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Showing posts from August, 2008

हिन्दी टाकीज:दर्शक की यादों में सिनेमा -रवीश कुमार

हिन्दी टाकीज-7 रवीश कुमार को उनके ही शब्दों में बताएं तो...हर वक्त कई चीज़ें करने का मन करता है। हर वक्त कुछ नहीं करने का मन करता है। ज़िंदगी के प्रति एक गंभीर इंसान हूं। पर खुद के प्रति गंभीर नहीं हूं। मैं बोलने को लिखने से ज़्यादा महत्वपूर्ण मानता हूं क्योंकि यही मेरा पेशा भी है। ...रवीश ने हिन्दी टाकीज के ये आलेख अपने ब्लॉग पर बहुत पहले डाले थे,लेकिन चवन्नी के आग्रह पर उन्होंने अनुमति दी की इसे चवन्नी के ब्लॉग पर पोस्ट किया जा सकता है.जिन्होंने पढ़ लिया है वे दोबारा फ़िल्म देखने जैसा आनंद लें और जो पहले पाठक हैं उन्हें तो आनंद आएगा ही .... जो ठीक ठीक याद है उसके मुताबिक पहली बार सिनेमा बाबूजी के साथ ही देखा था। स्कूटर पर आगे खड़ा होकर गया था। पीछे मां बैठी थी। फिल्म का नाम था दंगल। उसके बाद दो कलियां देखी। पटना के पर्ल सिनेमा से लौटते वक्त भारी बारिश हो रही थी। हम सब रिक्शे से लौट रहे थे। तब बारिश में भींगने से कोई घबराता नहीं था। हम सब भींगते जा रहे थे। मां को लगता था कि बारिश में भींगने से घमौरियां ठीक हो जाती हैं। तो वो खुश थीं। हम सब खुश थे। बीस रुपये से भी कम में चार लोग सिनेमा

फ़िल्म समीक्षा :रॉक ऑन

दोस्ती की महानगरीय दास्तान -अजय ब्रह्मात्मज फरहान अख्तर की पहली फिल्म दिल चाहता है में तीन दोस्तों की कहानी थी। फिल्म काफी पसंद की गई थी। इस बार उनकी प्रोडक्शन कंपनी ने अभिषेक कपूर को निर्देशन की जिम्मेदारी दी। दोस्त चार हो गए। महानगरीय भावबोध की रॉक ऑन मैट्रो और मल्टीप्लेक्स के दर्शकों के लिए मनोरंजक है। आदित्य, राब, केडी और जो चार दोस्त हैं। चारों मिल कर एक बैंड बनाते हैं। आदित्य इस बैंड का लीड सिंगर है और वह गीत भी लिखता है। उसके गीतों में युवा पीढ़ी की आशा-निराशा, सुख-दुख, खुशी और इच्छा के शब्द मिलते हैं। चारों दोस्तों का बैंड मशहूर होता है। उनका अलबम आने वाला है और म्यूजिक वीडियो भी तैयार हो रहा है। तभी एक छोटी सी बात पर उनका बैंड बिखर जाता है। चारों के रास्ते अलग हो जाते हैं। दस साल बाद आदित्य की पत्नी के प्रयास से चारों दोस्त फिर एकत्रित होते हैं। उनका बैंड पुनर्जीवित होता है। आपस के मतभेद और गलतफहमियां भुलाकर सब खुशहाल जिंदगी की तरफ बढ़ते हैं। लेखक-निर्देशक अभिषेक कपूर ने रोचक पटकथा लिखी है। ऊपरी तौर पर फिल्म में प्रवाह है। कोई भी दृश्य फालतू नहीं लगता लेकिन गौर करने पर हम प

फ़िल्म समीक्षा:चमकू

-अजय ब्रह्मात्मज यथार्थ का फिल्मी चित्रण शहरी दर्शकों के लिए इस फिल्म के यथार्थ को समझ पाना सहज नहीं होगा। फिल्मों के जरिए अंडरव‌र्ल्ड की ग्लैमराइज हिंसा से परिचित दर्शक बिहार में मौजूद इस हिंसात्मक माहौल की कल्पना नहीं कर सकते। लेखक-निर्देशक कबीर कौशिक ने वास्तविक किरदारों को लेकर एक नाटकीय और भावपूर्ण फिल्म बनाई है। फिल्म देखते वक्त यह जरूर लगता है कि कहीं-कहीं कुछ छूट गया है। एक काल्पनिक गांव भागपुर में खुशहाल किसान परिवार में तब मुसीबत आती है, जब गांव के जमींदार उससे नाराज हो जाते हैं। वे बेटे के सामने पिता की हत्या कर देते हैं। बेटा नक्सलियों के हाथ लग जाता है। वहीं उसकी परवरिश होती है। बड़ा होने पर चमकू नक्सल गतिविधियों में हिस्सा लेता है। एक मुठभेड़ में गंभीर रूप से घायल होने के बाद वह खुद को पुलिस अस्पताल में पाता है। वहां उसके सामने शर्त रखी जाती है कि वह सरकार के गुप्त मिशन का हिस्सा बन जाए या अपनी जिंदगी से हाथ धो बैठे। चमकू गुप्त मिशन का हिस्सा बनता है। वह मुंबई आ जाता है, जहां वह द्वंद्व और दुविधा का शिकार होता है। वह इस जिंदगी से छुटकारा पाना चाहता है लेकिन अपराध जगत की

बॉक्स ऑफिस:२९.०८.२००८

नही चला मल्लिका का जादू सिंह इज किंग ने यह ट्रेंड चालू कर दिया है कि शुक्रवार को फिल्म रिलीज करो और अगले सोमवार को कामयाबी का जश्न मना लो। इसके दो फायदे हैं- एक तो ट्रेड में बात फैलती है कि फिल्म हिट हो गयी है और दूसरे कामयाबी के जश्न की रिपोर्टिग देख, सुन और पढ़ कर दूसरे शहरों के दर्शकों को लगता है कि फिल्म हिट है, तभी तो पार्टी हो रही है। इस तरह कामयाबी के प्रचार से फिल्म को नए दर्शक मिल जाते हैं। पिछले सोमवार को फूंक की कामयाबी की पार्टी थी। एक बुरी फिल्म की कामयाबी का जश्न मनाते हुए निर्देशक राम गोपाल वर्मा की संवेदना अवश्य आहत हुई होगी। मन तो कचोट रहा होगा, लेकिन कैसे जाहिर करें? बहरहाल, फूंक के प्रचार से आरंभिक दर्शक मिले। पहले दिन इसका कलेक्शन 70 प्रतिशत था। राम गोपाल वर्मा की पिछली फिल्मों के व्यापार को देखते हुए इसे जबरदस्त ओपनिंग मान सकते हैं। शनिवार को दर्शक बढ़े, लेकिन रविवार से दर्शक घटने आरंभ हो गए। इस फिल्म की लागत इतनी कम है कि सामान्य बिजनेस से भी फिल्म फायदे में आ गयी है। मान गए मुगले आजम और मुंबई मेरी जान का बुरा हाल रहा। संजय छैल की मान गए मुगले आजम देखने दर्शक गए

फिल्मी पर्दे और जीवन का सच

-अजय ब्रह्मात्मज कुछ दिनों पहले शबाना आजमी ने बयान दे दिया कि मुसलमान होने के कारण उन्हें (पति जावेद अख्तर समेत) मुंबई में मकान नहीं मिल पा रहा है। उनके बयान का विरोध हो रहा है। शबाना का सामाजिक व्यक्तित्व ओढ़ा हुआ लगता है, लेकिन अपने इस बयान में उन्होंने उस कड़वी सच्चाई को उगल दिया है, जो भारतीय समाज में दबे-छिपे तरीके से मौजूद रही है। मुंबई की बात करें, तो अयोध्या की घटना के बाद बहुत तेजी से सामुदायिक ध्रुवीकरण हुआ है। निदा फाजली जैसे शायर को अपनी सुरक्षा के लिए मुस्लिम बहुल इलाके में शिफ्ट करना पड़ा। गैर मजहबी और पंथनिरपेक्ष किस्म के मुसलमान बुद्धिजीवियों, शायरों, लेखकों और दूसरी समझदार हस्तियों ने अपने ठिकाने बदले। आम आदमी की तो बात ही अलग है। अलिखित नियम है कि हिंदू बहुल सोसाइटी और बिल्डिंग में मुसलमानों को फ्लैट मत दो। हिंदी सिनेमा बहुत पहले से इस तरह के सामाजिक भेदभाव दर्शाता रहा है। देश में मुसलमानों की आबादी करीब बीस प्रतिशत है, लेकिन फिल्मों में उनका चित्रण पांच प्रतिशत भी नहीं हो पाता। मुख्यधारा की कॉमर्शिअॅल फिल्मों में कितने नायकों का नाम खुर्शीद, अनवर या शाहरुख होता है?

हिन्दी टाकीज: फ़िल्में, बचपन और छोटू उस्ताद-रवि रतलामी

हिन्दी टाकीज-6 हिन्दी टाकीज में इस बार रवि रतलामी.ब्लॉग जगत के पाठकों को रवि रतलामी के बारे में कुछ भी नया बताना नामुमकिन है.उनके कार्य और योगदान के हम सभी कृतज्ञ हैं.उन्होंने चवन्नी का आग्रह स्वीकार किया और यह सुंदर आलेख भेजा.इस कड़ी को कम से कम १०० तक पहुँचाना है.चवन्नी का आप सभी से आग्रह है कि आप अपने अनुभव और संस्मरण बांटे.आप अपने आलेख यूनिकोड में chavannichap@gmail.com पर भेजें. फ़िल्में, बचपन और छोटू उस्ताद पिछली गर्मियों में स्पाइडरमैन 3 जब टॉकीज में लगी थी तो घर के तमाम बच्चों ने हंगामा कर दिया कि वो तो टॉकीज पर ही फ़िल्म देखने जाएंगे और वो भी जितनी जल्दी हो सके उतनी. उन्हें डीवीडी, डिश या केबल पर इसके दिखाए जाने तक का इंतजार कतई गवारा नहीं था. और उसमें हमारा हीरो छोटू भी था. बच्चे उठते बैठते, खाते पीते अपने अभिभावकों को प्रश्न वाचक दृष्टि से देखते रहते कि उन्हें हम कब फ़िल्म दिखाने ले जा रहे हैं. अंततः जब छोटू ने स्पाइडरमैन फ़िल्म देखने के नाम पर खाना पीना बंद कर बुक्के फाड़कर रोना पीटना शुरू कर दिया कि उनके पापा-मामा तीन मर्तबा वादा करने के बाद भी स्पाइडरमैन दिखाने नहीं

फ़िल्म समीक्षा:मुंबई मेरी जान

मुंबई के जिंदादिल चरित्र ऐसी फिल्मों में कथानक नहीं रहता। चरित्र होते हैं और उनके चित्रण से ही कथा बुनी जाती है। हालांकि फिल्म के पोस्टर पर पांच ही चरित्र दिखाए गए हैं, लेकिन यह छह चरित्रों की कहानी है। छठे चरित्र सुनील कदम को निभाने वाला कलाकार अपेक्षाकृत कम जाना जाता है, इसलिए निर्माता ने उसे पोस्टर पर नहीं रखा। फिल्म के निर्देशक निशिकांत कामत हैं और वे सबसे पहले इस उपक्रम के लिए बधाई के पात्र हैं कि आज के माहौल में वे ऐसी भावनात्मक और जरूरी फिल्म लेकर आए हैं। 11 जुलाई 2006 को मुंबई के लोकल ट्रेनों में सीरियल बम विस्फोट हुए थे। एक बारगी शहर दहल गया था और इसका असर देश के दूसरे हिस्सों में भी महसूस किया गया था। बाकी देश में चिंताएं व्यक्त की जा रही थीं, लेकिन अगले दिन फिर मुंबई अपनी रफ्तार में थी। लोग काम पर जा रहे थे और लोकल ट्रेन का ही इस्तेमाल कर रहे थे। मुंबई के इस जोश और विस्फोट के प्रभाव को निशिकांत कामत ने विभिन्न चरित्रों के माध्यम से व्यक्त किया है। उनके सभी चरित्र मध्यवर्गीय और निम्न मध्यवर्गीय परिवेश के हैं। न जाने क्यों उन्होंने शहर के संपन्न और सुरक्षित तबके के चरित्रों क

फ़िल्म समीक्षा:फूँक

डर लगा राम गोपाल वर्मा के लिए फूंक डराती है। यह डर फिल्म देखने के बाद और बढ़ जाता है। डर लगता है कि राम गोपाल वर्मा और क्या करेंगे? प्रयोगशील और साहसी निर्देशक राम गोपाल वर्मा हर विधा में बेहतर फिल्म बनाने के बाद खुद के स्थापित मानदंडों से नीचे आ रहे हैं। डर लग रहा है कि एक मेधावी निर्देशक सृजन की वैयक्तिक शून्यता में लगातार कमजोर और साधारण फिल्में बना रहा है। फूंक रामू के सृजनात्मक क्षरण का ताजा उदाहरण है। पूरी फिल्म इस उम्मीद में गुजर जाती है कि अब डर लगेगा। काला जादू के अंधविश्वास को लेकर रामू ने लचर कहानी बुनी है। फिल्म की घटनाओं, दृश्य और प्रसंग का अनुमान दर्शक पहले ही लगा लेते हैं। फिल्म खतरनाक तरीके से काला जादू में यकीन करने की हिमायत करती है और उसके लिए बाप-बेटी के कोमल भावनात्मक संबंध का उपयोग करती है। रामू से ऐसी पिछड़ी और प्रतिगामी सोच की अपेक्षा नहीं की जाती। फिल्में सिर्फ मनोरंजन ही नहीं करती, भारतीय समाज में वे दर्शकों की मानसिकता भी गढ़ती हैं। एक जिम्मेदार निर्देशक से अपेक्षा रहती है कि वह मनोरंजन के साथ कोई विचार भी देगा। मुख्य कलाकार : सुदीप, अमृता खनविलकर, अहसास

फ़िल्म समीक्षा:मान गए मुगलेआज़म

छेल हुए फेल कैसे मान लें कि जो अच्छा लिखते और सोचते हैं, वे अच्छी फिल्म नहीं बना सकते? मान गए मुगलेआजम देख कर मानना पड़ता है कि संजय छैल जैसे संवेदनशील, चुटीले और विनोदी प्रकृति के लेखक भी फिल्म बनाने में चूक कर सकते हैं। फिल्म की धारणा भी आयातित और चोरी की है, इसलिए छैल की आलोचना होनी ही चाहिए। ऐसी फिल्मों के लिए निर्माता से ज्यादा लेखक और निर्देशक दोषी हैं। गोवा के सेंट लुईस इलाके में कलाकार थिएटर कंपनी के साथ जुड़े कुछ कलाकार किसी प्रकार गुजर-बसर कर रहे हैं। अंडरव‌र्ल्ड पर नाटक करने की योजना में विफल होने पर वे फिर से अपना लोकप्रिय नाटक मुगलेआजम करते हैं। अनारकली बनी (मल्लिका सहरावत) शबनम का एक दीवाना अर्जुन (राहुल बोस) है। जब भी उसके पति उदय शंकर मजूमदार (परेश रावल) अकबर की भूमिका निभाते हुए पांच मिनट का एकल संवाद आरंभ करते हैं, अर्जुन उनकी पत्नी से मिलने मेकअप रूम में चला जाता है। बाद में पता चलता है कि वह रा आफिसर है। इंटरवल तक के विवाहेतर संबंध के इस मनोरंजन के बाद ड्रामा शुरू होता है। रा आफिसर थिएटर कंपनी के कलाकारों की मदद से आतंकवादियों की खतरनाक योजना को विफल करता है। ट्री

समाज को चाहिए कुछ विद्रोही-महेश भट्ट

दावानल खबरों में है। कैलिफोर्निया के जंगल की आग तबाह कर रही है। इन पंक्तियों को लिखते समय मैं टीवी पर आग की लपटें देख रहा हूं। कम ही लोग महसूस कर पाते हैं कि आग पर्यावरण का जरूरी हिस्सा है, क्योंकि यह पुराने को जला देती है और नए विकास के लिए जगह बनाती है। इसी प्रकार विद्रोही भी जरूरी होते हैं। संस्कृति के पर्यावरण को सुव्यवस्थित और विकसित करने के लिए उनकी जरूरत पडती है। जंगल की आग की तरह वे भी पुराने को जला देते हैं। विद्रोही संस्कृति की मोर्चेबंदी को तोडते हैं और जिंदगी के नए अवतार के लिए जगह बनाते हैं। विद्रोह के परिणाम तुम वही क्यों नहीं करते, जो तुम्हें कहा जाता है? स्कूल के दिनों में मुझे अपने शिक्षक से अकसर यह डांट मिलती थी। पर आप जो समझाते और कहते हैं, उस तरह से आप खुद जीवन बसर नहीं करते। आप मुझे ईमानदार होने के लिए कहते हैं और मैं पाता हूं कि मेरे आसपास हर आदमी अपने दावे के विपरीत काम कर रहा है। मेरे पूर्वज उन भिक्षुओं की तरह थे, जो आदर्श की माला जपते रहे, लेकिन जीवन में उन्हें नहीं उतार सके। जो शिक्षक मुझे शिवाजी के साहस के बारे में बता रहे थे, वे स्कूल के बाहर खडी उत्तेजित भी

दरअसल:प्रचार में गौण होते निर्देशक

-अजय ब्रह्मात्मज हर कलाकार अपने इंटरव्यू में निर्देशक को कैप्टन ऑफ द शिप कहता है। मुहावरा बहुत पुराना जरूर है, लेकिन यही मुहावरा प्रचलित है। हां, निर्देशक फिल्म रूपी जहाज का कप्तान होता है, क्योंकि यही सच है। निर्देशक ही फिल्म की प्लानिंग करता है। एक रचना-संसार सुनिश्चित करता है। लेखक की मदद से किरदार गढ़ता है और फिर उनमें प्राण फूंक देता है। पर्दे पर चलते-फिरते वे किरदार दर्शकों से संवाद और संवेदना स्थापित करते हैं। दो से तीन घंटे की उस दुनिया को गढ़ने वाला निर्देशक ही होता है। अगर आप फिल्म जगत से वाकिफ हैं और निर्माण की प्रक्रिया से परिचित हैं, तो निर्देशक की नियामक भूमिका को समझ सकते हैं। एक सिम्पल विचार को फिल्म में परिणत करना और फिर उसे व्यापार योग्य वस्तु बना देने में आज के निर्देशक की भूमिका फिल्म पूरी होने के साथ खत्म हो जाती है। फिल्म का फाइनल प्रिंट आते ही इन दिनों बाजार के जानकार उसकी मार्केटिंग और पैकेजिंग की रणनीति तय करना शुरू कर देते हैं। अफसोस की बात तो यह है कि इस रणनीति में निर्देशक की राय नहीं ली जाती और न उसे इतना जरूरी समझा जाता है कि फिल्म के प्रचार में उसका समुचि

बॉक्स ऑफिस:२२.०८.२००८

पर्व-त्योहार से हुआ फायादा पर्व-त्योहार के दिनों में सिनेमाघरों में भीड़ बढ़ जाती है। साथ में छुट्टियां आ जाएं तो टिकट बिक्री अच्छी होती है। पिछले हफ्ते रिलीज हुई बचना ऐ हसीनों और गाड तुसी ग्रेट हो को 15 अगस्त, रक्षाबंधन, शब-ए-बारात और नवरोज के साथ रविवार का फायदा हुआ। चार दिनों में फिल्मों का आरंभिक कलेक्शन संतोषजनक रहा। बचना ऐ हसीनों यशराज की फिल्म है। इस बार उन्हें सामान्य लाभ होता दिख रहा है। टशन के गम के बाद यशराज टीम में खुशी की लहर लौटी है। महानगरों और मल्टीप्लेक्स में यह फिल्म अधिक पसंद की जा रही है। सिंगल स्क्रीन और अपेक्षाकृत मध्यम व छोटे शहरों में इसके दर्शक तेजी से घट रहे हैं। फिल्म की कहानी और किरदार हिंदी सिनेमा के दर्शक से कनेक्ट नहीं हो पाए। दूसरी फिल्म गाड तुसी ग्रेट हो में सलमान खान के कारण दर्शकों ने रुचि दिखाई। यह फिल्म छोटे शहरों और सिंगल स्क्रीन में ज्यादा अच्छा व्यवसाय कर रही है। वैसे इस फिल्म के प्रति भी दर्शकों का उत्साह जल्दी ही ठंडा हो गया। मंगलवार से इस फिल्म के दर्शक घटे हैं। लगता है कि बचना ऐ हसीनों और गाड तुसी ग्रेट हो सामान्य बिजनेस ही कर पाएंगी। पिछ

जो काम मिले, उसे मन से करो: बिपाशा बसु

फिल्म बचना ऐ हसीनों की एक हसीना बिपाशा बसु हैं। उनका फिल्म के हीरो से मुंबई में रोमांस होता है। कुछ गाने होते हैं और बस काम खत्म। हीरोइन की ऐसी भूमिकाओं से बहुत संतुष्ट नहीं होतीं बिपाशा बसु, हालांकि वे नाखुश भी नहीं हैं। वे आह भरती हुई कहती हैं, अब कहां बची हैं लीड भूमिकाएं। वैसे रोल ही नहीं लिखे जा रहे हैं! मैंने तो कुछ सालों पहले ही लीड रोल की चिंता छोड़ दी। काम करना है, तो जो भूमिका मिले, उसे मन से करो और उसी में अपनी छाप छोड़ दो। बिपाशा आश्वस्त हैं कि दीपिका पादुकोण और मिनिषा लांबा जैसी नई अभिनेत्रियों के बीच वे बेमेल नहीं लगेंगी। वे धीरे से बता भी देती हैं, मिनिषा उम्र में मुझसे बड़ी ही होंगी। हां, वे देर से फिल्मों में आई हैं, इसलिए मुझ से छोटी दिखती हैं। वैसे उम्र से क्या फर्क पड़ता है? आप जब तक पर्दे पर आकर्षक और ग्लैमरस दिखते हैं, तब तक सब ठीक है। बिपाशा इस फिल्म में राधिका का किरदार निभा रही हैं, जो दुनिया के रस्म-ओ-रिवाज को नहीं मानती। वे मानती हैं किउनकी स्क्रीन एज ज्यादा है। वे पिछले छह सालों से काम कर रही हैं। मॉडलिंग, फिल्में और विज्ञापनों की वजह से उनका चेहरा जाना-पहचा

श्रीमान सत्यवादी और गुलजार

माना जाता है कि बिमल राय की फिल्म 'बंदिनी' से गुलजार का फिल्मी जीवन आरंभ हुआ। इस फिल्म के गीत 'मेरा गोरा अंग लेइ ले' का उल्लेख किया जाता है। किसी भी नए गीतकार और भावी फिल्मकार के लिए यह बड़ी शुरूआत है। लेकिन क्या आपको मालूम है कि गुलजार ने 'बंदिनी' से तीन साल पहले एसएम अब्बास निर्देशित 'श्रीमान सत्यवादी' के गीत लिखे थे। इस फिल्म में गीत लिखने के साथ निर्देशन में भी सहायक रहे थे। तब उनका नाम गुलजार दीनवी था। दीनवी उपनाम उनके गांव दीना से आया था। हेमेन गुप्ता की फिल्म 'काबुलीवाला' में भी उनका नाम सहायक निर्देशक के तौर पर मिलता है। जाने क्यों गुलजार के जीवनीकार उनकी इस फिल्म का उल्लेख नहीं करते? गुलजार ने स्वयं भी कभी स्पष्ट नहीं कहा कि 'बंदिनी' के 'गोरा अंग लेई ले' के पहले वे गीत लिख चुके थे। 'श्रीमान सत्यवादी' में राज कपूर और शकीला ने मुख्य चरित्र निभाए थे। फिल्म में दत्ताराम वाडेकर का संगीत था। गीतकारों में हसरत जयपुरी, गुलजार दीनवी और गुलशन बावरा के नाम हैं। गुलजार दीनवी ने इस फिल्म में (1) भीगी

हिन्दी टाकीज:इस तरह सुनते जैसे हम देख रहे हों -विमल वर्मा

हिन्दी टाकीज-5 विमल वर्मा अपने बारे में लिखते हैं... बचपन की सुहानी यादो की खुमारी अभी भी टूटी नही है॥ जवानी की सतरगी छाँव गोरखपुर,बलिया,आज़मगढ़, इलाहाबाद, और दिल्ली मे.. फिलहाल १२ साल से मुम्बई मे.. चैनल के साथ रोजी-रोटी का नाता... उसी खुमारी से हम सिनेमा से सम्बंधित कुछ यादें ले आयें हैं.विमल वर्मा ने वादा किया है की वे बाद में विस्तार से लिखेंगे,तब तक के लिए पेश है.... जब छोटा था तो, फ़िल्म देखना हमारे लिये उत्सव जैसा होता था...घर से नाश्ता॥पानी की बोतल आदि के साथ....पूरा परिवार फ़िल्म देखने जाता था...हमारे लिये एकदम पिकनिक जैसा होता था...बचपन में धार्मिक फ़िल्में देखने ही जाया करते थे.....मैं छोटे बड़े शहर में पिताजी की नौकरी की वजह से बहुत रहे थे......समय रेडियो ट्रांजिस्टर का था कुछ खास गीत होते थे जिन्हें सुनकर हम उन जगहों को याद करते थे.....जहां हम पहले रह आये थे जैसे ।ताजमहल फ़िल्म का गाना "जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा" या "हंसता हुआ नूरानी चेहरा".......बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है कानपुर की याद दिलाता, गोरखपुर "ये जो मोहब्बत है ये उनका

मुहब्बत न होती तो कुछ भी न होता-महेश भट्ट

यह दुनिया प्रेम के विभिन्न प्रकारों से बनी है। मां का अपने शिशु से और शिशु का मां से प्रेम, पुरुष का स्त्री से प्रेम, कुत्ते का अपने मालिक से प्रेम, शिष्य का अपने गुरु या उस्ताद से प्रेम, व्यक्ति का अपने देश और लोगों से प्रेम और इंसान का ईश्वर से प्रेम आदि। प्रेम का रहस्य वास्तव में मृत्यु के रहस्य से गहरा होता है। मानव जीवन के इस महत्वपूर्ण तत्व और मानवीय व्यापार एवं व्यवहार में इसके महत्व के बारे में कुछ बढाकर कहने की जरूरत नहीं है। हम लोगों में से अधिकतर या तो प्रेम जाहिर करते हैं या फिर किसी की प्रेमाभिव्यक्ति पाते हैं। लेकिन यह प्रेम है क्या जो हम सभी को इतनी खुशी और गम देता है? एक आलेख में प्रेम के संबंध में इन सभी के विचार और दृष्टिकोण को समेट पाना मुश्किल है। मैं हिंदी फिल्मों की अपनी यादों के प्रतिबिंबों के सहारे प्रेम के रूपों को रेखांकित करने की कोशिश करूंगा। माता-पिता, कवि, पैगंबर, उपदेशक, मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक अपनी-अपनी तरह से प्रेम को समझते हैं। हिंदी फिल्मकारों की भी अपनी समझ है। मदर इंडिया का प्रेम समय की धुंध हटाने के साथ मैं खुद को एक सिनेमाघर में पाता हूं। एक श्वे

फ़िल्म समीक्षा:बचना ऐ हसीनों

एक फिल्म में तीन प्रेम कहानियां बहरहाल, हिंदी लिखने और बोलने में बरती जा रही लापरवाही बचना ऐ हसीनों में भी दिखती है। शीर्षक में ही हसीनो लिखा गया है। फिल्म में राज और उसकी जिंदगी में आई तीन हसीनाओं की कहानी है। राज दिलफेंक किस्म का नौजवान है। लड़कियों को प्रेमपाश में बांधना और फिर उनके साथ मौज-मस्ती करने को उसने राजगीरी नाम दे रखा है। वह अपनी जिंदगी में आई माही और राधिका को धोखा देता है। उनकी मनोभावनाओं और प्यार की कद्र नहीं करता। फिर उसकी मुलाकात गायत्री से होती है। वह गायत्री से प्रेम करने लगता है। जब गायत्री उसका दिल तोड़ती है और उसके प्रेम को अस्वीकार कर देती है, तब उसकी समझ में आता है कि दिल टूटने पर कैसा लगता है? इस अहसास के बाद वह पुरानी प्रेमिकाओं, माही और राधिका, से माफी मांगने वापस लौटता है। वह उनके सामने स्वीकार करता है कि वह कमीना और गिरा हुआ आदमी है। संभवत: हिंदी फिल्म में पहली बार हीरो ने खुद को कमीना और गिरा हुआ इंसान कहा है। पुरानी प्रेमिकाओं से जबरदस्ती माफी लेने के बाद राज नई प्रेमिका गायत्री के पास लौटता है। इस दरम्यान गायत्री को भी अहसास हो चुका है कि वह राज से प्र

फ़िल्म समीक्षा:गॉड तूसी ग्रेट हो

ठीक नहीं है परिवर्तन इस फिल्म की धारणा रोचक है। अगर प्रकृति और जीवन के कथित नियंता भगवान की जिम्मेदारी इंसान को दे दी जाए तो क्या होगा? अरुण प्रजापति नौकरी, प्रेम, परिवार और जीवन की उलझनों में फंसा निराश युवक है। लगातार असफलताओं ने उसे चिडि़चिड़ा बना दिया है। वह भगवान से संवाद करता है और अपनी नाकामियों के लिए उन्हें दोषी ठहराता है। उसके आरोपों से झुंझला कर भगवान उसे अपनी दिव्य शक्तियों से लैस कर देते हैं और कहते हैं कि अगले दस दिनों तक वह दुनिया चलाए। मध्यवर्गीय अरुण सबसे पहले अपनी समस्याएं दूर करता है और फिर दुनिया भर के लोगों की मनोकामनाएं पूरी कर देता है। सबकी मनोकामना पूरी होते ही दुनिया में हड़कंप मच जाता है। व्यवस्था चरमरा जाती है। फिर भगवान समझाते हैं कि दुनिया को नियंत्रण में रखना कितना जरूरी है। यथास्थिति बनी रहे तो दुनिया सुचारू ढंग से चलती रहती है। परिवर्तन दुनिया के लिए ठीक नहीं है। हर इंसान को अपना जीवन भगवान के ऊपर या सहारे छोड़ देना चाहिए? भगवान इस दुनिया में संतुलन बनाए रखते हैं। दुनिया को व्यवस्थित करने के लिए भगवान उसे फिर से यथास्थिति में ले आते हैं। इस फिल्म का उद्

सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता

-अजय ब्रह्मात्मज मंगलवार 5 अगस्त को अक्षय शिवम शुक्ला ने एकता कपूर के बालाजी टेलीफिल्म्स के दफ्तर केसामने आत्महत्या की कोशिश की। अपमान, निराशा और उत्तेजना में शुक्ला ने भले ही यह कदम उठाया हो, लेकिन इस घटना के कारणों पर ठंडे दिमाग से गौर करने की जरूरत है। अक्षय सिर्फ एक खबर नहीं हैं। एक सच्चाई हैं। मुंबई में अक्षय जैसे हजारों युवक संघर्ष करते हुए सिसक रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि वे सभी अक्षय जैसे दुस्साहसी नहीं हैं या फिर उन्होंने अभी तक उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा है। लिखने और बताने की जरूरत नहीं कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का ग्लैमर देश के सुदूर कोनों में बैठे युवक-युवतियों को आकर्षित करता है। वे हर साल हजारों की तादाद में मुंबई पहुंचते हैं और फिल्म इंडस्ट्री की चौखट के बाहर ही अपनी उम्र और उम्मीद गुजार देते हैं। ऐसे महत्वाकांक्षी व्यक्तियों में एक अदम्य जिद होती है कि वे अवसर मिलने पर अवश्य कामयाब होंगे, लेकिन अवसर मुंबई पहुंच जाने की तरह आसान होता, तो क्या बात थी..? फिल्म इंडस्ट्री की उम्र सौ साल से अधिक लंबी हो चुकी है, लेकिन अभी तक कोई ऐसा जरिया या तरीका विकसित नहीं हो पाया है कि फ

बॉक्स ऑफिस:१५.०८ २००८

सिंह इज किंग ने बनाए नए रिकार्ड अक्षय कुमार और विपुल शाह ने प्रचार के तरीके सीख लिए हैं। सिंह इज किंग को चर्चा में रखने के लिए दोनों लगातार मीडिया से मुलाकात और बातचीत कर रहे हैं। सोमवार को उन्होंने जश्न-ए-कामयाबी की पार्टी भी रख दी और बताया कि सिंह इज किंग ने सारे पुराने रिकार्ड तोड़ दिए हैं। अक्षय कुमार और विपुल शाह को और क्या चाहिए? अत्यंत कारगर तरीके से प्रचारित सिंह इज किंग को ओपनिंग अपेक्षा से थोड़ी कम रही। शत-प्रतिशत ओपनिंग नहीं हो सकी। मुंबई में बारिश की वजह से दर्शकों को दिक्कत हुई। मुंबई में एक मल्टीप्लेक्स ने प्रति दिन 28 शो रखे और उतने दर्शक जुटा लिए। सिंह इज किंग के संबंध में समीक्षकों की मिश्रित प्रतिक्रिया है। उसकी वजह से ऐसा माना जा रहा है आने वाले दिनों में दर्शक कम होंगे। उससे वितरकों और प्रदर्शकों को थोड़ा नुकसान हो सकता है, क्योंकि यह फिल्म भारी कीमत में सभी ने खरीदी है। फिल्म की लागत अधिक होने के कारण कलेक्शन की राशि को मुनाफा बनने में वक्त लगेगा। विपुल शाह खुश हैं कि उनकी फिल्म ने आरंभिक कलेक्शन के नए रिकार्ड बनाए हैं। अगली और पगली के प्रति बनी आरंभिक जिज्ञासा सम

हिन्दी टाकीज: सिनेमा बुरी चीज़ है, बेटा-नचिकेता देसाई

हिन्दी टाकीज में इस बार नचिकेता देसाई । नचिकेता देसाई ने भूमिगत पत्रकारिता से पत्रकारिता में कदम रखा। पिछले २५ सालों में उन्होंने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय न्यूज़ एजेंसियों से लेकर हिन्दी और अंग्रेज़ी के विभिन्न अख़बारों में सेवाएँ दीं.आपातकाल के दौर में उन्होंने रणभेरी नाम की पत्रिका निकली थी.इन दिनों अहमदाबाद में हैं और बिज़नस इंडिया के विशेष संवाददाता हैं.अहमदाबाद में वे हार्मोनिका क्लब भी चलाते हैं.आप उन्हें nachiketa.desai@gmail.com पर लिख सकते हैं। बात मेरे बचपन की है. बनारस में राज कपूर की फिल्म 'संगम' लगी थी. मेरी बड़ी बहन और उसकी सहेलियां फिल्म देखना चाहती थीं. अब बनारस में उन दिनों लड़कियां अकेली सिनेमा देखने नहीं जा सकती थीं. इसलिए उन्होंने मेरी नानी से कहा, "चलो हमारे साथ, अच्छी फिल्म है." नानी, श्रीमती मालतीदेवी चौधरी, प्रसिद्ध गांधीवादी नेता थीं, भारत की संविधान सभा की सदस्य रह चुकी थीं और उड़ीसा के आदिवासियों के बीच उन्हें उनके अधिकारों के लिए संगठित करने का काम करती थीं. बहुत ना-नुकुर के बाद राजी हो गईं। चार घंटे की फिल्म, तिस पर वैजयंती माला के नहा

पहली सीढ़ी:राज कुमार हिरानी से अजय ब्रह्मात्मज की baatcheet

'पहली सीढ़ी' निर्देशकों के इंटरव्यू की एक सीरिज है। मेरी कोशिश है कि इस इंटरव्यू के जरिए हम निर्देशक के मानस को समझ सकें। पहली फिल्म की रिलीज के बाद हर निर्देशक की गतिविधियां पत्र-पत्रिकाओं और टीवी चैनल के माध्यम से दुनिया के सामने आ जाती हैं। हम पहली फिल्म के पहले की तैयारियों में ज्यादा नहीं जानते। आखिर क्यों कोई निर्देशक बनता है और फिर अपनी महत्वाकांक्षा को पाने के लिए उसे किन राहों, अवरोधों और मुश्किलों से गुजरना पड़ता है। आम तौर पर इस पीरियड को हम 'गर्दिश के दिन' या 'संघर्ष के दिन' के रूप में जानते हैं। वास्तव में यह 'गर्दिश या 'संघर्ष से अधिक तैयारी का दौर होता है, जब हर निर्देशक मिली हुई परिस्थिति में अपनी क्षमताओं के उपयोग से निर्देशक की कुर्सी पर बैठने की युक्ति में लगा होता है। मेरी कोशिश है कि हम सफल निर्देशकों की तैयारियों को करीब से जानें और उस अदम्य इच्छा को पहचानें जो विपरीत स्थितियों में भी उन्हें भटकने, ठहरने और हारने से रोकती है। सफलता मेहनत का परिणाम नहीं होती। अनवरत मेहनत की प्रक्रिया में ही संयोग और स्वीकृति की कौंध है सफलता... क्यों