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Showing posts from October, 2007

'नो स्मोकिंग' का के काफ्का नहीं कश्यप है ... अनुराग कश्यप

हिंदी फिल्मों के अंग्रेजी समीक्षकों पर चवन्नी की हैरानी बढ़ती ही जा रही है. एक अंग्रजी समीक्षक ने तो 'नो स्मोकिंग' के बजाए अनुराग कश्यप की ही समीक्षा कर दी. वे अनुराग से आतंकित हैं. उनके रिव्यू में यह बात साफ झलकती है. क्यों आतंकित हैं? क्योंकि अनुराग उन्हें सीधी चुनौती देते हैं कि आप खराब लिखते हो और हर लेखन के पीछे निहित मंशा फिल्म नहीं ... कुछ और रहती है. 'नो स्मोकिंग' को लेकर बहुत कुछ लिखा और कहा जा रहा है. अनुराग कश्यप की यह फिल्म कुछ लोगों की समझ में नहीं आई, इसलिए निष्कर्ष निकाल लिया गया कि फिल्म बुरी है. इस लॉजिक से तो हमें जो समझ में न आए, वो सारी चीजें बुरी हो गई. समझदारी का रिश्ता उपयोगिता से जोड़कर ऐसे निष्कर्ष निकाले जाते हैं. आज की पीढ़ी संस्कृत नहीं समझती तो फिर संस्कृत में लिखा सब कुछ बुरा हो गया. और संस्कृत की बात क्या करें ... आज तो हिंदी में लिखा भी लोग नहीं पढ़ पाते, समझ पाते ... तो फिर मान लें कि हम सभी हिंदी में लिखने वाले किसी दुष्कर्म में संलग्न हैं. कला और अभिव्यक्ति के क्षेत्र में वह तुरंत पॉपुलर और स्वीकृत होता है, जो प्रचलित रूप और फॉर्म अप

रतलाम की गलियां

चवन्नी तो रवि रतलामी की वजह से रतलाम को जानता था.उसने अभी जब वी मेट फिल्म देखी.इसमें शाहिद कपूर के पीछे उतरी करीना की ट्रेन छोट जाती है तो वह शहीद पर ट्रेन पकड़वाने का दवाब डालती है.दोनों टैक्सी से रतलाम स्टेशन पहुँचते हैं.सामने प्लेटफॉर्म पर ट्रेन खड़ी है ,लेकिन करीना पानी के बोतल की ज्यादा कीमत के लिए उलझ जाती है और कंज्यूमर कोर्ट में जाने तक की बात करती है.इस बहस में उसकी ट्रेन फिर से छोट जाती है.फिर रतलाम रात की बाँहों में दिखाई पड़ता है.कुछ मनचले दिखते हैं.ऐसे मनचले हर शहर में प्लेटफॉर्म और बस स्टैंड पर मिल जायेंगे.चवन्नी को याद है कि कॉलेज के दिनों में उसके कुछ दोस्तों की शामें स्टेशन पर ही गुजरती थीं.उन्हें ट्रेन के आने-जाने का पूरा आईडिया रहता था.यहाँ तक तो सब सही लगता है। करीना प्लेटफॉर्म से बाहर आती है तो स्टेशन के बाहर उन औरतों के बीच अनजाने में खड़ी हो जाती है ,जो रात के ग्राहकों के इंतज़ार में हैं.तभी एक युवक मोटर साइकिल पर आता है और करीना से सौदा करता है.करीना उसे समझती है कि वह उस टाइप की नही है.वह युवक पीछे ही पड़ जाता है तो भागती है.संयोग से उसे फिर से शाहिद कपूर दिखता ह

चांद और हिन्दी सिनेमा

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चवन्नी ने हाल में ही सबसे बड़ा चांद देखा.हिन्दी फिल्मों में शुरू से चांद दिखता रहा है.फिल्मी गीतों चांद का प्रयोग बहुतायत से होता रहा है।गुलजार की हर फिल्म चांद के गीत से ही पूरी होती है.चवन्नी को कुछ गीत याद आ रहे हैं.कुछ आप याद दिलाएं. -चंदा ओ चंदा... -चंदा है तू मेरा सूरज है तू -चांद आहें भरेगा... -चांद को क्या मालूम... माफ करें आज कीबोर्ड नाराज दिख रहा है।मैं अपनी सूची नहीं दे पा रहा हूं. क्या आप सभी एक -एक गीत टिप्पणियों में देंगे?

अभिमान निषेध

हाल ही में गोवा की एक गैर सरकारी संस्था ने शाहरुख़ खान को नोटिस भेजी है.शाहरुख़ खान को १५ दिनों के अन्दर सफ़ाई भेजनी है की वे सार्वजनिक जगहों पर क्यों धूम्रपान करते हैं.सही सवाल उठाया गया है की उनके इस उच्छृंखल व्यवहार का किशोरों पर बुरा असर पड़ता है। फिल्म अभिनेताओं और अभिनेत्रियों पर किसी भी प्रकार का निषेध लगाने से पहले ज़रूरी है कि उन पर अभिमान निषेध लगाया जाये.चवन्नी को इन स्टारों से मिलने के कई मौके मिले हैं और आगे भी मिलेंगे.बातचीत के दरम्यान थोडा बेतक़ल्लुफ़ होने पर इनका अभिमान जाग पड़ता है. अहम् सिर उठता है.लगभग सारे ही सितारे आत्मरति,आत्ममोह,आत्ममुग्धता और अंहकार के शिकार हैं.शाहरुख़ खान की बातचीत देखें और सुनें तो जाम की तरह छलकते उनके अहम् से आप गीले तक हो सकते हैं.सिर्फ शाहरुख़ ही क्यों ...हर स्टार केवल अपनी ही बात करता नज़र आता है। अभिमान होना या स्वाभिमानी होना गलत नही है,लेकिन अभिमान हद से बढे तो अंहकार बनता है और अहंकारी व्यक्ति अनजाने में अपना ही नुकसान करता रहता है.फिल्म जगत के लोगों को अपने अंहकार में नष्ट होते चवन्नी ने देखा,पढा और सुना है.चवन्नी की सिफारिश ह

दर्शनीय व विमर्श योग्य है नो स्मोकिंग

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-अजय ब्रह्मात्मज अनुराग कश्यप की इस फिल्म को कृपया जॉन अब्राहम की फिल्म समझ कर देखने न जाएं। हिंदी में स्टार केंद्रित फिल्में बनती हैं, जिनमें निर्देशक का हस्ताक्षर पहचान में ही नहीं आता। अनुराग कश्यप युवा निर्देशकों में एक ऐसे निर्देशक हैं, जिनकी फिल्में अभी तक स्टारों पर निर्भर नहीं करतीं। ऊपरी तौर पर यह के (जान अब्राहम) की कहानी है। उसे सिगरेट पीने की बुरी लत है। चूंकि वह बेहद अमीर है, इसलिए उसे लगता है कि उसकी लतों और आदतों को बदलने की सलाह भी उसे कोई नहीं दे सकता। एक स्थिति आती है, जब उसकी बीवी उसे आखिरी चेतावनी देती है कि अगर उसने सिगरेट नहीं छोड़ी तो वह उसे छोड़ देगी। वह घर से निकल भी जाती है। के अपनी बीवी से बेइंतहा प्यार करता है। बीवी को वापस लाने के लिए वह सिगरेट छोड़ने की कोशिश में बाबा बंगाली से मिलता है। यहां से उसकी जिंदगी और लत को बाबा बंगाली नियंत्रित करते हैं। इसके बाद एक ऐसा रूपक बनता है, जिसमें हम इस संसार में रिश्तों की विदू्रपताओं को देखते हैं। स्वार्थ के वशीभूत दोस्त भी कितने क्रूर और खतरनाक हो सकते हैं। फिल्म के अंत में हम देखते हैं कि के भी उसी विद्रूपता का शिक

जब वी मेट: भारतीयता का रसीला टच

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-अजय ब्रह्मात्मज इम्तियाज अली की जब वी मेट शुद्ध मनोरंजक रोमांटिक कामेडी है। फिल्म पहले ही दृश्य से बांधती है। मुंबई से भटिंडा तक के सफर में यह फिल्म आपको हंसाती, गुदगुदाती और रिझाती हुई ले जाती है। शाहिद कपूर और करीना कपूर की रोमांटिक जोड़ी फिल्म का सबसे मजबूत और प्रभावशाली आधार है। आदित्य (शाहिद) अपने कंधों पर अचानक आ गई जिम्मेदारी से घबराकर यूं ही निकल जाता है। उसका यह निष्क्रमण गौतम बुद्ध की तरह नहीं है। वस्तुत: वह अपनी जिम्मेदारियों से पलायन करता है। ट्रेन में उसकी मुलाकात गीत (करीना कपूर) से होती है। बक-बक करने में माहिर गीत के दिल से खुशी लगातार छलक-छलक पड़ती है। जिंदगी को अपने ढंग से जीने पर आमादा गीत अपनी मुश्किलों में आदित्य को ऐसा फंसाती है कि उसे भटिंडा तक जाना पड़ता है। जब वी मेट एक स्तर पर दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे का भारतीय और अल्प बजट संस्करण है। मुंबई से मध्यप्रदेश, फिर राजस्थान और पंजाब होते हुए हिमाचल तक की यात्रा में हम विभिन्न प्रसंगों में ऐसे दृश्य देखते हैं, जो मुंबई फिल्म इंडस्ट्री के फिल्मकारों के अनुभव और कल्पना के परे हैं। इम्तियाज अली के सटीक संवाद और दृश

अनुराग कश्यप का पक्ष

(चवन्नी ने अनुराग कश्यप के ब्लॉग का एक अंश तीन दिनों पहले पोस्ट किया तह.तभी वादा किया था कि पूरा पोस्ट जल्दी ही आप पढेंगे.पेश है सम्पूर्ण पोस्ट...आप पढें और अपनी राय ज़रूर दें.एक विमर्श शुरू हो तो और अच्छा... ) कोई वास्तव में होवार्ड रोअर्क नहीं हो सकता ॥ बाकी सब 'उसकी तरह होना' चाहते हैं … आयन रैंड की सफलता इसी तथ्य में है कि उनहोंने एक ऐसे हीरो का सृजन किया, जिसकी तरह हर कोई होना चाहेगा, लेकिन हो नहीं सकेगा … वह खुद जीवन से पलायन कर अपने किसी चरित्र में नहीं ढल सकीं। दुनिया को बदलने की ख्वाहिश अच्छी है, कई बार इसे बदलने की कोशिश भी पर्याप्त है, वास्तव में बदल देना तो चमत्कार है … हमलोग अपने इंटरव्यू में ढेर सारी बातें करते हैं, उससे ज्यादा हम महसूस करते हैं, लेकिन बता नहीं पाते हैं। अनाइस नीन के शब्‌दों में, हम सभी जो कह सकते हैं, वही कहना लेखक का काम नहीं है, हम जो नहीं कह सकते, लेखक वह कहे …' इस लेख को लिखने की वजह मुझ पर लगातार लग रहे आरोप हैं, जिनमें मैं जूझता रहा हूं … मैं ईमानदारी से सारे सवालों के जवाब देता हूं, उन जवाबों को संपादित कर संदर्भ से अलग कर सनसनी फैल

शुक्रवार ,२६ अक्टूबर ,२००७

अक्टूबर महीने का आखिरी शुक्रवार है.तीन फिल्में रिलीज हो रही हैं.सबसे पहले उन फिल्मों की बाट कर लें। विक्रम भट्ट अब फिल्में पेश करने लगे हैं.लगातार १० फ्लॉप फिल्में बनाने के बाद उनका यह फैसला दर्शकों के लिए कितना खुशगवार होगा...यह टू वक्त ही बताएगा.इस हफ्ते उनकी पहली पेशगी 'मुम्बई सालसा' आ रही है.इसे मनोज त्यागी ने दिरेक्ट किया है.अगर आप मेट्रो शहरों में नही रहते तो अपने जोखिम पर ही इस फिल्म को देखने जाएं.सेक्स,रोमांस और रिश्तों की ऐसी उलझन समझना छोटे शहरों के दर्शकों की कल्पने से परे है। इम्तियाज़ अली की 'जब वी मेट 'रोमांटिक कॉमेडी है.चवन्नी गारंटी लेता है की इस फिल्म पर खर्च किया आप का एक भी पैसा फिजूल नही जायेगा.हंसने,खुश होने और राहत महसूस करेंगे आप यह फिल्म देख कर.दीवाली के पहले की छुट्टी या रविवार को पूरे परिवार के साथ भी आप यह फिल्म देख सकते हैं.इस फिल्म की खूबियों के बारे में आप बताएं.चवन्नी की राय में शहीद कपूर और करीना कपूर की जोड़ी को इतने रोमांटिक अंदाज़ में पहले नही देखा.इम्तियाज़ अली की पीठ थपथपाप्यें और छोटे शहरों से आये निर्देशकों को बढावा दें तो और भी ऐस

नया हिंदी सिनेमा -अनुराग कश्यप

(अनुराग कश्यप ने अपने ब्लोग पर नये पोस्ट में नया हिन्दी सिनेमा को लेकर अपना पक्ष रखा है.चवन्नी आज उसका एक अंश प्रस्तुत कर रहा है.पूरा आलेख एक-दो दिनों में आपके सामने होगा) कोई वास्तव में होवार्ड रोअर्क नहीं हो सकता .. बाकी सब 'उसकी तरह होना' चाहते हैं … आयन रैंड की सफलता इसी तथ्य में है कि उनहोंने एक ऐसे हीरो का सृजन किया, जिसकी तरह हर कोई होना चाहेगा, लेकिन हो नहीं सकेगा … वह खुद जीवन से पलायन कर अपने किसी चरित्र में नहीं ढल सकीं। दुनिया को बदलने की ख्वाहिश अच्छी है, कई बार इसे बदलने की कोशिश भी पर्याप्त है, वास्तव में बदल देना तो चमत्कार है … हमलोग अपने इंटरव्यू में ढेर सारी बातें करते हैं, उससे ज्यादा हम महसूस करते हैं, लेकिन बता नहीं पाते हैं। अनाइस नीन के शब्‌दों में, हम सभी जो कह सकते हैं, वही कहना लेखक का काम नहीं है, हम जो नहीं कह सकते, लेखक वह कहे …' इस लेख को लिखने की वजह मुझ पर लगातार लग रहे आरोप हैं, जिनमें मैं जूझता रहा हूं … मैं ईमानदारी से सारे सवालों के जवाब देता हूं, उन जवाबों को संपादित कर संदर्भ से अलग कर सनसनी फैलाने के लिए छाप दिया जाता है … ' नो

गुड्डी में जया की जगह डिंपल आ जातीं तो....

चवन्नी इन दिनों सैबल चटर्जी की गुलज़ार पर लिखी किताब द लाइफ एंड सिनेमा ऑफ़ गुलज़ार पढ़ रहा है.इस किताब में एक रोचक प्रसंग है.आदतन चवन्नी आप को बता रहा है। आनंद के बाद हृषिकेश मुखर्जी और गुलज़ार गुड्डी पर काम कर रहे थे।इस फिल्म के लिए नयी अभिनेत्री की ज़रूरत थी। हालांकि यह ज़रूरत आखिरकार जया भादुड़ी ने पूरी की,लेकिन उसके पहले किसी और के नाम का सुझाव आया था.गुलज़ार तब एच एस रवैल के यहाँ आया-जाया करते थे। उनकी पत्नी अंजना भाभी से उनकी छनती थी.गुलज़ार ने वहाँ एक लड़की को आते-जाते देखा था.एक दिन अंजना भाभी ने गुलज़ार को बताया कि वह रजनी भाई की बेटी है और फिल्मों में काम करना चाहती है। उसका नाम डिंपल कापडिया है। गुलज़ार ने हृषिकेश मुखर्जी को डिंपल के बारे में बताया,लेकिन हृषिकेश मुखर्जी के दिमाग में पहले से जया भादुड़ी थीं। हृषिकेश मुखर्जी ने पूना के फिल्म संस्थान में एक फिल्म देखी थी.उस फिल्म कि लड़की उन्हें अपनी फिल्म गुड्डी के लिए उपयुक्त लगी थी.उनहोंने गुलज़ार को सलाह दी कि जाकर पूना में उस से मिल आओ। गुलज़ार और हृषिकेश मुखर्जी के छोटे भाई हृषिकेश मुखर्जी से लगातार पूछते रहे कि कब पूना चलना है।

आमिर की ईमानदारी

चवन्नी को आमिर खान पसंद हैं.अपनी बातों और प्रतिक्रियाओं से वे इस में इजाफा करते हैं.पिछले दिनों उनके भाई फैसल को लेकर कई तरह की खबरें आयीं.मीडिया का एक तबका आमिर के पीछे लगा ही रहता है.उसे मौका मिल गया .उन सभी ने फैसल की मानसिक बीमारी के लिए आमिर को जिम्मेदार ठहराया और उनकी लानत-मलामत की.आमिर आदतन चुप रहे.यह वक्त भी नही है कि आमिर चिल्ला कर सबको दिल की बाट बताएं। बहरहाल,आमिर ने अपने प्रशंसकों से वादा किया है कि वे अपनी हर बात उनसे शेयर करेंगे सो उनहोंने अपने वेब साईट पर चंद पंक्तियों में अपनी दशा का ज़िक्र किया है.उनहोंने लिखा है कि .... मुझे माफ़ करें दोस्तों,मेरी परिस्थितियां ऐसी हो गयी हैं कि में आप से किसी भी प्रकार का सार्थक संवाद नही कर सकता.कृपया मेरी तकलीफ समझें.यह वक्त मेरे लिए और मेरे परिवार के लिए अत्यंत मुश्किल है.उम्मीद करता हूँ कि जल्दी ही कुछ लिखूंगा। चवन्नी के एक पत्रकार मित्र ने बिलकुल सही लिखा कि आमिर के भाई फैसल को माइक की नही मेडीसिन की ज़रूरत है। आमिर के पिता ताहिर हुस्सैन के बारे में सभी जानते हैं.आमिर की मां के साथ वे नही रहते.उनकी आमिर से अलग किस्म की खटपट है.वे

कहीं से भी अपील नहीं करती स्पीड

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-अजय ब्रह्मात्मज कई बार फिल्म के शीर्षक का कहानी से कोई ताल्लुक नहीं होता। स्पीड के साथ ऐसी ही बात है। पूरी फिल्म निकल जाने के बाद सहसा ख्याल आता है कि फिल्म का नाम स्पीड क्यों रखा गया? बहरहाल, स्पीड विक्रम भट्ट की फिल्म है। भट्ट कैंप से निकलने के बाद विक्रम भट्ट की कोई भी फिल्म दर्शकों को पसंद नहीं आई है। ऐसा क्यों होता है कि कैंप या बैनर से छिटकने के बाद युवा निर्देशक पस्त हो जाते हैं। कुछ निर्देशक दिशानिर्देश मिले तभी अच्छा काम कर सकते हैं। विक्रम भट्ट को जल्दी ही एक ठीक-ठाक फिल्म बनानी होगी अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए। स्पीड की कहानी लंदन में घटित होती है। इस फिल्म में मोबाइल फोन का प्रचुर इस्तेमाल हुआ है। कह लें कि वह भी एक जरूरी कैरेक्टर बन गया है। वह लिंक है कैरेक्टरों को जोड़ने का। संदीप (जाएद खान) भारत से लंदन गया है अपनी प्रेमिका संजना (तनुश्री दत्ता) को समझाने। उसे एक रांग काल आता है, जो अपहृत हो चुकी युवती (उर्मिला मातोंडकर) का है। उसका अपहरण कर फिल्म का खलनायक आफताब शिवदासानी उसके पति सिद्धार्थ (संजय सूरी) से एक हत्या करवाना चाहता है। हत्या भी किसी मामूली आदमी की नहीं, भार

शुक्रवार,१९ अक्टूबर,2007

फिर से आया शुक्रवार ... आज रिलीज हो रही फिल्मों में स्पीड और बाल गणेश का उल्लेख किया जा सकता है.बाल गणेश एनीमेशन फिल्म है और बच्चों को ध्यान में रख कर बनायीं गयी है.गणेश पर एक और एनीमेशन फिल्म आ चुकी है.अब चूंकि अपने देश में एनीमेशन फिल्में अभी घुटनों के बाल चल रही हैं तो चवन्नी ज्यादा उम्मीद नही रखता और न चाहता है कि आप ही कोई उम्मीद रखें. स्पीड विक्रम भट्ट की फिल्म है.विक्रम भट्ट पिछली कुछ फिल्मों से दर्शकों को पसंद नही आ रहे हैं.हो सकता है इस बार कोई चमत्कार हो जाये.चवन्नी चमत्कार की बात इसलिए कर रहा है कि फिल्म की कहानी और कलाकारों की सूची देख कर अधिक उम्मीद नही की जा सकती.यह फिल्म लंदन की पृष्ठभूमि पर बनी है.रहस्य,रोमांस, कर्तव्य और प्रेम की यह कहानी पसंद आ जाये तो विक्रम भट्ट का भला हो जाये. पिछले हफ्ते करीना और सैफ के प्रेम संबंधो की खूब चर्चा रही.इस पूरे प्रसंग में मजेदार तथ्य है कि करीना या शहीद ने अभी तक यह नही कहा है कि उनके संबंध खत्म हो गए हैं.अगर यह खबर अफवाह निकली तो इस साल की सबसे बड़ी अफवाह होगी जो फिल्म के प्रचार के लिए इस्तेमाल की जा रही है.शहीद खामोश हैं.सैफ ने कहा

कहां गए खलनायक?

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(चवन्नी को अजय ब्रह्मात्मज का यह आलेख दशहरा के मौक़े पर थोडे अलग ढंग का लगा.चवन्नी ने अपने पाठकों के लिए इसे जागरण से लिया है।) निश्चित रूप से लोग भी यही सोच रहे होंगे कि चूंकि दशहरे का समय है और तीन दिनों के बाद बुराई के सर्वनाश के प्रतीक के रूप में रावण के पुतले जलाए जाएंगे, लेकिन क्या आपने सोचा और देखा कि हिंदी फिल्मों से रावण अब लगभग गायब हो गए हैं! कहने का तात्पर्य यह है कि हीरो तो हैं और विविध रूपों में हैं, लेकिन विलेन गायब हो गए हैं। थोड़े-बहुत कुछ फिल्मों में दिखते भी हैं, तो वे पिद्दी जैसे नजर आते हैं। सबसे पहले सूरज बड़जात्या और फिर आदित्य चोपड़ा और करण जौहर ने अपनी फिल्मों से विलेन को गायब किया। तीनों की पहली फिल्म आप याद करें, तो पाएंगे कि उनमें खलनायक है ही नहीं! दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे में पिता आरंभिक विरोध करते हैं और लगता है कि वे हीरो-हीरोइन के प्रेम में विघ्न पैदा करेंगे, लेकिन हीरोइन उनसे बगावत नहीं करती और हीरो मुकाबला नहीं करता। दोनों पिता का दिल जीतते हैं, इस कहानी में हीरोइन का मंगेतर हीरो के मुकाबले में आता है, लेकिन पूरी कहानी में उसकी जगह किसी प्यादे से ज

एकलव्य ही गयी ऑस्कर

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ऑस्कर से जारी सूची में एकलव्य शामिल है. देश में ऑस्कर को लेकर चल रहा विवाद घिनौने स्तर तक पहुंच गया था.मामला कोर्ट तक गया.चवन्नी नही समझ पा रहा है कि क्यों हर बार कोई भी पुरस्कार,सम्मान और प्रतिष्ठा को पहले शक की निगाह से देखा जाता है.उस पर सवाल उठाये जाते हैं.विवाद खडा होता है.कुल मिला कर स्वाद खट्टा हो जाता है.अब एकलव्य का ही प्रसंग लें.इस पर ऐसे विवाद की कोई ज़रूरत नही थी.इसके साथ यह भी ज़रूरी है की हर समिति पारदर्शी तरीके से काम करे.शक-ओ-शुबहा कि गुंजाइश ही क्यों हो? बहहाल,एकलव्य ऑस्कर कि सूची में पहुंच गयी है.फिल्म के निर्देशल विधु विनोद चोपडा के लिए यह खुशी और जिम्मेदारी का मौका है.अब वे अपनी पूरी ताकात लगाएं और इस बात की कोशिश करें कि एकलव्य ज्यूरी के सारे सदस्य देखें.ऑस्कर में जम कर प्रचार करना पड़ता है.विधु को कुछ दिनों के लिए वहीँ डेरा डालना होगा.चवन्नी भी चाहेगा कि उसके देश की फिल्म पहले नामांकन सूची में पहुंचे और फिर पुरस्कार भी हासिल करे.चवन्नी की शुभकामनायें विधु और एकलव्य के साथ हैं। ऑस्कर की विदेशी भाषा की श्रेणी में ग़ैर अंग्रेजी फ़िल्में भेजी जाती हैं.halanki चवन्नी क

तस्वीरों में ' गोल '

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निर्माता-रोनी स्क्रूवाला निर्देशक-विवेक अग्निहोत्री कलाकार-जॉन अब्राहम,बिपाशा बासु,दिब्येंदु भट्टाचार्य,अरशद वारसी

रिलीज के पहले का टूटना-जुड़ना

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चवन्नी की तरह आप भी ख़बरें पढ़ राहे होंगे कि इन दिनों शाहिद और करीना में नही निभ रही है.कहा जा रहा है कि करीना को सैफ की संगत पसंद आ रही है.दोनों गलबहियां दिए कभी किसी होटल में तो कभी मोटर बैक पर नज़र आ राहे हैं.इधर शाहिद और करीना ने अपनी ताज़ा फिल्म जब वी मेट के प्रचार के लिए साथ में शूटिंग की.उनहोंने इस मौक़े पर आपस में कोई बात नही की और मुँह फेर कर सैट पर बैठे मिले.चवन्नी को इस किस्से पर कतई यकीं नहीं है। शाहिद और करीना kee बेवफाई की इस कहानी पर यकीं इसलिये भी नही होता कि दोनों की दोस्ती चार साल पुरानी है और इस दोस्ती के लिए उनहोंने इतने ताने भी सुने हैं.शुरू में दोनों परिवारों को उनका मिलना-जुलना पसंद नही था.फिर एम् एम् एस के मामले में कैसे दोनों ने मीडिया का मिल कर मुक़ाबला किया था.निशित ही यह फिल्म क प्रचार के लिए अपनाया गया पुराना हथकंडा है। इसकी शुरुआत राज कपूर ने की थी.आपको याद होगा कि संगम की रिलीज के समय उनहोंने खुद के साथ वैजयंती माला के प्रेम के किस्से छपवाए थे.यहाँ तक कि उनके बीवी कृष्ण कपूर भी प्रचार का झूठ नही समझ सकी थीं और घर छोड कर चली गयी थीं.बाद में धर्मेंद्र,राजेश ख

क्या हैं ऐश्वर्या राय ?

-अजय ब्रह्मात्मज मिस व‌र्ल्ड, हिंदी फिल्मों की हीरोइन, मशहूर मॉडल या कुछ और? कई पहचानों की संश्लिष्ट अस्मिता में ऐश्वर्या राय से हम सभी ठीक से परिचित नहीं हो पाते। अगर सारी पहचानों से आंखें मूंद कर ऐश्वर्या राय के बारे में सोचें और आंखें खोलें तो कोमल खिलखिलाहट से भरी एक चंचल लडकी नजर आती है, जिसके मुस्कराते ही सतरंगी किरणें बिखरने लगती हैं और उसकी आंखों की नीली-हरी गहराई आमंत्रित करती है। अपने समाज में लडकियों की स्वतंत्र पहचान नहीं है। इंदिरा गांधी भी आजन्म नेहरू की बेटी रहीं और आज की चर्चित नेता सोनिया गांधी भी राजीव गांधी की पत्नी हैं। लडकियां किसी भी ओहदे पर पहुंच जाएं, अपनी मेहनत और लगन से कुछ भी हासिल कर लें और अपनी मेधा से आकाश छूने का संकेत दें तो भी हम उन्हें किसी न किसी प्रकार मर्दो के घेरे में ले आते हैं। समाज उनकी उडान को सराहता है, लेकिन धीरे-धीरे उनके पंख भी कतरता रहता है। अगली बार जब वे उडान के लिए खुद को तौलती हैं तो डैनों में ताकत की कमी महसूस होती है, क्योंकि मर्यादा की आड में उनके पंख नोच लिए गए होते हैं। बहुत जरूरी है ऐश्वर्या राय के व्यक्तित्व को समझना। वह हमारे ब

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इन अंकों की बात चवन्नी बाद में करेगा। पहले इन अंकों का रिश्ता जिस से है,उसके बारे में सुनें.बीते ज़माने के इस फिल्म स्टार को सबसे पहले सुपर स्टार का दर्जा मिला था.इस सुपर स्टार की लोकप्रियता का ऐसा आलम था कि लडकियां उनकी कार को होंठों से चूम कर रंग देती थीं.वे परदे पर पलकें झाप्काते थे और इधर सिनामघरों में आहें सुने पड़ती थिनेक साल में उनकी आठ फ़िल्में हुई थीं और उनहोंने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किये थे.अपनी उसी लोकप्रियता के दिनों में उनहोंने रातोंरात स्टार बनी एक नयी अभ्नेत्री से शादी कर सभी को चौंका दिया था। चवन्नी को lag रह है कि आप उस सत्र को पहचान गए हैं.आप नाम बताएं,इसके पहले चवन्नी ही बता देना चाहता है कि सुपर स्टार राजेश खन्ना की बात चल रही है। चवन्नी अब जो बताने जा रह है,इस से आपका मन खट्टा हो सकता है.लेकिन यह सच है.पिछले शनिवार १३ अक्टूबर को राजेश खन्ना एक फिल्मी पार्टी में गए थे.रजा बुंदेला की नै फिल्म का मुहूर्त था.राजेश खन्ना को ही क्लैप देना था.वहाँ राज बब्बर और शत्रुघ्न सिन्हा भी आये थे.किस्सा यूं हुआ कि राजेश खन्ना उर्फ़ काका अन्दर हॉल में जाकर बैठ गए.मज़बूरी और

बनारस के रंग में रंगी फिल्म है लागा चुनरी में दाग

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-अजय ब्रह्मात्मज कहते हैं विद्या बालन ने यह फिल्म कुछ दिक्कतों के कारण छोड़ दी थी। इस नुकसान को वह फिल्म देखने के बाद समझ सकती हैं। कोंकणा सेन शर्मा ने उसे लपक कर खुद को कमर्शियल सेटअप में लाने का सुंदर प्रयास किया है। लागा चुनरी में दाग के फ‌र्स्ट हाफ में बनारस की सुंदरता और अल्हड़पन को बड़की (रानी मुखर्जी) और छुटकी (कोंकणा सेन शर्मा) के माध्यम से प्रदीप सरकार ने चित्रित किया है। पुश्तैनी अमीरी गंवाने के बाद बदहाल जिंदगी जी रहे एक मध्यवर्गीय परिवार की बड़ी लड़की परिवार संभालने के चक्कर में जिस्मफरोशी के धंधे में फंस जाती है। बाद में जब उसके बारे में पता चलता है तो सभी उसकी मजबूरी और जिम्मेदारी के एहसास को समझ कर उसकी इज्जत करने लगते हैं। मेलोड्रामा, भावनाओं के खेल और अश्रुविगलित कहानियां पसंद करने वाले दर्शकों को यह फिल्म पसंद आएगी, क्योंकि कई दृश्यों में रुमाल निकालने की जरूरत पड़ जाएगी। बड़की-छुटकी का बहनापा और गरीबी में पिसती मां से उनके संबंध को ऐसी संवेदना के साथ फिल्मों में कम दिखाया गया है। फिल्म में दिक्कत तब शुरू होती है, जब यह मेलोड्रामा हद से ज्यादा हो जाता है। एक-एक कर सा

भूल भुलैया :फिल्म की प्रस्तुति में कंफ्यूजन

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-अजय ब्रह्मात्मज सबसे पहले तो भूलभुलैया को दो शब्द भूल भुलैया बना देने का सवाल है। इसका जवाब कोई नहीं देता। न निर्माता, न निर्देशक और न फिल्म के कलाकार। जैसे कि संजय लीला भंसाली की फिल्म सांवरिया को अंग्रेजी में सावरिया लिखा जा रहा है। क्यों? किसी को नहीं मालूम। भूलभुलैया प्रियदर्शन की फिल्म है। हिंदी में पिछले कुछ समय से आ रही उनकी कॉमेडी फिल्मों के कारण यह इंप्रेशन बनता है कि हम कॉमेडी फिल्म देखने आए हैं। फिल्म की शुरुआत से भी लगता है कि हम कॉमेडी फिल्म ही देखेंगे, लेकिन बाद में हॉरर का समावेश होता है। फिल्म का प्रचार और इसका लोकप्रिय गाना हरे कृष्णा हरे राम कुछ अलग तरह से आकर्षित करते हैं और फिल्म पर्दे पर कुछ और दिखती है। इस फिल्म की प्रस्तुति में कंफ्यूजन है। बनारस के घाटों के आरंभिक दृश्य आते हैं और पुरबिया मिश्रित हिंदी के संवाद से लगता है कि यह बनारस के आसपास की फिल्म होगी, लेकिन महल और वेशभूषा में राजस्थानी टच है। एक तरफ लैपटाप और मोबाइल का इस्तेमाल हो रहा है। दूसरी तरफ, चौथे-पांचवें दशक की मोटरकार दिखाई जा रही है। अब कहां ऐसे पंडित-पुजारी दिखते हैं, जिनकी चुटिया आकाश की तरफ ख

हम परिवर्तन नहीं ला सकते: अमिताभ बच्चन

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११ अक्टूबर को अमिताभ बच्चन का जन्मदिन था.उसी अवसर पर अजय ब्रह्मात्मज ने उनका साक्षात्कार लिया.यहाँ कुछ अलग सवाल अमित जी के सामने रखे गए.अमित जी ठीक मूड में होन तो रोचक जवाब देते हैं.चवन्नी दैनिक जागरण में प्रकाशित अमिताभ बच्चन का साक्षात्कार अपने पाठकों के लिए पेश कर रह है । अमिताभ बच्चन भारतीय सिनेमा की धुरी हैं, इसमें कोई दो राय नहीं। धुरी इसलिए हैं, क्योंकि हिंदी सिनेमा के इतिहास में उनका अहम योगदान है। हर रंग की भूमिकाएं निभाने में माहिर होने की वजह से ही उन्हें कई उपनाम भी मिले। बातचीत अमिताभ बच्चन से.. आपका उल्लेख होते ही एंग्री यंग मैन की छवि उभरती है, जबकि आपने दूसरी तरह की फिल्में भी की हैं। क्या वजह हो सकती है? वजह तो आप लोग ज्यादा अच्छी तरह बता सकते हैं। वैसे, यह सही है कि जब कहीं पर क्रोध होता है या कहीं पर हिंसा होती है, तो लोगों का उधर ध्यान जरूर जाता है। आप सड़क पर चल रहे हैं और अगर एक लड़का-लड़की हाथ पकड़े जा रहे हैं, तो आप शायद एक बार देखकर अपना मुंह मोड़ लेंगे, लेकिन अगर वही लड़का-लड़की एक-दूसरे को चपतियाने लगें और चप्पल उतार कर मारने लगें, तो आप रुक जाएंगे। उसे देखें

सल।म सलीम बाबा!

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नॉर्थ कोलकाता में रहते हैं सलीम बाबा. दस साल की उम्र से वे सिनेमाघरों के बाहर फेंके फिल्मों के निगेटिव जमा कर उन्हें चिपकाते हैं और फिर चंद मिनटों की फिल्म टुकड़ियों की तरह अपने अ।सपास के बच्चों को दिखाते हैं. यह उनका पेशा है. यही उनकी अ।जीविका है. ऐसे ही फिल्में दिखाकर वे पांच बच्चों के अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं. चवन्नी को पता चला कि टिम स्टर्नबर्ग ने उन पर 14 मिनट की एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म 'सलीम बाबा' बनायी है. यह डॉक्यूमेंट्री फिल्म ऑस्कर भेजी गयी थी. खुशी की बात है कि 'सलीम बाबा' अंतिम अ।ठ की सूची में अ। गयी है. अगर ज्यूरी को पसंद अ।ई तो यह नामांकित भी होगी. 'सलीम बाबा' का पूरा नाम सलीम मोहम्मद है. उन्हे अपने पिता से यह प्रोजेक्टर विरासत में मिला है. इसे हाथ से चलाया जाता है. सलीम बाबा की फिल्में देखने बच्चे जमा होते हैं. सिनेमाघरों में जाकर फिल्में देख पाने में असमर्थ बच्चे अपने चहेते स्टारों की चंद झलकियां या फिल्म टुकड़ियां देख कर ही मस्त हो जाते हैं. सलीम बाबा के पास जो हस्तचालित प्रोजेक्टर है, उस पर भी विदेशियों की नजर है. ऐसे प्रोजेक्टर दुनिया

शुक्रवार,१२ अक्टूबर, 2007

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लो आ गया सुहाना शुक्रवार.आज प्रियदर्शन की फिल्म भूल भुलैया और प्रदीप सरकार की लागा चुनरी में दाग रिलीज हो रही हैं.प्रियदर्शन की फिल्म पहले तमिल और मलयालम में बन चुकी है और चवन्नी को किसी ने बताया कि दोनों भाषाओं में यह सफल भी रही थी.देखना है कि हिंदी में क्या हश्र होता है.चवन्नी को तो अजय ब्रह्मात्मज की समीक्षा का इंतज़ार है.वैसे इस बार प्रियदर्शन ने अक्षय कुमार,परेश रावल और राजपाल जैसे पालतू कलाकारों के साथ ही शाइनी आहूजा और विद्य बालन को जोडा है. विद्य बालन इधर आ गयीं और उधर अपने पहले निर्देशक प्रदीप सरकार की फिल्म लगा चुनरी में दाग छोड दी.इस फिल्म में दादा ने उन्हें कोंकणा का रोल दिया था.लगा चुनरी में दाग बनारस की पृष्ठभूमि पर बनी पारिवारिक फिल्म है.दो बहने हैं.बड़ी को परिवार की जिम्मेदारी संभालनी पड़ती है ताकि छोटी पढ़ाई कर सके.बड़ी ज़िन्दगी की अँधेरी गुफाओं में समां जाती है और फिर जब एक बार छोटी को उसकी सच्चाई कि जानकारी मिलती है तो उसे अपना वजूद सालने लगता है. दादा प्रदीप सरकार से उम्मीद है कि वे एक पारिवारिक फिल्म दिखायेंगे. इस हफ्ते शाहरुख़ खान ओम शांति ओम की टीम के साथ रैंप पर उ

रैंप पर क्यों चलते हैं सितारे ?

माफ करें, चवन्नी नहीं समझ पाता कि किसी फिल्म की रिलीज के पहले उस फिल्म के सितारों के रैंप पर चलने से क्या फायदा होता है? क्या फिल्म के दर्शक बढ़ जाते है अगर ऐसा होता तो 'सलाम-ए-इश्क' का सल।म दर्शकों ने कुबूल किया होता. अभी हाल में शाहरुख खान रैंप पर दिखे. वे अकेले नहीं थे. उनकी पूरी यूनिट अ।ई थी और फिर से माफ करें ... अपने हाव, भाव और फोटो के लिए दिए गए अंदाज से साफ लगा कि वे अ।ठवें दशक के कलाकारों के मैनरिज्म का मजाक उड़ा रहे हैं. फराह खान और शाहरुख खान को लगता है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का अ।ठवां दशक ही बॉलीवुड है. उनकी यह समझ विदेश की यात्राओं और विदेशियों की सोच से बनी है. अगर हिंदी फिल्मों के अ।म दर्शक से बॉलीवुड का मतलब पूछें तो शायद वह बता ही नहीं पाए. चवन्नी को बॉलीवुड शब्द पसंद नहीं है. इससे एक तरफ हीन भावना और दूसरी तरफ हेय भावना प्रकट होती है. शाहरुख खान और फराह खान 'ओम शांति ओम' को बेचने के तमाम हथकंडे अपना रहे हैं. इसमें कोई बुराई नहीं है. फेरीवाला भी अ।वाज देता है तभी हम समझ पाते हैं कि वह गली में अ। गया है. मछली बाजार है फिल्म इंडस्ट्री ... न

चालू हो गया आमिर खान का वेब साईट

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चवन्नी ने कल आप को एक दुख भरी खबर के साथ ही सुखद सूचना दी थी.उस सूचना के अनुसार आज ठीक १२ बज कर १ मिनट पर आमिर खान ने अपना वेब साईट आरम्भ कर दिया.यह वेब साईट अन्य फिल्म स्टारों की तरह केवल दिखाने या लुभाने के लिए नहीं है.आप अगर पंजीकरण कर लेते है तो आप आमिर खान से बात कर सकते हैं.आमिर ने वादा किय है कि वे बार-बार यहाँ आएंगे और सभी से बातचीत करेंगे.आमिर बहस के लिए भी तैयार हैं. चवन्नी के कुछ पाठकों को लग सकता है कि ऐसा क्या है कि चवन्नी हमेशा आमिर की ही बातें करता है.चवन्नी को लगता है कि अगर कोई स्तर अपने प्रशंसकों से बहस और बातचीत के लिए तैयार है तो उसकी जानकारी हिंदी के प्रशंसकों और पाठकों को भी मिलनी चाहिऐ.अब आप ही कहो कि आप ऐसा मौका गंवाना चाहेंगे. आमिर खान के वेक साईट पर फिलहाल चैट और ब्लॉग के लिंक शुरू किये गए हैं.आज रात में ९ से १० के बीच आमिर चैट रूम में रहेंगे.सोच क्या रहे हैं ,लौग कीजिये अपना सवाल रखिये .अपनी जिज्ञाशाएं शांत कीजिये। आमिर खान के वेक साईट का पता है... http://www.aamirkhan.com/

बंद हुआ आमिर खान का ब्लॉग

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चवन्नी बडे दुख के साथ आप को बता रह है कि आमिर खान ने अपने ब्लॉग को बंद करने का फैसला ले लिया है.उनहोंने अपने आख़िरी ख़त में लिखा है कि उन्हें भी इस बात के बेहद तकलीफ है,क्यों कि ब्लॉग के जरिये कई नए दोस्त बने थे और कुछ नयी बातें सामने आयी थीं.आमिर ने लिखा है कि एक तो उनके पास समय नही है और फिर ब्लॉग का बैंडविड्थ भी नही मिल पायेगा.हम सभी जानते हैं कि काम के पक्के आमिर खान एक बार में एक ही काम करते हैं और पूरे मनोयोग से करते हैं.जैसे अगर वह आप से मिल राहे हैं तो उनका पूरा ध्यान सिर्फ आप पर रहता है. इस दुख भरी खबर से चवन्नी भी काफी दुःखी हुआ था...आमिर थोड़े मजाकिया मिजाज के आदमी हैं.उनहोंने ब्लॉग पर लिखे अपने आख़िरी ख़त में एक लम्बा स्पेस देने के बाद बताया है कि अब उनका ब्लॉग नयी जगह पर जा रह है और उसका नया पता होगा.यहाँ पर और भी कई खूबियां रहेंगी.आमिर अपना वेब साईट लेकर आ राहे हैं.उस वेब साईट का चैट रूम चौबीस घंटे खुला रहेगा.वहाँ आमिर कभी बता कर तो कभ बिना बताये आएंगे और सभी से बातें करेंगे.अगर कोई दिलचस्प बात कर रह होगा तो वे उसके साथ चैट रूम में अलग से बात करेंगे। http://www.aamirkhan.

जोधा अकबर की पहली झलक

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चवन्नी को याद नही कि कभी किसी निर्माता या निर्देशक ने अपनी फिल्म के ट्रेलर बेखने के लिए मीडिया को औपचारिक निमंत्रण दिया हो.आशुतोष गोवारिकर ने १० तारीख को ट्रेलर देखने का निमंत्रण भेजा है.जोधा अकबर में ऐश्वर्या राय जोधा की भूमिका निभा रही हैं और अकबर बने हैं हृतिक रोशन .यह फिल्म पहले १२ अक्तूबर को रिलीज होने वाली थी.अब यह अगले साल आएगी.१० तारीख को पहली झलक देखने के बाद चवन्नी आप को ट्रेलर के बारे में बतायेगा.

जॉन-बिपाशा:अंतरंग पल

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जॉन अब्राहम और बिपाशा बसु को लेकर पत्र-पत्रिकाओं में तरह-तरह की बातें छपती रहती हैं.कुछ गॉसिप लेखक दोनों को अलग करने में तुले हैं.चवन्नी दोनों से अलग-अलग और एक साथ भी मिल चूका है.दो अंतरंग प्रेमियों की भाव और दैहिक मुद्राओं से कोई अनुमान लगा सकता है कि प्रेमियों के संबंध कितने गहरे हैं.ठीक है कि दोनों ऐक्टर हैं,लेकिन दोनों मनुष्य भी तो हैं। चलिए चवन्नी आप के लिए दोनों के अंतरंग पलों को बयां करती तसवीरें ले आया है.ये तसवीरें बिपाशा बसु के ब्लोग से ली गयी हैं। http://bipashabasunet।com/cms/ बिपाशा का पर्सनल वेब पोर्टल

चवन्नी सर्वेक्षण

चवन्नी के पाठक बढ़ रहे हैं.यह तो खुशी की बात है.इस ब्लौग पर चवन्नी ने दो सर्वेक्षण किये.उसे अच्छा लगा कि पाठकों ने सर्वेक्षण में हिस्सा लिया।पहला सर्वेक्षण था.चवन्नी पर आने से क्या मिलता है? चार विकल्प थे.१.उपयोगी फिल्म समीक्षा,२.बढती है जिज्ञासा,३.मिलती है जानकारी और४.होती है सनसनी।सचमुच खुशी की बात है कि किसी पाठक को चवन्नी सनसनी नही देता.४१% को चवन्नी पर अजय ब्रह्मात्मज की फिल्म समीक्षा उपयोगी लगी.३४% ने मत दिया कि चवन्नी पढने से जिज्ञासा बढती है और २५% की राय में चवन्नी उनकी जानकारी बढाता है।दुसरे सर्वेक्षण में पूछा गया था कि सांवरिया और ओम शांति ओम में से आप पहले कौन सी फिल्म देखेंगे.तीसरा विकल्प था कोई नही.३०% ने कहा कि वे कोई फिल्म नहीं देखेंगे.चवन्नी अपने इन पाठकों की नाराजगी नहीं समझ पा रहा है. बहरहाल सांवरिया और ओम शांति ओम दोनों को बराबर मत मिले.दोनों फिल्मों को चवन्नी के पाठकों ने ३५-३५% मत दिए।चवन्नी अपने पाठकों को और सक्रिय रूप में देखना चाहता है।

अच्छे विषय पर बुरी फिल्म है इट्स ब्रेकिंग न्यूज

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-अजय ब्रह्मात्मज अच्छे विषय पर बुरी फिल्म का उदाहरण है इट्स ब्रेकिंग न्यूज। मीडिया के बढ़ते प्रभाव और मीडिया में अपनाए जा रहे तरीकों पर सवाल उठाती यह फिल्म पटकथा और विषय की समझ के अभाव में शुरू से ही लड़खड़ा जाती है। हालांकि फिल्म के कुछ प्रसंगों से मीडिया के अंदर चल रही गतिविधियों से दर्शक परिचित और चकित होंगे। सच दिखाने का दावा करने वाले अंदरूनी तौर पर कितने झूठे और दिखावटी हो सकते हैं? मीडिया को बेनकाब करने और मीडिया कवरेज की मर्यादा पर सवाल उठाने में यह फिल्म नाकाम रहती है। फिल्म की मुख्य अभिनेत्री कोयल पुरी अपने किरदार को निभाने में कमजोर साबित हुई हैं। फिल्म के नायक अभिमन्यु सिंह छोटी सी भूमिका में प्रभावित करते हैं। उन्हें अपनी संवाद अदायगी पर ध्यान देने की जरूरत है। मुख्य कलाकार : कोयल पुरी, अभिमन्यु सिंह, हर्ष छाया, स्वाति सेन, शिशिर शर्मा निर्देशक : विशाल ईनामदार तकनीकी टीम : निर्माता-श्रेयस म्हासकर, पटकथा-जयंत पवार, संवाद-संजय मोरे, संगीत-कौशल ईनामदार

थ्रिलर व कॉमेडी के बीच पिस गयी गो

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-अजय ब्रह्मात्मज क्लिक..क्लिक.. यह है राम गोपाल वर्मा फ्लिक राम गोपाल वर्मा जितनी फिल्में बनाते हैं.. उनकी कंपनियों के नाम भी उतने ही हैं। कभी फैक्ट्री तो कभी आरजीवी फिल्म्स तो कभी यह फ्लिक.. इरादा क्या है? शायद दर्शकों को लगातार तंग करना..। राम गोपाल वर्मा फ्लिक की गो के निर्देशक मनीष श्रीवास्तव हैं। उन्होंने इस फिल्म की योजना क्यों और कैसे बनाई, उसे रामू ने क्यों मंजूर किया? यह तो दोनों से मिल कर ही पूछा जा सकता है। फिलहाल फिल्म हमारे सामने है, जिसमें नायक अभय (गौतम) और नायिका वसु (निशा कोठारी) गा रहे हैं बैंड बजा दे। वो अपना तो क्या बैंड बजाएंगे.. दर्शकों का बैंड बजाने पर जरूर लगे हैं। शायद ये भी बता रहे हैं कि रामू का भी बैंड बज गया है। दो युवा प्रेमी अपने माता-पिता से नाराज होकर घर से भागते हैं। उन्हें नहीं मालूम कि अनजाने में किन चंगुलों में फंसते जा रहे हैं। ऐसे विषय पर एक रोमांचक फिल्म बन सकती थी, लेकिन मनीष श्रीवास्तव कभी थ्रिलर तो कभी कॉमेडी का सहारा लेते दिखते हैं। हम सभी जानते हैं कि दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय.. गो भी चकनाचूर हो जाती है। उम्दा एक्टर के।के. मेनन अधपक

शुक्रवार, 5 अक्तूबर, 2007

चवन्नी की सलाह मानें तो इस हफ्ते किसी नयी फिल्म को देखने का जोखिम न उठाएं. 'इट्स ब्रेकिंग न्यूज', 'गो', 'छोड़ो न यार'और '50 लाख' फिल्में रिलीज हुई है. इनमें से '50 लाख' चवन्नी ने नहीं देखी है, इसलिए उसके बारे में कुछ भी कहना गलत होगा. बाकी तीन औसत से कमजोर फिल्में हैं. रामू कैंप की 'गो' का तो गाना ही है . बैंड बजा दे. लगता है राम गोपाल वर्मा अपना और अपनी टीम का बैंड बजा कर ही रहेंगे. चवन्नी निराश है, लेकिन हताश नहीं है. चवन्नी को उम्मीद है कि रामू 'सरकार राज' से लौटेंगे. 'इट्स ब्रेकिंग न्यूज' तो अ।पके धैर्य को ब्रेक करने वाली फिल्म है. कोयल पुरी को अभिनय की अच्छी और पूरी ट्रेनिंग लेनी चाहिए और अपना हिंदी उच्चारण भी दुरूस्त करना चाहिए. 'छोड़ो न यार' का शीर्षक ही बता देता है कि उसे दर्शकों से क्या उम्मीद है. इस हफ्ते सुनील दत्त और नरगिस के जीवन पर लिखी नम्रता एवं प्रिया दत्त की लिखी किताब विमोचित हुई. बांद्रा के एक पंचसितारा होटल में अ।योजित इस कार्यक्रम में दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन, महेश भट्ट, संजय खान, सायरा बानो

गांधी और फिल्म

{चवन्नी को अजय ब्रह्मात्मज का यह आलेख बापू की जयंती पर प्रासंगिक लगा।} -अजय ब्रह्मात्मज यह संयोग किसी फिल्मी कहानी की तरह ही लगता है। फैमिली फिल्मों में किसी संकट के समय नालायक बेटा कुछ ऐसा कर बैठता है, जिससे परिवार की प्रतिष्ठा बच जाती है। 'लगे रहो मुन्ना भाई' ऐसे ही नालायक माध्यम का सृजन है, जिसे गांधी जी बिल्कुल पसंद नहीं करते थे। उन्होंने फिल्मों के प्रति अपनी बेरूखी और उदासीनता छिपा कर नहीं रखी। समय-समय पर वे इस माध्यम के प्रति अपनी आशंका जाहिर करते रहे। फिल्में देखने का उन्हें कोई शौक नहीं था और वह फिल्मी हस्तियों के संपर्क में भी नहीं रहे। उनकी मृत्यु के 59सालों के बाद उसी माध्यम ने उन्हें फिर से चर्चा में ला दिया है। 'लगे रहो मुन्ना भाई' ने विस्मृति की धूल में अदृश्य हो रहे गांधी को फिर से प्रासंगिक बना दिया है। किशोर और युवा दर्शक गांधी के मूलमंत्र सत्य और अहिंसा से परिचित हुए हैं और जैसी खबरें आ रही हैं, उससे लगता है कि गांधी का दर्शन हमारे दैनिक एवं सामाजिक व्यवहार में लौट रहा है। गांधी पुरातनपंथी नहीं थे, लेकिन तकनीकी आधुनिकता से उन्हें परहेज था। कुटीर उद्य

बिंदास बिपाशा बसु

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बिपाशा बसु से चवन्नी की चंद मुलाकातें हैं. सब से पहले एतबार के सेट पर मुलाकात हुई थी और खूब लंबी बात हुई थी.बिपाशा की कही बातें चवन्नी अभी तक नहीं भूल सका है.अरे भूल गया पहली मुलाकात तो बांद्रा के एक फ्लैट में हुई थी,जहां वह पेइंग गेस्ट के तौर पर रहती थी.फिल्मों में आए अभी ज्यादा वक्त नहीं हुआ था.बांद्रा में महबूब स्टूडियो की पीछे की गलियों में एक छोटे फ्लैट में उसने डेरा डाला था.तब उसकी अजनबी पूरी हो गयी थी.करीना कपूर ने कुछ उल्टा-सीधा बोल दिया था. अपनी करीना न ...चवन्नी को दिल की साफ लगती है.उसे जो समझ में आता है...बोल देती है.उसकी बातें जाहिर है उसकी समझ से तय होती हैं.कपूर खानदान की टूटे परिवार की लड़की की सोच की कल्पना चवन्नी कर सकता है.एक बातचीत में उसने चवन्नी को बताया था कि वह रोल पाने के लिए किसी डायरेक्टर के घर जाकर खाना नहीं बनाती या शॉपिंग पर नहीं जाती.अरे...रे..रे.. चवन्नी क्या बताने लगा.वैसे रोल हथियाने और पाने के लिए लड़कियां क्या -क्या करती हैं...इस पर कभी अलग से चवन्नी लिखेगा. तो बात हो रही थी बिपाशा की.बिपाशा छोटी उम्र में ही दुनियादार हो गयी.वह खुद मुंबई आयी और उसने