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Tuesday, September 17, 2019

संडे नवजीवन : हिंदी दर्शक.साहो और प्रभास


संडे नवजीवन
हिंदी दर्शक.साहो और प्रभास
-अजय ब्रह्मात्मज
एस राजामौली की फिल्म बाहुबली से विख्यात हुए प्रभास की ताजा फिल्म साहो’  को दर्शकों-समीक्षकों की मिश्रित प्रतिक्रिया मिली है. यह फिल्म अधिकांश समीक्षकों को पसंद नहीं आई, लेकिन फिल्म ने पहले वीकेंड में 79 करोड़ से अधिक का कलेक्शन कर जता दिया है कि दर्शकों की राय समीक्षकों से थोड़ी अलग है. ‘साहो’ का हिंदी संस्करण उत्तर भारत के हिंदी दर्शकों के बीच लोकप्रिय हुआ है. अगर यह फिल्म तेलुगू मलयालम और तमिल में नहीं होती. पूरे भारत में सिर्फ हिंदी में रिलीज हुई होती तो वीकेंड कलेक्शन 100 करोड़ से अधिक हो गया होता. वैसे तेलुगू,हिंदी,तमिल और मलयालम का कुल कलेक्शन मिला दें तो फिल्म की कमाई संतोषजनक कही जा सकती है.
बाहुबली के बाद प्रभास देश भर के परिचित स्टार हो गए. फिर साहो’ की घोषणा हुई और एक साथ चार भाषाओं में इसके निर्माण की योजना बनी. तभी से दर्शकों का उत्साह नजर आने लगा था. इस फिल्म के निर्माण के पीछे एक अघोषित मकसद यह भी रहा कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में प्रभास के प्रयाण को सुगम बनाया जाए. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से जैकी श्रॉफ और श्रद्धा कपूर को इसी उद्देश्य से फिल्म में जोड़ा गया. बड़े पैमाने पर बन रही इस फिल्म के एक्शन की चर्चा पहले से आरंभ हो गई थी. रिलीज के समय प्रभास और श्रद्धा कपूर की रोमांटिक छवि आई तो कन्फ्यूजन हो गया. खुद प्रभास ने भी रिलीज के समय प्रमोशन के दौरान लगातार इसकी लागत और एक्शन पर हुए खर्च की बात की. सभी दर्शक जानते हैं कि 350 करोड़ की लागत से बनी इस फिल्म में 150 करोड़ तो सिर्फ एक्शन पर खर्च हुआ है. यह अलग मुद्दा है कि क्या अधिक लागत से फिल्म बेहतरीन हो जाती है?
दर्शकों को यही भ्रम होगा कि ‘साहो’ की लागत 350 करोड़ है. किसी भी इंटरव्यू में न तो प्रभास ने बताया और ना ही किसी पत्रकार ने स्पष्ट किया कि 350 करोड़ में चार भाषाओं में यह फिल्म बनी है. इस हिसाब से प्रति फिल्म लागत 87.5 करोड़ ठहरती है. आजकल थोड़ी बड़ी फिल्म के लिए इतनी लागत तो आम बात है. बहरहाल, 350 करोड़ की लागत से बनी यह फिल्म प्रभास की ‘बाहुबली’ की लोकप्रियता का सहारा लेकर रिलीज की गई. दर्शकों को ‘बाहुबली 1-2’ के प्रभास याद रहे. उन्होंने इस फिल्म के हिंदी संस्करण को समर्थन दिया. हिंदी में यह फिल्म मेट्रो शहरों और मल्टीप्लेक्स से अधिक छोटे शहरों और सिंगल स्क्रीन में चल रही है. इसके बावजूद यह नहीं कहा जा सकता कि हिंदी फिल्मों इन्दुस्त्र खुली बाँहों से प्रभास का स्वागत करने के लिए तैयार है.
बहुत पीछे ना जाएँ तो भी याद कर लें कि तेलुगू फिल्म इंडस्ट्री से चिरंजीवी, नागार्जुन और पवन कल्याण ने हिंदी फिल्मों में पहले दस्तक दी है. इनमें चिरंजीवी और नागार्जुन की खास पहचान भी बनी है, लेकिन इनमें से कोई अभी तक हिंदी दर्शकों के बीच तमिल फिल्म इंडस्ट्री के स्टार रजनीकांत और कमल हसन जैसी ऊंची लोकप्रियता नहीं छू सका. बाद में रामचरण और राना डग्गुबाती भी हिंदी फिल्मों में आए. तेलुगू समेत सभी दक्षिण भारतीय भाषाओं के फेमस कलाकार अपनी लोकप्रियता और प्रतिष्ठा के विस्तार के लिए हिंदी फिल्मों में कदम रखते हैं. इससे उन्हें अखिल भारतीय पहचान मिलती है. उम्मीद थी कि प्रभास के आगमन की धमक हिंदी फिल्म इंडस्ट्री महसूस करेगी, लेकिन ऐसा कोई हंगामा नहीं हुआ. फिल्म की रिलीज से पहले या बाद में प्रभास की किसी हिंदी फिल्म की घोषणा नहीं हुई है. ‘साहो’ से उनकी लोकप्रियता में कोई खास इजाफा भी नहीं हो सका. ‘बाहुबली’ से मिली पहचान ही बनी हुई है.
वास्तव में ‘बाहुबली’ के पहले प्रभास को बड़ी कामयाबी नहीं मिली थी. सन 2002 में वह ‘ईश्वर’ में दिखे थे, लेकिन उस फिल्म पर किसी का ध्यान नहीं दिया था. तीसरी फिल्म ‘वर्षम’ से उन्हें थोड़ी पहचान मिली. इस फिल्म से ‘बाहुबली’ तक के सफर में प्रभास की सफलता का अनुपात कम ही रहा है. उनकी एक फिल्म हिट हो जाती थी और फिर अगली हिट के पहले तीन-चार फिल्में फ्लॉप हो जाती थीं. हां, एक अच्छी बात रही कि उनकी हिट फिल्मों ने हमेशा नए रिकॉर्ड बनाए. तेलुगू के मशहूर डायरेक्टर एस राजामौली और पूरी जगन्नाथ के साथ कुछ फिल्मों में उन्हें बड़ी कामयाबी मिली. उन्हीं दिनों उनकी फिल्म ‘डार्लिंग’ आई थी. इस फिल्म में उनका किरदार दर्शकों को इतना पसंद आया कि उन्होंने प्रभास को ‘डार्लिंग स्टार’ का नाम दे दिया. तेलुगू फिल्म इंडस्ट्री में लोकप्रिय मेल स्टारों को ‘मेगा पावर स्टार’,’स्टाइलिश स्टार’ और ‘पॉवर स्टार’ जैसे नाम मिले हैं. प्रभास को ‘डार्लिंग स्टार’ के नाम से लोग जानते हैं.
कह सकते हैं कि 10 जुलाई 2015 से प्रभास की जिंदगी और फिल्म कैरियर में बड़ा बदलाव आया. ‘बाहुबली - द बिगिनिंग’ रिलीज़ हुई और प्रभास की राष्ट्रीय पहचान की शुरुआत हुई. इस फिल्म ने प्रभास के धैर्य और त्याग की भी परीक्षा ली थी. एस राजामौली ने उन्हें निर्देश दिया था कि ‘बाहुबली’ के दोनों भाग प्रदर्शित होने तक वे कोई और फिल्म नहीं करेंगे और ना श्री व् लुक में कोई बदलाव करेंगे. इन दोनों फिल्मों के निर्माण में 5 साल लगे. फिल्म इंडस्ट्री में जहां हर शुक्रवार को स्टार के भाग्य और भविष्य बदल जाते हैं, वहां प्रभास ने 5 सालों का समय सिर्फ एक फिल्म के लिए समर्पित कर दिया था. इस समर्पण का उन्हें भरपूर लाभ मिला. वह राष्ट्रीय पहचान के साथ उभरे. याद करें तो ‘साहो’ की घोषणा के समय से ही हिंदी के दर्शकों के बीच उनके प्रयास और अवतार को देखने इंतजार बढ गया था.
‘साहो’ के प्रमोशन के दौरान प्रभास ने संकेत तो दिया था कि मुंबई के दो-तीन निर्माताओं के साथ हिंदी फिल्मों के लिए बातें चल रही हैं,लेकिन निर्माताओं या फिल्मों के नाम नहीं बताये थे. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का अनोखा रिवाज है. किसी बड़ी संभावना की भनक लगते ही निर्माता नए सितारों से मिलने-मिलाने लगते हैं. उनसे नए प्रोजेक्ट की सहमति ले लेते हैं. उन्हें एडवांस और साइनिंग के तौर पर एक राशि भी दे दी जाती है. संभावना को सफलता मिली तो सब कुछ आरंभ हो जाता है, अन्यथा निर्माता पुरानी संभावना को भूल जाते हैं. अभी तक तो प्रभास की किसी फिल्म की अधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन ट्रेड विशेषज्ञ बताते हैं कि हिंदी या तेलुगू फिल्म का कोई निर्माता द्विभाषी पर विचार कर सकता है. ‘सहो’ का ही सन्दर्भ लें तो यह फिल्म हिंदी से बेहतर कमाई तेलुगू में कर रही है. दो भाषाओं के दर्शकों के बीच लोकप्रिय स्टार पर कोई भी निर्माता दांव लगाने को तैयार हो जायेगा.
‘बाहुबली’ में प्रभास के हिंदी संवाद शरद केलकर ने डब की थी. ‘साहो’ में उन्होंने अपने संवाद खुद बोले. उनकी हिंदी में तेलुगू का लहजा है.. जैसे कमल हसन की हिंदी में तमिल का लहजा रहता है. दर्शकों को इससे अधिक फर्क नहीं पड़ता बशर्ते उनका मनोरंजन हो रहा हो. प्रभास ने ‘साहो’ में सही उच्चारण के साथ हिंदी बोलने के लिए डायलॉग कोच भी रखा था. कमाल अहमद ने उनकी मदद की थी. अब यह देखना रोचक होगा कि हिंदी फिल्मों के उभरते लोकप्रिय सितारों के बीच प्रभाव हिंदी फिल्मों के आकाश में कैसे अपनी जगह बना पाते हैं?


Sunday, September 1, 2019

संडे नवजीवन : घर-घर में होगा फर्स्ट डे फर्स्ट शो


संडे नवजीवन
घर-घर में होगा फर्स्ट डे फर्स्ट शो
-अजय ब्रह्मात्मज

सिनेमा देखने का शौक बहुत तेजी से फैल रहा है. अब जरूरी नहीं रह गया है कि सिनेमा देखने के लिए सिनेमाघर ही जाएँ. पहले टीवी और बाद में वीडियो के जरिए यह घर-घर में पहुंचा. और फिर मोबाइल के आविष्कार के बाद यह हमारी मुट्ठी में आ चुका है. उंगलियों के स्पर्श मात्र से हमारे स्मार्ट फोन पर फिल्में चलने लगती है. वक्त-बेवक्त हम कहीं भी और कभी भी सिनेमा देख सकते हैं. एक दिक्कत रही है कि किसी भी फिल्म के रिलीज के दो महीनों (कम से कम 8 हफ्तों) के बाद ही हम घर में सिनेमा देख सकते हैं. पिछले दिनों खबर आई कि अब दर्शकों को आठ हफ्तों का इंतजार नहीं करना होगा. अगर सब कुछ योजना के मुताबिक चलता रहा तो बगैर सिनेमाघर गए देश के दर्शक ‘फर्स्ट डे फर्स्ट शो’ देख सकेंगे.
पिछले दिनों जियो टेलीकॉम के सर्वेसर्वा ने अपनी कंपनी की जीबीएम में घोषणा कर दी कि 2020 के मध्य तक वे अपने उपभोक्ताओं को ‘फर्स्ट डे फर्स्ट शो’ की सुविधा दे देंगे. दरअसल, जियो ब्रॉडबैंड की विस्तार योजनाओं की दिशा में यह पहल की जा रही है. दावा है कि पूरी तरह से एक्टिव होने के बाद जियो ब्रॉडबैंड अपने उपभोक्ताओं को बेहिसाब फिल्में देखने की सुविधा देगा. इसमें सबसे बड़ी सुविधा ‘फर्स्ट डे,फर्स्ट शो’ की होगी. हम सभी जानते हैं कि देश में सिनेमाघरों की संख्या लगातार कम हुई है. इससे संबंधित चिंताएं और बहसें तो सुनने को मिलती हैं, लेकिन टूट रहे सिंगल स्क्रीन की भरपाई नहीं हो पा रही है. शहरों में मेट्रो में मल्टीप्लेक्स तो हैं, लेकिन उनके प्रवेश दर(टिकट) इतने महंगे हैं कि आम दर्शक चाहने के बावजूद फिल्में नहीं देख पाते. नतीजा यह होता है कि वे फिल्में देखने के अवैध तरीकों का उपयोग करते हैं छोटे शहरों और कस्बों की तो वास्तविक मजबूरी है. बड़ी से बड़ी फिल्में भी छोटे शहरों और कस्बों में नहीं पहुंच पाती. उन्हें अपने आसपास के जिला शहरों में जाकर फ़िल्में देखनी पड़ती है. जाहिर सी बात है कि यात्रा व्यय की वजह से इन फिल्मों को देखने का खर्च बढ़ जाता है. ऐसी स्थिति में ज्यादातर दर्शक 10-20 रुपयों पायरेटेड फिल्म खरीदते हैं और आपस में बांटकर देखते हैं.
मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु जैसे मेट्रो शेरोन में भी फिल्म की रिलीज के दिन ही लोकल ट्रेन, मेट्रो ट्रेन और पब्लिक ट्रांसपोर्ट में सफर कर रहे शहरी आराम से मोबाइल पर ताजा फिल्में देख रहे होते हैं. वेरोक यह सब चल रहा है. फिर भी निर्माताओं के लिए थिएटर बहुत बड़ा सहारा है. फिल्मों के हिट-फ्लॉप का पैमाना बॉक्स ऑफिस ही है. फिक्की की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक 2018 में भारतीय फिल्मों का कुल कारोबार 175 अरब अमेरिकी डॉलर था, जिसमें से 75% कमाई थिएटर के जरिए आई थी. पिछले कुछ सालों में डिजिटल प्लेटफॉर्म तेजी से बढ़े हैं; दर्शकों की फिल्म देखने की प्रवृत्ति में बदलाव आ रहा है. इसके अलावा कुछ दर्शकों के लिए परदे का आकार ज्यादा मायने नहीं रखता. वे सिंपल मोबाइल के रसीदी टिकट साइज के परदे पर भीफिल्म देखने का आनंद उठा लेते हैं. इन सबके लिए ‘फर्स्ट डे,फर्स्ट शो’ किसी लॉटरी से कम नहीं होगी.
पिछले दिनों पीवीआर, आईनॉक्स और कार्निवाल मल्टीप्लेक्स चेन ने आधिकारिक विज्ञप्ति जारी की. विज्ञप्ति में आसन्न संकट के साथ फिल्मों के सामूहिक दर्शन के आनंद की वकालत की गई है. बताया गया है कि समूह में ही फिल्म देखी जानी चाहिए. थिएटर की तकनीकी सुविधाओं से फिल्म के सौंदर्य, रस, दृश्य, आदि का भरपूर आस्वादन लिया जा सकता है. इन तथ्यों से इंकार नहीं किया जा सकता, लेकिन आभाव में जी रहा दर्शक फिल्म की तकनीकी खूबियों से अधिक दृश्य और संवादों तक ही सीमित रहता है. उनके लिए संवादों के जरिए उद्घाटित हो रही कहानी ही पर्याप्त होती है. सिनेमाघरों में जाकर फिल्में देख रहे दर्शकों में बहुत कम ही मानक प्रोजेक्शन से परिचित होते हैं. मेट्रो से लेकर छोटे शहरों तक में सिनेमाघरों के मालिक प्रोजेक्शन की क्वालिटी में कटौती कर मामूली पैसे बचाते हैं. क्वालिटी से अपरिचित दर्शक खराब साउंड और प्रोजेक्शन से ही आनंदित हो जाता है. कमियों और सीमाओं के बावजूद दर्शक यूट्यूब और दूसरे स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म से प्रसारित शो और फ़िल्में देख कर क्वालिटी के प्रति सजग हो रहे हैं, उनके पास फिल्में देखने की सुविधाएं नहीं पहुंच पा रही हैं. अगर उन्हें फाइबर के जरिए ब्रॉडबैंड के माध्यम से एचडी क्वालिटी की वीडियो और 5.1 ऑडियो सम्पान सिनेमा मिलेगा तो वे क्यों न टूट पड़ेंगे? अब कमाई में कटौती की आशंका बढ़ी है तो मल्टीप्लेक्स मालिकों को दर्शकों की चिंता सताने लगी है. वे उन्हें आनंद के तरीके समझाने और बताने लगे हैं.
असल दुविधा, मुश्किल और चिंता इस बात की होगी कि कितने निर्माता-निर्देशक ‘फर्स्ट डे,फर्स्ट शो’ स्कीम के लिए अपनी फिल्में देने के लिए राजी होंगे? इन फिल्मों के प्रसारण अधिकार का मूल्य निर्धारण कैसे होगा? अभी तक फिल्म के प्रचार, फिल्म के स्टार और फिल्म के कारोबार की संभावना के आधार पर सारी चीजें तय होती रही हैं. अब पहले की तरह टेरिटरी के आधार पर मूल्य निर्धारण नहीं होता. अभी तो केवल कारोबार की संभावना के आधार पर स्क्रीन की संख्या तय की जाती है. यह 500 से 5000 के बीच कुछ भी हो सकती है. प्रतिदिन के कलेक्शन के आधार पर फिल्म के हिट या फ्लॉप का निर्धारण होता है. ‘फर्स्ट डे,फर्स्ट शो’ का अधिकार देने के पहले किस आधार पर पैसे तय किए जाएंगे? अभी तक का घोषित-अघोषित नियम है कि थिएटर रिलीज के 8 हफ्तों के बाद ही टीवी, डिजिटल, वीडियो और सेटेलाइट आदि के प्रसारण अधिकार दिए जाएं. ‘राजमा चावल’ और ‘लव पर स्क्वायर फीट’ जैसी फिल्में सीधे स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म पर आईं. उनके प्रति दर्शकों का उत्साह थोड़ा कम ही दिखा. ओटीटी प्लेटफॉर्म ने अपने मिजाज के अनुरूप वेब सीरीज का मीडियम विकसित कर लिया है. वहां 8 हफ्ते के बाद फिल्में भी आ जाती हैं, जिन्हें दर्शक अपनी सुविधा से देख लेता है, ‘फर्स्ट डे,फर्स्ट शो’ की संभावना नियम, पाबंदी और दूसरों अवरोधों को तोड़ने की एकबारगी उम्मीद    दे दी है. दर्शक हर लिहाज से फायदे में रहेगा. परेशानी प्रदर्शकों की बढ़ रही है और निर्माता असमंजस में है.
मनोरंजन के कारोबारी और विशेषज्ञ कोई राह निकाल ही लेंगे. नई तकनीक को रोका नहीं जा सकता. सिनेमा पर ऐसे अस्थायी संकट आते रहे हैं. टीवी आया तो सिनेमा खत्म हो रहा था. वीडियो सिनेमा के लिए मौत के फंदे की तरह आया था. डिजिटल क्रांति के बाद सिनेमा के दम घुटने की बातें की जाने लगी. फिर भी हम देख रहे हैं कि कारोबारी और दर्शक अपने लिए राह निकाल लेते हैं और सिनेमा सरवाइव कर रहा है. नई संभावना के मध्य यह भी कहा जा रहा है कि अगर फिल्में मिलने में दिक्कतें हुई तो ब्रॉडबैंड कंपनी खुद ही निर्माता-निर्देशकों को फिल्में बनाने का ऑफर देंगी और साल भर का कैटलॉग तैयार कर लेंगी इस विकल्प के बावजूद हम जानते हैं कि भारतीय सिनेमा में रुचि-अभिरुचि फिल्म सितारों और खासकर लोकप्रिय सितारों की वजह से होती है. अगर चोटी के लोकप्रिय स्टारों की फिल्में ‘फर्स्ट डे, फर्स्ट शो’ में उपलब्ध नहीं होंगी तो दर्शक आरंभिक उत्साह के बाद उदासीन हो जाएंगे.
देखना यह है कि मनोरंजन की इस रस्साकशी में कौन विजयी होता है? दर्शक तो हर हाल में फायदे में रहेगा. उसे कम फीस देकर अधिक फिल्में देखने को मिलेंगी. ऊपर से ‘फर्स्ट डे,फर्स्ट शो’ का बोनस मिल गया तो हर शुक्रवार सुहाना और गुलजार हो उठेगा. यह बहुत दूर की संभावना है, लेकिन यह हो भी सकता है कि देश में साप्ताहिक अवकाश का दिन रविवार के बजाय शुक्रवार हो जाए, क्योंकि नई फिल्में शुक्रवार को घर-घर में उपलब्ध होंगी. सिनेमा घर में आ जाएगा तो सिनेमाघर जाने की जहमत कौन उठाएगा?


Monday, August 12, 2019

संडे नवजीवन : मोदी सरकार,कलाकार और फ़िल्मकार


संडे नवजीवन
मोदी सरकार,कलाकार और फ़िल्मकार
-अजय ब्रह्मात्मज

रेमो फर्नांडिस की ‘स्ट्रीट डांसर’ फिल्म की अभी शूटिंग चल रही है. इसमें वरुण धवन डांसर की भूमिका में हैं. हाल ही में इस फिल्म की शूटिंग के कुछ दृश्य सोशल मीडिया पर शेयर किए गए. एक दृश्य में डांसर राष्ट्रीय ध्वज लेकर दौड़ते नजर आ रहे हैं. निश्चित ही डांसर किसी डांस कंपटीशन में भारत की टीम के रूप में हिस्सा ले रहे होंगे. डांस कंपटीशन में अधिकृत रूप से भारत कोई दल नहीं भेजता. फिर भी डांसर भारतीय होने के नाते तिरंगा लहरा रहे हैं. ‘राष्ट्रवाद के नवाचार’ के तहत फिल्मों में ऐसी दिखावटी दृश्यावलियाँ बढ़ गई हैं. मौका मिलते ही या मौका निकाल कर हर कोई देशभक्ति दिखा रहा है. कभी राष्ट्रगान तो कभी राष्ट्रध्वज.... कभी देश की बात तो कभी अतीत का एकांगी गौरव. हिंदी फिल्मों में राष्ट्रवाद का चलन बढ़ा है. ‘नेशनलिज्म’ अनेक रूपों में फूट रहा है. सत्ताधारी पार्टी की सोच और देश के प्रति लोकप्रिय अप्रोच की भावनाएं हिलोरें मार रही हैं.
फिल्म एक कलात्मक उत्पाद है. मुख्यधारा की फिल्मों में कला पर उत्पाद हावी हो चुका है. निर्माता की कोशिश रहती है कि वह दर्शकों के लिए मनोरंजन का ऐसा उत्पाद लेकर थिएटर में आए, जिसे ज्यादा से ज्यादा दर्शक देखने आयें. दर्शकों को लुभाने के लिए यूं तो हमेशा से लोकप्रिय धारणाओं और विचारों पर केंद्रित फिल्में आती रही हैं. प्रत्यक्ष और प्रच्छन्न रूप से आजादी के पहले और बाद के दशकों में भी निर्माता-निर्देशक राष्ट्रीय चेतना और आकांक्षा से आलोड़ित होते रहे हैं. केंद्रीय सत्ता के दिखाए और बांटे सपनों की कथा फिल्मों में परोसी जाती रही है. हिंदी फिल्मों में यह चलन आम रहा है. फर्क इतना आया है कि एक-दो दशक पहले तक ऐसे प्रयास सायास नहीं होते थे. विचार कहानी का हिस्सा बनकर आते थे. आज की तरह उन्हें थोपना, पिरोना या चिपकाना नहीं पड़ता था. इधर की फिल्मों में जब अचानक हमारे नायक और उसके पक्ष के लोग ‘राष्ट्रवाद’ का सुर पकड़ते हैं व्तो खटका सा होता है. ऐसा लगता है कि कहीं कोई दबाव, प्रभाव या झुकाव काम कर रहा है. अभी खौफ या जबरदस्ती की स्थिति नहीं है. वैसे जानकार बताते हैं कि सत्ताधारी पार्टी के समर्थक अपने पक्ष में समर्थन जुटाने के लिए संगठित रूप से फिल्म इंडस्ट्री में सक्रिय हैं.
सोशल मीडिया से लेकर सभा-सेमिनारों तक में सुचारू रूप से सक्रिय दक्षिणपंथी विचारों के कार्यकर्ता अपने तई समर्थन जुटाने, आधार बनाने और सोच फैलाने में लगे हुए हैं. प्रगतिशील और विरोधी विचारों को ‘सूडो लिबरल’ और ‘सूडो सेक्युलर’ बता कर कोसने का काम बखूबी जरी है. पूरी कोशिश है कि ‘पैराडाइम’ ही बदल जाए और सिर्फ सत्ता के सुकून की बातें की जाए. प्रतिकूल विचार आते ही टूट पड़ो और अपनी सीमित नकारात्मक जानकारी से धज्जियां उड़ाओ. सोशल मीडिया को नक्कारखाना बना दो. जहां संयत और संतुलित विचार तूती की आवाज बन कर रह जाए. सोशल मीडिया पर एक्टिव भीड़ विवेक त्याग चुकी है. पारंपरिक मीडिया की स्थिति इससे अलग या बेहतर नहीं है. वहां भी विचार और विश्लेषण के नाम पर कचरा फैलाने का काम चल रहा है. चंद पंक्तियों के सवाल और टिप्पणियों के जवाब में अग्रलेख, संपादकीय और समाचार लिखे जा रहे हैं. विमर्श को खास दिशा दी जा रही है. मीडिया और सोशल मीडिया के इस चलन से फिल्म बिरादरी का प्रभावित होना लाजमी है. सोच=समझ और वैचारिकता के अभाव में फिल्मकार तेजी से लुढ़क रहे हैं.
पिछले चुनाव के पहले नरेंद्र मोदी लगातार फिल्म बिरादरी के चुनिंदा सदस्यों से मिलते रहे हैं. प्रधानमंत्री के साथ फिल्म बिरादरी की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होती रही हैं. मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में कुछ व्यक्तियों को संपर्क साधने और करीब लाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है. नतीजा यह होता है कि प्रधानमंत्री से मिलकर लौटने के बाद करण जौहर समेत तमाम लोकप्रिय चेहरे सोशल मीडिया पर ‘नए भारत’ के लिए जरूरी परिवर्तन की ताकीद करते हैं... हामी भरते हैं. पिछले दिनों जब देश के 49 बुद्धिजीवियों और फिल्मकारों ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा कि कैसे ‘जय श्रीराम’ युद्धघोष बनता जा रहा है तो उस पर विमर्श और चिंता जाहिर करने के बजाय दक्षिणपंथी धड़े ने खुला पत्र लिखा कि क्यों चुनिंदा मामलों में ही ऐसी आवाजें उठती हैं. इस पत्र पर प्रसून जोशी और कंगना रनोट समेत 62 व्यक्तियों के हस्ताक्षर थे. स्थिति यह है कि कोई भी सवाल पूछे तो जवाबी हमला कर दो
पीछे पलट कर देखें तो आजादी के बाद के दशकों में हिंदी फिल्में और फिल्मकार नेहरू और के सपनों के भारत की कहानियां लिख और दिखा रहे थे. साम्यवाद, बराबरी, प्रेम व् भाईचारा, तरक्की आदि विषयों को प्राथमिकता दी जा रही थी. सामंतवाद की बेड़ियों में जकड़े भारत ने गुलामी तोड़कर अंगडाई ली थी. महात्मा गांधी ने प्रेम, अहिंसा और सद्भाव का पाठ पढ़ाया था. देश की विविधता में एकता की तलाश की जा रही थी. आजादी के बाद के भारत में मौजूद सामाजिक विसंगतियों को निशाना बनाया जा रहा था. राष्ट्र निर्माण की लहर थी. फ़िल्मकार और कलाकार की भागीदारी थी. कह सकते हैं यह तब की सत्ता के अनुकूल होने के प्रयास में हो रहा था. सच भी है, लेकिन आजादी के बाद के दशकों में यह प्रयास गहरी सोच के साथ ऑर्गेनिक तरीके से अमल में लाया जा रहा थे. उस दौर के फिल्मकार स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना से प्रेरित और प्रभावित थे. हर तरफ से रूढ़िवादिता और पुरातनपंथी आग्रहों पर चोट किया जा रहा था
पिछले एक दशक में माहौल बदल गया है. निस्संदेह देश में दक्षिणपंथी सोच की लहर है. इस लहर को बनाने, समझने और इस्तेमाल करने में मोदी और शाह की जोड़ी सफल रही है. उन्होंने देश के नागरिकों की धारणा और मानसिकता बदली है. दोबारा मजबूत बहुमत से केंद्र में उनका आना सबूत है कि देश का बहुमत उनके अनुगमन के लिए तैयार है. कायदे से यही मतदाता दर्शक होते हैं. दर्शकों की रुचि, पसंद और प्राथमिकता को व्यावसायिक निर्माता नजरअंदाज नहीं कर सकटा’ उनके लिए फिल्म पहले एक प्रोडक्ट है. वे फिल्मों को खरीदार की पसंद के सांचे में ढाल कर प्रचलित नारों,मुहावरों और संवादों से सजा कर आकर्षक पैकेजिंग करते हैं. दशकों से प्रचलित प्रेम कहानियों में बाजार(दर्शक) की मांग के मुताबिक मसाले जोड़ते हैं और अधिकाधिक कमाई की कामना करते हैं. इस साल की सर्वाधिक कमाई की दो फिल्में ‘उरी’ और ‘कबीर सिंह’ का उदाहरण शामिल सामने है. एक में ‘नए भारत का उग्र राष्ट्रवाद’ है तो दूसरे में 21वीं सदी में ‘स्त्रीविरोधी पुरुष’ का नायकत्व है.
समाजशास्त्रियों के मुताबिक अपनी प्रसिद्धि और लोकप्रियता के बावजूद फिल्मी हस्तियां सत्ता(पावर) के करीब रहने की कोशिश करती हैं. इसका उन्हें अतिरिक्त लाभ मिले या ना मिले... नियमित नुकसान से वे बच जाते हैं. पिछले सालों में हमने देखा कि कैसे आमिर खान, शाह रुख खान और दूसरी फिल्मी हस्तियां छोटी आपत्तियों, टिप्पणियों और भिन्न विचारों से निशाने पर आ गए. अभी ज्यादातर ने खामोशी ओढ़ ली है. जरूरी नहीं है कि वेसभी खौफ में हों, लेकिन व्यर्थ का पंगा लेने और आंख की किरकिरी बनने से बेहतर है कि सरकारी अभियानों में दिख जाओ और समर्थन में दो-चार शब्द बोल दो. यही समर्थन प्रभाव और झुकाव की अभिव्यक्ति के रूप में फिल्मों में आता है तो हमें ‘नेशनलिज्म’ के नारे की अनुगूंज सुनाई पड़ने लगती है. हमेशा से सत्ता और फिल्म बिरादरी की नजदीकी रही है. यह वैचारिक से ज्यादा व्यवहारिक रही है यह नजदीकी. चापलूसी से दूर. नए दौर में सीधे, क्रूर और जबरन तरीके से वर्तमान सत्ता की राजनीतिक विचारधारा और नारों को शब्दों-दृश्यों में बदला जा रहा है. भयंकर महिमामंडन हो रहा है. इसी साल ऐसी अनेक फिल्में आयीं,जिनमें व्यक्ति विशेष पर फोकस किया गया और विरोधी राजनीति के व्यक्तियों और नीतियों की छवि को गंदला और मलिन किया गया. भाजपा के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ‘पीएम नरेंद्र मोदी’ का ट्रेलर शेयर करना स्पष्ट संकेत था कि इरादे क्या हैं?
दरअसल सारा खेल छवि सुधारने और अपनी सोच को जन-जन तक पहुंचाने का है. देश में आमजन तक पहुंचने का एक सशक्त जरिया फिल्में है, इसलिए हम देख रहे हैं कि सरकारी नीतियों, योजनाओं और विचारों को लेकर फिल्में बन रही हैं, उनमें लोकप्रिय अभिनेता-अभिनेत्री काम कर रहे हैं. अक्षय कुमार नए भारत कुमार बन चुके हैं. अजय देवगन, जॉन अब्राहम, कंगना रनोट, विकी कौशल और अन्य सितारे नारों को संवादों में बोल रहे हैं. राष्ट्रीय चेतना की फिल्मों का स्वर बदल चुका है. प्रधानमंत्री पूछ बैठते है...हाउ इज द जोश?
सच्चाई यही है कि कल फिर से सत्ता बदली, सत्ता के विचार बदले और योजनाएं बदलीं तो फिल्मों,कलाकारों और फिल्मकारों को बदलते देर नहीं लगेगी. तब उनके पास नई परिस्थिति के अनुकूल तर्क और कारण होंगे.


Sunday, August 4, 2019

संडे नवजीवन : खटकता है हिंदी फिल्मों का नकलीपन


संडे नवजीवन
खटकता है हिंदी फिल्मों का नकलीपन
अजय ब्रह्मात्मज
पिछले दिनों मनोज के झा निर्देशित फिल्म ‘फैमिली ऑफ ठाकुरगंज’ आई. फिल्म अगर आपने देखी हो तो मान लें कि हिंदी फिल्मों में उत्तर भारतीय समाज कमोबेश इसी रूप-रंग में आ रहा है. अपराध की दुनिया में लिप्त किरदार बदले, फिरौती और जमींदारि रसूख में डूबे रहते हैं. इन फिल्मों में रिश्तो का लोकतंत्र नहीं रहता. महिलाओं की गौण उपस्थिति रहती है. उत्तर भारत से सामंती प्रथा आजादी के कुछ दशकों के बाद समाप्त हो गई, लेकिन फिल्मों में यह अभी तक चली आ रही है. वेशभूषा, बोली, रहन-सहन और पृष्ठभूमि में दशकों पहले की छाप मौजूद रहती है. चरित्र का निर्माण भी दशको पुराना है. उत्तर भारत में प्रवेश करते ही हिंदी फिल्मों की कहानियां रूढ़िवादी गलियों में भटकने लगती हैं. दिख रहे समाज और संसार का नकलीपन झांकता रहता है. साफ दिखता है कि इन फिल्मों का अपने समाज से आज का कोई संबंध नहीं है.
लंबे समय से हिंदी फिल्मों से गांव गायब हो गया है. फिल्म जब उत्तर भारत में पहुंचती है तो यह स्पष्ट नहीं होता कि किस प्रदेश के किस इलाके की पृष्ठभूमि में किरदार रचे गए हैं. दशकों के अभ्यास और हिंदी फिल्मों ने उत्तर भारत के गांव और कस्बों की धारणा बना दी है. आज के निर्देशक भी उन्हीं धारणाओं पर अमल करते हैं और बार-बार नकली दुनिया रचने की कोशिश करते हैं. नतीजतन इन फिल्मों की लोकप्रिय अपील नहीं बन पाती. मल्टीप्लेक्स के दर्शकों की ऐसी फिल्मों में कोई रूचि नहीं रहती. निर्देशकों को भी लगता है कि छोटे-मझोले शहरों और कस्बों के दर्शकों को रिझाना है तो सौंदर्यबोध और चित्रण के लिहाज से कुछ दशक पीछे चलना ही ठीक रहेगा. पिछले साल आई राजकुमार गुप्ता की ‘रेड’ में आधुनिकता के बीच भी चित्रण यही पारम्परिकता दर्शकों को चिढ़ा रही थी. आर बाल्की की ‘पैडमैन’ फिल्म में मध्यप्रदेश का माहौल होने के बावजूद अक्षय कुमार की मौजूदगी व्यवधान डालती रही. अक्षय कुमार अपनी लोकप्रियता के अनुरूप उच्चारण और संवाद अदायगी पर मेहनत किए होते तो ‘पैडमैन’ की स्थानीयता उभर कर आती.
हिंदी फिल्मों में उत्तर भारत के चित्रण में इसी स्थानीयता की कमी खटकती है. बोली, भाषा, वेशभूषा, परिवेश और चरित्रों में स्थानीयता का अभाव उन्हें एकरूप और नकली बनाता है. इन दिनों निर्माता-निर्देशक भाषा पर थोड़ा ध्यान दे रहे हैं. कोशिश करने के साथ यह दावा किया जाता है कि अभिनेता/अभिनेत्री ने स्थानीय लहजे में हिंदी बोलना सीखा. उनके लिए प्रशिक्षक रखे गए और सेट पर भी उनके संवादों के उच्चारण के लहजे में आवश्यक सुधार के लिए प्रशिक्षक मौजूद रहे, लेकिन ढाक के वही तीन पात. प्रशिक्षकों के निर्देश और कलाकारों के अभ्यास के बावजूद स्थानीय लहजा सुनाई नहीं पड़ता. कुछ पंक्तियों और उनके भी कुछ शब्दों तक ही उनकी पकड़ बन पाती है. कई बार वे सही और सटीक बोलने का प्रयत्न करते हैं, लेकिन संवाद अदायगी अपेक्षित पटरी से उतर जाती है और प्रभाव भोंडा हो जाता है. लोकप्रिय अभिनेता/स्टार की मेहनत का झूठा सच पर्दे पर दिखाई और सुनाई पड़ने लगता है. इस मामले में थिएटर से फिल्मों में आए कलाकार फिर भी थोड़े सफल होते हैं.
ताजा उदाहरण के लिए विकास बहल की फिल्म ‘सुपर 30’ में रितिक रोशन को देखा जा सकता है. इस फिल्म में रितिक रोशन ने अपनी परिचित और लोकप्रिय छवि को नोच कर आनंद कुमार बनने का प्रयत्न किया है. कद-काठी और लुक में वह आनंद कुमार की तरह नहीं है. फिर भी आनंद कुमार के की मनोदशा, संघर्ष और मेहनत को उन्होंने आत्मसात किया, खुद को सांवला किया, पटनहिया हिंदी भी बोलने की कोशिश की, लेकिन दूसरे कलाकारों के साथ आते ही उनकी मेहनत की पोल खुलती रही. दरअसल, इस फिल्म में उनके साथ के किरदारों में वीरेंद्र सक्सेना, आदित्य श्रीवास्तव और पंकज त्रिपाठी सरीखे रंगमंच के अभिनेता थे. यहाँ तक कि उनके 30 छात्र भी... भाषा पर उनकी पकड़ रितिक रोशन से कई दर्जे ऊपर थी. यही वजह है कि उनके साथ के दृश्यों में उनकी संवाद अदायगी की कमजोरी उभरती रही. रितिक रोशन ने इस फिल्म में ‘बॉडी लैंग्वेज’ तो पकड़ ली लेकिन ‘लैंग्वेज’ पकड़ने में असफल रहे
‘सुपर 30’ घोषित रूप से आनंद कुमार के जीवन से प्रेरित फिल्म है. आनंद कुमार का ‘सुपर 30 पटना में है. खुद उनका जीवन पटना में बीता. फिल्म में पटना लिखना चाहिए था. अमूमन फिल्मकार किसी भी शहर को स्थापित करने के लिए वहां के ‘सिग्नेचर इमारतों और वास्तु’ को फिल्मों में दिखाते हैं. गलियां और मकान के हुबहू सेट तैयार किये जाते हैं. अगर उन्होंने वास्तविक लोकेशन पर शूट किया होता तो शहर सहज रूप में उनकी फिल्मों में आ जाता है. विकास बहल ने ‘सुपर 30’ में पटना शहर के प्रसिद्ध और परिचित स्थानों को दिखाने का कोई प्रयास नहीं किया. इसके उलट कुछ फिल्मों में कहानी किसी और प्रदेश और इलाके की रहती है, लेकिन शूटिंग की सुविधा-असुविधा से पृष्ठभूमि का लोकेशन लापरवाही की चुगली कर जाता है
वास्तविकता और स्थानीयता के लिहाज से इस साल आई फिल्मों में अभिषेक चौबे की ‘सोनचिरैया’ और अनुभव सिन्हा की ‘आर्टिकल 15 का उल्लेख किया जा सकता है. पिछले साल आई डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी की ‘मोहल्ला अस्सी’ भी उल्लेखनीय है. तीनों ही फिल्में में अनेक चरित्र थे. उन सभी की भूमिका दमदार थी. ‘सोनचिरैया में’ चंबल का इलाका स्पष्ट तरीके से दिखा. चंबल के बीहड़ों और बस्तियों को अभिषेक चौबे और उनके कैमरामैन ने बारीकी से कैद किया और विश्वसनीयता कायम रखी थी. अनुभव सिन्हा की ‘आर्टिकल 15’ का लालगांव काल्पनिक गाँव था,लेकिन वहां की गलियां, थाना, तालाब और भाषा उत्तर भारत की थी. निश्चित इसे रचने में फिल्म के प्रोडक्शन डिज़ाइनर और लेखकों ने अनुभव सिन्हा की मदद की होगी.उनके कलाकारों ने स्क्रिप्ट में निर्दिष्ट गांव को पर्दे पर स्थापित किया और दर्शकों को अपने साथ वहां पहुंचा दिया. डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फिल्म ‘मोहल्ला अस्सी’ में पप्पू के चाय की दुकर और अस्सी की गली देखकर ‘कशी का अस्सी’ के लेखक डॉ. काशीनाथ सिंह हैरत में रह गए थे.
उत्तर भारत की चरित्रगत स्थानीयता के संदर्भ में प्रकाश झा का उल्लेख जरूरी होगा. उनकी फिल्मों की भाषा और पृष्ठभूमि बिहार की रहती है. उन्होंने ‘दामुल’ की शूटिंग जरूर बिहार में की थी, लेकिन दूसरी पारी में वे महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में बिहार सृजित करते रहे. उन्होंने महाराष्ट्र के वाई और मध्यप्रदेश के भोपाल को बिहार बना दिया था. गौर करना होगा कि लहजे, उच्चारण और शैली के हिसाब से उन्होंने अपनी फिल्मों में खास भाषा विकसित की है, जो उनके संवादों और कलाकारों के परफॉर्मेंस को प्रभावशाली बना देती है. दूसरे निर्देशक उनके अनुकरण में सफल नहीं हो पाते.
इन दिनों एक और बात खटकती है.उत्तर भारत की पृष्ठभूमि के फिल्मों में पंजाबी गानों का कोई तुक नहीं बनता है, लेकिन हम बार-बार ऐसी फिल्मों में पंजाबी गाने सुनते हैं और देखते हैं. उत्तर भारत में प्रचलित गीत-संगीत के बजाय पंजाबी धुनों और बोलो के गीत-संगीत की भरमार रहती है. हमारे निर्देशकों को पंजाबी गाने डालने के इस दबाव से निकलना होगा. उन्हें अपनी फिल्मों में स्थानीय धुनों और बोलो को के साथ प्रयोग करना होगा.


Wednesday, May 29, 2019

संडे नवजीवन : कमाई और कामयाबी है बायोपिक में

संडे नवजीवन
कमाई और कामयाबी है बायोपिक में
-अजय ब्रह्मात्मज
हर हफ्ते नहीं तो हर महीने कम से कम दो बायोपिक की घोषणा हो रही है.उनमें से एक में कोई लोकप्रिय स्टार होता है.बायोपिक निर्माताओं में फिल्म इंडस्ट्री के बड़े बैनर होते हैं.दरअसल,बायोपिक का निर्माण निवेशित धन की वापसी और कमाई का सुरक्षित जरिया बन चुका है.पिछले कुछ सालों में आई बायोपिक में से कुछ की कामयाबी ने निर्माताओं का विश्वास और उत्साह भी बढ़ा दिया है.वे बायोपिक की तलाश में रहते हैं.लेखक किताबें छान रहे हैं.स्टार कान लगाये बैठे हैं.और निर्माता तो दुकान खोले बैठा है.अभी कम से कम 40 बायोपिक फ़िल्में निर्माण की किसी न किसी अवस्था में हैं.हाल ही में गणितज्ञ शकुंतला देवी पर बायोपिक की घोषणा हुई है,जिसका निर्देशन अनु मेनन करेंगी.विद्या बालन परदे पर शकुंतला देवी के रूप में नज़र आएंगी.कुछ बायोपिक फिल्मे इस साल के आखिर तक रिलीज होंगीं,जिनमें ‘उधम सिंह’ और ‘तानाजी’ पर सभी की नज़र है.
हिंदी फिल्मों के अतीत में झांक कर देखें तो शुरुआत से ही चरित कथाएं बनती रही है. मिथक और इतिहास के प्रेरक चुनिंदा चरित्रों को फिल्मों का विषय बनाया जाता रहा है. तब इनके लिए बायोपिक शब्द का इस्तेमाल नहीं होता था. उनकी कोई भी विधात्मक पहचान नहीं थी. रिचर्ड एटनबरो की ‘गांधी’ को भी हम बायोपिक के तौर पर नहीं जानते. वह हमारे लिए महज महात्मा गांधी के जीवन पर बनी प्रमाणिक फिल्म मानी जाती है. 
मूक फिल्मों के दौर से ऐतिहासिक और मिथकीय चरित्रों की शौर्य गाथा और कथा फिल्मकारों को आकर्षित और प्रेरित करती रही है. कह सकते हैं कि हॉलीवुड और विदेशी फिल्मों के प्रभाव से यह आरंभ हुआ होगा, लेकिन रामचरितमानस और रामलीला के देश में चरित्र चर्चा और कथा कहने और प्रदर्शन की सदियों पुरानी परंपरा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, संभव है, प्रेरणा बाहर से मिली हो, लेकिन प्रयास तो भारतीय रहे. देश के फिल्मकारों ने भारतीय चरित्रों को ही परदे पर पेश किया. राजा हरिश्चंद्र पर जीवन के प्रसंग पर बनी दादा साहेब फाल्के की पहली भारतीय फिल्म ‘राजा हरिशचंद्र से लेकर बोलती फिल्मों के आरंभिक दौर तक में ऐसे किरदारों को जगह मिलती रही. लोकगाथा और लोकश्रुति से नायक लिए गए. उन्हें कल्पना के सहारे फिल्मों में प्रभावशाली तरीके से पेश किया गया. आजादी के पहले के अधिकांश चरित्र नायक स्वतंत्रता की चेतना से आलोड़ित होते थे. ब्रिटिश सेंसरशिप की वजह से फिल्मकार अप्रत्यक्ष तरीके से देशभक्ति, राष्ट्रवाद और मुक्ति/आजादी की बातें करते थे. फिर भी उन्हें वास दफा सेंसरशिप का सामना करना पड़ा
आजादी के आसपास वी शांताराम ने ख्वाजा अहमद अब्बास की मदद से ‘डॉ कोटनीस की अमर कहानी’ का निर्माण और निर्देशन किया. डॉ कोटनीस चीनी क्रांति में मदद करने के लिए भारत से गए डॉक्टर थे, जो चीनी क्रांतिकारियों की सेवा करते हुए दिवंगत हुए चीन में आज भी उनका नाम आदर से याद किया जाता है. वी शांताराम की यह फिल्म तो अधिक नहीं चल पाई थी, लेकिन इससे समकालीन किरदारों पर फिल्म बनाने की शुरुआत हो गई. बाद के दशकों में देश के स्वतंत्रता सेनानियों और राष्ट्रीय नेताओं पर भी फिल्में बनीं, किन्तु रिचर्ड एटनबरो की ‘गांधी’ के अलावा कोई दूसरी फिल्म जनमानस(दर्शकों) के बीच लोकप्रिय नहीं हो पाई. निर्देशकों के लिए अकेली सचमुच विधात्मक और शिल्पगत चुनौती रही है कि किसी भी हस्ती के दशकों की जिंदगी को कैसे दो-तीन घंटों में समेटकर मनोरंजक तरीके से पेश किया जाए. कोशिश यह भी रहती है कि वह डॉक्यूमेंट्री ना बन जाए. हिंदी में राष्ट्रीय नेताओं पर बनी फिल्मों का शैक्षणिक महत्व हो सकता है. उनका मनोरंजक पक्ष कमजोर रहा है.यही कारन है कि अनगिनत चरित्रों में से कुछ खास ही रुपहले परदे पर नज़र आये,
लंबे अंतराल के बाद शेखर कपूर की फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ ने फिल्मकारों के लिए नया वितान खोल दिया. दस्यु सुंदरी फूलन देवी के जीवन पर आधारित ‘बैंडिट क्वीन’ रियलिस्टिक फिल्म थी’ हिंदी में किसी जीवित व्यक्ति पर बनी संभवत यह पहली फिल्म थी. फिल्म को अच्छी सराहना और चर्चा मिली.फिर मणिरत्नम की धीरूभाई अंबानी के जीवन से प्रेरणा लेकर गुरु का निर्माण और निर्देशन किया. मजेदार तथ्य है कि यह कभी लिखा और बताया नहीं गया कि ‘गुरु’ धीरूभाई अंबानी के जीवन पर आधारित फिल्म है, लेकिन सभी ने इसे उनके बायोपिक की तरह ही देखा. और फिर तिग्मांशु धूलिया के निर्देशन में आई ‘पान सिंह तोमर’ ने बायोपिक निर्माण में नया जोश दिया. इसे गहरे शोध के बाद संजय चौहान ने लिखा था. इस फिल्म की भाषा बुंदेली रखी गई थी. इरफान ने सैनिक और खिलाड़ी से भागी बने पान सिंह तोमर को पर्दे पर बखूबी चरितार्थ किया था. अब इस फिल्म के निर्माता भले ही ‘पान सिंह तोमर’ से आरंभ हुए बायोपिक ट्रेंड का क्रेडिट लेते रहें. कुछ नया दिखाने और करने पर गर्वित महसूस करते रहें. सच्चाई यह है कि बनने के बाद यह फिल्म एक अरसे तक रिलीज नहीं की गई. कहा नहीं गया,लेकिन निर्माताओं के लिए यह मेंनस्ट्रीम फिल्म नहीं थी. इसमें मनोरंजन भी नहीं था. जैसे-तैसे फिल्म रिलीज हुई तो दर्शकों ने इसे हाथोंहाथ लिया और सराहा. उसके बाद राकेश ओमप्रकाश मेहरा के निर्माण-निर्देशन में आई ‘भाग मिल्खा भाग’ ने कामयाबी का नया मंत्र देकर ट्रेंड स्थापित कर दिया. मुंबई के निर्माताओं को बायोपिक में कमाई के संभावना दिखी और वे टूट पड़े.
बायोपिक निर्माण के लिहाज से आसान प्रस्ताव हो गया है.निर्माता किसी भी लोकप्रिय कलाकार को सिर्फ मशहूर व्यक्ति का नाम बताता है और वह तैयार हो जाता है.प्रोजेक्ट और कहानी के लिए अधिक माथापच्ची नहीं करनी पड़ती. बायोपिक तैयार करने में समबन्धित व्यक्ति से आवश्यक इनपुट मिलने से फिल्म प्रमाणिक बन जाती है.फिल्म के प्रचार में भी मदद मिलती है. दर्शकों को अधिक कुछ बताना नहीं होता.उस मशहूर हस्ती से दर्शकों का पुराना परिचय रहता है.कई बार वे स्वयं प्रचार के लिए उपलब्ध रहते हैं.पिछले साल की ‘संजू’ का उदहारण सामने है.मज़ा तो तब है,जब किसी गुमनाम व्यक्ति पर बायोपिक बने और फिल्म की वजह से दर्शक और देश उस व्यक्ति को जाने.ऐसी कोशिश कम निर्माता करते हैं.ज्यादातर निर्माता खिलाडियों और सोशल वर्कर पर बायोपिक बनाना पसंद कर रहे हैं राजनीतिक और ऐतिहासिक चरितों को छूना बर्रे के छत्ते में हाथ लगाना माना जाता है.कोई न कोई समूह और समुदाय विरोध और तोड़फोड़ के लिए खड़ा हो जाता है.

निर्माणाधीन बायोपिक
साइना नेहवाल: अमोल गुप्ते के निर्देशन में बन रही बैडमिंटन खिलाड़ी साइना के जीवन पर और खेल पर आधारित है यह फिल्म. इस फिल्म में साइना की भूमिका पहले श्रद्धा कपूर निभा रही थीं. अब उनकी जगह परिणीति चोपड़ा आ गई है.
अभिनव बिंद्रा : इस फिल्म में अभिनव बिंद्रा की भूमिका हर्षवर्धन कपूर निभा रहे हैं. दो साल पहले इस फिल्म की घोषणा हुई थी, लेकिन अभी तक फिल्म निर्माण शुरू नहीं हुआ है, पहले विशाल भारद्वाज इसके निर्माता थे. अभी अनिल कपूर स्वयं बेटे की फिल्म प्रोड्यूस करेंगे.
मिताली राज : महिला क्रिकेट टीम की रिकॉर्ड होल्डर कप्तान मिताली राज की उपलब्धियों को समेटती इस फिल्म के अधिकार वायकॉम 18 के पास हैं. तापसी पन्नू मिताली राज की भूमिका निभाने के लिए उत्सुक हैं.
पुलेला गोपीचंद : बैडमिंटन खिलाडी पुलेला की इस बायोपिक में तेलुगू फिल्मों के अभिनेता सुधीर बाबू उनकी भूमिका निभाएंगे, वे कभी पुलेका के कोर्ट पार्टनर भी रहे हैं. यह फिल्म तेलुगू के साथ हिंदी और अंग्रेजी में भी बनेगी.
सैयद अब्दुल रहीम ; फुटबॉल कोच सैयद अब्दुल रहीम पर बन रही बायोपिक में अजय देवगन उनकी भूमिका निभाएंगे. इसके निर्माता बोनी कपूर हैं. ‘बधाई हो’ की कामयाबी के बाद अमित शर्मा का यह अगला निर्देशन होगा. जून महीने से इसकी शूटिंग आरंभ हो जाएगी.
अरुणिमा सिन्हा : अरुणिमा अपांग पर्वतारोही हैं. एक दुर्घटना के शिकार होने के बाद वॉलीबॉल खिलाड़ी अरुणिमा सिन्हा ने खुद को बटोरा था. और फिर एक मुश्किल उपलब्धि हासिल की थी. पहले इस फिल्म में कंगना रनोट के होने की खबर आई थी, लेकिन अभी यह भूमिका आलिया भट्ट निभा रही हैं. इसके निर्माता करण जोहार हैं.
बिरसा मुंडा : दक्षिण के निर्देशक पा रंजीत बिरसा मुंडा पर बायोपिक बना रहे हैं. वर्तमान झारखंड के क्रांतिकारी बिरसा मुंडा का प्रेरक जीवन ‘जल,जंगल,ज़मीं; की लडाई के लिए आज भी प्रासंगिक है. पा रंजीत ने महाश्वेता देवी के उपन्यास जंगल के दावेदार का अधिकार लिया है. निश्चित ही महाश्वेता देवी का नजरिया फिल्म में देखने को मिलेगा. इस फिल्म में ईशान खट्टर के चुने जाने की बात की जा रही है.
शकुंतला देवी : विक्रम मल्होत्रा की फिल्म शकुंतला देवी में विद्या बालन शीर्षक भूमिका निभाएंगी. इस फिल्म का निर्देशन अनु मेनन कर रही हैं
संजय चौहान का इंटरव्यू
बहुचर्चित बायोपिक के लेखक संजय चौहान को यह श्रेय मिलता है कि उनकी लिखी ‘पान सिंह तोमर’ की सफलता और सराहना ने फिल्मकारों को इस विधा के प्रति उत्साह और भरोसा दिया.लकीर की फ़क़ीर फिल्म इंडस्ट्री को तो कामयाबी का संकेत भर मिलना चाहिए.वे टूट पड़ते हैं.पेश है बायोपिक बनाने की होड़ के सन्दर्भ में संजय चौहान से हुई बातचीत के अंश.
-‘पान सिंह तोमर’ लिखे जाने के समय का क्या माहौल था?
० स्पष्ट कर दूं कि ‘लेट्स मेक अ बायोपिक’ के अंदाज में हम ने इसके बारे में नहीं सोचा था.हमारे लिए पान सिंह तोमर एक किरदार था. उसकी जर्नी रोचक थी. दर्शकों ने उसे पसंद किया. फिल्म चल गयी. फिर सभी का ध्यान गया कि यह भी एक जोनर हो सकता है.आप देखें कि उसके पहले हिंदी में छिटपुट बायोपिक बने हैं,लेकिन उन्हें वैसी कामयाबी नहीं मिली थी.’पान सिंह तोमर’ के बाद ट्रेंड चल पड़ा.
-बायोपिक में किसी व्यक्ति की पूरी ज़िन्दगी नहीं होती?
० हो भी नहीं सकती. फ़िल्में बायोग्राफी नहीं होतीं,इसीलिए बायोपिक शब्द बना होगा. बायोग्राफी तो फिर डोक्युमेंटऋ जैसी हो जाएगी. उसमे दर्शकों का इंटरेस्ट नहीं रहेगा.दर्शक किसी व्यक्ति की कहानी देखते हुए एंटरटेन भी होना चाहते हैं.
-इन दिनों हर बैनर और डायरेक्टर बायोपिक बनाने में लगा है.यह भेडचाल क्यों?
० आसान सा लगता है.किसी मशहूर व्यक्ति या अचीवर से अधिकार ले लो. किसी व्यक्ति की दशकों की ज़िन्दगी को दो घंटे में कहने के लिए रियल मसाले मिल जाते हैं. कल्पना की ज़रुरत नहीं पड़ती.सच्ची बात यह है कि लेखक के तौर पर मेरे लिए चुनौती होती है.किसी की ज़िन्दगी को मुकम्मल कहानी की तरह पेश करना होता है,होड़ जो लगी है,वह कामयाबी की है.एक और चीज देख रहा हूँ कि स्टार भी बायोपिक में इंटरेस्ट दिखा रहे हैं.उन्हें सिर्फ नाम बता दो तो आरंभिक सहमती हो जाती है.
-मिल्खा सिंह पर आये बायोपिक के बाद जीवित व्यक्तियों पर फिल्म बनाने का रुझान बढ़ा है...और खिलाडियों या दूसरे किस्म के लोगों पर ही फोकस है. राजनीतिज्ञ गायब हैं..
० राजनीतिज्ञों को कोई टच नहीं करना चाहता.वह थोडा मुश्किल भी.विवाद और आपत्ति की सम्भावना रहती है.मैं’मोदी’ जैसे बायोपिक की बात नहीं कर रहा हूँ.उसमें उन्हें निराधार हीरो बनाने की कोशिश है.कश्मीर में झंडा फहराने तो मुरली मनोहर जोशी गए थे.यहाँ मोदी बता रहे हैं.वे उस समूह का हिस्सा रहे होंगे.निर्माता को दर रहता है कि उसकी फिल्म न फँस जाए.दक्षिण में कोशिशें हो रही हैं. एनटीआर पर आ रही है. जयललिता पर बन रही है,
-अगर अभी आप को कोई बायोपिक लिखनी हो तो किसे चुनेंगे?
० मैं अंजान व्यक्ति की बायोपिक लिखना चाहूँगा. मैंने एक बायोपिक लिखी है,लेकिन वे मशहूर व्यक्ति हैं.मुझे अफ़सोस हुआ कि मुझे रेशमा पठान क्यों नहीं नज़र आयीं? ‘शोले’ की इस स्टंट गर्ल पर अच्छी फिल्म बनानी चाहिए थी. वह अफ्ली स्टंट गर्ल हैं.  



Sunday, March 31, 2019

संडे नवजीवन : मोदी चरित की हड़बड़ी


मोदी चरित की हड़बड़ी
-अजय ब्रह्मात्मज
चुनाव के मौसम में नेताओं के जीवन की झांकियां शब्दों में प्रस्तुत की जाती रही हैं.कोई चालीसा लिखता है तो कोई पुराण...कुछ पॉपुलर फ़िल्मी धुनों पर गीत बनाते हैं.चुनाव के दौरान ऑडियो-वीडियो के जरिये नेताओं और संबंधित पार्टियों के बारे में आक्रामक प्रचार किया जाता है. एक ही कोशिश रहती है कि मतदाताओं को को लुभाया जा सके.पहली बार ऐसा हो रहा है कि सत्ताधारी प्रधानमंत्री के जीवन पर एक फिल्म और एक वेब सीरीज की तैयारी चल रही है.इन्हें भाजपा की तरफ से आधिकारिक तौर पर नहीं बनवाया जा रहा है,लेकिन उक्त पार्टी का मौन व मुग्ध समर्थन है.पूरी कोशिश है कि चुनाव के पहले इन्हें दर्शकों के बीच लाकर उनके मतों को प्रभावित किया जाए. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बड़े परदे के साथ डिजिटल प्लेटफार्म पर पेश करने की हड़बड़ी स्पष्ट है.
फिल्म ‘पीएम नरेन्द्र मोदी’ और वेब सीरीज ‘मोदी’ का निर्माण चुनाव के मद्देनज़र ही हो रहा है. निर्माता संदीप सिंह,सुरेश ओबेरॉय,आनंद पंडित और आचार्य मनीष ने जनवरी के पहले हफ्ते में ‘पीएम नरेन्द्र मोदी’ का फर्स्ट लुक अनेक राष्ट्रिय भाषाओँ में जरी किया था. थी की तीन महीनों के बाद यह फिल्म 5 अप्रैल को रिलीज होने जा रही है. गौर करें तो फिल्म की रिलीज की पहली घोषणा 12 अप्रैल थी. 11 अप्रैल से आरम्भ हो रहे चुनाव को ध्यान में रखते हुए इसकी तारीख 5 अप्रैल कर दी गयी. निर्माता,निर्देशक और अभिनेता को संभवतः मुगालता है कि वे अपनी फिल्म से दर्शकों को प्रभावित कर सकेंगे. फिल्म का ट्रेलर आ चुका है.ट्रेलर में शामिल मोदी के संवादों को गौर से सुनें तो स्पष्ट हो जायेगा कि निर्देशक ओमंग कुमार का क्या मकसद है. यह ट्रेलर स्वयं मोदी ने भी देखा होगा और मुमकिन है कि उनके करीबी फिल्म भी देख चुके हों. अभी तक कहीं से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.हां,आम दर्शकों को यह ट्रेलर रत्ती भर भी फिल्म देखने के लिए प्रेरित नहीं कर सका है. खास दर्शकों की बात दीगर है. वे इसे देखेंगे और दिखायेंगे.
‘पीएम’ मोदी पर बनी फिल्म की कहानी अभी नहीं मालूम.ट्रेलर और कास्टिंग से  संकेत मिल रहा है कि इसमें उनकी मां,पत्नी,अमित शाह और रतन टाटा किरदार के तौर पर दिखेंगे. चाय बेचने से शुरु हुई उनकी यात्रा संन्यासी होने की चाहत और फिर देश सेवा के लिए संघ(यानि सेना) में शामिल होने के प्रसंग से गुअजरती हुई आगे बढती है. पूरे देश में तिरंगा फहराने का आह्वान करते हैं.कश्मीर के मसले पर वे उत्तेजित हैं और लाल चौक तिरंगा फहराते हैं. इंदिरा गाँधी के निर्देश पर उन्हें गिरफ्तार किया जाता है. एक दृश्य में वे कहते हैं,हिंदुस्तान आतंक से नहीं,आतंक हिंदुस्तान से डरेगा, वे रतन टाटा को कहते हैं,जो डिसिशन एक मनात में नहीं होता,वह डिसिशन ही नहीं होता. और फिर अंत में कहते हैं,चेतावनी देता हूँ पाकिस्तान को...अगर दोबारा हम पर हाथ उठाया तो हाथ काट दूंगा. तुम ने हमारा बलिदान देखा है. अब बदला भी देखोगे.भारत माता की जय! फिल्म आने पर सभी संवादों,प्रसंगों और दृश्यों का सन्दर्भ समझ में आएगा.फिर भी नरेन्द्र मोदी के सार्वजानिक भाषणों से हम सभी जानते हैं कि वे क्या सोचते और चाहते हैं? उनके व्यक्तित्व और विचारों का फ़िल्मी रूप राष्ट्रवाद के फ़िल्मी डोज के रूप में ‘पीएम नरेन्द्र मोदी’ में दिखेगा.
फिल्म इंडस्ट्री में इन दिनों बायोपिक की लोकप्रिय मांग है.साथ में राष्ट्रवाद का तड़का लगाया जा रहा है.’पीएम नरेन्द्र मोदी’ में लोकप्रिय तत्वों के साथ प्रधानमंत्री को खुश करने की मंशा भी है.आनन्-फानन में बनी इस फिल्म से जुड़े निर्माता,निर्देशक और लीड कलाकार(विवेक ओबेरॉय) के अतीत को देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि इस फिल्म का पहला और फौरी उद्देश्य सत्तारूढ़ पार्टी के आकाओं को खुश करना है.वे स्वयं भी सत्तारूढ़ पार्टी की विचारधारा के हिमायती हैं. देखना तो यह होगा कि क्या दर्शक इसे किसी फिल्म की तरह ही लेते हैं या प्रोपगंडा समझ का उदास रवैया अपनाते हैं. भक्त दर्शक इसे देखेंगे...और अगर उन्होंने ही देख लिया तो फिल्म झट से वीकेंड में ही 100 करोड़ी हो जाएगी. फ़िल्मकार और कलाकार ट्रेलर देखने के बाद भी रियेक्ट नहीं कर रहे हैं. एक सिद्ध फ़िल्मकार ने नाम न लिखने की शर्त पर कहा कि फिल्म ‘टैकी’ लग रही है. परफार्मेंस में अपील नहीं है.विवेक ओबेरॉय के मोदी लुक पर अधिक काम नहीं किया गया है.मोदी का करिश्मा विवेक के अभिनय में नदारद है.
याद करें तो पिछले लोकसभा के चुनाव के पहले नरेन्द्र मोदी की जीत की हवा को भांपते हुए एक आप्रवासी भारतीय ने उन पर बायोपिक बनाने की सोची. उन्होंने भाजपा के समर्थक निर्देशकों को संपर्क किया. परेश रावल के नाम की घोषणा भी हो गयी थी कि वे मोदी की भूमिका निभाएंगे. २०१४ के इंटरनेशनल फिल्म समारोह के समय निर्माता मितेश शाह इस फिल्म की घोषणा के लिए आमादा थे,लेकिन उन्हें उपयुक्त कलाकार नहीं मिल पाया. मोदी की फिल्म खटाई में चली गयी. उन पर बन रही वेब सीरीज के लेखक मिहिर भूता भी तब अपनी इसी पटकथा पर फिल्म बनाने की सोच रहे थे. उन्होंने ने भी हाथ-पाँव मारे,लेकिन फिल्म फ्लोर पर नहीं जा सकी. खैर,उन्होंने फिल्म का खयाल छोड़ा और अब वेब सीरीज ‘मोदी’ लेकर आ रहे हैं.
मिहिर भूता गुजरती के लोकप्रिय नाटककार हैं. वे नरेन्द्र मोदी को उनके मुख्या मंत्री काल से जानते हैं. भाजपा के करीबी हैं. उनकी पत्नी माधुरी भूता भाजपा के महिला विंग में ज़िम्मेदार पद पर हैं. स्वयं मिहिर भूता संगठन के कार्य और विचार को लेकर सक्रिय रहे हैं. वे सीबीएफ़सी के भी सदस्य रहे. मिहिर भूता की पहली चाहत तो फिल्म बनाने की ही थी. वे संदीप सिंह और ओमंग कुमार की तरह नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता की बहती गंगा में हाथ धोने नहीं आये हैं. वे भाजपा के लिए समर्पित नाटककार हैं और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी में उनकी अटूट वैचारिक श्रद्धा है. मोदी के प्रधानमंत्री बन्ने के बाद यह श्रद्धा स्वाभाविक रूप से गढ़ी हो गयी है.
वेब सीरीज ‘मोदी’ इरोस नाउ नमक डिजिटल प्लेटफार्म पर आएगा. 10 एपिसोड के इस वेब सीरीज का निर्देशन उमेश शुक्ल कर रहे हैं. याद दिला दें कि उमेश शुक्ल ने ‘ओ माय गॉड’ और ‘102 नोट आउट’ फिल्मों का निर्देशन किया है. वे परेश रावल के प्रिय निर्देशक हैं. वेब सीरीज को मिहिर भूता ने राधिका आनंद के साथ लिखा है. इस सीरीज में 12 साल के नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनाने तक की रोमांचक राजनीतिक यात्रा होगी. उनके विभिन्न उम्र में चरित्र को निभाने के लिए लेखा-निर्देशक की टीम ने फैसल खान,आशीष शर्मा और महेश ठाकुर का चुनाव किया है. इरोस नाउ अपर आने के साथ इसके सारे 10 एपिसोड देखे जा सकते हैं. इरोस नाउ अभी नेटफ्लिक्स या अमेज़न की तरह लोकप्रिय प्लेटफार्म नहीं है. हो सकता है की इस वेब सीरीज की वजह से उसका प्रसार हो.
सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर फिल्म स्वयं मोदी और भाजपा की सहमति से बन रही हैं.अगर हां तो इसके पीछे की मंशा और मानसिकता समझी जा सकती है.मतदाताओं/दर्शकों को लुभाने का यह माध्यम कितना कारगर होगा यह तो चुनाव के नतीजों पर इनके प्रभाव के आकलन से पता चलेगा. फिलहाल यही कहा जा सकता है कि नरेन्द्र मोदी और भाजपा फिल्म और वेब सीरीज को लेकर आश्वस्त हैं. और कुछ नहीं तो भोले मतदाताओं के लिए प्रचार सामग्री तो बन ही जायेगा. सोशल मीडिया और मीडिया में छाये मोदी के लिए यह अतिरिक्त प्रयास और प्रभाव होगा.
पुनःश्च : ताज़ा सूचना है कि निर्माता संदीप सिंह ने इस फिल्म के लिए एक रैप गया है,जिसे पैरी जी ने लिखा है और हितेश मोदक ने संगीतबद्ध किया है. बताने की ज़रुरत नहीं कि फिल्म की कहानी भी संदीप सिंह की है.
इस फिल्म का पिछला क्रेडिट पोस्टर आया तो उसमें भाजपा और मोदी के धुर विरोधी जावेद अख्तर का बतौर गीतकार नाम देख कर सभी को हैरानी हुई.उनके साथ समीर का भी नाम था.पहले जावेद अख्तर और फिर समीर ने सोशल मीडिया अपना पक्ष रखा. दोनों ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए स्पष्ट किया कि फिल्म से उनका कोई संबंध नहीं है. दरअसल फिल्म में जावेद अख्तर के गीत ‘इश्वर अल्लाह’(1947:अर्थ) और समीर के गीत ‘सुनो गौर से दुनिया वालों’(दस) का उपयोग किया गया है.स्पष्ट नहीं हुआ है कि संगीत कंपनियों ने बगैर गीतकारों की सहमति के अधिकार कैसे दिए? बाद में संदीप सिंह का हिमाकत भरा बयान आया कि दोनों गीतकारों को सोशल मीडिया पर ना जाकर मुझ से बात करनी चाहिए थी.मोदी पर फिल्म बनाने से आया यह दुस्साहस तो देखिये कि बगैर अनुमति लिए ही आप प्रतोश्थित गीतकारों के नाम पोस्टर पर छाप देते हैं.पूछने पर माफ़ी मांगने बजाय गाल बजाने लगते हैं.
दक्षिण भारत के अभिनेता सिद्धार्थ ने ‘पीएम नरेन्द्र मोदी’ का ट्रेलर देखने के बाद कटाक्ष किया है. उन्होंने ट्वीट किया है...ट्रेलर में यह तो बताया ही नहीं गया की पीएम नरेन्द्र मोदी ने कैसे देश को अकेले ही आज़ादी दिलवा दी.फिल्म रिलीज होने पर निश्चित ही मखौल उदय जायेगा और सोशल मीडिया मीम से भर जायेगा.पर यही तो उन्हें चाहिए...आप मजाक करें या भर्त्सना ....सभी के केंद्र में मोदी हों.
यह भी आशंका है कि चुनाव आयोग फिल्म और वेब सीरीज पर आचार संहिता के मद्देनज़र पाबन्दी लगा दे.


Sunday, November 25, 2018

संडे नवजीवन : जीवित पात्रों का जीवंत चित्रण वाया मोहल्ला अस्सी


संडे नवजीवन
जीवित पात्रों का जीवंत चित्रण वाया मोहल्ला अस्सी
अजय ब्रह्मात्मज
हिंदी फिल्मों के इतिहास में साहित्यिक कृत्यों पर फ़िल्में बनती रही हैं.और उन्हें लेकर विवाद भी होते रहे हैं.ज्यादातर प्रसंगों में मूल कृति के लेखक असंतुष रहते हैं.शिकायत रहती है कि फ़िल्मकार ने मूल कृति के साथ न्याय नहीं किया.कृति की आत्मा फ़िल्मी रूपांतरण में कहीं खो गयी.पिछले हफ्ते डॉ. काशीनाथ सिंह के उपन्यास ‘काशी का अस्सी पर आधारित ‘मोहल्ला अस्सी देश के चंद सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई.इस फिल्म के प्रति महानगरों और उत्तर भारत के शहरों की प्रतिक्रियाएं अलग रहीं.यही विभाजन फिल्म के अंग्रेजी और हिंदी समीक्षकों के बीच भी दिखा.अंग्रेजी समीक्षक और महानगरों के दर्शक ‘मोहल्ला अस्सी के मर्म को नहीं समझ सके.फिल्म के मुद्दे उनके लिए इस फिल्म की बनारसी लहजे(गालियों से युक्त) की भाषा दुरूह और गैरज़रूरी रही.पिछले कुछ सालों में हम समाज और फिल्मों में मिश्रित(हिंग्लिश) भाषा के आदी हो गए हैं.इस परिप्रेक्ष्य में ‘मोहल्ला अस्सी में बोली गयी हिंदी को क्लिष्ट कहना लाजिमी है.
रिलीज से दो दिनों पहले डॉ. काशीनाथ सिंह के शहर बनारस में ‘मोहल्ला अस्सी का विशेष शो रखा गया था.फिल्म के निर्माण के समय निर्देशक डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी और लेखक डॉ. काशीनाथ सिंह ने सोचा था कि फिल्म का प्रीमियर बनारस में रखा जायेगा. प्रीमियर में काशी और अस्सी के निवासियों और उपन्यास के पात्रों को आमंत्रित किया जायेगा.ऐसा नहीं हो सका.फिल्म की रिलीज में हुई देरी और निर्माता-निर्देशक के बीच ठनी अन्यमनस्कता से प्रदर्शन के समय जोश और उत्साह नज़र नहीं आया.यह विडंबना ही है कि हिंदी उपन्यास पर बनी हिंदी फिल्म ‘मोहल्ला अस्सी का कोई पोस्टर हिंदी में नहीं आया.हिंदी दर्शकों तक पहुँचने के लिए हॉलीवुड के निर्माता तक अपनी फिल्मों के पोस्टर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओँ में लेन लगे हैं.बनारस स्थित लेखक डॉ. काशीनाथ सिंह की शिकायत थी कि शहर में फिल्म के प्रचार के लिए ज़रूरी पोस्टर भी दीवारों पर नहीं लगे हैं.यूँ लगा कि रिलीज की रस्म अदायगी भर कर दी गयी.
बहरहाल,बनारस में आयोजित विशेष शो में ‘काशी का अस्सी के लेखक अपने पात्रों और मित्रों-परिचितों के साथ मौजूद रहे.ढाई सौ दर्शकों का स्क्रीन खचाखच भर गया था,क्योंकि पात्र और मित्र अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ आ गए थे.डॉ. काशीनाथ सिंह के लिए यह ख़ुशी का मौका था. वे अपने उपन्यास के पत्रों के साथ फिल्म देख रहे थे. लगभग 20-22 सालों पहले जिन व्यक्तियों के साथ उनका उठाना-बैठा था,जिनसे बहसबाजी होती थी....वे सभी ही अपने संवादों के साथ उपन्यास के पात्र बने.उन पात्रों को डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने खास सोच-समझ से आकार दिया और ‘मोहल्ला अस्सी का चरित्र बना दिया.फिर उन चरित्रों के अनुरूप कलाकारों का चयन किया गया.उन कलाकारों ने निर्देशक के निर्देश और अपनी समझदारी से निभाए जा रहे पात्रों को परदे पर जीवंत किया और उन्हें एक किरदार दिया..व्यक्ति,पात्र,चरित्र,अभिनेता और किरदार की यह प्रक्रिया सृजनात्मक चक्र पूरा कर उन व्यक्तियों के साथ परदे पर चल्तिफिरती नज़र आ रही थी.दर्शकों के बीच पप्पू भी मौजूद थे.वही पप्पू,जिनकी दुकान बनारस के अस्सी के लिए किसी संसद से कम नहीं थी. अंग्रेजी में इसे ‘सररियल’ अनुभव कह सकते हैं.25 सालों की फिल्म पत्रकारिता के करियर में अतीत में कभी ऐसा अनुभव नहीं हुआ,जब परदे के जीवंत किदर जीवित व्यक्ति के रूप में सिनेमाघर में मौजूद हों.इधर उनकी साँसें चल रही हो और उधर रील.रील औए रियल का यह संगम और समागम दुर्लभ अनुभव रहा.’मोहल्ला अस्सी के प्रदर्शन में डॉ.काशीनाथ सिंह,डॉ.गया सिंह,रामजी राय,वीरेंद्र श्रीवास्तव,पप्पू और कुछ दूसरे पात्र(जो फिल्म में नहीं आ पाए) भी आये थे. फिल्म देखने के बाद आह्लादित डॉ. काशीनाथ सिंह की अंतिम पंक्ति थ,’मैं संतुष्ट हूँ.’
प्रदर्शन के बाद की बातचीत में सभी पात्र अपने किरदारों को निभाए कलकारों के अभिनय और संवाद अदायगी की चर्चा मशगूल हुए. डॉ. गया सिंह का मन्ना था की वे पूरा तन कर चलते हैं लाठी की तरह,जबकि उन्हें निभा रहे कलाकार कमर से लचके हुए थे.हां,आवाज़ की ठसक उन्होंने पकड़ ली थी.वीरेंद्र श्रीवास्तव का किरदार राजेंद्र गुप्ता ने निभाया है.वीरेंद्र श्रीवास्तव खुश थे कि राजेंद्र गुप्ता उन्हीं की तरह लहते हैं और उन्होंने बोलने का अंदाज भी सही पकड़ा था.फिल्म में पप्पू की खास भूमिका नहीं थी.वह तो चाय ही बनता रहा,लेकिन प्रदर्शन के दिन वह भी पत्रों में शामिल होकर खुद को उनके समकक्ष महसूस कर रहा था.रवि किशन के भाव,अंदाज और चंठपन से सभी मुग्ध थे कि उन्होंने ने अस्सी के ‘अड़ीबाज’ को आत्मसात कर लिया है.उनके प्रणाम और हर हर महादेव में बनारसी बेलौसपन था.दुर्भाग्य है कि ‘मोहल्ला अस्सी निर्माण और वितरण-प्रदर्शन की आधी-अधूरी रणनीति और असमर्थ हस्तक्षेप की वजह से अपने दर्शकों तक सही संदर्भों के साथ नहीं पहुँच सकी.फिल्मों में चित्रित भारतीय समाज के लिए ‘मोहल्ला अस्सी एक ज़रूरी पाठ के तौर पर देखी और पढ़ी जाएगी.
‘मोहल्ला अस्सी नौ सालों की म्हणत और इंतज़ार का नतीजा है.मुंबई से वाराणसी की एक फ्लाइट में डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने उषा गांगुली के नाटक ‘काशीनामा की समीक्षा पढ़ कर इतने प्रभावित हुए कि उसी नाम की किताब खोजने लगे.बाद में पता चला कि वह डॉ. काशीनाथ सिंह का उपन्यास ‘काशी का अस्सी पर आधारित नाटक है.खैर,अपने मित्र और लेखक के परिचित अतुल तिवारी के साथ बनारस जाकर 2009 में उन्होंने उपन्यास के अधिकार लिए.2010 में उन्हें निर्माता विनय तिवारी मिले.2011 में मुंबई शूटिंग आरम्भ हुई और मार्च तक ख़त्म भी हो गयी.निर्माता-निर्देशक के बीच विवाद हुआ.फिल्म की रिलीज खिसकती गयी.2012 में रिलीज करने की योजना पर पानी फिर गया.2015 में पहले अवैध ट्रेलर और फिर फिल्म लीक होकर इन्टरनेट पर आ गयी.फिल्म अटक गयी.उसके बाद सीबीएफसी का लम्बा चक्कर चला.आख़िरकार दिल्ली हाईकोर्ट ने फिल्म की रिलीज की अनुमति दी और साथ ही कहा कि कला माध्यमों में सृजनात्मक अभिवयक्ति की आज़ादी मिलनी चाहिए.
‘काशी का अस्सी उपन्यास के ‘मोहल्ला अस्सी फिल्म के रूप में रूपांतरण की रोचक कथा पर पूरी किताब लिखी जा सकती है.

   



Wednesday, October 17, 2018

संडे नवजीवन : राष्ट्रवाद का नवाचार


संडे नवजीवन
राष्ट्रवाद का नवाचार
-अजय ब्रह्मात्मज
सर्जिकल स्ट्राइक की दूसरी वर्षगांठ पर हिंदी फिल्म ‘उरी – द सर्जिकल स्ट्राइक’ का टीजर आया. इस फिल्म में विकी कौशल प्रमुख नायक की भूमिका में है. 1 मिनट 17 सेकंड के टीजर में किसी संय अधिकारी की अनुभवी.आधिकारिक और भारी आवाज़ में वाइस् ओवर है. बताया जाता है कि ‘हिंदुस्तान के आज तक के इतिहास में हम ने किसी भी मुल्क पर पहला वार नहीं किया. 1947,61,75,99... यही मौका है उनके दिल में डरर बिठाने का. एक हिन्दुस्तानी चुप नहीं बैठेगा. यह नया हिंदुस्तान है. यह हिंदुस्तान घर में घुसेगा और मारेगा भी.’ वरिष्ठ अधिकारी की इस अधिकारिक स्वीकारोक्ति और घोषणा के बीच जवान ‘अहिंसा परमो धर्मः’ उद्घोष दोहराते सुनाई पड़ते हैं. सभी जानते हैं कि पाकिस्तान ने 18 सितम्बर 2016 को कश्मीर के उरी बेस कैंप में घुसपैठ की थी और 19 जवानों की हत्या कर दी थी. भारत ने डर बिठाने की भावना से सर्जिकल स्ट्राइक किया था. इस सर्जिकल स्ट्राइक को देश की वर्तमान सरकार ने राष्ट्रीय गर्व और शोर्य की तरह पेश कर अपनी झेंप मिटाई थी. गौर करें तो इस संवाद में पाकिस्तान का नाम नहीं लिया गया है,लेकिन युद्ध के सालों से पाकिस्तान का ही संकेत मिलता है.इसमें 196 की ज़िक्र नहीं आता. जिस नया हिंदुस्तान’ की बात की जा रही है,वह सीधे तौर पर वर्तमान प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘न्यू इंडिया’ का अनुवाद है.
याद करे कभी हिंदी फिल्मों के नायक ‘ ये पूरब है पूरबवाले,हर जान की कीमत जानते हैं’ और ‘है प्रीत जहां की रीत सदा,मैं गीत वहां के गता हूँ. भारत का रहनेवाला हूँ,भारत की बात सुनाता हूँ’ जैसे गीतों से भारत की विशेषताओं का बक्कन किया करते थे. राष्ट्र और राष्ट्रवाद फिल्मों के लिए नयी चिंता या टूल नहीं है. आज़ादी के पहले की मूक और बोलती फिल्मों में कभी प्रछन्न और अप्रत्यक्ष रूप से तो कभी सीधे शब्दों में भारतीय अस्मिता की पहचान और राष्ट्र गौरव का उल्लेख होता था. आज़ादी के पहले स्वतंत्रता की लडाई के दौर में मुक्ति  की चेतना और गुलामी के विरुद्ध जागरूकता फैलाने में फ़िल्मों की छोटी-बड़ी भूमिका रही है. विश्वविद्यालयों में राष्ट्रवाद में फिल्मों की भूमिका और योगदान पर पारंपरिक पर्चे तो लिखे गए हैं,लेकिन फिल्मों का व्यवहारिक और उपयोगी अध्ययन और विश्लेषण नहीं किया गया है. मुग़ल बादशाहों और राजपूत राजाओं की हाथों का मकसद कहीं न कहीं दर्शकों को यह बताना और जाताना रहा है कि गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा हिंदुस्तान कभी शांति,समृदधि और संस्कृति का केंद्र था. सत्य,धर्म,अहिंसा और लोकतंत्र की राह पर चल रहे भारत ने कभी पडोसी देशों पर आक्रामण नहीं किया. भारत की भूमि में कदम रखे व्यक्तियों को मेहमान माना और उन्हें बार-बार सत्ता तक सौंप दी. कुछ तो यहीं बस हाय और भारतीय समाज में घुलमिल गए,जिनमें से कुछ को अलगाने और छांटने की कोशिश की जा रही है. और कुछ शासक बन कर लूटते रहे. हिंदी फिल्मों में में इनका यशोगान मिलता है तो साथ ही शासकों के खिलाफ छटपटाहट भी जाहिर होती है.
हिंदी फिल्मों में राष्ट्रवाद कभी मुखर तरीके से व्यक्त नहीं हुआ.आज़ादी के पहले अंग्रेजों के सेंसर का डर रहता था. आज़ादी के बाद राष्ट्र गौरव के बदले राष्ट्र निर्माण पर जोर दिया जाने लगा नेहरु के सपनों के सेक्युलर भारत के चरित्र गधे गए. इन फिल्मों में विविधता में एकता और राष्ट्रीय एकता के संवैधानिक सिद्धांतों को चरित्रों और संवादों में पिरोया जाता था. तब फिल्मों में वर्णित राष्ट्रवाद ‘भारत’ के लिए लक्षित होता था. वह किसी राजनीतिक पार्टी के एजेंडा या किसी नेता के भाषण से निर्दिष्ट या संचालित नहीं होता था.यह शोध और अध्ययन का विषय हो सकता है कि कैसे नेहरु और शास्त्री के आह्वान देश के प्रधानमंत्री के आग्रह के रूप में फ़िल्मकारों ,कलाकारों और नागरिकों तक संप्रेषित होते थे,जबकि आज प्रधानमंत्री का आह्वान किसी राजनीतिक पार्टी के नेता मोदी के आदेश के रूप में सुनाई पड़ता है. यही कारण है कि आज की फिल्मों में राष्ट्रगान,भारतीय तिरंगा या भारत की गौरव गाथा सुन कर राष्ट्रीय भावना का संचार नहीं होता. ‘वन्दे मातरम’ का उद्घोष ‘बोलो वन्दे मातरम’ का आदेश बन जाता है. डर लगता है कि जयघोष नहीं किया या बीच फिल्म में ‘जन गण मन’ सुन कर खड़े नहीं हुए तो कोई अदृश्य हाथ कालर पकड़ कर खींचेगा और ‘मॉब लिंचिंग’ के लिए ‘न्यू इंडिया’ के भक्तों के बीच ड्राप कर देगा. राष्ट्रवाद धीरे से अंधराष्ट्रवाद और फिर फर्जी राष्ट्रवाद में बदल गया है.
यह अनायास नहीं हुआ है. हम इसी सदी की बात करें तो ‘लगान’ या ‘चक दे इंडिया’ देखते हुए कतई भान नहीं होता कि देशभक्ति की घुट्टी पिलाई जा रही है. भुवन और कबीर खान का संघर्ष और प्रयत्न भारत के लिए है. वे अपे परिवेश और माहौल में गुलामी और क्षेत्रीयता से निकलना चाहते हैं. उनकी एकजुटता उस विजय के लिए है,जो सामूहिक है.’चक दे इंडिया’ और ‘गोल्ड’ को आगे-पीछे देखें तो स्पष्ट हो जायेगा कि फ़िल्मकार किस तरह के दबाव में सृजनात्मक एकांगिता के शिकार हो रहे हैं. ‘चक दे इंडिया’ का कबीर खान भी ‘इंडिया’ के लिए टीम बना रहा है और ‘गोल्ड’ के तपन दास की ‘इंडिया’ की जीत की आकांक्षा में फर्क है. एक खेल में जीत चाहता है तो दूसरा देश के रूप में जीत चाहता है.’हमरी टीम लंदन में ब्रिटेन को हरा कर 200 सालों की गुलामी का बदला लेगी’ या ‘हम अपना झंडा फहराएंगे और राष्ट्र गान गायेंगे’ जैसे संवाद बोलता तपन दास फर्जी देशभक्त जान पड़ता है. यह थोपा गया राष्ट्रवाद है,जो इन दिनों फैशन में है. इसे संयोग कहें या सुनियोजित चुनाव कि अक्षय कुमार  ‘न्यू इंडिया’ के भारत कुमार के रूप में उभरे हैं. उनकी फिल्मों ‘एयरलिफ्ट’,‘टॉयलेट एक प्रेमकथा’ और ‘पैडमैन’ में भी राष्ट्रवाद छलकाया गया है है. नीरज पाण्डेय ने ‘बेबी’ में उन्हें देशभक्ति दिखाने का पहला मौका दिया. उसके बाद उनकी फिल्मों में लगातार देशभक्ति और राष्ट्रवाद के सचेत संदेशात्मक संवाद होते हैं. मनोज कुमार और अक्षय कुमार की प्रस्तुति और धरना में बड़ा फर्क है. हम सभी जानते हैं कि प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के कहने पर मनोज कुमार ने ‘जय जान जय किसान’ के नारे को लेकर ‘उपकार’ लिखी और निर्देशित की. अभी प्रधानमंत्री ने नहीं कहा है,लेकिन सभी उन्हें सुननाने में लगे हैं. कभी जॉन अब्राहम तो कभी कोई और देशभक्ति के ‘समूह गान’ में शामिल होता दिखता है.
अभी का फर्जी राष्ट्रवाद हिन्दू राष्ट्रवाद से प्रेरित है,जो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर रचा जा रहा है.इसकी शुरुवात तो ‘आज़ादी’ के नारे से होती है,लेकिन आखिर में ‘हर हर महादेव’ सुनात्यी पड़ता है. कंगना रनोट की ‘मणिकर्णिका’ का टीजर आप सभी ने देख ही लिया होगा. समस्या हिन्दू प्रतीकों और जयकारों से नहीं है. समस्या उनके जबरन उपयोग या दुरुपयोग को लेकर है. फिल्म शुरू होने के पहले सिनेमाघरों में राष्ट्र गान कई साल पहले से अनिवार्य हो चुका है,उसके सम्मान में खड़े होने या न हो पाने का विवाद पिछले चार सालों में समाचारों में आने लगा है.’भाग मिल्खा भाग’ में मिल्खा सिंह का संघर्ष भारत के एक खिलाडी का संघर्ष ‘सूरमा’ तक आते-आते भिन्न अर्थ ले लेता है.न्यू इंडिया के ‘राष्ट्रवाद’ का दवाब इतना ज्यादा है की सामान्य प्रेम कहानियों एन भी किसी न किसी बहने इसे लेप और थोपा जा रहा है..