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Friday, November 11, 2011

फिल्‍म समीक्षा : रॉकस्‍टार

रॉकस्टार : हीर का मॉर्डन प्रेमी जार्डन-अजय ब्रह्मात्‍मज

युवा फिल्मकारों में इम्तियाज अली की फिल्में मुख्य रूप से प्रेम कहानियां होती हैं। यह उनकी चौथी फिल्म है। शिल्प के स्तर पर थोड़ी उलझी हुई, लेकिन सोच के स्तर पर पहले की तरह ही स्पष्ट... मिलना, बिछुड़ना और फिर मिलना। आखिरी मिलन कई बार सुखद तो कभी दुखद भी होता है। इस बार इम्तियाज अली प्रसंगों को तार्किक तरीके से जोड़ते नहीं चलते हैं। कई प्रसंगअव्यक्त और अव्याख्यायित रह जाते हैं और रॉकस्टार अतृप्त प्रेम कहानी बन जाती है। एहसास जागता है कि कुछ और भी जोड़ा जा सकता था... कुछ और भी कहा जा सकता था।

रॉकस्टार की नायिका हीर है और नायक जनार्दन जाखड़... जो बाद में हीर के दिए नाम जॉर्डन को अपना लेता है। वह मशहूर रॉकस्टार बन जाता है, लेकिन इस प्रक्रिया में अंदर से छीजता जाता है। वह हीर से उत्कट प्रेम करता है, लेकिन उसके साथ जी नहीं सकता... रह नहीं सकता। कॉलेज के कैंटीन के मालिक खटाना ने उसे मजाक-मजाक में कलाकार होने की तकलीफ की जानकारी दी थी। यही तकलीफ अब उसकी जिंदगी बन गई है। वह सब कुछ हासिल कर लेने के बाद भी अंदर से खाली हो जाता है, क्योंकि उसकी हीर तो किसी और की हो चुकी है... छिन गई है उसकी हीर। क्या इम्तियाज अली ने वारिस शाह की हीर रांझा से प्रेरित होकर इस फिल्म की कहानी लिखी है? यहां भी हीर अमीर परिवार की खूबसूरत लड़की है और रांझा की तरह जॉर्डन संगीतज्ञ है। रांझा की जिंदगी में बाबा गोरखनाथ आए थे और अलख जगा गए थे। इस फिल्म में जॉर्डन उस्ताद जमील खान के संपर्क में आता है और निजामुद्दीन औलिया की दरगाह की कव्वाली के दौरान उसके अंदर के तार बजते हैं।

ओरिजनल रांझा की तरह पूरी जिंदगी जॉर्डन भी भटकता रहता है और हीर से मिलकर भी नहीं मिल पाता।

इम्तियाज अली ने हीर रांझा की कहानी को आधुनिक परिवेश में हीर-जॉर्डन की कहानी बना दिया है। रॉकस्टार जनार्दन के जॉर्डन बनने की भी कहानी है। एक संगीतज्ञ और कलाकार की जेनेसिस के रूप में इसे देखें तो पाएंगे कि साधारण व्यक्ति की जिंदगी की साधारण घटनाएं ही कई बार व्यक्ति के अंदर असाधारण विस्फोट करती हैं और उसे विशेष बना देती है। रूपांतरण की यह घटना आकस्मिक नहीं होती। कलाकार इससे अनजान रहता है। जॉर्डन के जीवन का द्वंद्व, विरोधाभास और सब कुछ हासिल कर उन्हें गंवा देने की सहज प्रवृत्ति अविश्वसनीय होने के बावजूद स्वाभाविक है।

रॉकस्टार एक विलक्षण प्रेम कहानी भी है। हीर और जॉर्डन के बीच प्रेम पनपता है तो वह नैतिकता और अनैतिकता ही परवाह नहीं करता। दोनों अपने प्रेम की अनैतिकता को जानते हुए भी उसमें डूबते जाते हैं, क्योंकि वे विवश हैं। उनका रिश्ता सही और गलत के परे है। साथ आते ही उनके बीच जादुई रिश्ता बनता है, जो मेडिकल साइंस को भी झुठला देता है। तर्क के तराजू पर तौलने चलें तो रॉकस्टार में कई कमियां नजर आएंगी। इस फिल्म का आनंद इसके उद्दाम भावनात्मक संवेग में है, जो किनारों और नियमों को तोड़ता बहता है।।

यह फिल्म सिर्फ रणबीर कपूर के लिए भी देखी जा सकती है। रणबीर अपनी पीढ़ी के समर्थ और सक्षम अभिनेता हैं। उन्होंने जनार्दन की सादगी और जॉर्डन की तकलीफ को अचछी तरह चित्रित किया है। वे एक कलाकार के दर्द, चुभन खालीपन, निराशा, जोश, खुशी सभी भावों को दृश्य के मुताबिक जीते हैं। रॉकस्टार में उनके अभिनय के रेंज की जानकारी मिलती है। फिल्म का कमजोर पक्ष नरगिस फाखरी का चुनाव है। वह सुंदर हैं, लेकिन भावपूर्ण नहीं हैं। फिल्म के महत्वपूर्ण दृश्यों को वह कमजोर कर देती हैं। सहयोगी कलाकारों में कुमुद मिश्रा और पियूष मिश्रा उल्लेखनीय हैं। दोनों सहज, स्वाभाविक और चरित्र के अनुरूप हैं।

इस फिल्म के गीत-संगीत की चर्चा पहले से है। इरशाद कामिल ने जॉर्डन की तकलीफ को उचित शब्द दिए हैं। उन्हें ए.आर. रहमान ने भाव के अनुरूप संगीत से सजाया है।

रेटिंग- *** 1/2 साढ़े तीन स्टार

Friday, December 10, 2010

इम्तियाज अली से अजय ब्रह्मात्‍मज की बातचीत

डिलीवरी ब्वॉय से बना डायरेक्टर: इम्तियाज अली-अजय ब्रह्मात्‍मज

सिनेमा की आरंभिक छवियों के बारे में कुछ बताएं?

जमशेदपुर में पला-बढा हूं। वहां मेरे फूफा जान के तीन सिनेमा घर हैं। उनका नाम एच. एम. शफीक है। करीम, जमशेदपुर और स्टार टाकीज थे उनके। करीम और जमशेदपुर टाकीज के पास ही उनका घर भी था। सांची के पास है यह। वहां के थिएटरों में शोले तीन साल चली थी। टिकट निकालने के चक्कर में हाथ तक टूट जाया करते थे। नई पिक्चर लगती थी तो हम छत पर चढ कर नजारा देखते थे। हॉल के दरवाजों का खुलना, वहां की सीलन, दीवारों की गंध...सब-कुछ रग-रग में बसा हुआ है।

घर में फिल्में देखने की अनुमति थी?

नहीं। यह शौक अच्छा नहीं समझा जाता था। पिक्चर छुपकर देखते थे। गेटकीपर हमें पहचानते थे। हाफ पैंट पहने कभी भी थिएटर में चले जाते। कई बार सीट नहीं मिलती तो जमीन पर बैठ कर फिल्म देखते थे। सीन बेकार लगता तो दूसरे हॉल में चले जाते। लार्जर दैन लाइफ छवियां और लोगों की दीवानगी..मिथुन चक्रवर्ती की फिल्म देखने आ रहे हैं तो खुद को मिथुन ही समझते। स्क्रीन के बीच में पंखे का चलना दिख रहा है। सीटें तोडी जा रही हैं। एक-दो बार पर्दे फाड दिए गए। नॉर्थ इंडिया के छोटे से कस्बे में पिक्चर का क्रेज देखते ही बनता था। मैं फूफी के घर पर एक साल रहा हूं। हम पटना से ट्रांसफर होकर जमशेदपुर गए थे। उन दिनों एयर कूल्ड हॉल होते थे। गर्मी में दरवाजे खोल दिए जाते। हमारी खिडकी से पर्दे का छोटा सा हिस्सा दिखता था। एक खास एंगल से पिक्चर दिखती थी। सीन देखकर कहानी का अंदाज लगा लेते थे।

ऐसी कोई फिल्म, जो पूरी तरह याद हो?

फिल्में टुकडों में ही ज्यादा देखीं। धर्मेद्र की लोफर याद है। शोले पूरी याद है।

सिनेमा देखने के लिए कोई तैयारी नहीं होती थी? घर के सिनेमा हॉल थे, जब मर्जी हुई देख ली?

छिपकर फिल्में देखना तो एडवेंचर था। पकडे जाने पर मार भी पडती थी। गेटकीपर जाने देता था, लेकिन चिढ जाता तो शिकायत लगाता। घर वाले जाते तो पूरी तैयारी होती थी। फिल्म देखना और फूफी के घर जाना साथ-साथ होता था। पटना में टिकट खरीदकर फिल्म देखते थे। मम्मी-डैडी को फिल्में देखना पसंद है। खासकर मम्मी को, लेकिन तब फिल्म देखने की बात अच्छी नहींसमझी जाती थी। मैं फिल्मों में हूं, लेकिन फिल्मी पत्रिकाएं घर पर नहीं आतीं। मैं खुद इसकी सहमति नहीं दूंगा।

जमशेदपुर से कब तक रिश्ता रहा?

पैदा जमशेदपुर में हुआ था। इसके बाद हम पटना चले गए थे। आठवीं के बाद फिर से जमशेदपुर आ गया। बारहवीं के बाद पढाई के लिए दिल्ली चला गया। मम्मी-डैडी से मिलने जमशेदपुर आता-जाता था।

दिल्ली जाने के पहले फिल्मों में आने या मुंबई आने का इरादा जाहिर किया?

कभी-कभी दिमाग में ये बातें आती थीं। लेकिन जमशेदपुर में रहकर यह सपना मुश्किल लगता था। दिल्ली जाने से पहले पक्का नहीं सोचा था कि मुंबई जाऊंगा। जेहन में बडी सी बिल्डिंग हुआ करती, जिसे फिल्म इंडस्ट्री समझता था। सोचता था कि वहां जाऊंगा तो फलां से मिलूंगा, ये कहूंगा या वो कहूंगा।

बिहार में माहौल नहीं था या करियर के प्रति निश्चित सोच थी कि दिल्ली गए?

जमशेदपुर में स्कूल तो अच्छे हैं, लेकिन कॉलेज अच्छे नहीं हैं। स्कूल के दिनों में ही थिएटर से लगाव हो गया था। प्रिंसिपल ने एक बार कहा कि अलादीन व हिज मैजिकल लैंप प्ले करना है। ऑडिशन दे दो। धीरे-धीरे सारे सांस्कृतिक कार्यक्रमों की जिम्मेदारी मुझे मिलने लगी। टीम बनाता था, एक्टिंग भी करता था। डायरेक्ट करने लगा तो रोटरी क्लब व अन्य जगहों से ऑफर मिलने लगे। ये प्ले खुद लिखने और डायरेक्ट करने होते थे।

घर में किसी का रिश्ता फिल्मों से था?

मेरे पिता सिंचाई विभाग में इंजीनियर रहे हैं। अभी भी वे सिंचाई विभाग में सलाहकार हैं। पाकिस्तान में खालिद मामू हैं, जो दरअसल मेरी मां के मामू हैं। वे पाकिस्तानी रंगमंच की बडी हस्ती हैं। एक वही फिल्मों से जुडे हैं।

इंजीनियर पिता चाहते होंगे कि आप भी उसी फील्ड में जाएं। कितने भाई-बहन हैं?

मेरे दो छोटे भाई हैं। पढाई-खेलकूद में मैं अच्छा रहा। यदि मेरे स्कूल में तब बास्केट बॉल खेलने की सुविधा होती तो मैं खिलाडी बनता। रिजल्ट ठीक रहता था। मम्मी-डैडी ने रोका नहीं, सिर्फ सावधान किया। वे मुझे आई.ए.एस. अधिकारी के रूप में देखते थे। साइंस स्टूडेंट था। जब उन्हें लगा कि मैं दूर निकल गया हूं तो डांटा-समझाया। लेकिन रोका बिलकुल नहीं। कुल मिलाकर उन्होंने मुझे सपोर्ट किया।

स्कूल के दिनों में कोई ऐसा व्यक्ति था, जिसने आप पर गहरा प्रभाव छोडा हो?

दो-तीन टीचर थीं। एक हैं मिसेज अशोक शांता। उनका सही नाम शांता अशोक कुमार है। नौवीं कक्षा में मैं फेल हो गया था। शर्मिदगी की बात थी। उन्होंने मुझे समझाया। कहती थीं, कोई बात नहीं, 75 प्रतिशत आएं या 90 प्रतिशत, जिंदगी यहीं खत्म नहीं होती। इंग्लिश टीचर दीपा सेनगुप्ता थीं। फेल भी हुआ तो अंग्रेजी में अच्छे मा‌र्क्स थे। मेरे निबंध क्लास में पढे जाते थे। मैं अंग्रेजी कविताएं लिखता तो मैम को पढने के लिए देता था। वह मुझे गाइड करती थीं। अब तक भी इंटरनेट के जरिये मैं इन दोनों टीचर्स के संपर्क में हूं।

कोई प्रेम-प्रसंग रहा? छोटे शहरों में प्यार तो जागता है, लेकिन खिल नहीं पाता?

अलादीन और जादुई चिराग की हीरोइन थीं प्रीति, वही आज मेरी पत्‍‌नी हैं। आठवीं कक्षा से ही प्रेम था। साथ रहते बीस साल हो गए अब।

दिल्ली जाने का मकसद क्या था?

पढाई के लिए गया था। फिजिक्स, केमिस्ट्री में मैंने पढाई की थी, लेकिन इंजीनियरिंग में नहीं जाना था। मेरे सभी दोस्त इंजीनियर हैं। मेरा चयन भी हुआ, लेकिन मुझे नहीं करना था। दिल्ली में एक्सपोजर था, सिर्फ इसलिए वहां गया। हिंदू कॉलेज में एडमिशन लिया और थिएटर करने लगा।

थिएटर का सिलसिला जमशेदपुर में शुरू हो गया था। वही सिलसिला जारी रहा या नए सिरे से कुछ शुरू हुआ?

जमशेदपुर छोडने तक मैं थिएटर करने लगा था। मेरे शो के टिकट बिकने लगे थे। हिंदू कॉलेज पहुंचने पर पता चला कि ड्रमैटिक सोसायटी बंद है पिछले आठ-नौ सालों से। मैंने उसे फिर से शुरू किया। उसका नाम इब्तदा रखा। साल में दो-तीन शो करते थे। वहां मैंने विजय तेंदुलकर और महेश ऐलकुंचवर के प्ले किए। मराठी नाटककार ज्यादा पॉपुलर थे। मोहन राकेश के प्ले को हर कोई मंचित करता था। हमने वसंत देव के अनुवादों का मंचन किया। पहले साल मैंने होली और जाति न पूछो साधु की किए। उसके बाद के दो सालों में ओरिजनल प्ले भी लिखे और किए। फिर एक्ट वन से जुडा। उनके साथ दो-तीन प्ले किए। वहां एक्ट करता था और कॉलेज में डायरेक्ट करता था।

छात्र राजनीति के संपर्क में नहीं आए आप?

नहीं, मुझे थिएटर में ही मजा आता था। दिल्ली में छात्र राजनीति स्कूल की तरह नहीं थी। वह होल-टाइमर राजनीति थी। 1992-93 की बात है। छात्र-नेताओं के अभियानों में चला जाता था, लेकिन रुचि थिएटर में थी। हिंदू कॉलेज के प्रिंसिपल सी.पी. वर्मा थे। उन्होंने साफ कहा कि पास होना जरूरी है और उपस्थिति पूरी हो। उपस्थिति रजिस्टर पर साइन तो उन्होंने कर दिए। फिर कहा कि दो प्रोडक्शन करने हैं कॉलेज के लिए। मुझे और क्या चाहिए था। अंग्रेजी साहित्य मेरा विषय था और मैं टॉपर था तब। अपने कॉलेज के अलावा आई.टी. कॉलेज, मिरांडा में जाकर भी प्ले करता था। मिरांडा जाते हुए तो कुछ लडके यूं ही साथ चलते थे कि लडकियों को देखने को मिलेगा।

सिनेमा में जाने की बात थी या नहीं?

नहीं। थिएटर, थिएटर, थिएटर...और कुछ याद नहीं था। एक्ट वन में एन. के. थे। फिल्मों का उनका लंबा अनुभव था। मैं जूनियर था तो उनसे बात नहीं हो पाती थी। मैंने सिर्फ सुना था कि फलां फिल्म उन्होंने असिस्ट की है।

मुंबई का रुख कैसे किया?

ग्रेजुएशन के बाद सोचा कि जर्नलिस्ट बनूं। आई.आई.एम.सी. या जामिया के बारे में पता था। जामिया में एडमिशन नहीं हो सका। मेरे शफीक अंकल ने अजीब बात कही, बेटे, जब कहीं दंगा-फसाद होगा तो सब शहर से बचने के लिए भाग रहे होंगे और तुम वहां कवरेज के लिए जाओगे। जर्नलिस्ट नहीं बनना था-सो नहीं बना। एक तरह से अच्छा ही हुआ। मुंबई जाना था। घर वालों को नहीं कह सकता था कि फिल्म के लिए जाना है।

लेकिन क्यों?

पर्सनल वजह यह थी कि प्रीति (मेरी पत्‍‌नी) मुंबई में थीं। फिर हुआ कुछ यूं कि मैं मुंबई आया तो उन्हें जमशेदपुर बुला लिया गया। यहां आया तो सोचा कि एडवर्टाइजिंग में स्कोप है। साथ में मार्केटिंग करूंगा। इसलिए जेवियर्स में एडमिशन ले लिया। वहां एक प्ले किया। कोर्स पूरा किया तो नौकरी नहीं मिली। मेरे कोर्स वाले कहते थे कि मैं सबसे तेज था और सबसे ज्यादा जरूरतमंद भी। शादी करनी थी और उसके लिए पैसे कमाने जरूरी थे। 20-21 की उम्र थी। एक महीना परसेप्ट कम्युनिकेशंस के बाहर खडा रहा। मुद्रा सहित कई जगहों पर भटका। साल भर लगभग बेरोजगार था। सोचता था कि मुझे ही क्यों नौकरी नहीं मिल रही है, जबकि सभी को पता है कि मैं बेहतर लेखक हूं। अब सोचता हूं तो लगता है कि दरअसल मुझे कुछ और करना था। झक मारकर एक नौकरी की, क्योंकि वही मिली।

क्या नौकरी थी?

जी टीवी में प्रोडक्शन असिस्टेंट की। वर्ली से टेप लेकर बांद्रा स्टूडियो जाना होता था। वहां एडिट हो जाता था उसका लॉग शीट बना कर इंचार्ज को देना होता था। हजार-पंद्रह सौ की नौकरी थी। एक तरह से डिलीवरी ब्वाय था, एडिटिंग देखता था। एडिटर से बात होने लगी तो दिमाग उधर चलने लगा। डायलॉग लिखने के बाद यह सब करने लगा। टीवी के लिए वॉयस ओवर देना शुरू किया। प्रोमो का एक डिपार्टमेंट बन गया। मैं और मेरा दोस्त शंकर उसके हेड बन गए। मेरा कभी कोई बॉस नहीं रहा। पहले डिलीवरी ब्वॉय था। फिर यह डिपार्टमेंट बना। जो हेड आने वाला था, वह नहीं आया तो हम इंचार्ज बन गए। तीन महीने गुजरे। फिर क्रेस्ट कम्युनिकेशंस से जुडा।

यही टर्निग पाइंट बना शायद?

हां। एक दिन अनुराग कश्यप आया। उसने कहा, क्रेस्ट में छह हजार की नौकरी है। मुझे मिली थी, लेकिन मैं स्क्रिप्ट लिख रहा हूं। मैंने तुम्हारे लिए बात की है। इंटरव्यू में अनुराग भी साथ में था। छह हजार मिलने लगे तो लगा कि शादी कर सकता हूं। अनुराग को भी पता थी मेरी सिचुएशन। सब एक ही नाव पर सवार थे। पहली सैलरी सात हजार मिली, क्योंकि वे मेरे काम से खुश थे, फिर दस हजार हो गई। वहां सोलह घंटे लिखने की आदत हो गई। तब श्याम खन्ना विदेशी एड लेते थे। मैं उनकी स्क्रिप्ट लिखता था। टीवी डिपार्टमेंट बना। पुरुषक्षेत्र बना तो मैंने ही डायरेक्ट किया। उसके पहले सिर्फ लिखता था। एक कहानी लिखी थी, जिसे श्याम बेनेगल ने डायरेक्ट किया। मेरे लिए बडी बात थी। ये सब सीरियल प्रपोजल थे। जो क्रेस्ट बना रही थी। मैं टीवी का क्रिएटिव डायरेक्टर था। श्याम बेनेगल के लिए रॉन्ग नंबर लिखी थी। एक विधवा व आठ साल के बच्चे की कहानी थी यह, जिनके फोन पर रॉन्ग नंबर आता था। फिर कैसे उस बच्चे की रॉन्ग नंबर वाले आदमी से दोस्ती होती है। इसी की नाटकीय कहानी थी यह। अब लगता है कि वह नाटक भी हो सकता था। डेढ-दो साल हुए। शादी हो गई। पुरुषक्षेत्र डायरेक्टर के तौर पर मेरा पहला काम था। हालांकि उसमें डायरेक्शन जैसी बात नहीं थी। इससेपहले किसी सीरियल या फिल्म के सेट तक पर नहीं गया था। सीधा डायरेक्टर बन गया।

तब तक सिनेमा में रुचि जग चुकी थी? अनुराग कश्यप तो स्ट्रगल कर रहे थे?

हां, अनुराग व अन्य साथी फिल्मों के स्ट्रगलर थे। मैं जिंदगी का स्ट्रगलर था। अनुराग को मैं दिल्ली से जानता था। वह यहां मेरे होस्टल में भी रहा था। पुरुषक्षेत्र खत्म हुआ तो अनुपम खेर ने बुलाया। उनके दोस्त रवि राय इम्तहान बनाते थे। उनका कोई झगडा हो गया था। अनुपम किरण की वजह से मिले। किरण मुझे जानती थीं। वह कहती थीं कि हम साथ मिलकर काम करें। हम सोच ही रहे थे कि रवि राय छोडकर चले गए। फिर समझ नहीं आया कि क्या करें। मैं असमंजस में रहा, लेकिन मैंने कर लिया। इस तरह मैं डायरेक्टर हो गया और सीरियल नंबर वन हो गया। पुरुषक्षेत्र में मुझे अवार्ड मिल गया था, तो लोगों को लगता था कि अवार्ड विनिंग डायरेक्टर है। उन दिनों अवार्ड मूंगफली की तरह नहीं बंटते थे। लिखता मैं खुद था। थिएटर के अनुभव से एक्टर को समझ लेता था। कैमरा और टेक्नीक मैं उनसे ही सीखता था। पता चलता था कि जो ट्रॉली लगा रहा है, वह भी मुझसे ज्यादा जानता है। उन लोगों के साथ रहकर ही काम सीखा। ट्रॉली पर रखा कैमरा, क्रेन पर रखा, क्रेन को ट्रॉली पर डाला। अशोक बहल कैमरामैन ने मुझसे कहा, तू टेक्नीकली बडा स्ट्रॉन्ग डायरेक्टर है। उस दिन मैंने उनके साथ पार्टी की।

इम्तिहान के बाद...

कुछ और सीरियल किए। एक प्रोडयूस भी किया। तब तक फिल्म का कीडा लग चुका था। लगा कि फिल्म करनी चाहिए। कई लोगों के साथ काम करने लगा। बस इसी तरह यह सिलसिला चल निकला।


Friday, July 31, 2009

फ़िल्म समीक्षा:लव आज कल

शाश्वत प्यार का अहसास
****
-अजय ब्रह्मात्मज
इम्तियाज अली निर्देशित लव आज कल बीते कल और आज की प्रेम कहानी है। 1965 और 2009 के किरदारों के जरिए इम्तियाज अली एक बार फिर साबित करते हैं कि प्यार किया नहीं जाता, हो जाता है। प्रेम ज्ञान है, आख्यान है, व्याख्यान है। यही हिंदी फिल्मों का दर्शन है।
रोमांटिक हिंदी फिल्मों में हमेशा से पटकथा प्यार और उसके विशुद्ध अहसास पर केंद्रित रहती है। हर पीढ़ी का निर्देशक अपने नजरिए से प्यार को परिभाषित करने का प्रयास करता है। इम्तियाज अली ने 2009 के जय और मीरा के माध्यम से यह प्रेम कहानी कही है, जिसमें 1965 के वीर और हरलीन की प्रेम कहानी एक रेफरेंस की तरह है। इम्तियाज अली नई पीढ़ी के निर्देशक हैं। उनके पास सुघढ़ भाषा और संवेदना है। अपनी पिछली फिल्मों सोचा न था और जब वी मेट से दमदार दस्तक देने के बाद लव आज कल के दृश्यों और प्रसंगों में इम्तियाज के कार्य कुशलता की छाप स्पष्ट नजर आती है। हिंदी फिल्मों में हम फ्लैशबैक देखते रहे हैं। लव आज कल में फ्लैशबैक और आज की कहानी साथ-साथ चलती है, कहीं कोई कंफ्यूजन नहीं होता। न सीन डिजाल्व करने की जरूरत पड़ती है और न कहीं सीन खोलने की। इम्तियाज अली का दूसरा सफल प्रयोग ऋषि कपूर की जवानी के दृश्यों में सैफ अली खान को दिखाना है। एकबारगी यह प्रयोग चौंकाता है, लेकिन चंद मिनटों बाद सब कुछ स्वाभाविक लगने लगता है।
सैफ अली खान ने दोनों किरदारों को मैनरिज्म और उच्चारण से अलग करने की अच्छी कोशिश की है। अगर पंजाबी के उच्चारण पर उन्होंने थोड़ी और मेहनत की होती तो फिल्म निखर जाती। भाषा की जानकारी ज्यादा नहीं होने पर संवाद अदायगी और भाव अभिव्यक्ति में अंतर आ जाता है। दीपिका पादुकोण के साथ कुछ यही हुआ। उनके उच्चारण साफ है, लेकिन शब्दों के सही अर्थ नहीं समझने से असली भाव उनके चेहरे पर नहीं आ पाया है। आंखें धोखा दे जाती है। इस कारण किरदार कमजोर हो जाता है। फिर भी मीरा का किरदार उनके करिअर में उल्लेखनीय रहेगा।
इम्तियाज अली की फिल्मों में किरदारों की अंतर्यात्रा और बाह्ययात्रा होती है। वे एक जगह नहीं टिकते। कहीं से चलते हैं और कहीं पहुंचते हैं। कई बार वे पुराने ठिकानों पर लौटते हैं। लव आज कल में जय-मीरा एवं वीर-हरलीन को हम विभिन्न शहरों में आते-जाते देखते हैं। उनकी ये यात्राएं खुद की खोज के लिए होती हैं। इम्तियाज की यह खूबी है कि उनके किरदार हिंदी फिल्मों के आम दर्शकों की तरह आसपास के प्रतीत होते हैं। बातचीत और लहजे से अपने से लगते हैं।
अभिनय के लिहाज से सैफ अली खान ने काफी मेहनत की है। 21वीं सदी के युवक के गुण और कंफ्यूजन को वे बेहतरीन तरीके से व्यक्त करते हैं। वहीं दीपिका पादुकोण अपने किरदार के साथ पूरा न्याय नहीं कर सकीं हैं। किरदार में गहराई आते ही उनकी अभिनय क्षमता डगमगाने लगती है। इंटरवल के बाद के नाटकीय दृश्यों में वे कमजोर पड़ जाती हैं। ऋषि कपूर अपने निराले अंदाज में प्रभावित करते हैं। नीतू सिंह की जवानी की भूमिका निभा रही अभिनेत्री लिसेल ने अपनी स्वाभाविकता से हरलीन के किरदार को विश्वसनीय बना दिया है। पहली फिल्म होने पर भी वह कैमरे के सामने सहमी नजर नहीं आती।
फिल्म का गीत-संगीत, स्क्रिप्ट के अनुरूप है। भाव पैदा करने में दोनों अहम भूमिका निभाते हैं। फिल्म का संपादन खासतौर पर सराहनीय है। आरती बजाज ने स्क्रिप्ट और दृश्य की बारीकियों को समझते हुए उन्हें अच्छी तरह जोड़ा है। लव आज कल प्यार की तरह ही एक खूबसूरत अहसास है, जिसे देखते हुए आपको बोरियत नहीं होगी।

Tuesday, July 28, 2009

डेली रूटीन से ऊब जाता हूं: सैफ अली खान

-अजय ब्रह्मात्मज
छोटे नवाब के नाम से मशहूर सैफ अली खान अब निर्माता बन गए हैं। उनके प्रोडक्शन हाउस इलुमिनाती फिल्म्स की पहली फिल्म लव आज कल इस शुक्रवार को रिलीज हो रही है। फिल्म के निर्देशक इम्तियाज अली हैं और हीरोइन दीपिका पादुकोण हैं। लव आज कल की रिलीज के पहले खास बातचीत।
आप उन खास और दुर्लभ बेटों में से एक हैं, जिन्होंने अपनी मां के प्रोफेशन को अपनाया। ज्यादातर बेटे पिता के प्रोफेशन को अपनाते हैं?
मेरी मां भी दुर्लभ एवं खास हैं। इस देश में कितनी मां हैं, जो किसी प्रोफेशन में हैं। मैं तो कहूंगा कि मेरी मां खास और दुर्लभ हैं। एक सुपर स्टार और मां ... ऐसा रोज नहीं होता। मेरी मां निश्चित ही खास हैं। उन्होंने दोनो जिम्मेदारियां बखूबी निभाई।
मां के प्रोफेशन में आने की क्या वजह है?
बचपन में मुझे क्रिकेट का शौक था। कुछ समय खेलने के बाद मुझे लग गया था कि मैं देश का कैप्टन नहीं बन सकता। इतना टैलेंट भी नहीं था। पढ़ाई में मेरी रुचि नहीं थी। कोई भी चीज अच्छी नहीं लगती थी। फिल्मों के बारे में सोचा तो यह बहुत ही एक्साइटिंग लगा। फिल्मों में नियमित बदलाव होता रहता है। रोल बदलते हैं, लोकेशन बदलते हैं, साथ के लोग बदलते हैं ... यह बदलाव मेरी पर्सनैलिटी को बहुत जंचता है।
फिल्म निर्माण के साथ जुड़ा एडवेंचर और बदलाव ...
जी कभी रात में काम कर रहे हैं, कभी दिन में ... कभी पनवेल में तो कभी लंदन में। कभी इनके साथ तो कभी उनके साथ। यह सब अच्छा लगता है। डेली रूटीन मुझे बचपन से बहुत पकाता था।
मतलब दस से पांच की नौकरी और पांच दिनों के टेस्ट मैच जैसे रूटीन में आप की रुचि नहीं थी?
टेस्ट मैच को इसमें शामिल न करें। मैं क्रिकेट बहुत पसंद करता हूं। वह तो मेरे खून में है। नौकरी मैं नहीं कर सकता था। लोखंडवाला से रोज वर्ली जाना और आना ... नहीं यार, मेरे बस का नहीं था। मेरी रुचि नहीं थी।
कुछ मकसद रहा होगा फिल्मों में आने का?
मैं इस प्रोसेस का आनंद लेना चाहता था। बचपन से फिल्में देखता रहा हूं। मैं फिल्ममेकिंग के प्रोसेस का हिस्सा बनना चाहता था। क्लिंट इस्टवुड की फिल्में देख कर बड़ा हुआ हूं।
बचपन में कितनी हिंदी फिल्में देखते थे?
ज्यादा नहीं। मां की फिल्में देख कर बहुत दुखी हो जाता था, क्योंकि बहुत रोना-धोना होता था उनकी फिल्मों में।
आप जो सोच कर फिल्मों में आए थे, वह सब अचीव कर लिया।
नहीं, अभी नहीं किया है। थोड़ा-बहुत किया है। बाकी अब प्रोडक्शन में आने के बाद कर रहा हूं। एजेंट विनोद के साथ उसे अचीव करना चाहता हूं।
कोई भी एक्टर जब डायरेक्टर या प्रोड्यूसर बनता है तो उसके दिमाग में रहता है कि मुझे अभी तक जो मौके नहीं मिले, उन्हें हासिल करूंगा। या फिर उनकी कुछ खास करने की इच्छा रहती है। आप क्यों निर्माता बने?
निर्माता बनने की यही वजह है। क्रिएटिव कंट्रोल मेरा रहे। कैसी फिल्म बनानी है। पोस्टर कैसा होगा? और ऐसे रोल जो हमें नहीं मिल पा रहे हैं, उन्हें हम खुद बनाएंगे। जैसे एजेंट विनोद, जैसे लव आज कल ...
आप कैसे तय करते हैं कि मुझे यह रोल करना चाहिए या वह रोल करना चाहिए? अपनी बनी हुई छवि से प्रभावित होता है यह फैसला या फिर दर्शकों ने जिसमें पसंद कर लिया ...
मेरी छवि क्या है? सलाम नमस्ते और हम तुम के चॉकलेट हीरो की छवि ़ ़ ़ लेकिन मैंने ओमकारा किया और लोगों ने मुझे पसंद किया। रेस अलग फिल्म थी। दोनों ही फिल्मों में मेरे रफ रोल थे, लेकिन दर्शकों ने पसंद किया। मुझे लगता है कि मैं दोनों कर सकता हूं।
एक विकासशील देश में एक्टर होना कितनी बड़ी बात है और इस के क्या सुख हैं?
बहुत बड़ी बात है। कितने लोग एक्टर बन पाते हैं इस देश में। कितनी समस्याएं हैं। बिजली नहीं है। म्युनिसिपल ऑफिस जाओ। हम बहुत ही भाग्यशाली हैं। हम किसी लाइन में खड़े नहीं होते। दर्शक हम से ज्यादा मांग नहीं करते। आप अच्छे लगो ... तो आधी लड़ाई खत्म। अच्छे लगने के लिए जिम जाना और कसरत करना जरूरी हो जाता है।
एक्टर होने के लिए और क्या चीजें जरूरी हैं?
बहुत चीजें जरूरी हैं। लुक और शरीर तो अच्छा होना ही चाहिए। साफ दिमाग हो, जो आंखों में नजर आता है। आप साफ दिल हों। दुनिया और जिंदगी की समझदारी होनी चाहिए। मेरे हिसाब से कैरेक्टर और पर्सनैलिटी अच्छी होनी चाहिए। भारत में बच्चे सब सुनते, देखते और पढ़ते हैं कि सैफ ने ऐसे किया ... हम लोग रोल मॉडल बन जाते हैं। हमें सावधान रहना चाहिए। एक जिम्मेदारी होती है।
इस जिम्मेदारी से आप कितना बंधते या खुलते हैं?
एक्टर के तौर पर फर्क नहीं पड़ता। मैंने निगेटिव रोल भी किए हैं। हमारा ऑन स्क्रीन और ऑफ स्क्रीन इमेज होता है। हमें दोनों का ख्याल रखना चाहिए। मुझे अपने बारे में छपी-दिखाई सारी बातें पता चलती हैं। अभी मैं जिंदगी में च्यादा स्थिर हूं। पहले इतना नहीं था।
आप छोटे नवाब कहे जाते रहे हैं। उसके साथ कहीं न कहीं यह जुड़ा रहा कि देखें छोटे नवाब क्या कर लेते हैं? क्या आपको लगता है कि अपने परिवार की वजह से आप निशाने पर रहें?
परिवार की वजह से हमारा स्पेक्ट्रम बड़ा हो जाता है। इसके फायदे भी होते हैं, लेकिन परेशानियां भी होती हैं। अगर असफल रहे तो कहा जाता है कि देखो क्या किया? मां-बाप इतने काबिल और मशहूर, लेकिन बेटे को देखो। अगर सुपरस्टार बन गए तो कहा जाता है कि यह तो होना ही था। आखिर बेटा किस का है?
बीच में आप ने बुरा दौर भी देखा। किस वजह से इंडस्ट्री में बने और टिके रहे?
मेरे पास विकल्प नहीं थे। मैंने तय कर लिया था कि हिलना नहीं है। मैंने यहां आने के बाद अपने पुल जला दिए थे। लौटने का रास्ता नहीं बचा था।
पहली फिल्म के लिए इम्तियाज अली को चुनने की कोई खास वजह थी क्या?
बहुत सी बातें थी। उनके पास नया आइडिया था। मुझे वही पुरानी चीज नहीं बनानी थी। मुझे वह परफेक्ट लगे। मुझे लव स्टोरी फिल्म ही बनानी थी, लेकिन थोड़ी बोल्ड स्टोरी बनानी थी। देखें क्या होता है? फिल्म की कहानी इम्तियाज लेकर आए थे।
आपकी पहली डबल रोल फिल्म है। कितना मुश्किल या आसान रहा इसे निभाना?
यों समझें कि दो फिल्में एक साथ कर लीं। इसमें एक रोल में सरदार हूं। मुझे इस रोल में देखकर सरदार खुश होंगे। हम ने उसे बहुत आंथेटिक रखा है। इतना मुश्किल नहीं होता है डबल रोल करना। मैनरिच्म अलग रखना पड़ता है। दूसरे रोल में सरदार होने की वजह से मैनरिच्म खुद ही अलग हो गया।
क्या है लव आज कल?
यह रिलेशनशिप की कहानी है। आज के जमाने में संबंधों को निभाने में कितनी समस्याएं हैं। सातवें दशक का प्यार थोड़ा अलग था। लंबे समय के बाद मिलते थे। इंतजार रहता था। पहले शादी करते थे, फिर प्यार के बारे में सोचते थे। उस समय के प्यार को देख कर आज के लड़के-लड़की रश्क करेंगे। आज की प्रेम कहानी में करियर बहुत खास हो गया है। लड़कियों का रोल और समाज में स्थान बदल गया है। मां के जेनरेशन और हमारे जेनरेशन में फर्क आ गया है। आज ऐसा लगता है कि दो व्यक्ति एक साथ रहते हैं। दोनों की वैयक्तिकता बनी रहती है।
आप को खुद लव स्टोरी कितनी अच्छी लगती है?
मैं एक्शन, एक्शन कॉमेडी और थ्रिलर फिल्में च्यादा पसंद करता हूं। मुझे लव स्टोरी च्यादा अच्छी नहीं लगती। लव स्टोरी में काम करता हूं। मैं बनाना भी चाहता हूं, क्योंकि देश देखना चाहता है। मुझे व्यक्तिगत रूप से ओमकारा और रेस जैसी फिल्में पसंद हैं।
फिर भी हिंदी फिल्मों की कौन सी लव स्टोरी आप को अच्छी लगी है?
दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, कयामत से कयामत तक, मैंने प्यार किया, दिल, ... आमिर खान की काफी फिल्में ... मां के समय की बात करूं तो आराधना और अमर प्रेम ...
प्यार में सबसे जरूरी क्या है?
सम्मान ... और भरोसा।
सचमुच प्यार बदल गया है?
प्यार का एहसास नहीं बदला है। प्यार दिखाने का तरीका बदल गया है। दबाव बदल गए हैं। पहले टीवी का एक ही चैनल था। अभी इतने चैनल आ गए हैं। आप एक चैनल से ऊबते ही दूसरे चैनल पर चले जाते हैं। प्यार भी ऐसा ही हो गया है। थोड़ी मुश्किल आती है तो भूल जाते हैं। दिलासा दिलाने के लिए काम का बहाना है।
क्या यह पश्चिमी प्रभाव की वजह से हो रहा है?
नहीं, यह अंदरूनी मामला है। हम कहते रहते हैं कि गोरे लोग बड़े खराब होते हैं और हम अच्छे हैं। वास्तव में हम भी उतने ही खराब हैं। हम भारतीय क्या हैं? मौका मिले तो अम‌र्त्य सेन की किताब पढें़। उन्होंने बहुत अच्छे तरीके से विश्लेषित किया है। हम इटली के माफिया की तरह हैं। हम मुंह पर कुछ और, पीठ पीछे कुछ और बोलते हैं। फिल्म इंडस्ट्री में भी सामने बोलेंगे कि क्या फिल्म बनाई है और पीठ पीछे बोलेंगे कि क्या बकवास बनाई है? अगर बेटी किसी लड़के से मिलवा कर कहे कि इस से शादी करनी है तो उस लड़के से कहेंगे कि वाह तुम बहुत अच्छे हो। उसके जाते ही बेटी से कहेंगे कि खबरदार उससे दोबारा मिली। बहुत घटिया इंसान लगता है।
आप आम इंसान की तरह जी पाते हैं क्या? आप तो सुपर स्टार सैफ अली खान हैं?
मैं बहुत ही नार्मल हूं। चाट खना, पानी पुरी खाना ... कहीं भी जाओ। जिम पैदल जाता हूं। शुरू में लोग चौंकते हैं, फिर उन्हें आदत पड़ जाती है। मुंबई में दिक्कत नहीं है। दूसरे शहरों में कभी-कभी लोगों की वजह से दिक्कत होती है। लेकिन आप पैसे कमा रहे हो, तरक्की कर रहे हो तो लंदन चले जाओ। आप चाहते हो कि कोई न पहचाने तो वैसे शहर में जाकर घूमो, जहां कोई नहीं जानता।
क्या ऐसा लगता है कि आप समाज को जितना देते हैं, उतना ही समाज भी आपको देता है?ज्यादा ही देता है। हम तो आज के राजा-महाराजा हैं। हमें नेताओं से ज्यादा इज्जत मिलती है। एक फोन करने पर सब कुछ मिल जाता है।
अपनी तीन फिल्में मुझे गिफ्ट करनी हो तो कौन-कौन सी देंगे?
ओमकारा, हम तुम और परिणीता।
फिल्म इंडस्ट्री के किन लोगों से आप मुझे मिलवाना चाहेंगे। वैसे लोग, जिनकी आप इज्जत करते हों और जो सचमुच आप को इंडस्ट्री के प्रतिनिधि लगते हैं?
डायरेक्टर में करण जौहर ... करण ने दुनिया को देखा और समझा है। एक वजह है कि वे ऐसी फिल्में बनाते हैं। वे लंदन देख चुके हैं। पेरिस उनका देखा हुआ है। फ्रेंच बोलते हैं। अमेरिका में रह चुके हैं। वे भारतीय दर्शकों को समझते हैं। उन्हें मालूम है कि यह फिल्म बनाऊंगा तो सबसे ज्यादा पैसा मिलेगा। इम्तियाज अली ... इम्तियाज आर्टिस्ट मिजाज के हैं। घूमंतू किस्म के हैं। काफी कूल और तेज है। श्री राम राघवन ... इतने अच्छे इंसान हैं और सिनेमा की बहुत अच्छी समझ रखते हैं। अनुराग बसु और विशाल भारद्वाज भी हैं। शाहरुख खान से मिलवाऊंगा। उनका दिमाग बहुत तेज चलता है और वे बहुत इंटरेस्टिंग बात करते हैं फिल्मों और दुनिया के बारे में। शायद आमिर से मिलवाऊंगा। लड़कियों में करीना से ... और भी बताऊं।
फिल्म इंडस्ट्री की सबसे अच्छी बात क्या लगती है?
डेमोक्रेसी ... आप यहां बुरी फिल्म नहीं चला सकते। यहां जो लोगों को पसंद है वही चलेगा। बाकी फील्ड में आप कुछ भी थोप सकते हैं, यहां नहीं। किसी का नियंत्रण नहीं है इंडस्ट्री पर। थिएटर में दर्शक आएं और तीन बार देखें तो फिल्म हिट होती है।
इस फिल्म की रिलीज के पहले आप की कैसी फीलिंग है?
यह फिल्म मेरे लिए बहुत जरूरी है। तनाव तो है। 31 जुलाई तक मैं बीमार न पड़ जाऊं? यह बच्चे के जन्म की तरह है। एक तो सुरक्षित डिलिवरी हो और बच्चा सही-सलामत हो। कुछ चीजें तो जन्म के बाद तय होती है?
लव आज कल को क्यों देखें?
इसमें नयापन है। इम्तियाज से संवाद ऐसे हैं, जो दो असली लोग बात कर रहे हों। एक लव स्टोरी है। आज के दबाव और कमिटमेंट के बारे में ... एक संदेश भी देती है फिल्म। हमेशा दिमाग की न सुनें, दिल की भी सुनें। इसमें कोई विलेन नहीं है। दिमाग ही विलेन है।

Thursday, July 16, 2009

इम्तियाज ने मुझे हमेशा सरप्राइज किया है-अनुराग कश्यप

-अजय ब्रह्मात्मज

'लव आज कलÓ के निर्देशक और अनुराग कश्यप पुराने दोस्त हैं। फिल्ममेकिंग की में दोनों की शैली अलग है, लेकिन दोनों एक-दूसरे को पसंद करने के साथ निर्भर भी करते हैं। अनुराग कश्यप ने अपने दोस्त इम्तियाज अली के बारे में खास बात की-
इम्तियाज बहुत शांत आदमी है। उसको मैंने कभी घबराते हुए नहीं देखा है। कभी परेशान होते हुए नहीं देखा है। उसमें उत्सुकता बहुत है। अगर आप बताएं कि कल दुनिया खत्म होने वाली है तो पूछेगा कि कैसी बात कर रहे हो? अच्छा कैसे खत्म होगी? छोड़ो, बताओ कि शाम को क्या कर रहे हो? वह इस तरह का आदमी है। बड़े प्यार से लोगों को हैंडिल करता है। बहुत सारी खूबियां है। उसके साथ जो एक बार काम कर ले या उसे जान ले तो वो दूर नहीं जाना चाहेगा।
उसके चेहरे पर अजीब सी मुस्कराहट रहती है। हमलोग उसको शुरू से बोलते थे तू अंदर से कहीं न कहीं बहुत बड़ा शैतान है। वह मुस्कुरा कर... छुपा कर रखता है। उसके अंदर कुछ बहुत ही खास बात है। सेंसिटिव बहुत है। बहुत ही रोमांटिक आदमी है। बहुत स्थिर है। डिपेंडेबल है। मुझे मालूम है कल कोई हो ना हो मगर इम्तियाज अली है। काफी चीजों के लिए मैं उस पर निर्भर कर सकता हूं। सलाह के लिए खास कर... हर स्क्रिप्ट पढ़ाता हूं। हर फिल्म दिखाता हूं। वह मुझसे बोलता है कि तू सबसे लड़ाई-झगड़ा बंद कर के बस काम करो। वही एक आदमी है, जिससे मैं सलाह लेता हूं।
मुझे उसकी फिल्म बहुत अच्छी लगती है। हिंदी फिल्मों की प्रेमकहानियां मुझे अच्छी नहीं लगतीं। नकली प्रेम कहानियां बनाते हैं। पता नहीं क्यों मैं अजीब तरीके से चिढ़ता हूं और दूर भागता हूं। इम्तियाज की फिल्में कहीं न कही बहुत स्वाभाविक, बहुत ही रीयल होती है। उसमें गाने बहुत स्वाभाविक तरीके से आते हैं। कहीं न कहीं आप उसमें अपने आप को पाते हो। उसका कैरेक्टर भले ही बिजनेस मैन है। 'जब वी मेटÓ लार्जरदेन लाइफ नहीं है। फिल्म का हीरो बहुत बड़ा बिजनेसमैन है, लेकिन ह्यूमन है। वह आदमी है। वह लार्जर दैन लाइफ नहीं है। हेलीकॉप्टर में नहीं घूमता है। वह एक नार्मल इंसान है। उसकी लव स्टोरी बहुत ही अलग रहती है। कुछ लोग हैं जो इस तरह के रोमांटिक फिल्में बनाते हैं, जो बहुत रीयल स्वाभाविक एक वास्तविक दुनिया में आधारित होती हैं। जैसे एडवर्ड बर्न बनाया करता था पहले। कुछ फ्रेंच फिल्ममेकर हैं जो साधारण सी प्रेम कहानियां बनाते हैं। वह जिस तरह के सेंसिटिव मूवमेंट क्रिएट करता है,उस से फिल्में आसपास की लगती हैं। उसके कैरेक्टर कहीं न कहीं कंफ्यूज और कमजोर लोग होते हैं। उसके कैरेक्टर पहले अपने आपको खोते हैं,फिर पाते हैं। यह उसकी खास बात है, जो मुझे बहुत अच्छी लगती है।
हमारी दोस्ती बहुत पुरानी है। मुझे खुद नही मालूम था कि मैं फिल्ममेकर बनूंगा। हमलोग कॉलेज में थे। उसका पहला लक्ष्य यह था कि मैं 21 का होते ही पहले शादी कर लूंगा। 21 का होते ही उसने शादी कर ली। काम मिला नहीं और शादी कर ली। हम में से वह पहला आदमी था, जिसने पहले शादी की। वह सबसे ज्यादा ट्रैवल करता है और ट्रैवल करते समय लिखता है। सारी फिल्में वह ट्रैवल करते हुए लिखता है। वह यात्रा और जर्नी उसकी फिल्मों में आ जाती है। वह सही मायने में जीता है। 'सोचा न थाÓ की मैंने स्क्रिप्ट पढ़ी थी। स्क्रिप्ट पढक़र मुझे नहीं लगा था कि वह फिल्म इतनी अच्छी बनेगी। वह मेरी फेवरिट फिल्म है और 'जब वी मेटÓ में भी वही हुआ। उसका नजरिया ऐसा है कि आप स्क्रिप्ट को पढक़र अंदाज नहीं लगा सकते कि वह क्या करने वाला है। ऑन स्क्रीन क्या होने वाला है और कैसे अनफोल्ड होगी फिल्म... इसका अंदाजा स्क्रिप्ट पढ़ कर नहीं लगा सकते। वह सालों-साल बैठा रहता है, लिखता रहता है। उसकी कहानियां चलती रहती है। मैंने उसकी सारी कहानियां पढ़ी हैं और स्क्रीन पर देख कर सरप्राइज हुआ हूं। खास कर 'लव आज कलÓ मैंने देखी है। सात-आठ मिनट तक आप फिल्म देखते हैं तो समझने की कोशिश करते हैं। आठवें मिनट के बाद आप हिलेंगे नहीं। खास बात है। कहीं न कहीं पकड़ लेती है फिल्म।
इम्तियाज की जो कहानियां है, उसने उन्हें जिया हैं। मेरा जो सिनैमैटिक अप्रोच है, उसमें बहुत सारे प्रभाव दिख सकते हैं। क्योंकि मैं बहुत सारी चीजों से एक्सपोज्ड हूं। लेकिन इम्तियाज जिंदगी से कहानियां ढूंढ कर ला रहा है। जिंदगी की कहानियों की अलग बात होती है।

Saturday, April 25, 2009

जब वी वोट-इम्तियाज़ अली

मैं बिहार का रहने वाला हूं। राजनीति की समझ रखता हूं। मुझे देश-दुनिया की खबर रहती है। इस बार मुझे वोट को लेकर मतदाता में जागरूकता दिख रही है। यंग इंडिया का नारा मुझे अच्छा लगता है। चुनाव के समय एक जोशीला माहौल है। अलग-अलग माध्यमों से वोट और प्रत्याशियों के बारे में बताया जा रहा है। ऐसे ही एक माध्यम से मैंने अपना पंजीकरण किया है। मुझे खुशी है कि इस बार मैं मुंबई में वोट दूंगा। मुंबई और दिल्ली में रहते हुए मैंने महसूस किया है कि बड़े शहरों में युवकों को राजनीति की सही समझ नहीं है। वे इसके प्रति उदासीन रहते हैं। इस बार चल रहे विभिन्न संस्थाओं के अभियानों से उनके बीच थोड़ी सुगबुगाहट दिख रही है। वे सभी वोट देंगे तो देश की राजनीति बदलेगी। मुझे लगता है कि किसी एक पार्टी को बहुमत मिलना चाहिए। सरकार कोई भी बनाए लेकिन किसी एक पार्टी की बने ताकि वह कुछ काम कर सके। ऐसी सरकार से बाद में सवाल भी पूछे जा सकते हैं। इस चुनाव में कुछ पार्टियों में मुझे नेतृत्व संकट दिख रहा है। बड़े नेताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। नेतागण मुद्दों की बात छोड़ कर व्यक्तिगत आाक्षेप लगाने लगते हैं। लोकतंत्र के लिए यह अच्छा नहीं है। अगर फिल्म के लोग राजनीति में जा रहे हैं तो क्या बुराई है? जैसे कोई इंजीनियर, डॉक्टर या किसी और पेशे का व्यक्ति चुनाव लड़ सकता है, वैसे ही फिल्मी हस्तियां भी राजनीति में जा सकती हैं। फिल्मों के लोग अपनी लोकप्रियता की वजह से जीत सकते हैं, लेकिन उन्हें पहले सोचना चाहिए कि क्या राजनीति में जाना उनके लिए आवश्यक है। यह नहीं हो कि चुनाव के बाद राजनीति में जाने को कोई भूल समझे।