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इरशाद कामिल से सचिन श्रीवास्‍तव की बातचीत

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एक इनसान के बनने में जिस ईंट-गारे का इस्तेमाल होता है, वह यकीनन सारी उम्र अपना असर दिखाता है। यह बात नई सदी के हिंदी फिल्मों के गीतों को दार्शनिक ऊंचाई, रूमानी सुकून और विद्राही तेवर बख्शने वाले कलमकार इरशाद कामिल को जानने के बाद फिर साबित होती है। पंजाबी खुशी और इश्क की मस्ती में पले-बढ़े इरशाद के भरपूर इनसान बनने में आठवें दशक की नफरत, अवतार सिंह पाश के विद्रोह, शिवकुमार बटालवी के दर्द का गारा है, तो बचपन की दोस्ती की शरारतों और आवारा-मिजाजी की ईंटें भी हैं। जाहिर है यह सब कुछ उनके लेखन में अनायास ही दिखाई देता भी है। इरशाद को महज गीतकार कहना, एक ऐसी नाइंसाफी है, जिसे करने का गुनाह नाकाबिले मुआफी है। गीत उनके लेखन की महज एक विधा है, जो लोकप्रिय हो गई है, लेकिन असल में वे एक कलाकार हैं, जो खुद को बयां करने के हर औजार को, हर विधा को आजमाना चाहता है। दिलचस्प यह कि वे कई रचनात्मक विधाओं में पारंगत भी हैं। इरशाद कामिल से सचिन श्रीवास्तव ने मुलाकात के दौरान अनौपचारिक बातचीत की। इसके प्रमुख अंश... 


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