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Thursday, May 29, 2014

भाते हैं अपने मिजाज से अलग किरदार-जिम्मी शेरगिल


-अजय ब्रह्मात्मज
    कबीर सदानंद की ‘फगली’ में जिम्मी शेरगिल दिल्ली पुलिस के हरियाणवी पुलिस इंस्पेक्टर की भूमिका निभा रहे हैं। अपने अंदाज और लहजे में उन्होंने हरियाणवी खूबियां उतार ली हैं।
- ‘फगली’ में आप का हरियाणवी अंदाज आ रहा है?
0 दिल्ली पुलिस का एक ऑफिसर है। वह हरियाणवी है। भाषा, लहजा और अंदाज हरियाणा का है। वह थोड़ा सिरफिरा है। पुलिस रूलबुक उसे याद है। गंदी और बुरी स्थितियों में भी फायदा उठाने से नहीं हिचकता। वह इंटरेस्टिंग होने के साथ विचित्र भी है। कोई नहीं बता सकता है कि अगले पल ही वह क्या करेगा? वह अडिय़ल, चालाक और तेज दिमाग है। वह सिस्टम और पब्लिक के बीच का लिंक है।
- मतलब सिस्टम की कमजोरियों और सूराखों से परिचित है और उसका फायदा उठाता है?
0 हां,एक हद तक। अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि कुछ पुलिस अधिकारी सारे नियम-कानून जानते हैं। कबीर ने इस किरदार को रोचक तरीके से प्रजेंट किया है। पुलिस के तौर-तरीकों को बारीकी से रखा गया है।
- आप के अपने मिजाज से ऐसे किरदार मेल नहीं खाते तो फिर निभाने में दिक्कत होती होगी?
0 मजा आता है। जो आप नहीं होते हैं, उसे पर्दे पर निभाना हो,यही तो एक्टिंग की खूबसूरती है। मैं बेफिक्र और खुद में डूबा व्यक्ति हूं। लेकिन अगर कोई पुश करे तो खोपड़ी घूम जाती है। कभी किसी पर चिल्लाता नहीं। मुझ जैसे व्यक्ति को ऐसा या साहब जैसा रोल मिलता हे तो उसे निभाना चुनौती होती है। डायरेक्टर के साथ मिल कर फिल्म का सुर पकडऩा पड़ता है। मैं डायरेक्टर की सोच से ही चलता हूं। कुछ जटिल किरदारों पर बातें करते समय हम अपने सुझाव भी दे देते हैं। ‘साहब बीवी और गैंगस्टर’ के समय तिग्मांशु ने कहा था कि साहब ऐसा किरदार है जो बुलाए जाने पर पलट कर देखने में वक्त लेगा। वहां से मुझे किरदार का एटीट्यूड मिल गया था।
- ऐसे किरदारों में और क्या खास बात होती है, जो आप आकृष्ट होते हैं?
0 ये किरदार नार्मल नहीं होते। फिर इन्हें निभाते समय महसूस होता है कि हर एक्शन और संवाद में कुछ कहा जा रहा है। आप पंक्तियां भी नहीं बदल सकते, क्योंकि उनमें कोई सूचना, जानकारी या प्रतिक्रिया रहती है। ‘फगली’ का मेरा किरदार हरियाणवी है, लेकिन उसकी बातें सारे दर्शक समझ सकेंगे।
- इस फिल्म में आपके साथ तीन नए कलाकार है। क्या कोई जिम्मेदारी महसूस करते हैं?
0 जिम्मेदारी तो डायरेक्टर की ही रहती है। किसी सीन में साथ हों तो मैं नार्मल रहता हूं। मैं चौटाला का किरदार निभा रहा हूं। वह अडिय़ल है। उसकी इमेज से किसी को झिझक हुई हो तो फिल्म के लिए अच्छा ही होगा। चारों ने बहुत अच्छा और कंफीडेंस से काम किया है। कियारा, मोहित, विजेन्द्र और अरफी सभी अच्छे लगेंगे।
- आप के लिए ‘फगली’ का मतलब क्या है?
0 ‘फगली’ का मतलब सभी के लिए अलग-अलग है। फिल्म की थीम को यह टायटल अच्छी तरह व्यक्त करता है। मेरे लिए ‘फगली’ अगली से ऊपर का शब्द है।
- आप ने सुना होगा कि ‘बुलेट राजा’ में लगभग सभी की यही राय थी कि आप के किरदार की मौत के बाद फिल्म आगे नहीं बढ़ पाती?
0 यह सुन कर अच्छा लगता है। तिग्मांशु धूलिया ने स्वयं यह बात स्वीकार की कि मूल आयडिया पर चलना था। मेरे किरदार को इंटरवल में आने का फैसला गलत हो गया। दोनों की जुगलबंदी में दर्शकों की रुचि हो गई थी। मेरे मरते ही वह जुगलबंदी खत्म हो जाती है। ऐसी टिप्पणियों के बावजूद फिल्म न चले तो बुरा लगता है।


Friday, November 29, 2013

फिल्‍म समीक्षा : बुलेट राजा

Bullet Rajaदेसी क्राइम थ्रिलर 
-अजय ब्रह्मात्‍मज
तिग्मांशु धूलिया 'हासिल' से अभी तक अपनी फिल्मों में हिंदी मिजाज के साथ मौजूद हैं। हिंदी महज एक भाषा नहीं है। हिंदी प्रदेशों के नागरिकों के एक जाति (नेशन) है। उनके सोचने-विचारने का तरीका अलग है। उनकी संस्कृति और तहजीब भी थोड़ी भिन्न है। मुंबई में विकसित हिंदी सिनेमा की भाषा ही हिंदी रह गई है। संस्कृति, लोकाचार, बात-व्यवहार, परिवेश और प्रस्तुति में इसने अलग स्वरूप ले लिया है। प्रकाश झा, विशाल भारद्वाज, अनुराग कश्यप और तिग्मांशु धूलिया की फिल्मों में यह एक हद तक आ पाती है। तिग्मांशु धूलिया ने बदले और प्रतिशोध की अपराध कथा को हिंदी प्रदेश में स्थापित किया है। हालांकि मुंबइया सिनेमा (बॉलीवुड) के दुष्प्रभाव से वे पूरी तरह से बच नहीं सके हैं, लेकिन उनके इस प्रयास की सराहना और प्रशंसा करनी होगी। 'बुलेट राजा' जोनर के लिहाज से 'न्वॉयर' फिल्म है। हम इसे 'पुरबिया न्वॉयर' कह सकते हैं।
इन दिनों हिंदी फिल्मों में लंपट, बेशर्म, लालची और लुच्चे नायकों की भीड़ बढ़ी है। 'बुलेट राजा' के राजा मिसरा को गौर से देखें तो वह इन सब से अलग तेवर का मिडिल क्लास का सामान्य युवक है। वह 10 से 5 की साधारण नौकरी करना चाहता है, लेकिन परिस्थितियां ऐसे बनती हैं कि उसके हाथों में बंदूक आ जाती हैं। आत्मविश्वास के धनी राजा मिसरा के दिन-दहाड़े गोलीकांड से सभी आतंकित होते हैं। जल्दी ही वह प्रदेश के नेताओं की निगाह में आ जाता है। उनकी राजनीतिक छत्रछाया में वह और भी संगीन अपराध और हत्याएं करता है। एक स्थिति आती है कि उसकी हरकतों से सिस्टम को आंच आने लगती है। उसे हिदायत दी जाती है तो वह सिस्टम के खिलाफ खड़ा हो जाता है। राजा मिसरा आठवें दशक के एंग्री यंग मैन विजय से अलग है। वह आज का नाराज, दिग्भ्रमित और दिल का सच्चा युवक है। दोस्ती, भाईचारे और प्रेम के लिए वह जान की बाजी लगा सकता है।
राजा मिसरा के जीवन में दोस्त रूद्र और प्रेमिका हैं। इनके अलावा उसका मध्यवर्गीय परिवार भी है, जिसके लिए वह हमेशा फिक्रमंद रहता है। राजा मिसरा आठवें दशक के विजय की तरह रिश्तों में लावारिस नहीं है। रूद्र की हत्या का बदला लेने से जब उस रोका जाता है तो स्पष्ट कहता है, 'भाई मरा है मेरा। बदला लेने की परंपरा है हमारी। यह कोई कारपोरेट कल्चर नहीं है कि अगली डील में एडजस्ट कर लेंगे।' तिग्मांशु अपने फिल्मों के चरित्रों को अच्छी तरह गढ़ते हैं। इस फिल्म में ही रूद्र, सुमेर यादव, बजाज, मुन्ना और जेल में कैद श्रीवास्तव को उन्होंने हिंदी प्रदेश की समकालीन जिंदगी से उठा लिया है। शुक्ला, यादव और अन्य जातियों के नामधारी के नेताओं के पीछे कहीं न कहीं हिंदी प्रदेश के राजनीतिक समीकरण को भी पेश करने की मंशा रही होगी। तिग्मांशु का ध्येय राजनीति के विस्तार में जाना नहीं था। कई प्रसंगों में अपने संवादों में ही वे राजनीतिक टिप्पणी कर डालते हैं। अगर भाषा की विनोदप्रियता से वाकिफ न हों तो तंज छूट सकता है। मुंबई, कोलकाता और चंबल के प्रसंग खटकते हैं।
सैफ अली खान ने राजा मिसरा के किरदार में चुस्ती, फुर्ती और गति दिखाई है। अगर उनके बातों और लुक में निरंतरता रहती तो प्रभाव बढ़ जाता। उम्र और अनुभव से वे देसी किरदार में ढलते हैं। जिम्मी शेरगिल को कम दृश्य मिले हैं, लेकिन उन दृश्यों में ही वे अपनी असरदार मौजूदगी से आकर्षित करता है। सुमेर यादव की भूमिका में रवि किशन मिले दृश्यों में ही आकर्षित करते हैं। छोटी और महत्वपूर्ण भूमिकाओं में राज बब्बर, गुलशन ग्रोवर आदि अपनी भूमिकाओं के अनुकूल हैं। यहां तक कि चंकी पांडे को भी एक किरदार मिला है। सोनाक्षी सिन्हा बंगाली युवती के किरदार को निभा ले जाती हैं। विद्युत जामवाल का एक्शन दमदार है।
फिल्म का गीत-संगीत थोड़ा कमजोर है। देसी टच और पुरबिया संगीत की ताजगी की कमी महसूस होती है। 'तमंचे पर डिस्को' खास उद्देश्य को पूरा करता है और 'डोंट टच' में माही गिल का नृत्य बॉलीवुड के आयटम नंबर से प्रभावित है। इस फिल्म की खूबी परतदार पटकथा और स्थितिजन्य संवाद हैं।
अवधि: 138 मिनट 
**** चार स्‍टार