करिअर बनाने का इरादा नहीं है। शुरू में दोस्तों के ऑफर या यों कहें कि डिमांड  ठुकरा नहीं सका। फिलहाल निखिल आडवाणी की फिल्म ‘हीरो’ में शम्मी कपूर वाली भूमिका निभा रहा हूं। अनुराग कश्यप निर्देशित धारावाहिक में भी दिखूंगा, जिसमें अमिताभ बच्चन हैं। उसमें अमित जी ईमानदार बिजनेसमैन बने हैं। मैं उस धारावाहिक में होम मिनिस्टर बना हूं। भ्रष्ट राजनीतिज्ञ हूं। अभी जून से आरंभी हो रही अपनी  ‘यारा’ में छोटी भूमिका निभा रहा हूं।
-एक्टिंग की तरफ रुझान कैसे हुआ?
0 मुझे एक्टिंग के ऑफर मिलते रहे हैं। मुझे करना नहीं था। हंसल मेहता की ‘शाहिद’ में सुनील वोहरा ने वकील के रोल के लिए राजी कर लिया। वह एक दिन का काम था। केतन मेहता की ‘माउंटेन मैन’ में भी किया। केतन ने बुलाया तो ना नहीं कह सका। उनके साथअपनी पहली फिल्म ‘सरदार पटेल’ की थी। उनका बड़ा उपकार रहा है। ‘बुलेट राजा’ की शूटिंग से समय निकाल कर मैंने वह फिल्म की। दोस्ती में की गई फिल्मों के लिए पैसे नहीं लिए थे।
-अभी भी क्या दोस्ती और मुफ्त में काम कर रहे हैं?
0 नहीं, इधर पैसों की जरूरत महसूस हुई। सच कहूं तो एक्टिंग मेरी क्रिएटिव जरूरत नहीं है। फिल्मों में अपनी क्रिएटिविटी की हसरतें पूरी कर लेता हूं। जब ‘हीरो’ कर रहा था तो एहसास हुआ कि एक्टिंग भी की जा सकती है। अनुराग कश्यप के धारावाहिक तक यह खयाल नहीं आया था। वह धारावाहिक तो मैंने अमित जी की वजह से किया। यही सोचा कि पता नहीं कब उनके साथ कोई फिल्म बनाऊंगा। चलो इसी बहाने उनके साथ खड़ा होने का तो मौका मिलेगा। कहने को हो जाएगा कि मैंने अमिताभ बच्चन के साथ काम किया है। ‘हीरो’ में लडक़ी का पिता हूं। पॉजीटिव कैरेक्टर हूं। तमाम इमोशन हैं। मुझे लगा कि सभी सीरियसली ले रहे हैं। फिर ‘यारा’ हो गई। इसके बावजूद मैं बता रहा हूं कि कोई सेक्रेटरी वगैरह रख कर काम खोजने की कोशिश नहीं करूंगा। मेरा पहला काम रायटिंग और डायरेक्शन ही है।
-खुद को डायरेक्ट करना कितना आसान होगा? क्या कभी किसी नाटक में खुद के डायरेक्शन में एक्ट किया है आप ने?
0 नाटक में तो किया है। देखें फिल्म का अनुभव कैसा रहता है। अभी तो मानीटर वगैरह की सुविधा हो गई है। हिंदी फिल्मों में मनोज कुमार में डायरेक्टर-एक्टर का उम्दा कांबीनेशन देखता हूं। वे जबरदस्त शॉट टेकिंग करते थे। ‘मैं न भूलूंगा’ गाना ही देख लीजिए। मेरे लिए मुश्किल नहीं होगी। ‘यारा’ में दस दिनों का काम है, बस।
-क्या हम कभी आप को स्वयं के डायरेक्शन में मेनलीड में भी देख सकेंगे?
0 नहीं। ऐसा नहीं होगा। बतौर एक्टर तो बिल्कुल नहीं। स्क्रिन पर मैं खुद को अजीब लगता पसंद नहीं करता हूं। अजीब लगता हूं। ‘यारा’ के लिए मेहनत करनी है। वजन कम करना है। ज्यादा सेहतमंद दिखूंगा। लुक और मेकअप पर ध्यान दूंगा। अगस्त-सितंबर तक फिट हो जाऊंगा।
- ‘यारा’ के अलावा और कौन सी फिल्मों की योजना है? सुना है कि अभिषेक बच्चन के साथ भी कुछ कर रहे हैं?
0 उनके साथ बातचीत चल रही है। एक स्क्रिप्ट उन्हें पसंद आई है। हम लोग डायरेक्टर खोज रहे हैं। हो सकता है कि वह हम दोनों का को-प्रोडक्शन हो। अभिषेक के साथ और भी फिल्मों पर बात चल रही है। एक को तो मैं डायरेक्ट करूंगा।
- ‘मिलन टाकीज’ और ‘बेगम समरू’ किस स्टेज पर है?
0 ‘मिलन टाकीज’ बालाजी के साथ करनी है। अभी वे लोग व्यस्त हैं। मैं भी खाली नहीं हूं। अभी तक एक्टर फायनल नहीं हुए हैं। जल्दी ही कुछ फैसला होगा। उस फिल्म की स्क्रिप्ट सभी को पसंद आती है, लेकिन फिल्म शुरू नहीं हो पा रही है।
-आशा-निराशा के बीच किस्मत पर भरोसा बढ़ गया होगा?
0 मैं पहले किस्मत को मानता था। अब यकीन कम हो गया है। लगा कि गलतियां हमारे अंदर थीं। मैं जल्दी ही भरोसा कर लेता हूं और सभी से सहमत हो जाता हूं। वह मेरी पर्सनैलिटी की समस्या है। मैं तो समझ ही नहीं पाता कि सभी को कैसे संदेह से देखा जाए? अभी इंडस्ट्री का मजेदार फेज चल रहा है। उतार आया है तो चढ़ाव भी आएगा।

Friday, November 29, 2013

फिल्‍म समीक्षा : बुलेट राजा

Bullet Rajaदेसी क्राइम थ्रिलर 
-अजय ब्रह्मात्‍मज
तिग्मांशु धूलिया 'हासिल' से अभी तक अपनी फिल्मों में हिंदी मिजाज के साथ मौजूद हैं। हिंदी महज एक भाषा नहीं है। हिंदी प्रदेशों के नागरिकों के एक जाति (नेशन) है। उनके सोचने-विचारने का तरीका अलग है। उनकी संस्कृति और तहजीब भी थोड़ी भिन्न है। मुंबई में विकसित हिंदी सिनेमा की भाषा ही हिंदी रह गई है। संस्कृति, लोकाचार, बात-व्यवहार, परिवेश और प्रस्तुति में इसने अलग स्वरूप ले लिया है। प्रकाश झा, विशाल भारद्वाज, अनुराग कश्यप और तिग्मांशु धूलिया की फिल्मों में यह एक हद तक आ पाती है। तिग्मांशु धूलिया ने बदले और प्रतिशोध की अपराध कथा को हिंदी प्रदेश में स्थापित किया है। हालांकि मुंबइया सिनेमा (बॉलीवुड) के दुष्प्रभाव से वे पूरी तरह से बच नहीं सके हैं, लेकिन उनके इस प्रयास की सराहना और प्रशंसा करनी होगी। 'बुलेट राजा' जोनर के लिहाज से 'न्वॉयर' फिल्म है। हम इसे 'पुरबिया न्वॉयर' कह सकते हैं।
इन दिनों हिंदी फिल्मों में लंपट, बेशर्म, लालची और लुच्चे नायकों की भीड़ बढ़ी है। 'बुलेट राजा' के राजा मिसरा को गौर से देखें तो वह इन सब से अलग तेवर का मिडिल क्लास का सामान्य युवक है। वह 10 से 5 की साधारण नौकरी करना चाहता है, लेकिन परिस्थितियां ऐसे बनती हैं कि उसके हाथों में बंदूक आ जाती हैं। आत्मविश्वास के धनी राजा मिसरा के दिन-दहाड़े गोलीकांड से सभी आतंकित होते हैं। जल्दी ही वह प्रदेश के नेताओं की निगाह में आ जाता है। उनकी राजनीतिक छत्रछाया में वह और भी संगीन अपराध और हत्याएं करता है। एक स्थिति आती है कि उसकी हरकतों से सिस्टम को आंच आने लगती है। उसे हिदायत दी जाती है तो वह सिस्टम के खिलाफ खड़ा हो जाता है। राजा मिसरा आठवें दशक के एंग्री यंग मैन विजय से अलग है। वह आज का नाराज, दिग्भ्रमित और दिल का सच्चा युवक है। दोस्ती, भाईचारे और प्रेम के लिए वह जान की बाजी लगा सकता है।
राजा मिसरा के जीवन में दोस्त रूद्र और प्रेमिका हैं। इनके अलावा उसका मध्यवर्गीय परिवार भी है, जिसके लिए वह हमेशा फिक्रमंद रहता है। राजा मिसरा आठवें दशक के विजय की तरह रिश्तों में लावारिस नहीं है। रूद्र की हत्या का बदला लेने से जब उस रोका जाता है तो स्पष्ट कहता है, 'भाई मरा है मेरा। बदला लेने की परंपरा है हमारी। यह कोई कारपोरेट कल्चर नहीं है कि अगली डील में एडजस्ट कर लेंगे।' तिग्मांशु अपने फिल्मों के चरित्रों को अच्छी तरह गढ़ते हैं। इस फिल्म में ही रूद्र, सुमेर यादव, बजाज, मुन्ना और जेल में कैद श्रीवास्तव को उन्होंने हिंदी प्रदेश की समकालीन जिंदगी से उठा लिया है। शुक्ला, यादव और अन्य जातियों के नामधारी के नेताओं के पीछे कहीं न कहीं हिंदी प्रदेश के राजनीतिक समीकरण को भी पेश करने की मंशा रही होगी। तिग्मांशु का ध्येय राजनीति के विस्तार में जाना नहीं था। कई प्रसंगों में अपने संवादों में ही वे राजनीतिक टिप्पणी कर डालते हैं। अगर भाषा की विनोदप्रियता से वाकिफ न हों तो तंज छूट सकता है। मुंबई, कोलकाता और चंबल के प्रसंग खटकते हैं।
सैफ अली खान ने राजा मिसरा के किरदार में चुस्ती, फुर्ती और गति दिखाई है। अगर उनके बातों और लुक में निरंतरता रहती तो प्रभाव बढ़ जाता। उम्र और अनुभव से वे देसी किरदार में ढलते हैं। जिम्मी शेरगिल को कम दृश्य मिले हैं, लेकिन उन दृश्यों में ही वे अपनी असरदार मौजूदगी से आकर्षित करता है। सुमेर यादव की भूमिका में रवि किशन मिले दृश्यों में ही आकर्षित करते हैं। छोटी और महत्वपूर्ण भूमिकाओं में राज बब्बर, गुलशन ग्रोवर आदि अपनी भूमिकाओं के अनुकूल हैं। यहां तक कि चंकी पांडे को भी एक किरदार मिला है। सोनाक्षी सिन्हा बंगाली युवती के किरदार को निभा ले जाती हैं। विद्युत जामवाल का एक्शन दमदार है।
फिल्म का गीत-संगीत थोड़ा कमजोर है। देसी टच और पुरबिया संगीत की ताजगी की कमी महसूस होती है। 'तमंचे पर डिस्को' खास उद्देश्य को पूरा करता है और 'डोंट टच' में माही गिल का नृत्य बॉलीवुड के आयटम नंबर से प्रभावित है। इस फिल्म की खूबी परतदार पटकथा और स्थितिजन्य संवाद हैं।
अवधि: 138 मिनट 
**** चार स्‍टार 

Tuesday, July 30, 2013

मिली बारह साल पुरानी डायरी



कई बार सोचता हूं कि नियमित डायरी लिखूं। कभी-कभी कुछ लिखा भी। 2001 की यह डायरी मिली। आप भी पढ़ें। 

30-7-2001

      आशुतोष राणा राकेशनाथ (रिक्कू) के यहां बैठकर संगीत शिवन के साथ मीटिंग कर रहे थे। संगीत शिवन की नई फिल्म की बातचीत चल रही है। इसमें राज बब्बर हैं। मीटिंग से निकलने पर आशुतोष ने बताया कि बहुत अच्छी स्क्रिप्ट है। जुहू में रिक्कू का दफ्तर है। वहीं मैं आ गया था। रवि प्रकाश नहीं थे।
      आज ऑफिस में बज (प्रचार एजेंसी) की विज्ञप्ति आई। उसमें बताया गया था कि सुभाष घई की फिल्म इंग्लैंड में अच्छा व्यापार कर रही है। कुछ आंकड़े भी थे। मैंने समाचार बनाया बचाव की मुद्रा में हैं सुभाष घई। आज ही क्योंकि सास भी कभी बहू थीका समाचार भी बनाया।
      रिक्कू के यहां से निकलकर हमलोग सुमंत को देखने खार गए। अहिंसा मार्ग के आरजी स्टोन में सुमंत भर्ती हैं। उनकी किडनी में स्टोन था। ऑपरेशन सफल रहा, मगर पोस्ट ऑपरेशन दिक्कतें चल रही हैं। शायद कल डिस्चार्ज करें। अब हो ही जाना चाहिए? काफी लंबा मामला खिच गया।
      रास्ते में आशुतोष ने बताया कि वह धड़ाधड़ फिल्में साइन कर रहे हैं। कल उन्होंने आकाशदीप की और फिर एक दिनसाइन की। इस फिल्म में ढेर सारे कलाकार हैं। यह थ्रिलर फिल्म है। आशुतोष ने इसकी कहानी भी सुनाई।
      सुमंत के यहां से लौटते समय आशुतोष ने बताया कि वह मंदिरा के पिता कश्यप से मिल कर लौटेंगे। कश्यप भगत सिंह पर फिल्म बनाने की सोच रहे हैं, जिसमें चंद्रशेखर आजाद का रोल आशु को दिया जा रहा है। रवि प्रकाश ने उनसे कहा कि रोल के लिए हां मत कहिएगा। आशुतोष ने साफ कहा, ‘इतने पैसे मांगूंगा कि अंकल खुद ही राजी नहीं होंगे।
      बातचीत में कभी मुकेश तिवारी का भी जिक्र आया।

31-7-2001

      सुमंत को हास्पिटल से डिस्चार्ज करवा कर उनके घर पहुंचाने के लिए बारह बज खार रोड स्थित आरजी स्टोन पहुंचा। वहीं महेश भट्ट का फोन आया। वे कल दिल्ली में थे। प्रिय पाठकों के लिए उन्हें लेख लिखना था। बात हुई कि इस बार सुभाष घई पर लेख हो। सुभाष घई की फिल्म यादेंबेहतर पिट गई है। फिर भी उनका अहंकार खत्म नहीं हुआ है। महेश भट्ट ने कहा है कि वे सुभाष घई पर अवश्य लिखेंगे। शाम में उनका फिर से फोन आया कि उन्होंने लिख लिया है। कल ऑफिस में उनका फैक्स मिलेगा।
      महेश भट्ट सुभाष घई को शो मैन नहीं मानते। कैसा शो मैन और काहे का शो मैन। राजकुमार संतोषी की भी यही राय है। पिछले दिनों हैदराबाद में लज्जा  की शूटिंग के अंतिम चरणों में उनसे मुलाकात हुई। वह उर्मिला मातोंडकर पर आइटम सौंग आइए, आ जाइए, आजी जाइएकी शूटिंग कर रहे थे। रात में डिनर के बाद अनौपचारिक गपशप में उन्होंने कहा कि पत्रकारों और समीक्षकों को सुभाष घई का पर्दाफाश करना चाहिए। फिल्मफेयर की पत्रकार अनुराधा ने तब हां में हां मिलाया। उसी रात राम गोपाल वर्मा का भी जिक्र आया। रोम गोपाल वर्मा किस प्रकार खालिद मोहम्मत से नाराज चल रहे हैं। उसकी वजह क्या है? अनुराधा ने बताया कि हर फिल्म की रिलीज के समय राम गोपाल वर्मा के फोन आने लगते हैं। इस बार लव के लिए कुछ भी करेगा’ - निर्देशक ई निवास पर खालिद का रिव्यू देख कर रामू बहुत नाराज हुए हैं।

1 अगस्त 2001

      आज महेश भट्ट ने सुभाष घई पर लेख भेजा। इसमें उन्होंने जीवन चक्र की बात की है। बताया है कि सुभाष घई नाम का ब्रांड मर रहा है। यादेंकी विस्तृत चर्चा नहीं थी लेख में। महेश भट्ट अपने लेखों में धार का भ्रम पैदा करते हैं। वे गहरे विश्लेषण में नहीं उतरते। उनके पास एक खास दृष्टि है। एक दर्शन भी है। यह उन्हें रजनीश और कृष्णमूत्र्ति की संगत से मिली है। मुझे लगता है कि वे या तो जल्दबाजी में रहते हैं या फिर कई फ्रंट पर एक साथ व्यस्त हैं।
      शाम में कर्मा फिल्म्स प्रेस कांफ्रेंस था। विजय जिंदल ने जी टीवी के साथ मिलकर इसका गठन किया है। यह छोटी फिल्में बनाएगा। पहली फिल्म तिग्मांशु धूलिया की हासिलहै। इसमें जिम्मी शेरगिल और रिशित भट्ट के साथ इरफान और आशुतोष राणा हैं। विजय जिंदल पहले जी टीवी में थे। वहां से निकलने के बाद कुछ समय तक बाहर रहे और अब यह काम - फिल्म निर्माण का। उन्होंने कारपोरेट संस्कृति की बात की है। वह मानते हैं कि फिल्म निर्देशक भी फिल्म का सीइओ होताहै। इस संबंध में पूछने पर तिग्मांशु ने जवाब दिया - निश्चित समय में फिल्म पूरी करना भी एक जिम्मेदारी है। यह जिम्मेदारी बगैर सीइओ का रूख अपराए नहीं निभाई जा सकती।
      तिग्मांशु की फिल्म हासिलकैंपस की पृष्ठभूमि में है। इसमें इलाहाबाद का बैकड्रॉप है। इसे प्रेमकहानी के तौर पर बना रहे हैं तिग्मांशु। उनका इरादा कभी खुशी कभी गमसे टकराने का है। उनकी लगन देखकर लगता है कि वह अवश्य कुछ कर लेंगे।
      इरफान ने बताया कि उन्होंने टीवी का काम बंद कर दिया है। मुझे याद आता है कि जब मैं मुंबई आया था तो गोविंद निहलानी की फिल्म दृष्टिमें वह डिंपल कपाडिय़ा के साथ दिखे थे। कुछ समांतर फिल्में भी की, लेकिन बाद में टीवी में व्यस्त हो गए। अभी फिर से फिल्म में सक्रिय हो रहे हैं।

Thursday, May 2, 2013

21वीं सदी का सिनेमा



-अजय ब्रह्मात्मज

            समय के साथ समाज बदलता है। समाज बदलने के साथ सभी कलारूपों के कथ्य और प्रस्तुति में अंतर आता है। हम सिनेमा की बात करें तो पिछले सौ सालों के इतिहास में सिनेमा में समाज के समान ही गुणात्मक बदलाव आया है। 1913 से 2013 तक के सफर में भारतीय सिनेमा खास कर हिंदी सिनेमा ने कई बदलावों को देखा। बदलाव की यह प्रक्रिया पारस्परिक है। आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक बदलाव से समाज में परिवर्तन आता है। इस परिवर्तन से सिनेमा समेत सभी कलाएं प्रभावित होती हैं। इस परिप्रेक्ष्य में हिंदी सिनेमा को देखें तो अनेक स्पष्ट परिवर्तन दिखते हैं। कथ्य,श्ल्पि और प्रस्तुति के साथ बिजनेस में भी इन बदलावों को देखा जा सकता है। हिंदी सिनेमा के अतीत के परिवर्तनों और मुख्य प्रवृत्तियों से सभी परिचित हैं। मैं यहां सदी बदलने के साथ आए परिवर्तनों के बारे में बातें करूंगा। 21वीं सदी में सिनेमा किस रूप और ढंग में विकसित हो रहा है?
            सदी के करवट लेने के पहले के कुछ सालों में लौटें तो हमें निर्माण और निर्देशन में फिल्म बिरादरी का स्पष्ट वर्चस्व दिखता है। समाज के सभी क्षेत्रों की तरह फिल्मों में भी परिवारवाद चलता है। कहा जाता है कि फिल्म बिरादरी एक दूसरे की मदद करने में आगे रहती है, लेकिन जब भी कोई बाहरी प्रतिभा इस बिरादरी में शामिल होना चाहती है तो एक अनकहा प्रतिरोध होता है। बाहर से आई प्रतिभाओं को दोगुनी-तिगुनी मेहनत करनी पड़ती है। अपनी जगह और पहचान बनाने में उन्हें तिरस्कार और अपमान भी झेलने पड़ते हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के गलियारे में जाने कहां-कहां से चले आते हैं?’  की झुंझलाहट भरी प्रतिध्वनि अक्सरहां सुनाई पड़ती है।
            21वीं सदी के पहले सूरज बडज़ात्या, आदित्य चोपड़ा और करण जौहर की तिगड़ी ने हिंदी सिनेमा को खास ढंग से विकसित किया। उन्होंने इसे संभ्रांत और आभिजात्य वर्ग के सिनेमा के रूप में बढ़ाया। भव्य चमकदार सेट और उनसे भी भव्य भाव भंगिमा के किरदारों के साथ उन्होंने ऐसा फील गुडसिनेमा रचा, जिसका आम दर्शक से सीधा ताल्लुक नहीं था। अपने ही देश के दर्शकों से कटा यह सिनेमा मुख्य रूप से आप्रवासी भारतवंशियों के मनोरंजन के लिए तैयार किया जा रहा था। ध्येय के अनुरूप इन फिल्मों का बिजनेस भी हो रहा था। कुछ इतिहासकारों ने इस सिनेमा को डॉलर सिनेमाया एनआरआई सिनेमाका भी नाम दिया। इस ससिनेमा ने देसी दर्शकों को रिक्त और बहिष्कृत कर दिया। कुछ फिल्मकार तो दंभी के साथ कहने लगे थे कि हम चवन्नी छाप या हिंदी प्रदेश के दर्शकों के लिए फिल्में नहीं बनाते। गौर करें तो यह वही दौर था जब हिंदी सिनेमा के मुख्य दर्शकों ने मनोरंजन के विकल्प के रूप में भोजपुरी सिनेमा को चुना। हम ने देखा कि भोजपुरी सिनेमा में तेजी से उभार आया। इसी दौर में मल्टीप्लेक्स संस्कृति की वजह से हिंदी सिनेमा का अखिल भारतीय स्वरूप खंडित हुआ। फिलमें पूरे भारत में सफल होनी बंद हो गईं। माना गया कि मल्टीप्लेक्स के दर्शकों का सिनेमा अलग होता है और पारंपरिक सिंगल स्क्रीन के दर्शकों का सिनेमा अलग होता है। सिनेमा की समझ के इस विभाजन से वास्तव में हिंदी फिल्मों का भारी नुकसान किया।
            दूसरी तरफ हिंदी फिल्मों में आ रही जड़ता और एकरसता को कुछ फिल्मकार महसूस कर रहे थे। वजह यह भी थी कि ग्लोबल गांव के दौर में आम दर्शक भी घिसी पिटी और फाूर्मला फिल्मों से ऊब चुका था। कॉमेडी और एक्शन के नाम पर परोसी जा रही फूहड़ फिल्मों से मनोरंजन की उसकी भूख नहीं मिट रही थी। वह चालू किस्म की फिल्मों को लगातार रिजेक्ट कर रहा था। संक्रांति के इस  पल में आमिर खान ने पहल की। अपने मित्र आशुतोष गोवारीकर की नायाब स्क्रिप्ट पसंद करने के साथ उसके निर्माण का भी उन्होंने फैसला लिया। आमिर खान अभिनीत लगानहिंदी फिल्मों के इतिहास में मील का स्तंभ कही जा सकती है। इस फिल्म ने हिंदी फिल्मों की दशा, दिशा और राह बदल दी। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में व्याप्त आलस्य और भ्रष्टाचार खत्म हुआ। निर्माता और अभिनेता एक शेड्यूल में फिल्म पूरी करने के लिए जागृत हुए। इस परिवर्तन से फिल्म निर्माण के साथ उसकी मार्केटिंग भी बदली। अंग्रेजों के अत्याचार से दबी जनता की इस फिल्म में चित्रित लड़ाई और जीत ने दर्शकों को आनंदित किया। इन दिनों दो घंटे से अधिक अवधि की फिल्म को लंबी फिल्म कहा जाता है। कहा जाता है कि दर्शक ऊब जाते हैं, जबकि लगानपौने चार घंटे की फिल्म थी। लगानका हीरो भुवन अकेले नहीं लड़ता। वह एक समूह का नेतृत्व करता है। यह समूह ही टीम भावना के साथ खेल के मैदान में डटती और जीत हासिल करती है।
             पिछले 13 सालों में फिल्म इंडस्ट्री में देश के सुदूर इलाकों से अनेक निर्देशकों और तकनीशियनों ने सफलता पाई है। पहले के दशकों में ऐसा कभी नहीं हुआ। हां, आजादी के बाद जब मुंबई हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का केन्द्र बनी तो अवश्य कोलकाता, लाहौर और दक्षिण से अनेक लेखकों और निर्देशकों ने मुंबई का रुख किया। उनकी सांस्कृतिक और सामाजिक भिन्नता ने ही हिंदी फिल्मों को समृद्ध किया। इस दौर में लेखन,निर्देशन,गीत-संगीत सभी क्षेत्रों में सृजनात्मक निनिधता और कलात्मकता दिखाई और सुनाई पड़ती है। आज हम उस दौर को हिंदी सिनेमा के स्वर्ण युग के नाम से जानते हैं।
         बाहर से आई प्रतिभाओं का वैसा ही योगदान पिछले डेढ़ दशकों में दिखा है। बाजार की भाषा में इसे धोनी प्रभाव कहा जा रहा है। धोनी प्रभाव का सीधा तात्पर्य है कि अब किसी भी क्षेत्र में अवसर बड़े शहरों के नागरिकों तक ही सिमटे नहीं रह सकते। देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था ने समाज को इस रूप में विकसित किया है कि छोटे और मझोले शहरों की प्रतिभाएं अपने क्षेत्रों में हक से जगह बना रही हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में प्रतिभाओं के इस प्रवाह ने परविारवाद के बांध को तोड़ दिया है। पिछले कुछ सालों में आई फिल्मों को ही देख लें तो पाएंगे कि फिल्म इंडस्ट्री से आए फिल्मकार ज्यादातर रीमेक और सीक्वल फिल्में बना रहे हैं, जब कि बाहर से आए निर्देशक नई कहानियों से फिल्मों का खजाना भर रहे हैं।
            राजकुमार हिरानी से लेकर व्रिक्रमादित्य मोटवाणी तक ऐसी प्रतिभाओं की लंबी सूची है। इम्तियाज अली, अनुराग कश्यप, अनुराग बसु, विशाल भारद्वाज, तिग्मांशु धूलिया, सुजीत सरकार, हबीब फैजल, सुजॉय घोष आदि ने हिंदी फिल्मों का कंटेंट बदल दिया है। इन सभी की फिल्मों में जिंदगी के ताजा और विविध अनुभव हैं, जबकि फिल्म इंडस्ट्री के स्थापित फिल्मकारों की फिल्मों में पुरानी फिल्मों के ही रेफरेंस पाइंट मिलते हैं। उल्लेखनीय है कि इन फिल्मकारों को एक दो सालों में यह सफलता और पहचान नहीं मिली है। उनकी इस पहचान के पीछे लंबा संघर्ष और कामयाब होने की जिद है। आज दमक रही इन प्रतिभाओं के बायोडाटा को ही पढ़ लें तो पाएंगे कि सभी ने इस मुकाम तक पहुंचने में कम से कम दस साल बिताए। आरंभिक असफलताओं और तिरस्कार से उन्होंने हार नहीं मानी। इन प्रतिभाओं के संघर्ष की प्रतिनिधि कथा अनुराग कश्यप के प्रयास से समझी जा सकती है। टीवी लेखन से उनका करिअर आरंभ हुआ। पहला बड़ा मौका राम गोपाल वर्मा की सत्यामें मिला। उसके बाद उन्होंने पांचनिर्देशित की तो उसे अनेक कारणों से रिलीज नहीं मिल सकी। हताशा के उन सालों में भी अनुराग अपने दोस्तों के साथ सक्रिय रहे। उन्हें देव डीऔर गुलालसे पहचान मिली, जबकि ब्लैक फ्रायडेवह काफी पहले बना चुके थे।
        कमोबेश सभी युवा निर्देशकों को अनुराग कश्यप जैसा ही संघर्ष करना पड़ा। केवल राजकुमार हिरानी ही इस समूह के अकेले सफल फिल्मकार है, जिनकी पहली फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएसको कामयाबी और सराहना मिली। पिछले साल की सफल और प्रशंसित फिल्मों पर ध्यान दें तो पाएंगे कि उन्हें ही नेशनल अवार्ड मिले हैं। तिग्मांशु धूलिया की फिल्म पान सिंह तोमरएक मिसाल है। वगैर लोकप्रिय स्टार के बनी इस फिल्म का नायक एक धावक था, जो सामाजिक अत्याचार और प्रशासन की उदासीनता से डकैत बन गया। कैसी विडंबना है कि जिस पान सिंह तोमर की समाज ने उपेक्षा की थी, उसी के जीवन पर मिली फिल्म को समाज ने सराहा और पुरस्कृत किया। सुजॉय घोष की कहानीकी एक अलग कहानी है। इस फिल्म को विद्या बालन ने अपने कंधों पर खींचा और बाक्स आफिस पर सफलता दिलाई। विद्या बालन की कामयाबी समाज में हुए नारी उत्थान का ही प्रतिफल  और रेखांकन है। हिंदी फिल्मों की कामयाबी का श्रेय पूरा हीरो को मिलता रहा है, लेकिन विद्या बालन की कामयाबी सोच और समाज में आए बदलाव का संकेत देती है। पिछले साल ही सुजीत सरकार की विकी डोनरभी आई थी। इस फिल्म की नवीनता ने दर्शकों को चौंकाया। नए कलाकार थे। फिल्म के हीरो आयुष्मान खुराना की गायकी और अदयगी का जलवा हम सभी ने देखा और सुना।
             स साल सुभाष कपूर की जॉली एलएलबीकी सफलता और साजिद खान की हिम्मतवालाकी असफलता दर्शकों की बदलती रुचि और रुझान को स्पष्ट कर देती है। भारी प्रचार और स्टारों के बावजूद हिम्मतवालाको दर्शक नकार देते हैं,जबकि सीमित बजट की देसी फिल्म जॉली एलएलबीको वे हाथोंहाथ लेते हैं। यह अनोखा संयोग है कि जॉली एलएलबीके जज त्रिपाठी के पर्दे पर लिए जागरूक फैसले के बाद वास्तविक जिंदगी में सालों से अटके मामलों के फैसले आने लगे हैं। 



Tuesday, May 22, 2012

कुछ बदल तो रहा है...

 
-अजय ब्रह्मात्‍मज 

    सिनेमा के लोकतंत्र में वही पॉपुलर होता है, जिसे दर्शक और समीक्षक पसंद करते हैं। ऑब्जर्वर और उपभोक्ताओं की संयुक्त सराहना से ही सिनेमा के बाजार में प्रतिभाओं की पूछ, मांग और प्रतिष्ठा बढ़ती है। हमेशा से जारी इस प्रक्रिया में केंद्र में मौजूद व्यक्तियों और प्रतिभाओं की स्थिति ज्यादा मजबूत होती है। परिधि से केंद्र की ओर बढ़ रही प्रतिभाओं में से अनेक संघर्ष, धैर्य और साहस की कमी से इस चक्र से बाहर निकल जाते हैं, लेकिन कुछ अपनी जिद्द और मौलिकता से पहचान और प्रतिष्ठा हासिल करते हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की बात करें तो यहां बाहर से आई प्रतिभाओं ने निरंतर कुछ नया और श्रेष्ठ काम किया है। हिंदी फिल्मों को नया आयाम और विस्तार दिया है। वे परिवत्र्तन लाते हैं। हालांकि यह भी सच है कि नई प्रतिभाएं कालांतर में एक नया केंद्र बनती है। फिर से कुछ नए परिधि से अंदर आने की कोशिश में जूझ रहे होते हैं।
    21वीं सदी के आरंभिक वर्षो से ही हम देख रहे हैं कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में देश के सुदूर इलाकों से आई प्रतिभाएं लगातार दस्तक दे रही हैं। उनमें से कुछ के लिए दरवाजे खुले। अब वे सफलता के मुकाम पर पहुंचती नजर आ रही हैं। इधर की तीन खबरों से नई प्रतिभाओं की सार्थक मौजूदगी की पुष्टि होती है। सबसे पहले कान फिल्म समारोह के विभिन्न खंडों में अनुराग कश्यप की तीन फिल्मों का चयन। लगभग सभी जानते हैं कि अनुराग कश्यप की पहली फिल्म ‘पांच’ अभी तक रिलीज नहीं हो पाई है, लेकिन इस दुद्र्धर्ष फिल्मकार ने हार नहीं मानी। ‘गुलाल’ और ‘देव डी’ से मिली पहचान के बाद उनकी स्थिति एक हद तक सुरक्षित और मजबूत हुई। इस बार कान फिल्म समारोह में उनकी निर्देशित ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ (दो खंड) और निर्मित ‘पेडलर्स’ चुनी गई है। यह कोई छोटी खबर नहीं है, फिर भी फिल्म इंडस्ट्री की उदासीनता हैरत में डालती है। फिल्म इंडस्ट्री की छोटी-मोटी इंटरनेशनल उपलब्धियों पर ट्विट और टिप्पणियों की बारिश करने वाले भी खामोश हैं। ऐसा लगता है कि इस खबर से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के कान पर जूं तक नहीं रेंगा है। यह उदासीनता और निरपेक्षता भयावह है, लेकिन युवा प्रतिभाएं डरने और निराश होने के बजाए अपने तई जूझती और लड़ती रहती हैं।
    दूसरी खबर है कि दिबाकर बनर्जी की फिल्म ‘शांघाई’ का सिंगापुर में आयोजित आईफा अवार्ड में प्रीमियर होगा। अभी तक आईफा में स्टारों से लक-दक फिल्में ही प्रीमियर होती रही हैं। कोशिश रहती है कि फिल्म इंडस्ट्री के किसी बड़े निर्देशक, बैनर या स्टार को उपकृत किया जाए। इस बार दिबाकर बनर्जी की ‘शांघाई’ चुन कर आईफा के अधिकारियों ने फिल्म इंडस्ट्री में आ रहे बदलाव को स्वीकार किया है। पहचान की ऐसी मोहरों की अपनी महत्ता होती है।
    तीसरी खबर है कि करीना कपूर युवा निर्देशक तिग्मांशु धूलिया की फिल्म करने के लिए आतुर हैं। पिछले दस सालों से फिल्म इंडस्ट्री में सक्रिय तिग्मांशु धूलिया को आखिरकार ‘पान सिंह तोमर’ की कामयाबी से पहचान मिली। अभी उनके सारे प्रोजेक्ट आरंभ हो रहे हैं। कारपोरेट हाउस को उनमें संभावनाएं दिख रही हैं और स्टारों को उनकी प्रतिभा का एहसास हुआ है। सुना है कि उनकी आगामी फिल्मों में से एक ‘बेगम समरू’ को लेकर करीना कपूर बहुत उत्साहित हैं।
    तात्तपर्य यह है कि जड़ीभूत फिल्म इंडस्ट्री में कुछ बदल रहा है। यह बदलाव महत्वपूर्ण है। इस बदलाव से फिल्म इंडस्ट्री में ताजगी आएगी। दर्शकों को भी कुछ नया देखने को मिलेगा। ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’, ‘शांघाई’ और निर्माणाधीन ‘बेगम समरू’ निश्चित ही इस बदलाव में मील के पत्थर साबित होंगे।
    गहरी और लंबी अंधेरी रात के बाद पौ फट रहा है।