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Friday, October 6, 2017

फिल्‍म समीक्षा : शेफ




फिल्‍म समीक्षा
रिश्‍तों की नई परतें
शैफ
-अजय ब्रह्मात्‍मज
यह 2014 में आई हालीवुड की फिल्‍म शेफ की हिंदी रीमेक है। रितेश शाह,सुरेश नायर और राजा कृष्‍ण मेनन ने इसका हिंदी रुपांतरण किया है। उन्‍होंने विदेशी कहानी को भारतीय जमीन में रोपा है। मूल फिल्‍म देख चुके दर्शक सही-सही बता सकेगे कि हिंदी संस्‍करण्‍ में क्‍या छूटा है या क्‍या जोड़ा गया है? हिंदी में बनी यह फिल्‍म खुद में मुकम्‍मल है।
रोशन कालरा चांदनी चौक में बड़े हो रहे रोशन कालरा के नथुने चांदनी चौक के छोले-भठूरों की खुश्‍बू से भर जाते थे तो वह मौका निकाल कर रामलाल चाचा की दुकान पर जा धमकता था। उसने तय कर लिया था कि वह बड़ा होकर बावर्ची बनेगा। पिता को यह मंजूर नहीं था। नतीजा यह हुआ कि 15 साल की उम्र में रोशन भाग खड़ा हुआ। पहले अमृतसर और फिर दूसरे शहरों से होता हुआ वह अमेरिका पहुंच जाता है। वहां गली किचेन का उसका आइडिया हिंट हो जाता है। सपनों का पीछा करने में वह तलाकशुदा हो चुका है। उसका बेटा अपनी मां के साथ रहता है,जिससे उसकी स्‍काइप पर नियमित बात होती है।
गली किचेन की एक छोटी सी घटना में उसे अपनी नौकरी से ाथ धोना पड़ता है। उसी देने बेटे की फरमाइश आती है कि वह पहली बार स्‍टेज शो करने जा रहा है। क्‍या वे आ सकेंगे? असमंजस में डूबे रोशन की दुविध उसकी दोस्‍त खत्‍म करती है,जिसने उसी दिन रोशन की जगह किचने की कमान संभाली है। पुरुष-स्‍त्री की यह दोस्‍ती हिंदी फिल्‍मों के पर्दे पर बिल्‍कुल नई है। बहरहाल,रोशन बेटे के स्‍टेज शो के लिए कोच्चि पहुंचता है। वहीं वह तलाकशुदा बीवी के घर ही ठहरता है। आगे की कहानी यहां से बढ़ती है,जो भावनाओं के ज्‍वार-भाटा को समेटते हुए बाप-बेटे की अंतरंगता में खत्‍म होती है।
इस फिल्‍म में पैशन को फालो करने की बात बहुत खूबसूरत अंदाज में कही गई है। साथ ही उपभोक्‍ता समाज में दरकते संबंधों को भी चिह्नित किया गया है। एक बाप अपने बेटे की उच्‍च शिक्षा के लिए धन जुटाने की कोशिश और अपनी लगन में इस कदर डूब चुका है कि वह अपने बेटे के बचपन की हिलोरों से दूर जा चुका है। उसे डांटने-समझाने की उम्र में वह उसके साथ नहीं रह पाता। रोशन फिल्‍म के अंत तक आते-आते न केवल अपने बेटे से जुड़ता है,अल्कि अपने पिता को भी खाना पकाने की काबिलियत से गर्वीला एहसास देता है। फिल्‍म में रिश्‍तों की बुनावट आज की है। सभी अलग-थलग है,लेकिन किसी के मन में कटुता और मलाल नहीं है। तलाकशुदा जोड़े अक्‍सर बाद की मुलाकातों में मीन-मेख ही निकालते रहते हैं। यहां रोशन और उसकी बीवी की परस्‍पर समझदारी प्रभावित करती है। दोनों एक-दूसरे का खयाल रखते हैं और उनकी आगे की जिंदगी सुगम करने की कोशिश करते हैं।
यह फिल्‍म रिश्‍तों के खट्टे-मीठे अनुभवों को व्‍यवहार और आचरण में बड़े प्‍यार से ले आती है। फिल्‍म का विस्‍तार केरल,दिल्‍ली,अमृतसर और अमेरिका है,लेकिन सफर में पता ही नहीं चलता की कहानी ने गियर बदल लिया। लेखक और संवाद लेखक ने फिल्‍म को मुलायम और सटीक बना दिया है। रितेश शाह के संवादों में 21 वीं सदी के दूसरे दशक के एहसास के शब्‍दार्थ हैं। वे रिश्‍तों की नई परतों से परिचित कराते हैं।
फिल्‍म में उपयुक्‍त कलाकारों का चयन भी उल्‍लेखनीय है। उत्‍तर-दक्षिण के किरदारों और परिवेश को जोड़ती यह फिल्‍म अखिल भारतीय अपील रखती है। कलाकारों में सैफ अली खान एक ठहराव के साथ मौजूद हैं। पत्‍नी की भूमिका में पद्म प्रिया जंचती है। बांग्‍लादेशी दोस्‍त के रूप में चंदन रॉय सान्‍याल ने विश्‍वसनीय सहयोग ि‍दया है। अेटे की भूमिका में धनीश करर्तिक उल्‍लेखनीय हैं। रोशन के पिता की छोटी भूमिका में रामगोपाल बजाज की आंखें अलग से सवाल करती और बोलती हैं।
यह फिल्‍म अपने अप्रोच में शहरी है। कुछ संवाद अंग्रेजी में हैं।
अवधि- 130 मिनट
***1/2 साढ़े तीन स्‍टार
 

Friday, February 24, 2017

फिल्‍म समीक्षा : रंगून



फिल्‍म रिव्‍यू
युद्ध और प्रेम
रंगून
-अजय ब्रह्मात्‍मज
    युद्ध और प्रेम में सब जायज है। युद्ध की पृष्‍ठभूमि पर बनी प्रेमकहानी में भी सब जायज हो जाना चाहिए। द्वितीय विश्‍वयुद्ध के बैकड्रॉप में बनी विशाल भारद्वाज की रंगीन फिल्म रंगून में यदि दर्शक छोटी-छोटी चूकों को नजरअंदाज करें तो यह एक खूबसूरत फिल्म है। इस प्रेमकहानी में राष्‍ट्रीय भावना और देश प्रेम की गुप्‍त धार है, जो फिल्म के आखिरी दृश्‍यों में पूरे वेग से उभरती है। विशाल भारद्वाज ने राष्‍ट्र गान जन गण मन के अनसुने अंशों से इसे पिरोया है। किसी भी फिल्म में राष्‍ट्रीय भावना के प्रसंगों में राष्‍ट्र गान की धुन बजती है तो यों भी दर्शकों का रक्‍तसंचार तेज हो जाता है। रंगून में तो विशाल भारद्वाज ने पूरी शिद्दत से द्वितीय विश्‍वयुद्ध की पृष्‍ठभूमि में आजाद हिंद फौज के हवाले से रोमांचक कहानी बुनी है।
    बंजारन ज्वाला देवी से अभिनेत्री मिस जूलिया बनी नायिका फिल्म प्रोड्रयूसर रूसी बिलमोरिया की रखैल है, जो उसकी बीवी बनने की ख्‍वाहिश रखती है। 14 साल की उम्र में रूसी ने उसे मुंबई की चौपाटी से खरीदा था। पाल-पोस और प्रशिक्षण देकर उसे उसने 20 वीं सदी के पांचवें दशक के शुरूआती सालों की चर्चित अभिनेत्री बना दिया था। तूफान की बेटी की नायिका के रूप में वह दर्शकों का दिल जीत चुकी है। उसकी पूरी कोशिश अब किसी भी तरह मिसेज बिलमोरिया होना है। इसके लिए वह पैंतरे रचती है और रूसी को मीडिया के सामने सार्वजनिक चुंबन और स्‍वीकृति के लिए मजबूर करती है। अंग्रेजों के प्रतिनिधि हार्डी जापानी सेना के मुकाबले से थक चुकी भारतीय सेना के मनोरंजन के लिए मिस जूलिया को बॉर्डर पर ले जाना चाहते हैं। आनाकानी के बावजूद मिस जूलिया को बॉर्डर पर सैनिकों के मनोरंजन के लिए निकलना पड़ता है। उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी जमादार नवाब मलिक को दी गई है। जांबाज नवाब मलिक अपनी बहादुरी से मिस जूलिया और अंग्रेजों को प्रभावित करता है। संयोग से इस ट्रिप पर जापानी सैनिक एयर स्ट्राइक कर देते हैं। भगदड़ में सभी बिखर जाते हैं। मिस जूलिया और नवाब मलिक एक साथ होते हैं। नवाब मलिक अपनी जान पर खेल मिस जूलिया को भारतीय सीमा में ले आना चाहता है। अंग्रेजों के साथ रूसी बिलमोरिया भी मिस जूलिया की तलाश में भटक रहे हैं। उनकी मुलाकात होती है। अंग्रेज बहादुर नवाब मलिक से प्रसन्न होकर विक्‍टोरिया क्रॉस सम्मान के लिए नाम की सिफारिश का वादा करता है, लेकिन आशिक रूसी बिलमोरिया को नवाब मलिक में रकीब की बू आती है। वह उसके प्रति चौकन्ना हो जाता है। हम प्रेमत्रिकोण में नाटकीयमता की उम्‍मीद पालते हैं। कहानी आगे बढती है और कई छोरों को एक साथ खोलती है। आखिरकार वह प्रसंग और मोड़ आता है, जब सारे प्रेमी एक-एक कर इश्‍क की ऊंचाइयों से और ऊंची छलांग लगाते हैं। राष्‍ट्रीय भावना और देश प्रेम का जज्‍बा उन्हें सब कुछ न्‍यौछावर कर देने के लिए प्रेरित करता है।
    विशाल भारद्वाज अच्छे किस्सागो हैं। उनकी कहानी में गुलजार के गीत घुल जाते हैं तो फिल्म अधिक मीठी,तरल और गतिशील हो जाती है। रंगून में विशाल और गुलजार की पूरक प्रतिभाएं मूल कहानी का वेग बनाए रखती हैं। हुनरमंद विशाल भारद्वाज गंभीर प्रसंगों में भी जबरदस्त ह्यूमर पैदा करते हैं। कभी वह संवादों में सुनाई पड़ता है तो कभी कलाकारों के स्‍वभावों में दिखता है। रंगून में भी पिछली फिल्मों की तरह विशाल भारद्वाज ने सभी किरदारों को तराश कर पेश किया है। हमें सारे किरदार अपनी भाव-भंगिमाओं के साथ याद रहते हैं। यही काबिल निर्देशक की खूबी होती है कि पर्दे पर कुछ भी बेजा और फिजूल नहीं होता। मुंबई से तब के बर्मा के बॉर्डर तक पहुंची इस फिल्म के सफर में अधिक झटके नहीं लगते। विशाल भारद्वाज और उनकी तकनीकी टीम सभी मोड़ों पर सावधान रही है।
    विशाल भारद्वाज ने सैफ अली खान को ओमकारा और शाहिद कपूर को कमीनेहैदर में निखरने का मौका दिया था। एक बार फिर दोनों कलाकारों को बेहतरीन किरदार मिले हैं, जिन्हें पूरी संजीदगी से उन्होंने निभाया है। बतौर कलाकार सैफ अली खान अधिक प्रभावित करते हैं। नवाब मलिक के किरदार में शाहिद कपूर कहीं-कहीं हिचकोले खाते हैं। यह उस किरदार की वजह से भी हो सकता है। सैफ का किरदार एकआयामी है, जबकि शाहिद को प्रसंगों के अनुसार भिन्‍न आयाम व्‍यक्‍त करने थे। मिस जूलिया के रूप में कंगना रनोट आरंभिक दृश्‍यों में ही भा जाती हैं। रूसी बिलमोरिया और नवाब मलिक के प्रेम प्रसंगों में मिस जूलिया के दोहरे व्‍यक्तित्‍व की झलक मिलती है, जिसे कंगना ने बखूबी निभाया है। एक्शन और डांस करते समय वह पिछली फिल्मों से अधिक आश्‍वस्त नजर आती हैं। बतौर अदाकारा उनमें आए निखार से रंगून को फायदा हुआ है। मिस जूलिया के सहायक किरदार जुल्फी की भूमिका निभा रहे कलाकार ने बेहतरीन प्रदर्शन किया है। अन्य सहयोगी कलाकार भी दृश्‍यों के मुताबिक खरे उतरे हैं।
    विशाल भारद्वाज की फिल्मों में गीत-संगीत फिल्म की कहानी का अविभाज्‍य हिस्सा होता है। गुलजार उनकी फिल्मों में भरपूर योगदान करते हैं। दोनों की आपसी समझ और परस्पर सम्मान से फिल्मों का म्यूजिकल असर बढ़ जाता है। इस फिल्म के गानों के फिल्मांकन में विशाल भारद्वाज ने भव्‍यता बरती है। महंगे सेट पर फिल्‍मांकित गीत और नृत्‍य तनाव कम करने के साथ कहानी आगे बढ़ाते हैं।
अवधि- 167 मिनट
स्टार- चार स्‍टार

Friday, November 21, 2014

फिल्म समीक्षा : हैप्पी एंडिंग

-अजय ब्रह्मात्मज
 हिंदी फिल्में अपने मसाले और फॉर्मूले के लिए मशहूर हैं। कहा और माना जाता है कि रियल लाइफ में जो नहीं हो सकता, वह सब हिंदी फिल्मों में हो सकता है। 'हैप्पी एंडिंग' इन्हीं मसालों और फॉर्मूलों का मजाक उड़ाती हुई खत्म होती है। राज और डीके अभी तक थ्रिलर फिल्में निर्देशित करते रहे हैं। इस बार उन्होंने रोमांटिक कॉमेडी बनाने की कोशिश की है। उनके पास सैफ अली खान, इलियाना डिक्रूज और कल्कि कोचलिन जैसे कलाकार हैं। ऊपर से गोविंदा जैसे कलाकार का छौंक है।
यूडी बेस्ट सेलर है। उसकी किताब ने नया कीर्तिमान स्थापित किया है, लेकिन पिछले कुछ सालों से सही हैप्पी एंडिंग नहीं मिल पाने की वजह से कुछ नहीं लिख पा रहा है। अपनी शोहरत और कमाई का इस्तेमाल वह अय्याशी में करता है। उसकी अनेक प्रेमिकाएं रह चुकी हैं। वह किसी के प्रति समर्पित और वफादार नहीं है। प्रेमिकाओं से 'आई लव यू' सुनते ही वह बिदक जाता है। यही वजह है कि उसकी एक प्रेमिका दूसरे लड़के से शादी कर दो बच्चों की मां बन चुकी है। फिलहाल विशाखा उस पर डोरे डाल रही है। यूडी उससे संबंध तोडऩा चाहता है। इस बीच नई लेखिका आंचल का आगमन होता है। आंचल की लोकप्रियता से यूडी असुरक्षित महसूस करता है। परिस्थितियां कुछ ऐसी बनती हैं कि वह आंचल से प्रेम करने लगता है, लेकिन आंचल उसके साथ वैसा ही व्यवहार करती है, जैसा वह अपनी प्रेमिकाओं के साथ करता रहा है।
संबंध भेद, विच्छेद और संवेद की यह फिल्म स्त्री-पुरुष रिश्तों में कथित आधुनिकता से आए असमंजस की कहानी लेकर चलती यह फिल्म हिंदी फिल्मों के घिसे-पिटे दृश्यों का ऊपरी तौर पर मजाक उड़ाती है, लेकिन वैसे ही दृश्यों में रमती है। 'हैप्पी एंडिंग' में हिंदी फिल्मों का एक स्टार अरमान भी है, जो अपनी नई फिल्म के लिए नई कहानी चाहता है। उसकी मुलाकात यूडी से हो जाती है। यूडी का प्रकाशक भी चाहता है कि वह अरमान के लिए कोई कहानी लिख दे। यहां भी यूडी को हैप्पी एंडिंग नहीं मिल पा रहा है। सही हैप्पी एंडिंग की तलाश में यूडी हिंदी फिल्मों के फॉर्मूलों को आजमाना शुरू कर देता है।
कलाकारों में सैफ अली खान अपने एक्टिंग जोन में लौटे हैं। कंफ्यूज किरदारों को वे पर्दे पर अच्छी तरह उतारते हैं। इलियाना डिक्रूज ने अपने किरदार को संयम और शालीनता के साथ निभाया है। वह लगातार इम्प्रूव कर रही हैं। कल्कि कोचलिन अच्छी अभिनेत्री हैं, पर इस भूमिका में वह नहीं जंच पायी हैं। फिल्म के एक आकर्षण गोविंदा हैं। वे अपनी अदाओं से मुग्ध करते हैं। डायरेक्टर ने उन्हें कम नचाया होता तो उनका सही उपयोग हो जाता।
फिल्म का मजेदार पक्ष है अंग्रेजी में उपन्यास लिख रहे और विदेश में बसे भारतीय लेखकों का हिंदी बोलना। हम सभी जानते और शिकायत करते हैं कि हिंदी फिल्मों के कलाकार और तकनीशियन भले ही हिंदी में फिल्में बनाते हों, लेकिन उनके संपर्क और व्यवहार की भाषा अंग्रेजी है। यहां उनका लेखन, प्रकाशन और समाज अंग्रेजी का है, लेकिन वे हिंदी बोलते हैं और हिंदी में गाने गाते हैं। लेखक-निर्देशक को पता होना चाहिए कि ऐसी विसंगति के साथ रची गई कहानी दर्शकों से कनेक्ट नहीं करती। अगर ये किरदार मुंबई या दिल्ली के होते तो कहानी विश्वसनीय लगती।
अवधि: 135 मिनट
abrahmatmaj@mbi.jagran.com

Friday, June 20, 2014

फिल्‍म समीक्षा : हमशकल्‍स

-अजय ब्रह्मात्‍मज
साजिद खान की 'हमशकल्स' वास्तव में हिंदी फिल्मों के गिरते स्तर में बड़बोले 'कमअकल्स' के फूहड़ योगदान का ताजा नमूना है। इस फिल्म में पागलखाने के नियम तोडऩे की एक सजा के तौर पर साजिद खान की 'हिम्मतवाला' दिखायी गयी है। भविष्य में कहीं सचमुच 'हमशकल्स' दिखाने की तजवीज न कर दी जाए। साजिद खान जैसे घनघोर आत्मविश्वासी इसे फिर से अपनी भूल मान कर दर्शकों से माफी मांग सकते हैं, लेकिन उनकी यह चूक आम दर्शक के विवेक को आहत करती है। बचपना और बचकाना में फर्क है। फिल्मों की कॉमेडी में बचपना हो तो आनंद आता है। बचकाने ढंग से बनी फिल्म देखने पर आनंद जाता है। आनंद जाने से पीड़ा होती है। 'हमशकल्स' पीड़ादायक फिल्म है।
साजिद खान ने प्रमुख किरदारों को तीन-तीन भूमिकाओं में रखा है। तीनों हमशकल्स ही नहीं, हमनाम्स भी हैं यानी उनके एक ही नाम हैं। इतना ही नहीं उनकी कॉमेडी भी हमशक्ली है। ये किरदार मौके-कुमौके हमआगोश होने से नहीं हिचकते। डायलॉगबाजी में वे हमआहंग (एक सी आवाजवाले) हैं। उनकी सनकी कामेडी के हमऔसाफ (एकगुण) से खिन्नता और झुंझलाहट बढ़ती है। 'हमशकल्स' में कलाकारों और निर्माता-निर्देशक की हमखयाली और हमखवासी से कोफ्त हो सकती है। हिंदी फिल्मों के ये हमजौक और हमजल्सा हुनरबाज हमदबिस्तां(सहपाठी) लगते हैं। सच कहूं तो उन्हें दर्शकों से कोई हमदर्दी नहीं है। इस मायने में साजिद खान की हमशीर (बहन) फराह खान ज्यादा काबिल और माकूल डायरेक्टर हैं। फिर भी साजिद खान की हमाकत (मूर्खता) देखें कि उन्होंने इस फिल्म को किशोर कुमार और जिम कैरी जैसे हुनरमंद कलाकारों को समर्पित किया है और परोसा है कॉमेडी के नाम पर फूहड़ मनोरंजन। भला किशोर कुमार और साजिद खान मनोरंजन के हमरंगी हो सकते हैं?
'हमशकल्स' में सैफ अली खान, रितेश देशमुख और राम कपूर हैं। इन तीनों में केवल रितेश देशमुख अपनी काबिलियत से सुकून देते हैं। यहां तक कि लड़कियों का रूप धारण करने पर भी तीनों में केवल वही अपने नाज-ओ-अंदाज से लड़कीनुमा लगते हैं। सैफ अली खान ने पहली बार ऐसी कॉमेडी की है। अफसोस कि उन्हें केवल जीभ निकालने और पुतलियों को नाक के समीप लाना ही आता है। चेहरे पर उम्र तारी है। उनके लिए बच्चा, कुत्ता, समलैंगिक और लड़की बनना भी भारी है। मार्के की बात है कि किसी भी स्थिति-परिस्थिति में उनके बाल नहीं बिगड़ते। राम कपूर का इस्तेमाल इनकी प्रतिभा से अधिक डीलडौल के लिए हुआ है। बिकनी में वे बर्दाश्त के बाहर हो गए हैं। फिल्म की अभिनेत्रियां साजिद खान की अन्य फिल्मों की तरह केवल नाच-गाने और देहदर्शन के लिए हैं। तमन्ना भाटिया, ईशा गुप्ता और बिपाशा बसु को कुछ दृश्य और संवाद भी मिल गए हैं। फिल्म पूरी होने के बाद बिपाशा बसु का एंड प्रोडक्ट से क्यों मोहभंग हुआ था? उनके बयान का औचित्य समझ में नहीं आता। फिल्म शुरुआत से अंत तक निकृष्ट है। यह बात तो शूटिंग आरंभ होते ही समझ में आ गई होगी। बहरहाल, इस निम्नस्तरीय फिल्म में भी कॉमेडी के नाम पर दी गई घटिया हरकतों के बावजूद सतीश शाह की मौजूदगी तारीफ के काबिल है।
इतना ही नहीं। यह फिल्म 159 मिनट से अधिक लंबी है। बेवकूफियों का सिलसिला खत्म ही नहीं होता। हंसी लाने की कोशिश में गढ़े गए लतीफों और दृश्य मुंबइया भाषा में दिमाग का दही करते रहते हैं। दर्शकों के दिमाग के साथ धैर्य की भी परीक्षा लेती है 'हमशकल्स'। अगर आप नीली दवा पीकर आदमी के भौंकने और कुत्तों जैसी हरकतें करने पर बार-बार हंस सकते हैं, बड़ों के बच्चों जैसे तुतलाने पर मुस्कराने लगते हों और दो दृश्यों के बीच कोई संबंध या तर्क न खोजते हों तो आप 'हमशकल्स' देख सकते हैं। अन्यथा मनोरंजन के नाम पर तिगुना उत्पीडऩ हो सकता है।
अवधि-159 मिनट
* एक स्‍टार

Friday, November 29, 2013

फिल्‍म समीक्षा : बुलेट राजा

Bullet Rajaदेसी क्राइम थ्रिलर 
-अजय ब्रह्मात्‍मज
तिग्मांशु धूलिया 'हासिल' से अभी तक अपनी फिल्मों में हिंदी मिजाज के साथ मौजूद हैं। हिंदी महज एक भाषा नहीं है। हिंदी प्रदेशों के नागरिकों के एक जाति (नेशन) है। उनके सोचने-विचारने का तरीका अलग है। उनकी संस्कृति और तहजीब भी थोड़ी भिन्न है। मुंबई में विकसित हिंदी सिनेमा की भाषा ही हिंदी रह गई है। संस्कृति, लोकाचार, बात-व्यवहार, परिवेश और प्रस्तुति में इसने अलग स्वरूप ले लिया है। प्रकाश झा, विशाल भारद्वाज, अनुराग कश्यप और तिग्मांशु धूलिया की फिल्मों में यह एक हद तक आ पाती है। तिग्मांशु धूलिया ने बदले और प्रतिशोध की अपराध कथा को हिंदी प्रदेश में स्थापित किया है। हालांकि मुंबइया सिनेमा (बॉलीवुड) के दुष्प्रभाव से वे पूरी तरह से बच नहीं सके हैं, लेकिन उनके इस प्रयास की सराहना और प्रशंसा करनी होगी। 'बुलेट राजा' जोनर के लिहाज से 'न्वॉयर' फिल्म है। हम इसे 'पुरबिया न्वॉयर' कह सकते हैं।
इन दिनों हिंदी फिल्मों में लंपट, बेशर्म, लालची और लुच्चे नायकों की भीड़ बढ़ी है। 'बुलेट राजा' के राजा मिसरा को गौर से देखें तो वह इन सब से अलग तेवर का मिडिल क्लास का सामान्य युवक है। वह 10 से 5 की साधारण नौकरी करना चाहता है, लेकिन परिस्थितियां ऐसे बनती हैं कि उसके हाथों में बंदूक आ जाती हैं। आत्मविश्वास के धनी राजा मिसरा के दिन-दहाड़े गोलीकांड से सभी आतंकित होते हैं। जल्दी ही वह प्रदेश के नेताओं की निगाह में आ जाता है। उनकी राजनीतिक छत्रछाया में वह और भी संगीन अपराध और हत्याएं करता है। एक स्थिति आती है कि उसकी हरकतों से सिस्टम को आंच आने लगती है। उसे हिदायत दी जाती है तो वह सिस्टम के खिलाफ खड़ा हो जाता है। राजा मिसरा आठवें दशक के एंग्री यंग मैन विजय से अलग है। वह आज का नाराज, दिग्भ्रमित और दिल का सच्चा युवक है। दोस्ती, भाईचारे और प्रेम के लिए वह जान की बाजी लगा सकता है।
राजा मिसरा के जीवन में दोस्त रूद्र और प्रेमिका हैं। इनके अलावा उसका मध्यवर्गीय परिवार भी है, जिसके लिए वह हमेशा फिक्रमंद रहता है। राजा मिसरा आठवें दशक के विजय की तरह रिश्तों में लावारिस नहीं है। रूद्र की हत्या का बदला लेने से जब उस रोका जाता है तो स्पष्ट कहता है, 'भाई मरा है मेरा। बदला लेने की परंपरा है हमारी। यह कोई कारपोरेट कल्चर नहीं है कि अगली डील में एडजस्ट कर लेंगे।' तिग्मांशु अपने फिल्मों के चरित्रों को अच्छी तरह गढ़ते हैं। इस फिल्म में ही रूद्र, सुमेर यादव, बजाज, मुन्ना और जेल में कैद श्रीवास्तव को उन्होंने हिंदी प्रदेश की समकालीन जिंदगी से उठा लिया है। शुक्ला, यादव और अन्य जातियों के नामधारी के नेताओं के पीछे कहीं न कहीं हिंदी प्रदेश के राजनीतिक समीकरण को भी पेश करने की मंशा रही होगी। तिग्मांशु का ध्येय राजनीति के विस्तार में जाना नहीं था। कई प्रसंगों में अपने संवादों में ही वे राजनीतिक टिप्पणी कर डालते हैं। अगर भाषा की विनोदप्रियता से वाकिफ न हों तो तंज छूट सकता है। मुंबई, कोलकाता और चंबल के प्रसंग खटकते हैं।
सैफ अली खान ने राजा मिसरा के किरदार में चुस्ती, फुर्ती और गति दिखाई है। अगर उनके बातों और लुक में निरंतरता रहती तो प्रभाव बढ़ जाता। उम्र और अनुभव से वे देसी किरदार में ढलते हैं। जिम्मी शेरगिल को कम दृश्य मिले हैं, लेकिन उन दृश्यों में ही वे अपनी असरदार मौजूदगी से आकर्षित करता है। सुमेर यादव की भूमिका में रवि किशन मिले दृश्यों में ही आकर्षित करते हैं। छोटी और महत्वपूर्ण भूमिकाओं में राज बब्बर, गुलशन ग्रोवर आदि अपनी भूमिकाओं के अनुकूल हैं। यहां तक कि चंकी पांडे को भी एक किरदार मिला है। सोनाक्षी सिन्हा बंगाली युवती के किरदार को निभा ले जाती हैं। विद्युत जामवाल का एक्शन दमदार है।
फिल्म का गीत-संगीत थोड़ा कमजोर है। देसी टच और पुरबिया संगीत की ताजगी की कमी महसूस होती है। 'तमंचे पर डिस्को' खास उद्देश्य को पूरा करता है और 'डोंट टच' में माही गिल का नृत्य बॉलीवुड के आयटम नंबर से प्रभावित है। इस फिल्म की खूबी परतदार पटकथा और स्थितिजन्य संवाद हैं।
अवधि: 138 मिनट 
**** चार स्‍टार 

Monday, August 19, 2013

अपने पैटर्न और कम्फर्ट जोन में खुश हूं-सोहा अली खान



-अजय ब्रह्मात्मज

-‘साहब बीवी गैंगस्टर रिटर्नस’ का संयोग कैसे बना?
0 तिग्मांशु धूलिया की ‘साहब बीवी और गैंगस्टर’ मैंने देखी थी। वह मुझे अच्छी लगी थी। पता चला कि वे सीक्वल बना रहे हैं। मैंने ही उनको फोन किया। मैंने कभी किसी को फोन नहीं किया था। पहली बार मैंने काम मांगा। पार्ट वन में बीवी बहुत बोल्ड थी। मैं सोच रही थी कि कर पाऊंगी कि नहीं? फिर तिग्मांशु ने ही बताया  कि बीवी का रोल टोंड डाउन कर रहे हैं। उस वजह से मैं कम्फटेबल हो गई। फिल्म की रिलीज के बाद भाई ने फोन कर के मुझे बधाई दी। उन्होंने बताया कि रिव्यू के साथ-साथ कलेक्शन भी अच्छा है।
- आपकी ‘वार छोड़ न यार’ आ रही है। इसके बारे में कुछ बताएं?
0 पहले मुझे लगा था कि नए डायरेक्टर की फिल्म नहीं करनी चाहिए। बाद में स्क्रिप्ट सुनने पर मैंने हां कर दी। वे दिबाकर बनर्जी के असिस्टेंट रहे हैं। इस फिल्म में मेरे साथ शरमन जोशी, जावेद जाफरी और संजय मिश्रा हैं। बीकानेर के पास बोर्डर के समीप भयंकर गर्मी में इसकी शूटिंग हुई है। अपनी सीमा में हमने हिंदुस्तान और पाकिस्तान बनाया था। यह वार सटायर है। ऐसी फिल्म हिंदी में नहीं बनी है।
- किस प्रकार से यह सटायर है?
0 सीमा पर हिंदुस्तान और पाकिस्तान के मोर्चे हैं। पाकिस्तानी कमांडर जावेद जाफरी हैं और इंडियन आर्मी ऑफिसर शरमन जोशी हैं। हमें लगता है कि बॉर्डर पर हमेशा तनाव रहता है और गोली-बारी होती रहती है। वहां मैं एक टीवी रिपोर्टर की हैसियत से जाती हूं। किसी वजह से वहां मुझे रुकना पड़ता है। इस सटायर में एक मैसेज भी है।
- वॉर रिपोर्टर के लिए आपने किसे आयडियल माना?
0 फिल्म में मेरा नाम रुत दत्ता है। अब आप जो भी समझ लीजिए।
- आप इतनी कम फिल्में क्यों कर रही हैं?
0 मेरे पास जो ऑफर आते हैं उन्हीं में से कुछ चुनती हूं। इस साल यह मेरी दूसरी फिल्म होगी। इसके बाद अरशद वारसी के साथ ‘जो भी करवा लो’ फिल्म आएगी। वह आउट एंड आउट कामेडी है। इस फिल्म में मैंने एक पुलिस इंस्पेक्टर का रोल किया है। मुझे एक्शन और कैबरे करने का मौका मिला। इसे समीर तिवारी निर्देशित कर रहे हैं।
- आपकी तमाम फिल्में सीमित बजट की हैं? आप बड़ी एंटरटेनर फिल्मों की हिस्सा क्यों नहीं हैं?यही आपने चुना है या महज संयोग है?
0 ऐसा नहीं है कि मैं बड़ी एंटरटेनर फिल्में नहीं करना चाहती हूं। मैंने पहले ही कहा कि मुझे जो मिलता है उन्हीं में से चुनती हूं। मैं फिल्में करना चाहती हूं, लेकिन कहीं कुछ अटका हुआ है। मुझे लगता है कि सिनेमा का उद्देश्य होना चाहिए। सिर्फ पैसे कमाने से तो यह आर्ट नहीं रह जाएगा। मैं फिल्मों में ज्यादा पैसे या नाम कमाने के लिए नहीं आई हूं। मुझे सेट पर जाना अच्छा लगे। अपना काम एंज्वाय करूं। वैसे भी हिंदी फिल्मों में हीरोइनों के लिए कम गुंजाइश रहती है। फिर भी मैं कोशिश करती रहूंगी।
- क्या आपको भी लगता है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में हीरो की ही पूछ होती है?
0 इंडस्ट्री अभी तक हीरो केंद्रित ही है। बाहर के समाज में जो स्थिति है वही यहां भी है। मुझे तो पता नहीं चलता कि इंडस्ट्री कैसे चलती है? कभी बड़ा स्टार भी नहीं चलता और कभी कोई छोटी फिल्म कमाल कर जाती है।
- पिछले दिनों में आई कौन सी हिंदी फिल्में आपको अच्छी लगी हैं?
0 मुझे ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ बहुत अच्छी लगी। मैं छह-सात घंटे की फिल्म एक साथ देख सकती हूं। मुझे तो अच्छी लगी। मुझे तो ‘गो गोवा गॉन’ भी पसंद आई। मैं कम फिल्में देखती हूं। मुझे पांच लोग बताएं तो फिल्म देखती हूं। अगर पांच सौ लोग बताएं तो नहीं देखती हूं। ऐसी फिल्म को मेरी जरूरत नहीं होती है।
- फिल्मों के अलावा क्या करती हैं आप?
0 योगा करती हूं। बैडमिंटन खेलती हूं। खूब घूमती हूं। पढऩे का भी शौक है। नई जगह देखने और रिलैक्स करने के लिए मुंबई से भागती हूं। काम के अलावा यहां रुकने की कोई वजह नहीं। मुझे यह शहर अच्छा नहीं लगता। यहां के लोग अच्छे हैं, लेकिन शहर तो खूबसूरत नहीं है। खूबसूरती के लिए मन तरसता है तो बाहर निकल जाती हूं।
- निजी जिंदगी में सोहा कैसी हैं?
0 मैं बहुत कम में संतुष्ट हो जाती हूं। मेरी पसंद भी सीमित है। आस-पास में दो-चार लोग ही रहें तो काफी है। यों समझें कि अगर मुझे कोई चप्पल पसंद है तो टूट जाने पर भी उसे टेप लगाकर मैं पहनती रहूंगी। लोगों से वगैर मिले दो-तीन दिनों तक आराम से मैं घर में रह सकती हूं। सभी कहते हैं कि मुझे खुद में बदलाव लाना चाहिए। इसके लिए मैं मनोचिकित्सक से भी मिल चुकी हूं। उनकी सलाह है कि मुझे अपनी जिंदगी में हर पैटर्न तोडऩा चाहिए। उनकी सलाह है कि एक्टर के तौर पर भी मुझे अपने कम्फर्ट जोन से निकलना चाहिए।




Friday, July 13, 2012

फिल्‍म समीक्षा : कॉकटेल

Review : cocktail 

दिखने में नयी,सोच में पुरानी 

-अजय ब्रह्मात्‍मज

होमी अदजानिया निर्देशित कॉकटेल की कहानी इम्तियाज अली ने लिखी है। इम्तियाज अली की लिखी और निर्देशित फिल्मों के नायक-नायिका संबंधों को लेकर बेहद कंफ्यूज रहते हैं। संबंधों को स्वीकारने और नकारने में ढुलमुल किरदारों का कंफ्यूजन ही उनकी कहानियों को इंटरेस्टिंग बनाता है। कॉकटेल के तीनों किरदार गौतम, वेरोनिका और मीरा अंत-अंत तक कंफ्यूज रहते हैं। इम्तियाज अली ने इस बार बैकड्रॉप में लंदन रखा है। थोड़ी देर के लिए हम केपटाउन भी जाते हैं। कहानी दिल्ली से शुरू होकर दिल्ली में खत्म होती है।
गौतम कपूर आशिक मिजाज लड़का है। उसे हर लड़की में हमबिस्तर होने की संभावना दिखती है। वह हथेली में दिल लेकर चलता है। लंदन उड़ान में ही हमें गौतम और मीरा के स्वभाव का पता चल जाता है। लंदन में रह रही वेरोनिका आधुनिक बिंदास लड़की है। सारे रिश्ते तोड़कर मौज-मस्ती में गुजर-बसर कर रही वेरोनिका के लिए आरंभ में हर संबंध की मियाद चंद दिनों के लिए होती है। एनआरआई शादी के फरेब में फंसी मीरा पति से मिलने लंदन पहुंचती है।
पहली ही मुलाकात में उसका स्वार्थी पति उसे दुत्कार देता है। बेघर और बेसहारा हो चुकी मीरा को वेरोनिका का सहारा मिलता है। लंदन में कितनी आसानी से सबकुछ हो जाता है। वेरोनिका और मीरा साथ रहने लगते हैं। अपनी भिन्नता की वजह से दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। वे अपनी जिंदगी से संतुष्ट हैं। इस बीच मीरा के कहने पर गौतम को सबक सिखाने के लिए वेरोनिका उसकी चाल ही उस पर आजमाती है। गौतम को वेरोनिका का अंदाज पसंद आता है। असमर्पित रिश्ते में यकीन रखने वाले दोनों मौज-मस्ती के लिए साथ रहने लगते हैं। मीरा उनके साथ एडजस्ट करती है। अरे हां, गौतम की मां और मामा भी हैं।
मां दिल्ली में रहती हैं और मामा लंदन में। मामा का ही दिलफेंक मिजाज भांजे को मिला है। मां बेटे की शादी के लिए परेशान हैं। न जाने कब हिंदी फिल्मों की माताएं बेटे-बेटियों की शादी की चिंता से मुक्त होंगी? वह बेटे को समझाने के लिए लंदन पहुंच जाती हैं। मां को खुश करने के लिए गौतम संभावित बहु के रूप में मीरा का परिचय करवाता है। कुछ दिनों के लिए भिड़ायी गयी यह तरकीब रिश्तों के नए मायने उजागर करती है। तीनों मुख्य किरदारों के स्वभाव और सोच में परिव‌र्त्तन आता है। लव और इमोशन का कंफ्यूजन आरंभ होता है, जो अंत तक जारी रहता है। थोड़ा खिंच भी जाता है।
सैफ ऐसे खिलंदड़े और दिलफेंक आशिक की भूमिका में जंचते हैं। उन्होंने दिल चाहता है से लेकर लव आज कल तक में निभाई भूमिकाओं में से थोड़ा-थोड़ा याद कर कॉकटेल के गौतम को भी निभा दिया है। कुछ दृश्यों में वे बहुत अच्छे हैं तो कुछ में दोहराव की वजह से बहुत बुरे भी लगे हैं। उन्हें लगता होगा कि वे परफॉर्म कर रहे हैं,जबकि वे बोर करने लगते हैं। दीपिका पादुकोण भी बिगड़ी हुई लड़की का किरदार निभाने के अनुभव बटोर चुकी हैं। यहां उनमें थोड़ा और निखार दिखाई देता है। खास कर छूट जाने, अकेले पड़ने और प्रेमरहित होने के एहसास, भाव और दृश्यों में वह प्रभावशाली लगी हैं। इस फिल्म में उन्हें चरित्र के मुताबिक आकर्षक कॉस्ट्यूम भी मिले हैं।
वेरोनिका को उन्होंने बहुत अच्छी तरह जीवंत किया है। सीधी-सादी मीरा के किरदार में पहली बार पर्दे पर आई डायना पेंटी में आत्मविश्वास है। वह अपने किरदार के साथ न्याय करती हैं। बोमन ईरानी और डिंपल कपाडि़या के किरदार घिसेपिटे हैं, इसलिए उनके अभिनय में नयापन भी नहीं है। रणदीप हुडा का चरित्र अविकसित रह गया है। कॉकटेल हिंदी फिल्मों की पीढि़यों पुरानी सोच को फिर से स्थापित करती है। दीपिका पादुकोण जैसी आधुनिक लड़की को कथित भारतीय नारी में तब्दील करने की कोशिश लेखक-निर्देशक के वैचारिक दायरे को जाहिर करती है। एक-दूसरे के लिए त्याग कर रही लड़कियों के व्यवहार को देख कर हंसी आती है। क्या ऐसा नहीं हो सकता था कि वेरोनिका और मीरा के बीच एक अंडरस्टैंडिंग बनती और दोनों लात मार कर गौतम को अपनी जिंदगी और घर से बाहर निकाल देतीं। यह फिल्म हर हाल में गौतम यानी नायक के फैसलों को उचित ठहराती चलती है। फिल्म के कुछ संवाद अंग्रेजी में हैं। हिंदीभाषी दर्शकों को दिक्कत हो सकती है।
अवधि - 146 मिनट
** 1/2 ढाई स्टार

Friday, March 23, 2012

फिल्‍म समीक्षा : एजेंट विनोद

review : agent vinodचुनौतियों से जूझता एजेंट विनोद
-अजय ब्रह्मात्‍मज

एक अरसे के बाद हिंदी में स्पाई थ्रिलर फिल्म आई है। श्रीराम राघवन ने एक मौलिक स्पाई फिल्म दी है। आमतौर पर हिंदी में स्पाई थ्रिलर बनाते समय निर्देशक जेम्स बांड सीरिज या किसी और विदेशी फिल्म से प्रभावित नजर आते हैं। श्रीराम राघवन ऐसी कोशिश नहीं करते। उनकी मौलिकता ही एक स्तर पर उनकी सीमा नजर आ सकती है, क्योंकि एजेंट विनोद में देखी हुई फिल्मों जैसा कुछ नहीं दिखता। एजेंट विनोद उम्मीद जगाती है कि देश में चुस्त और मनोरंजक स्पाई थ्रिलर बन सकती है।

ऐसी फिल्मों में भी कहानी की आस लगाए बैठे दर्शकों को इतना बनाता ही काफी होगा कि एक भारतीय एजेंट मारे जाने से पहले एक कोड की जानकारी देता है। वह विशेष कुछ बता नहीं पाता। एजेंट विनोद उस कोड के बारे में पता करने निकलता है। दिल्ली से दिल्ली तक के खोजी सफर में एजेंट विनोद पीटर्सबर्ग, मोरक्को, रिगा, पाकिस्तान आदि देशों में एक के बाद एक चुनौतियों से जूझता है। किसी वीडियो गेम की तरह ही एजेंट विनोद की बाधाएं बढ़ती जाती हैं।

वह उन्हें नियंत्रित करता हुआ अपने आखिरी उद्देश्य की तरफ बढ़ता जाता है। श्रीराम राघवन ने एजेंट विनोद की बहादुरी दिखाने के लिए रोमांचक दृश्य गढ़े हैं। अपने नाम के अनुरूप एजेंट विनोद विनोदी और कूल है। दुश्मनों से घिरे रहने पर भी वह ठंडे बीयर की चाहत रखता है और मौका मिलने पर चुटीले मुहावरे बोलने से बाज नहीं आता।

सैफ अली खान ने लेखक-निर्देशक श्रीराम राघवन की कल्पना को शिद्दत और बहादुरी के साथ पर्दे पर उतारा है। एक्शन दृश्यों में सैफ जमते हैं। अच्छी बात है कि एक्शन दृश्य अविश्वसनीय नहीं हैं। हाथों और हथियारों से लड़ते समय एजेंट विनोद की तेजी और तत्परता प्रभावशाली लगती है। कई देशों, शहरों और घटनाओं में हम एजेंट विनोद को संलग्न देखते हैं। फिल्म की स्क्रिप्ट इतनी चुस्त और सटीक है कि कहीं कोई झटका या जंप नजर नहीं आता।

सैफ अली खान को उनके सहयोगी कलाकारों का भरपूर समर्थन मिला है। प्रेम चोपड़ा, गुलशन ग्रोवर,रवि किशन और जाकिर हुसैन जैसे परिचित कलाकार तो हैं ही। आदिल हुसैन, अंशुमान सिंह और बीपी सिंह जैसे नए कलाकार भी पीछे नहीं रहे हैं। पाकिस्तानी एजेंट के इरम के रूप में करीना कपूर जंची हैं।

हिंदी की उन चंद फिल्मों में एजेंट विनोद शामिल है, जिसमें पाकिस्तान का चित्रण करते समय उसे दुश्मन देश केरूप में नहीं दिखाया गया। फिल्म बड़ी सफाई से संदेश देती है कि भारत की तरह पाकिस्तान में भी कुछ लोग हैं जो आतंकवादी गतिविधियों में शामिल हैं, लेकिन दोनों देशों में कुछ अधिकारी और एजेंट ऐसे भी हैं जो अमन चाहते हैं। वे इंटरनेशनल साजिश के खिलाफ लगे हैं। एजेंट विनोद का यह संदेश महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय है। एंटरटेमेंट और एक्शन के बीच इस पर भी गौर करना चाहिए।

फिल्में अपने समय का आईना होती है। फिल्म में जिम्मी का भारत प्रवेश और उसके बाद की सुरक्षा चौकसी देखते हुए 26-11 के दृश्य याद आते हैं। श्रीराम राघवन ने बगैर उल्लेख किए उन स्थितियों का चित्रण किया है, जो 26-11 के समय हम ने भारतीय टीवी पर लाइव देखा था। निश्चित रूप से फिल्म में कुछ कमियां हैं। कई दृश्यों में लंबी पूछताछ और जांच के बाद भी स्मार्ट सैफ को देख कर आश्चर्य होता है, लेकिन कुछ दृश्यों में उनके सूजे होंठ, घायल चेहरे और फूली आंखें वास्तविक लगती हैं।

श्रीराम राघवन ने कला निर्देशक और कैमरामैन के सहयोग से लोकेशन को विहंगम और वास्तविक रूप दिया है। फिल्म की शुरुआत में ही अफगानिस्तान के वीरानों में छावनी के धूसर दृश्य फिल्म का मूड बना देते हैं। सभी शहरों को कैमरामैन ने नए तरीके से कहानी के संदर्भ में पेश किया है।

*** 1/2 साढ़े तीन स्टार


Thursday, March 22, 2012

रिएलिस्टिक स्पाई थ्रिलर है एजेंट विनोद

interview : shriram raghwan-अजय ब्रह्मात्‍मज

श्रीराम राघवन की तीसरी फिल्म है एजेंट विनोद। उनकी पहली फिल्म एक हसीना थी के हीरो सैफ अली खान थे। तभी से दोनों एक स्पाई थ्रिलर के लिए प्रयासरत थे। एजेंट विनोद के निर्माण में ढाई साल लग गए,लेकिन श्रीराम राघवन मानते हैं कि ऐसी फिल्मों में इतना समय लग जाना स्वाभाविक है।

एजेंट विनोद किस जोनर की फिल्म है? कुछ लोग इसे थ्रिलर कह रहे हैं तो कुछ मान रहे हैं हैं कि यह हिंदी में जेम्स बांड टाइप की फिल्म है?

यह स्पाई फिल्म है। हिंदी या किसी भी भाषा में आप स्पाई फिल्म बनाएंगे, तो लोग उसे जेम्स बांड टाइप ही कहेंगे। जेम्स बांड की फिल्मों की तरह एजेंट विनोद में भी कई लोकेशन हैं, ढेर सारे वन लाइनर हैं, रहस्यात्मक कहानी है। फिर भी हमने जेम्स बांड की कॉपी नहीं की है। बांड का प्रभाव जरूर है। उसे मैं स्पिरिट ऑफ बांड कहूंगा।

हमारे पास बांड का बजट नहीं है। जेम्स बांड की फिल्में 1000 करोड़ में बनती हैं। मैंने हिंदी फिल्मों की परंपरा से प्रभाव लिया है। आंखें, यकीन, चरस, ब्लैकमेल जैसी फिल्में आपको याद होंगी। मेरी कोशिश है कि दर्शकों को भरपूर मनोरंजन मिले। यह आज की कहानी है। रियल समय में चलती है। इसमें एक स्टाइल है। यह मेरी तीसरी फिल्म है और मुझे लगता है कि मैं मेनस्ट्रीम के ज्यादा करीब आ गया हूं। इसमें एक्शन भी है, गीत भी है, एक्टिंग भी है, डांस भी है।

जेम्स बांड तो कोल्ड वार का प्रोडक्ट था। एजेंट विनोद क्या आज के ग्लोबल टेररिज्म का प्रोडक्ट है?

इसमें टेररिज्म के तत्व हैं, लेकिन मेरा फोकस एजेंट विनोद पर है। यह ट्रेजर हंट की तरह है। फिल्म के शुरू में एक एजेंट की हत्या होती है। मरने के पहले वह एक नंबर बोलता है। उस नंबर को समझने के लिए एजेंट विनोद अपनी खोज आरंभ करता है। दर्शक एजेंट विनोद के साथ चलते हैं। उसी के नजरिए से कहानी अनफोल्ड होती है। इस खोज में दर्शकों को एडवेंचर का आनंद मिलेगा।

एजेंट विनोद पहले रूस जाता है। रूस के बाद वह मोरक्को जाता है। मोरक्को में उसे करीना कपूर मिलती है। वह एक रहस्यमयी लड़की है। वह उस पर भरोसा करता है, पर आशंकित भी रहता है। वहां से फिर एक गुप्त जगह पर जाता है। आखिरकार उसकी खोज पूरी होती है। आतंकवादी गतिविधियों की जो खबरें हम पढ़ और देख रहे हैं, वह सब इस फिल्म में आता है।

इस फिल्म का नाम एजेंट विनोद ही क्यों? मेरा सवाल विनोद को लेकर है। यह आठवें-नौंवे दशक का नाम लगता है?

चार साल पहले सैफ के साथ हम यूं ही बात कर रहे थे। हमदोनों अपनी-अपनी पसंद की फिल्में शेयर कर रहे थे। बांड की फिल्मों की भी बातें हुई। हिंदी फिल्मों में हम दोनों की कॉमन पसंद एजेंट विनोद निकली। महेंद्र संधू की यह फिल्म सालों पहले आई थी। मैंने यह फिल्म स्कूल के दिनों में देखी थी। आज यह फिल्म पुरानी लग सकती है, लेकिन उसमें भरपूर मस्ती है। हमने तभी तय किया कि इसी नाम से हम फिल्म बनाएंगे। यह रीमेक नहीं है। हमने सिर्फ टाइटिल दिया है। आपने सच कहा कि यह पुराना नाम लगता है, लेकिन इस नाम में एक आकर्षण भी है। यह टाइटिल ध्यान खींचता है। चूंकि इस नाम की एक फिल्म बनी हुई थी,इसलिए यह नाम हमारे दिमाग में आया। अन्यथा हम कोई और नाम भी रख सकते थे।

अभी के एक्शन और मौज-मस्ती के दौर में क्या स्पाई फिल्म को दर्शक मिलेंगे?

हमें याद है कि विजय आनंद और राज खोसला ने कई सारी सफल थ्रिलर फिल्में बनाई, लेकिन पिछले दो दशकों में प्रेम कहानियां और एक्शन प्रधान फिल्में ही बन रही हैं। सचमुच, मिथुन चक्रवर्ती की सुरक्षा के बाद थ्रिलर फिल्में आनी बंद हो गई थी। अब्बास-मस्तान के थ्रिलर में रोमांस ज्यादा रहता है। बीच में अनिल शर्मा की हीरो आई थी, लेकिन इस स्पाई स्टोरी में भी लव स्टोरी घुस गई थी। मुझे भी आश्चर्य होता है कि पिछले 10-15 सालों में कोई स्पाई स्टोरी या थ्रिलर फिल्म क्यों नहीं आई? अभी मैंने सुना है कि विद्या बालन की कहानी लोगों को पसंद आई है।

एजेंट विनोद के साथ एक रहस्य जुड़ा हुआ है कि इस फिल्म को पर्दे पर आने में इतना समय क्यों लगा?

न जाने कैसे एजेंट विनोद शुरू होने से डेढ़ साल पहले खबरों में आ गई थी। जॉनी गद्दार खत्म करने के बाद ही इसकी चर्चा होने लगी थी। सही बात बताऊं तो इसमें कुल ढ़ाई साल लगे। स्क्रिप्ट मैं खुद लिखता हूं। इसलिए उसमें समय लगा। दूसरे लिखने के बाद, जब मैं लोकेशन पर गया, तो वहां के नक्शे के हिसाब से फिर से कहानी में बदलाव किया। अब जैसे कि एम्सटर्डम में शूट करना चाहता था, लेकिन यह मुमकिन नहीं हो पाया। लिखते समय हमने कल्पना की उड़ानें भरीं। उन्हें पर्दे पर लाने में अनेक दिक्कतों का सामना करना पड़ा।

एजेंट विनोद में सौ से ज्यादा लोकेशन है और किसी भी लोकेशन का दुहराव नहीं है। यह फिल्म लगातार चलती रहती है। इंटीरियर ड्रामा बहुत कम है। फिल्म देखते समय आप महसूस करेंगे कि हमने इतना समय क्यों लिया? यह कोई एक्सक्यूज नहीं है। आमतौर पर इतना समय नहीं लगना चाहिए। यही फिल्म हॉलीवुड में रहती, तो प्री-प्रोडक्शन में ज्यादा समय लेकर छह महीने में शूटिंग कर लेते। हमलोग दोनों काम एक साथ करते रहते हैं।पहले की दोनों फिल्में एक हसीना थी और जॉनी गद्दार आप ने अनेक सीमाओं और बंधनों के बीच की थी। सुना है इस बार आप को फ्री हैंड मिला था?

पहले की फिल्मों में थोड़ी सीमाएं थीं। एजेंट विनोद अलग तरह की लो बजट फिल्म है। यहां लो का मतलब कम नहीं, लेना है। मैंने जो भी मांगा, वह मिलता रहा। इस फिल्म और फिल्म के कैरेक्टर के साथ सैफ का जुड़ाव ज्यादा था। उन्होंने ठान ली थी कि यह फिल्म करनी है। शायद उनके बचपन का सपना था कि एक स्पाई फिल्म करेंगे। बचपन में चोर-सिपाही खेलते हैं। मुझे लगता है वहीं से इसका वायरस उनके दिमाग में घुसा होगा। सैफ लव स्टोरी और रोमांटिक फिल्मों में भी अच्छे लगते हैं, लेकिन उनमें पूरा मन नहीं लगता। सैफ ने बजट की कोई सीमा नहीं रखी। फिल्म महंगी जरूर हो गई है। दर्शकों को अच्छी लगी, तो सब कुछ वसूल हो जाएगा।

हीरो अगर निर्माता हो, तो फायदा होता है?

जरूर। उसे मालूम रहता है कि फिल्म की जरूरतें क्या-क्या हैं? इस फिल्म में दो दिनों की शूटिंग के लिए हमलोग रूस गए थे। छोटा यूनिट लेकर गए। फिर भी पैसे तो खर्च हुए। कोई और निर्माता होता, तो किसी कम खर्चीली जगह पर शूट करने के लिए दवाब डालता। हमारी कोशिश थी कि रूस का फ्लेवर आए। स्पाई फिल्म में रूस दिखे, तो कहानी का रहस्य बढ़ जाता है। निर्माता के तौर पर सैफ ने मेरी बात मानी। होम प्रोडक्शन होने के कारण उन्हें खुद को फीस नहीं देनी पड़ी।

सैफ से आप की दोस्ती कब हुई?

एक हसीना थी की शूटिंग के समय ही हुई थी। तब तक सैफ का नाम तो हो गया था, लेकिन एक्टर के तौर पर पहचान नहीं बनी थी। रामगोपाल वर्मा ने हम दोनों पर भरोसा करते हुए एक हसीना थी सौंप दी थी। एक हसीना थी ज्यादा नहीं चल सकी थी, फिर भी हम दोनों को सराहना मिली। मेरे लिए तो वह पहली फिल्म थी। सैफ के कॅरियर में वह टर्निग प्वाइंट साबित हुई। उसके बाद इंडस्ट्री ने उन पर ध्यान दिया। अलग-अलग तरह के रोल दिए। हमारे बीच एक कंफर्ट लेवल है। हमारे झगड़े भी होते हैं। हम लोग नाराज भी हो जाते हैं। यह सब फिल्म के लिए होता है।

इस फिल्म में करीना कपूर का चुनाव कैसे हुआ?

जब मैं फिल्म लिख रहा था, तभी सैफ बार-बार पूछते थे कि हीरोइन का कैरेक्टर कैसा बन रहा है। उनके दिमाग में अवश्य करीना रही होंगी। मैंने भी कहा कि करीना अच्छी एक्ट्रेस हैं। उन्हें फिल्म के लिए चुना जा सकता है। मेरे दोस्तों ने जरूर चिंता जताई कि रीयल लाइफ कपल पर्दे पर नहीं जमते। उनकी कुर्बान भी नहीं चली थी। इन बातों से मैं परेशान नहीं था। रोल और कैरेक्टर में वे फिट बैठती थी। इस फिल्म में दोनों कुछ इस ढंग से आते हैं कि दर्शककेमिस्ट्री वगैरह की चिंता नहीं करेंगे। शुरू में ही सब कुछ सेट हो जाता है।

बाकी कौन से एक्टर हैं?

लंबे समय के बाद प्रेम चोपड़ा दिखाई देंगे। वे खलनायक के तौर पर आए हैं। राम कपूर, आदिल हुसैन, धृतिमान चटर्जी, रविकिशन और गुलशन “्रोवर हैं। दिल्ली का एक नया लड़का अंशुमान सिंह भी फिल्म में है। दर्शक उसे नोटिस करेंगे। सेकेंड हाफ में वह एक खास किरदार में आता है।

फिल्म में गाने और मुजरा तक हैं। ये आपकी पसंद है या बाजार का दबाव?

मुजरा का एक सिचुएशन है। उस सिचुएशन के हिसाब से मुजरा बनाया गया है। हमारी दिक्कत है कि उस सीन में हम पूरा मुजरा नहीं दिखा सकते। अगर थोड़ा दिखाएंगे, तो दर्शक मानेंगे कि हमने धोखा दिया। हमने तय किया है कि उसे फिल्म के अंत में दिखाएंगे और टीवी प्रमोशन में इस्तेमाल करते रहेंगे। वह हिट गाना हो गया है। फिल्म देखते समय दर्शक रियलाइज कर लेंगे कि मुजरा कहां पर होता।

सैफ के बारे में क्या कहेंगे?

मुझे खुद नहीं कहना चाहिए, लेकिन उन्होंने शानदार काम किया है। इस कैरेक्टर को निभाने का वह पूरा आनंद उठा रहे थे। पर्दे पर उसे आप महसूस करेंगे। एजेंट विनोद में सिर्फ एक्शन नहीं है। इमोशन भी है। सैफ इवॉल्व्ड एक्टर हैं।

एजेंट विनोद का आइडिया कब और कैसे पैदा हुआ?

सैफ के साथ तय हो जाने पर कि स्पाई फिल्म बनानी है, मैंने कुछ लेखकों को अप्रोच किया। लेखकों से मुझे अपनी स्क्रिप्ट नहीं मिल पा रही थी। मैं दिखाना चाहता हूं कि आज का रॉ एजेंट कैसा होगा। मैंने ढेर सारे स्पाई नॉवेल पढ़े हैं। फिल्में तो सारी देखी हैं। उन सभी का निचोड़ लेकर मैंने अपनी कहानी लिखी है। ऐसी फिल्मों में कोई कहानी नहीं होती। एक उद्देश्य होता है, जिसे फिल्म का हीरो पूरा करता है। मैंने अभिजीत विश्वास की मदद ली है।

पूरी फिल्म सीक्वेंस बाई सीक्वेंस खुलती जाती है और दर्शकों की जिज्ञासा बढ़ती जाएगी। इस फिल्म को देखते समय टिनटिन कॉमिक्स का मजा आएगा। ट्विस्ट और टर्न ढेर सारे हैं। एंटरटेनिंग स्पाई फिल्म है। जब मैं इसे लिख रहा था, तभी 26/11 की घटना हुई थी। मैं कल्पना करता था और टीवी देखता रहता था। दोनों में एक क्लैश चलता रहता था। रीयल घटनाएं मेरी कल्पना से ज्यादा जानदार थीं। मैं उनसे भी प्रभावित हुआ। फिल्म में मैंने एक संतुलन बनाने की कोशिश की है। यह फिल्म फिक्शन है, लेकिन देशों और शहरों के नाम रीयल हैं। एजेंट विनोद जैसी घटनाएं या कहानी हो सकती हैं। अभी तक ऐसा कुछ हुआ नहीं है।

इसका मतलब भविष्य में फिल्म से प्रेरित होकर कुछ हुआ तो सारा दोष आप पर आएगा?

ऐसा होना तो नहीं चाहिए। अगर हो ही गया, तो एजेंट विनोद भी रहेगा उसमें। वह सब को बचा लेगा। दरअसल मैं एक रियलिस्टिक स्पाई थ्रिलर फिल्म लेकर आ रहा हूं। इसमें मस्ती, एक्शन, रोमांस और मजा है। इस फिल्म को देखते समय पूरा ध्यान पर्दे पर रखना होगा। अगर आप कुछ मिस करेंगे, तो फिल्म समझने में दिक्कत हो सकती है।


Monday, June 6, 2011

आरक्षण ने बदल दिया है ताना-बाना-प्रकाश झा

सामाजिक मुद्दों पर राजनीतिक फिल्म बनाने के लिए विख्यात प्रकाश झा की नई फिल्म 'आरक्षण' 12 अगस्त को रिलीज होगी। उनसे बातचीत के अंश..

आरक्षण के बारे में क्या कहेंगे, खासकर फिल्म के संदर्भ में.. देश में इस मुद्दे पर बहस चलती रही है और पक्ष-विपक्ष में तर्क दिए जाते रहे हैं?

यह एक सत्य है, जिसे समाज को पूरी संवेदना के साथ अंगीकार करना होगा। 20वीं सदी के आखिरी दो दशकों में आरक्षित समाज के प्रभाव से देश के सामाजिक समीकरण और राजनीति में बदलाव आया है। इस दौर में एक तरफ देश विकसित हो रहा था और दूसरी तरफ शिक्षा का व्यवसायीकरण आरंभ हो चुका था।

शिक्षा के व्यवसायीकरण को आरक्षण से जोड़ना क्या उचित है?

नौकरी से पहले शिक्षण संस्थानों में ही आरक्षण का असर हुआ है। अब लोग वैकल्पिक शिक्षा पर इसलिए ध्यान दे रहे हैं कि उन्हें ऐसी नौकरियों के लिए कोशिश ही न करनी पड़े, जिसमें आरक्षण की मुश्किल आए। पूरे देश में मैनेजमेंट स्कूल खुल रहे हैं। आईआईएम से लेकर छोटे शहरों तक में मैनेजमेंट स्कूल चल रहे है। शिक्षा जगत से गुरु-शिष्य की परंपरा खत्म हो चुकी है। अब शिष्य क्लाइंट है और गुरु सर्विस प्रोवाइडर।

आरक्षण के प्रभाव में बदल रहे समाज को दिखाने के लिए आपने एक शैक्षणिक संस्थान ही क्यों चुना?

आरक्षण से पैदा हुए सामाजिक विद्वेष को दिखाने के लिए मुझे कुछ किरदारों की जरूरत थी। उन्हें शैक्षणिक संस्थान में दिखाना ज्यादा स्वाभाविक और प्रतीकात्मक रहा। मेरी फिल्म में प्रभाकर आनंद शिक्षा के प्रति सजग प्रिंसिपल हैं। वह एक इंस्टीट्यूट खड़ा करते हैं। उनकी सहानुभूति समाज के गरीब, निम्न और दलित छात्रों से है। वह उनकी मदद भी करते हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद उनके सामने दुविधा खड़ी होती है। दीपक कुमार (सैफ अली खान) दलित समाज के प्रतिनिधि हैं। वह सदियों के दंश के साथ जी रहे हैं। फिर मिथिलेश सिंह (मनोज बाजपेयी) हैं, जो शिक्षा के व्यवसायीकरण के समर्थक हैं। वह कोचिंग माफिया के तौर पर आते हैं। प्रतीक (सुशांत) कथित उच्च जाति का लड़का है, जो महसूस करता है कि प्रतिभाशाली होने के बावजूद उसे आरक्षण की वजह से अवसर नहीं मिल पा रहे हैं।

आपने दामुल, परिणति और मृत्युदंड जैसी फिल्में निर्देशित कीं। आलोचकों की राय है कि आपकी सोच और शैली में शिफ्ट आ चुका है?

मैं ऐसा नहीं मानता। दामुल और मृत्युदंड में आप देख चुके हैं कि समाज में मौजूद जातिगत संरचना और उसके प्रभाव को मैं चित्रित करता रहा हूं। आरक्षण का नायक भी एक दलित है। समाज में बदल रहे जातीय समीकरण को मैं हमेशा फिल्मों में किरदारों के माध्यम से रखता आया हूं। मैंने समय के साथ केवल फिल्म की प्रस्तुति बदली है।

यही तो शिकायत है कि अब आप पहले जैसी फिल्में क्यों नहीं बना रहे हैं?

मैं पूछता हूं कि कौन बना रहा है? जब तक मैं वैसी फिल्में बना सकता था, बनाता रहा। अभी तो समस्या है कि आपकी फिल्म बने कैसे? एक अंतराल के बाद मृत्युदंड उसी उद्देश्य से बनाने आया था। मैंने पहले पल्लवी जोशी को साइन किया, लेकिन खुले बाजार में निर्माण की कीमत बढ़ गई थी। रिटर्न नहीं दिख रहा था तो माधुरी दीक्षित को लाना पड़ा। आप देखें कि पैरेलल सिनेमा का आंदोलन ही खत्म हो चुका है। अभी हमें कामर्शियल सेटअप में रह कर ही काम करना है। बाजार के हिसाब से फिल्में बनानी पड़ेंगी। मैं तो फिर भी अपनी बात रख पा रहा हूं। अपनी कहानी सुना पा रहा हूं।

मृत्युदंड तक आपकी फिल्मों में सामाजिक यथार्थ के रेशे दिखाई पड़ते थे। अब वह यथार्थ भी डिजाइन किया हुआ लगता है?

मेरी कोशिश रहती है कि सामाजिक यथार्थ आए। हम उनके अंतद्र्वद्व और विसंगतियों को समझें। हो सकता है कि लार्जर दैन लाइफ दिखाने या बड़ा करने के चक्कर में कुछ और चीजें हावी हो जाती हों, मुद्दा दब जाता हो। मैं अपने उद्देश्य और सोच में अभी तक पहले जैसा हूं।

आप बिहार में शूटिंग क्यों नहीं करते?

करना चाहता हूं, लेकिन लॉजिस्टिक की समस्या है। नितीश जी भी चाहते हैं कि बिहार में फिल्मी एक्टिविटी हो। मैं भी कुछ सोच रहा हूं।

भोजपुरी फिल्में कब बनाएंगे?

जैसे ही एक अच्छी कहानी मिलेगी!

Friday, July 31, 2009

फ़िल्म समीक्षा:लव आज कल

शाश्वत प्यार का अहसास
****
-अजय ब्रह्मात्मज
इम्तियाज अली निर्देशित लव आज कल बीते कल और आज की प्रेम कहानी है। 1965 और 2009 के किरदारों के जरिए इम्तियाज अली एक बार फिर साबित करते हैं कि प्यार किया नहीं जाता, हो जाता है। प्रेम ज्ञान है, आख्यान है, व्याख्यान है। यही हिंदी फिल्मों का दर्शन है।
रोमांटिक हिंदी फिल्मों में हमेशा से पटकथा प्यार और उसके विशुद्ध अहसास पर केंद्रित रहती है। हर पीढ़ी का निर्देशक अपने नजरिए से प्यार को परिभाषित करने का प्रयास करता है। इम्तियाज अली ने 2009 के जय और मीरा के माध्यम से यह प्रेम कहानी कही है, जिसमें 1965 के वीर और हरलीन की प्रेम कहानी एक रेफरेंस की तरह है। इम्तियाज अली नई पीढ़ी के निर्देशक हैं। उनके पास सुघढ़ भाषा और संवेदना है। अपनी पिछली फिल्मों सोचा न था और जब वी मेट से दमदार दस्तक देने के बाद लव आज कल के दृश्यों और प्रसंगों में इम्तियाज के कार्य कुशलता की छाप स्पष्ट नजर आती है। हिंदी फिल्मों में हम फ्लैशबैक देखते रहे हैं। लव आज कल में फ्लैशबैक और आज की कहानी साथ-साथ चलती है, कहीं कोई कंफ्यूजन नहीं होता। न सीन डिजाल्व करने की जरूरत पड़ती है और न कहीं सीन खोलने की। इम्तियाज अली का दूसरा सफल प्रयोग ऋषि कपूर की जवानी के दृश्यों में सैफ अली खान को दिखाना है। एकबारगी यह प्रयोग चौंकाता है, लेकिन चंद मिनटों बाद सब कुछ स्वाभाविक लगने लगता है।
सैफ अली खान ने दोनों किरदारों को मैनरिज्म और उच्चारण से अलग करने की अच्छी कोशिश की है। अगर पंजाबी के उच्चारण पर उन्होंने थोड़ी और मेहनत की होती तो फिल्म निखर जाती। भाषा की जानकारी ज्यादा नहीं होने पर संवाद अदायगी और भाव अभिव्यक्ति में अंतर आ जाता है। दीपिका पादुकोण के साथ कुछ यही हुआ। उनके उच्चारण साफ है, लेकिन शब्दों के सही अर्थ नहीं समझने से असली भाव उनके चेहरे पर नहीं आ पाया है। आंखें धोखा दे जाती है। इस कारण किरदार कमजोर हो जाता है। फिर भी मीरा का किरदार उनके करिअर में उल्लेखनीय रहेगा।
इम्तियाज अली की फिल्मों में किरदारों की अंतर्यात्रा और बाह्ययात्रा होती है। वे एक जगह नहीं टिकते। कहीं से चलते हैं और कहीं पहुंचते हैं। कई बार वे पुराने ठिकानों पर लौटते हैं। लव आज कल में जय-मीरा एवं वीर-हरलीन को हम विभिन्न शहरों में आते-जाते देखते हैं। उनकी ये यात्राएं खुद की खोज के लिए होती हैं। इम्तियाज की यह खूबी है कि उनके किरदार हिंदी फिल्मों के आम दर्शकों की तरह आसपास के प्रतीत होते हैं। बातचीत और लहजे से अपने से लगते हैं।
अभिनय के लिहाज से सैफ अली खान ने काफी मेहनत की है। 21वीं सदी के युवक के गुण और कंफ्यूजन को वे बेहतरीन तरीके से व्यक्त करते हैं। वहीं दीपिका पादुकोण अपने किरदार के साथ पूरा न्याय नहीं कर सकीं हैं। किरदार में गहराई आते ही उनकी अभिनय क्षमता डगमगाने लगती है। इंटरवल के बाद के नाटकीय दृश्यों में वे कमजोर पड़ जाती हैं। ऋषि कपूर अपने निराले अंदाज में प्रभावित करते हैं। नीतू सिंह की जवानी की भूमिका निभा रही अभिनेत्री लिसेल ने अपनी स्वाभाविकता से हरलीन के किरदार को विश्वसनीय बना दिया है। पहली फिल्म होने पर भी वह कैमरे के सामने सहमी नजर नहीं आती।
फिल्म का गीत-संगीत, स्क्रिप्ट के अनुरूप है। भाव पैदा करने में दोनों अहम भूमिका निभाते हैं। फिल्म का संपादन खासतौर पर सराहनीय है। आरती बजाज ने स्क्रिप्ट और दृश्य की बारीकियों को समझते हुए उन्हें अच्छी तरह जोड़ा है। लव आज कल प्यार की तरह ही एक खूबसूरत अहसास है, जिसे देखते हुए आपको बोरियत नहीं होगी।

Tuesday, July 28, 2009

डेली रूटीन से ऊब जाता हूं: सैफ अली खान

-अजय ब्रह्मात्मज
छोटे नवाब के नाम से मशहूर सैफ अली खान अब निर्माता बन गए हैं। उनके प्रोडक्शन हाउस इलुमिनाती फिल्म्स की पहली फिल्म लव आज कल इस शुक्रवार को रिलीज हो रही है। फिल्म के निर्देशक इम्तियाज अली हैं और हीरोइन दीपिका पादुकोण हैं। लव आज कल की रिलीज के पहले खास बातचीत।
आप उन खास और दुर्लभ बेटों में से एक हैं, जिन्होंने अपनी मां के प्रोफेशन को अपनाया। ज्यादातर बेटे पिता के प्रोफेशन को अपनाते हैं?
मेरी मां भी दुर्लभ एवं खास हैं। इस देश में कितनी मां हैं, जो किसी प्रोफेशन में हैं। मैं तो कहूंगा कि मेरी मां खास और दुर्लभ हैं। एक सुपर स्टार और मां ... ऐसा रोज नहीं होता। मेरी मां निश्चित ही खास हैं। उन्होंने दोनो जिम्मेदारियां बखूबी निभाई।
मां के प्रोफेशन में आने की क्या वजह है?
बचपन में मुझे क्रिकेट का शौक था। कुछ समय खेलने के बाद मुझे लग गया था कि मैं देश का कैप्टन नहीं बन सकता। इतना टैलेंट भी नहीं था। पढ़ाई में मेरी रुचि नहीं थी। कोई भी चीज अच्छी नहीं लगती थी। फिल्मों के बारे में सोचा तो यह बहुत ही एक्साइटिंग लगा। फिल्मों में नियमित बदलाव होता रहता है। रोल बदलते हैं, लोकेशन बदलते हैं, साथ के लोग बदलते हैं ... यह बदलाव मेरी पर्सनैलिटी को बहुत जंचता है।
फिल्म निर्माण के साथ जुड़ा एडवेंचर और बदलाव ...
जी कभी रात में काम कर रहे हैं, कभी दिन में ... कभी पनवेल में तो कभी लंदन में। कभी इनके साथ तो कभी उनके साथ। यह सब अच्छा लगता है। डेली रूटीन मुझे बचपन से बहुत पकाता था।
मतलब दस से पांच की नौकरी और पांच दिनों के टेस्ट मैच जैसे रूटीन में आप की रुचि नहीं थी?
टेस्ट मैच को इसमें शामिल न करें। मैं क्रिकेट बहुत पसंद करता हूं। वह तो मेरे खून में है। नौकरी मैं नहीं कर सकता था। लोखंडवाला से रोज वर्ली जाना और आना ... नहीं यार, मेरे बस का नहीं था। मेरी रुचि नहीं थी।
कुछ मकसद रहा होगा फिल्मों में आने का?
मैं इस प्रोसेस का आनंद लेना चाहता था। बचपन से फिल्में देखता रहा हूं। मैं फिल्ममेकिंग के प्रोसेस का हिस्सा बनना चाहता था। क्लिंट इस्टवुड की फिल्में देख कर बड़ा हुआ हूं।
बचपन में कितनी हिंदी फिल्में देखते थे?
ज्यादा नहीं। मां की फिल्में देख कर बहुत दुखी हो जाता था, क्योंकि बहुत रोना-धोना होता था उनकी फिल्मों में।
आप जो सोच कर फिल्मों में आए थे, वह सब अचीव कर लिया।
नहीं, अभी नहीं किया है। थोड़ा-बहुत किया है। बाकी अब प्रोडक्शन में आने के बाद कर रहा हूं। एजेंट विनोद के साथ उसे अचीव करना चाहता हूं।
कोई भी एक्टर जब डायरेक्टर या प्रोड्यूसर बनता है तो उसके दिमाग में रहता है कि मुझे अभी तक जो मौके नहीं मिले, उन्हें हासिल करूंगा। या फिर उनकी कुछ खास करने की इच्छा रहती है। आप क्यों निर्माता बने?
निर्माता बनने की यही वजह है। क्रिएटिव कंट्रोल मेरा रहे। कैसी फिल्म बनानी है। पोस्टर कैसा होगा? और ऐसे रोल जो हमें नहीं मिल पा रहे हैं, उन्हें हम खुद बनाएंगे। जैसे एजेंट विनोद, जैसे लव आज कल ...
आप कैसे तय करते हैं कि मुझे यह रोल करना चाहिए या वह रोल करना चाहिए? अपनी बनी हुई छवि से प्रभावित होता है यह फैसला या फिर दर्शकों ने जिसमें पसंद कर लिया ...
मेरी छवि क्या है? सलाम नमस्ते और हम तुम के चॉकलेट हीरो की छवि ़ ़ ़ लेकिन मैंने ओमकारा किया और लोगों ने मुझे पसंद किया। रेस अलग फिल्म थी। दोनों ही फिल्मों में मेरे रफ रोल थे, लेकिन दर्शकों ने पसंद किया। मुझे लगता है कि मैं दोनों कर सकता हूं।
एक विकासशील देश में एक्टर होना कितनी बड़ी बात है और इस के क्या सुख हैं?
बहुत बड़ी बात है। कितने लोग एक्टर बन पाते हैं इस देश में। कितनी समस्याएं हैं। बिजली नहीं है। म्युनिसिपल ऑफिस जाओ। हम बहुत ही भाग्यशाली हैं। हम किसी लाइन में खड़े नहीं होते। दर्शक हम से ज्यादा मांग नहीं करते। आप अच्छे लगो ... तो आधी लड़ाई खत्म। अच्छे लगने के लिए जिम जाना और कसरत करना जरूरी हो जाता है।
एक्टर होने के लिए और क्या चीजें जरूरी हैं?
बहुत चीजें जरूरी हैं। लुक और शरीर तो अच्छा होना ही चाहिए। साफ दिमाग हो, जो आंखों में नजर आता है। आप साफ दिल हों। दुनिया और जिंदगी की समझदारी होनी चाहिए। मेरे हिसाब से कैरेक्टर और पर्सनैलिटी अच्छी होनी चाहिए। भारत में बच्चे सब सुनते, देखते और पढ़ते हैं कि सैफ ने ऐसे किया ... हम लोग रोल मॉडल बन जाते हैं। हमें सावधान रहना चाहिए। एक जिम्मेदारी होती है।
इस जिम्मेदारी से आप कितना बंधते या खुलते हैं?
एक्टर के तौर पर फर्क नहीं पड़ता। मैंने निगेटिव रोल भी किए हैं। हमारा ऑन स्क्रीन और ऑफ स्क्रीन इमेज होता है। हमें दोनों का ख्याल रखना चाहिए। मुझे अपने बारे में छपी-दिखाई सारी बातें पता चलती हैं। अभी मैं जिंदगी में च्यादा स्थिर हूं। पहले इतना नहीं था।
आप छोटे नवाब कहे जाते रहे हैं। उसके साथ कहीं न कहीं यह जुड़ा रहा कि देखें छोटे नवाब क्या कर लेते हैं? क्या आपको लगता है कि अपने परिवार की वजह से आप निशाने पर रहें?
परिवार की वजह से हमारा स्पेक्ट्रम बड़ा हो जाता है। इसके फायदे भी होते हैं, लेकिन परेशानियां भी होती हैं। अगर असफल रहे तो कहा जाता है कि देखो क्या किया? मां-बाप इतने काबिल और मशहूर, लेकिन बेटे को देखो। अगर सुपरस्टार बन गए तो कहा जाता है कि यह तो होना ही था। आखिर बेटा किस का है?
बीच में आप ने बुरा दौर भी देखा। किस वजह से इंडस्ट्री में बने और टिके रहे?
मेरे पास विकल्प नहीं थे। मैंने तय कर लिया था कि हिलना नहीं है। मैंने यहां आने के बाद अपने पुल जला दिए थे। लौटने का रास्ता नहीं बचा था।
पहली फिल्म के लिए इम्तियाज अली को चुनने की कोई खास वजह थी क्या?
बहुत सी बातें थी। उनके पास नया आइडिया था। मुझे वही पुरानी चीज नहीं बनानी थी। मुझे वह परफेक्ट लगे। मुझे लव स्टोरी फिल्म ही बनानी थी, लेकिन थोड़ी बोल्ड स्टोरी बनानी थी। देखें क्या होता है? फिल्म की कहानी इम्तियाज लेकर आए थे।
आपकी पहली डबल रोल फिल्म है। कितना मुश्किल या आसान रहा इसे निभाना?
यों समझें कि दो फिल्में एक साथ कर लीं। इसमें एक रोल में सरदार हूं। मुझे इस रोल में देखकर सरदार खुश होंगे। हम ने उसे बहुत आंथेटिक रखा है। इतना मुश्किल नहीं होता है डबल रोल करना। मैनरिच्म अलग रखना पड़ता है। दूसरे रोल में सरदार होने की वजह से मैनरिच्म खुद ही अलग हो गया।
क्या है लव आज कल?
यह रिलेशनशिप की कहानी है। आज के जमाने में संबंधों को निभाने में कितनी समस्याएं हैं। सातवें दशक का प्यार थोड़ा अलग था। लंबे समय के बाद मिलते थे। इंतजार रहता था। पहले शादी करते थे, फिर प्यार के बारे में सोचते थे। उस समय के प्यार को देख कर आज के लड़के-लड़की रश्क करेंगे। आज की प्रेम कहानी में करियर बहुत खास हो गया है। लड़कियों का रोल और समाज में स्थान बदल गया है। मां के जेनरेशन और हमारे जेनरेशन में फर्क आ गया है। आज ऐसा लगता है कि दो व्यक्ति एक साथ रहते हैं। दोनों की वैयक्तिकता बनी रहती है।
आप को खुद लव स्टोरी कितनी अच्छी लगती है?
मैं एक्शन, एक्शन कॉमेडी और थ्रिलर फिल्में च्यादा पसंद करता हूं। मुझे लव स्टोरी च्यादा अच्छी नहीं लगती। लव स्टोरी में काम करता हूं। मैं बनाना भी चाहता हूं, क्योंकि देश देखना चाहता है। मुझे व्यक्तिगत रूप से ओमकारा और रेस जैसी फिल्में पसंद हैं।
फिर भी हिंदी फिल्मों की कौन सी लव स्टोरी आप को अच्छी लगी है?
दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, कयामत से कयामत तक, मैंने प्यार किया, दिल, ... आमिर खान की काफी फिल्में ... मां के समय की बात करूं तो आराधना और अमर प्रेम ...
प्यार में सबसे जरूरी क्या है?
सम्मान ... और भरोसा।
सचमुच प्यार बदल गया है?
प्यार का एहसास नहीं बदला है। प्यार दिखाने का तरीका बदल गया है। दबाव बदल गए हैं। पहले टीवी का एक ही चैनल था। अभी इतने चैनल आ गए हैं। आप एक चैनल से ऊबते ही दूसरे चैनल पर चले जाते हैं। प्यार भी ऐसा ही हो गया है। थोड़ी मुश्किल आती है तो भूल जाते हैं। दिलासा दिलाने के लिए काम का बहाना है।
क्या यह पश्चिमी प्रभाव की वजह से हो रहा है?
नहीं, यह अंदरूनी मामला है। हम कहते रहते हैं कि गोरे लोग बड़े खराब होते हैं और हम अच्छे हैं। वास्तव में हम भी उतने ही खराब हैं। हम भारतीय क्या हैं? मौका मिले तो अम‌र्त्य सेन की किताब पढें़। उन्होंने बहुत अच्छे तरीके से विश्लेषित किया है। हम इटली के माफिया की तरह हैं। हम मुंह पर कुछ और, पीठ पीछे कुछ और बोलते हैं। फिल्म इंडस्ट्री में भी सामने बोलेंगे कि क्या फिल्म बनाई है और पीठ पीछे बोलेंगे कि क्या बकवास बनाई है? अगर बेटी किसी लड़के से मिलवा कर कहे कि इस से शादी करनी है तो उस लड़के से कहेंगे कि वाह तुम बहुत अच्छे हो। उसके जाते ही बेटी से कहेंगे कि खबरदार उससे दोबारा मिली। बहुत घटिया इंसान लगता है।
आप आम इंसान की तरह जी पाते हैं क्या? आप तो सुपर स्टार सैफ अली खान हैं?
मैं बहुत ही नार्मल हूं। चाट खना, पानी पुरी खाना ... कहीं भी जाओ। जिम पैदल जाता हूं। शुरू में लोग चौंकते हैं, फिर उन्हें आदत पड़ जाती है। मुंबई में दिक्कत नहीं है। दूसरे शहरों में कभी-कभी लोगों की वजह से दिक्कत होती है। लेकिन आप पैसे कमा रहे हो, तरक्की कर रहे हो तो लंदन चले जाओ। आप चाहते हो कि कोई न पहचाने तो वैसे शहर में जाकर घूमो, जहां कोई नहीं जानता।
क्या ऐसा लगता है कि आप समाज को जितना देते हैं, उतना ही समाज भी आपको देता है?ज्यादा ही देता है। हम तो आज के राजा-महाराजा हैं। हमें नेताओं से ज्यादा इज्जत मिलती है। एक फोन करने पर सब कुछ मिल जाता है।
अपनी तीन फिल्में मुझे गिफ्ट करनी हो तो कौन-कौन सी देंगे?
ओमकारा, हम तुम और परिणीता।
फिल्म इंडस्ट्री के किन लोगों से आप मुझे मिलवाना चाहेंगे। वैसे लोग, जिनकी आप इज्जत करते हों और जो सचमुच आप को इंडस्ट्री के प्रतिनिधि लगते हैं?
डायरेक्टर में करण जौहर ... करण ने दुनिया को देखा और समझा है। एक वजह है कि वे ऐसी फिल्में बनाते हैं। वे लंदन देख चुके हैं। पेरिस उनका देखा हुआ है। फ्रेंच बोलते हैं। अमेरिका में रह चुके हैं। वे भारतीय दर्शकों को समझते हैं। उन्हें मालूम है कि यह फिल्म बनाऊंगा तो सबसे ज्यादा पैसा मिलेगा। इम्तियाज अली ... इम्तियाज आर्टिस्ट मिजाज के हैं। घूमंतू किस्म के हैं। काफी कूल और तेज है। श्री राम राघवन ... इतने अच्छे इंसान हैं और सिनेमा की बहुत अच्छी समझ रखते हैं। अनुराग बसु और विशाल भारद्वाज भी हैं। शाहरुख खान से मिलवाऊंगा। उनका दिमाग बहुत तेज चलता है और वे बहुत इंटरेस्टिंग बात करते हैं फिल्मों और दुनिया के बारे में। शायद आमिर से मिलवाऊंगा। लड़कियों में करीना से ... और भी बताऊं।
फिल्म इंडस्ट्री की सबसे अच्छी बात क्या लगती है?
डेमोक्रेसी ... आप यहां बुरी फिल्म नहीं चला सकते। यहां जो लोगों को पसंद है वही चलेगा। बाकी फील्ड में आप कुछ भी थोप सकते हैं, यहां नहीं। किसी का नियंत्रण नहीं है इंडस्ट्री पर। थिएटर में दर्शक आएं और तीन बार देखें तो फिल्म हिट होती है।
इस फिल्म की रिलीज के पहले आप की कैसी फीलिंग है?
यह फिल्म मेरे लिए बहुत जरूरी है। तनाव तो है। 31 जुलाई तक मैं बीमार न पड़ जाऊं? यह बच्चे के जन्म की तरह है। एक तो सुरक्षित डिलिवरी हो और बच्चा सही-सलामत हो। कुछ चीजें तो जन्म के बाद तय होती है?
लव आज कल को क्यों देखें?
इसमें नयापन है। इम्तियाज से संवाद ऐसे हैं, जो दो असली लोग बात कर रहे हों। एक लव स्टोरी है। आज के दबाव और कमिटमेंट के बारे में ... एक संदेश भी देती है फिल्म। हमेशा दिमाग की न सुनें, दिल की भी सुनें। इसमें कोई विलेन नहीं है। दिमाग ही विलेन है।