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Tuesday, February 14, 2012

जुड़े गांठ पड़ जाए

जुड़े गांठ पड़ जाए-अजय ब्रह्मात्‍मज

अभी पिछले दिनों शिरीष कुंदर ने ट्विट किया है कि झगड़े के बाद हुई सुलह से कुछ रिश्ते ज्यादा मजबूत हो जाते हैं, लेकिन मानव स्वभाव शब्दों के संविधान से निर्देशित नहीं होता। रहीम ने सदियों पहले कहा है, रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाये, टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाये..। यह गांठ और खलिस शिरीष कुदर, फराह खान और मुमकिन है कि शाहरुख खान के मन में भी बनी रहे। शाहरुख और फराह की दोस्ती बहुत पुरानी है। दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे के सेट पर सरोज खान से अनबन होने पर शाहरुख ने फराह को अपने गाने की कोरियोग्राफी के लिए बुलाया था। दिन पलटे। फराह सफल कोरियोग्राफर हो गईं। फिर शाहरुख ने ही उनकी बढ़ती ख्वाहिशों को पर दिए और मैं हूं ना डायरेक्ट करने का मौका दिया। शाहरुख के प्रोडक्शन को पहली बार फायदा हुआ, लेकिन उससे बड़ा फायदा फराह का हुआ। सफल निर्देशक के तौर पर उन्होंने दस्तक दी और शाहरुख के प्रोडक्शन की अगली फिल्म ओम शांति ओम से उनकी योग्यता मुहर लग गई। इसी बीच शिरीष का फराह के जीवन में प्रवेश हुआ। दोनों का विवाह हुआ और इसके गवाह रहे साजिद खान, साजिद नाडियाडवाला और शाहरुख।

शादी के बाद शिरीष ने संबंधों के उस स्पेस में अपने लिए जगह बनाई जो तब तक मुख्य रूप से शाहरुख के अधीन था। देखा गया है कि प्रेम या शादी के बाद सबसे पहले किसी नजदीकी दोस्त से रिश्ता दरकता है। शाहरुख और फराह का रिश्ता पहले सा नहीं रहा। फिल्म निर्माण-निर्देशन से जुड़े शिरीष की ख्वाहिशों ने करवट ली। शाहरुख ने इस बार उसे तरजीह नहीं दी। नतीजा इस रूप में सामने आया कि फराह ने अपने पति की इच्छाओं के लिए नई दोस्ती कर ली। गलतफहमी गाढ़ी हुई और फिर प्रेम का धागा चटक गया। फराह और शाहरुख ने मर्यादित व्यवहार बनाए रखा, लेकिन खार खाए शिरीष की अम्लीय टिप्पणियां सोशल नेटवर्क पर सामने आने लगीं। हद तब हुई, जब रॉ. वन की रिलीज और दर्शकों के रेस्पॉन्स पर शिरीष ने ट्विट किया, सुना 150 करोड़ का पटाखा फुस्स हो गया..। बॉक्स ऑफिस की मार झेल रहे शाहरुख के लिए टिप्पणी शूल साबित हुई। इमोशन लहूलुहान हुए और संबंधों में कड़वाहट आ गई।

यही कड़वाहट पिछले रविवार-सोमवार की रात हाथपाई के तौर पर सामने आई। शिरीष के व्यवहार और स्वभाव के जानकारों के मुताबिक वह पंगे के लिए उतारू थे। शाहरुख के सब्र का बांध टूटा। वे उत्तेजित हुए और उन्होंने हाथ छोड़ दिया। कहना मुश्किल है कि उस खास क्षण में क्या हुआ होगा, लेकिन जो सामने आया वह भद्दा और शर्मनाक था। मीडिया और इंडस्ट्री ने इस मौके पर संयम से काम नहीं लिया। बात को बतंगड़ और तिल को ताड़ बनाने की हर कोशिश की गई। अगले दिन कहते हैं संजय दत्त और साजिद खान की पहल पर शिरीष और फराह मन्नत गए और उन्होंने शाहरुख को मना लिया। फिलहाल ऊपरी तौर पर सुलह हो गई है और शांति दिख रही है, लेकिन दोस्ताने में पड़ी कलह भविष्य में किसी और रूप में जाहिर हो सकती है। सुहल से सब कुछ सुलझ जाए, तो फराह और शाहरुख की जोड़ी फिर से धमाल कर सकती है। थोड़ी फेर-बदल से उनकी स्थापित फिल्म हैप्पी न्यू ईयर आरंभ हो सकती है। फराह लोकप्रिय सिनेमा के तत्वों को बारीकी से समझती हैं और शाहरुख उन्हें बखूबी पर्दे पर उतारते हैं। करीबी बताते हैं कि शाहरुख के कैंप में शिरीष अच्छी तरह फिट नहीं हो पाए हैं। दोस्ती और दांपत्य दो अलग चीजें हो सकती हैं। दोनों रिश्तों को उनकी जरूरतों के साथ काजोल ने निभाया है। काजोल भी शाहरुख के कैंप की सदस्य हैं, जबकि अजय देवगन की इस कैंप से नहीं छनती। फिर भी कभी कोई अभद्र या अशोभनीय घटना आज तक नहीं सुनाई पड़ी।

उम्मीद की जानी चाहिए कि हमारे लोकप्रिय स्टार भविष्य में ऐसी अप्रिय घटनाओं में शामिल न हों। उन्हें अपने सामाजिक व्यवहार ध्यान रखना चाहिए कि वे समाज के आइकॉन हैं। उनसे संयत व्यवहार की उम्मीद की जाती है। आम नागरिक की तरह उनका लड़ना-झगड़ना सही नहीं लगता..।

Tuesday, February 9, 2010

पापुलैरिटी को एंजाय करते हैं शाहरुख

-अजय ब्रह्मात्मज
शाहरुख खान से मिलना किसी लाइव वायर को छू देने की तरह है। उनकी मौजूदगी से ऊर्जा का संचार होता है और अगर वे बातें कर रहे हों तो हर मामले को रोशन कर देते हैं। कई बार उनका बोलना ज्यादा और बड़बोलापन लगता है, लेकिन यही शाहरुख की पहचान है। वे अपने स्टारडम और पापुलैरिटी को एंजाय करते हैं। वे इसे अपनी मेहनत और दर्शकों के प्यार का नतीजा मानते हैं। उन्होंने इस बातचीत के दरम्यान एक प्रसंग में कहा कि हम पढ़े-लिखे नहीं होते तो इसे लक कहते ़ ़ ़ शाहरुख अपनी उपलिब्धयों को भाग्य से नहीं जोड़ते। बांद्रा के बैंडस्टैंड पर स्थित उनके आलीशान बंगले मन्नत के पीछे आधुनिक सुविधाओं और साज-सज्जा से युक्त है उनका दफ्तर। पूरी चौकसी है। फिल्मी भाषा में कहें तो परिंदा भी पर नहीं मार सकता, लेकिन फिल्म रिलीज पर हो तो पत्रकारों को आने-जाने की परमिशन मिल जाती है।
उफ्फ! ये ट्रैफिक जाम
मुंबई में कहीं भी निकलना और आना-जाना मुश्किल हो गया है। मन्नत से यशराज स्टूडियो (12-15 किमी) जाने में डेढ़ घंटे लग जाते हैं। मैं तो जाने से कतराता हूं। मेरा नया आफिस खार में बन रहा है। लगता है कि यहीं है, लेकिन 35 मिनट से ज्यादा लगते हैं। कई बार ऐसा होता है कि 10-15 मिनट के काम से आफिस निकलता हूं, लेकिन लौटते-लौटते ढाई घंटे बीत जाते हैं। सड़कों पर बहुत क्राउड हो गया है अभी। कार्टर रोड पर हमेशा भीड़ लगी रहती है। मैं गलियों से निकलता हूं फिर भी फंस जाता हूं।
बेस्ट सिटी, दिल्ली
दिल्ली इस वक्त इंडिया के बेस्ट सिटी हो गई है। इंफ्रास्ट्रक्चर इतना अच्छा हो गया है। मैट्रो चालू हो गया है। ब्रिज बन गए हैं। सड़क पर कहीं रुकना नहीं पड़ता। मैं अभी तक मैट्रो में नहीं चढ़ा हूं। एक बार जाना था। मुझे ओपनिंग के लिए भी बुलाया था। मैं जा नहीं सका। अभी तो मुंबई में भी मैट्रो आ रही है। तब शायद मुंबई में कहीं आना-जाना आसान हो जाए।
सिक्युरिटी और प्रशंसक
दिल्ली और नॉर्थ में सिक्युरिटी का प्राब्लम हो जाता है। मैं कई बार सुनता हूं कि एक्टर गए और झगड़ा हो गया। मैं बहुत क्लियर हूं इस मामले में। अच्छी सिक्युरिटी रखो। किसी को चोटें-वोटें न लगें। भीड़ और भगदड़ में क्या होता है? हम तो भाग जाते हैं गाड़ी में बैठकर ़ ़ ़ मैंने एक-दो बार देखा है, कुछ लोग गिर जाते हैं। बहुत बुरा लगता है। एक बार किसी सिनेमाघर की ओपनिंग में गया था। कैमरामैन पीछे खिसकते-खिसकते कांच तोड़ गया। अच्छा हुआ कि नीचे नहीं गिरा, नहीं तो जान भी जा सकती थी। कोलकाता में काफी भीड़ लग जाती है। पिछले दिनों कोई गुवाहाटी बुला रहा था। मैंने समझाया कि वहां फंक्शन न करें। सिक्युरिटी की समस्या से कई शहरों में नहीं जा पाता। अपने सभी प्रशंसकों से मिलना नहीं हो पाता।
माय नेम इज खान
अलग किस्म की फिल्म है। वो सभी चीजें डालने की कोशिश की है, जो होनी चाहिए। यह इंडियन सिनेमा है। ज्यादा तामझाम नहीं रखा है। फिल्म की कास्ट और मेकिंग कमर्शियल रखी है। कैरेक्टर बहुत अमीर नहीं हैं, लेकिन लुक में रिचनेस है। बड़ी फिल्म है। अमेरिका में शूट हुई है। यह चक दे नहीं है। इसमें लव स्टोरी भी है। काजोल, शाहरुख और करण हों तो दर्शक की उम्मीदें रहती हैं। हम उन्हें निराश नहीं कर सकते। यह एक ड्रामैटिक फिल्म है। इस फिल्म को दूर से देखो तो एक लव स्टोरी और मुसलमान की कहानी लगती है। पास आकर देखो हिंदू, मुसलमान, सिख और ईसाई में फर्क नहीं दिखेगा। सच कहूं तो यह एक साउथ एशियन व्यक्ति की कहानी है, जो अमेरिका में रहता है। इस फिल्म से साउथ एशिया के सभी लोग आइडेंटिफाय करेंगे। अमेरिका में हमें बराबरी का दर्जा नहीं मिला हुआ है। फर्क बरकरार है। ईस्ट और वेस्ट की सोच का भी फर्क है।
टेररिज्म का बैकड्राप
यह फिल्म टेररिज्म के ऊपर नहीं है। इसमें उसका बैकड्रॉप है। उस माहौल में कुछ किरदार फंस गए हैं। इस फिल्म के किरदारों पर टेररिज्म का बटर फ्लाय इफेक्ट है। ऐसे इफेक्ट में हम शामिल नहीं होते हैं, लेकिन प्रभावित होते हैं। उदाहरण केलिए किसी की बीवी रूठ के विदेश जा रही है। वह उसे मनाने जा रहा है। टैक्सी बुलाता है। तभी शहर में दंगा भड़क जाता है और टैक्सी ड्रायवर को कोई मार देता है। वह व्यक्ति समय पर एयरपोर्ट नहीं पहुंच पाता। बीवी विदेश चली जाती है। अब उस दंगे से उस व्यक्ति की जिंदगी तो तबाह हो गई, लेकिन वह दंगे में शामिल नहीं था। माय नेम इज खान के किरदार इसी तरह टेररिज्म से प्रभावित होते हैं।
सच्चे किरदारों पर आधारित
यह फिल्म सच्चे किरदारों पर आधारित है। मैं मिल चुका हूं उनसे। मियां मुसलमान हैं और बीवी हिंदू। मियां ने एक दंगे में उसे बचाया था। दंगे में उसके पति को मार दिया गया था। बाद में दोनों ने शादी कर ली थी। अमेरिका में 9-11 की घटना के तीन महीने बाद दिसंबर में वे बेचारे ईद मना रहे थे। किसी ने शिकायत कर दी तो पुलिस पूछताछ के लिए ले गई। बीवी ने तब अपनी बीमार बेटी का खयाल करते हुए पुलिस से कह दिया कि मैं तो हिंदू हूं ... मैं जाऊं। पुलिस वैसे भी उन्हें छोड़ने वाली थी। बीवी पहले चली गई। मियां आधे घंटे के बाद घर पहुंचा। उसने बीवी से पूछा, मैंने तुम्हारी जान बचाई। तुम्हारा बच्चा मुझे बाप जैसा प्यार करता है और तुम्हें यह कहने की जरूरत पड़ गई कि तुम मुसलमान नहीं हो। मैं तुम्हें नहीं समझा सका कि मुसलमान होना गलत नहीं है तो दुनिया को क्या समझाऊंगा। तब से दोनों आपस में बातचीत नहीं करते। शादीशुदा हैं। एक घर में रहते हैं, लेकिन उनके संबंध खत्म हो गए हैं। कल हो न हो के समय की बात है। हमें आयडिया अच्छा लगा तो हम ने इस पर काम किया। 9-11 के टेररिस्ट अटैक करने वाले को क्या मालूम कि उसकी वजह से एक मियां-बीवी की जिंदगी तबाह हो गई।
इमोशनल रियलिटी
इमोशनल रियलिटी यूनिवर्सल होती है। किसी के मरने पर सभी को दुख होता है। जन्म लेने पर खुशी होती है। प्यार सबको अच्छा लगता है। झगड़े से सभी डरते हैं। आप दुनिया के किसी भी कोने में चले जाएं। सभी जगह एक ही भाव होते हैं। यही हमारा नवरस है। जर्मनी में मेरे लाखों फैन हैं। उन्हें भाषा समझ में नहीं आती, गाना समझ में नहीं आता, मेरी शक्ल समझ में नहीं आती, लेकिन पर्दे पर मुझे रोता हुआ देख कर रोते हैं। अब आप अवतार ही देखें। इस फिल्म को देखते हुए आप किरदारों के इमोशन के साथ जुड़ जाते हैं। इमोशनल रियलिटी सभी को अपील करती है। मुझे विश्वास है कि अगर हमने अच्छी एक्टिंग की है और फिल्म की स्टोरी लाइन सही है तो फिल्म लोगों को पसंद आएगी, क्योंकि वे इमोशनली कनेक्ट होंगे।
नए डायरेक्टर
नए डायरेक्टर में मुझे इम्तियाज अली, विशाल भारद्वाज, अनुराग कश्यप और अनुराग बसु पसंद हैं। ये सिनेमा का विस्तार कर रहे हैं। इनकी फिल्मों से इंडियन सिनेमा का व‌र्ल्ड व्यू बदल सकता है। उनकी फिल्मों में कुछ इंटरनेशनल बातें होती हैं। अनुराग कश्यप थोड़े ऑफ बीट हैं, अगर इन सभी के लिए प्लेटफार्म क्रिएट हो तो अच्छी बात होगी।
प्राइस नहीं मांगता
ज्यादातर लोगों को यकीन नहीं होगा, लेकिन जिन फिल्मों में मैं एक्टिंग करता हूं, उनके लिए प्राइस नहीं मांगता। अगर फिल्म पहले हफ्ते चल जाती है तो प्रोडयूसर खुद आकर पैसे दे देते हैं। पिछले दस-बारह साल में किसी प्रोड्यूसर को मैंने नहीं बताया कि ये मेरा प्राइस है। किसी से निगोशिएट नहीं किया। शुरू में करते थे, जब पैसे नहीं थे। इस से एक मैसेज गया कि पैसे देकर मुझ से फिल्म नहीं करा सकते। पैसे देकर आप बाकी सब कुछ करा सकते हैं। एड करा सकते हैं। डांस करा सकते हैं। पार्टी कर लें। फिल्म की वजह से ही मैं हूं, वो नहीं बिकता। वह दिल से होता है तो होता है, अन्यथा नहीं होता।
विवेक वासवानी
मैं सच कहता हूं कि अगर विवेक वासवानी नहीं होता तो मैं मुंबई में नहीं होता। झूठे दिल से नहीं, सच बता रहा हूं। उसने अजीज मिर्जा को पटाया, जूही चावला को लाया। अमृता सिंह को घुमाया। नाना पाटेकर को समझाया। जी पी सिप्पी से मुझे राजू बन गया जैंटलमैन में लांच करवा दिया। उसने ऐसा समां बांध दिया था कि जिस पार्टी में जाऊं, सामने से लोग ऐसे मिलते थे कि इंडिया का सबसे बड़ा स्टार आ गया। उस रेपुटेशन से ही मुझे एक-दो साल काम मिले।
एक दिन में चार पिक्चर
मुझे अच्छी तरह याद है कि एक ही दिन में चार पिक्चर साइन की थी। दिल आशना है, किंग अंकल, राजू बन गया जेंटल मैन और चमत्कार चारों फिल्में एक ही दिन मिली थीं। इतनी अच्छी शुरूआत रही।
प्रिपरेशन
मैं रिजवान खान वाली बीमारी से ग्रस्त दो लोगों से मिला हूं। मेरे दोस्त ले आए थे। उनसे 14 दिनों तक मिला। वे चुपचाप बैठते हैं। बोलते नहीं हैं। मैं उन्हें बैठे हुए देखता और आब्जर्ब करता था। फिर मैंने एक का वाक, एक का बाल, थोड़ा अटक कर बोलना या रिपीट करना ़ ़ ़ ये सब नोट किया। वे आंखें मिलाकर बातें नहीं करते। वे जमीन पर देखकर बातें करते हैं। यह फिल्म रोमांटिक है, लेकिन आंखों से आंखों के मिलने का चक्कर ही नहीं है। मुझे इंटरेस्टिंग लगा यह कंसेप्ट कि डू रोमांस विदाउट एक्सप्रेसिंग। उन्हें छूना नहीं आता। गले मिलना नहीं आता। वैसे वे बहुत इंटेलिजेंट होते हैं। इस किरदार को निभाने के लिए आंखें भी चढ़ाई हैं। एक रोमांटिक सीन में मेरी आंखें टेढ़ी लगेंगी।
सीरियस हूं मैं भी
लोग मुझ से बार-बार कहते हैं कि मैं हर फिल्म में एक जैसा ही दिखता हूं तो वही मैंने भी कहना शुरू कर दिया। ऐसे सवालों से मैं गुस्सा नहीं होता। मैं अपनी एक्टिंग के बारे में सीरियसली बातें नहीं करता तो इसका मतलब यह नहीं है कि मैं सीरियसली एक्टिंग नहीं करता हूं। अगर मैं हर फिल्म में सेम हूं तो लोग बीस सालों से मेरी फिल्में क्यों देख रहे हैं? एक ही फिल्म देखते रहते। हर फिल्म में कुछ तो अलग करता ही हूं न। क्या अभी एक्टिंग के बारे में बोलना शुरू कर दूं कि क्या-क्या किया? आपको जवाब दे सकता था कि मैंने बहुत मेहनत की और लीन हो गया रोल के अंदर और छह महीने तक... ऑस्कर वाइल्ड ने लिखा था कि दुनिया का सबसे बोरिंग आदमी होता है वह, जो हाउ आर यू पूछने पर अपने बारे में बताने लगता है। टेक्नीकल बातें मैं क्या बताऊं? मौका और दस्तूर देखकर हम लोग काम करते हैं। डान एकदम स्टाइलिश है तो स्टाइल से चलूंगा, बैठूंगा, बातें करूंगा। बाल, कपड़े, बंदूक ़ ़ ़ सब कुछ स्टाइल में होंगे। अभी रा 1 करूंगा तो वही सुपरहीरो बनूंगा। मैं तो कहता हूं कि इंटेंस एक्टर से जरा बगीचे में तुझे देखा तो ये जाना सनम करा के दिखा दो। मैं वो कर सकता हूं और चक दे भी कर सकता हूं। अभी मुझे सीरियस एक्टिंग नहीं करनी है। मुझे कुछ हंसी की पिक्चर करनी है।
अवार्ड और एक्टिंग
किसी ने कहा था कि कामेडी करो तो लोग उसे एक्टिंग न हीं मानते। मुझे लगता है कि गोविंदा को अवश्य नेशनल अवार्ड मिलना चाहिए। मेरी बड़ी तमन्ना है नेशनल अवार्ड जीतने की। मुझे लगा कि चक दे और स्वदेस में मैंने अच्छा किया। वही एक अवार्ड मुझे नहीं मिला है। मेरी तमन्ना है कि आस्कर मिलने से पहले नेशनल मिल जाए तो अच्छा रहेगा। नहीं तो सभी को बुरा लगेगा कि देखो आस्कर मिल गया, नेशनल नहीं मिला। नेशनल अवार्ड मिले तो बच्चे भी खुश होंगे।
करण जौहर
वे जिस उम्र और मुकाम पर रहते हैं, उसी पर फिल्म बनाते हैं। 25-26 साल की उम्र में उन्होंने कुछ कुछ होता है बनायी थी। फिर डैडी के साथ उनका रिलेशन बेहतर हुआ और फैमिली को करीब से समझा तो उन्होंने कभी खुशी कभी गम बनाई। कल हो न हो बनाते समय उनके पिता की मौत हुई। उसके बहुत उनके सारे दोस्तों के विवाह टूट रहे थे तो उन्होंने कभी अलविदा ना कहना बनाई। अभी उन्होंने माय नेम इज खान बनाई है। इसमें आज का मुद्दा है।
इंडिया का मुसलमान
मेरी जिंदगी खुशहाल है। मैं इंडिया का मुसलमान हूं। हिंदू डोमिनेटेड देश में सुपर स्टार हूं। हिंदू से शादी हुई है मेरी। मुझे कभी कोई परेशानी नहीं हुई। न तो देश के अंदर और न देश के बाहर। मैं तो हर तरह से सही हूं, लेकिन दूसरों की कहानियां सुनता हूं तो मुझे लगता है कि इस पर बातें होनी चाहिए। मैंने महसूस किया है कि अभी परसेप्शन बदल रहा है।
एक किस्सा
दुनिया के एक अमीर आदमी से एक रिपोर्टर ने पूछा कि तुम्हारे पास इतने पैसे हैं। बड़ा बिजनेस है। हर बार ठीक बिजनेस कैसे कर लेते हो? अमीर ने कहा, हमेशा सही डिसीजन लेता हूं। भला यह भी कोई बात हुई? चलो, यही बताओ कि सही डिसीजन कैसे लेते हो? रिपोर्टर का अगला सवाल था। अमीर आदमी ने जवाब दिया, एक्सपीरिएंस से... फिर रिपोर्टर ने पूछा, एक्सपीरिएंस कहां से आया? अमीर ने जवाब दिया, गलत डिसीजन से, बार-बार गलत डिसीजन लेने से एक्सपीरिएंस हो गया।

Tuesday, June 30, 2009

दो तस्वीरें:माई नेम इज खान में काजोल और शाहरुख़




यह फ़िल्म अभी बन रही है.करण जौहर अपने कलाकारों के साथ अमेरिका में इस फ़िल्म की शूटिंग कर रहे हैं.मन जा रहा है की करण पहली बार अपनी ज़मीन से अलग जाकर कुछ कर रहे हैं.हमें उम्मीद है कि काजोल और शाहरुख़ के साथ वे कुछ नया करेंगे...

Thursday, April 30, 2009

दरअसल:दक्षिण अफ्रीका और मिस बॉलीवुड


-अजय ब्रह्मात्मज

यह आईपीएल के संयोजक और द्रष्टा ललित मोदी के दिमाग की उपज हो सकती है। साउथ अफ्रीका में चल रहे आईपीएल-2 के लीग मैचों में स्टेडियम के अंदर दर्शकों को बुलाने और बिठाने की उन्होंने आकर्षक तरकीब सोची। उन्होंने विभिन्न टीमों के मालिकों के साथ मिल कर मिस बॉलीवुड के चुनाव की घोषणा कर दी।
ऐसा माना जा रहा है कि मिस बॉलीवुड चुने जाने की आकांक्षा से कई लड़कियां मैच देखने आ रही हैं और वे अपने साथ मित्र और परिजनों को भी 20-20 का रोमांचक क्रिकेट मैच देखने के लिए बाध्य कर रही हैं। आंकड़ों और आमदनी के ब्यौरों में 5 से 10 प्रतिशत के फर्क से संख्या और राशि बढ़ जाती है।
चूंकि आईपीएल में शाहरुख खान, प्रीति जिंटा और शिल्पा शेट्टी की भागीदारी है, इसलिए उनकी मौजूदगी से मिस बॉलीवुड के प्रति विश्वसनीयता बढ़ जाती है। मित्र और परिजनों के साथ आईपीएल देखने आ रहीं लड़कियां उम्मीद कर सकती हैं कि अगर वे कैमरे की गिरफ्त में आ गई, तो मिस बॉलीवुड बन सकती हैं। मिस बॉलीवुड की विजेता को मिलने वाली राशि से अधिक महत्वपूर्ण फिल्म में काम मिलना है। हिंदी फिल्मों में काम पाने के लिए आतुर लड़कियों को आईपीएल-2 ने एक सपना दिया है। यह सपना आईपीएल के 56 मैचों में तैरता रहेगा। केवल आठ भाग्यशाली लड़कियों को अंतिम प्रतियोगिता में शामिल होने का मौका मिलेगा और उनमें से एक बनेगी मिस बॉलीवुड।
समाजशास्त्री और अध्येता भले ही फिल्मों को हेय दृष्टि से देखते रहें और समाज के अध्ययन में उसकी उपयोगिता को नजरंदाज करते रहें, किंतु इस सच से इंकार नहीं किया जा सकता कि फिल्में हमारे जीवन का हिस्सा बन चुकी हैं। कस्बों और शहरों में हम फिल्मों से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होते ही हैं। हिंदी फिल्मों के अभिनेता-अभिनेत्री हमारे आदर्श होते हैं। कभी वे स्वयं, तो कभी उनके निभाए किरदार हमारी एकरस जिंदगी को सरस बनाते हैं। अगर हिंदी फिल्मों की बात करें, तो तमाम आलोचनाओं और कमियों के बावजूद इसका प्रसार हुआ है। विदेशों में जहां भी भारतीय बसे हैं, वहां भारतीय व्यंजनों की तरह भारतीय मनोरंजन पहुंचा है और मनोरंजन का ऐसा सस्ता और सुलभ माध्यम कोई और नहीं है! डिजिटल क्रांति के बाद फिल्में तेजी से मूल रूप में दूर-दराज के इलाकों में पहुंच रही हैं। दक्षिण अफ्रीका में भारतवंशियों की अच्छी संख्या है। वे अपने मनोरंजन के लिए हिंदी फिल्में देखते हैं। हिंदी फिल्मों की गतिविधियों और खबरों से वाकिफ लोग जानते होंगे कि इधर साउथ अफ्रीका में ढेर सारी फिल्मों की शूटिंग हुई है। सितारों के दक्षिण अफ्रीका आने-जाने का सिलसिला बना हुआ है। वहां से लौटे स्टार और तकनीशियन बताते हैं कि स्थानीय भारतवंशी हिंदी फिल्मों के दीवाने हैं। नौ साल पहले साउथ अफ्रीका में ही आाईफा अवार्ड समारोह में आमिर खान की लगान का भव्य व‌र्ल्ड प्रीमियर हुआ था। उसके बाद ही दक्षिण अफ्रीका में हिंदी फिल्मों का प्रदर्शन तेज हुआ। हिंदी फिल्मों के प्रति स्थानीय नागरिकों के लगाव और आईपीएल से जुड़े फिल्म स्टारों को ध्यान में रख कर ही मिस बॉलीवुड की योजना रची गई है।
कहना मुश्किल है कि मिस बॉलीवुड के रूप में चुनी गई लड़की हिंदी फिल्मों के लिए काम की साबित होगी या नहीं? निश्चित ही उसे एक फिल्म मिल जाएगी और उसमें दम-खम हुआ, तो वह ग्लैमर व‌र्ल्ड में सफल पारी भी खेलेगी। आईपीएल-2 के साइड इफेक्ट के रूप में मिस बॉलीवुड का चुना जाना अच्छा ही है, क्योंकि ऐसा होने से हिंदी फिल्मों को एक और अभिनेत्री मिल जाएगी!

Tuesday, April 21, 2009

बाजपेयी और सोनिया जी प्रिय हैं:शाहरुख़ खान

बाजपेयी जी
बाजपेयी जी से मेरे पुराने संबंध हैं। उनकी बेटी नमिता से पुराना परिचय है। पहले हम दिल्ली लाकर फिल्में दिखाते थे तो उनके लिए विशेष शो रखते थे। उन्हें फिल्मों का बहुत शौक है। कई बार पता चल जाता था कि उन्हें फिल्म अच्छी नहीं लगी। फिर भी वे कहते थे बेटा, बहुत अच्छा है। एक बार मिले तो बोले कि बहुत दिनों से तुम्हारी कोई फिल्म नहीं देखी। पिछले दिनों उनकी तबियत खराब हुई थी तो मैं चिंतित था। मैंने नमिता से पूछा कि बाप जी कैसे हैं। हम उन्हें बाप जी कहते हैं। मेरी तबियत खुद खराब थी, इसलिए मिलने नहीं जा सका। फिर भी मैं नमिता से हालचाल लेता रहा। वे बहुत स्वीट व्यक्ति हैं। मैं छोटा था तो मेरे पिताजी मुझे आईएनए मार्केट ले जाते थे कि अटल बिहारी बाजपेयी जी की स्पीच सुनो। बहुत खूबसूरत बोलते हैं वे। उनका हिंदी पर अधिकार है। मैं उनको और इंदिरा जी को सुन कर बड़ा हुआ हूं। मेरे पिता जी कांग्रेस में थे। मेरी मां कांग्रेस में थीं। गांधी परिवार को मैं बचपन से जानता हूं। राबर्ट से भी मेरा पुराना परिचय है। हमने कभी पालिटिकल बात नहीं की। वे हमारे घर आते हैं। हम भी उनसे मिलने जाते हैं।

राजनीति से रिश्ता
राजनीति हमारा धंधा नहीं है तो इस सिलसिले में कोई बात नहीं होती। एक-दो बार आए तो शूटिंग देखने की इच्छा जाहिर की। हर आदमी शूटिंग देखना चाहता है। उनका दोस्त एक्टर है तो उनकी भी इच्छा हुई। मैं कभी कह दूं कि पार्लियामेंट सेशन नहीं देखा है, अगर गैरकानूनी न हो तो मुझे भी दिखा दो। तो वे मना नहीं करेंगे। इसके आगे कभी कोई बात नहीं हुई। उन्होंने मुझसे कभी कुछ बोला भी नहीं है। उन्हें मालूम है कि मैं अराजनीतिक व्यक्ति हूं। मेरा झुकाव किसी पार्टी की तरफ नहीं है। मेरी मम्मी पालिटिक्स में थीं। मैंने उन्हें करीब से देखा है। मैंने देखा है कि कई बार नेताओं को झुकना पड़ता है। वे दबाव में आ जाते हैं। कई बार वैसी नीतियां बनानी पड़ती है। जैसे कई बार हम छिछोरा काम करते हैं। एक्टर हैं तो करना पड़ता है। मार्केटिंग और पब्लिसिटी के लिए करना होता है। कई बार हाथ बंधे होते हैं। हमें नेताओं पर भरोसा करना चाहिए, लेकिन भरोसेमंद नेता भी तो हों।

सोनिया जी
सोनिया जी की बात करूं तो वो अकेली औरत हैं। यह सब बकवास और छिछोरी बात है कि वो बाहर की हैं या इटली की हैं। आप अपनी मां की तरह उनके बारे में सोचें। उनकी पूरी दुनिया तहस-नहस हो गयी। उनके देवर मर गए। सास मर गई। शौहर मर गए। दूसरे देश में वह अकेली हो गयीं। हमें लंदन में कोई पांच मिनट के लिए अकेला छोड़ दे तो हालत खराब हो जाती है। वह एक नए देश में थे और उनके परिवार के सभी सदस्य मारे गए। बच्चे छोटे थे। लोग विरोध में थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने लड़ाई लड़ी। एक नेता ना सही, एक इंसान के तौर पर तो उनकी इज्जत करें। हमारी मां-बहन ऐसा करतीं तो हम उनकी तारीफ करते या नहीं। उनकी राजनीति को एक तरफ रहने दें।

Saturday, February 14, 2009

फ़िल्म समीक्षा:बिल्लू


मार्मिक और मनोरंजक
-अजय ब्रह्मात्मज
शाहरुख खान की कंपनी रेड चिलीज ने प्रियदर्शन की प्रतिभा का सही उपयोग करते हुए बिल्लू के रूप में मार्मिक और मनोरंजक फिल्म पेश की है। विश्वनाथन की मूल कहानी लेकर मुश्ताक शेख और प्रियदर्शन ने पटकथा विकसित की है और मनीषा कोराडे ने चुटीले और सारगर्भित संवाद लिखे हैं। लंबे समय के बाद किसी फिल्म में ऐसे प्रासंगिक और दृश्य के अनुकूल संवाद सुनाई पड़े हैं।
बिल्लू सच और सपने को मिलाती भावनात्मक कहानी है, जो एक स्तर पर दिल को छूती और आंखों को नम करती है। इस फिल्म का सच है बिल्लू, जिसे इरफान खान ने पूरे संयम से निभाया है। फिल्म का सपना साहिर खान है, जो शाहरुख खान की तरह ही अतिनाटकीय है। सच, सपना और कल्पना का घालमेल भी किया गया है। साहिर खान के रोल में शाहरुख खान को लेना और शाहरुख खान की अपनी फिल्मों को साहिर खान की फिल्मों के तौर पर दिखाना एक स्तर पर उलझन और भ्रम पैदा करता है। बिल्लू में ऐसी उलझन अन्य स्तरों पर भी होती है। फिल्म की कहानी उत्तरप्रदेश के बुदबुदा गांव में घटित होती है।
उत्तर प्रदेश के गांव में नारियल के पेड़, बांध और पहाड़ एक साथ देखकर हैरानी होती है। बिल्लू का घर भी दक्षिण भारतीय शैली में बना हुआ है। खेत में काम करती महिलाएं, खेती के औजार और पहनावे में भी दक्षिण भारतीय झलक है। बिल्लू की बेटी गुंजा की वेशभूषा दक्षिण भारत की लड़कियों जैसी है। प्रोडक्शन डिजाइनर साबू सिरिल से ऐसी चूक कैसे हो गई? या फिर प्रियदर्शन ने मान लिया है कि फिल्में तो काल्पनिक होती हैं। उनका कोई देश काल या व‌र्त्तमान नहीं होता तो पृष्ठभूमि और परिवेश पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है। उनकी पिछली फिल्मों में भी उत्तर भारत के गांव दक्षिण भारत की शैली के दिखाए जाते रहे हैं।
इस चूक और व्यवधान को नजरअंदाज कर दें तो फिल्म असर करती है। बिल्लू की सादगी, ईमानदारी और ठस में भारत के आम आदमी की बानगी है। सुपर स्टार साहिर खान के बचपन के दोस्त बिल्लू का आत्मसंयम रूलाता है। उसकी ईमानदारी कचोटती है। इरफान खान ने बिल्लू को उसी सहजता से निभाया भी है। लारा दत्ता ने बिल्लू की बीवी की भूमिका में बराबर का साथ दिया है। ग्लैमरहीन घरेलू औरत के रोल में वह अपनी प्रतिभा का परिचय देती हैं।
फिल्म में पर्याप्त मसाले और आयटम गीत हैं। शाहरुख खान जिस गति, ऊर्जा और जोश के लिए मशहूर हैं, वह सब इस फिल्म में है। फराह खान के निर्देशन में उनके नृत्य का जादुई असर होता है। दीपिका पादुकोण, प्रियंका चोपड़ा और करीना कपूर की मौजूदगी का मादक प्रभाव है। फिल्म के अंतिम दृश्य से पहले यानी प्री-क्लाइमेक्स में दिया गया शाहरुख खान का मौलिक संदेश उदासी और हंसी के बीच चल रही फिल्म को इमोशनल बना देता है। तब तक हम फिल्म में इस तरह शामिल हो चुके होते हैं कि शाहरुख खान के संवाद सीधे दिल को छूते हैं और आंखें स्वाभाविक तौर पर नम होती हैं।
बिल्लू इरफान खान के अभिनय और शाहरुख खान के स्टारडम के सुंदर मेल की वजह से भी देखी जा सकती है।

Saturday, January 31, 2009

दरअसल:मखौल बन गए हैं अवार्ड समारोह

-अजय ब्रह्मात्मज
पहली बार किसी ने सार्वजनिक मंच से अवार्ड समारोहों में चल रहे फूहड़ संचालन के खिलाफ आवाज उठाई है। आशुतोष गोवारीकर ने जोरदार तरीके से अपनी बात रखी और संजीदा फिल्मकारों के उड़ाए जा रहे मखौल का विरोध किया। साजिद खान और फराह खान को निश्चित ही इससे झटका लगा होगा। उम्मीद है कि भविष्य में उन्हें समारोहों के संचालन की जिम्मेदारी देने से पहले आयोजक सोचेंगे और जरूरी हिदायत भी देंगे।
पॉपुलर अवार्ड समारोहों में मखौल और मजाक के पीछे एक छिपी साजिश चलती रही है। इस साजिश का पर्दाफाश तभी हो गया था, जब शाहरुख खान और सैफ अली खान ने सबसे पहले एक अवार्ड समारोह में अपनी बिरादरी के सदस्यों का मखौल उड़ाया था। कुछ समय पहले सैफ ने स्पष्ट कहा था कि उस समारोह की स्क्रिप्ट में शाहरुख ने अपनी तरफ से कई चीजें जोड़ी थीं। मुझे बाद में समझ में आया कि वे उस समारोह के जरिए अपना हिसाब बराबर कर रहे थे। आशुतोष गोवारीकर और साजिद खान के बीच मंच पर हुए विवाद को आम दर्शक शायद ही कभी देख पाएं, लेकिन उस शाम के बाद अवश्य ही साजिद जैसे संचालकों के खिलाफ एक माहौल बना है।
गौर करें, तो साजिद और उन जैसे संचालक गंभीर और संवेदनशील फिल्मकारों को ही अपना निशाना बनाते रहे हैं। कभी उनकी फिल्मों के नाम से, तो कभी फिल्मों की थीम का उल्लेख कर हंसी-मजाक करते रहे हैं। इस हंसी-मजाक में उनके गंभीर प्रयासों का मखौल उड़ाया जाता है। कोशिश यही रहती है कि खास तरह के सिनेमा और खास समूह के फिल्मकारों की फिल्मों की धज्जियां उड़ाई जाएं और इस तरह साधारण और पॉपुलर किस्म की फिल्मों का माहौल तैयार किया जाए। दरअसल, यह बहुत ही खतरनाक साजिश है। मंच और समारोहों तक ही यह मखौल सीमित नहीं रहता। उनकी फिल्मों के अंदर भी ऐसे दृश्य और रेफरेंस रखे जाते हैं।
करण जौहर, शाहरुख खान और उनके आसपास के सितारे और डायरेक्टर इस मखौल से बचे रहते हैं। उन्हें कभी निशाना नहीं बनाया जाता। वास्तव में, हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में समूहबाजी तेजी से बढ़ी है। पॉपुलर सितारों के आसपास मतलबी किस्म के लोगों की भीड़ लगी रहती है। इस भीड़ में छोटे स्टार, डायरेक्टर, निर्माता और यहां तक कि पत्रकार भी शामिल होते हैं। कहते हैं कि अपने अवार्ड समारोहों में सितारों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए मीडिया समूह भी इस गुटबाजी का हिस्सा बन जाते हैं। सभी अपने-अपने स्वार्थो के वशीभूत साजिश में शामिल होते हैं और एक घिनौना कुचक्र चलता रहता है। इस कुचक्र में विरोधी खेमों के स्टारों और फिल्मों पर छींटाकशी की जाती है। उन्हें आड़े हाथों लिया जाता है और बगैर संदर्भ के वनलाइनर के जरिए उन्हें हंसी का मसाला भी बना दिया जाता है। एक लॉजिक दिया जाता है कि चूंकि सारे अवार्ड समारोह और इवेंट टीवी चैनलों से प्रसारित होते हैं, इसलिए टीवी प्रसारण में दर्शकों को जोड़े रखने के लिए हंसी का माहौल रहना चाहिए। किसी भी अवार्ड समारोह में विजेताओं को फिल्म पर ज्यादा बोलने की अनुमति नहीं दी जाती। बहाना रहता है कि समय कम है। सब कुछ जल्दी-जल्दी समेटना है। ऐसी सूरत में हम क्रिएटिव लोगों के विचार और अनुभव नहीं सुन पाते। हां, परफॉर्मेस जरूर दिखाया जाता है, ताकि दर्शक टीवी से चिपके रहें और टीआरपी बढ़ती रहे।
धीरे-धीरे स्पष्ट होता जा रहा है कि सारे अवार्ड समारोह सिर्फ टीवी इवेंट बन कर रह जाएंगे। उनमें न तो उल्लेखनीय फिल्मों की कद्र होगी और न किसी कलाकार के अभिनय को ही सराहा जाएगा! स्टारों को खुश करने और उन्हें समारोह में मौजूद रखने के लिए पुरस्कारों की झटपट कैटॅगरी तैयार कर ली जाएगी। देखा गया है कि समारोह में आए सभी स्टारों को किसी न किसी तरीके से मंच पर बुला ही लिया जाता है और कुछ नहीं, तो उन्हें पुरस्कार देने का काम सौंप दिया जाता है। पहले से न तो कोई सूची बनी रहती है और न ही ऐसी तैयारी होती है कि फिल्म बिरादरी से जुड़े सभी सदस्य आएं। अवार्ड समारोह और उसके संचालन को लॉफ्टर शो में तब्दील कर रही सोच पर आशुतोष गोवारीकर ने आपत्ति की है। उन्होंने जरूरी पहल तो कर दी है। अब इसे आगे ले जाने और मखौल को पूरी तरह से रोकने की जिम्मेदारी फिल्म बिरादरी पर है। अब देखते हैं कि आशुतोष गोवारीकर के समर्थन में फिल्म बिरादरी के लोग कदम आगे बढ़ाते हैं या नहीं?

Tuesday, December 23, 2008

आमिर खान या शाहरुख़ खान


सिर्फ़ मीडिया ही नहीं,आम दर्शकों की भी रूचि होती है.हम सभी पैदाइशी होड़ में रूचि लेते हैं.बचपन में ही हमारे प्रतियोगिता हमउम्र बच्चों से करवाई जाती है.अरे,देखो तो कैसे दोड़ता है मुन्ना... यह तो राजू से आगे निकल जाएगा ... बेटा दौड़ो तो और हम तब से कभी अपनी खुशी तो कभी दूसरों के रोमांच के लिए दौड़ते रहते हैं.दुनिया की होड़ में शामिल हो जाते हैं।

आदिम ज़माने में शिकार,मुर्गाबाजी ,पतंगबाजी,घुड़दौड़ ,स्वयंवर,परीक्षा,नौकरी,प्रेम,शादी,बच्चों की परवरिश हर समय और जगह एक होड़ चलती रहती है.यह इंसानी फितरत है.मनुष्य की आदिम प्रवृत्ति है.इन दिनों क्रिकेट,फुटबॉल और राजनीती तक में इस होड़ और उठापटक के दर्शन होते हैं.हमें आनंद मिलता है.हम स्फुरित होते हैं और परम आनंद की लालसा में होड़ को बढ़ावा देते हैं।
आजकल हिन्दी फिल्मों के दो पॉपुलर स्टार में ऐसी ही होड़ की कल्पना की जा रही है.माना जा रहा की शाहरुख़ खान और आमिर खान के बीच आगे रहने की ज़ंग चल रही है.इस ज़ंग का अलग-अलग कोणों से चित्रण किया जाता है.बताया जाता है की इस चक्र में कौन आगे रहा और कौन पीछे सरकता नज़र आ रहा है.लोकप्रियता सूची में शीर्ष पर कौन है?यह कैसे तय होगा?दोनों की आमदनी से या किसी और चीज से?लोकप्रियता आंकने का कोई पैमाना नहीं होता.एक फ़िल्म चल जाए तो शाहरुख आगे,दूसरी चल जाए तो आमिर आगे।
संयोग से १५ दिनों के अन्दर दोनों खान की फिल्में रिलीज़ हो रही हैं.शाहरुख़ की फ़िल्म 'रब ने बना दी जोड़ी' दर्शकों के बीच अधिक पसंद नहीं की गई.उसके कलेक्शन को बढ़ा-चढ़ा कर बताया जा रहा है. सच यह है की आदित्य चोपड़ा और शाहरुख़ खान की फ़िल्म के लिए ७०-८०% का कलेक्शन मुनाफे का सौदा नहीं कहा जा सकता.इस तर्क में कोई तुक नहीं है की फ़िल्म की लगत कम है,इसलिए आमदनी ज्यादा होगी.अब आमिर की 'गजनी' आ रही है। 'गजनी' का जोरदार प्रचार हो रहा है.माना जा रहा है की आमिर खान की यह फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर नए रिकॉर्ड कायम करेगी।

आप क्या सोचते हैं?यह होड़ कितनी उचित है?और क्या सचमुच आमिर बनाम शाहरुख़ का माहौल है?अपनी राय लिखें और दाहिनी तरफ़ चल रहे पोल में हिस्सा लें.आप किस के पक्ष में हैं?
नए ज़माने की इस होड़ में आमिर और शाहरुख़ में से कौन आगे रहेगा?हम अपनी आदिम प्रवृत्ति के साथ जिज्ञाशु हैं.क्या आप इस जिज्ञाशा में शामिल नहीं हैं?

Saturday, December 20, 2008

अब बतियाए होत क्या जब दर्शक हो गए लेट

१२ दिसम्बर को 'रब ने बन दी जोड़ी' रिलीज हुई.कहा जा रहा था कि बॉक्स ऑफिस पर चल रही उदासी खुशी में बदलेगी.यशराज का बैनर,आदित्य चोपड़ा का निर्देशन और शाहरुख़ खान के होने की वजह से यह उम्मीद सही थी.लेकिन हुआ क्या?
फ़िल्म ने ७० से ८०% का व्यापार किया,जो इन दिग्गजों की फ़िल्म के लिए शर्मनाक है। हालाँकि चापलूस ट्रेड विशेषज्ञ इसही बड़ा कलेक्शन बता रहे हैं। अब समझाया जा रहा है कि चूंकि फ़िल्म की लगत ज्यादा नहीं है,इसलिए यशराज की अच्छी कमाई होगी.उनके इस कयास में खास दम नहीं है.देश भर के अखबार और ब्लॉग लिखने वाले उत्साही यशराज की विज्ञप्ति को सच मान कर 'रब ने बना दी जोड़ी' को हिट बता रहे है. अभी कोई नहीं पूछ रहा है कि शाहरुख़ ब्रांड की कीमत कैसे गिर गई?


दूसरी तरफ़ यशराज हमेशा कि तरह इस मुगालते में रहे कि उनकी फ़िल्म तो लोग देखने आयेंगे ही.उन्होंने फ़िल्म के प्रचार पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया.शाहरुख़ खान ने चाँद अंग्रेज़ी पत्रकारों से बात की और चैनलों पर शेखी बघारते रहे.उन्होंने फ़िल्म से ज्यादा अपनी बात की.शाहरुख़ खान को मालूम नहीं है कि आजकल दर्शक उनकी बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं देती.अगर आप दर्शकों के पास नहीं पहुंचेगें तो दर्शक सिनेमाघर कैसे आयेंगे?अब वोह ज़माना नहीं रहा कि दर्शक स्टार के दम पर कींचे चले आयेंगे.यह जादू फिलहाल सिर्फ़ सलमान खान में हैं.आप देखें कि आमिर कितनी म्हणत कर रहे हैं.बाल,बॉडी और न जाने क्या-क्या चीजों के बारे में विस्तार से बता रहे हैं.


फ़िल्म रिलीज़ होने के चार दिनों के बाद यशराज को सुधि आई कि फ़िल्म की हीरोइन से मीडिया की मुलाक़ात करवाई जाए.यहाँ शाहरुख़ खान उन्हें लेकर आए और बताया गया कि शाहरुख़ मीडिया के सामने अनुष्का का घूंघट (unveiled) उठा रहे हैं। फिल्में मौखिक प्रचार से तभी दर्शकों को खींच पति हैं,जब फिल्मों में दम हो और दर्शकों को फ़िल्म अच्छी लग रही हो। 'रब ने बना दी जोड़ी' दर्शकों को ख़ास पसंद नहीं आई है.युवा दर्शक तो बेतरह निराश हैं। उन्हें लगता है कि आज के ज़माने में कोई ऐसी फ़िल्म की कल्पना कैसे कर सकता है।

अगर यकीन करें तो इस फ़िल्म की स्क्रिप्ट सिर्फ़ १८ दिनों में लिखी गई थी.आत्मविश्वास का मतलब आत्महत्या नहीं है.आदित्य चोपड़ा को यह समझना चाहिए.यशराज की अगली फ़िल्म का निदेशन यश चोपड़ा करेंगे.उसके पहले अनुराग सिंह,शिमित अमीन और कबीर खान की फिल्में आएँगी.

Sunday, November 16, 2008

रब ने बना दी जोड़ी में अलग लग रहे हैं शाहरूख खान



12 दिसंबर को रब ने बना दी जोड़ी रिलीज होगी। दरअसल, यह फिल्म शाहरुख खान से ज्यादा आदित्य चोपड़ा के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि मोहब्बतें के निर्देशन के आठ साल बाद वे रब.. लेकर आ रहे हैं। फिल्म के पोस्टर और पहले गाने को देखकर ऐसा लग रहा है कि यह फिल्म उनकी पहले की फिल्मों से अलग होगी। वैसे, यह शाहरुख के लिए इस लिहाज से भी खास हो जाती है कि ओम शांति ओम के बाद यह उनकी पहली कायदे की फिल्म होगी।
शाहरुख इस बार ओम शांति ओम की तरह आक्रामक जरूर नहीं दिख रहे हैं, लेकिन इस फिल्म को दर्शकों तक ले जाने और उन्हें इस फिल्म के लिए तैयार करने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर भी है। इसी कारण उन्होंने अपने जन्मदिन के मौके पर मीडिया को मन्नत में बुलाया। कोशिश यह थी कि जन्मदिन के मौके पर रब.. की चर्चा आरंभ हो जाए। यशराज और शाहरुख इस रणनीति में सफल रहे। शाहरुख ने विस्तार से फिल्म के बारे में बताया। उन्होंने आदित्य के साथ हुई विमर्श की जानकारी भी दी। जैसे कि पहले पोस्टर में प्रौढ़ शाहरुख को पेश करना। पहले राय बनी थी कि इससे दर्शक निराश होंगे। उन्हें लगेगा कि शाहरुख बूढ़े हो गए हैं। शाहरुख की राय थी, हमें दर्शकों को सच बना देना चाहिए। फिल्म के पोस्टर और प्रचार में यह झलकना चाहिए कि वे फिल्म में क्या देखने जा रहे हैं? अगर इस फिल्म में मैं प्रौढ़ किरदार निभा रहा हूं, तो उसकी जानकारी लोगों को पहले से होनी ही चाहिए। ऐसा न हो कि दर्शकों को सिनेमाघरों जाकर झटका लगे। दर्शकों को नहीं लगना चाहिए कि उन्हें धोखे में रखा गया है। अगर मैं इस फिल्म में साधारण और मध्यवर्गीय बिजली कर्मचारी सुरेन्द्र साहनी की भूमिका निभा रहा हूं, तो यह लोगों को पहले से मालूम होना चाहिए!
शाहरुख ने आगे बताया, हालांकि हर फिल्म में मैं दर्शकों के बीच अपनी इमेज का खयाल रखता हूं, लेकिन इस फिल्म के लिए मैंने हिम्मत की है। फिल्म की कहानी मुझे पसंद आई और अपना किरदार दर्शकों के बीच का लगा। उन्होंने स्पष्ट कहा, अगर लोग मेरी इमेज और लोकप्रियता को किनारे कर दें, तो मैं मध्यवर्गीय साधारण चेहरे वाला लड़का ही हूं। आश्चर्य होता है कि गौरी (पत्नी) ने मुझमें क्या देखा! रब.. में खास संदेश है कि आप जिसके साथ हैं, उसी को प्यार करना सीखें। इससे जिंदगी खुशहाल होगी। पति-पत्नी और प्रेमी-प्रेमिका के भावनात्मक रिश्ते में किसी तीसरे का खयाल आना ही नहीं चाहिए। फिल्म में शाहरुख की दो छवियां हैं। एक प्रौढ़ और दूसरे जवान। दोनों ही रूपों में वे फिल्म की नायिका अनुष्का शर्मा के साथ हैं। चूंकि फिल्म का यही खास ऐंगल है, इसलिए शाहरुख साफ-साफ बताने में हिचकिचाते रहे। हालांकि उन्होंने कहा, मैं कहानी बता देने में कोई बुराई नहीं समझता, लेकिन आजकल रिवाज है कि पहले ज्यादा जानकारी मत दो। चूंकि आदित्य रहस्य बनाए रखना चाहते हैं, इसलिए मैं उनके विरोध में जा भी नहीं सकता। एक तरह से यह अच्छा भी है कि दर्शक अनुमान लगाते रहें कि फिल्म में क्या है!
फिल्म की भूमिका के लिए शाहरुख खान को खास तैयारी करनी भी पड़ी। मध्यवर्गीय आचरण और व्यवहार भूल चुके शाहरुख ने अपने पिछले टीवी शो क्या आप पांचवीं पास से तेज हैं के लिए आए प्रतियोगियों के ऑडिशन के वीडियोज देखे और उनमें से दो प्रतियोगियों के हाव-भाव और अंदाज को अपने लिए पकड़ा। उन्होंने इस फिल्म में मूंछ भी लगाई है। पर्दे पर अपनी मूंछ को लेकर शंकालु शाहरुख को डर भी लग रहा है कि पता नहीं यह दर्शकों को पसंद आएगी भी या नहीं? फिल्म पहेली में उनका चरित्र यानी किशन मूंछ वाला था और उस फिल्म का हाल सभी जानते हैं। शाहरुख के शुभचिंतक मानते हैं कि उन्हें मूंछों को लेकर परेशान नहीं होना चाहिए। इस बार अमोल पालेकर ने नहीं, आदित्य चोपड़ा ने मूंछें लगवाई हैं, तो कोई बात जरूर होगी? वैसे भी, रब.. एक तरह से यशराज फिल्म्स, आदित्य चोपड़ा और शाहरुख खान की मूंछों का मामला है।

Sunday, November 2, 2008

जन्मदिन विशेष:तब शाहरुख गार्जियन बन जाते हैं


-अब्बास टायरवाला

शाहरुख खान की जिन दो फिल्मों अशोका और मैं हूं ना का लेखन मैंने किया, उन दोनों के वे स्वयं निर्माता भी थे। निर्माता होने के साथ ही उन्होंने फिल्मों में लीड भूमिकाएं भी की थीं। गौर करने वाली बात यह है कि दोनों निर्देशकों को ही उन्होंने पहला अवसर दिया था। हालांकि संतोष शिवन पहले फिल्म बना चुके थे, लेकिन हिंदी में यह उनकी पहली फिल्म थी और यह अवसर उन्हें शाहरुख ने ही दिया। वैसे, संतोष हों या फराह खान, दोनों ही उनके पुराने परिचित और करीबी हैं। संतोष से उनकी मित्रता दिल से के समय हुई थी। इसी तरह फराह उनकी फिल्मों में नृत्य-निर्देशन करती रही हैं। फराह को वे छोटी बहन की तरह मानते हैं। शाहरुख के व्यक्तित्व की यही खास बात है कि वे अपने करीबी लोगों के गार्जियन बन जाते हैं या यूं कहें कि लोग उन्हें उसी रूप में देखने लगते हैं। सच तो यह है कि वे अपने मित्र और भरोसे के व्यक्तियों के साथ काम करना पसंद करते हैं। लोग उनके निर्देशक की सूची बनाकर देख सकते हैं। बतौर ऐक्टर वे अपने निर्देशक पर पूरी तरह से निर्भर करते हैं। शायद इसी वजह से भी वे मित्र निर्देशकों की फिल्में करते हैं। अशोका की शूटिंग का किस्सा बताता हूं, जिसमें कुछ नए ऐक्टर थे। शूटिंग करते समय एक प्वॉइंट के बाद शाहरुख के परफॉर्मेस से संतोष संतुष्ट हो जाते थे। शाहरुख के हिसाब से शॉट भी ओके हो जाता था, लेकिन साथ के कलाकारों की किसी छोटी गड़बड़ी से कई बार शॉट फिर से लेना पड़ता था। ऐसे में शाहरुख ने कभी उफ तक नहीं की और न कभी नए ऐक्टरों के बारे में कुछ कहा! वे शांत भाव से ओके किए शॉट को ही रिपीट कर देते थे। उनकी यह खूबी होती थी कि नए शॉट में वे कुछ नया नहीं जोड़ते थे। वे पहले शॉट की तरह खास समय पर ही पलकें झपकाते थे, टर्न लेते थे और मुस्कराते थे। दो-चार सेकंड भी आगे-पीछे नहीं होते थे। शाहरुख की ऐक्टिंग या कैमरे के सामने उनका परफॉर्मेस कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग की तरह होता है। वे मेथॅड ऐक्टर नहीं हैं, लेकिन उनकी ऐक्टिंग की अपनी मेथॅडोलॉजी है। शाहरुख को जानना मुश्किल काम नहीं है। दरअसल, उनके बारे में हर कोई सारी बातें जानता है। उनसे चालू किस्म की जान-पहचान सभी से रहती है, लेकिन आप उन्हें किसी परिचित या स्टार से अधिक नहीं जान पाते। वे बहुत ही उम्दा अभिनेता हैं। पर्दे की तरह वे जिंदगी में भी बारीकी से अभिनय करते हैं और आपको दोस्त बताते हुए भी खुद से दूर रखते हैं। शाहरुख को गहरे दोस्त और व्यक्ति के रूप में जानना बहुत कम लोगों को नसीब हुआ है। वे सभी से कायदे से बात करते हैं। खुलकर जरूर मिलते हैं, लेकिन यदि लोग गौर करेंगे, तो पाएंगे कि वे अपने इर्द-गिर्द ऊंची दीवार तो नहीं, लेकिन एक पर्दा जरूर रखते हैं। उस पर्दे के पार के इनसान और शाहरुख को जान पाना आसान नहीं है। दरअसल, उस पर्दे के भीतर बहुत कम लोगों को ही आने दिया जाता है। पर्दे के बाहर से जो झीना-झीना दिखता है, वह बहुत साफ और सच्चा नहीं होता। असली शाहरुख तो पर्दे के अंदर हैं। शाहरुख ने कामयाबी हासिल की है, जो कि उन्हें किसी से खैरात में नहीं मिली है। लोग देखें कि दिल्ली से आया एक लड़का कैसे मुंबई में धीरे-धीरे सबसे मजबूत और चमकता सितारा बन गया! इसके पीछे उनकी मेहनत और लगन है। दर्शकों ने उन्हें सिर पर बिठाया, लेकिन शाहरुख ने यह साबित किया कि वे इस काबिल हैं। उन्होंने अपने प्रशंसक और दर्शकों को कभी निराश नहीं किया। उन्होंने निर्माता-निर्देशकों को हमेशा उचित सम्मान दिया और सेट पर शूटिंग के वक्त निर्देशक के हर आदेश का पालन भी किया। मैंने देखा है कि वे दूसरों की तरह निर्देशकों को सुझाव नहीं देते। मैं चाहूंगा कि भविष्य में कभी उन्हें निर्देशित करूं। मुझे पूरा यकीन है कि वे अपने पुराने निर्देशकों की तरह मुझ पर भी भरोसा करेंगे। उनके साथ काम करने का मेरा पिछला अनुभव हर लिहाज से सुखद और फायदेमंद रहा। उनके जन्मदिन पर बधाई देने के साथ मैं उनकी सुखद जिंदगी और कामयाब करियर की दुआ करता हूं।

Monday, May 19, 2008

माँ से नहीं मिले खली पहलवान

खली पहलवान भारत आए हुए हैं.आप पूछेंगे चवन्नी को पहलवानी से क्या मतलब? बिल्कुल सही है आप का चौंकना. कहाँ चवन्नी चैप और कहाँ पहलवानी?
चवन्नी को कोई मतलब ही नहीं रहता.मगर खली चवन्नी की दुनिया में आ गए.यहाँ आकर वे राजपाल यादव के साथ फोटो खिंचवाते रहे और फिर रविवार को धीरे से मन्नत में जा घुसे.मन्नत ??? अरे वही शाहरुख़ खान का बंगला.बताया गया की आर्यन और सुहाना खली पहलवान के जबरदस्त प्रशंसक हैं.प्रशंसक तो आप के भी बच्चे हो सकते हैं,लेकिन खली वहाँ कैसे जा सकते हैं।बेचारे खली पहलवान के पास तो इतना समय भी नहीं है कि वे माँ के पास जा सकें.चवन्नी को पता चला है कि खली की माँ ने घर का दरवाजा ८ फीट का करवा दिया है.उसे ४ फीट चौडा भी रखा है,ताकि लंबे-चौड़े हो गए बेटे को घर में घुसने में तकलीफ न हो.वहाँ नए दरवाजे के पास बैठी माँ खली का इंतज़ार कर रही है और यहाँ खली पहलवान शाहरुख़ खान के बेटे-बेटी का मनोरंजन कर रहे हैं।
ऐसा कैसे हो रहा कि ढाई साल के बाद अपने देश लौटा बेटा माँ के लिए समय नहीं निकल पा रहा है.ऐसा भी तो नहीं है कि उसके पास गाड़ी-घोडा नहीं है.उसे तो बस सोचना है और सारा इन्तेजाम हो जायेगा.लगता है खली पहलवान कद-काठी से जितना बड़ा हुआ है,भावनाओं में उतना ही छोटा हो गया है.क्या आप को नहीं लगता कि उसे सबसे पहले अपनी माँ तंदी देवी का दर्शन करना चाहिए था और पिता ज्वाला राम का आशीर्वाद लेना चाहिए था।
हर भारतीय के मन में किसी न किसी रूप में फिल्मों से जुड़ने की दबी इच्छा रहती है.चवन्नी को लगता है कि खली पहलवान भी इसी इच्छा के वशीभूत होकर मुम्बई के चक्कर लगा रहा है.ख़बर मिली है कि उसे एक-दो फिल्में भी मिल गई हैं.

Tuesday, April 22, 2008

शाहरुख़ की हिन्दी पर वाह कहें!!!!


शाह शाहरुख़ खान का प्यार का नाम है.उनके करीबी उन्हें इसी नाम से पुकारते है.चवन्नी ने सोचा कि नाम लेकर ही शाहरुख़ के करीब होने का भ्रम पाल लिया जाए.मजाक एक तरफ़...इस पोस्ट में चवन्नी शाहरुख़ की हिन्दी से आपको परिचित कराएगा.चवन्नी को अच्छी तरह मालूम है कि शाहरुख़ को हिन्दी आती है.कम से कम वे हिन्दी बोल और समझ सकते हैं.आज के अभिनेता-अभिनेत्री तो हिन्दी बोलने की बात आने पर ही कसमसाने लगते हैं.शाहरुख़ को पांचवी पास इतनी हिन्दी अवश्य आती है.चवन्नी हिन्दी लिखने और पदने के सन्दर्भ में यह बात कर रहा है.चूंकि वे दिल्ली में रहे हैं और परिवार में दिल्ली की भाषा ही बोली जाती थी,इसलिए वे समझ भी सकते हैं.चवन्नी को आश्चर्य होता है कि हिन्दी के नाम पर नाक-भौं सिकोरने वाले शाह को हिन्दी लिखने की क्या जरूरत पड़ गई है.यह मनोरंजन की माया है,जहाँ राजनीति की तरह हिन्दी ही चलती है.पिछले दिनों शाहरुख़ खान ने हिन्दी में एक संदेश लिखा.बड़ा भारी जलसा था....वहाँ शाहरुख़ खान ने यह संदेश स्वयं लिखा.अब आप ऊपर की तस्वीर को ठीक से देखें.आप पायेंगे कि शाह को पढ़ते रहिये के ढ के नीचे बिंदी लगाने की जरूरत नहीं महसूस हुई.उन्हें कोई बताने वाला भी नहीं था कि वे पढ़ते को ग़लत तरीके से लिख रहे है.शाह की इस हिन्दी पर हम वाह ही कर सकते हैं.यह क्या कम एहसान है कि देश का इतना बड़ा स्टार यानि किंग खान हिन्दी लिख रहा है?आप चाहें तो इसी पर गुमान कर लें या फिर दुःख हो रहा हो तो उन्हें पत्र लिखें.अपनी शिकायत दर्ज करे.

Monday, March 10, 2008

शाहरुख़ खान ने पढी कविता

शाहरुख़ खान ने समर खान की फ़िल्म 'शौर्य' के लिए एक कविता पढी है.इसे जयदीप सरकार ने लिखा है।

शौर्य क्या है?
शौर्य क्या है?
थरथराती इस धरती को रौंदती फौजियों के पलटन का शौर्य
या सहमे से आसमान को चीरता हुआ बंदूकों की सलामी का शौर्य
शौर्य क्या है?
हरी वर्दी पर चमकते हुए चंद पीतल के सितारे
या सरहद का नाम देकर अनदेखी कुछ लकीरों की नुमाईश
शौर्य क्या है?
दूर उड़ते खामोश परिंदे को गोलियों से भून देने का एहसास
या शोलों की बरसातों से पल भर में एक शहर को श्मशान बना देने का एहसास
शौर्य क्या है?
बैठी हुई आस में किसी के गर्म खून सुर्ख हो जाना
या अनजाने किसी जन्नत की फिराक में पल-पल का दोज़ख हो जाना
बारूदों से धुन्धलाये इस आसमान में शौर्य क्या है?
वादियों में गूंजते किसी गाँव के मातम में शौर्य क्या है?
शौर्य क्या है?
शयद एक हौसला,शयद एक हिम्मत......
मजहब के बनाये दायरे को तोड़कर किसी का हाथ थाम लेने की हिम्मत
गोलियों के बेतहाशा शोर को अपनी खामोशी से चुनौती देने की हिम्मत
मरती-मारती इस दुनिया में निहत्थे डटे रहने की हिम्मत
शौर्य
आने वाले कल की खातिर अपनी कायनात को आज बचा लेने की हिम्मत
शौर्य क्या है?

Thursday, January 31, 2008

सिगरेट और शाहरुख़ खान

शाहरुख़ खान ने कहा कि फिल्मों में सिगरेट पीते हुए कलाकारों को दिखाना कलात्मक अधिकार में आता है और इस पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए.अगर आप गौर से उस समाचार को पढें तो पाएंगे कि एक पंक्ति के बयान से खेला गया है.फिल्म पत्रकारिता की यही सामाजिकता है।

हमेशा बहस कहीं और मुड़ जाती है.सवाल फिल्मों में किरदारों के सिगरेट पीने का नहीं है.सवाल है कि आप उसे अपने प्रचार में क्यों इस्तेमाल करते हैं.क्या पोस्टर पर स्टार की सिगरेट पीती तस्वीर नहीं दी जाये तो फिल्म का प्रचार नहीं होगा ?चवन्नी ने देखा है कि एक ज़माने में पोस्टर पर पिस्तौल जरूर दिखता था.अगर फिल्म में हत्या या बलात्कार के दृश्य हैं तो उसे पोस्टर पर लाने की सस्ती मानसिकता से उबरना होगा. फिल्म के अन्दर किसी किरदार के चरित्र को उभारने के लिए अगर सिगरेट जरूरी लगता है तो जरूर दिख्यें.लेकिन वह चरित्र का हिस्सा बने,न कि प्रचार का।

शाहरुख़ खान इधर थोड़े संयमित हुए हैं.पहले प्रेस से मिलते समय कैमरे के आगे वे बेशर्मों की तरह सिगरेट पीते रहते थे.इधर होश आने पर उन्होंने कैमरे के आगे सिगरेट से परहेज कर लिया है.चवन्नी को याद है एक बार किसी टॉक शो में उन्होंने इसी सवाल पर कहा था कि मैं अपने प्रशंसकों को को सिगरेट पीने के लिए नहीं कहता.यह मेरी व्यक्तिगत पसंद है.आप क्यों अपनाते हैं?अब उन्हें कौन समझाए कि एक स्टार अगर सार्वजनिक तौर पर सिगरेट पीता है तो उसका क्या असर होता है?

इस मामले में उन्हें आमिर खान से सीखना चाहिए.तारे ज़मीन पर की रिलीज के समय आमिर ने यह लत पकड़ ली थी,लेकिन उस फिल्म के धुआंधार प्रचार में वे कहीं भी सिगरेट पीते नज़र नहीं आये.अमिताभ बच्चन पर जब आपत्ति की गयी थी तो उन्होंने माफ़ी माँग ली थी.

Monday, January 28, 2008

शाहरुख़ खान को फ़्रांस का सम्मान

शाहरुख़ खान को कल रात फ़्रांस के राजदूत जेरोम बोनाफों ने फ़्रांस के प्रतिष्ठित insignia of officer in the order of arts & letters से सम्मानित किया.उन्हें यह सम्मान इसलिए दिया गया है कि उन्होंने कला और साहित्य के क्षेत्र में प्रसिद्धि पायी है और फ़्रांस एवं शेष दुनिया में उसे प्रचारित भी किया है.यह हिन्दी फिल्मों का जलवा है.शाहरुख़ खान को इतराने का यह मौका उसी हिन्दी फिल्म ने दिया है,जिसमें बोलने और बात करने से वे कतराते हैं.उस पर चवन्नी फिर कभी विस्तार से बताएगा।

कल रात मुम्बई के एक पंचसितारा होटल में यह सम्मान दिया गया.फ़्रांस के राजदूत महोदय ने आश्वस्त किया कि भविष्य में हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं की फिल्मों को ज्यादा तरजीह दी जायेगी.कोशिश रहेगी कि कान फिल्म महोत्सव में भारत की फिल्में आमंत्रित की जाएँ.राजदूत महोदय ने स्वीकार किया कि फ़्रांस अभी तक भारतीय फिल्मों को अधिक तवज्जो नहीं दे रहा था।

इस अवसर पर शाहरुख़ खान ने फ्रांसीसी फिल्मों की तारीफ की और जोर देकर कहा कि हर दर्शक और फिल्मकार को फ़्रांस की फिल्में देखनी चाहिए.उन्होंने बगैर किसी शर्म के बताया कि वे दिल्ली में जवानी के दिनों में फ्रांसिसी फिल्में देखा करते थे.देखने के मुख्य वजह उन फिल्मों के प्रणय दृश्य होते थे।

फ़्रांस के अपने अनुभव बांटते हुए उनहोंने बताया कि उन्हें इस बात का एहसास है कि वे फ़्रांस में काफी पॉपुलर हैं.एक बार वे मशहूर रित्ज़ होटल में ठहरे थे.होटल से निकलने लगे तो भीड़ उमड़ पड़ी.किसी ने कहा कि यह टॉम क्रूज़ नहीं है ,फिर इतनी भीड़ क्यों?थोडी देर में भीड़ का एक और रेला शाहरुख़ खान और एस आर के चिल्लाता हुआ आया और सवाल पूछने वाला उस लहर में खो गया.