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मिस्टर फर्नाडीस के एकांत और इला के अकेलेपन का जायकेदार मेल है - लंचबॉक्स : सोनाली सिंह

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" द लंचबाक्‍स पर सोनाली सिंह की यह टिप्‍पणी शेयर करते हुए आप सभी से आग्रह है कि आप भी अपने विचारों से अवगत करांए। इस फिल्‍म पर बातें करें। और भी फिल्‍मों पर कुछ लिखने का मन करे तो लिख कर मुझे भेजें....  brahmatmaj@gmail.com मिस्टर फर्नाडीस के एकांत और इला के अकेलेपन का जायकेदार मेल है - लंचबॉक्स "
फिल्म की शुरुआत में नायिका तल्लीनता से लंच बनाते हुए नज़र आती है जैसे Mrs.Dalloway गार्डन पार्टी की तैयारी  में लीन  हो। ताज्जुब है कि  वह समय काटने के लिए टीवी नहीं देखती।शायद  टीवी पर नाचती - गाती खुशहाल जिंदगियों का हरापन उसके स्याह अकेलेपन को और गहरा कर जाता है। वह बार- बार फ्रिज खोलकर अपने खालीपन को खाने -पीने की तमाम चीज़ों से भरने की कोशिस भी नहीं करती। सुबूत  है उसके हनीमून  की ड्रेस जो आज भी उसे फिट आती है ,थोड़ी ढीली ही होती है।

यह फिल्म किसी फार्मूले पर नहीं चलती ,आस- पास बिखरी जिंदगी की पटरियों पर दौड़ती है। हम सभी ने लंच में कभी न कभी केले खाए है नहीं तो लंच में केले खाते लोगों को देखा तो जरुर ही है। इस फिल्म को देखकर कितनी ही कहानियां याद आती है , कितने ही अनुभव…

स्‍पेशल छब्‍बीस पर सोनाली सिंह की टिप्‍पणी

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चवन्‍नी के पाठकों के लिए सोनाली सिह की खास टिप्‍पणी... 
फिल्म इतनी चुस्त - दुरुस्त है कि  सिनेमा हॉल  में एकांत तलाश रहे प्रेमी जोड़ो को शिकायत हो  सकती है । फिल्म का ताना -बाना असल घटनायों को लेकर बुना गया है। यह किसी भी एंगल से "Ocean'11" से प्रेरित नहीं है ।"Ocean' 11" के सभी सदस्य अपनी-अपनी फ़ील्ड के एक्सपर्ट थे।  कोई  मशीनरी ,कोई विस्फोटक तो कोई  हवाई करतब  में  पारंगत था।यह नीरज पाण्डेय की" स्पेशल 26 "है, जिसमे बहुत सारे बच्चे पैदा करने वाले आम आदमी और बीवी के कपड़े  धोने वाले अदने से आदमी हैं । जब कलकत्ता के बाज़ार में नकली सीबीआई की भिडंत असली सीबीआई से होती है तब नकली सीबीआई ऑफिसर अनुपम खेर का आत्मविश्वास  डगमगाने लगता है । ऐन वक़्त पर अक्षय कुमार का आत्मविश्वास स्थिति संभाल लेता है। यह भारत की कहानी है,जहाँ "आत्मविश्वास कैसे जगाये/बढ़ाये " जैसी किताबे सबसे ज्यादा पढ़ी जाती है। यह हम सभी  भारतीयों  की कहानी है जो जानते है कि  "असली ताकत दिल में होती है ।"

दुनिया को बेवकूफ बनाने वाले अक्षय कुमार की पाक मोहब्बत हैरत में डाल  द…

शांघाई पर सोनाली सिंह की टिप्‍पणी

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शांघाई देखने के बाद सोनाली सिंह आग्रह करने पर यह टिप्‍पणी भेजी है। चवन्‍नी के पाठक इसे संवेदनशील रचनाकार की अपने समय की महत्‍वपूर्ण फिल्‍म पर की गई सामन्‍य प्रतिक्रिया के रूप में पढ़ें या विशेष टिप्‍पणी के रूप में....मर्जी आप की।



"हर आदमी के अन्दर होते है दस- बीस आदमी, जिसको भी देखना कई बार देखना ..."
फिल्म कितनी सफल है या सार्थक है , दो अलग- अलग चीजें होती है I जरुरी नहीं कि जो सफल हो सार्थक भी हो और न ही सार्थकता सफलता की कुंजी होती है  I सफल फिल्मो की तरह  यहाँ एक  हलवाई की बेटी किसी  business tycoon  से  शादी करने का ख्वाब नहीं देख सकती I फिल्म के किरदार में हम और आप है जहाँ विजातीय संबंधों को लेकर बवाल कटता है और लड़के को जान बचाने के लिए  शहर छोड़कर भागना पड़ता है I  फिल्म की कहानी हमारे नाकारापन  और दोगलेपन को घेरती कहानी है I सुबह रास्ते में हुए एक्सीडेंट को अनदेखा कर हम ऑफिस भागते है जैसे जिंदगी की ट्रेन छूटी जा रही हो पर शाम को तयशुदा वक़्त एक नोबल cause के लिए इंडिया गेट पर मोमबत्ती लेकर पहुच जाते है I कहानी है उन बिल्डर्स की ,जो गरीबो से जबरन जमीन  हडपते है I …

नहीं-नहीं आलिया बहुत क्लियर है straight फॉरवर्ड -सोनाली सिंह

सोनाली सिंह ने ब्रेक के बाद की आलिया के संदर्भ में यह टिप्‍पणी दी है।
प्रेम गली अति साकरी जिसमे समाये न दोय" वाली कहावत पुरानी हो चुकी है.आजकल के प्रेम की गलियां बहुत फिसलन भरी है जिन पर बहुत संभल - संभल कर कदम बढ़ाने पढ़ते है अन्यथा आपका हाल गुलाटी की बुआ जैसा हो सकता है.फिल्म का सबसे खुबसूरत पक्ष बेइंतहा , बेशर्त प्यार करने वाला गुलाटी और बेहद restless n confused character आलिया है.नहीं-नहीं आलिया बहुत क्लियर है straight फॉरवर्ड .इतनी साफ दिल की लड़कियां भला मिलती है आजकल ? फिल्म देखने मेरे साथ गए दोस्तों को आलिया confused लगी थी पर मुझे नहीं.......मैं आलिया की बैचेनी महसूस कर सकती थी.यह बैचेनी कुछ कर पाने की,कुछ न कर पाने की, किन्ही अर्थों में मैडम बावेरी की बैचेनी से कम नहीं थी.हममे से कोई भी परफेक्ट नहीं है.किसी के पास परफेक्ट लाइफ नहीं.हर कोई परफेक्ट लाइफ पाना चाहता है....किसी के पास प्यार है तो करियर नहीं. अगर करियर है तो प्यार नहीं. "जिंदगी एक तलाश है और हर किसी को अपनी-अपनी मंजिलों की तलाश है."बात सिर्फ इतनी है की जिंदगी अब बहुत सी मंजिलों की तलाश हो गयी है.एक म…

इश्किया : सोनाली सिंह

इश्किया............सोचा था की कोई character होगा लेकिन......पूरी फिल्म में इश्क ही इश्क और अपने-अपने तरीके का इश्क। जैसे भगवान् तो एक है पर उसे अलग-अलग लोगों ने अलग-अलग रूप में उतार दिया है । जहाँ खालुजान के लिए इश्क पुरानी शराब है जितना टाइम लेती है उतनी मज़ेदार होती है । इसका सुरूर धीरे - धीरे चढ़ता है । वह अपनी प्रेमिका की तस्वीर तभी चाय की मेज़ पर छोड़ पाता है जब उसके अन्दर वही भाव कृष्णा के लिए जन्मतेहै । वहीँ उसके भांजे के लिए इश्क की शुरुआत बदन मापने से होती है उसके बाद ही कुछ निकलकर आ सकता है। कहे तो तन मिले बिना मन मिलना संभव नहीं है। व्यापारी सुधीर कक्कड़ के लिए इश्क केवल मानसिक और शारीरिक जरूरतों का तालमेल है । वह बस घरवाली और बाहरवाली के लिए समर्पित है और किसी की चाह नहीं रखता। मुश्ताक के लिए उसकी प्रेमिका ही सबकुछ है । वह प्रेम की क़द्र करता है । उसे अहसास है " मोहब्बत क्या होती है '। इसी वजह से वह विलेन होने के बाबजूद, मौका मिलने के बाद भी अंत में कृष्ण, खालुजान या फिर बब्बन किसी पर भी गोली नहीं चला पता। विद्याधर वर्मा के लिए प्रेम है पर कर्त्तव्य से ऊपर नही…

हिन्दी टाकीज-जिंदगी है तो सिनेमा है और सिनेमा ही जिंदगी है-सोनाली सिंह

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हिन्दी टाकीज-४८



सोनाली से चवन्नी की मुलाक़ात नहीं है। तस्वीर से ऐसा लगता है कि वह खूबसूरत और खुले दिल की हैं। जुगनुओं के पीछे भागती लड़की के हजारों सपने होंगे और उनसे जुड़ी लाखों ख्वाहिशे होंगी। चवन्नी चाहेगा कि रोज़ उनकी कुछ खेअहिशें पूरी हों.वैसे सोनाली कम से कम २२-२३ चीजों पर पक्का यकीं करती हैं। यकीनयाफ्ता सोनाली निश्चित ही ज़िन्दगी को भरपूर अंदाज़ में जीती होंगी। चवन्नी ने उनकी कहानियाँ नहीं पढ़ी हैं,पर भरोसे के करीबियों से उनकी तारीफें सुनी है। उनके लेखन का एक नमूना यहाँ लिखे शब्द भी है...आप उनसे संपर्क करना चाहें तो पता है...sonalisingh.smile@gmail.com

चवन्‍नी के हिन्‍दी टाकीज का कारवां जल्‍दी ही 50वे पड़ाव पर पहुंच जाएगा। सफर जार रहेगा और आप के संस्‍मरण ही चवन्‍नी के हमसफ़र होंगे। आप भी लिखें और पोस्‍ट कर दें ... chavannichap@gmail.com यूं तो मैं जब तीन माह की थी, मैंने अपनी मौसी के साथ सिनेमा देखने जाना शुरू कर दिया था। मौसी बताती हैं कि मैं बिना शोरगुल किये चुपचाप बड़े शौक से तीन घंटे तक पिक्‍चर देख लिया करती थी। कुछ बड़ी हुई तो चाचा लोगों के साथ सिनेमा हॉल जाना शुरू कर दिया। '…