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संकीर्णता पैदा हो गई है माहौल में-पंकज कपूर

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पंकज कपूर के इंटरव्‍यू का दूसरा और आखिरी अंश ..यहां पंकज कपूर ने एनएसडी में चल रही राजनीति,अलकाजी पर लगे आरोप,हिंदी षिएटर की बुरी स्थिति और दूसरे अनेक मसलों को छुआ है। एनएसडी के छात्रों की इनमें रुचि हो सकती है। आप की टिप्‍पणियां मेरा मार्गदर्शन करेंगी।  - राजनीतिक सक्रियता 0 नहीं , मैं कभी राजनीति में सक्रिय नहीं रहा। ऐसी रुचि ही नहीं जगी। चीजों की समझदारी और उसमें हिस्सेदारी भी रही , पर मैं सक्रिय नहीं था। साफ कहूं तो पेशेवर संस्थान में छात्र राजनीति को मैं आज भी नहीं समझ पाता हूं। वहां छात्र राजनीति की जगह नहीं है , ऐसा मेरा अपना ख्याल है।       रानावि में एक छात्र संघ बनाई गई। इस छात्र संघ के होने का मतलब समझा सकते हैं आप। छात्र यह तय करने लगें कि निर्देशक किस छात्र को भूमिका दे। यह निहायत जहालत की बात है। आप जरूर लिखें। पेशेवर खासकर सृजनात्मक पेशे में राजनीति नहीं होनी चाहिए। आप कला का लोकतंत्रीकरण कैसे कर सकते हैं। हाउ कैन यू डू इट। इट इज नॉट पॉसिबल। आप यह बात कैसे कह सकते हैं कि एक आदमी परिश्रमी है , इसलिए वह अगला नाटक निर्देशित करे या अभिनय करे या प्रकाश व्यवस्था कर

हमारी गपबाजी में भी माद्दा होता था-पंकज कपूर

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 पंकज कपूर से यह बातचीत 1994-1995 में हुई होगी। यह अप्रकाशित ही रहा। अभी पुरानी फाइलों में मिला। कुछ बातें पुरानी और अप्रासंगिक हो गई हैं,लेकिन इन्‍हें एक बार पढ़ जाएं तो सारी बातें जरूरी लगने लगती हैं। आज पहला हिस्‍सा है। कल दूसरा और अंतिम हिस्‍सा पोस्‍ट करूंगा।       मैं पंजाब के लुधियाना शहर में पैदा हुआ। वहीं से मेंने स्कूल और कॉलेज की तालीम हासिल की। कुंदन विद्या मंदिर स्कूल में पढ़ा। आर्या कॉलेज में था। कॉलेज में प्री इंजिनयरिंग तक पढ़ाई की , फिर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय गया। 1973 में वहां गया। 1976 में वहां से निकला। अभिनय में विशेषज्ञता ली। एनएसडी की रेपटरी में चार साल तक काम किया। अभिनेता था। उसके बाद फिल्में मिलनी शुरू हो गईं तो फिल्मों का सिलसिला शुरू हो गया। स्कूल-कॉलेज की गतिविधियों में हमलोग काफी सक्रिय रहते थे। मैं अंतर्मुखी   कभी नहीं रहा , बहिर्मुखी व्यक्तित्व का था। उम्र बढऩे के साथ अब थोड़ी गंभीरता आ गई है। वर्ना बहुत शरारतें करते थे। नाटक,अभिनय और भाषण प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया करता था। खेल में भी समान रुचि थी। हमारा ज्‍यादातर समय इन्हीं चीजों में जाय

फिल्‍म रिव्‍यू : मटरू की बिजली का मन्‍डोला

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मुद्दे का हिंडोला -अजय ब्रह्मात्‍मज देश के सामाजिक और राजनीतिक मुद्दे संवेदनशील फिल्मकारों को झकझोर रहे हैं। वे अपनी कहानियां इन मुद्दों के इर्द-गिर्द चुन रहे हैं। स्पेशल इकॉनोमिक जोन [एसईजेड] के मुद्दे पर हम दिबाकर बनर्जी की 'शांघाई' और प्रकाश झा की 'चक्रव्यूह' देख चुके हैं। दोनों ने अलग दृष्टिकोण और निजी राजनीतिक समझ एवं संदर्भ के साथ उन्हें पेश किया। विशाल भारद्वाज की 'मटरू की बिजली का मन्डोला' भी इसी मुद्दे पर है। विशाल भारद्वाज ने इसे एसईजेड मुद्दे का हिंडोला बना दिया है, जिसे एक तरफ से गांव के हमनाम जमींदार मन्डोला व मुख्यमंत्री चौधरी और दूसरी तरफ से मटरू और बिजली हिलाते हैं। हिंडोले पर पींग मारते गांव के किसान हैं, मुद्दा है, माओ हैं और व‌र्त्तमान का पूरा मजाक है। वामपंथी राजनीति की अधकचरी समझ से लेखक-निर्देशक ने माओ को म्याऊं बना दिया है। दर्शकों का एक हिस्सा इस पर हंस सकता है, लेकिन फिल्म आखिरकार मुद्दे, मूवमेंट और मास [जनता] के प्रति असंवेदी बनाती है। मन्डोला गांव के हमनाम जमींदार मन्डोला दिन में क्रूर, शोषक और सामंत बने रहते हैं। शा

मौसम में मुहब्बत है-सोनम कपूर

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-अजय ब्रह्मात्‍मज मौसम को लेकर उत्साहित सोनम कपूर को एहसास है कि वह एक बड़ी फिल्म का हिस्सा हैं। वे मानती हैं कि पंकज कपूर के निर्देशन में उन्हें बहुत कुछ नया सीखने को मिला.. आपके पापा की पहली फिल्म में पंकज कपूर थे और आप उनकी पहली फिल्म में हैं..दो पीढि़यों के इस संयोग पर क्या कहेंगी? बहुत अच्छा संयोग है। उम्मीद है पापा की तरह मैं भी पंकज जी के सानिध्य में कुछ विशेष दिखूं। मौसम बहुत ही इंटेंस लव स्टोरी है। जब मुझे आयत का किरदार दिया गया तो पंकज सर ने कहा था कि इसके लिए तुम्हें बड़ी तैयारी करनी होगी। पहले वजन कम करना होगा, फिर वजन बढ़ाना होगा। बाडी लैंग्वेज चेंज करनी पड़ेगी। ज्यादा मेकअप नहीं कर सकोगी। इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया रही? मैंने कहा कि इतना अच्छा रोल है तो मैं सब कुछ कर लूंगी। इस फिल्म में चार मौसम हैं। मैंने हर सीजन में अलग उम्र को प्ले किया है। इस फिल्म में मैं पहले पतली हुई, फिर मोटी और फिर और मोटी हुई। अभी उसी वजन में हूं। वजन कम नहीं हो रहा है। वजन का खेल आपके साथ चलता रहा है। पहले ज्यादा फिर कम..। बार-बार वजन कम-ज्यादा करना बहुत कठिन होता है। पहले तो अपनी लांचिंग फिल

स्‍टैंड आउट करेगी 'मौसम'-शाहिद कपूर

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-अजय ब्रह्मात्‍मज समाज के बंधनों को पार करती स्वीट लव स्टोरी है 'मौसम'। मैं हरिंदर सिंह उर्फ हैरी का किरदार निभा रहा हूं। कहानी पंजाब के एक छोटे से गांव से शुरू होती है। हरिंदर की एयरफोर्स में नौकरी लगती है। जैसे-जैसे मैच्योरिटी के ग्राफ में अंतर आता है, आयत से उसका प्यार भी उतना ही खूबसूरत अंदाज लेता जाता है। ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में 'मौसम' के शुद्ध प्यार से दर्शक जुड़ पाएंगे क्या? कुछ साल पहले जब मैंने 'विवाह' की थी, तब भी ऐसे सवाल उठे थे कि क्या कोई पति ऐसी पत्नी को स्वीकार करेगा जिसका चेहरा झुलस गया हो? ऐसी फिल्में बननी कम हो गई हैं। मुझे लगता है कि 'मौसम' स्टैंड आउट करेगी। इसमें लड़का-लड़की मिलना चाहते हैं, लेकिन दूसरे कारणों से वे मिल नहीं पाते। दुनिया में कई ऐसी चीजें घटती हैं, जिन पर हमारा नियंत्रण नहीं रहता, लेकिन उनकी वजह से हमारा जीवन प्रभावित होता है। फिल्म के प्रोमो में आप और सोनम एक-दूसरे को ताकते भर रहते हैं..मिलने की उम्मीद या जुदाई ही दिख रही है? मिलना और बिछुड़ना दोनों ही हैं फिल्म में। 1992 से 2001 तक दस साल की कहानी है। छोटे शहरों म

फिल्‍म समीक्षा : चला मुसद्दी आफिस आफिस

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पापुलर सीरियल ऑफिस ऑफिस को फिल्म बनाने की कोशिश में राजीव मेहरा सिरे से नाकाम रहे हैं। सक्षम अभिनेताओं और पापुलर सीरियल के इस बुरे हश्र पर ऑफिस ऑफिस सीरियल केदर्शकों को गलानि हो सकती है। लगता है कि सीरियल को फिल्म में रूपांतरित करने पर अधिक विचार नहीं किया गया। ऑफिस ऑफिस मुसद्दी लाल नामक कॉमन मैन की कहानी है, जो अपनी जिंदगी में नित नई मुश्किलों का सामना करता है। भ्रष्ट समाज और तंत्र में लगातार सताए जाने के बाद भी वह थका और हारा नजर नहीं आता। एक बात समझ में नहीं आती कि ऐसे समझदार और व्यावहारिक मुसद्दी लाल का बेटा इतना नालायक कैसे हो गया है? फिल्म में मुसद्दी लाल की समस्याएं कचोटती नहीं हैं। हां, हंसने के दो-चार प्रसंग हैं और उन प्रसंगों में हंसी भी आती हैं। पर उनसे फिल्म का आनंद पूरा नहीं होता। हेमंत पांडे, मनोज पाहवा, देवेन भोजानी, संजय मिश्रा और आसावरी जोशी को अलग-अलग किरदारों में दिखाने का प्रयोग सीरियल के मिजाज में है, लेकिन फिल्म में तब्दील करते समय उन किरदारों पर अधिक मेहनत नहीं की गई है। रेटिंग- * एक स्टार