Search This Blog

Showing posts with label बमन ईरानी. Show all posts
Showing posts with label बमन ईरानी. Show all posts

Friday, April 22, 2016

फिल्‍म समीक्षा : संता बंता प्रायवेट लिमिटेड


फूहड़ हास्‍य,लचर अभिनय

-अजय ब्रह्मात्‍मज
आकाशदीप साबिर की फिल्‍म संता बंता प्रायवेट लिमिटेड हर लिहाज से एक फूहड़ और लचर फिल्‍म है। अगर कुछ देखने लायक है तो वह केवल फिजी की खूबसूरती है। यह फिल्‍म नमूना है कि कैसे बमन ईरानी,संजय मिश्रा और जॉनी लीवर जैसे अभिनेताओं का बेजा इस्‍तेमाल किया जा सकता है। ताज्‍जुब है कि इसे वॉयकॉम 18 का सहयोग भी मिला है। अगर वे किसी होनहार और संभावनाशील निर्देशक की सोच को ऐसा समर्थन दें तो फिल्‍म इंडस्‍ट्री में कुछ नई प्रतिभाएं भी आएं।
बहरहाल,बमन ईरासनी और वीर दास लतीफों से मशहूर हुए संता और बंता के किरदार में हैं। कुद लतीफों को सीन में तब्‍दील कर दिया गया है। उनमें जरूर हंसी आ जाती है। ऐसी हंसी तो ह्वाट्स ऐप के लतीफे पढ़ कर भी आती है। लतीफों से आगे बढ़ कर जैसे ही फिल्‍म में ड्रामा आता है,वैसे ही निर्देशक आकाशदीप साबिर अपनी अयोग्‍यता जाहिर कर देते हैं।
बमन ईरानी,संजय मिश्रा और जॉनी लीवर घिसे-पिटे लतीफों से ही हंसाने की कोशिश करते हैं। अपनी कोशिशों में वे ज्‍यादातर असफल रहते हैं,क्‍योंकि उन्‍हें कोई सपोर्ट नहीं मिलता।
अवधि- 112 मिनट
स्‍टार- आधा स्‍टार


Friday, March 15, 2013

फिल्‍म रिव्‍यू : जॉली एलएलबी

-अजय ब्रह्मात्‍मज
तेजिन्दर राजपाल - फुटपाथ पर सोएंगे तो मरने का रिस्क तो है।
जगदीश त्यागी उर्फ जॉली - फुटपाथ गाड़ी चलाने के लिए भी नहीं होते।
सुभाष कपूर की 'जॉली एलएलबी' में ये परस्पर संवाद नहीं हैं। मतलब तालियां बटोरने के लिए की गई डॉयलॉगबाजी नहीं है। अलग-अलग दृश्यों में फिल्मों के मुख्य किरदार इन वाक्यों को बोलते हैं। इस वाक्यों में ही 'जॉली एलएलबी' का मर्म है। एक और प्रसंग है, जब थका-हारा जॉली एक पुल के नीचे पेशाब करने के लिए खड़ा होता है तो एक बुजुर्ग अपने परिवार के साथ नमूदार होते हैं। वे कहते हैं साहब थोड़ा उधर चले जाएं, यह हमारे सोने की जगह है। फिल्म की कहानी इस दृश्य से एक टर्न लेती है। यह टर्न पर्दे पर स्पष्ट दिखता है और हॉल के अंदर मौजूद दर्शकों के बीच भी कुछ हिलता है। हां, अगर आप मर्सिडीज, बीएमडब्लू या ऐसी ही किसी महंगी कार की सवारी करते हैं तो यह दृश्य बेतुका लग सकता है। वास्तव में 'जॉली एलएलबी' 'ऑनेस्ट ब्लडी इंडियन' (साले ईमानदार भारतीय) की कहानी है। अगर आप के अंदर ईमानदारी नहीं बची है तो सुभाष कपूर की 'जॉली एलएलबी' आप के लिए नहीं है। यह फिल्म मनोरंजक है। फिल्म में आए किरदारों की सच्चाई और बेईमानी हमारे समय के भारत को जस का तस रख देती है। मर्जी आप की ़ ़ ़ आप हंसे, रोएं या तिलमिलाएं।
हिंदी फिल्मों में मनोरंजन के नाम पर हास्य इस कदर हावी है कि हम व्यंग्य को व्यर्थ समझने लगे हैं। सुभाष कपूर ने किसी भी प्रसंग या दृश्य में सायास चुटीले संवाद नहीं भरे हैं। कुछ आम किरदार हैं, जो बोलते हैं तो सच छींट देते हैं। कई बार यह सच चुभता है। सच की किरचें सीने को छेदती है। गला रुंध जाता है। 'जॉली एलएलबी' गैरइरादतन ही समाज में मौजूद अमीर और गरीब की सोच-समझ और सपनों के फर्क की परतें खोल देती है। 'फुटपाथ पर क्यों आते हैं लोग?' जॉली के इस सवाल की गूंज पर्दे पर चल रहे कोर्टरूम ड्रामा से निकलकर झकझोरती है। हिंदी फिल्मों से सुन्न हो रही हमारी संवेदनाओं को यह फिल्म फिर से जगा देती है। सुभाष कपूर की तकनीकी दक्षता और फिल्म की भव्यता में कमी हो सकती है, लेकिन इस फिल्म की सादगी दमकती है।
'जॉली एलएलबी' में अरशद वारसी की टीशर्ट पर अंग्रेजी में लिखे वाक्य का शब्दार्थ है, 'शायद मैं दिन में न चमकूं, लेकिन रात में दमकता हूं'। जॉली का किरदार के लिय यह सटीक वाक्य है। मेरठ का मुफस्सिल वकील जगदीश त्यागी उर्फ जॉली बड़े नाम और रसूख के लिए दिल्ली आता है। तेजिन्दर राजपाल की तरह वह भी नाम-काम चाहता है। वह राजपाल के जीते एक मुकदमे के सिलसिले में जनहित याचिका दायर करता है। सीधे राजपाल से उसकी टक्कर होती है। इस टक्कर के बीच में जज त्रिपाठी भी हैं। निचली अदालत के तौर-तरीके और स्थिति को दर्शाती यह फिल्म अचानक दो व्यक्तियों की भिड़ंत से बढ़कर दो सोच की टकराहट में तब्दील हो जाती है। जज त्रिपाठी का जमीर जागता है। वह कहता भी है, 'कानून अंधा होता है। जज नहीं, उसे सब दिखता है।'
सुभाष कपूर ने सभी किरदारों के लिए समुचित कास्टिंग की है। बनी इमेज के मुताबिक अगर अरशद वारसी और बमन ईरानी किसी फिल्म में हों तो हमें उम्मीद रहती है कि हंसने के मौके मिलेंगे। 'जॉली एलएलबी' हंसाती है, लेकिन हंसी तक नहीं ठहरती। उससे आगे बढ़ जाती है। अरशद वारसी, बमन ईरानी और सौरभ शुक्ला ने अपने किरदारों को सही गति, भाव और ठहराव दिए हैं। तीनों किरदारों के परफारमेंस में परस्पर निर्भरता और सहयोग है। कोई भी बाजी मारने की फिक्र में परफारमेंस का छल नहीं करता। छोटे से दृश्य में आए राम गोपाल वर्मा (संजय मिश्रा) भी अभिनय और दृश्य की तीक्ष्णता की वजह से याद रह जाते हैं। फिल्म की नायिका संध्या (अमृता राव) से नाचने-गाने का काम भी लिया गया है, लेकिन वह जॉली को विवेक देती है। उसे झकझोरती है। हिंदी फिल्मों की आम नायिकाओं से अलग वह अपनी सीमित जरूरतों पर जोर देती है। वह कामकाजी भी है।
सुभाष कपूर ने 'जॉली एलएलबी' के जरिए हिंदी फिल्मों में खो चुकी व्यंग्य की धारा को फिर से जागृत किया है। लंबे समय के बाद कुंदन शाह और सई परांजपे की परंपरा में एक और निर्देशक उभरा है, जो राजकुमार हिरानी की तरह मनोरंजन के साथ कचोट भी देता है। धन्यवाद सुभाष कपूर।

Friday, August 24, 2012

फिल्‍म समीक्षा :शिरीन फरहाद की तो निकल पड़ी

-अजय ब्रह्मात्‍मज
संजय लीला भंसाली की बड़ी बहन बेला भंसाली सहगल की पहली फिल्म है शिरीन फरहाद की तो निकल पड़ी। बेला काफी अर्से से फिल्म बनाना चाहती थी और वे पहले भी असफल कोशिशें कर चुकी हैं। एक समय अदनान सामी के साथ तो उनकी फिल्म लगभग फ्लोर पर जाने वाली थी। बहरहाल, भाई संजय लीला भंसाली ने बहन की ख्वाहिश पूरी कर दी। बेला भंसाली सहगल ने अपने भाई से बिल्कुल अलग किस्म की फिल्म निर्देशित की है। वैसे इसे संजय लीला भंसाली ने ही लिखा है। शिरीन फरहाद.. की प्रेमकहानी मशहूर शिरीं-फरहाद की प्रेमकहानी से अलग और आज के पारसी समुदाय की है।
शिरीन फरहाद.. पारसी समुदाय के दो कुंवारे प्रौढ़ों की कहानी है। फरहाद की उम्र 45 की हो चुकी है। सीधे-सादे और नेक फरहाद के जीवन में अभी तक किसी लड़की का आगमन नहीं हुआ है। मां की प्रबल इच्छा है कि उसके बेटे को एक लायक बीवी मिल जाए। बार-बार संभावित बीवियों से रिजेक्ट किए जाने के कारण फरहाद अब शादी के नाम से ही बिदक जाता है। उधर शिरीन पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण शादी के बारे में सोच भी नहीं सकी है। दोनों किरदारों के घरों में कैमरे के आने के साथ हम पारसी समुदाय की जीवनशैली, सोच और आचार-व्यवहार से भी परिचित होते हैं। हिंदी फिल्मों ने तो इन्हें ज्यादातर मजाकिया अंदाज में ही छोटे किरदारों में पेश किया है।
शिरीन फरहाद.. का पूरा परिवेश पारसी है। बेला भंसाली सहगल ने बड़ी खूबसूरती के साथ उसे रचा है। हास्य पैदा करने के उद्देश्य से उन्होंने पारसी समुदाय के हंसी-मजाक, बैठकें और सामुदायिकमेल-जोल की जो तस्वीर पेश की है, वह पारसी समुदाय की सही तस्वीर नहीं लगती। सामुदायिक मेल-जोल में उनकी मार-पीट और उठा-पटक के दृश्य नाटकीय और नकली हो गए हैं। हां, उन्होंने शिरीन और फरहाद को गढ़ने में नाटकीयता का कम उपयोग किया है।
एक जमाने में जैसे परेश रावल गुजराती किरदारों के लिए तयशुदा कलाकार थे। वैसे ही इन दिनों पारसी किरदार के लिए बमन ईरानी पहली पसंद बन गए हैं। पिछले दो-तीन सालों में हमने अनेक पारसी किरदारों में उन्हें देखा है। शिरीन फरहाद.. में बेला ने उन्हें रोमैंटिक और संवेदनशील प्रौढ़ की भूमिका दी है। मां और शिरीन के बीच फंसे फरहाद के द्वंद्व को बमन ईरानी ने समुचित ढंग से व्यक्त किया है। लहजा, शैली और बात-व्यवहार में वे बिल्कुल पारसी लगते हैं। इसके विपरीत शिरीन की भूमिका में फराह खान दिखने में तो पारसी लगती हैं, लेकिन जैसे ही मुंह खोलती हैं, तो उनका लहजा उनकी पोल खोल देता है। फराह खान और बेला भंसाली सहगल ने शिरीन के लहजे पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया है। इस एक कमी से फराह खान की ईमानदारी और सादगी खटाई में पड़ जाती है। फिल्म में नाचते-गाते समय वह बहुत स्वाभाविक लगती हैं। खासकर, स्वयं नृत्य निर्देशक होने की वजह से उनके डांसिंग स्टेप्स लय में दिखते हैं। बमन ईरानी ने भी डांस करते समय उनसे तालमेल बिठाने की पूरी कोशिश की है। अन्य किरदारों में फरहाद की मां बनी डेजी ईरानी और दादी शम्मी आंटी स्वाभाविक और प्रिय लगते हैं।
बेला भंसाली सहगल ने प्रौढ़ प्रेमियों के प्रेम, मिलन और विछोह को उनकी उम्र के मुताबिक शालीन और रोचक ढंग से पेश किया है। शिरीन और फरहाद की मां की मुलाकात का पहला दृश्य काफी मजेदार है। शिरीन फरहाद.. में सारे महिला किरदार स्ट्रांग और स्वतंत्र हैं। ऐसा लगता है कि पारसी समुदाय में परिवार और समुदाय का नियंत्रण महिलाओं के हाथ में ही रहता है। यों यह संयोग भी हो सकता है कि इस फिल्म में पुरुष किरदार नहीं आ पाए हों। बेला भंसाली सहगल ने मार्मिक विषय चुना है, लेकिन उसे पेश करने में वह मार्मिकता कहीं खो गई है। हम शिरीन फरहाद.. की तकलीफ देखते भर हैं। उसे महसूस नहीं कर पाते। फिल्म में गीत-संगीत का अधिक योगदान नहीं है। सारे गाने जबरदस्ती ठूंसे गए हैं, इसलिए अनावश्यक और लंबे लगते हैं। 
संरचना और प्रस्तुति की अंतर्निहित कमियों के बावजूद हमें बेला भंसाली सहगल के इस प्रयास की तारीफ करनी चाहिए कि उन्होंने लोकप्रिय हो रहे अर्थहीन और कथ्यहीन सिनेमा के इस दौर में एक खास समुदाय के प्रौढ़ों की समस्या पर संवेदनशील फिल्म निर्देशित की है। चूंकि रोमांटिक कामेडी में फूहड़ता शिल्पगत विशेषता के तौर पर घुस गई है,इसलिए संभव है कि उन पर बाजार और समकालीन सफल फिल्मों का दबाव रहा हो। बमन ईरानी और फराह खान को लीड भूमिकाओं के लिए चुनना ही क्रिएटिव हिम्मत है।
अवधि- 112 मिनट
*** तीन स्टार

Friday, June 15, 2012

फिल्‍म समीक्षा : फरारी की सवारी

मध्यवर्गीय मुश्किलों में भी जीत 

मध्यवर्गीय मुश्किलों में भी जीत

-अजय ब्रह्मात्‍मज
विनोद चोपड़ा फिल्म्स स्वस्थ मनोरंजन की पहचान बन चुका है। प्रदीप सरकार और राजकुमार हिरानी के बाद इस प्रोडक्शन ने राजेश मापुसकर को अपनी फिल्म निर्देशित करने का मौका दिया है। राजेश मापुसकर ने एक सामान्य विषय पर सुंदर और मर्मस्पर्शी कहानी बुनी हैं। सपने टूटने और सपने साकार होने के बीच तीन पीढि़यों के संबंध और समझदारी की यह फिल्म पारिवारिक रिश्ते की बांडिंग को प्रभावपूर्ण तरीके से पेश करती है। राजेश मापुसकर की कल्पना को विधु विनोद चोपड़ा और राजकुमार हिरानी ने कागज पर उतारा है। बोमन ईरानी, शरमन जोशी और ऋत्विक सहारे अपने किरदारों को प्रभावशाली तरीके से निभा कर फरारी की सवारी को उल्लेखनीय फिल्म बना दिया है।
फिल्म के शीर्षक फरारी की सवारी की चाहत सहयोगी किरदार की है, लेकिन इस चाहत में फिल्म के मुख्य किरदार अच्छी तरह गुंथ जाते हैं। रूसी (शरमन जोशी) अपने प्रतिभाशाली क्रिकेटर बेटे केयो (ऋत्विक सहारे) के लिए कुछ भी कर सकता है। तीन पीढि़यों के इस परिवार में कोई महिला सदस्य नहीं है। अपने बिस्तर पर बैठे मूंगफली टूंगते हुए टीवी देखने में मशगूल मोटा पापा (बोमन ईरानी) घर की हर गतिविधि से वाकिफ रहते हैं। उनके कान हमेशा जगे रहते हैं। मोटा पापा अपने किशोरावस्था में क्रिकेटर थे। रणजी खेल चुके थे, लेकिन नेशनल टीम में चुनाव के दिन दोस्त दिलीप धर्माधिकारी की साजिश की वजह से छंट गए थे। क्रिकेट में छल-कपट भुगत चुके मोटा पापा नहीं चाहते कि उनका बेटा क्रिकेटर हो। बेटा तो मान जाता है, लेकिन पोते में आनुवंशिक गुण आ जाता है।
केयो धुरंधर क्रिकेटर है। अपनी उम्र के इस तीक्ष्ण खिलाड़ी का चुनाव लार्ड्स के विशेष प्रशिक्षण के लिए होने वाला है। एक ही दिक्कत है कि चुने जाने पर उसे डेढ़ लाख रुपए की फीस भरनी होगी। सीमित आय के इस परिवार के लिए इतनी भरी रकम जुटाना मुश्किल काम है। रूसी अत्यंत ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ नागरिक है। बेटे के भविष्य के लिए वह एक बार अपनी ईमानदारी से डिगता है। उसे कुछ घंटों के लिए अपने पिता के संपर्क से सचिन तेंदुलकर की लाल फरारी किसी को उपलब्ध करावा देनी है, जिसके एवज में उसे डेढ़ लाख रुपए मिल जायेंगे। घटनाएं कुछ यों घटती हैं कि वह सचिन तेंदुलकर को बताए बगैर उनकी फरारी लेकर निकल जाता है। उसके बाद की घटनाएं फरारी की तरह तेज स्पीड से घटती हैं।
फरारी की सवारी में पिता-पुत्र संबंध का लेखक-निर्देशक ने मार्मिक चित्रण किया है। फिल्म रुलाने की कोशिश में जबरन भावुक नहीं होती, फिर भी केयो के परिवार की स्थिति-परिस्थति देख कर आंखें भर आती हैं। अभाव और वंचना के बीच पलते सपने के अंकुर विश्वास दिलाते हैं कि प्रतिभाएं कहीं भी फूट सकती हैं। उन्हें बढ़ने के लिए सही माहौल और मौका मिलना चाहिए। फरारी की सवारी मध्यवर्गीय महत्वाकांक्षा का रूपक गढ़ती है, जिसमें सचिन तेंदुलकर और उनकी फरारी का प्रतीकात्मक इस्तेमाल फिल्म के मर्म को गाढ़ा और परिचित करता है। फिल्म में राजकुमार हिरानी के संवादों की सहजता जोड़ती है। फिल्म हमें अपने आस-पास की लगने लगती है,क्योंकि रूसी,्र केयो और मोटा पापा की दशा-दुर्दशा से देश के अनेक परिवार गुजर रहे हैं। अच्छी बात है कि फिल्म अनावश्यक रूप से भावुक नहीं होती और सामान्य मध्यवर्गीय जीवन का मुश्किलों को उजागर कर देती है।
यह फिल्म ऋत्विक सहारे, शरमन जोशी और बमन ईरानी के प्रशंसनीय और विश्वसनीय अभिनय के लिए भी देखी जा सकती है। सहयोगी कलाकारों में सीमा पाहवा, सत्यदीप मिश्र और परेश रावल आदि ने सुंदर और उपयुक्त योगदान दिया है। सिनेमैटोग्राफर सुधीर पलासणे ने फरारी की स्पीड के साथ भावों की तीव्रता को भी बखूबी पर्दे पर उतारा है। रात में दादा-पोते के बीच हुआ क्रिकेट मैच भावपूर्ण बन गया है। फिल्म के नाटकीय दृश्यों में अनुरूप पाश्‌र्र्व संगीत और उम्दा कलाकारों के अभिनय की जुगलबंदी प्रभाव डालती है। फिल्म का संगीत सामान्य और जरूरत के मुताबिक है। विद्या बालन का आयटम सॉन्ग माला जाऊ दे फिल्म में चिप्पी की तरह नहीं आया है। वह फिल्म का हिस्सा बन गया है। सचमुच,देसी ड्रेस और डांस में भी अभिनेत्रियां आकर्षक लग सकती हैं।

*** 1/2 साढ़े तीन स्टार