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Showing posts with the label तमाशा

तमाशा और जादू का स्‍कूल - ममता सिंह

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ममता सिंह ने अपने बेटे जादू के बचपन,मस्‍ती और व्‍यवहार से जोड़ते हुए 'तमाशा' को अलग अंदाज में समझा है। इम्तियाज अली की मंशा यही थी कि कुछ लोग भी अगर इस फिल्‍म से प्रेरित होकर नैसर्गिक जिंदगी जी सकें तो काफी होगा। अब हमें जादू के रूप में एक आजाद बालक मिलेगा,जो बड़े होने पर भी किसी हद में नहीं बंधेगा। ममता ने अपनी बात बहुत सादगी से सरल शब्‍दों में रखी है।
-ममता सिंह जिंदगी भी कई बार किस तरह से आइना दिखाती है। पिछले शनिवार को अजीब इत्‍तेफाक हुआ। सुबह जादू के स्‍कूल गए, पैरेन्‍ट-टीचर-मीटिंग में, जिसे ओपन-हाउस भी कहते हैं। उम्‍मीद तो यही थी कि शिकायत सुनने को मिलेगी कि जादू बहुत मस्‍ती करते हैं, He is very naughty but he is good at studies. लेकिन इस बार दो टीचर्स ने एक ही बात कही, nowadays he is very quiet. He does very good behavior. मेरा माथा थोड़ा ठनका। इंग्लिश टीचर ने आश्‍चर्य भी जताया कि आजकल वो बड़ा शांत रहने लगा है। लेकिन मैथ टीचर, जो क्‍लास-टीचर भी है- इस बात से खुश थी कि जादू आजकल शांत बैठने लगा है। पहले उसकी मस्‍ती और शरारतों से पूरी क्‍लास डिस्‍टर्ब होती थी। जादू के साथ …

कोई फिल्म नहीं है इम्तियाज़ की तमाशा -शोभा शमी

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शोभा शमी भोपाल की रहने वाली हैं. इंदौर दिल्ली से पढ़ाई पूरी करने के बाद फिलहाल पेशे से पत्रकार हैं. दैनिक भास्कर, अमर उजाला में काम करने के बाद फिलहाल का ठिकाना नेटवर्क 18 है. कई रुचियों में एक सिनेमा है. बातूनी और घुमक्कड़ . लिखना और लाइफ, फिलॉसफी, प्रेम जैसे विषयों पर लम्बी बातचीत करना पसन्द है.
चाहे फिल्म की कहानी हो या लम्बाई, सिनेमेटोग्राफी हो या एडिटिंग.  बहुत ही आसानी से कहा जा सकता है कि ये भी कोई फिल्म है? और बात भी तो यही है कि 'तमाशा' असल में फिल्म है ही नहीं! इम्तियाज़ कि ये फिल्म  दरअसल हम सब के भीतर का 'तमाशा' है. 
ये एक किरदार है. एक जूझ है. एक पूरी फिलॉसफी. 
और इस तमाशे को सिर्फ सिनेमाहॉल में बैठकर नहीं देखा जा सकता. उसके लिए उस जगह जाना होगा जो दिल और दिमाग के बीच कि एक जगह है. जिसके लिए पहले खुद का एक दुनियादार नकाब उतारना होगा और स्वीकार करना होगा कि फिल्म उसी तरह के अँधेरे में है जैसी कई बार या लगातार हमारी ज़िन्दगी. 
तमाशा एक दमदार फिल्म है. और वो खास है क्योंकि वो एक ऐसे किरदार के बारे में बात करती है जो हम सब के भीतर मौजूद है. या शायद ये क…

तमाशा : चलो कुछ ऐसी फिल्में बनाते हैं जो हीरो की न होकर अपनी हों- रोहित मिश्र

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रोहित मिश्र पेशे से पत्रकार हैं। पिछले नौ सालों में सहारा, दैनिक भास्कर और अमर उजाला ग्रुप के साथ रहे। फिलहाल अमर उजाला नोएडा में कार्यरत हैं। अपने को इस गलतफहमी में लगातार डाले रखते कि वे फिल्मों में भी दखल रखते हैं। शुक्रवार की शाम नाम का एक ब्लॉग भी चलाते हैं,जो फिलहाल कामचोरियों के चक्कर में रुका हुआ सा है। एक व्यंग्य संग्रह अपने अंतिम पड़ाव पर प्रकाशनाधीन। उन्‍होंने सिनेमा में कुछ एकेडमिक काम भी.किया है।...





चलो कुछ ऐसी फिल्में बनाते हैं जो हीरो की न होकर अपनी हों

आपको हिंदी सिनेमा की कोई ऐसी फिल्म याद है जो नायक की ग्रंथि पर बात करती है? और उसके औसत होने पर भी? हीरो को उसकी प्रेमिका इसीलिए छोड़ती है क्योंकि उसे लगता है कि उसका हीरो तो औसत है, शहर के फुटपाथों पर ब्रीफकेश लेकर चलता हुआ कोई भी आम आदमी। मुझे ऐसी कोई फिल्म नहीं याद। मैंने तो फिल्मों में नायकों को महान काम करते और पापियों का संहार करते ही देखा है। हीरोइन तो उतने भर से खुश रही है। इस बीच नायक महान काम करते हुए नायिका के साथ डुएट गाने भी गाता है।

मनोरंजन न कर पाने की तोहमत झेल रही 'तमाशा' असल में यही…

तमाशा : एक में पाया सपना,दूजे ने बस प्रेम -प्रदीप अवस्‍थी

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प्रदीप ने अपने परिचय मेंं बस इतना ही लिखा है....


मूलतः रामपुर(उत्तर प्रदेश ) का रहने वाला | इंजीनियरिंग में स्नातक,दिल्ली में रहकर थिएटर में अभिनय और लेखन | अभी मुंबई में लेखन और अभिनय में सक्रीय |  फिलहाल हम इसी से काम चलाएंगे।
तमाशा देखकर निकला तो उलझन में डूबा रहा | इम्तियाज़ की फ़िल्में पसंद आती रहीं हैं,तो इस बार ऐसा क्या हुआ कि बाहर निकल कर उत्साह की जगह निराशा थी | जहाँ सब तमाशा की तारीफ़ में डूबे थे,किसको और कैसे बताऊँ कि फ़िल्म मुझे अच्छी नहीं लगी | यह जैसे ख़ुद में अपराध-बोध जैसा था | फिर सिलसिलेवार सोचना शुरू किया तो पाया कि फ़िल्म कई बातें सिर्फ़ ऊपर-ऊपर से करती है और निकल आती है |
या तो यह इम्तियाज़ की ज़िद है कि मैं कहानी दोहराऊँगा और उसे कुछ अलग रँग देकर पेश करूँगा और साबित करूँगा कि एक ही कहानी अलग-अलग तरह से दिखाने पर भी वह सफल फ़िल्म हो सकती है | इस की भूमिका वे फ़िल्म के शुरूआती बीस मिनट में बाँधते हैं | यह जैसे फ़िल्म शुरू होने से पहले उनका उद्घोष है कि दुनिया में सारी कहानियाँ एक ही तो हैं,तब फिर मुझपर यह इल्ज़ाम क्यों ? यहीं वे अपनी कहानी के लिए एक बचाव ढूँढते नज़र आते हैं | य…

तमाशा : डॉ. दुष्‍यंत

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'तमाशा' पर प्रतिक्रियाएं जारी हैं। इस बार डा.. दुष्‍यंत की प्रतिक्रिया। उन्‍होंने यह फिल्‍म मंगलवार को देखा। वे इन दिनों ज्‍यादातर मुंबई में रहते हैं और फिल्‍म्‍ा बिरादरी के संगत में पाए जाते हैं। उनके बारे में जानने के लिए उनके ब्‍लॉग पर जाया जा सकता है।
भारत-पाक सीमा पर बसे कस्बे केसरीसिंहपुर में 13 मई 1977 को जन्मे दुष्यंत ने इतिहास में उपलब्ध सब डिग्रियां (यानी बीए ऑनर्स, एमए, नेट, जेआरएफ, पीएच.डी.) हासिल कीं,  कॉलेज में पढाया। एफटीआईआई, पुणे में कुछ समय सिनेमा की तमीज सीखने की कोशिश करने वाले दुष्यंत पत्रकारिता से जुडे हैं और अब तक जयपुर, दिल्ली, मुम्बई जैसे शहरों में रहे हैं। उनकी पहली ही किताब (2005) को स्टेट अकादमी अवॉर्ड मिला जबकि दूसरे कविता संग्रह ‘प्रेम का अन्य’ को 2012 का रामकुमार ओझा अवॉर्ड दिया गया। उनकी कविताओं का अंग्रेजी सहित कई अन्य भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है। उन्होंने कहानियां लिखीं तो उन्हें हिंदी की श्रेष्‍ठ पत्र -पत्रिकाओं ने प्रकाशित किया। उन्होंने दर्जन भर यूरोपीय और लेटिन अमेरिकन कवियों का हिंदी तथा रूसी कवि येवेग्नी येव्तुशेंको की कविताओं का राजस…

अलहदा लोगों के सर्वाइवल की जगह की तलाश में ‘तमाशा’ -सुदीप्ति सत्‍यानंद

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सुदीप्ति सत्‍यानंद के फेसबुक स्‍टेटस से स्‍पष्‍ट था कि उन्‍हें 'तमाशा' देखनी है और पूरी संभावना थी कि वह उन्‍हें पसंद भी आएगी। फिल्‍म देखने के पहले और देखने के बाद के उन्‍के स्‍टेटस इसकी स्‍पष्‍ट जानकारी देते हैं। फिल्‍मों पर इरादतन लिखना सहज नहीं होता। मैंने सुदीप्ति से आग्रह किया था कि वह इस फिल्‍म पर लिखें। कुछ और दोस्‍तों से भी कहा है। यहां सुदीप्ति का आलेख पढें। आप लिखना चाहें तो स्‍वागत है। उसे brahmatmaj@gmail.com पर भेज दें।
सुदीप्ति के फेसबुक स्‍टेटस पहली बार चेतावनी दे रही हूँ-
जो भी तमाशा की कहानी लिखेगा/गी ब्लाक कर दूँगी। हालाँकि इम्तियाज़ खुद कह रहे हैं सेम कहानी पर हम देख ना लें तब तक समीक्षा लिखें कहानी नहीं।
बहुत दिनों के बाद एक ऐसी फ़िल्म देखी जो दिलो-दिमाग पर छा गयी। रॉकस्टार फैन होने के बाद और इसमें रिपिटेड सीन दिखने के बाद भी लगता है कि 'तमाशा' इम्तियाज़ अली की अब तक की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म है।
देखिए जरूर, इससे ज्यादा अभी कुछ नहीं कहूँगी।
'तमाशा' उनको पसंद आएगी क्या जिन्होंने बजरंगी भाईजान को हिट कराया और तनु-मनु रिटर्न्स की शान में कसीदे काढ़े? एक …

फिल्‍म समीक्षा : तमाशा

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-अजय ब्रह्मात्‍मज प्रेम और जिंदगी की नई तकरीर इम्तियाज अली ने रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण जैसे दो समर्थ कलाकारों के सहारे प्रेम और अस्मिता के मूर्त-अमूर्त भाव को अभिव्‍यक्ति दी है। सीधी-सपाट कहानी और फिल्‍मों के इस दौर में उन्‍होंने जोखिम भरा काम किया है। उन्‍होंने दो पॉपुलर कलाकारों के जरिए एक अपारंपरिक पटकथा और असामान्‍य चरित्रों को पेश किया है। हिंदी फिल्‍मों का आम दर्शक ऐसी फिल्‍मों में असहज हो जाता है। फिल्‍म देखने के सालों के मनोरंजक अनुभव और रसास्‍वादन की एकरसता में जब भी फेरबदल होती है तो दर्शक विचलित होते हैं। जिंदगी रुटीन पर चलती रहे और रुटीन फिल्‍मों से रुटीन मनोरंजन मिलता रहे। आम दर्शक यही चाहते हैं। इम्तियाज अली इस बार अपनी लकीर बदल दी है। उन्‍होंने चेहरे पर नकाब चढ़ाए अदृश्‍य मंजिलों की ओर भागते नौजवानों को लंघी मार दी है। उन्‍हें यह सोचने पर विवश किया है कि क्‍यों हम सभी खुद पर गिरह लगा कर स्‍वयं को भूल बैठे हैं? वेद और तारा वर्तमान पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं। परिवार और समाज ने उन्‍हें एक राह दिखाई है। उस राह पर चलने में ही उनकी कामयाबी मानी जाती है1 जिंदगी का यह ढर्रा चाहता …

तारा की स्पिरिट समझती हूं-दीपिका पादुकोण

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-अजय ब्रह्मात्‍मज इम्तियाज अली के निर्देशन में दीपिका पादुकोण की दूसरी फिल्‍म है ‘तमाशा’। इसमें वह अपने पूर्व प्रेमी रणबीर कपूर के साथ हैं। दोनों की पिछली फिल्‍म ‘ये जवानी है दीवानी’ बेहद सफल रही थी। निर्देशक दोनों के निजी जीवन के प्रेम और अलगाव को फिल्‍म की स्क्रिप्‍ट में ले आते हैं और दीपिका पादुकोण और रणबीर कपूर बगैर ना-नुकूर के उन्‍हें पर्दे पर निभाते हैं। पहले ऐसा मुमकिन नहीं था। पर्सनल संबंधों और प्रोफेशनल जरूरतों का यह नया संयुक्‍त आयाम है। अब के कलाकार अलग होने के बाद भी स्‍क्रीन पर बेलाग लगाव दिखाते हैं। वे पूर्व संबंधों के बोझ लेकर नहीं चलते। दीपिका पादुकोण ने ‘तमाशा’ में तारा की भूमिका निभाई है। - कौन है तारा ? 0 तारा साधारण और मामूली सी लड़की है। वह अपनी जिंदगी में मस्‍त है। वह कामकाजी है। उसका ब्‍वाम्‍य फ्रेंड है। वह अच्‍छे परिवार से आती है। उसे अपनी जिंदगी से कोई शिकायत नहीं है। वह वेद से मिलती है तो उसे कुछ हो जाता है। ऐसा लगता है कि अंदार से कुछ खुल जाता है। वेद से मिलने के पहले वह कुछ अलग थी। मिलने के बाद वह कुछ और हो जाती है। बेहतर तरीके से... -वेद से प्रभावित क्‍यों हो…

अपने सपनों को जी लो - रणबीर कपूर

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-अजय ब्रह्मात्मज 
रणबीर कपूर मिलते ही कहते हैं कि अभी तक मेरी तीन फिल्में लगातार फ्लॉप हुई हैं। जब फ्लॉप की संख्या पांच हो जाएगी तब मुझे सोचना पड़ेगा। फ़िलहाल पिछली बातों को भूल कर मैं 'तमाश' के लिए तैयार हूँ। इम्तियाज अली के साथ यह मेरी दूसरी फिल्म है। सभी जानते हैं क़ि इम्तियाज़ कैसे फिल्मकार हैं। उन्होंने मुझे 'रॉकस्टार' जैसी  है। उस फिल्म के दौरान मैंने एक्टिंग और ज़िन्दगी के बारे में बहुत कुछ सीखा। 'तमाशा' ने मुझे अधिक जागरूक बना दिया है। इसमें मैं वेद वर्धन का किरदार निभा रहा हूँ। 
-वेद का परिचय दें।  वह कौन है? ० वेद आम बच्चों की तरह स्कूल जाता है। उसका दिमाग गणित से ज्यादा किस्से-कहानियों में लगता है। उसके शहर में एक किस्सागो है, वेद कहानियां सुनने उसके पास जाया करता है। वह किस्सागो पैसे लेकर कहानियां सुनाता है। वेद कहानियां सुनने के लिए पैसे इधर-उधर से जमा करता है। वेद कहानियों की दुनिया में गुम होना पसंद करता है। बड़े होने पर देश के दुसरे बच्चों की तरह उस पर भी माता-पिता और समाज का दबाव बढ़ता है कि क्या बनना है? इंजीनियर या मार्केटिंग गुरु के प्रो…

तलाश है खुद की ‘तमाशा’: इम्तियाज अली

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-अजय ब्रह्मात्मज
    प्रेम, भावना और संबंध के संवेदनशील फिल्मकार इम्तियाज अली इन दिनों ‘तमाशा’ पूरी करने में व्यस्त हैं। तकनीकी बारीकियां हासिल करने की सुविधाएं बढऩे से फिल्म के पोस्ट प्रोडक्शन में भी निर्देशक की तल्लीनता बढ़ जाती है। रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण की ‘तमाशा’ में इम्तियाज अली ने प्रमुख किरदारों को बिल्कुल नए अंदाज में पेश किया है। 21 वीं सदी के दूसरे दशक की इस प्रेम कहानी में स्वयं की खोज के साथ समाज भी है।
-क्या है ‘तमाशा’?
‘बाचीजा-ए-अतफाल है दुनिया मेरे आगे. होता है शब-ओ-रोज तमाशा मेरे आगे’ कह लें या ‘दुनिया रंगमंच है और हम एक्टर हैं। अपनी भूमिकाएं निभा रहे हैं।’ हमेशा यह एहसास होता है कि यह जिंदगी एक खेल है, तमाशा है। हमारे इर्द-गिर्द जो चल रहा है, वह सच है कि माया है, हमें पता नहीं। शायरों, कवियों, दार्शनिकों ने अपने-अपने समय पर हमें समझाने की कोशिश की है। ऐसा कहते हैं कि सारी दुनिया की कहानियां एक जैसी होती हैं।
    मेरी फिल्म में शिमला का एक बच्चा है। उसकी कहानियों में रुचि है, वह पैसा चुरा कर कहानी सुनने एक किस्सागो के पास रहता है। शिमला में ही एक किस्सागो रहता …

तमाशा में दीपिका पादुकोण

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