Search This Blog

Showing posts with label अमित त्रिवेदी. Show all posts
Showing posts with label अमित त्रिवेदी. Show all posts

Saturday, January 23, 2016

गीत-संगीत में पिरोए हैं कश्‍मीरी अहसास - स्‍वानंद किरकिरे



   
-अजय ब्रह्मात्‍मज
    पशमीना घागों से कोई ख्‍वाब बुने तो उसके अहसास की नजुकी का अंदाजा लगाया जा सकता है। कच्‍चे और अनगढ़ मोहब्‍बत के खयालों की शब्‍दों में कसीदाकारी में माहिर स्‍वानंद किरकिरे फितूर के गीतों से यह विश्‍वास जाहिर होता है कि सुदर और कामेल भवनाओं की खूबसूरत बयानी के लिए घिसे-पिटे लब्‍जों की जरूरत नहीं होती। स्‍वानंद किरकिरे ने अमित त्रिवेदी के साथ मिल कर फितूर का गीत-संगीत रख है। उनकी साला खड़ूस भी आ रही है। शब्‍दों के शिल्‍पकार स्‍वानंद किरकिरे से हुई बातचीत के अंश...
       स्‍वानंद किरकिरे बताते हैं, अभिषेक कपूर और अमित त्रिवेदी के साथ मैाने काय पो छे की थी। उस फिल्‍म के गीत-संगीत को सभी ने पसंद किया था। फितूर में एक बार फिर हम तीनों साथ आए हैं। फितूर का मिजाज बड़ा रोमानी है। ऊपर से काश्‍मीर की पृष्‍ठभूमि की प्रेमकह कहानी है। उसका रंग दिखाई देगा। उसमें एक रुहानी और सूफियाना आलम है। फितूर इंटेंस लव स्‍टोरी है,इसलिए बोलों में गहराई रखी गई है। गानों के रंग में भी फिल्‍म की थीम का असर दिखेगा। मैंने शब्‍दों को बुनते समय कश्‍मीरी अहसास के लिए वहां के लब्‍ज डाले हैं।
    शब्‍दों की यह शिल्‍पकारी तो अधिक मेहनत और जानकारी चाहती होगी। स्‍वानंद हंसने लगते हैं। फिर कहते हैं,शब्‍दकार की मेहनत दिमागी होती है। वह कहां दिखाई पड़ती है। जानकाी तो रहती ही है,लेकिन अनुभव काम आता है। शब्‍दों के चुनाव के लिए खयालों की उड़ान लगानी होती है। फिल्‍मी और घिसे-पिटे शब्‍दों से बचने के साथ यह भी देखना पड़ता है कि प्रयोग किए गए शब्‍दों से भाव न उलझे। इस फिल्‍म के सिलसिले में मैं काश्‍मीर भी गया था। वहां का संगीत सुना। पशमीना घागों में टेंडर लव की बात है। टेंडर लव कितना मुलायम और गर्म होता है। पशमीना में वह भाव आ जाता है। एक गीत में अगर फिरदौस बर्रूए-जमीनस्तो, हमीनस्त, हमीनस्त, हमीनस्तो।' का मैंने इस्‍तेमाल किया है। काश्‍मीर की खूबसूरती की इससे बेहतर अभिव्‍यक्ति नहीं हो सकती। मैंने एक गीत में पहले इस मशहूर पंक्ति के भाव और अर्थ को लेकर कुछ शब्‍दों को जोड़ा था। अभिषेक को लगा कि उसमें वह प्रभाव पैदा नहीं हो रहा है। वह अनुवाद लग रहा है।फिर यह तय हुआ कि मूल पंक्ति ही रखते हैं।
    स्‍वानंद मानते हैं कि अभिषेक कपूर,इम्तियाज अली और राजकुमार हिरानी जैसे फिल्‍मकारों के साथ काम करने का मजा है कि आप पर बाजार के हिसाब से ही लिखने का दबाव नहीं रहता। वे कहते हैं, उनके साथ कुछ अलग काम करने के मौके मिलते हैं। इस फिल्‍म में तो अमित त्रिवेदी का साथ मिला। अमित बहुत सुलझे और मौलिक संगीत निर्देशक हैं। वे कहानी के अंदर से धुनें निकालते हैं। साथ ही वे प्रयोगधर्मी हैं। आप उनकी कोई भी फिल्‍म देख लें। हमीनस्‍त गीत मैंने पहले लिख लिया था। अमित ने बाद में उसे संगीत से सजाया। यह आजकल कम होता है। इस गीत में काश्‍मीर की विडंबना भी सुनाई पड़ेगी। होने दो बतिया मेरे दिल के करीब है।
    स्‍वानंद किरकिरे अपनी अगली फिल्‍म साला खड़ूस का भी जिक्र करते हैं। वे कहते हैं, इस फिल्‍म के गाने भी अव्च्‍छे हैं। नए संगीतकार हैं संतोष नारायण। उनके साथ मजा आया। मैंने राजकुमार हिरानी से कहा था कि मुझे कुछ ओरिजिनल लिखने का मौका देना। मैं तमिल गीतों के आधार पर नहीं लिखूंगा। उन्‍होंने मेंरी बात मानी। आप सभी फिल्‍म देख कर बताएं कि कैसे हैं गीत?

Wednesday, May 13, 2015

बॉम्‍बे वेल्‍वेट के गीत - क ख ग


क ख ग

ऐ तुम से मिली 
तो प्‍यार का 
सीखा है क ख ग घ 
ऐ, समझो ना 
क्‍यों प्‍यार का 
उल्‍टा है क ख ग घ 
क्‍यो जो दर्द दे 
तड़पाए भी 
लगता है प्‍यारा वही 
क्‍यों टूटे ये दिल 
कहलाए दिल तभी 

तैरने की जो कोशिशें करे 
काहे डूब जाता है 
सब भुला के जो डूब जाए क्‍यों 
वही तैर पाता है 
 जो हर खेल में जीता यहां दिलबर से हारा वो भी 
क्‍यों टूटे ये दिल 
कहलाए दिल तभी 

ऐ तुम से मिली 
तो प्‍यार का 
सीखा है क ख ग घ 
ऐ, समझो ना 
क्‍यों प्‍यार का 
उल्‍टा है क ख ग घ




धत्‍त तेरी 
इसकी हर सज़ा क़बूल है जिसे 
यहां वही...वही बरी हुआ है 
इस पे जो मुक़द्दमा करे
अजी वही ...वही मरा है 
बताओ क्‍यों इस जेल से 
भागा है जो 
दोबारा लौटा वो भी 
क्‍यों टूटे ये दिल
कहलाए दिल तभी 

ऐ तुम से मिली 
तो प्‍यार का 
सीखा है क ख ग घ 
ऐ, समझो ना 
क्‍यों प्‍यार का 
उल्‍टा है क ख ग घ




Friday, February 6, 2009

फ़िल्म समीक्षा:देव डी


आत्मलिप्त युवक की पतनगाथा
-अजय ब्रह्मात्मज

घिसे-पिटे फार्मूले और रंग-ढंग में एक जैसी लगने वाली हिंदी फिल्मों से उकता चुके दर्शकों को देव डी राहत दे सकती है। हिंदी फिल्मों में शिल्प और सजावट में आ चुके बदलाव का सबूत है देव डी। यह फिल्म आनंद और रसास्वादन की पारंपरिक प्रक्रिया को झकझोरती है। कुछ छवियां, दृश्य, बंध और चरित्रों की प्रतिक्रियाएं चौंका भी सकती हैं। अनुराग कश्यप ने बहाना शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के देवदास का लिया है, लेकिन उनकी फिल्म के किरदार आज के हैं। हम ऐसे किरदारों से अपरिचित नहीं हैं, लेकिन दिखावटी समाज में सतह से एक परत नीचे जी रहे इन किरदारों के बारे में हम बातें नहीं करते। चूंकि ये आदर्श नहीं हो सकते, इसलिए हम इनकी चर्चा नहीं करते। अनुराग कश्यप की फिल्म में देव, पारो, चंदा और चुन्नी के रूप में वे हमें दिखते हैं।
देव डी का ढांचा देवदास का ही है। बचपन की दोस्ती बड़े होने पर प्रेम में बदलती है। एक गलतफहमी से देव और पारो के रास्ते अलग होते हैं। अहंकारी और आत्मकेंद्रित देव बर्दाश्त नहीं कर पाता कि पारो उसे यों अपने जीवन से धकेल देगी। देव शराब, नशा, ड्रग्स, सेक्स वर्कर और दलाल के संसर्ग में आता है। वह चैन की तलाश में बेचैन है। उसकी मुलाकात चंदा से होती है तो उसे थोड़ा सुकून मिलता है। उसे लगता है कि कोई उसकी परवाह करता है। चंदा भी महसूस करती है कि देव खुद के अलावा किसी और से प्रेम नहीं करता। देव अमीर परिवार का बिगड़ैल बेटा है, जो भावनात्मक असुरक्षा के कारण भटकता हुआ पतन के गर्त में पहुंचता है। यही कारण है कि उसकी बेबसी और लाचारगी सहानुभूति नहीं पैदा करती। उसके जीवन में आए पारो, चंदा और रसिका रियल, स्मार्ट और आधुनिक हैं। वे भी उसकी हकीकत समझते हैं और दया नहीं दिखाते। देव डी का देव कमजोर, असुरक्षित, भावुक, आत्मलिप्त और अनिश्चित व्यक्ति है। बाह्य परिस्थितियों से ज्यादा वह खुद के अनिश्चय और भटकाव का शिकार है।
अनुराग कश्यप ने देव डी में चंदा की पृष्ठभूमि की खोज की है। सेक्स वर्कर बनने की विवशता की कहानी मार्मिक है। अनजाने में एमएमएस कांड में फंस गई लेनी परिवार और समाज से बहिष्कृत होने के बाद वह चुन्नी की मदद से दिल्ली के पहाड़गंज में शरण पाती है और अपना नाम चंद्रमुखी रखती है। कुल्टा समझी गई चंदा मानती है कि समाज का अधिक हिस्सा कुत्सित ओर गंदी चीजें देखने में रस लेता है। जिस समाज ने उसे बहिष्कृत किया, उसी समाज ने उसके एमएमएस को देखा। देव डी की पारो साहसी, आधुनिक और व्यावहारिक है। देव से अलग होने के बाद वह बिसूरती नहीं। दोबारा मिलने पर वह देव को अपनी अंतरंगता से तृप्त करती है, लेकिन देव के प्रति वह किसी किस्म की भावुकता नहीं दिखाती। वह अपने परिवार में रच-बस चुकी है। इस फिल्म को निर्देशित करते समय अनुराग के मानस में पुरानी देवदास मंडराती रही है। लेनी तो अपना नाम चंद्रमुखी देवदास की माधुरी दीक्षित के कारण रखती है। देव डी में चित्रित प्रेम, सेक्स, रिश्ते और भावनाओं को आज के संदर्भ में ही समझा जा सकता है। देव डी एक प्रस्थान है, जो प्रेम के पारंपरिक चित्रण के बजाए 21वीं सदी के शहरी और समृद्ध भारत के युवा वर्ग के बदलते प्रेमबोध को प्रस्तुत करती है। अनुराग कश्यप ने क्रिएटिव साहस का परिचय दिया है। उन्होंने फिल्म के नए शिल्प के हिसाब से पटकथा लिखी है। पारो, देव और चंदा के चरित्रों को स्थापित करने के बाद वे इंटरवल के पश्चात रिश्तों की पेंचीदगियों में उतरते हैं। दृश्य, प्रसंग, बिंब और रंग में नवीनता है। फिल्मांकन की प्रचलित शैली से अलग जाकर अनुराग ने नए प्रयोग किए हैं। ये प्रयोग फिल्म के कथ्य और उद्देश्य के मेल में हैं। अनुराग के शिल्प पर समकालीन विदेशी प्रभाव दिख सकता है।
अभय देओल स्वाभाविक अभिनेता हैं। उन्होंने देव के जटिल चरित्र को सहजता से निभाया है। मुश्किल दृश्यों में उनकी अभिव्यक्ति, भाव मुद्राएं और आंगिक क्रियाएं किरदार के मनोभाव को प्रभावशाली तरीके से जाहिर करती हैं। अभय अपनी पीढ़ी के निर्भीक अभिनेता हैं। माही और कल्कि में माही ने अपने किरदार को समझा और बखूबी निभाया है। माही के अभिनय में सादगी है। कल्कि को दृश्य अच्छे मिले हैं, किंतु वह चरित्र की संश्लिष्टता को चेहरे पर नहीं ला पातीं। चुन्नी की भूमिका में दिब्येन्दु भट्टाचार्य ध्यान खींचते हैं। इस किरदार को अनावश्यक तरीके से सीमित कर दिया गया है।
देव डी की विशेषता इसका संगीत है। फिल्म में गीत-संगीत इस खूबसूरती से पिरोया गया है कि पता ही नहीं चलता कि फिल्म खत्म होने तक हम अठारह गाने सुन चुके हैं। गीतों का ऐसा फिल्मांकन रंग दे बसंती के बाद दिखा है। अमिताभ भट्टाचार्य, शैली और अमित त्रिवेदी की टीम ने मधुर और भावपूर्ण सुर, स्वर और शब्द रचे हैं।
****