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Showing posts from February, 2014

फिल्‍म समीक्षा : शादी के साइड इफेक्‍टृस

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पति,पत्‍नी और इच्‍छाएं  -अजय ब्रह्मात्‍मज  न तो फरहान अख्तर और न विद्या बालन,दोनों में से कोई भी कामेडी के लिए चर्चित नहीं रहा। निर्देशक साकेत चौधरी ने उन्हें शादी के साइड इफेक्ट्स में एक साथ पेश करने का जोखिम उठाया है। फरहान अख्तर की पिछली फिल्म 'भाग मिल्खा भाग' रही है। उसके पहले भी वे अपनी अदाकारी में हंसी-मजाक से दूर रहे हैं। विद्या बालन ने अवश्य घनचक्कर में एक कोशिश की थी,जो अधिकांश दर्शकों और समीक्षकों के सिर के ऊपर से निकल गई थी। साकेत चौधरी ने शादी के साइड इफेक्ट्स में दोनों को परिचित किरदार दिए हैं और उनका परिवेश घरेलू रखा है। इन दिनों ज्यादातर नवदंपति सिड और तृषा की तरह रिलेशनशिप में तनाव,दबाव और मुश्किलें महसूस कर रहे हैं। सभी शिक्षा और समानता के साथ निजी स्पेस और आजादी की चाहत रखते हैं। कई बा लगता है पति या पत्‍‌नी की वजह से जिंदगी संकुचित और सीमित हो रही है। निदान कहीं और नहीं है। परस्पर समझदारी से ही इसे हासिल किया जा सकता है,क्योंकि हर दंपति की शादीशुदा जिंदगी के अनुभव अलग होते हैं। सिड और तृषा अपनी शादीशुदा जिंदगी में ताजगी बनाए रखने के लिए नए एडव…

अनुभव सिन्‍हा से अजय ब्रह्मात्‍मज की बातचीत

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अनुभव सिन्हा
-अजय ब्रह्मात्मज
    ‘तुम बिन’ से ‘रा.वन’ तक अनेक चर्चित और प्रशंसित फिल्में निर्देशित कर चुके अनुभव सिन्हा ‘बनारस मीडिया वक्र्स’ की स्थापना के साथ अब निर्माता भी बन चुके हैं। पिछले दिनों उनके प्रोडक्शन की पहली फिल्म ‘वार्निंग’ आई थी। 7 मार्च को माधुरी दीक्षित और जुही चावला अभिनीत ‘गुलाब गैंग’ आ रही है। फिल्मों के साथ अन्य गतिविधियों में संलग्न अनुभव सिन्हा इन दिनों खुद के लिए एक फिल्म का लेखन कर रहे हैं। उम्मीद है इस साल के अंत तक यह फिल्म फ्लोर पर चली जाएगी।
- ‘बनारस मीडिया वक्र्स’ का क्रिएटिव विचार क्या है?
0 हाई कांसेप्ट की फिल्में बनाना। ऐसे फिल्में जो हमारे दिल को अच्छी लगे और दर्शकों को भी पसंद आएं। फिर यह नहीं देखना कि वे फिल्में मुश्किल हैं या आसान। क्रिएटिव साहस के साथ फिल्मों का निर्माण करना। इसके अलावा गैरफिल्मी संगीत पर काम कर रहा हूं।
- आप सफल निर्देशक हैं। फिर निर्माता बनने का ख्याल क्यों आया?
0 बतौर निर्देशक औसतन मैं दो साल में एक फिल्म बनाता हूं। सच है कि इस दरम्यान मुझे अनेक कहानियां भाती हैं। सारी फिल्में मैं स्वयं निर्देशित नहीं कर सकता। यही सोच कर निर्म…

फिल्‍म समीक्षा : हाईवे

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-अजय ब्रह्मात्‍मज  हिंदी और अंग्रेजी में ऐसी अनेक फिल्में आ चुकी हैं, जिनमें अपहरणकर्ता से ही बंधक का प्रेम हो जाता है। अंग्रेजी में इसे स्टॉकहोम सिंड्रम कहते हैं। इम्तियाज अली की 'हाईवे' का कथानक प्रेम के ऐसे ही संबंधों पर टिका है। नई बात यह है कि इम्तियाज ने इस संबंध को काव्यात्मक संवेदना के साथ लय और गति प्रदान की है। फिल्म के मुख्य किरदारों वीरा त्रिपाठी (आलिया भट्ट) और महावीर भाटी (रणदीप हुड्डा) की बैकस्टोरी भी है। विपरीत ध्रुवों के दोनों किरदारों को उनकी मार्मिक बैकस्टोरी सहज तरीके से जोड़ती है। इम्तियाज अली की 'हाईवे' हिंदी फिल्मों की मुख्यधारा में रहते हुए भी अपने बहाव और प्रभाव में अलग असर डालती है। फिल्म के कई दृश्यों में रोंगटे खड़े हो जाते हैं। सच का सामना न होने से न केवल किरदार बल्कि दर्शक के तौर पर हम भी स्तब्ध रह जाते हैं। इम्तियाज ने आज के दौर में बच्चों की परवरिश की एक समस्या को करीब से देखा और रेखांकित किया है,जहां बाहर की दुनिया के खतरे के प्रति तो सचेत किया जाता है लेकिन घर में मौजूद खतरे से आगाह नहीं किया जाता। वीरा की शादी होने वाली …

खतरनाक रंग है गुलाबी- सौमिक सेन

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-अजय ब्रह्मात्मज
मैं बंगाल से हूं। हर बंगाली की तरह सत्यजित राय और रविंद्रनाथ टैगोर को देखते-पढ़ते बड़ा हुआ हूं। दोनों हर बंगाली के खून में बहते हैं। इन दोनों के प्रभाव से पूरी मानवता के प्रति संवेदना बनती है। जापानी निर्देशक कुरोसोवा ने सही कहा था कि हर पृथ्वीवासी को सत्यजित राय की फिल्म देखनी चाहिए। साहित्य, सिनेमा और संगीत की संगत बचपन से रही। आरंभ में थिएटर में एक्टिव हुआ। सरोद बजाने के साथ मैं शास्त्रीय संगीत गाता भी था। यह संस्कार माता-पिता से मिला था। दिल्ली विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र की पढ़ाई करने के बाद मैं जर्नलिज्म में चला गया। बिजनेस स्टैंडर्ड के लिए वीकएंड बिजनेस टीवी प्रोग्राम बनाता था। वहां रहते हुए मैंने दो डॉक्युमेंट्री भी बनाए। फिर सोच-समझकर 2005 में मुंबई आ गया।
    मुंबई आने के बाद फिल्म लेखन से शुरूआत की। मुझे लगा कि मैं लेखन में अच्छा योगदान कर सकता हूं। राज कौशल की ‘एंथनी कौन है?’ मेरी पहली फिल्म थी। उसके बाद मैंने ‘मीराबाई नॉटआउट’, ‘रूबरू’ और ‘हम तुम और घोस्ट’ जैसी फिल्में लिखी। इनके साथ ही मैं किशोर कुमार पर स्क्रिप्ट लिख रहा था। मेरी नजर में आजादी के बाद ऐसी…

दरअसल : साथ आना अमिताभ बच्चन और हनी सिंह का

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-अजय ब्रह्मात्मज
 खबर है कि हनी सिंह अमिताभ बच्चन के साथ ‘भूतनाथ रिटन्र्स’ फिल्म का एक गीत गाएंगे। इस खबर को उलट कर भी पढ़ा जा सकता है। जी हां,अमिताभ बच्चन हनी सिंह के साथ गीत गाएंगे। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में हनी सिंह की मांग अभी सबसे ज्यादा है। उनके गाए गीत लोकप्रिय हो रहे हैं। किसी भी फिल्म की लोकप्रियता बढ़ाने के लिए उनके गाए गीतों का इस्तेमाल हो रहा है। इसी कड़ी में ‘भूतनाथ रिटन्र्स’ के गीत की योजना बनी है। भूषण कुमार  भी अपने पिता गुलशन कुमार की तरह जब किसी गायक को या संगीतकार को पसंद करते हैं तो उसे भरपूर मौके देते हैं। इन दिनों वे हनी सिंह पर कृपावान हो गए हैं। कहा तो यह भी जा रहा है कि भूषण कुमार की पिछली फिल्म ‘यारियां’ को हिट कराने में हनी सिंह के गीत का बड़ा योगदान रहा। वे ‘भूतनाथ रिटन्र्स’ में इसी लाभप्रद संयोग को दोहरा रहे हैं।
हनी सिंह की बात करें तो चलन के मुताबिक वे इन दिनों सभी की पसंद बने हुए हैं। हर बार कुछ सालों के अंतराल पर पंजाब से कोई एक नई आवाज आती है और वह हर जगह गूंजने लगती है। सुखविंदर,दलेर मेंहदी,मीका और अब हनी सिंह ़ ़ ़ इन सभी ने अलग-अलग दौर में हिंदी स…

फिल्‍म समीक्षा : गुंडे

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दोस्ती-दुश्मनी की चटख कहानी -अजय ब्रह्मात्‍मज यशराज फिल्म्स की अली अब्बास जफर निर्देशित 'गुंडे' देखते समय आठवें दशक की फिल्मों की याद आना मुमकिन है। यह फिल्म उसी पीरियड की है। निर्देशक ने दिखाया भी है कि एक सिनेमाघर में जंजीर लगी हुई है। यह विक्रम और बाला का बचपन है। वे बडे होते हें तो 'मिस्टर इंडिया' देखते हैं। हिंदी फिल्में भले ही इतिहास के रेफरेंस से आरंभ हों और एहसास दें कि वे सिनेमा को रियल टच दे रही हैं, कुछ समय के बाद सारा सच भहरा जाता है। रह जाते हैं कुछ किरदार और उनके प्रेम, दुश्मनी, दोस्ती और बदले की कहानी। 'गुंडे' की शुरुआत शानदार होती है। बांग्लादेश के जन्म के साथ विक्रम और बाला का अवतरण होता है। श्वेत-श्याम तस्वीरों में सब कुछ रियल लगता है। फिल्म के रंगीन होने के साथ यह रियलिटी खो जाती है। फिर तो चटखदार गाढ़े रंगों में ही दृश्य और ड्रामा दिखाई पड़ते हैं। लेखक-निर्देशक अली अब्बास जफर ने बिक्रम और बाला की दोस्ती की फिल्मी कहानी गढी है। ऐसी मित्रता महज फिल्मों में ही दिखाई पड़ती है, क्योंकि जब यह प्रेम या किसी और वजह से टूटती है तो अच्छा …

इरशाद कामिल से सचिन श्रीवास्‍तव की बातचीत

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एक इनसान के बनने में जिस ईंट-गारे का इस्तेमाल होता है, वह यकीनन सारी उम्र अपना असर दिखाता है। यह बात नई सदी के हिंदी फिल्मों के गीतों को दार्शनिक ऊंचाई, रूमानी सुकून और विद्राही तेवर बख्शने वाले कलमकार इरशाद कामिल को जानने के बाद फिर साबित होती है। पंजाबी खुशी और इश्क की मस्ती में पले-बढ़े इरशाद के भरपूर इनसान बनने में आठवें दशक की नफरत, अवतार सिंह पाश के विद्रोह, शिवकुमार बटालवी के दर्द का गारा है, तो बचपन की दोस्ती की शरारतों और आवारा-मिजाजी की ईंटें भी हैं। जाहिर है यह सब कुछ उनके लेखन में अनायास ही दिखाई देता भी है। इरशाद को महज गीतकार कहना, एक ऐसी नाइंसाफी है, जिसे करने का गुनाह नाकाबिले मुआफी है। गीत उनके लेखन की महज एक विधा है, जो लोकप्रिय हो गई है, लेकिन असल में वे एक कलाकार हैं, जो खुद को बयां करने के हर औजार को, हर विधा को आजमाना चाहता है। दिलचस्प यह कि वे कई रचनात्मक विधाओं में पारंगत भी हैं। इरशाद कामिल से सचिन श्रीवास्तव ने मुलाकात के दौरान अनौपचारिक बातचीत की। इसके प्रमुख अंश... 


"चमेली" से लेकर "रॉकस्टार" और "हाईवे" तक आपके गाने कानफोडू शोर …

दरअसल : ‘वन बाय टू’ की डिजिटल रिलीज

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-अजय ब्रह्मात्मज
    अभय देओल अभिनीत और निर्मित ‘वन बाय टू’ दर्शकों और समीक्षकों को पसंद नहीं आई। बाक्स आफिस पर फिल्म का प्रदर्शन बहुत बुरा रहा। फिल्म अंतर्निहत कारणों से नहीं चली। फिर भी यह फिल्म हिंदी फिल्मों के इतिहास में याद रहेगी। अक्षर सुनहरे हो या न हो।
    सबसे पहले अभय देओल ने अपने संगीतकारों और गायकों के पक्ष में खड़े होने की हिम्मत दिखाई। टी सीरिज के दबाव में न आकर उन्होंने संगीत के भविष्य में उपयोग के स्वत्वाधिकार और हिस्सेदारी के मामले को उठाया। इसकी वजह से उनकी फिल्म ऐन रिलीज के मौके पर पारंपरिक प्रचार से वंचित रह गई। अमूमन म्यूजिक कंपनी अपनी फिल्मों के संगीत के प्रचार के लिए उनके ‘सौंग प्रोमो’ चलाते हैं। ऊपरी तौर पर दिखता है कि अब संगीत का बाजार खत्म हो गया है। लोग न तो सीडी खरीदते हैं और न उनकी मार्केटिंग की जाती है। डिजिटल युग में संगीत का डिजिटल उपयोग बढ़ गया है। गाने डाउनलोड होते हैं। उनके कलर ट्यून बनते हैं। मोबाइल इंडस्ट्री से म्यूजिक कंपनियों को लाभ मिलता है। मॉनिटरिंग की व्यवस्था बढऩे से अब उन्हें मालूम रहता है कि उनके संगीत का कौन, कहां इस्तेमाल कर रहा है। कॉ…

आज के इस इंसान को ये क्या हो गया - प्रदीप

प्रदीप के लिखे इस गीत को आज संतोष कुमार पांडेय ने रेखांकित किया। गीत सुनने के बाद इसे शब्‍दों में लिख देना उचित लगा। मशहूर कवि आलो धन्‍वा कहते हैं कि गर आप किसी गीत को बार-बार पढ़ें तो उसके अर्थ की नई छवियों से परिचित होंगे। आप देखना चाहें तो इस गीत को देख भी सकते हैं। नीचे लिंक दे रहा हूं। 1961 में आई अमर रहेये प्‍यार के लिए यह गीत लिखा गया था।

आज के इस इंसान को ये क्या हो गया
इसका पुराना प्यार कहाँ पर खो गया
कैसी यह मनहूस घडी है, भाईओं में जंग छिड़ी है
कहीं पे खून कहीं पर जवाला, जाने क्या है होने वाला
सब का माथा आज झुका है, आजादी का जलूस रुका है
चरों और दगा ही दगा है, हर छुरे पर खून लगा है
आज दुखी है जनता सारी, रोते हैं लाखों नर नारी
रोते हैं आँगन गलिआरे, रोते आज मोहल्ले सारे
रोती सलमा रोती है सीता, रोते हैं कुरान और गीता
आज हिमालय चिल्लाता है, कहाँ पुराना वो नाता है
डस लिया सारे देश को जेहरी नागो ने,
घर को लगादी आग घर के चिरागों ने
अपने देश था वो देश था भाई, लाखों बार मुसीबत आई
इंसानों ने जान गवाई, पर बहनों की लाज बचाई
लेकिन अब वो बात कहाँ है, अब तो केवल घात यहाँ है
चल रहीं हैं …

फिल्‍म समीक्षा : बबलू हैप्‍पी है

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-अजय ब्रह्मात्‍मज  शहरों की दौड़ती-भागती जिंदगी में युवक-युवतियों की बड़ी उलझन और समस्या प्यार, संबंध और समर्पण है। हर संबंध के लिए गहरी समझदारी के साथ परस्पर विश्वास अनिवार्य है। पसंद और आकांक्षाएं भी एक सी हों तो रिश्तों के पनपने के लिए समान भूमि मिल जाती है। यह फिल्म दिल्ली के कुछ युवक-युवतियों के जरिए प्यार और समर्पण तलाशती हुई एक ऐसे मुकाम पर पहुंचती है, जहां सच के आभास से डर पैदा होता है ओर उसके एहसास से प्रेम और विश्वास जगता है। जतिन और तमन्ना की शादी होने वाली है। शादी से पहले जतिन दोस्तों के साथ पहाड़ों की सैर को निकलता है। तमन्ना को भी एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में पहाड़ों पर जाना है। तय होता है कि दोनों वहां मिलेंगे। तमन्ना तुनकमिजाज और पजेसिव किस्म की युवती है। वह जतिन को कभी कुछ कहने का मौका नहीं देती। हमेशा उलाहने और डांट से ही उनकी मुलकातें खत्म होती हैं? जतिन समर्पित प्रेमी की तहर हमेशा उसकी सुनता रहता है। पहाड़ों के सफर में उसके साथ हैरी और रोहन भी है। उनकी अपनी समस्याएं हैं। यात्रा की रात बैचलर पार्टी में जतिन की मुलाकात नताशा से हो जाती है। उन्हें सुधि नहीं …

फिल्‍म समीक्षा : हंसी तो फंसी

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-अजय ब्रह्मात्‍मज फिल्म के अंग्रेजी हिज्जे का उच्चारण करें तो यह फिल्म 'हसी तो फसी' हो जाती है। यह इरादतन किया गया होगा। धर्मा प्रोडक्शन की फिल्म है तो अक्षर जोड़ने के बजाय इस बार घटा दिया गया है। फिल्म का यही प्रभाव भी है। फिल्म में बस मनोरंजन का अनुस्वार गायब है। फिल्म मनोरंजन की जगह मनोरजन करती है। हिंदी में बिंदी का बहुत महत्व होता है। अंग्रेजी में हिंदी शब्दों के सही उच्चारण के लिए बिंदी के लिए 'एन' अक्षर जोड़ा जाता है। करण जौहर की भूल या सोच स्वाभाविक हो सकती है, लेकिन इस फिल्म के साथ अनुराग कश्यप भी जुड़े हैं। अफसोस होता है कि भाषा और उच्चारण के प्रति ऐसी लापरवाही क्यों? 'हंसी तो फंसी' गीता और निखिल की कहानी है, जो अपने परिवारों में मिसफिट हैं। उनकी जिंदगी परिवार की परंपरा में नहीं है। वे अलग सोचते हैं और कुछ अलग करना चाहते हैं। गीता संयुक्त परिवार की बेटी है, जिसमें केवल उसके पिता उसकी हर गतिविधि के पक्ष और समर्थन में खड़े मिलते हैं। निखिल को अपनी मां का मौखिक समर्थन मिलता है। संयोग कुछ ऐसा बनता है कि दोनों बार-बार टकराते हैं। आखिरकार उन्हें …

दरअसल : ...इसलिए नहीं चली ‘जय हो’

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-अजय ब्रह्मात्मज
    लोकप्रिय सितारों की हल्की पड़ती चमक के भी कारण कहीं और खोज लिए जाते हैं। बता दिया जाता है कि दर्शकों और सितारों के बीच किसी वजह से धुंध आ गई थी,इसलिए चमक धुधली हुई है। ये वजहें अतार्किक और बचकानी भी हो सकती हैं। दो हफ्ते पहले सलमान खान की फिल्म ‘जय हो’ रिलीज हुई अपेक्षा के मुताबिक इस फिल्म के कलेक्शन नहीं हुए। स्वयं सलमान खान भी हैरान रहे। वे फिल्म चलने की वजह खुद खोजें या बताएं, इसके पहले ही कुछ ट्रेड पंडितों ने उनके स्टारडम के बचाव ढूंढ निकाले। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के निमंत्रण पर सैफई महोत्सव में शरीक होना और अहमदाबाद जाकर वहां के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ पतंग उड़ाना ‘जय हो’ के लिए नुकसानदेह साबित हुआ।
    कहा जा रहा है कि मुस्लिम संगठनों और नेताओं की अपील पर देश के मुसलमान दर्शकों ने ‘जय हो’ और सलमान खान का बहिष्कार कर दिया। वे फिल्म देखने ही नहीं गए। इस तर्क का एक अव्यक्त पहलू है कि सलमान खान की कामयाब फिल्में कथित मुसलमान दर्शकों की वजह से ही चलीं। देश के दर्शकों का यह विभाजन ट्रेड सर्किल करता रहा है। पहले ये विचार …

संगीत मेरा सबका सूरज - ए आर रहमान

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-अजय ब्रह्मात्मज
विनम्र और प्रतिभाशाली एआर रहमान से साक्षात मिलना किसी अनुभव से कम नहीं है। वे अपनी प्रतिभा से परिचित हैं,लेकिन तारीफ सुनने पर शर्म से लाल होने लगते हैं। संगीत के लिए समर्पित ए आर रहमान हमेशा प्रयोगों के लिए तैयार रहते हैं। प्रतिभाओं पर उनकी नजर रहती है। वे उन्हें मौका देने से भी नहीं चूकते। ए आर रहमान से यह खास बातचीत इम्तियाज बली की फिल्म ‘हाईवे’ के प्रोमोशनल वीडियो शुटिंग के दौरान हुई। इस म्यूजिक वीडियो में वे आलिया भट्ट के साथ दिखाई देंगे।

- शूटिंग का कैसा अनुभव रहा और वीडियो शूटिंग में आपको कितना मजा आता है?
0 मैं ज्यादा शूटिंग नहीं करता, लेकिन इम्तियाज जैसा कोई भरोसेमंद फिल्ममेकर का आग्रह हो तो कुछ भी करने के लिए मैं राजी हो जाता हूं।
- अभी तक आपने कितने वीडियो किए हैं?
0 सबसे पहले मैंने ‘मां तुझे सलाम’ किया था। फिर ‘जन गण मन’ किया था। बहुत ज्यादा म्यूजिक वीडियो नहीं किए हैं मैंने। ‘जय हो’ को इंटरनेशन वर्सन किया था।
- क्या शूटिंग के समय किसी प्रकार का दबाव भी रहता है।
0 एक ही दबाव होता है। वजन कम करने का, क्योंकि कैमरा आपके शरीर को बढ़ा देता है। आप बीस से पच्चीस प्…