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फिल्‍म समीक्षा : फुल्‍लू

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फिल्‍म रिव्‍यू चकाचौंध नहीं करती फुल्‍लू -अजय ब्रह्मात्‍मज
सीमित साधनों और बजट की अभिषेक सक्‍सेना निर्देशित ‘फुल्‍लू’ आरंभिक चमक के बाद क्रिएटिविटी में भी सीमित रह गई है। नेक इरादे से बनाई गई इस फिल्‍म में घटनाएं इतनी कम हैं कि कथा विस्‍तार नहीं हो सका है। फिल्‍म एकआयामी होकर रह जाती है। इस वजह से फिल्‍म का संदेश प्रभावी तरीके से व्‍यक्‍त नहीे हो पाता। महिलाओं केबीच सैनीटरी पैड की जरूरत पर जोर देती यह फिल्‍म एक दिलचस्‍न व्‍यक्ति के निजी प्रयासों तक मिटी रहती है। लेखक ने कहानी बढ़ाने के क्रम में तर्क और कारण पर अधिक गौर नहीं किया है। प्रसंगों में तारतम्‍य भी नहीं बना रहता। उत्‍तर भारत के भोजुपरी भाषी गांव में फुल्‍लू अपनी मां और बहन के साथ रहता है। वह गांव की महिलाओं के बीच बहुत पॉपुलर है। शहर से वह गांव की सभी महिलाओं के लिए उनकी जरूरत के सामान ले आता है। मां उसे हमेशा झिड़कती रहती है। मां को लगता है कि उसका बेटा निकम्‍मा और ‘मौगा’ निकल गया है। वह चाहती है कि बेटा शहर जाकर कोई काम करे। कुछ पैसे कमाए। गांव के जवान मर्द रोजगार के लिए दूर शहरों में रहते हैं। फुल्‍लू की मां गुदड़ी सीने और बेचन…

फिल्‍म समीक्षा : फिल्मिस्‍तान

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- अजय ब्रह्मात्‍मज  2012 में 'फिल्मिस्तान' को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। कायदे से यह फिल्म काफी पहले आ जानी चाहिए थी। अभी चर्चित फिल्मी हस्तियां 'फिल्मिस्तान' के गुणगान में लगी हैं। पिछले एक साल तक ये सहृदय समर्थक कहां थे? 'फिल्मिस्तान' नितिन कक्कड़ की शानदार फिल्म है। यह फिल्म भारत-पाकिस्तान के रिश्तों की घिसी-पिटी कथाओं और घटनाओं में नहीं जाती। नए तरीके से दोनों देशों की समानता को रेखांकित करती 'फिल्मिस्तान' में भावनाओं का उद्रेक होता है और घृणा थोड़ी कम होती है। इस फिल्म में नितिन कक्कड़ ने अनोखे अंदाज में दोनों पड़ोसी देशों को करीब दिखाने की सार्थक कोशिश की है। सनी अरोड़ा एक्टर बनना चाहता है। एक्टिंग में सही मौका नहीं मिलने पर वह कुछ समय के लिए एक अमेरिकी फिल्म मंडली का सहायक बन जाता है। राजस्थान के सीमांत पर शूटिंग के दरम्यान सनी का अपहरण हो जाता है। पाकिस्तानी आतंकवादी उसे अमेरिकी समझ कर उठा ले जाते हैं। गलती का एहसास होने पर सही समय के इंतजार में वे उसे बंदी बना लेते हैं। इस दौरान सनी की मुलाकात आफताब से हो जाती है। आफताब हिंदी फिल्म…