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Saturday, November 30, 2013

पटना सिने परिवेश : सैयद एस तौहीद

सैयद एस तौहीद का यह लेख मुझे बहुत पहले मिल गया था। पोस्‍ट नहीं कर पाया था। पटना शहर के सिने परिवेश पर उन्‍होंने रोचक तरीके से लिखा है। हम सभी को अपने शहरों और कस्‍बों के बारे में लिखना चाहिए। सब कुछ इतनी तेजी से बदल रहा हैं कि हम खुद ही भूल जाएंगे पते,ठौर-ठिाने और किस्‍से...इन सब के साथ भूलेंगी यादें।

पटना सिने वातावरण से गुजरा दौर बडे व्यापक रूप से ओझल होने की कगार पर है।

आधुनिक समय की धारा में गुजरा वक्त अपनी ब्यार खो चुका है। नए समय में सिनेमा का जन-सुलभ वितरण अमीरों के शौक में बदलता जा रहा है। राजधानी के बहुत से सिंगल-स्क्रीन सिनेमाघर परिवर्तन एवं तालाबंदी के दौर से गुजररहे हैं। परिवर्तन की रफ्तार में यह इतिहास ‘आधुनिकता’ व बाजारवाद के लिए जगह बना रहा है । अतीत जो अब भी उस समय की याद लिए नगर में कहीं सिमटा पडा था। आज वह गुजरे वक्त की जुस्तजु को फिर भी हवा देता है । सबसे पहले बुध मार्ग के उजड चुके ‘पर्ल’ का जिक्र करना चाहिए। कहा जाता है कि यह अस्सी के उत्तरार्ध में तालाबंदी के अंधेरे में डूब गया। रेलवे स्टेशन करीब जबरदस्त लोकेशन पर इसे स्थापित किया गया था। संचालन के कुछ ही वर्षों के भीतर तालाबंदी का साया पड गया। एक विश्लेषण के मुताबिक सिनेमाघर पर बंदी का कारण पर्याप्त लाईसेंस का न होना समझ आता है। फिर वितरकों के साथ व्यावसायिक अराजकता का मामला एवं स्वामित्व बडा कारण है। भूमि विवाद एवं फिल्मों के प्रदर्शन पर स्टे भी बडी समस्या है। पर्ल की किस्मत का साया पटना के सभी पुराने सिनेमाघरों पर पड चुका है । इस समय
राजधानी के अनेक लोकप्रिय छविग्रह किसी न किसी वजह से दैनिक सिनेमाई गतिविधियों से महरूम हैं। अब वहां फिल्मों का प्रदर्शन नहीं होता, आज की तारीख में अप्सरा से लेकर अशोक तक के परदे पर कोई मंजर नहीं आता। दर्शक हितों के मददेनजर लोकप्रिय छविग्रहों का एक के बाद एक बंद हो जाना बडी बात है। आधुनिक बदलाव के वजह से नए समय में पुरानी दरों का मनोरंजन शुल्क लगभग समाप्त है। अब छविग्रहों में फिल्म का मजा लेना हर किसी के बस में नहीं। विशेषकर हर तरफ का मारा गरीब आदमी एक बडे शहर में सिनेमा का टिकट नहीं ले सकता। गांव में ढंग का सनेमा होता नहीं ।गांव-कसबे से पलायन कर नगर-महानगर में आए आदमी के पास स्वस्थ मनोरंजन का विकल्प नहीं है। घर पर गुजारा हो जाने लायक रोजगार नहीं कि वापस लौट आएं। मोबाइल में लोड फिल्म उसे सिनेमाघर का मजा नहीं दे सकती। त्वरित व आसान तरीके से मनोरंजन का सामान मुहय्या कराने वाला बाजार गरीब आदमी से विशेष सरोकार नहीं । हां,स्वस्थ मनोरंजन का दायित्त्व रेडियो जरूर निभा रहा है । किंतु सिने अनुभव में भागीदारी का दायरा सामुदायिक सेवा से खरीद सेवा में बदल चुका है । सिनेमाघरों के परंपरागत प्रारूप में बदलाव से ‘सभी को मनोरंजन’ देने की मुराद पर चर्चा नहीं । हाशिए के लोग हर जगह उपेक्षा के शिकार होते रहे। कहना होगा कि यह तक़रीबन हर जगह देखा जाता है ।
                 एक समय में राजधानी का गौरव कहा जाने वाला बडे लोगों का हाल ‘अशोक’ फिल्हाल संक्रमण काल से गुजर रहा है । आज इसकी जमीन पर एक महत्त्वकांक्षी योजना का काम चल रहा है। । पाटलीपुत्र
                         राजेन्द्र नगर का वैशाली सिनेमा पर भी संकट के बादल हैं । कुछ ही समय पहले जबरदस्त प्रयास के साथ पुनरूत्थान की सांसे ले सका था । किंतु फिर से गुमनाम पटरी पर खडा है। आस-पास के दर्शकों के लिए अब विकल्प के तौर पर वीणा सिनेमा ही उपलब्ध है । भोजपुरी फिल्मों की चाहत रखने वाले लोगों के
लिए यह खास है। वीणा में पोपुलर बाम्बे सिनेमा (हिंदी सिनेमा) की फिल्मों का प्रदर्शन तकरीबन रूका पडा है । इस तरह हिंदी फिल्म के दर्शकों को विकल्प की तलाश करनी होगी। लेकिन सिनेमा अनुभव का भागीदार होना अब एक पूंजी का सवाल है। नए समय में आधुनिक छविग्रहों का सेवा शुल्क बढ जाने से फिल्म देखना अमीरों की ठसक हो गया है । विशेष कर मल्टीपलेक्स के जमाने में हाशिए का मनोरंजन अधिकार एक दीवास्वपन है। वह समय अब नहीं रहा जब सिनेमा हर वर्ग की पहुंच में था। सिनेमा से आम आदमी के गायब हो जाने का असर परदे के दूसरी ओर भी नजर आने लगा है । छविग्रहों की दीर्घा से गरीब आदमी का गायब हो जाना खटकता है । अब ज्यादातर सिनेमाघरों में आसान शुल्क वाली श्रेणी खत्म हो गयी है। यह कम दाम पर लोगों को अच्छी फिल्में दिखाने की क़ुव्वत रखती थी । अमीर मल्टीपलेक्स में गरीब आदमी का स्वागत करने वाली स्पेशल-फ्रंट-रियर दीर्घा की अवधारणा नहीं होती। उसकी चमक गरीब आदमी को बहुत असहज कर सकती है । परंपरागत सिंगल स्क्रीन छविग्रहों की तालाबंदी एवं बदलाव की नयी ब्यार में हाशिए के आदमी का सवाल खारिज सा लगता है। स्तरीय मनोरंजन सेवाएं आसान दरों पर मुहय्या कराने का स्वपन धूमिल है । आधुनिक कीमत के प्रकाश में एक साधारण आदमी ‘पाइरेटेड सीडी’ की सीमित दुनिया में गुमराह होने को आमदा नजर आता है । कहना जरूरी है कि उस बाजार की निरंतरता में चिंताजनक परिणाम देखने को मिलेंगे ।
राजधानी की सिने-दर्शक परम्परा फिल्मों के प्रदर्शन में सहायक बनी । यह चलन सिनेमाघरों से विकसित हुआ । यह सभी पटना सिने संस्कृति के महत्त्वपूर्ण पड़ाव कहे जा सकते हैं । गांधी मैदान से सटे नगर के तीन
मुख्य सिनेमा हाल: मोना-रिजेंट-एल्फिसटन क्षेत्र में सिने दर्शन को परिभाषित करते थे । दर्शक जब कभी इस दिशा मे आता, तो एक अनजाने मोहपाश में स्वयं को बंधा पाता । मोना से कुछ ही पहले एल्फिसटन टाकिज का भवन है,जोकि फिलवक्त परिवर्तन काल से गुजर रहा है । इस टाकिज में भोजपुरी फिल्मों का प्रेमियर होता था। क्षेत्रीय सर्कल में यह टाकिज काफी लोकप्रिय रहा । सिने टाकिज त्रयी में तीसरी कड़ी रेजेंट सिनेमा है। रेलवे स्टेशन के करीब बना वीणा आस-पास के दर्शको के लिए वर्षो से एक विकल्प रहा है । लेकिन अब वीणा में ग्रेड- वन फिल्में न के बराबर रिलीज़ होती हैं । पटना से सटे दानापुर के छविग्रह राजधानी सिने संसार को विस्तार देने के प्रयास में हैं । यहां पर टिकट की कीमत नगर के सिनेमाघरों से कम है । लेकिन वहां जाने को बडी फुर्सत की दरकार है।
                       वर्त्तमान हालात में पर्व त्योहार- सांस्कृतिक संस्कारों तथा परंपरागत विधान से गरीब तबका छूटता दिख रहा । हाशिए के लोगों को सुरक्षित करने के लिए भोजपुरी फिल्म मनोरंजन को गलत रूप से कुंठाओं से मुक्ति का मार्ग करार दिया जाता है। आरंभिक भोजपुरी फिल्मों के संदर्भ में बात ठीक थी। किंतु वो बात अब के भोजपुरी सिनेमा पर लागू नहीं होती । हाशिए के आदमी का मनोरंजन अधिकार इससे आगे निर्धारित होना चाहिए । एक सांस्कृतिक जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाने की जरूरत है। उसे स्तरीय फिल्में दिखाने का अवसर उपलब्ध कराया जाए। बदलाव की धारा में छविग्रहों की परंपरागत अवधारणा मिटने से सिनेमा का शौकीन गरीब तबक़ा भयावह कुंठाओं की गिरफ्त में है। हाशिए के हित में सिनेमा का सामुदायिक स्वरूप बरकरार रखना चाहिए। केवल भोजपुरी फिल्में दिखाने से काम नहीं चल सकता । उन्हें अच्छी भोजपुरी व हिंदी फिल्में दिखाने का इंतजाम होना चाहिए । उन्हें सकारात्मक मनोरंजन का आदि बनाना होगा। फिर वो शायद मानसिक हित-अहित का अवलोकन स्वतंत्र होकर कर सकेंगे । यह एक बडे सामाजिक संघर्ष की दिशा में एक पहल होगी । आगे और भी पहल की जरूरत पड सकती है । हमें इस दिशा में विचार करना होगा । फिल्हाल ऐसा नहीं हो रहा और यह लोग भ्रमित दिशाओं की ओर मोड दिए जा रहे हैं। सिनेमा से जुडे लोगों ऊपर समाज को जोडने का महत्ती दायित्व है। आधुनिकता व बाजार की इकानामी में काम थोडा मुश्किल जरूर है, किंतु असंभव नहीं ।  लेकिन क्या हाशिए को कुछ अधिकार मुहय्या कराने के ऊपर सोंचा भी जाता है?
कालोनी के नजदीक चालू अत्याधुनिक शापिंग माल में राज्य का पहला मल्टीपलेक्स स्थापित हो जाने से कंशट्रक्शन क्षेत्र में बहुत रश हो गया है। उदाहरण की विराट भव्यता दोहराव को प्रेरित करती है । अशोक सिनेमा की जमीन पर भी बहुमंजिला इमारत का निर्माण हो रहा है । जिसमें एक मल्टीपलेक्स की भी योजना है। विगत कुछ वर्षों से राजधानी में पुराने ठिकानों को जमींदोज कर देने की एक मुहिम सी चली है । परिवर्तन यह कहानी चाण्क्य एवं एलिफिस्टन के साथ भी फिट बैठती है । नगर का हर परिवर्तित (मिटा हुआ भी) पता एक बडी कहानी का हिस्सा है। विकास की कहानी के भूले-बिसरे किरदारों में इनका नाम भी जोडा जा सकता है। मंजर से जो हट तो गए लेकिन यादों में अब भी हैं। बदलाव की ब्यार में परंपरा की बात पुरानी मालूम पडे लेकिन फिर भी वह वक्त याद आता है । छविग्रहों के पुराने भवन को ध्वस्त कर नए भवन का निर्माण हो रहा है। एलिफिस्टन के पुराने भवन को हटा कर नए युग में प्रवेश की नींव पड चुकी है। संचालन रोके जाने समय यह भोजपुरी फिल्मों का सिनेमाहाल था । हो सकता है कि आगामी समय में इस चलन में विस्तार हो । बहरहाल फिलवक्त तो यह साफ नहीं कि नियमित प्रदर्शन कब तक बहाल हो सकेगा। एक्जिविशन रोड पर ‘अप्सरा’ तालाबंदी भी इसी संकट से जूझ रहा है । जिस समय से यहां फाटक बंद हुआ, तब से एक इंच भी सकारात्मक बदलाव सामने नहीं आया । नगर के एक नामचीन छविग्रह की वर्त्तमान हालात देखकर  एक मिटे हुए नाम का आभास होता है । जिस प्रांगण में दर्शकों का जमावडा हुआ करता था, अब एक परिंदा भी बमुश्किल दिख जाए । कह सकते हैं कि खंडहर में तब्दील होने को है । तालाबंदी के गुमनाम अंधेरे में जाने बाद एक गुमनाम विषय है।

Sunday, August 4, 2013

रायटर आउटसाइडर ही होता है-अमितावा कुमार


-अजय ब्रह्मात्मज

    न्यूयार्क निवासी अमितावा कुमार भारत और खासकर बिहार से कभी खुद को अलग नहीं कर सके। कभी बिहार उनके मानस में प्रवेश करता है तो कभी अमितावा कुमार बिहार आते-जाते हैं। उन्होंने संस्मरणों से आगे बढक़र वर्तमान की धडक़नों को शब्दों में बुना है और उन्हें कहानी एवं रिपोर्ताज के बीच की अनोखी शैली में पेश किया है। यथार्थ और कल्पना के बीच छलांगें मारती उनकी अभिव्यक्ति पाठकों को विचलित, विह्वल और विस्मित करती है। अमितावा कुमार की नई किताब ‘ए मैटर ऑफ रैट्स : ए शॉर्ट बायोग्राफी ऑफ पटना’ है। अमितावा कुमार फिलहाल भारत में बिहार और झारखंड की यात्राओं पर हैं।
- इस पुस्तक का विचार कहां से और कैसे आया?
0 इस पुस्तक का विचार डेविड डेविडार ने दिया था। पेंग्विन छोडऩे के बाद उन्होंने अपनी नई कंपनी शुरू की। उन्होंने आठ लेखकों के सामने प्रस्ताव रखा कि वे अपने होमटाउन के बारे में लिखें। उन्होंने मुझ से पटना के बारे में लिखने के लिए कहा। उसी प्रस्ताव और आग्रह के परिणाम के रूप में यह पुस्तक सामने आई है।
- आप लगातार भारत आने पर बिहार जाते रहे हैं। पटना आप से कभी छूटता नहीं? क्या वजह है?
0 मेरा पटना तो मुझ से छूट गया है। हर ट्रिप में मैं उसे खोजता-पकड़ता रहता हूं। इस पुस्तक को लिखने की वजह भी यही रही कि मुझे पटना से रिश्ता बनाने का मौका मिलेगा और यह हुआ भी। मैं उन लोगों से मिल सका जो नए पटना के अंश हैं। उन जगहों को भी देख पाया जिन्हें मैं सालों से देखना चाहता था। गुलजारबाग के ओपियम वेयरहाउस को देख सका, जहां महान साहित्यकार जॉर्ज आर्वेल के पिता काम किया करते थे।
- आपकी पुस्तक का नाम ‘ए मैटर ऑफ रैट्स : ए शॉर्ट बायोग्राफी ऑफ पटना’ है। इस अनोखे टायटल का विचार कैसे आया?
0 पटना में चूहे मेरा दांत लेकर भाग गए थे। चूहा वास्तव में एक सिंबल है। जब कोई जहाज डूबने को होता है तो सबसे पहले चूहे भाग जाते हैं। मैंने सोचा कि बिहार से भाग गए चूहेनुमा लोगों के बारे में लिखूं। अपने बारे में लिखूं। हमलोग पटना से भाग कर कहीं और चले गए हैं। पटना के बारे में यह मेरा व्यक्तिगत निबंध है।
- आपके लेखन की शैली रिपोर्ताज और कहानी की विशेषताओं को लेकर चलती है। आप अपने लेखन को खुद कैसे देखते हैं?
0 मेरी यही चेष्टा रही है। मैं नॉन फिक्शन लिखता हूं, लेकिन चाहता हूं कि फिक्शन की रोचकता और रस उसमें आए। मैं शुष्क रिपोर्टिंग नहीं करना चाहता। दूसरी तरफ यह पूरी तरह से फिक्शन न हो। उसमें रियल दुनिया भी आए। आपको याद होगा कि मेरे नॉवेल ‘होम प्रोडक्ट’ में एक किरदार का नाम अजय ब्रह्मात्मज है। वह किरदार वही बताता और बोलता है जो बातें आपने मुझे रिसर्च के दौरान बताई थीं। इस तरह फैक्ट और फिक्शन को मैं एक साथ लाने की कोशिश करता हूं। फिक्शन में मैं वैसी हिस्ट्री नहीं पेश करता हूं,जो आप टेक्सट बुक में पाते हैं। इस किताब में ‘इमोशनल अत्याचार’ चैप्टर में मैंने एक कवि की चर्चा की है। उनके बारे में लिखने के बाद मैंने बताया है कि कैसे मैंने कुछ गलत याद किया था। वास्तव में मैं टेक्स्ट बुक के खिलाफ रायटिंग करना चाहता हूं।
- आप मूलत: भारतीय हैं। अभी बाहर से भारत और बिहार को देख रहे हैं। अपनी पुस्तक में इन्हें किस रूप में रखते हैं? और क्या भारतीय बुद्धिजीवी उनसे सहमत होते हैं?
0 मैं सिर्फ सकारात्मक या बड़ाई की बातें नहीं करता। फिर भी बिहार के समाज और कुछ व्यक्तियों से मुझे काफी उम्मीद है। ये लोग जब किसी भी मंच पर आते हैं तो पहले व्यक्ति के तरह होते हैं। इस समझने की जरूरत है। मैं जिनकी बातें कर रहा हूं वे पहले से मंच मौजूद नहीं हैं। आगमन की एक आक्रामकता होता है। वह इनमें दिखती है। मैं इसे ‘देसी भाषा और व्यक्ति की मतवाली चाल’ कहता हूं। मुझे उनसे उम्मीद है।
- हिंदी समाज के लेखन, विचार और अभिव्यक्ति से कितने परिचित हैं?
0 अपेक्षा के मुताबिक तो नहीं हूं। मैंने इसी किताब में अरुण प्रकाश की चर्चा की है। एनडीटीवी के रवीश कुमार की रिपोर्ट की बात की है। उनकी रिपोर्ट मुझे हमेशा तगड़ी लगती है। मुझे चवन्नीचैप ब्लॉग भी बहुत पसंद है। उसमें सिनेमा के प्रति हिंदी दृष्टिकोण मिलता है। कोशिश रहती है कि मैं टच में रहूं।
- आप लगातार रिपोर्टिंग भी करते रहे हैं। लेखक अमितावा कुमार में एक पत्रकार भी है। आप उपयुक्त और सारगर्भित पत्रकारिता करते हैं। यह कैसे संभव होता है?
0 पत्रकारिता मेरे लिए क्लास रूम से निकलने और दुनिया से जुडऩे का बहाना है। भारत के बारे में लिखते समय मैं बदलते भारत की सच्चाइयों को करीब से जान पाता हूं। ऐसा नियमित रूप से न हो तो मैं कहीं दूर और पीछे छूट जाऊंगा। जब भी मुझे ऐसा प्रस्ताव मिलता है तो मैं हां कह देता हूं। अपने आउटसाइडर होने को मैं तोड़ता रहता हूं। वैसे रायटर हमेशा आउटसाइडर ही होता है। उसे इनसाइडर बनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।
- क्या कभी वाजिब पहचान और सम्मान नहीं मिल पाने का रंज होता है?
0 कभी-कभी दुख होता है। दो-चार साल पहले साहित्य अकादेमी का एक पत्र आया था कि हम आपको पुरस्कार देने का विचार कर रहे हैं। आप अपनी नागरिकता बताएं? मुझे दुख के साथ कहना पड़ा कि मेरी नागरिकता अमेरिकी हो गई है। पहचानन मिलते और सम्मान न पाने से कोई खास तकलीफ नहीं है।



Friday, July 15, 2011

क्यूँ न "देसवा" को हिंदी फिल्मो की श्रेणी में समझा जाये ?

मुझे यह समीक्षा रविराज पटेल ने भेजी है। वे पटना में रहते हैं और सिनेमा के फ्रंट पर सक्रिय हैं।

-रविराज पटेल

देसवा की पटकथा उस बिहार का दर्शन करवाती है ,जो पिछले दशक में बिहार का चेहरा कुरूप और अपराधिक छवि का परिचायक बन चूका था .शैक्षणिक ,आर्थिक ,सामाजिक एवं मानसिक रूप से विकलांग बिहार हमारी पहचान हो चुकी थी ,और ज़िम्मेदार जन प्रतिनिधिओं के रौब तले रहना हम जनता की मज़बूरी .
मूल रूप से बिहार के बक्सर जिले के युवा निर्देशक नितिन चंद्रा बक्सर जिले में ही वर्ष २००३-२००४ के मध्य घटी वास्तविक घटनाओं को अपनी पहली फिल्म का आधार बनाया है ,जो संपूर्ण बिहार का धोतक प्रतिबिंबित होता है .
चंपारण टॉकीज के बैनर तले निर्मित देसवा के सितारे हैं - क्रांति प्रकाश झा ,आशीष विद्यार्थी ,नीतू चंद्रा ,पंकज झा ,दीपक सिंह ,अजय कुमार ,आरती पूरी ,एन .एन पाण्डेय ,अभिषेक शर्मा ,नवनीत शर्मा एवं डोल्फिन दुबे जबकि सभी भोजपुरी फिल्मों के तरह देसवा में भी आईटम सोंग का तड़का देने से नही चूका गया है , जिसका मुख्य आकर्षण यह है की फिल्म निर्मात्री एवं बिहार बाला मशहूर अभिनेत्री नीतू चंद्रा स्वय यह न. पेश करती नज़र आती है ,जो आजमगढ़ के ओर्केष्ट्र पार्टी की नृत्यांगना अपने लटके झटके से सिटी ताली बटोरने में कामयाब रहती है .नीतू चन्द्रा भोजपुरी फिल्म में पहली बार नज़र आ रही है .
फिल्म में गीत संगीत मनमोहक एवं कर्णप्रिय है ,गीत आशुतोष सिंह एवं अन्य का है .आशुतोष सिंह के ही संगीत निर्देशन में सोनू निगम ,श्रेया घोषाल ,सुनिधि चौहान ,स्वानंद किरकिरे ,मिका ,शारदा सिन्हा ,भारत शर्मा "व्यास" एवं प्रभाकर पाण्डेय के सुमधुर स्वरों से सजाया गया है .
तकनिकी दृष्टीकोण से देसवा आज के भोजपुरी फिल्मों के व्याकरण से भिन्न, काफी अब्बल नज़र आता है . विशेष विषय को दर्शाता कहानी ,छाया ,प्रकाश,संपादन , कला निर्देशन एवं निर्देशन या फिर पटकथा के अनुकूल लोकशन का चुनाव में नितिन चंद्रा एवं क्रूज़ का दक्षता तथा क्षमता प्रवल प्रतीत होता है .लिहाजा, फिल्मों के कई जानकारों के अनुसार -क्यूँ न "देसवा" को हिंदी फिल्मो की श्रेणी में समझा जाये ?
सिनेमा का आरंभ पटना में मार्च २००५ में घटित दंगे के विरोध मार्च के दृश्य से होती है ,उसी क्रम में पटकथा अक्तूबर २००३ की ओर मुड़ जाती है ,जहाँ तत्कालीन बिहार की विभीषिका बयां कर रही दृश्य के साथ सिनेमा का दृश्यारंभ होता है .यह वह समय होता है ,जब बिहार अनेकानेक समस्याओं से जूझ रहा होता है.
फिल्म, कहानी के मुख्य तीन किरदारों के मध्य घुमती है ,जिसमे केंद्रीय भूमिका पात्र राजीव कुमार भारतीय प्रशासनिक सेवा का इच्छुक प्रतियोगी है , परन्तु संघ लोक सेवा आयोग की कई परीक्षाएं अनुत्तरिण होने के बाद राजीव अपने गाँव वापस लौट आया है .
फिल्म का दूसरा मुख्य किरदार शंकर पाण्डेय जो एक संघर्षशील, स्वाभिमानी एवं नव स्नातक युवा है और असम के गुवाहाटी में रेलवे भर्ती बोर्ड की परीक्षा के दौरान बुरी तरह पीटा जा चूका है .
तीसरा पात्र चंचल स्वाभाव ,निर्मल दिल और स्वप्निल भोजपुरी गायक, नाम है "जींस" , जो आज कल के प्रचलित भोजपुरी गायकों की तरह नाम और पैसा कमाना चाहता है ,जो फूहड़ता पर कटाक्ष नजर आता है.
तीनों पात्र अपने - अपने दशा और दिशा सँवारने की कोशिश कर रहा है ,किन्तु आर्थिक तंगी, बेरोज़गारी, भ्रष्ट तंत्र व्यवस्था ,सामाजिक विषमता ,लुट ,हत्या ,अपहरण अपने प्रदेश से पलायन करने पर मजबूर तथा राज्य के बाहर अन्य प्रदेशों में बिहारी होने का अपमान पीड़ा सहने की लाचारी .
तीनों पात्र अपनी अपनी स्थिति -परिस्थिति सुदृढ़ करने के लिए मेहनत तो करता है ,लेकिन सरकारी तंत्र व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्ट्राचार ,देश में भाषावाद -प्रान्तवाद का भेदभाव ,गाँव समाज में बाहुबलियों का दबंगई ,जातिगत नरसंहारों की काली छाया ,लड़कियों की शादी-विवाह में दहेज़ प्रथा की मार ऊपर से मंगली दोष जैसे अन्धविश्वास को तबज्जो से परेशानी ,नक्सलवाद का फलना फूलना इत्यादि समस्याओं के चलते कैसे युवा पीढ़ी काविल ,शिक्षित ,मेहनती,इमानदार एवं कुछ करने की ज़ज्बा रखते हुए भी उदासीन सरकार का बेलगाम शासन के आगे बेचारापन एवं बद्द से बद्दतर ज़िन्दगी जीने पर मजबूर युवा पीढ़ी जुर्म का रास्ता अपना कर अपनी ज़रूरतों को पूरा करने की कोशिश करता है ,लेकिन जुर्म तो जुर्म होता है ,मसलन एक सुन्दर सपनों को साकार करने के बजाय सलाखों के पीछे जुर्म की सजा कटनी पड़ती है ,नतीजा वह न घर का होता है, न घाट का, "देसवा "इन तमाम समस्याओं को परिभाषित करने मे सफल है .
फिल्म के अंत मे बिहार वर्ष २००३ -०४ से बाहर निकल कर २००५-०६ मे आती है ,और एक नया बिहार ,सुदृढ़ ,समृध औरर सुशासन का राज कायम प्रतीत होता है ,या यूँ कहें की वर्तमान बिहार मे नितीश सरकार को श्रेय दे रहा हो....,जिसे देख कर संतोष ,सुकून एवं सकारात्मक आशाओं का भाव महसूस किया जाता है .
फिल्म के मध्य प्रेम -प्रसंग को भी स्थान दिया गया है ,आज के भोजपुरी अश्लील गानों पर व्यंग और संयुक्त परिवार मे बेरोज़गारी के वज़ह से आपसी कलह को बेबाकी से चित्रण किया गया है .
देसवा मे शत -प्रतिशत (लगभग) कलाकार बिहार के ही हैं ,जिनका कला कौशल किसी मज़े हुए कलाकारों से कम नही दिखती ,फिल्म की अधिकांश शूटिंग भी बिहार के ही विभिन्न स्थानों पर की गई है ,जो पटकथा के अनुकूल है ....

Saturday, November 7, 2009

दरअसल :फेस्टिवल सर्किट में नहीं आते हिंदी प्रदेश

-अजय ब्रह्मात्‍मज

कुछ समय पहले इंदौर में एक फिल्म फेस्टिवल हुआ था। वैसे ही गोरखपुर और लखनऊ में भी फेस्टिवल के आयोजन होते हैं। भोपाल से भी खबर आई थी। अभी दिसंबर में हरियाणा के यमुनानगर में फेस्टिवल होगा। ये सारे फेस्टिवल स्थानीय स्तर पर सीमित बजट और उससे भी सीमित फिल्मों को लेकर आयोजित किए जाते हैं। स्थानीय दर्शक, फिल्म प्रेमी और मीडिया के छात्रों के उत्साह का आकलन ऐसे फेस्टिवल में जाकर ही किया जा सकता है। फिर भी हिंदी प्रदेशों के फेस्टिवल राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित हो रहे फेस्टिवल सर्किट में शामिल नहीं किए जाते। अक्टूबर में दिल्ली में ओसियान फेस्टिवल हुआ। गुलजार, विशाल भारद्वाज, इम्तियाज अली और अनुराग कश्यप की फिल्मों के विशेष उल्लेख के साथ उनकी सराहना की गई। साथ में विदेशों से लाई गई फिल्में भी दिखाई गई। निश्चित ही दिल्ली के फिल्म प्रेमियों को लाभ हुआ होगा। अक्टूबर के अंतिम हफ्ते में मुंबई में मामी फिल्म फेस्टिवल हुआ। एक बड़ी कंपनी ने इसे प्रायोजित किया। पुरस्कारों की रकम बढ़ा दी गई। ऐसा माना जा रहा है कि अगर उक्त कंपनी का संरक्षण मिलता रहा, तो अपनी पुरस्कार राशि की वजह से मामी फेस्टिवल एशिया का महत्वपूर्ण फेस्टिवल हो जाएगा, क्योंकि पहली फिल्म के निर्देशक और निर्माता को मोटी रकम दी जा रही है।

नवंबर के अंत में गोवा में इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल होगा। यह भारत सरकार का अधिकृत फिल्म फेस्टिवल है। पिछले कुछ वर्षो से इसे गोवा शिफ्ट कर दिया गया है। उम्मीद थी कि गोवा के समुद्रतटों की वजह से भारत सरकार का इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल दुनिया भर के सिने प्रेमियों का प्रिय डेस्टिनेशन बन जाएगा, लेकिन वह लक्ष्य पूरा नहीं हो सका। अच्छे थिएटर और उचित व्यवस्था के अभाव में इस फेस्टिवल में दर्शकों की रुचि कम होती जा रही है। मुंबई गोवा से अधिक दूर नहीं है, फिर भी मुंबई से हिंदी फिल्मों के निर्देशक और कलाकार इस फेस्टिवल में जाने की नहीं सोचते।

इसी प्रकार कोलकाता और तिरुअनंतपुरम इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल भी लोकप्रिय हैं। पहले इन सारे फेस्टिवल में फिल्मों का पैकेज लगभग समान होता था। इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के लिए मंगवाई गई फिल्में ही सभी फेस्टिवलों में जाती थीं। अब कोशिश यह होती है कि फेस्टिवल के खंडों को देश-विदेश की फिल्मों और फिल्मकारों के आधार पर स्पष्ट रूप से विभाजित कर दिया जाए। हर फेस्टिवल का खास फोकस रहे। इसमें कामयाबी भी मिल रही है। दूसरी तरफ यह जरूरी भी है, क्योंकि सुनिश्चित फेस्टिवल नहीं होंगे, तो उनके दर्शकों में भी कमी आएगी। साधारण और रेगुलर फिल्में तो इन दिनों डीवीडी पर आसानी से उपलब्ध हैं।

इस पृष्ठभूमि में फेस्टिवल के प्रति हिंदी प्रदेशों के सरकार, संस्थान और फिल्म प्रेमियों की निष्क्रियता देखकर निराशा होती है। हिंदी प्रदेशों में सिने संस्कृति विकसित नहीं हो रही है। न फिल्म देखने का रिवाज है और न फिल्म दिखाने की प्रथा। आज भी हिंदी प्रदेशों में फिल्म देखना किशोर और नौजवानों के बिगड़ने के पहले लक्षण के रूप में देखा जाता है। हिंदी प्रदेशों से निकले फिल्मकार, कलाकार और तकनीशियन मुंबई और दूसरे शहरों में अपने प्रोफेशन में इतने व्यस्त रहते हैं कि अपने इलाकों की तरफ ध्यान नहीं दे पाते। उन पर खुद हिंदी प्रदेश ही गर्व नहीं करते। क्या उत्तर प्रदेश सरकार ने विशाल भारद्वाज और अनुराग कश्यप या झारखंड सरकार ने इम्तियाज अली को सम्मानित करने का निर्णय लिया या बिहार ने ही अपने कलाकारों की कभी सराहना की? अगर हिंदी प्रदेश के राज्यों में फिल्म फेस्टिवल के आयोजन हों तो सिने सक्रियता बढ़ेगी और फिल्मों की समझ विकसित होगी। सिनेमा के तिरस्कार से हम इस क्षेत्र में पिछड़े हुए हैं और पिछड़ें रहेंगे। हमें सिनेमा की संस्कृति पर ध्यान देना होगा। तभी हिंदी प्रदेशों में नई प्रतिभाएं मुखरित होंगी।


Tuesday, August 11, 2009

हिन्दी टाकीज:काश, लौटा दे मुझे कोई वो सिनेमाघर ........ -सुदीप्ति

हिन्दी टाकीज-४५
चवन्नी को यह पोस्ट अचानक अपने मेल में मानसून की फुहार की तरह मिला.सुदीप्ति से तस्वीर और पसंद की १० फिल्मों की सूची मांगी है चवन्नी ने.कायदे से इंतज़ार करना चाहिए था,लेकिन इस खूबसूरत और धड़कते संस्मरण को मेल में रखना सही नहीं लगा.सुदीप्ति जब तस्वीर भेजेंगी तब आप उन्हें देख सकेंगे.फिलहाल हिन्दी टाकीज में उनके साथ चलते हैं पटना और सिवान...
bबिहार के एक छोटे से गाँव से निकलकर सुदीप्ति ने पटना वूमेन'स कॉलेज और जे एन यू में अपनी पढ़ाई की है। छोटी-छोटी चीजों से अक्सरहां खुश हो जाने वाली, छोटी-छोटी बातों से कई बार आहत हो जाने वाली, बड़े-बड़े सपनों को बुनने वाली सुदीप्ति की खुशियों की चौहद्दी में आज भी सिनेमा का एक बहुत बड़ा हिस्सा मौजूद है।जितनी ख़ुशी उनको इतिहास,कहानियों,फिल्मों और मानव-स्वभाव के बारे में बात करके मिलती है, उससे कहीं ज्यादा खुश वो पटनहिया सिनेमाघरों के किस्सों को सुनाते हुए होती हैं. झूठ बोलकर या छुपाकर ही सही, खुद सिनेमा देखने बिहार में सिनेमाघर में चले जाना, बगैर किसी पुरुष रिश्तेदार/साथी के, साहस और खुदमुख्तारी को महसूस करने का इससे बड़ा जरिया भला और क्या हो सकता था उनके लिए तब...
बढ़ती उम्र, बदलते सिनेमाघर
हम दो छोटे-छोटे शब्दों का इस्तेमाल अक्सर करते हैं--एक शब्द है मज़ा और दूसरा मस्ती। मेरे लिए अगर इनका कोई मायने है तो वह सिनेमा से अभिन्न रूप से जुडा हुआ है।
ज़िन्दगी में मैंने चाहे जितने 'मज़े' किये, उनमें से नब्बे फीसदी फिल्मों की वजह से किये। आज अगर मैं किसी को कहती हूँ कि एक ज़माने में हमने भी खूब 'मस्ती' की है तो उस वक़्त कहीं न कहीं दिमाग में वो ही दौर रहता है जो ग्रेजुएशन के समय में हमारे छोटे से 'गैंग' ने फिल्में देखते हुए गुजारा।
सिनेमा मेरे लिए पैशन है....था भी...और शायद रह भी जाये...., पर वो बात अलग थी; कैसे?
चलिए बात शुरू से ही बताती हूँ।
मेरा पहला सिनेमाघर
चलती हुई कहानी देखने का मेरा सबसे पहला अनुभव तब का है, जब मैं अपने माँ-पापा के साथ एक बार सिवान के मशहूर सिनेमाघर 'दरबार हॉल' में फिल्म देखने गयी थी। जिस पहली फिल्म की धुंधली-सी छाया आज तक बनी हुई है, वो है 'राम तेरी गंगा मैली'। माशाअल्लाह...! शुरुआत ही ऐसी थी; पर मैं सिनेमा के शौकीन अपने माँ-पापा के पास से पढ़ाई के लिए अपनी नानी के घर चली आई। सिवान जिले के महाराजगंज प्रमंडल के पकवलिया नामक गाँव में।वहां से फिल्म देखने तो किसी के 'ले जाने' पर ही जाया जा सकता था. दिक्कत यह कि मामा लोग तो बाहर रह कर पढाई करते थे, अब हमें फिल्म कौन ले जाये? तभी घर में टी. वी. का दाखिला हुआ. वो रामायण-महाभारत का ज़माना था. सिनेमा न सही, टी. वी. ही सही- की तर्ज पर बचपन में टी. वी. से चिपकने की मेरी आदत हजारों लानतें सुनकर भी नहीं सुधरी.
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जब मैं आठवीं में आई तो मेरे फ्रेंड्स महाराजगंज के ही छोटे से हॉल में जा कर फिल्मे देखते थे, पर प्रोफेसर साहब की नातिन के रूप में शहर भर में मेरी जो पहचान हो गयी थी (जिसके चलते उस छोटे से शहर में दूर से ही मेरी साईकिल तक पहचान ली जाती थी) उसे देखते हुए कभी मैंने 'रिस्क' नहीं लिया!दूरदर्शन पर जिन सैकड़ों फीचर फिल्मों को देख-देख मैंने खुद को दिलासा दिए रखा,उनमें बावर्ची ,कटी पतंग,अराधना,अभिमान जैसी फिल्में भी होती थीं,जो आस-पड़ोस के लोगों के साथ हॉउसफुल जाती थीं और सूरज का सातवाँ घोड़ा जैसी फिल्म भी होती थी, जिसे देखने बैठे घर के लोग भी एक-एक कर उठ जाते और मौसी बार-बार कहने लगती कि- "टी।वी. बंद कर दो, बैटरी बचेगी तो कल 'रिपोर्टर' (धारावाहिक) देखा जायेगा". मैं रुआंसी हो उसकी तरफ देखती और जब विज्ञापन (उस समय हम प्रचार कहते थे) आता तो बंद कर देती, पर प्राण तो उस बुद्धू बक्से में ही कैद रहते! सो मिन्नतें करती कि बीच-बीच में देख सकूँ. आज तक सूरज का सातवाँ घोड़ा उन्हीं छोटे-छोटे टुकडों में ही दिमाग में कैद है; जबकि अच्छे से देखी हुईं कई फिल्में गायब हो चुकी है. इसे अच्छे सिनेमा का प्रभाव भी कह सकते हैं या मेरे सिनेमा-प्रेम का जिद्दी रूप भी. खैर,मेरा पहला सिनेमाघर टी.वी. ही था, जिसने सिनेमा के प्रति मेरे लगाव को जिलाए रखा.
किशोर उम्र और असली सिनेमाघर की डगर
अपनी मुकम्मल याददाश्त में हॉल में देखी पहली फिल्म है- बंजारन, जो पटना के चाणक्या या एलिफिस्टन सिनेमा हॉल में मेरी पसंद से प्रकाश आचार्य जी ने दिखाया और संजीव-संदीप को मन मार कर देखना पड़ा। दरअसल हम तीनों अपने स्कूल की क्वीज़ टीम में पटना गए थे और पहला स्थान हासिल किया.क्वीज़ के दौरान नब्बे फीसदी जबाब मैंने दिए तो मेरी पसंद की फिल्म देखना तय हुआ. उन्हें तो फिल्म में क्या मज़ा आया होगा! अच्छा तो प्रकाश आचार्य जी को भी क्या खाक़ लगा होगा!! पर मेरी खातिर सबने देखी. और मुझे बंजारन ही इसलिए देखनी थी, क्योंकि उसमें मेरी फेवरिट हिरोइन श्रीदेवी थी. चाँदनी और चालबाज़ से लेकर नगीना तक सारी फिल्में मैं दशहरे के दौरान और शादियों के सीज़न में चलने वाले विडियो पर देख चुकी थी.
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थोडा अवांतर तो है,पर एक मजेदार बात बताने से मैं अपने को रोक नहीं पा रही हूँ। उन दिनों किसी की बारात में या तो 'नाच' होता था (बिहार का खास लौंडा नाच) या किसी पैसे वाले शौकीन के यहाँ 'बाई जी का नाच'. नये-नए पर विडियो का चलन बढ़ रहा था.नाच में मुझे कुछ खास मज़ा नहीं आता था. वो मेरी परिष्कृत हो चुकी रूचि को थोड़ा भोंडा प्रतीत होता, पर विडियो देखने तो गर्मियों की दुपहर में सबके सो जाने पर झूना (जो गोली के खेल में मेरा गेम पार्टनर हुआ करता था ) के साथ खूब गयी हूँ. बचपन में मेरे लिए अच्छी बारात वही होती थी, जिसमे विडियो आए और शादी का बेस्ट समय वह,जब गर्मी की छुट्टियों में स्कूल बंद हो.मेरे लिए उस समय वीडियो सिनेमाघर से कमतर के बदले बढ़कर था.जा कर देख लेने की सहूलियत तो उसमें थी ही,नई-नई फिल्में भी देखने को मिलतीं थीं.ये दोनों सहूलियतें मेरे शहर के सिनेमाघर से जुडी हुई नहीं थीं. उन दिनों को याद कर मैं भी सिनेमा देखने की अपनी ललक के लिए रेणु जी के इन शब्दों को दुहरा भर सकती हूँ......
'तेरे लिए लाखों के बोल सहे' ;-)
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वो मेरे बोर्ड एक्जाम के दिन थे, जब हमारे शहर में हम आपके हैं कौन फिल्म लगी थी।उन दिनों वहां फिल्में रिलीज होने के साथ नहीं,बाद में लगा करती थीं. परीक्षा के ही दौरान मैंने पापा से जिद्द शुरू कर दी.वो मेरी चचेरी बहन (जिसका एक्जामिनेशन सेंटर भी महाराजगंज ही था) को सेंटर ले जाने-घर लाने के लिए मेरी नानी के यहाँ ही रह रहे थे.पापा ने टालते हुए कहा- अच्छा पहले परीक्षा दे लो. परीक्षा ख़त्म हुई तो वे चले गए, पर 'हम आपके हैं कौन' तो सुपर-डुपर हिट फिल्म थी और दरबार में आधी सीटें लेडिज थीं और यह फिल्म पूरी तरह पारिवारिक-सामाजिक थी; सो लोग अपने परिवार की औरतों को खूब दिखा रहे थे. इसलिए भी अगले कुछ महीनों तक यह लगी ही रही और जब एक-आध माह के अंतराल पर मेरे पापा आये तो मैंने उन्हें इमोशनली ब्लेकमेल करना शुरू किया.पापा सोच रहे होंगे कि कहाँ इसे ले जाऊँ और कहाँ बिठाऊंगा.लेडिज सीट पर भी अकेले बिठाने का ख्याल उन्हें तब आ भी कैसे सकता था? तो उन्होंने कहा कि अगर तुम्हारी मौसी चलेंगी तो तुम्हें ले चलेंगे. अब मौसी को मनाने का काम था जो ज्यादा मुश्किल नहीं पड़ा, क्योंकि वो भी सिनेमा की शौकीन थी. इस तरह सिवान के दरबार सिनेमा हॉल में हम आपके हैं कौन वह दूसरी फिल्म रही, जिसे मैंने दसवीं (के इम्तहान के समय) की उम्र में हॉल में देखा और जाहिर सी बात है कि सलमान को देखना अच्छा लगने लगा. आज उम्र के दरिया से काफी पानी बह जाने के बाद (और बौद्धिक स्तर पर समझदार कहलाने के बाद भी) किसी भी बहस में ये साबित कर सकती हूँ कि सलमान को क्यों देखा जाना चाहिए तो कच्ची उम्र के उस लगाव के कारण ही. कुछ नहीं है उसमें तो कम से कम दर्शनीय चेहरा और सुन्दर शरीर तो है. आखिर हमारी अधिकांश हीरोइनें भी तो इनमें से एक भी होने पर सालों-साल चल जाती हैं. इस फिल्म ने और एक कमाल किया. इसे देखने से पहले तक मैं माधुरी दीक्षित को बहुत नापसंद करती थी.सिर्फ इसलिए कि मेरी फेवरिट श्रीदेवी थी,जिसे मैं पागलों की तरह पसंद करती थी... तो ज़ाहिर सी बात है की माधुरी मुझे कैसे पसंद हो? आज मैं भी अपनी वैसी पसंद पर हँस सकती हूँ /हंसती हूँ, पर तब हालत ये थी कि जैसे स्टेफी ग्राफ के किसी प्रशंसक ने मोनिका सेलेस को चलते मैच में छुरे से घायल कर दिया था, वैसे ही मैं माधुरी दीक्षित को चलती फिल्म में मार डालने का हिंसक भाव रखती थी. खैर, इस फिल्म ने मुझे माधुरी को पसंद करना तो नहीं, पर स्वीकार करना सिखा दिया.
असली सिनेमाघरों वाला मेरा हसीन शहर
१०वीं के बाद की पढ़ाई के लिए मैं पटना आ गयी। उसी शहर में,जहाँ के सिनेमाघर की शक्ल मेरी यादों में बहुत लुभावनी थी. मेरा मौसेरा भाई पटना में कोचिंग करता था. एक दिन वो मेरे हॉस्टल आया और बोला,"चल,तुझे घुमा कर लाते है". मैंने आंटी से पूछा तो उन्होंने हाँ कह दिया. हम बाहर गए तो उसने पूछा, 'कहा चलेगी'? मैंने कहा, 'फिल्म'. उसने बताया कि रीजेंट यहाँ का सबसे अच्छा हॉल है और वहां DDLJ लगी है. हम वही देखने गए. ६ बजे का शो मिला और जब हम देखने लगे तो मेरे भाई ने बताया कि इस फिल्म में काजोल उसे अच्छी लगी है. थोडी देर में जब मेरे ख्वाबों में... गाना शुरू हुआ और काजोल छोटी-सी सफ़ेद ड्रेस में बारिश में भींग -भींग नाच रही थी तो उसने अपनी सीट पर पहलू बदलते हुए कहा कि, "यहाँ नहीं,सेकेंड हाफ में अच्छी लगती है". उस समय की उसकी लाचारी पर आज हंसी आती है. खैर,रीजेंट (सिनेमाघर) और DDLJ (सिनेमा) दोनों मुझे पसंद आये.साथ ही इस रहस्य का पता चला कि स्पेशल क्लास दरअसल सबसे सस्ता वाला क्लास होता है.भाई ने जैसे मेरा इम्तिहान लेते हुए पूछा था- किस में देखोगी? स्पेशल, बी.सी., डी.सी.- देख मैंने स्पेशल कहा था. तब उसने बताया कि वो सबसे बेकार होता है. इसी के साथ यह भी पता चला (और जान कर मेरा मुंह खुला रह गया) कि डी.सी. की कीमत मात्र १२.५०रु. है. अचानक मुझे लगने लगा कि तब तो ५००रु. की अपनी पॉकेट मनी में मैं चाहूँ तो सारी फिल्में देख सकती हूँ.
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खैर, इंटर(11th-12th) में जिस हॉस्टल में थी,वो मेरी चाची के परिचितजन का था और वहां ज्यादातर स्कूली बच्चे रहते थे,सो उस दौरान मोना,अशोक,रीजेंट आदि में जो फिल्में मैंने देखीं,वो अपने पापा के पटना आने पर जिद्द करके या चाची की मेहरबानी से उनके परिवार के साथ। इस दौर की फिल्में हैं खामोशी- द म्यूजिकल, इश्क़, दिल तो पागल है आदि. खामोशी-द म्यूजिकल पापा ने दिखाई जो मेरे दिमाग पर लम्बे अरसे तक छाई रही. 'बांहों के दरमियाँ ... ' गाने से तो सलमान और अच्छा लगने ही लगा,साथ ही साथ मनीषा कोइराला मेरी नयी पसंद बनी.आज जब अपनी पसंद को एनालाइज करती हूँ तो लगता है कि मुझे पूरी तरह औरत दिखने वाली हिरोइनें पसंद आती थीं और हीरो...(?) ॥पहली शर्त तो गुडलुकिंग होना है ही. देवानंद, धर्मेन्द्र, विनोद खन्ना, अमिताभ से लेकर हृतिक और इमरान खान तक मुझे अच्छी शक्ल वाले हीरो ही पसंद आते रहे है. जिंदगी में तो हम गुण देखते ही हैं, रुपहले परदे पर रूप ही क्यों न देखा जाये! हालाँकि इसकी एक गड़बडी है. सभी लड़कियों को पसन्द तो सलमान,आमिर,शाहरुख,हृतिक वगैरह हीरो ही आते हैं, पर रियल लाइफ में ऐसा भी होता है कि एक्स्ट्रा के रूप में भी नहीं चल पाने जैसे लड़के से तालमेल बिठानी पड़ती है. क्योंकि हमारे यहाँ शादियों में लड़के की शक्ल नहीं,अक्ल भी नहीं, आय देखी जाती है. जिसे अमिताभ जैसा छः फुट्टा पसंद हो, उसकी हालत सोचिये- जब उसे ५फ़ुट का दूल्हा मिले? खैर, अपना समाज तो विडंबनाओं से भरा समाज है ही!इस पर नया क्या रोना!!!
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हॉस्टल में रहने की असली आज़ादी मिली बी।ए. पार्ट-I में, जब मैं पटना विमेंस कॉलेज के पीछे के हॉस्टल पीटर विला में रहने लगी. यह अब भी नागेश्वर कालोनी में है.जो भी माँ-बाप अपनी व्यस्तता के चलते विमेंस कॉलेज हॉस्टल के सख्त नियम- कायदों का पालन नहीं कर सकते,पर अपनी लड़कियों को ज्यादा सुरक्षित और कड़े प्राइवेट हॉस्टल में रखना चाहते थे,उनके लिए पीटर विला से बेहतर कुछ नहीं होता था. इसी हॉस्टल में रिंकी और रश्मि के साथ मेरी जो तिकड़ी बनी,वो IIIrd year आते-आते फिल्म देखने में उस्ताद हो गयी.
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पहली फिल्म का दृश्य :
सिनेमा हॉल :अशोक
फ़िल्म : जब प्यार किया तो डरना क्या,
शो : दोपहर १२ से ०३ बजे यानी noon show।
करीब पच्चीस लड़कियाँ तरह-तरह से तैयार और फिल्म के बारे में बातें करते हुए... मैं सकपकाई हुई... चारों तरफ देखती हुई कि कहीं कोई मेरा परिचित तो नहीं है.... तब तक ढेर सारे लड़के देखने, समझने और टिकेट पा लेने की जुगत में! मुझे कभी इससे घबराहट नहीं हुई,पर उन लड़कों की हरकतों पर जब-तब गुस्सा जरुर आ रहा था और मैं अपने साथ खड़ी पूनम से कहने लगती- यार, सलमान की आँखें इतनी खूबसूरत हैं तो वह गोगल्स क्यों पहनता है?
दरअसल बी।ए।-पार्ट I (इको आनर्स) की लड़कियों ने तय किया कि जब प्यार किया तो डरना क्या लगी है और इसे ग्रुप में देखना है. डिपार्टमेन्ट की सबसे कम उम्र मैम को भी मनाया ,पर आखिर में उन्होंने दगा दे दिया.मैंने अपनी लोकल गार्जियन (चाची) से पूछा; क्योंकि तब डर बना रहता था कि पटना में रहने वाले दसियों रिश्तेदार देख कर चुगली मत खाएं . पर चाची ने चलताऊ ढंग से टाल दिया (भाई,दूसरे की लड़की!कुछ हो हवा गया तो रिस्क किसका?), पर उनके इसी ढंग ने मुझे शह्काया कि जब इन्हें मतलब ही नहीं तो पूछने से क्या फायदा ? और उस समय मोबाईल और फोन तो इतने थे नहीं कि हर बार पापा से पूछ सको! तो अब मैं बेखौफ तो नहीं,पर डर के बावजूद फिल्में देखने जाने लगी. इस तरह पहली फिल्म देखी 'जब प्यार किया तो डरना क्या'. बड़े-से परदे पर जब सलमान और अरबाज आते,हम सब जोर से चिल्लाते. इसी फिल्म और हॉल में मैंने पहली बार सीटी बजायी और चुपचाप देखने के बजाय हल्ला -गुल्ला करते हुए फिल्म देखने का मज़ा पाया.और फिर यह हॉल 'अशोक' अब मेरा पसंदीदा सिनेमाघर बन गया;क्योंकि यहाँ लड़कियों को स्पेशल प्रिविलेज मिलता था.कैसे? अभी बताती हूँ.
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अशोक में डी।सी., बी.सी. में टिकट पहले लड़कियों को मिलता था. अगर बच जाये तो ही लड़कों को. अब होता ये था कि लड़के लाइन में खड़ी लड़कियों से खूब निहोरे (request) करते थे. उनमें से कोई -कोई दया दिखाते हुए उनका पैसा लेकर टिकट ले देती,पर मैंने कभी इसका समर्थन नहीं किया.एक तो ये गलत था,साथ ही अगर उनका टिकट हम लेंगे तो वो हमारे बगल में बैठ जायेंगे और फिल्म के बीच ऐसे अवांछित तत्वों को कौन झेले!...और हॉल के कर्मचारी भी मना करते थे कि यह ठीक नहीं है.बाद में आप लोगों को ही परेशानी होगी तो मत कहियेगा.अशोक के अलावा पटना के जिन सिनेमाघरों में हम खूब गए,वो हैं- उमा, रीजेंट, वीणा, रूपक, रीजेंट, मोना. एलिफिस्टन. यहाँ तक कि अप्सरा में भी एकाध बार चले गए.यही शुकर था कि हम हॉस्टल में रहते थे और हमारे वापस लौटने की अपर लिमिट ३.३०p.m. तय थी.इसी वजह से हम दानापुर और दीघा के हॉल से वंचित रह गए!
हमारी तिकड़ी और इन सिनेमाघरों के किस्से
सबसे पहले उमा।
इसमें हमारे गैंग (मैं,रश्मि और रिंकी तो 'आजीवन सदस्य' थे, बाकी घटते-बढ़ते रहे, 2 से 8-10 की संख्या तक) ने बंधन नामक फिल्म देखी। दो रिक्शों में लद के हम पहुंचे १०.३० बजे सुबह.यहाँ एक जरुरी बात बता दूँ- हम १२ से ३का noon show ही देख सकते थे.किसी कारण से क्लास कैंसिल हो जाये तब या उबाऊ पढ़ाने वाली मैम की क्लास बंक कर या अच्छी फिल्म हो तो यूँ भी क्लास छोड़कर फिल्म देख सकते थे पर हॉस्टल किसी कीमत पर ३.३० तक लौट कर खाना खा लेना होता था,वरना पेशी हो जाती. उमा कदमकुआँ में है जो बोरिंग रोड स्थित हमारे हॉस्टल से काफी दूर था.पर उस समय मैं दिल्ली से बंधन के रिलीज की खबरें दिल्ली टाईम्स में पढ़ के गयी थी और टीम लीडर थी तो ये फिल्म देखनी ही थी. १०बजे के करीब हम लोग उमा पहुँच चुके थे. दरअसल नून शो की टिकट तत्काल ही मिलती थी. मैटनी शो की तो एडवांस में मिलती,पर नून की नहीं. करेंट बुकिंग १०.३० से होता था और ५ मिनट में जितनी हो जाये,उसके बाद ब्लैक कर देते. तो हमें ठीक १०.३० बजे पहुचने से क्या फायदा,अगर हम लाइन के शुरू के ५-७ लोगों में नहीं हो!फिर तो ब्लैक से देखना ही पड़ता. अब १२.५० की टिकट ३० रुपये में कौन खरीदना चाहेगा? इसलिये हम ९ से १० के बीच हॉल जाकर टिकट खिड़की पर खड़े हो जाते. लगभग हर हॉल में हमें टिकट १०.३० से १०.४० के बीच मिल जाती. अब समस्या रहती कि बचा हुआ टाइम कैसे खपाया जाये, तो हमने पटना के मंदिर,दरगाह और म्युजियम की खाक़ खूब छानी.इसलिए भी हमें अशोक पसंद था कि वहां से हम बिना रिक्शा का पैसा खर्च किये हनुमान मंदिर में समय गुजार सकते थे.अशोक में फिल्म देखना सबसे सस्ता और सुविधाजनक था. इसलिए 3rd year में तो हमने शायद ही कोई फिल्म वहां छोड़ी होगी. १२.५० रुपये की टिकट+१० रुपये रिक्शा भाड़ा ( एक आदमी के आने-जाने का ) ,यानी कम-से-कम २२.५० में हम एक फिल्म देख सकते थे.
खैर,उमा भी इस मायने में अच्छा था कि दूर होने की वजह से यहाँ किसी परिचित के आने की सम्भावना कम थी और अन्दर में बैठ कर इंतज़ार करने के लिए काफी जगह थी।वहां हम टिकट लेने के साथ ही अन्दर जा सकते थे. इस फिल्म में भी हम १०.३० में अन्दर चले गए और गप्प हांकने लगे. उमा काफी बड़ा हॉल था.अशोक से डेढ़ गुना बड़ा तो होगा ही. इसलिए यहाँ पर दूसरी जगहों की अपेक्षा देर से आने पर भी टिकट मिल जाती थी.कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि दूसरी जगह टिकट नहीं मिलने पर हम यहाँ आने की सोचते थे और वहां जाने पर आसानी से टिकट मिल जाता था.उमा का स्क्रीन बहुत बड़ा था,लेकिन आवाज कुछ खरखराहट के साथ आती. फिर भी ये हमारा सेकेंड फेवरेट हॉल था.उमा में जाने की एक और वजह थी-सलमान की फिल्में ज्यादातर उसी हॉल में लगती थीं. उमा में देखी सबसे यादगार फिल्म है- तक्षक. गोविन्द निहलानी की इस फिल्म को समीक्षकों ने भलें ही उतना नहीं सराहा हो, पर हमारे लिए यह उत्कृष्ट फिल्म थी.राहुल बोस का अभिनय लाजवाब था. पर फिल्म आने से पहले ही रंग दे गाने पर रिंकी और रश्मि ने हमारे हॉस्टल डे पर जो डांस किया था,उसका मुकाबला फिल्म में स्टिफ तब्बू नहीं कर पाई.और उमा में ही देखी सबसे वाहियात फिल्म थी-हेल्लो ब्रदर जिसे देखते हुए हम बीच से ही उठ कर जाने को तैयार थे.
अशोक में एक से बढ़ कर एक अनगिनत फिल्में देखी हैं हमने। दिल तो पागल है और इश्क़ तो अपनी लोकल गार्जियन के साथ देखी,पर अपने गैंग के साथ हम दिल दे चुके सनम, ताल, गाडमदर , फायर, हे राम, जख्म जैसी यादगार फिल्में यहाँ देखीं और आज भी इस हॉल मुरीद हूँ. इसमें कुछ और भी फिल्में (जैसे फिर भी दिल है हिदुस्तानी भी ) देखीं, पर वो सब उल्लेखनीय नही हैं. अशोक की खासियत यही थी कि आज तक उसमें हमने ब्लैक से टिकट खरीद कर नहीं देखी.
एक बार हम जल्दी यानी ९ बजे पहुच गए। दो लाइनें देख यह सोचा कि एक तत्काल और दूसरी एडवांस बुकिंग की लाइन होगी. हमने टिकट लिया और चले अपने ठिकाने पर; मतलब हनुमान मंदिर.उस दिन तो एक फैमिली के साथ सत्यनारायण की पूजा में भी शामिल हुए. रस्ते में थे,जब मैंने टिकट देखा (टिकट, पैसा मेरे पास ही रहता था और लौट कर हिसाब भी मैं ही करती थी.सो एक दोस्त ने मेरा नाम ही मुनीम जी रख छोडा था).टिकट पर मैटनी प्रिंट था.मैंने रिंकी को दिखाया.उसने कहा कि-"चलो जो भी होगा ...ज्यादा से ज्यादा आज नहीं देख पाएंगे".हम जब हॉल पर पहुचे तो सच में गड़बड़ हो गयी थी,पर मैं कहाँ मानाने वाली थी? मैं हॉल के मैनेजर के पास गयी और अपनी समस्या सुनाई. उसने सुना और रहम खाते हुए तीन सीटों की व्यवस्था कर दी.
बाद के दिनों में बस हम तीन जने जाने लगे थे- मैं, रिंकी और रश्मि।तीनों अपना G.S. का क्लास कॉलेज के साइंस ब्लाक की जगह सिनेमा हॉल में करने लगे थे.हम तीनों रूममेट भी थे और बैचमेट भी,तो प्राइवेसी और यूनिटी खूब थी.बस एक-एक फिल्म मैंने और रिंकी ने और मैंने और रश्मि ने अकेले देखी थी. मैं कॉमन थी, मेठ जो थी! मुझे छोड़ वे जा ही नहीं सकते थे...आखिर टिकट कौन कटाता? ब्लैकेटियर से झगडा कौन करता??
अशोक की दूसरी यादगार घटना फायर फिल्म की है। यह माँर्निंग शो में लगी थी.जाना समस्या नहीं था. वह टिकट लेना और माँर्निंग शो के लोगों को झेलना हमारे हिम्मत का इम्तेहान था.जब हम नून शो के लिए खड़े होते थे,उस वक्त भी माँर्निंग का जो क्राउड निकलता था,वो वाहियात होता था.खैर, फिल्म तो देखनी ही थी. आज भी कोई मुझे देख मेरी उम्र के बारे में गफलत में आ सकता है.ये तो १० साल पहले की बात है.टिकट लेने को और कोई राजी नहीं था.हमारे बहुत प्रयत्नों के बाद भी हॉस्टल से और लड़कियों में सिर्फ ११वीं की एक बेवकूफ किस्म की लड़की तैयार हुई थी. कहाँ तो हम सोच रहे थे कि बड़े ग्रुप में आ कर हम शर्मिंदगी से बच सकेंगे, कहाँ सिर्फ चार लड़कियाँ!! हॉल पहुँच कर सुकून मिला कि इस माँर्निंग शो में ढेर सारे अंकल लोग आंटियों के साथ आये थे.टिकट खिड़की पर पहुँच मैं बहुत गंभीर बनते हुए और ये बोलते हुए आगे बढ़ी कि अगर टिकट नहीं देगा तो हम कालेज का आई कार्ड देंगे. कैसे नहीं देगा?जैसे ही अपनी बारी आई,मुंह से निकला-"अंकल प्लीज चार टिकट दे दो". उसने सर उठा ऊपर से नीचे तक देखा, दो सेकेंड सोचा फिर बोला, "ये अडवांस की लाइन नहीं है." मैंने झेपते हुए कहा, "हमें फायर देखनी है." उसे पता था कि यह प्रचलित अर्थों में 'मॉर्निंग शो' की फिल्म नहीं है और टिकट दे दिया. साथ साथ इस बात का ख्याल भी रखा कि हमारी सीट बुजुर्गों/सयाने लोगों के बीच में हो ...so nice of him :)
फायर मूवी में ऐसा कुछ नहीं था,जिसके लिए इतना हल्ला मचा हुआ था। हमारे लिए हताश होने जैसी बात तो नहीं थी,बस दिमाग में सवाल कुलबुला रहा था.सबसे मजेदार बात यह थी कि जब नंदिता दास और जावेद जाफरी के बीच कुछ होने की गुंजाइश बनती दिखी तो उसकी शुरुआत में जोर की सीटी बजी,पर उससे ज्यादा प्रगाढ़ दृश्यों में पूरा हॉल स्तब्ध रहा.आज तक मैं समझ नहीं पाई कि ऐसा क्यों हुआ?
अशोक ही वो हॉल था,जहाँ हमने 'फर्स्ट डे,फर्स्ट शो' देखने की हसरत भी पूरी की।फिल्म थी हे राम और हमें ये अंदाजा था कि पटना में इसके लिए मारामारी तो नहीं होगी. बस, अपन पहुँच गए 'फर्स्ट डे,फर्स्ट शो' की फैंटेसी पूरी करने. इसी फिल्म के बाद मैं रानी को पसंद करने लगी. इसमें गला काटने वाला दृश्य हमने आँखे खोल कर देखीं और लौट कर खाना नहीं खा पाए. इस फिल्म के प्रेम-दृश्य अद्भुत थे.बाद में जब नदी के द्वीप पढ़ा तो वे दृश्य बार बार स्मृति -पटल पर उभर रहे थे.प्रेम के क्षणों में कविता बुदबुदाना... , यह तो नदी के द्वीप में अद्भुत रूप में है.आज भी अशोक बहुत याद आता है.
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रीजेंट वाकई अच्छा हॉल था।उसकी बुराई बस यही थी कि वहां टिकट ब्लैक कर देते थे. कभी लड़-झगड़ कर तो कभी ब्लैक में ही टिकट खरीद यहाँ भी हमने खूब मस्ती की. हम साथ साथ है - देखने तो लगभग पूरा होस्टल ही चला गया था. इसमें हमने हर टिकट पर बस दस रुपये ज्यादा दिए थे. फिल्म ख़त्म होने पर वो भी खल रहा था और हॉस्टल की एक लड़की ने ऐसी हरकत की कि कुछ लड़कों ने नागेश्वर कालोनी तक हमारा पीछा किया. इसी हॉल मे कुछ कुछ होता है देखने आठ लोग गए थे और ये पहली फिल्म थी,जिसे हमने ५० रुपये में और वो भी स्पेशल क्लास में बैठ कर देखा.टिकट नहीं मिल रहा था तो मेरी एक दोस्त ने कहा कि चलो दूसरी जगह छोटे मिया-बड़े मिया लगी है, वही देख लेते है.पर मैं गोविंदा की फिल्म नहीं देखना चाहती थी और पूजा कि छुट्टी में घर जाने से पहले सब ये फिल्म देख लेना चाहते थे.सो हमने ब्लैक में और स्पेशल क्लास में देखी ही. हमारी दो सीनियर लड़कियाँ जो आपस में गहरी दोस्त थीं , इस फिल्म को देखते हुए इतनी बुरी तरह रोने लगीं कि बगल में बैठा आदमी घबरा ही गया.इन अनुभवों के बाद हमने तय किया कि अब अपने छोटे ग्रुप में जाएँगे. बड़े ग्रुप में मज़ा और प्रॉब्लम दोनों ज्यादा है. कोई काम करने तो बढ़ता नहीं, बस फायदा सबको चाहिए.अब हम फिल्म का प्रोग्राम सोते समय बनाते और लौट कर बताते कि देख आये है.
रीजेंट से जुडी दो मधुर यादे भीं हैं---सरफ़रोश देखने मैं और रिंकी बस दो लोग गए थे। फिल्म जब रिलीज हुई थी तो हमारी छुट्टियाँ थीं और जब वापस आये तब तक हट चुकी थी, पर डिमांड इतनी कि दुबारा लगाना पड़ा. हमारी तो मुराद पूरी हो गयी मानों. लगभग सबने देख रखी थी, सो हम दो ही गए. आज तक इस एडवेंचर का अहसास बहुत मजेदार है कि बस दो लड़कियों ने जाकर फिल्म देख ली. इससे बड़ा फिल्म संबन्धी एडवेंचर मेरे पास यही है कि दिल्ली के पी.वी.आर.प्रिया हॉल में नाइट शो में बस एक लड़की के साथ कारपोरेट फिल्म देखी. पर तब तक मैं J.N.U. में शोध छात्रा थी और प्रिया कुछ ख़ास दूर भी नहीं है.बस १.४५में जब हॉल से बाहर सड़क पर थे, तो जल्दी से ऑटो मिल जाए- इसी की कोशिश में लगे थे. खैर,अभी रीजेंटकी बात. हम लोग अक्सर सेकेंड डे पहला शो देखा करते थे, क्योंकि G.S. की क्लास शनिवार को होती थी और उसमें अटेंडेंस नहीं होता. फिल्में शुक्रवार को रिलीज होतीं और हम शनिवार बिना नागा पहुँच जाते. एक ही शुक्रवार को रिलीज हुई फिर भी दिल है हिदुस्तानी और कहो ना प्यार है. दोस्तों ने हम........का मन बनाया,लेकिन मुझे तो शाहरुख पसंद नहीं. पहले उसे बन्दर कहती थी बाद में पता चला कि बन्दर कहना रेसिस्ट होना है,तब से छोड़ दिया. अब मैं अपनी पसंद के कारण नहीं जाने का तर्क नहीं दे सकती थी. क्यों??? दोस्त बड़े कमीनें थे,याद दिला देते कि कौन-कौन सी फिल्में उन्होंने सिर्फ मेरी पसंद से देखी थी,सो मैंने तर्क दिया- शाहरुख की फिल्म है तो पहले हफ्ते भीड़ होगी तो क्यों ना दूसरी वाली देख ली जाये? बात में दम था और हम रिक्शे पे सवार हो पहुँच गए रीजेंट. भीड़ थी, पर उतनी नहीं. लड़कियों की लाइन में हम ५वे नंबर पे थे. टिकट मिल गयी. बीच का टाइम बिताने के लिए हम पटना मार्केट गए. रीजेंट गांधी मैदान के पास है वहां से हम पटना मार्केट या रेस्टोरेंट ही जाते थे. जब हॉल में घुसे तो हमें फिल्म के बारे में कुछ पता नहीं था और ज्यादा उम्मीद भी नहीं थी,पर जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ रही थी मज़ा आ रहा था.एक लड़का तो पागलों जैसा चिल्ला रहा था,"साला शहरुखवा अब गया". इंटरवल तक तो हम रोमांचित हो उठे कि वाह क्या फिल्म है! इंटरवल के बाद और मज़ा आया, यह देख कि अब क्यूट हृतिक की जगह हैण्डसम हृतिक है. और ढर्रे पर चली आती डबल रोल वाली बात भी नहीं है.ये फिल्म हमने दुबारा देखी थी,ठीक एक महीने बाद.रूपक पता नहीं, है कि बंद हो गया. इसका रास्ता किसी गली से होकर जाता था.यह रीजेंट से काफी अन्दर था. हॉल की अच्छाई और सुविधाओं को देखते हुए तो यह एकदम बेकार था.इतना बेकार कि हम कभी यहाँ १० बजे तक जाने का नहीं सोचते थे.ज्यादा जल्दी जाते तो ११.१५ तक और हमेशा ब्लैक में ही फिल्में देखी यहाँ. अंदर जाने पर पता चलता था कि हॉल तो बहुत खाली है, पर टिकट कभी खिड़की पर नहीं मिली. हम कभी समय से गए भी नहीं, क्योंकि वहां से लौट कर कहीं जाना और दुबारा टिकट लेने जाना बहुत महंगा पड़ता. तो हम पिक्चर के टाइम से जाते और २०/३०या ४० में टिकट खरीद लेते. वहां मोल-तोल भी खूब होता था. अब सवाल तो यह है कि हम वहां जाते ही क्यों थे? दरअसल उस समय की लगभग सारी क्रिटिकली एक्लेम्ड फिल्में वही लगती थी.
रूपक में देखी यादगार फिल्में हैं अर्थ-1947, हु-तु-तू ,संघर्ष आदि। अर्थ-1947 से जुडी मजेदार घटना है.हम देर से पहुचे और ब्लैकेटिएर से रिक्वेस्ट करने लगे कि भैया हमें अच्छी जगह पर सीट देना (पता था कि फिल्म में 'सीन' है). उसने मुस्कुराते हुए जिस तरह से 'हाँ' कहा, हमें थोड़ा शक हुआ, पर उस दिन हम छः थे. सोचा, कोई नहीं, देखा जायेगा. हमें सीट तो साइड से ही मिली. छः के बाद एक् कपल था. लड़की हमारी तरफ बैठ गयी...और भी अच्छा...लेकिन ये क्या? फिल्म शुरू होने के दो मिनट पहले हमारे आगे हमारी ही उम्र के ५-६ लड़के आ कर बैठ गए. अब तो जो टेंशन शुरू हुई....उन लड़कों की आँखों में भी हमें देख एक मुस्कराहट आ गयी. खैर इतना डरते हमलोग तो हॉल हमारा दूसरा कालेज क्यों होता? अर्थ-१९४७ में राहुल खन्ना की एक साईकिल है. जैसे ही उस पर नंदिता को आगे बिठा वो ले जाता है, वैसे ही सामने वालो में किसी ने कहा,"अरे यार!मेरे मामा जी के पास भी ऐसी साईकिल है.आज समझ में आया, क्यों वे उसे छूने भी नहीं देते." ना चाहते हुए भी हमारी हंसी फूट पड़ी. हम जानते थे कि हँसना इनको बढावा देना है, पर रोक नहीं सके.अब तो उन लड़कों ने पूरी फिल्म के दौरान इतने मजेदार कमेन्ट किये कि फिल्म का मज़ा दोगुना हो गया. एक बानगी- नंदिता और राहुल के बीच एक रोमांटिक सीन है, कुछ physical closeness लिए हुए. उस सीन के पहले नंदिता रो रही थी और उसके बाद मुस्कुराती है. हमारी धड़कने भी खामोश थीं.हम मानो उस सीन के बीच से गायब हो जाना चाहते थे. तभी एक लड़के ने बहुत innocently दूसरे से पूछा," इसीलिए रो रही थी क्या?" उस टोन में कोई कमेन्ट नहीं था. हमारी हंसी दबी-दबी सी ही सही,पर निकल ही गयी.
मोना में भी खूब फिल्में देखी।हॉल ठीक ठाक था,पर रीजेंट के पास होने के कारण उसकी तुलना में थोड़ा बुरा लगता था. रीजेंट, मोना, एलिफिस्टन- तीनों आस-पास थे. किसी-ना-किसी में टिकट तो मिल ही जाता था.हमारा उस एरिया में जाना कभी बेकार नहीं हुआ.किसी- किसी बार तो हम सोचते कि तीनों लोग तीनों हॉल के पास जाएँ,चाहे जिसे टिकट मिल जाये;पर तब मोबाईल का जमाना नहीं था. हम एक-दूसरे को बताते कैसे, सो यह प्लान कभी हकीकत में नहीं बदला.मोना में हमने ऐश्वर्या की एक तरह से पहली फिल्म आ अब लौट चले देखी और पाया कि सुमन रंगनाथन उससे हॉट है.वो मेरी रिंकी का बर्थडे था,जब यह फिल्म हमने देखी. 9th फरवरी- आज तक याद है. मोना में ही हमने लगातार दो शो देखने का रिकार्ड बनाया- सत्या मोर्निंग शो में और नून शो में दिल से. परदे पर पानी पीती हुई मनीषा के गले के भीतर से पानी उतरता दिखाई दे रहा था और हमने मान लिया कि मनीषा ही हमारे समय की सबसे सुन्दर और versatile ऐक्ट्रेस है.वीणा वो आखिरी हॉल था,जहाँ हम फिल्म देखने जाते थे; बहुत मजबूरी में,जब किसी और हॉल में कोई चांस न हो.एक तो ये हॉल गन्दा था,दूसरे क्राउड वाहियात होता था.एकदम स्टेशन के पास था और रुकने की कोई जगह नहीं थी. जहाँ वेट करते थे,वो जगह एकदम सड़क पर लगती थी.देखी तो कई फिल्में यहाँ, पर याद नहीं रखीं.इसकी वजह वहां से निकलने के बाद का आफ्टर इफेक्ट था. एक-दो मज़ेदार वाकये वहाँ जरुर हुए. तब की बात है जब मन फिल्म रिलीज हुई थी. एक दिन RJD का बिहार बंद था.कॉलेज भी बंद था, क्योंकि रूलिंग पार्टी के बंद में कुछ खोलने की हिम्मत तो होती नहीं. लाइब्रेरी खुली थी.सिस्टर को बाहर से आना तो था नहीं कि वो बंद रहे?हमने तय किया कि कोई एक जाकर टिकट लेगा और हॉस्टल फ़ोन कर देगा कि क्लास चल रही है.अब मुझ-सा वीर बहादुर कौन जो जाकर टिकट ले और बाहर का माहौल देखे. मैं ८.३० बजे ही निकली, पर आंटी ने देख लिया और पूछा, "आज तो बंद है,कहाँ जा रही हो?" मैंने कहा, "लाइब्रेरी जा रही हूँ, वो बंद नहीं होगा और जल्दी जा रही हूँ कि कोई दिक्कत न हो." आंटी ने कहा, "ठीक है पर ध्यान रखना. मत ही जाओ तो अच्छा." मैंने कहा, "नहीं आंटी!जरुरी नोट्स बनाना है."इस तरह से मैं निकल गयी. सड़क से रिक्शा ले सीधे वीणा पहुंची. मुश्किल से ९ ही बजे होंगे.मैंने देखा कि लड़कियों की कोई लाइन नहीं लगी थी. मैं गयी और तीन टिकट मांगे. टिकट खिड़की पर बैठे आदमी ने मेरी तरफ देखा भी नहीं और दूसरों को टिकट देता रहा. मैंने थोड़ी देर में गुस्से से कहा कि "मुझे तीन टिकट दे दीजिये पहले." उस आदमी ने और अधिक गुस्से से कहा, "मोर्निंग शो का टिकट मिल रहा है यहाँ." मैं इतना अधिक सकपका गयी कि आगे कुछ पूछ भी नहीं पाई; क्योंकि सामने ही मोर्निग की फिल्म का पोस्टर लगा था- प्यासी जवानी. उस दिन तो लौट के बुद्धू घर को आये की तर्ज पर हम हॉस्टल लौट आये.अगली बार जब मन देखने गए तो और मजेदार घटना हुई.हम सुबह जल्दी ही गए और.टिकट लेने के लिए खिड़की खुलने का इंतजार कर रहे थे. सामने में एक दक्षिण भारतीय युवक था.हमने सोचा कि वो क्या समझेगा और कारू-कारू कह मजाक बनाने लगे.हमारा मकसद उसका अपमान करना नहीं था, बल्कि अपना मनोरंजन करना था. हम लोग कोई गोरे नहीं थे, पर हमारी बनिस्पत वो काला था और हमेशा हमारा मन ऐसे ही तो लगता था- अपरिचितों का आपस में मजाक बना. लेकिन वो 'कारू' शब्द समझ गया. जरुर उसकी भाषा में कारू से मिलता-जुलता काले का कोई पर्याय होगा.उसने आगे बढ़ हमसे कहा, "this is very bad.this is really bad to comment on color." आज भी मैं उसकी हिम्मत कि दाद देती हूँ कि किसी और प्रदेश में तीन लड़कियों को उसने टोका. पर हमें तो काटो तो खून नहीं. हम सभी का चेहरा लाल! हिम्मत बटोर कर रश्मि ने ही पहले कहा,"we did not mean that.we are just talking." तब तक मैं थोडी संभल गयी थी और उसे समझाना चाहा , "no, in our language karu means something else." उसने कहा, "no, i can understand little Hindi and I can sense things." वो दिल्ली में software engineer था और पटना किसी काम के सिलसिले में आया था.काम पूरा हो गया और रात की ट्रेन से उसे जाना था सो फिल्म के लिए आ गया था. मिडिल क्लास गिल्टी महसूस करते हुए हमने उसका टिकट लिया.१०.३५ से १२ बजे का समय बिताने और उसे पटना घुमाने के लिए म्युजिअम ले गए. एक रिक्शे पर हम तीनों और एक पर वो गया और दोनों का पैसा हमने दिया. म्युजिअम में रश्मि ही उसे घुमाती रही और मैं-रिंकी आपस में बुदबुदाते रहे कि अगर किसी ने इसके साथ देख लिया तो लेने के देने पड़ जायेंगे. अकेले फिल्म देखना तो समझ में आता है, पर इसको लेकर घुमाना? जैसे-तैसे फिल्म देखकर ख़त्म किया और इंटरवल में हमने कोल्ड ड्रिंक भी ख़रीदा,ताकि वो नहीं खरीद सके और हमें किसी और के पैसे का कुछ न लेना पड़े. फिल्म के अंत में उसने पूछा कि पूरे समय तो तुम्हीं लोगों ने खर्च किया, तो मेरे साथ लंच कर लो. हमने उसे बताया कि हमें ३.३० में हॉस्टल पहुँच जाना होता है. उसे लगा कि हम बहाना कर रहे हैं तो वो अपना शेयर देने लगा. मैं तो लेने ही वाली थी कि रश्मि की बच्ची ने मुस्कुरा कर मना कर दिया. पूरे टाइम मैं लड़ते आई कि हम उस कारू के ऊपर क्यों खर्च करें.हमारा बजट गड़बड़ा गया और उस महीने हमने एक फिल्म कम देखी.
इससे भी दिलचस्प बात हॉस्टल आकर पता चली कि उसने हमारा पता माँगा तो रश्मि ने दे दिया था।हमने उसे खूब डांटा...इतना कि वो डर गयी और कहने लगी,"मुझे लगा कि वो क्या लिखेगा? लेकिन अगर वो लिखता है तो मेरे नाम से ही लिखेगा. मुझसे ही तो बात हो रही थी सबसे ज्यादा". हमने चिढाया भी कि उस समय तो चिपक रही थी, अब क्या हुआ? जुलाई,१९९९ में ये घटना हुई थी.अगस्त तक हम डरे रहे, पर सितम्बर आते-आते भूल गए. अक्टूबर में पूजा की छुट्टियों में घर चले गए. एक दिन सुबह-सुबह जब मैं सो ही रही थी तो माँ ने पुकारा- "रूम में आओ".मैं अपनी कजिन के रूम में सोती थी. आते ही उसने उस लड़के/आदमी का नाम लेकर पूछा कि ये कौन? मुझे याद ही नहीं था.मैंने कहा- पता नहीं. माँ ने कहा तो तुम्हे चिट्ठी कैसे लिख दिया है? मैंने कहा- चिट्ठी?? माँ ने लिफाफा सामने कर दिया.ऊपर लिखा था- तो, Miss Rashmi,Rinki & Sudipti. अब तक मैंने हॉस्टल के अंकल को दसियों गालियाँ दी कि सबसे पहला नाम रश्मि का था,तो लेटर मुझे क्यों फारवर्ड किया? बाद में पता चला कि पोस्टल एड्रेस सिर्फ मेरा ही था उनके पास और रश्मि ने तो लाख-लाख शुकर मनाया; क्योंकि अगर उसके घर जाता तो उसके भैया उसे हॉस्टल से हटा ही लेते. लेकिन उस दिन मुझे अपनी माँ के सामने क्या-क्या झूठ नहीं बोलना पड़ा? कैसे मैं बची, मैं ही जानती हूँ. मेरे भोले पापा ही वो लेटर लाये थे, पर उन्होंने पढ़ा नहीं था.पढ़ा माँ ने था और फिल्म देखने की बात तो वो समझ ही गयी थी. मैंने कॉलेज फंक्शन में उसके गेस्ट होने की बात समझाई,जिसे पता नहीं माँ ने कितना सच माना, पर उसने देखा कि पत्र ज्यादातर रश्मि को ही संबोधित है.मेरा नाम बस संबोधन में ही है,तो वह थोडी निश्चिंत दिखी. लौट कर मैंने रश्मि को खूब हड़काया.दूसरी घटना: जब दिल क्या करे फिल्म रिलीज हुई,हम यह फिल्म अजय- काजोल की वजह से देखना चाह रहे थे. वीणा को नकारने के लिए हम अप्सरा में चले गए.अप्सरा गाँधी मैदान के दाहिनी तरफ है.कौटिल्य होटल के पीछे की एक गली से रास्ता जाता है.हम वहाँ पहली बार गए और पता चला कि शो आल रेडी हाउस फुल हो चुका था. जो शुद्ध झूठ था.खैर,मैंने कहा- चलो, वीणा चलते है.इससे तो बेहतर ही है.सबों ने कहा- छोड़ देते हैं आज, जब यहाँ नहीं मिल रहा तो अब वीणा पहुँच कर मिलेगा? मैंने कहा- चलो, देखते है.हम सब देर से गए और मैनेजेर से लड़ कर टिकट लिया.
पटना शहर के पटना विमेन'स कॉलेज में पढ़ते और पीटर विला में रहते हुए कमोबेश यही मेरी सिनेमाई दास्ताँ रही।आज भी संतोष इसी बात का है कि हमने कभी किसी लड़के या किसी सहेली के बॉयफ्रेंड से मदद नहीं ली, बल्कि अपने उद्यम से हर फिल्म देखी और किसी का पैसा भी अपने ऊपर नहीं खर्च करवाया, जिसके लिए लड़किया बदनाम रहती है :) !!!
आज भी इन यादों के साथ होठों पे मुस्कराहट इसलिए भी आ जाती है कि हम कभी बदनाम पटना शहर में भी छेड़खानी जैसी चीजों के शिकार नहीं हुए.उस दौर(१९९६-२०००) के पटना में कई दहशतनाक घटनाएं हुई थीं, जिससे हमारे माता-पिता डरे रहते थे,पर हम फिल्में देखने से कब बाज आने वालों में थे!!! और ऐसी कोई बुरी घटना भी नहीं घटी,जिससे आज भी हमारे मुंह का जायका बिगड़ जाये.... मुझे तो लगता है कि उन सिनेमाघरों की व्यवस्था ऐसी थी कि हम "लड़की होकर भी" वैसी-वैसी फिल्में और इतनी ढेर सारी (!) सम्मानजनक तरीके से देख सके.
पसंद की १० फिल्में-
१.कागज़ के फूल
२.सूरज का सातवां घोड़ा
३.मुगलेआज़म
४.खामोशी
खामोशी दी म्यूजिकल
६.अंगूर
७। सदमा
८.हम आपके हैं कौन
९.जब वी मेट
१०.अमिताभ बच्चन की लगभग हर फ़िल्म

Friday, May 8, 2009

हिन्दी टाकीज:बार-बार याद आते हैं वे दिन-आनंद भारती

हिन्दी टाकीज-३४
पत्रकारों और लेखों के बीच सुपरिचित आनंद भारती ने चवन्नी का आग्रह स्वीकार किया.उन्होंने पूरे मनोयोग से यह संस्मरण लिखा है,जिसमें उनका जीवन भी आया है.हिन्दी टाकीज के सन्दर्भ में वे अपने बारे में लिखते हैं...बिहार के एक अविकसित गांव चोरहली (खगड़िया) में जन्‍म। यह गांव आज भी बिजली, पक्‍की सड़क की पहुंच से दूर है। गांव भी नहीं रहा, कोसी नदी के गर्भ में समा गया। बचपन से ही यायावरी प्रवृत्ति का था। जैसे पढ़ाई के लिए इस ठाम से उस ठाम भागते रहे,उसी तरह नौकरी में भी शहरों को लांघते रहे। हर मुश्किल दिनों में फिल्‍मों ने साथ निभाया, जीने की ताकत दी। कल्‍पना करने के गुर सिखाए और सृजन की वास्‍तविकता भी बताई। फिल्‍मों का जो नशा पहले था, आज भी है। मुंबई आया भी इसीलिए कि फिल्‍मों को ही कैरियर बनाना है, यह अलग बात है कि धक्‍के बहुत खाने पड़ रहे हैं। अगर कहूं कि जिस जिस पे भरोसा था वही साथ नहीं दे रहे, तो गलत नहीं होगा। फिर भी संकल्‍प और सपने जीवित हैं। जागते रहो का राज कपूर, गाईड का देव आनंद प्‍यासा का गुरुदत्‍त, आनंद का राजेश खन्‍ना और अमिताभ बच्‍चन,तीसरी कसम के निर्माता शैलेंद्र, अंकुर और निशांत के निर्देशक श्‍याम बेनेगल जैसे लोगों को हमेशा अपने भीतर महसूस करता रहता हूं। उनसे संपर्क करना चाहें तो लिखें ... anandbharti03@gmail.com
संभवत: 63 की बात है जब मैंने बिहार-नेपाल सीमा से सटे शहर फारबिसगंज में पहली फिल्‍म देखी थी 'ग्‍यारह हजार लड़कियां'। उसके एक सप्‍ताह बाद ही पूर्णिया में दूसरी मगर पुरानी फिल्‍म देखने का मौका मिला 'प्‍यार की जीत'। मेरी उम्र तब बहुत छोटी थी। मुझे अच्‍छी तरह याद है कि इसके कुछ समय बाद पूर्णिया के रूपवाणी टॉकीज में 'गंगा की लहरें' के पोस्‍टर को देखकर मैं खो गया था। पोस्‍टरों ने मुझे एक मायावी दुनिया में पहुंचा दिया था। उसी दिन पहली बार जेहन में आता था कि क्‍या मैं फिल्‍में नहीं बना सकता। जवाब खुद ही मिला कि 20-22 की उम्र हो जाए तब सोचना। कुछ भी करने के लिए बंबई जाना पड़ेगा, जो तब किसी भी रूप में संभव नहीं था। 'प्‍यार की जीत' के बाद कुछ फिल्‍में और भी देखीं,लेकिन पढ़ाई को लेकर दिमाग पर इतना दबाव था कि ज्‍यादा सोच ही नहीं पाता था। मगर फिल्‍मी खबरों से साबका रोज पड़ता था। बिनाका गीत माला ने पहली बार फिल्‍म का ज्ञान दिया था। उसके बाद घर में आने वाले अखबार, सा‍हित्यिक और फिल्‍मी मैगजीन ने उस ज्ञान को और समृद्ध किया। पिताजी की दिलचस्‍पी राजनीतिक खबरों और साहित्‍य में थी, वह अ‍सर हम तीनों भाइयों पर भी आ गया। छोटे चाचा सा‍हित्‍य-प्रेमी थे,मगर वह उससे ज्‍यादा फिल्‍मों में दिलचस्‍पी रखते थे इसलिए फिल्‍मी खबरें उनसे सुनने को मिलती रहती थीं। हमारे परिवार में देव आनंद सबकी पसंद थे इसलिए देव साहब की तस्‍वीरें घर की दीवारों पर सबसे ज्‍यादा सटी मिलती थीं।
हम बिहार के ऐसे गांव में थे, जहां की आबादी बहुत घनी थी। हिंदू और मुसलमान बराबर की संख्‍या में थे। समृद्ध लोगों की भरमार थी। सात-आठ घरों में तब रेडियो हुआ करता था, जिनकी आवाज हमेशा गूंजती रहती थी। अकेला मेरा घर था, जहां ग्रामोफोन भी था। उस गांव में तब भी बिजली और सड़क नहीं थी और आज भी नहीं है। अब तो वह गांव रहा ही नहीं। कोसी नदी के गर्भ में समा गया। लोग टोलों की शक्‍ल में जहां-तहां रह रहे हैं। तब हर साल मेरा गांव चोरहली ही क्‍यों पूरा इलाका तीन महीने तक बाढ़ के पानी से घिरा और डूबा रहता था। निचले इलाके के लोग हमारे जैसे लोगों के बड़े घरों में आ जाते थे। मिलकर रहते थे। कोई अमीरी-गरीबी का भाव ऐसे समय में नहीं आता था। जीवन ऐसे चलता था जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो। मुसलमान परिवार बाकी लोगों के मुकाबले ज्‍यादा रूतबे वाले थे,क्‍योंकि उनके परिवारों के लोग कमाई के लिए कलकता, गौहाटी और बम्‍बई में जाते रहते थे। हम जैसे फिल्‍मी लोगों के लिए बंबई आने-जाने वाले ज्‍यादा महत्‍व रखते थे क्‍योंकि उनके पास दिलीप साहब, देव आनंद, राजकपूर, नरगिस, सुरैया, मीना कुमारी की मानो आंखों से देखी खबरें होती थीं। वे बखान इस कदर करते कि बंबई जाने की मेरी जिद को पंख लग जाते थे। उनके पहनने के कपड़े, बोलने की स्‍टाईल, हाव-भाव काफी आकर्षक होते थे। मैंने छठी-सातवीं में पढ़ते हुए कई बार उनके साथ भागने की बात सोच ली थी।
घर से भागा जरूर लेकिन घर में पढ़ाने वाले एक मास्‍टरजी के खिलाफ विद्रोह कर। चाहा था कि सीधे बंबई चला जाऊं। लेकिन मुझे उसका कोई अता-पता नहीं था। डेढ़ महीने तक बिहार, बंगाल के अपने रिश्‍तेदारों के यहां चक्‍कर काटता रहा। जब पैसे खत्‍म हो गए तब घर लौट आया। बंबई जाने का सपना अधूरा रह गया। सच कहूं तो भागने का रास्‍ता मुझे फिल्‍मों ने ही दिखाया था, लेकिन इस दौरान डेढ़-दो महीने में दो बड़ी उपलब्धियां हाथ लगीं। पहला यह कि गुरू रवीन्‍द्र नाथ ठाकुर के शांतिनिकेतन देख आया और दूसरा, यह कि हिंदी फिल्‍मों के साथ-साथ बंगला फिल्‍मों को देखने का रेकार्ड कायम कर लिया। भागलपुर, साहेबगंज, कहलगांव, पीरपैंती, कटिहार, पूर्णिया, कलकता और खास कर बिहार में पूर्णिया और कटिहार तो पूरा पूरा बंगाल ही लगता था। मैंने बंगला फिल्‍मों का जो फ्रेम देखा था, वह मेरे किशोर मन पर गहरा असर छोड़ा था। तभी जाना था कि सत्‍यजीत राय, ऋत्विक घटक, मृणाल सेन, संध्‍या राय, छवि विश्‍वास आदि राजकपूर, नरगिस, दिलीप कुमार, देव आनंद आदि से भी बड़े नाम हैं। इसी लोभ में अपूर संसार, पथेर पांचाली, विराज बहू, अपराजितो, अजांतिक सहित कई फिल्‍में देख लीं। तब एक बड़ा फर्क देखता था। बंगला फिल्‍में हिंदी के मुकाबले ज्‍यादा सीरियस होती हैं। सीधी सादी ढंग से कहानी चलती हैं। बंगला फिल्‍मों ने जो मेरे मन पर असर छोड़ा वह आज भी बरकरार है। बंगला फिल्‍मों ने ही मुझे बंगला उपन्‍यासकारों की तरफ आकर्षित किया। शरतचंद्र मेरे प्रिय लेखक बन गए। वैसा ही जीवन जीने का सपना भी देखने लगा था। कुछ हद तक जीया भी। मगर जो जीया, वह मेरे अंदर का ही भाव था। शरतचंद्र ने उसमें आवारगी को एक हिस्‍सा बना दिया।
फिल्‍में देखने का सिलसिला बाद में और भी तेज हो गया, जब वनसठवा हाई स्‍कूल को छोड़कर जवाहर हाई स्‍कूल, महेशखूंट आ गया। बड़े व्‍यावसायिक परिवार से था इसलिए पैसे की कभी कमी महसूस नहीं हुई। हाई स्‍कूल में हॉस्‍टल में रहने लगा। हॉस्‍टल का अनुशासन था मगर आजादी का अहसास भी था। वहां पढ़ते हुए अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में चिट्ठयां छपने लगी थीं। छोटी-छोटी बाल कथाएं तथा मिनी कविताओं को भी जगह मिलने लगी थी। एक तो पैसे का दबदबा और दूसरे पत्र-पत्रिकाओं में नाम छपने से मिल रही लोकप्रियता ने मुझे अचानक स्‍टार बना दिया था। स्‍कूल के सारे शिक्षक भी मुझ पर गर्व करते थे। प्रेमचंद, शिवपूजन सहाय, दिनकर जी, जानकी वल्‍लभ शास्‍त्री, कवि आरसी प्रसाद सिंह, महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद, पंत जी सहित उस समय के सारे साहित्‍यकारों पर लंबा-चौड़ा व्‍याख्‍यान देने की स्थिति में होता था। जरूरत पड़ने पर सिनेमा पर धाराप्रवाह बोलता था क्‍योंकि फिल्‍मी पत्रिकाएं हॉस्‍टल में छिप-छिप कर खूब पढ़ता था। इसी कारण लड़कियां मेरी दीवानी रहती थीं। वे मुझ में फिल्‍म एक्‍टर की छाया देखती थीं। लेकिन पढ़ने की आदत ने मेरे अंदर बैठे एक्‍टर को षडयंत्र के शिकंजे में ले लिया। वहां से एक्‍टर को हटाकर राइटर को बिठा लिया। गांव के नाटकों में की हुई अदाकारी पीछे घूटती चली गई। गांव में हर साल कानपुर से नौटंकी आती थी। लगभग 15-20 दिन तक चलती रहती थी। ऐसा कोई दिन नहीं जब नौटंकी में नहीं जाता था। नौटंकी के सारे आर्टिस्‍ट मुझे बहुत प्‍यार करते थे। उनके संवादों को नौटंकी से प्रेरित होकर मैंने पहले हाई स्‍कूल में और फिर कालेज में कई नाटक लिखे, जो खेले भी गए।
हाई स्‍कूल में आने के बाद शौक बदल गए। नाटक की जगह सिनेमा ने ले लिया। ट्रेन में विदआउट टिकट न जाने कितनी बार फिल्‍में देखने के लिए खगडिया, बेगूसराय, नौगछिया, गोगरी जमालपुर और कटिहार गया। यह साप्‍ताहिक कार्यक्रम बन गया। कभी-कभी सिनेमाघर में दो से तीन फिल्‍में भी देख लेता था। कोई-कोई सिनेमाघर ऐसा भी था जहां एक टिकट में दो फिल्‍में दिखाता था। वहीं से फिल्‍मों की कहानी के बारे में सोचने लगा। फिल्‍में देखना जुनून की तरह हो गया। 1971-72 में पूर्णिया कालेज में एडमिशन ले लिया। आरएसएस के बहुत सारे लड़के मेरे साथ पढ़ते थे। कालेज में मेरी अच्‍छी शक्‍ल-सूरत और साहित्यिक दिलचस्‍पी ने मुझे कालेज में सबका चहेता बना दिया था। मेरी यह छवि आरएसएस के लोगों को अच्‍छा नहीं लग रही थी। वे मुझे गंभीर बनाना चाहते थे तथा जिम्‍मेदार भी। इसलिए वे किसी भी तरह मुझे पकड़ना चाहते थे। मैं उनकी बातों में आ गया और खुद को अपने सांचे से अलग हटाकर उनके सांचे में डाल दिया। यह भी षडयंत्र ही था। मेरे दोनों बड़े भाई तब नाराज भी हुए थे। इसलिए कि बड़े भैया मार्क्‍सवादी थे और मंझले भाई लोहियावादी, इंटरमीडियट के बाद हिंदी ऑनर्स ले लिया। जितने भी लेक्‍चरर थे, सबने समझाया कि साहित्‍य तक ही रहो तो ज्‍यादा ठीक है। सिनेमा को उसी नजरिए से देखो मगर मैं संघ के जाल में फंस गया। विद्यार्थी परिषद का नाम संभाल लिया। आंदोलन स्‍वभाव बन गया। सिनेमा देखना हालांकि तब भी कम नहीं हुआ, मगर संघ के प्रचारकों से यह बार-बार तोहफा मिली कि नौजवानों बच्‍चों पर क्‍या यही छाप छोड़ोगे? जब 1974 का आंदोलन में 1975 की इमरजेंसी में राजगीर समांतर लेखक सम्‍मेलन से जिस दिन गुलाबबाग (पूर्णिया) लौटा, उसी दिन पुलिस ने मुझे रात में होटल में खाना खाते समय गिरफ्तार कर लिया।
काफी समय बाद जेल से छूटने पर मैंने सबसे पहला काम किया वह फिल्‍म देखना था। बहुत दनों बाद लगा कि अपनी पुरानी जगह पर वापसी कर रहा हूं। उस दौरान बार-बार सोचा कि इमरजेंसी पर फिल्‍म बनाने जैसी कोई कहानी अवश्‍य लिखूंगा। जेल में मेरे साथ ज्‍यादातर आरएसएस तथा सर्वोदयी लोग थे। कुछ मार्क्‍सवादी और नक्‍सलवादी समर्थक थे। इनके साथ घंटों बहस चलती रहती। हर रात जेल में सामूहिक बहस का कार्यक्रम रखा जाता था। जब बहस के लिए विषय कम पड़ने लगते तब मेरे सुझाव पर फिल्‍मों को बहस का केंद्र में ले आया गया। सारे क्रांतिकारी लोग ध्‍यान से फिल्‍मों के बारे में सुनते थे। तब देशभक्ति वाले गीतों में साथ-साथ फिल्‍मी गीत भी खूब गाए जाने लगे थे। फिल्‍मी बातों से हर आदमी का छुपा हुआ चेहरा परत-दर-परत खुलने लगा था। हर किसी के पास फिल्‍में देखने का अनुभव था। फिल्‍मों ने उन्‍हें प्रेम-मुहब्‍बत का मतलब और तरीका भी सिखाया था। तब मेरे गहरे मित्र बने चुके मार्क्‍सवादी नेता चंद्रकांत सरकार (जो अब इस दुनिया में नहीं हैं) ने शायद व्‍यंग्‍य में कहा था कि जीवन इतना रंगीन भी होता है, मुझे कभी पता ही नहीं चला।
बहरहाल जिस दिन मैं जेल से छूटा था, अपने दोस्‍तों, परिवारों से मिलने के बाद सीधे सिनेमाघर का रास्‍ता पकड़ा था। यह काम मैं अमूमन हर परीक्षा के दौरान पहले भी करता रहा था। पेपर देकर निकलता और सीधे सिनेमा देखने चला जाता। 1976 में बी. ए. का एग्‍जामिनेशन सेंटर कटिहार पड़ा था। हर दिन शाम को फिल्‍म देखने जाता था। साथी-संगी कहने लगे कि सिनेमा मेरी कमजोरी है जब कि मैं मानता था कि वही मेरी मजबूरी है। पटना विश्‍वविद्यालय से एम. ए. करने गया। पढ़ाई के समांतर सिनेमा को रखा। वह मेरे खाली समयों का ही नहीं, व्‍यस्‍त क्षणों का भी साथी बना रहा। तब तक दिल और दिमाग का भी दायरा बड़ा हो चुका था।
लेकिन एक बात मेरे अंदर आज भी बैठी हुई है कि सिनेमा सिर्फ मनोरंजन का नहीं, बदलाव का भी माध्‍यम है। यह बेचैनी मुझे मथ रही है कि सिनेमा को आज के फिल्‍मकार ही हल्‍के तौर पर लेते हैं जब कि समाज उसे गंभीरता से लेता रहा है। पहले वो खास तौर पर बंगाली फिल्‍मकारों ने सिनेमा को कथात्‍मक और सामाजिक ऊंचाइयां दीं, जबकि पंजाबी फिल्‍मकारों ने उसे सिर्फ व्‍यवसाय का साधन बना दिया। यही वजह है कि उनकी फिल्‍में मिक्‍स वेजिटेबल हो जाती है।
सिनेमा का असर क्‍या होता है, यह तमिलनाडु में मैंने खुद भी देखा था। हिंदी विरोध के नाम जो सबसे पहला कदम उठता गया वह हिंदी फिल्‍मों के प्रदर्शन पर रोक का था। वर्ष 1966-67 की बात है जब डा. लो‍हिया हिंदी की तरफदारी कर रहे थे और उधर बंगाल में किसी कारण हिंदी का विरोध हो रहा था। मेरे दादा जी के छोटे भाई कलकते में रहते थे। उनकी मृत्‍यु संभवत: 1966 में हो गई थी। मेरे दादाजी अपने साथ श्राद्ध कर्म में भाग लेने के लिए मुझे भी कलकता ले गए थे। वहां काफी दिनों तक रहने का मौका मिला। मगर ऊब इसलिए गया था कि थियेटरों में हिंदी फिल्‍मों के के प्रदर्शन पर रोक लगा दी गई थी। कुछ मामला ठंडा हुआ तो कुछ भोजपुरी फिल्‍मों को चलाने की इजाजत दे दी गई। मैं भोजपुरी नहीं जानता था लेकिन भोजपुरी फिल्‍मों को देखना भी मेरे लिए 'मदर इंडिया' और 'आन' देखने जैसा था। अपनी रिश्‍तेदारों के साथ कुछ बंगला फिल्‍में भी देखीं।
1981 में एम.ए. की परीक्षा देकर पटना से सीधे दिल्‍ली चला गया। यह एक बड़ी गलती थी। तब पटना से मेरे दो मित्र आलोक रंजन और सुमन सरीन बम्‍बई के लिए चल चुके थे। हम तीनों फिल्‍मों के शौकीन थे। लेकिन पढ़ाई के दौरान कई पत्रिकओं के लिए पालीटिकल रिपो‍र्टिंग करता था, उसी ने मुझे दिल्‍ली जाने के लिए बाध्‍य कर दिया था। कई छोटे-छोटे पत्रों में काम किया। मगर लक्ष्‍य था टाइम्‍स ग्रुप में जाने का। 1982 के शुरू में टाइम्‍स डेली के लिए फाइनेंस्‍ट इंटव्‍यू देने बंबई गया। सोचकर गया था कि बंबई में तय करूंगा कि फिल्‍म पत्रकारिता करती है या राजनीतिक। मगर सारी उम्‍मीदों पर झटका लग गया। इटरव्‍यू अच्‍छा हुआ लेकिन जनसंघी होने का आरोप तब के नभाटा के संपादक आनंद जैन ने इस तरह लगा दिया कि धर्मवीर भारती के बीच-बचाव के बावजूद मेरा चयन नहीं हुआ। हम दोनों दिल्‍ली लौट गए। लेकिन जब तक बंबई में रहे, थियेटरों के छक्‍के छुड़ा दिए। फिल्‍में नहीं देखी सिर्फ सिनेमाघरों के चेहरे देखे। इसलिए सपने अगर साकार होंगे तो उसके गवाह थियेटर ही बनेंगे। खुद में ख्‍वाजा अहमद अब्‍बास, सलीम-जावेद, अली राज, नवेंदु घोष आदि को देखने लगा था।
एक जो अहम बात है, उसकी चर्चा के बिना सब कुछ अधूरा लगेगा। बचपन से लेकर हाई स्‍कूल तक जितनी भी फिल्‍में देखीं - वह यादगार इसलिए भी है क्‍योंकि कभी भी शांति से टिकट नहीं मिला। ग्रुप में जाता था और पूरी मस्‍ती लेता था। सीटों पर रूमाल या गमछा रखकर कब्‍जा करता था। सीटी भी बजाता था लेकिन जिम्‍मेदारी के साथ। आज वैसा दृश्‍य मुंबई में नवरंग जैसे थियेटर में देखने को मिलता है जहां भोजपुरी फिल्‍में दिखाई जाती हैं। लेकिन इस सीटी और उस सीटी में फर्क है।
पहले की वह युवा हूं कि देव आनंद मेरे प्रिय एक्‍टर रहे हैं। मुझे तब रोमांटिक एक्‍टर और रोमांटिक कहानियां बहुत पसंद थी। वैसे सबसे ज्‍यादा प्रभावित हुआ राज कपूर से और फिर गुरु दत्‍त से। दिलीप कुमार मेरी पहुंच से काफी दूर रहे। हां, राजेश खन्‍ना की अदा मुझे अच्‍छी लगती थी। इनकी 'आनंद' और 'आराधना' न जाने किती बार देखी होगीं। सबसे ज्‍यादा बार 'गाईड' देखी है। शायद 14-15 बार।द्य उसके बाद 'तीसरी कसम' को देखने का रिकार्ड तोड़ा। 'देवदास', 'आवारा', 'बरसात', 'याराना' , 'तेरे घर के सामने', 'राम और श्‍याम', 'हम दोनों', 'ज्‍वेल थीफ', 'मुगलेआजम', 'संगम', 'अंदाज', को भी बार-बार देखा।
सबसे बड़ी बात तो यह थी कि तब छोटे शहरों में रिक्‍शा, घोड़ागाड़ी पर फिल्‍मों की पब्लिसिटी होती थी। हम उसके पीछे-पीछे भी दौड़ते रहते थे। गानों के बीच-बीच में एनाउंसर की आवाजें दूर-दूर तक गूंजती रहती थीं। पोस्‍टर देखना भी फिल्‍म देखने से कम नहीं लगता था। सिनेमा को लेकर मेरे घर में न जाने कितनी शिकायतें लोगों ने मेरे बड़ों में की होंगी, मगर मुझे परिवार से हल्‍की झिड़की के अलावा कभी बड़ी डांट नहीं मिली। इसलिए कि सिनेमा की समझ रखने वाले सारे लोग थे।
एक ऐसा दौर भी आया था जब व्‍यावसायिक सिनेमा के मुकाबले मुझे समांतर, प्रयोगधर्मी, कलात्‍मक फिल्‍में ज्‍यादा पसंद आने लगी थीं। वह पसंद आज ज्‍यादा मजबूती के साथ बरकरार है। सई परांजपे, श्‍याम बेनेगल, मुजफ्फर अली, सथ्‍यू की दृष्टि को सलाम करता था।
मगर सबसे ज्‍यादा सलाम तब के गीतकारों, संगीतकारों और गायकों को करता था जिनके गानों के कारण फिल्‍में हिट हुआ करती थीं। फिल्‍मों को लोग देखें, गाने सबसे ज्‍यादा प्रेरित करते थे।

पसंद की फिल्‍में
1 अंकुर
2 शोले
3 बाइड
4 प्‍यासा
5 मुगलेआजम
6 बरसात
7 आनंद
8 तीसरी कसम
9 लगान
10 कागज के फूल

Wednesday, January 14, 2009

पटना के सिनेमाघरों में मैं फिल्म क्यों नहीं देखूंगी ... अंजलि सिंह

अंजलि सिंह का यह लेख मुंबई से प्रकाशित द फिल्म स्ट्रीट जर्नल के पेज - १३ पर 1-7 जुलाई, 2007 को प्रकाशित हुआ था.चूंकि इस लेख में पटना के सिनेमाघरों की वास्तविकता की एक झलक है,इसलिए इसे चवन्नी में पोस्ट किया जा रहा है.उम्मीद है कि इस पर ब्लॉगर दोस्तों का सुझाव मिलेगा। हम अंजलि सिंह के आभारी हैं कि उन्होंने इस तरफ़ इशारा किया.

आम तौर पर फिल्म देखने जाना एक खुशगवार अनुभव माना जाता है। लेकिन मेरे और मेरे शहर की दूसरी लड़कियों के लिए फिल्म देखने जाना ऐसा अनुभव है, जिसे हम बार-बार नहीं दोहराना चाहतीं। मैं पटना की बात कर रही हूं। पटना अपने पुरुषों की बदमाशी के लिए मशहूर है। जब भी मैंने पटना के सिनेमाघर में फिल्म देखने की हिम्मत की, हर बार यही कसम खाकर लौटी कि फिर से सिनेमाघर जाने से बेहतर है कि घर मैं बैठी रहूं।
आप सोच रहे होंगे कि सिनेमाघर जाने में ऐसी क्या खास बात है? लेकिन पटना की लड़कियों को सिनेमा जाने के पहले 'कुछ जरूरी तैयारियां' करनी पड़ती हैं। वह परेशानी सचमुच बड़ी बात है।
कालेज के दिनों की बात है, तब मनोरंजन के अधिक साधन नहीं थे। मैंने अपनी दोस्तों के साथ फिल्म देखने जाने की योजना बनायी। हम पांच-छह लड़कियां थीं, फिर भी योजना बनाते हुए डर लग रहा था। कुछ दिनों तक असमंजस में रहने के बाद हम सभी ने सोचा कि चलो चलकर देखते हैं। बताने की जरूरत नहीं है कि बड़ा ही बुरा अनुभव रहा।
हम सिनेमाघर पहुंचे ही थे कि सभी पुरुषों की नजरें पलटीं। वे हमें ऐसे घूर रहे थे, जैसे हम आयटम गर्ल हों, जो अभी-अभी 'जिस्म' के सेट से निकलकर उनके मनोरंजन के लिए आ गयी हों। कुछ मर्दों का व्यवहार ऐसा था, मानो उन्होंने सिनेमा के बजाए हमें देखने का टिकट खरीदा हो।
हम थोड़ा आगे बढ़े तो क्या चीज है, छमिया, मस्त माल, क्या सेक्सी फिगर है जैसी फब्तियों की बारिश होने लगी। कुछ हिम्मत कर पास में आ गए और यह कहने की हिम्मत की, 'मैडम, हमारे साथ बैठ कर फिल्म देखो, ज्यादा मजा आएगा।' कुछ ने कहा कि 'असली हीरोइन और असली मजा तो यहां है।'
मानो इतना ही काफी नहीं था। उनके गंदे हाथ हमारे जिस्मों को छूने के लिए बढ़े। उस भीड़ से निकलते हुए दम घुट रहा था। जहां ज्यादातर हाथ हमारे शरीर की ओर बढ़ रहे थे। हालांकि हम सभी ने सलवान कमीज पहन रखी थी और दुपट्टा भी सलीके से डाल रखा था, लेकिन उनकी गंदी निगाहें हम पर ही टिकी रहीं।
हर जवान और देखने-सुनने में थोड़ी खूबसूरत लड़कियों को कभी-कभार छेड़खानी का सामना करना पड़ता है, लेकिन पटना में ऐसी घटनाएं ज्यादा होती हैं। डर से रोएं सिहर जाते हैं। इतने सारे पुरुषों के बढ़े हाथ और हमें छूने की उनकी कोशिश ने फिल्म देखने की ललक ही खत्म कर दी थी। उन सभी पर चिल्लाने के अलावा कोई चारा नहीं था। उन्हें डांटना जरूरी लगा। हालांकि कई बार इससे बात बिगड़ जाती है और वे आक्रामक हो जाते हैं, लेकिन उस दिन वे सभी थोड़े शांत हो गए।
जब हम अपनी सीट पर आ गए और सिनेमाघर में अंधेरा हुआ तो स्थिति बदली। इसके पहले कभी अंधेरा इतना फायदेमंद नहीं लगा था। आखिरकार हमें कोई घूर नहीं रहा था और कोई भी इतना पास नहीं था कि हमें छू सके या हम पर झुक सके।
फिल्म देखने के दौरान मैं उस डरावने अनुभव के बारे में सोचती रही। मन में यह घबराहट बढ़ती रही कि बाहर निकलते समय फिर से पुरुषों की भीड़ मिलेगी।
पटना में सिनेमाघर जाने के उस एक अनुभव ने मुझे लंबे समय तक सिनेमाघरों में फिल्में देखने से दूर रखा।
निस्संदेह पटना में लड़कियां फिल्में देखने सिनेमाघरों में जाती हैं। कुछ मामलों में वे अपनी सुरक्षा का इंतजाम कर जाती हैं। उस घटना के बाद हम सब भी तभी सिनेमाघर गए, जब हमारे साथ कोई न कोई पुरुष रहा। किसी बॉडी गार्ड के साथ फिल्म देखने जाने की बात अजीब लग सकती है, लेकिन सच्चाई यही है कि पटना में तीन घंटे के शांतिपूर्ण मनोरंजन के लिए यही एक तरीका है। सुरक्षा के लिए कोई रहे तो भी लड़कियां भीड़ की फब्तियों से नहीं बच सकतीं। हां, तब शारीरिक छेड़छाड़ नहीं होती।
निस्संदेह कुछ लड़कियां पटना में भी सिनेमाघरों में जाकर हर फिल्म देखती हैं। ऐसी लड़कियों को या तो बदतमीज भीड़ की आदत हो जाती है या वे उनकी परवाह नहीं करतीं।
अशोक और रिजेंट जैसे कुछ सिनेमाघर लड़कियों के लिए सुरक्षित है। क्योंकि उन थिएटरों के प्रबंधक लोगों को दुर्व्यवहार से रोकते हैं। चूंकि इन सिनेमाघरों में ज्यादातर बड़ी फिल्में रिलीज होती हैं और दर्शकों में ज्यादातर परिवार के साथ आए लोग या कालेज के छात्र रहते हैं, इसलिए लड़कियां छोटे समूह में जाकर भी फिल्म देख लेती हैं। लेकिन इन सिनेमाघरों में भी 'मर्डर' या 'वो लम्हे' जैसी बोल्ड फिल्में लग जाती हैं तो लड़कियों का सिनेमा घर आना मुहाल हो जाता है। मर्दों के मन में यह गलत धारणा है कि ऐसी फिल्म देखने के लिए आई लड़कियां तो छेड़खानी और परेशानी के लिए तैयार होकर आती हैं।
चूंकि पटना के सिनेमाघर लड़कियों के लिए 'यौन उत्पीडऩ केंद्र' बन गए हैं, इसलिए अगर अधिकांश लड़कियां घर में बैठ कर टीवी या वीसीडी/ डीवीडी के जरिए फिल्में देखती हैं तो कोई आश्चर्य नहीं।
सिनेमा स्थानीय प्रशासन के लिए परीक्षण की चीज है। अगर दिन की रोशनी में सिनेमाघरों में जाने पर ऐसी परेशानी और छेड़छाड़ हो सकते हैं तो सूर्यास्त के बाद सार्वजनिक जगहों पर लड़कियों को किस नरक से गुजरना पड़ता होगा?

Wednesday, October 15, 2008

पटना के रिजेंट सिनेमाघर में दो दिनों में तीन फिल्में

रिजेंट सिनेमाघर का टिकट (अगला-पिछला)


पटना का गांधी मैदान … कई ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह रहा है। गांधी मैदान के ही एक किनारे बना है कारगिल चौक। कारगिल में शहीद हुए सैनिकों की याद दिलाते इस चौराहे के पास एलफिंस्टन, मोना और रिजेंट सिनेमाघर हैं। मोना का पुनरूद्धार चल रहा है। कहा जा रहा है कि इसे मल्टीप्लेक्स का रूप दिया जा रहा है। अगर जल्दी बन गया तो यह पटना का पहला मल्टीप्लेक्स होगा। वैसे प्रकाश झा भी एक मल्टीप्लेक्स पटना में बनवा रहे हैं। पटना के अलावा बिहार और झारखंड के दूसरे जिला शहरों में भी मल्टीप्लेक्स की योजनाएं चल रही हैं। पूरी उम्मीद है कि अगले एक-दो सालों में बिहार और झारखंड के दर्शकों का प्रोफाइल बदल जाएगा। सिनेमाघरों में भीड़ बढ़ेगी और उसके बाद उनकी जरूरतों का खयाल रखते हुए हिंदी सिनेमा भी बदलेगा।
फिलहाल, 1 अक्टूबर की बात है। भोजपुरी फिल्म 'हम बाहुबली' का प्रीमियर रिजेंट सिनेमाघर में रखा गया है। रिजेंट में आमतौर पर हिंदी फिल्में दिखाई जाती हैं। उस लिहाज से यह बड़ी घटना है। यहां यह बताना जरूरी होगा कि बिहार से हिंदी फिल्में लगभग बहिष्कृत हो चुकी हैं। ताजा उदाहरण 'हम बाहुबली' का ही लें। 2 अक्टूबर को यह फिल्म 35 प्रिंट्स के साथ रिलीज हुई, जबकि 'द्रोण' और 'किडनैप' को कुल 20 स्क्रीन ही मिल सके। मुंबई में बैठे हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के पंडितों, ट्रेड विशेषज्ञों और निर्माता-निर्देशकों के कानों पर अभी जूं नहीं रेंग रही है, लेकिन यह आगामी खतरे का संकेत है। हिंदी फिल्मों का साम्रा'य डांवाडोल स्थिति में है। इस साम्रा'य से बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड जैसे क्षेत्र निकल रहे हैं। इन इलाकों में भोजपुरी फिल्में ही चलती हैं। जब से हिंदी सिनेमा ने विदेशों का रुख किया है, तब से उसके अपने दर्शक बिसूर रहे हैं। उन्हें हिंदी फिल्मों में अपनी धडक़न नहीं सुनाई पड़ती, इसलिए वे सिनेमाघरों में ही नहीं जाते। इन इलाकों में सफल रही पिछली हिंदी फिल्म 'विवाह' थी। हां, 'आपका सुरुर', 'जन्नत' और 'जाने तू या जाने ना' बिहार में पटना समेत अन्य शहरों में चलीं, लेकिन शहरी मिजाज की फिल्मों को दर्शकों ने देखना जरूरी नहीं समझा।
पटना के दर्शक बदल रहे हैं। पहले सिनेमाघरों में लड़कियां नाम मात्र की दिखती थीं। माना जाता था कि शरीफ घरों की लड़कियां अकेले सिनेमा देखने नहीं जातीं। इस बार लड़कियों के ग्रुप दिखे तो जवान जोड़े भी थे। जाहिर सी बात है कि वे कॉलेज से क्लास छोड़ कर आए होंगे। सिनेमाघरों में लड़कियों की बढ़ती तादाद सुखद ही कही जा सकती है। पटना जैसे शहरों में मध्यवर्ग और उ'चमध्वर्गीय परिवार के सदस्य सिनेमाघरों में नहीं जाते। वे घर पर ही पायरेटेड डीवीडी देख लेते हैं। घर पर डीवीडी देखना सस्ता, सुरक्षित और सुविधाजनक होता है। फिल्म की क्वालिटी से आम दर्शकों का अधिक मतलब नहीं रहता। पर्दे पर चल रही झिर-झिर तस्वीर काफी होती है। आवाज यानी कि साउंड गड़बड़ हो तो भी क्या फर्क पड़ता है …
ऐसा लगता है कि हिंदी प्रदेशों में लगभग एक सी हालत है। 'यादातर दर्शक सिनेमाघरों में नहीं जाते। सिनेमा देखने का संस्कार बदला है। इस बदलाव की एक वजह कानून-व्यवस्था भी है। चूंकि अधिकांश शहरों में महिलाओं की असुरक्षा बढ़ी है और सिनेमाघरों के दर्शकों का प्रोफाइल उजड्ड, बबदमाश और आवारा नौजवानों का हो गया है, इसलिए मध्यवर्गीय परिवार सिनेमाघरों से परहेज करने लगे हैं। बड़े शहरों और महानगरों के दर्शकों को छोटे शहरों के दर्शकों का डर समझ में नहीं आएगा। बात थोड़ी पुरानी हो गयी, लेकिन इवनिंग शो के बाद लड़कियों के अपहरण के किस्से तो पटना में सुनाए-बताए जाते रहे हैं। और फिर सिनेमाघरों की जो स्थिति है, उसमें जाने की हिम्मत कौन करे?
वैसे पिछले दिनों चवन्नी ने पटला के रिजेंट सिनेमाघर में दो दिनों में तीन फिल्में देखीं। पहली फिल्म 'हम बाहुबली' थी। प्रीमियर शो था। उस शो में फिल्म के निर्देशक अनिल अजिताभ के साथ मुख्य कलाकार रवि किशन,दिनेश लान निरहुआ,रिंकू घोष और मोनालिसा भी थे। प्रीमियर शो में बिहार के गर्वनर भी आए थे। अगले दिन चवन्नी ने रिजेंट में ही 'द्रोण' और 'किडनैप' देखी। एक ही सीट पर बैठ कर दो शो की दो फिल्मों का मजा ही कुछ और था। फिल्म के साथ चल रही दर्शकों की विशेष टिप्पणियों और सुझाव से फिल्म देखने का मजा बढ़ गया। चवन्नी को आश्चर्य नहीं हुआ कि दर्शक आने वाले दूश्य के साथ संवादो का भी सही अनुमान लगा रहे थे। क्या करें हिंदी फिल्मों का यही हाल है। दर्शकों के लिए कुछ भी अनजाना या नया नहीं रह गया है। अरे हां, चवन्नी यह बताना भूल रहा था कि 40 रूपए के टिकट में दो गर्मागर्म समोसे भी शामिल थे,जो ठीक इंटरवल के दस मिनट पहले सीट पर मिल गए थे। आप कोल्ट ड्रिंक लेना चाहते हों तो वह भी सीट पर मिल जाता है,लेकिन उसके लिए 14 रूपए देने पड़ते हैं। एक बात चवन्नी की समझ में नहीं आई कि सिनेमाघर का गेट सिफग् पांच मिनट पहले क्यों खुलता है? जब तक आप अपनी सीछ पर पहुचें और आंखें अंधेरे से एडजस्ट करें कि फिल्म शुरू हो जाती है।
यह तो हुई पटना में फिल्म देखने का ताजा अनुभव। चवन्नी चाहेगा कि आप भी अपने शहरों के सिनेमाघरों की स्थिति और दर्शकों के बदलते प्रोफाइल पर लिखें। पता तो चले कि फिल्मों के प्रति हिंदी समाज का क्या रवैया है?

Tuesday, May 27, 2008

एगो चुम्मा...पर हुआ विवाद

ख़बर पटना से मिली है.चवन्नी के एक दोस्त हैं पटना में.फिल्मों और फिल्मों से संबंधित गतिविधियों पर पैनी नज़र रखते हैं.टिप्पणी करते हैं। उन्होंने ने बताया की पटना में पिछले दिनों एक भोजपुरी फ़िल्म के प्रचार के लिए मनोज तिवारी और रवि किशन पहुंचे.फ़िल्म का नाम है - एगो चुम्मा देले जइह हो करेजऊ।
भोजपुरी के इस मशहूर गीत को सभी लोक गायकों ने गाया है.अब इसी नाम से एक फ़िल्म बन गई है.उस फ़िल्म में मनोज तिवारी और रवि किशन दोनों भोजपुरी स्टार हैं.साथ में भाग्यश्री भी हैं.इस फ़िल्म के प्रचार के लिए आयोजित कार्यक्रम में मनोज ने मंच से कहा की इस फ़िल्म का नाम बदल देना चाहिए.भोजपुरी संस्कृति के हिसाब से यह नाम उचित नहीं है,लेकिन रवि भइया को इसमें कोई परेशानी नहीं दिखती.मनोज हों या रवि दोनों एक- दूसरे पर कटाक्ष करने का कोई मौका नहीं चूकते.सुना है कि बात बहुत बढ़ गई.मनोज ने अगला वार किया कि रवि भइया की असल समस्या मेरी मूंछ है.कहते रवि किशन ने मंच पर ही कहा कि तुम्हारा मूंछ्वे कबाड़ देंगे।
मनोज तिवारी और रवि किशन की नोंक-झोंक से आगे का मामला है यह.भोजपुरी फिल्मों में भरी मात्रा में अश्लीलता रहती है.भोजपुरी दर्शकों को रिझाने के नाम भोजपुरी फिल्मों के निर्माता-निर्देशक अश्लीलता परोसते रहे हैं.कहा जा रहा है कि भोजपुरी फिल्में इसी कारण स्तरहीन होती जा रही हैं.एक बड़ी सांस्कृतिक सम्भावना चंद रुपयों के लालच में मारी जा रही है.समय आ गाया है कि सभी चेत जाएं और भोजपुरी फिल्मों की भलाई के लिए सामूहिक तौर पर फूहड़ता और अश्लीलता से परहेज करें।
मनोज को पहल करनी चाहिए और रवि किशन को उनका समर्थन करना चाहिए.यहाँ बस एक ही सवाल है कि सदियों से प्रचलित एगो चुम्मा ...गीत आज अचानक कैसे इतना अश्लील हो गाया कि उस नाम से फ़िल्म नहीं बन सकती.कहीं मनोज बाबु का कोई सगूफा तो नहीं था यह...हो सकता है फ़िल्म को गर्म करने के लिए उन्होंने यह बात कही हो.