Search This Blog

Showing posts with label दीपिका पादुकोण. Show all posts
Showing posts with label दीपिका पादुकोण. Show all posts

Friday, December 18, 2015

फिल्‍म समीक्षा : बाजीराव मस्‍तानी




-अजय ब्रह्मात्‍मज
कल्‍पना और साक्ष्‍य का भव्‍य संयोग

      यह कहानी उस समय की है,जब मराठा साम्राज्‍य का ध्‍वज छत्रपति साहूजी महाराज के हाथों में लहरा रहा था और जिनके पेशवा थे बाजीराव वल्हाड़। तलवार में बिजली सी हरकत और इरादों में हिमालय की अटलता,चितपावन कुल के ब्राह्मनों का तेज और आंखों में एक ही सपना... दिल्‍ली के तख्‍त पर लहराता हुआ मराठाओं का ध्‍वज। कुशल नेतृत्‍व,बेजोड़ राजनीति और अकल्‍पनीय युद्ध कौशल से दस सालों में बाजीराव ने आधे हिंदुस्‍तान पर अपना कब्‍जा जमा लिया। दक्षिण में निजाम से लेकर दिल्‍ली के मुगल दरबार तक उसकी बहादुरी के चर्चे होने लगे।
       इस राजनीतिक पृष्‍ठभूमि में रची गई संजय लीला भंसाली की ऐतिहासिक प्रेमकहानी है बाजीराव मस्‍तानी। बहादुर बाजीराव और उतनी ही बहादुर मस्‍तानी की यह प्रेमकहानी छोटी सी है। अपराजेय मराठा योद्धा बाजीराव और  बुंदेलखंड की बहादुर राजकुमारी मस्‍तानी के बीच इश्‍क हो जाता है। बाजीराव अपनी कटार मस्‍तानी को भेंट करता है। बुंदेलखंड की परंपरा में कटार देने का मतलब शादी करना होता है। मस्‍तानी पुणे के लिए रवाना होती है ताकि बाजीराव के साथ रह सके। यहां बाजीराव बचपन की दोस्‍त काशीबाई के साथ शादी कर चुके हैं। मस्‍तानी के आगमन पर बाजीराव की मां नाखुश होती है। वह मस्‍तानी का तिरस्‍कार और अपमान करती हैं। बड़ी वजह उसका मुसलमान होना है। थोड़े समय के असमंजस के बाद बाजीराव तय करता है कि वह मस्‍तानी को अपना लेगा। रिश्‍तों के इस दास्‍तान में ही तब का हिंदुस्‍तान भी नजर आता है। उस समय की राजनीतिक और सामाजिक स्थितियों पर भी टिप्‍पणियां होती हैं।
    संजय लीला भंसाली की बाजीराव मस्‍तानी में कथात्‍मक तत्‍व कम हैं। ज्‍यादा पेंच और घटनाएं नहीं हैं। इस फिल्‍म में विपुल दृश्‍यात्‍मक सौंदर्य है। ऐसे विजुअल हिंदी फिल्‍मों में कम दिखाई पड़ते हैं। भंसाली ने  सभी दृश्‍यों को काल्‍पनिक विस्‍तार दिया है। वे उन्‍हें भव्‍य और विशद रूप में पेश करते हैं। वाड़ा,महल,युद्ध के मैदान के चित्रण में में गहन बारीकी दिखाई पड़ती है। संजय और उनके तकनीकी सहयोगी बाजीराव के समय की वास्‍तु कला,युद्ध कला,वेशभूषा,सामाजिक आचरण और व्‍यवहार,राजनीतिक और पारिवारिक मर्यादाओं का कहानी में समावेश करते हैं। उनके चित्रांकन के लिए आवश्‍यक भव्‍यता से वे नहीं हिचकते। अपनी खास शैली के साथ इस फिल्‍म में भी भंसाली मौजूद हैं। उस काल को दिखाने में उन्‍होंने ऐतिहासिक साक्ष्‍यों के साथ कल्‍पना का योग किया है। वे एक अप्रतिम संसार रचते हैं,जिसमें गतिविधियों का विस्‍तार करते हैं। वे उनके फिल्‍मांकन में ठहरते हें। राजसी कारोबार,पारिवारिक अनुष्‍ठान और युद्ध के मैदान में भंसाली स्‍वयं विचरते हैं और दर्शकों को अभिभूत करते हैं।
    भंसाली ने बाजीराव,मस्‍तानी और काशीबाई के किरदार को गढ़ा है। साथ ही बाजीराव की मां,चीमा और नाना जैसे किरदारों से इस छोटी कहानी में नाटकीयता बढ़ाई है। देखें तो सभी राज और पेशवा परिवारों में वर्चस्‍व के लिए एक तरह की साजिशें रची गई हैं। बाजीराव खुद के बारे में कहता है...चीते की चाल,बाज की नजर और बाजीराव की तलवार पर संदेह नहीं करते,कभी भी मात दे सकती है। हम फिल्‍म में स्‍फूर्तिवान बाजीराव को पूरी चपलता में देखते हैं। मस्‍तानी की आरंभिक वीरता पुणे आने के बाद पारिवारिक घात का शिकार होती है। उसकी आंखें पथरा जाती हैं। यों लगता है कि उसके सपने उन आंखों में जम गए हैं। किसी बाघिन को पिंजड़े में डाल दिया गया हो। बाजीराव से बेइंतहा मोहब्‍बत करने के साथ वह मर्यादाओं का खयाल रखने में वह संकुचित हो जाती है। काशीबाई के साथ स्थितियों ने प्रहसन किया है। फिर भी वह कठोर दिन होकर भी नारी के सम्‍मान और पति के अभिमान में कसर नहीं आने देती। संजय लीला भंसाली ने तीनों किरदारों को पर्याप्‍त गरिमा और परिप्रेक्ष्‍य दिया है। इनमें कोई भी भावनात्‍मक छल में नहीं शामिल है।
     बाजीराव मस्‍तानी के मुख्‍य कलाकार प्रियंका चोपड़ा,दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह ने अपने किरदारों को आवश्‍यक गहराई और गंभीरता दी है। रणवीर तो अपने नाम के अनुरूप ही कुशल योद्धा दिखते हैं। युद्ध के मैदान में उनकी स्‍फूर्ति घुड़सवारी,तलवारबाजी और आक्रामकता में स्‍पष्‍ट नजर आती है। सेनापति के रूप में वे योद्धाओं को ललकारने में सक्षम हैं। रणवीर सिंह ने युद्ध के मैदान से लेकर भावनात्‍मक उथल-पुथल के घमासान तक में बाजीराव के गर्व और द्वंद्व को अपेक्षित भाव दिए हैं। दीपिका पादुकोण इस दौर की सक्षम अथनेत्री के तौर पर निखरती जा रही हैं। उन्‍होंने योद्धा के कौशल और माशूका की कसक को खूबसूरती के साथ पेश किया है। बच्‍चे को कंधे पर लेकर युद्ध करती मस्‍तानी किसी बाघिन की तरह लगती है। प्रियंका चोपड़ा के किरदार काशीबाई के लिए अधिक स्‍पेस नहीं था। अपनी सीमित उपस्थिति में ही प्रियंका चोपड़ा पभावित करती हैं। इस किरदार को लेखक-निर्देशक का सपोर्ट भी मिला है। वास्‍तन में काशीबाई का किरदार ही बाजीराव और मस्‍तानी की प्रेमकहानी का पेंच है।
      संजय लीला भंसाली ने 21 वीं सदी का दूसरी ऐतिहासिक फिल्‍म प्रस्‍तुत की है। इसके पहले हम आशुतोष गोवाकरकर की जोधा अकबर देख चुके हैं। आशुतोष की तरह भंसाली ने भी अपने समय के सामाजिक,वैचारिक और धार्मिक मुद्दों को स्‍पर्श किया है। बाजीराव और मस्‍तानी के प्रेम की बड़ी अड़चन दोनों के अलग धर्म का होना है। संवादों और प्रसंगों के माध्‍यम से भंसाली ने बाजीराव के माध्‍यम से अपना पक्ष रखा है। खास कर मराठा राजनीति में इस ऐतिहासिक प्रसंग पर ध्‍यान देना चाहिए।
     बाजीराव मस्‍तानी के प्रोडक्‍शन पर अलग से लिखा जा सकता है। संजय लीला भंसाली की टीम ने उस दौर को राजसी भव्‍यता और विशालता दी है। उन्‍होंने संगीत,सेट,पार्श्‍व संगीत,दृश्‍य संयोजन,युद्ध की कोरियोग्राफी में अपनी कुशलता जाहिर की है। फिल्‍म के वे हिस्‍से मनोरम और उल्‍लेखनीय है,जब पार्श्‍व संगीत पर गतिविधियां चल रही हैं। बिंगल,दुदुंभि,ढोल और नगाड़ों की ध्‍वनि जोश का संचार करती है। बगैर कहे ही सब उद्घाटित होता है।
     फिल्‍म के क्‍लाइमेक्‍स से थोड़ी निराशा होती है। संभ्रम की स्थिति में आए बाजीराव के ये दृश्‍य लंबे हो गए हैं। हां, एक और बात उल्‍लेखनीय है कि फिल्‍म के अधिकांश कार्य व्‍यापार सूर्यास्‍त और सूर्योदय के बीच ही होते हें। गोधूलि वेला का फिल्‍म में अत्‍यधिक अस्‍तेमाल हुआ है। इसलिए फिल्‍म का रंग भी धूसर रखा गया है।
अवधि-158 मिनट
स्‍टार- चार स्‍टार
       

Friday, November 27, 2015

फिल्‍म समीक्षा : तमाशा



-अजय ब्रह्मात्‍मज
प्रेम और जिंदगी की नई तकरीर
    इम्तियाज अली ने रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण जैसे दो समर्थ कलाकारों के सहारे प्रेम और अस्मिता के मूर्त-अमूर्त भाव को अभिव्‍यक्ति दी है। सीधी-सपाट कहानी और फिल्‍मों के इस दौर में उन्‍होंने जोखिम भरा काम किया है। उन्‍होंने दो पॉपुलर कलाकारों के जरिए एक अपारंपरिक पटकथा और असामान्‍य चरित्रों को पेश किया है। हिंदी फिल्‍मों का आम दर्शक ऐसी फिल्‍मों में असहज हो जाता है। फिल्‍म देखने के सालों के मनोरंजक अनुभव और रसास्‍वादन की एकरसता में जब भी फेरबदल होती है तो दर्शक विचलित होते हैं। जिंदगी रुटीन पर चलती रहे और रुटीन फिल्‍मों से रुटीन मनोरंजन मिलता रहे। आम दर्शक यही चाहते हैं। इम्तियाज अली इस बार अपनी लकीर बदल दी है। उन्‍होंने चेहरे पर नकाब चढ़ाए अदृश्‍य मंजिलों की ओर भागते नौजवानों को लंघी मार दी है। उन्‍हें यह सोचने पर विवश किया है कि क्‍यों हम सभी खुद पर गिरह लगा कर स्‍वयं को भूल बैठे हैं?
    वेद और तारा वर्तमान पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं। परिवार और समाज ने उन्‍हें एक राह दिखाई है। उस राह पर चलने में ही उनकी कामयाबी मानी जाती है1 जिंदगी का यह ढर्रा चाहता है कि सभी एक तरह से रहें और जिएं। शिमला में पैदा और बड़ा हुआ वेद का दिल किस्‍सों-कहानियों में लगता है। वह बेखुदी में बेपरवाह जीना चाहता है। इसी तलाश में भटकता हुआ वह फ्रांस के कोर्सिका पहुंच गया है। वहां उसकी मुलाकात तारा से होती है। तारा और वेद संयोग से करीब आते हैं,लेकिन वादा करते हैं कि वे एकदूसरे के बारे में न कुछ पूछेंगे और न बताएंगे। वे झूठ ही बोलेंगे और कोशिश करेंगे कि जिंदगी में फिर कभी नहीं मिलें। वेद की बेफिक्री तारा को भा जाती है। उसकी जिंदगी में बदलाव आता है। उन दोनों के बीच स्‍पार्क होता है,लेकिन दोनों ही उसे प्‍यार का नाम नहीं देते। जिंदगी के सफर में वे अपने रास्‍तों पर निकल जाते हैं। तारा मोहब्‍बत की कशिश के साथ लौटती है और वेद जिंदगी की जंग में शामिल हो जाता है। एक अंतराल के बाद फिर से दोनों की मुलाकात होती है। तारा पाती और महसूस करती है कि बेफिक्र वेद जिंदगी की बेचारगी को स्‍वीकार कर मशीन बन चुका है। वह इस वेद को स्‍वीकार नहीं पाती। वेद के प्रति अपने कोमल अहसासों को भी वह दबा जाती है। तारा की यह अस्‍वीकृति वेद को अपने प्रति जागरूक करती है। वह अंदर झांकता है। वह भी महसूस करता है कि प्रोडक्‍ट मैनेजर बन कर वह दुनिया की खरीद-फरोख्‍त की होड़ में शामिल हो चुका है,क्‍योंकि अभी कंट्री और कंपनी में फर्क करना मुश्किल हों गया है। कंट्री कंपनी बन चुकी हैं और कंपनी कंट्री।
    इम्तियाज की तमाशा बेमर्जी का काम कर जल्‍दी से कामयाब और अमीर होने की फिलासफी के खिलाफ खड़ी होती है। रोजमर्रा की रुटीन जिंदगी में बंध कर हम बहुत कुछ खो रहे हैं। तारा और वेद की जिंदगी इस बंधन और होड़ से अलग नहीं है। उन्‍हें इस तरह से ढाला जाता है कि वे खुद की ख्‍वाहिशों से ही बेखबर हो जाते हैं। इम्तियाज अली के किरदार उनकी पहले की फिल्‍मों की तरह ही सफर करते हैं और ठिकाने बदलते हैं। इस यात्रा में मिलते-बिछुड़ते और फिर से मिलते हुए उनकी कहानी पूरी होती है। उनके किरदारों में बदलाव आया है,लेकिन शैली और शिल्‍प में इम्तियाज अधिक भिन्‍नता नहीं लाते। इस बार कथ्‍य की जरूरत के अनुरास थ्रिएटर और रंगमंचीय प्रदर्शन के तत्‍व उन्‍होंने फिल्‍म में शामिल किए हैं। कलाकरों के अंतस और आत्‍मसंघर्ष को व्‍यक्‍त करने के लिए उन्‍हें इसकी जरूरत पड़ी है। संभावना थी कि वे संवादों में दार्शनिक हो जाते,लेकिन उन्‍होंने आमफहम भाषा और संवादों में गहरी और परिवर्तनकारी बातें कही हैं।
       यह फिल्‍म रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण के परफारमेंस पर निर्भर करती है। उन दोनों ने कतई निराश नहीं किया है। वे स्क्रिप्‍ट की मांग के मुताबिक आने दायरे से बाहर निकले हैं और पूरी मेहनत से वेद और तारा को पर्दे पर जीवंत किया है। यह नियमित फिल्‍म नहीं है,इसलिए उनके अभिनय में अनियमितता आई है। छोटी सी भूमिका में आए इश्‍तयाक खान याद रह जाते हैं। उनकी मौजूदगी वेद को खोलती और विस्‍तार देती है। तमाशा हिंदी फिल्‍मों की रेगुलर और औसत प्रेमकहानी नहीं है। इस प्रेमकहानी में चरित्रों का उद्बोधन और उद्घाटन है। वेद और तारा एक-दूसरे की मदद से खुद के करीब आते हैं।
       फिल्‍म का गीत-संगीत असरकारी है। इरशाद ने अपने गीतों के जरिए वेद और तारा के मनोभावों को सटीक अभिव्‍य‍क्ति दी है। एआर रहमान ने पार्श्‍व संगीत और संगीत में किरदारों की उथल-पुथल को सांगीतिक आधार दिया है। फिलम को बारीकी से देखें तो पता चलेगा कि कैसे पार्श्‍व संगीत कलाकारों परफारमेंस का प्रभाव बढ़ा देता है। तमाशा के गीतों में आए शब्‍द भाव और अर्थ की गहराई से संपन्‍न हैं। इरशाद की खूबी को एआर रहमान के संगीत ने खास बना दिया है।
अवधि-151 मिनट
स्‍टार-साढ़े तीन स्‍टार  

Sunday, September 6, 2015

तलाश है खुद की ‘तमाशा’: इम्तियाज अली


-अजय ब्रह्मात्मज
    प्रेम, भावना और संबंध के संवेदनशील फिल्मकार इम्तियाज अली इन दिनों ‘तमाशा’ पूरी करने में व्यस्त हैं। तकनीकी बारीकियां हासिल करने की सुविधाएं बढऩे से फिल्म के पोस्ट प्रोडक्शन में भी निर्देशक की तल्लीनता बढ़ जाती है। रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण की ‘तमाशा’ में इम्तियाज अली ने प्रमुख किरदारों को बिल्कुल नए अंदाज में पेश किया है। 21 वीं सदी के दूसरे दशक की इस प्रेम कहानी में स्वयं की खोज के साथ समाज भी है।
-क्या है ‘तमाशा’?
‘बाचीजा-ए-अतफाल है दुनिया मेरे आगे. होता है शब-ओ-रोज तमाशा मेरे आगे’ कह लें या ‘दुनिया रंगमंच है और हम एक्टर हैं। अपनी भूमिकाएं निभा रहे हैं।’ हमेशा यह एहसास होता है कि यह जिंदगी एक खेल है, तमाशा है। हमारे इर्द-गिर्द जो चल रहा है, वह सच है कि माया है, हमें पता नहीं। शायरों, कवियों, दार्शनिकों ने अपने-अपने समय पर हमें समझाने की कोशिश की है। ऐसा कहते हैं कि सारी दुनिया की कहानियां एक जैसी होती हैं।
    मेरी फिल्म में शिमला का एक बच्चा है। उसकी कहानियों में रुचि है, वह पैसा चुरा कर कहानी सुनने एक किस्सागो के पास रहता है। शिमला में ही एक किस्सागो रहता है। वह आजीविका के लिए तो कुछ और करता है, लेकिन पैसे देने पर वह कहानियां सुनाता है। वह बताता है कि सारी कहानियां एक जैसी होती हैं और तुम्हारी जिंदगी में भी वही कहानी चल रही है। मेरे नायक वेद वद्र्धन साहनी की कहानी सुनी हुई कहानियों के किरदारों से टकराती है। वह अपनी जिंदगी में उनकी कहानियां देखता है।
-वेद वद्र्धन साहनी रोचक किरदार लग रहा है? थोड़ा विस्तार से बताएं?
वेद को एहसास नहीं है कि उसकी क्या क्षमताएं और योग्यताएं हैं। एक लडक़ी उसे याद दिलाती है कि तुम तो कोई और हो। मुझे तुम्हारे अंदर कुछ खास दिखता है, जबकि तुमने कोई और चोला पहन रखा है।
-आज पूरे समाज में एक खलबली सी मची है। इस दौर में वेद का समाज से ताल्लुक है या वह अपनी कहानियों की दुनिया में खोया रहता है?
यही मेरी फिल्म की कहानी है। दुनिया में जीने और आगे बढऩे के साथ उसका अपना ‘आप’ छूटता रहता है। यही स्ट्रगल है। सभी की नियति है कि दुनियादारी की वजह से अपनी खासियत दबा कर आम (साधारण) हो जाना होता है। यह लड़ाई ताजिंदगी चलती है। एक जो हम ऑर्गेनिक रूप में होते हैं और दूसरा जो हमारा सामाजिक रूप होता है। यह हम सभी के तसव्वुर और हकीकत की लड़ाई है।
-क्या वेद पर कोई सामाजिक दवाब भी है? क्या उसे खुशी मिल पाती है?
वेद का अंतस अलग है। बाह्य रूप में उसका अंतस नहीं उभर पा रहा है। वह असंतुष्ट रहता है। अपनी जिंदगी में उसका स्ट्रगल चल रहा होता है। हम कहते हैं कि समाज हमें रोकता है। मुझे लगता है कि हम खुद भी अपनी सीमाएं तय कर लेते हैं। हम जिसे समाज कहते हैं, हम वही समाज हो जाते हैं। खुद पर ही दवाब डालते हैं। वेद की लड़ाई खुद से है। वह सेफ प्ले करता है। वह डरा हुआ है। आईने के सामने खड़े होने पर दिल और दिमाग दोनों की आवाजें सुनाई पड़ती हैं। हम उनसे जूझते हैं और एक फैसला लेकर निकल पड़ते हैं।
-हम सभी कुछ करने या न करने के लिए कहानी खोजते या तोड़ते हैं? हीरो तोड़ते हैं तो जीत जाते हैं। ज्यादातर लोग कुछ न करने के बहानों और फैसलों से ही हारते हैं?
सही कह रहे हैं आप। हम अपने फैसलों के ही नतीजे हैं। ‘तमाशा’ के वेद को ही लें। उसके पिता विभाजन के बाद शिमला में आए थे। वेद के दादा को अपनी ड्यूटी पर अटल रहना पड़ा था। दिल के ख्यालों को बेकार मान कर छोडऩा पड़ा था। आज तीसरी पीढ़ी का लडक़ा विभाजन के समय का बोझ उठाने के लिए तैयार नहीं है। यह उस परिवार का लडक़ा है। पिता समझाते भी हैं कि बचपन में सभी कहानियां सुनते हैं, लेकिन कोई उन कहानियों में नहीं रह जाता। तुम भी निकलो।
-लडक़ी उसकी जिंदगी में कब और कैसे आती है?
लडक़ी पेरिस में है। वह कोर्सिका आने पर वेद से मिलती है। वह खुद एक क्राइसिस में है। दोनों की मुलाकात के बाद तय करते हैं कि हम अपनी कहानी को एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी बनाएंगे। कैसे बनाएंगे? हम एक-दूसरे को बताएंगे ही नहीं कि हम कौन हैं? वादा करते हैं कि हम फिर कभी नहीं मिलेंगे। एक-दूसरे को अपने बारे में बताते समय केवल झूठ कहेंगे। आठ दिनों के बाद वे अलग हो जाते हैं। कई सालों के बाद वे फिर मिलते हैं। फिर लडक़ी कोा लगता है कि लडक़े में इतना फर्क कैसे आ गया? ‘तमाशा’ की लडक़ी म्यूज है, जो किसी इंसान को कलाकार बना देती है।
-‘तमाशा’ में लडक़ी और लडक़े के संबंधों और प्रेम की गहराई और तीव्रता कैसी है?
उन लोगों ने वादा किया था कि वे फिजिकल नहीं होंगे। दोनों के बीच दिल का रिश्ता बनता है। लडक़ी वेद से बहुत प्रभावित होती है। उसकी फ्री स्पिरिट से खुश होती है। उसके साथ रहने में उसे अच्छा लगता है। वह मौज-मस्ती में लापरवाह जिंदगी जीता है। वह पहाड़ों से भी बातें कर सकता है।
- आप की फिल्मों में नायक-नायिका प्राय: शारीरिक संबंध बनाने से बचते हैं?
ऐसा नहीं है। मेरा मानना है कि अगर दिल न मिले तो शरीर के मिलने का मतलब नहीं है। मेरे किरदार पहले दिल से मिलते हैं।
-क्या ‘तमाशा’ के किरदार भी आप की दूसरी फिल्मों की तरह ट्रैवल करते हैं?
हां, करते हैं। शिमला, कोर्सिका, टोक्यो, दिल्ली और कोलकाता जैसे शहरों में किरदार मिलते हैं। वेद शिमला का है और तारा माहेश्वरी कोलकाता की है। फिल्म में उन दोनों की जर्नी है तो ट्रैवल भी है।
-खुद इम्तियाज के ख्यालों की दुनिया और वास्तविक दुनिया कितनी करीब है?
मुझे बराबर लगता रहा है कि यहां मैं ऐसे रह रहा हूं, लेकिन मैं कुछ और भी हूं। यह हम सभी को लगता है कि हम कुछ और हैं या होना चाहते हैं। मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ? समझ में नहीं आता। शायद यह मेरी अपनी समस्या है। मेरी खुशकिस्मती है कि मैं फिल्मों में आ गया। फिर भी यह नहीं लगता कि मैं उसके करीब आ पाया हूं, जो मेरा शुद्ध स्वयं है। मुझे खुद में ही प्रदूषण दिखता है। अच्छा आदमी बनने या होने का भ्रम पाल रखा है मैंने। कई बार खुशी के मौकों पर उदास हो जाता हूं और उदासी के मौकों पर दुखी नहीं होता।
-इस फिल्म का गीत-संगीत कैसा है?
इस फिल्म में म्यूजिक सूत्रधार है। मेरी फिल्मों में ऐसा संगीत कभी नहीं आया। गीतों में रंगमंचीय तरीके से कहानी कही गई है। हमने लोकगीतों और लोकगाथाओं का इस्तेमाल किया है। एआर रहमान ने काफी मधुर संगीत दिया है। इरशाद कामिल ने अपने गीतों में काफी प्रभावी संगीत दिया है। पारंपरिक तमाशा, नौटंकी आदि से प्रभाव लिए गए हैं। इस फिल्म के संगीत की ध्वनि में तमाशा है। एआर रहमान की प्रतियोगिता अपने आप से है। वे फिर से सरप्राइज करेंगे।

Monday, May 11, 2015

परिवार की रीढ़ है मां : दीपिका पादुकोण


-अजय ब्रह्मात्मज
    दीपिका पादुकोण की शुजीत सरकार निर्देशित ‘पीकू’ रिलीज हो चुकी है। इम्तियाज अली निर्देशित ‘तमाशा’ की शूटिंग समाप्ति पर है। इन दिनों वह संजय लीला भंसाली की ‘बाजीराव मस्तानी’ की शूटिंग कर रही हैं। इसकी शूअिंग के सिलसिले में वह फिल्मसिटी के पास ही एक पंचतारा होटल में रह रही हैं। समय बचाने के लिए यह व्यवस्था की गई है। दीपिका पिछले दिनों काफी चर्चा में रहीं। ‘माई च्वॉयस’ वीडियो और डिप्रेशन की स्वीमृति के बारे में बहुत कुछ लिखा और बताया गया। दीपिका थोड़ी खिन्न हैं,क्योंकि सोशल मीडिया और मीडिया पर चल रहे विमर्श ने उसे अलग परिप्रेक्ष्य में रख दिया है। दीपिका देश की अन्य हमउम्र लड़कियों की तरह स्वतंत्र हैं। मिजाज की कामकाजी लड़की हैं। उन्हें परिवार से बेहद प्यार है। इधर मिली पहचान की वजह से वह अपनी फिल्मों के चुनाव और एक्टिंग के प्रति अधिक सचेत हो गई हैं। उन्हें इसके अनुरूप तारीफ भी मिल रही है।
    ‘पीकू’ देख चुके दर्शकों को दीपिका के किरदार के बारे में मालूम होगा। पीकू के बारे में दीपिका के विचार कुछ यूं हैं, ‘वह कामकाजी लड़की है। अपने परिवार का भी ख्याल रखती है। अपने पिता से जुड़ी है। उसे हर दिन कई सारे काम निपटाने रहते हैं। दोस्त, दफ्तर और परिवार के बीच भागती-दौड़ती पीकू किसी अन्य भारतीय लड़की की तरह ही है। पूरी फिल्म पीकू की दुनिया है। उसी के दृष्टिकोण से पूरी कहानी कही गई है। पिता के साथ अपने संबंध में संतुलन बिठाते हुए पीकू बाकी दुनिया से भी जुड़ी रहती है। मुझे लगता है मेरी उम्र की हर लड़की ने खुद में पीकू को देखा होगा। बाबा के लिए पीकू सिर्फ बेटी नहीं है। वह अपनी मां की भूमिका भी निभाती है और कई बार तो बाबा की भी मां बन जाती है। पीकू की इसी पहचान की वजह से मैंने यह फिल्म साइन की थी।’
    दीपिका पादुकोण अपने पिता प्रकाश पादुकोण के काफी करीब हैं। रिश्ते की इस नजदीकी का फायदा उन्हें पीकू का किरदार निभाने में मिला। हालांकि रील के पिता भाष्कर और रियल पिता प्रकाश के नामों में अर्थ की समानता होने के बावजूद दोनों के मिजाज में फर्क है। दीपिका कहती हैं, ‘इमोशन के स्तर पर कमोबेश हर बाप-बेटी का रिश्ता एक जैसा ही होता है। अपने पापा के साथ के रिश्ते के बारे में बताऊं तो उसमें आदर, प्रेम, प्रोटेक्शन और जिम्मेदारी है। अमित जी के किरदार से अलग हैं मेरे पापा। मेरे पापा शांत, शर्मीले और कम बोलने वाले हैं। निजी जिंदगी में पापा को संभालना मुश्किल काम नहीं है, जबकि पीकू के बाबा मुश्किल किरदार हैं। उनकी जरूरतें कभी खत्म ही नहीं होती।’
    दीपिका के पिता प्रकाश पादुकोण की चर्चा बहुत ज्यादा होती है। दीपिका की मां के बारे में लोग कम जानते हैं। मां का जिक्र आने पर दीपिका गर्व से मुस्कुराती हैं। अपनी मां के बारे में वे कहती हैं, ‘ मेरे जीवन और कैरियर में मां की भूमिका बहुत बड़ी रही है। सभी बेटियों की जिंदगी में मां महत्वपूर्ण होती हैं, लेकिन मेरे कैरियर में तो उनका योगदान उल्लेखनीय है। हम जिस कैरियर में हैं, उसमें परिवार और मां के सपोर्ट की बहुत जरूरत पड़ती है। इस उम्र में पहुंचने पर मैं महसूस करती हूं कि मां ने हमारे लिए कितना त्याग किया है। सच कहूं तो यह सिर्फ मेरी मां की विशेषता नहीं है। हर मां ऐसी ही होती है। अपने आसपास और परिवार में देखें तो मां हमेशा बैक सीट लेती है और परिवार के पुरुष को काम पर जाने की अनुमति देती है। मां हर परिवार में बैकबोन होती है। परिवार और बच्चों की परवरिश में मां की छोटी-छोटी की गई मेहनत तब समझ में आती है, जब आप खुद बड़े होते हैं और उन पलों को याद करते हैं। हमें कहां पता चलता है कि घर को सुचारू रूप से चलाने में मां कब और क्या कर रही है? हमारे स्कूल से आने के पहले ही मां अपनी तकलीफ भूल कर खाने-पीने का इंतजाम कर लेती है। अगर बड़ी बीमारी न हो तो शायद ही किसी बच्चे ने अपनी मां को कभी उदास देखा हो। उसकी वजह से ही घर के मर्द निश्चिंत होकर काम पर निकलते हैं। उन्हें लगता है कि लौटने पर घर पर सब कुछ ठीक ठाक मिलेगा। वे अपने घर लौटेंगे। यह घर मां ही बनाती है। मैं स्वयं महसूस करती हूं कि अब मैं मां को ज्यादा समझ पा रही हूं। पलट कर देखती हूं तो पाती हूं कि मेरे हर निर्णय में मां और पापा का समर्थन मिला। मुझे ऐसा लगता है कि मेरी मां का समय औरतों को मिल रही स्वतंत्रता और सुविधा के हिसाब से बहुत सही नहीं थी। आज की हम जैसी लड़कियां खुद ही बड़े फैसले लेती हैं। उन्हें ऐसी आजादी मिली होती तो हमारा समाज आज कहीं और आगे होता।’
    इस साल दीपिका पादुकोण की तीन फिल्में आ जाएंगी। तीनों फिल्मों में उनकी अलग भूमिकाएं हैं। फिलहाल दपिका सफल हैं। वह अपनी सफलता का श्रेय निर्देशकों को देती हैं। कैरियर के बारे में उनकी राय है, ‘अपने को एन्ज्वॉय करना बहुत जरूरी है। सभी कहते हैं हिंदी फिल्मों में सक्सेस का कोई फॉर्मूला नहीं होता। यह बात बिल्कुल सच है। मैं सही कारणों से कोई भी फिल्म चुनती हूं। कभी किरदार पसंद आता है। कभी निर्देशक पसंद आते हैं। कभी पूरा सेटअप मन लायक होता है। मैं अपनी चुनावों के प्रति ईमानदार रहती हूं। अभी तक कोई फिल्म पैसों के लिए नहीं साइन की है। फिल्मों में यह ईमानदारी पर्द पर भी दिख जाती है। फिल्में पारदर्शी माध्यम हैं। हम दर्शकों को धोखा नहीं दे सकते। सिनेमा मुख्य रूप से भावों की अभिव्यक्ति है। हर किरदार को निभाते समय हम अपने व्यक्तित्व का कुछ हिस्सा छोड़ जाते हैं। कई बार निभाए किरदारों से भी कुछ ले आते हैं। यह छोड़ना और लेना अनुभव व अभिनय के स्तर पर होता है। इन वजहों से भी जरूरी होता है कि हम अपना काम ईमानदारी और दिल से करें।’
   

Friday, May 8, 2015

फिल्‍म समीक्षा : पीकू

-अजय ब्रह्मात्‍म्‍ाज 
**** चार स्‍टार 
कल शाम ही जूही और शूजीत की सिनेमाई जुगलबंदी देख कर लौटा हूं। अभिभूत हूं। मुझे अपने पिता याद आ रहे हैं। उनकी आदतें और उनसे होने वाली परेशानियां याद आ रही हैं। उत्तर भारत में हमारी पीढ़ी के लोग अपने पिताओं के करीब नहीं रहे। बेटियों ने भी पिताओं को अधिक इमोशनल तवज्जो नहीं दी। रिटायरमेंट के बाद हर मध्यीवर्गीय परिवार में पिताओं की स्थिति नाजुक हो जाती है। आर्थिक सुरक्षा रहने पर भी सेहत से संबंधित रोज की जरूरतें भी एक जिम्मेदारी होती है। अधिकांश बेटे-बेटी नौकरी और निजी परिवार की वजह से माता-पिता से कुढ़ते हैं। कई बार अलग शहरों मे रहने के कारण चाह कर भी वे माता-पिता की देखभाल नहीं कर पाते। 'पीकू' एक सामान्य बंगाली परिवार के बाप-बेटी की कहानी है। उनके रिश्ते को जूही ने इतनी बारीकी से पर्दे पर उतारा है कि सहसा लगता है कि अरे मेरे पिता भी तो ऐसे ही करते थे। ऊपर से कब्जियत और शौच का ताना-बाना। हिंदी फिल्मों के परिप्रेक्ष्य में ऐसी कहानी पर्दे पर लाने की क्रिएटिव हिम्मत जूही चतुर्वेदी और शूजीत सरकार ने दिखाई है। 'विकी डोनर' के बाद एक बार फिर दोनों ने साबित किया है कि लेखक और निर्देशक की परस्पर समझदारी अनोखे और आकर्षक परिणाम ला सकती है। 'पीकू' हमारे समय का पारिवारिक इतिहास है। 
         दिल्ली के चित्तरंजन पार्क की पीकू एक स्वतंत्र और आधुनिक लड़की है। वह करिअर, परिवार, जिम्मेंदारी(फैमिली और प्रोफेशनल दोनों) और निजी जिंदगी के बीच संतुलन बिठाने की कोशिश में रहती है। पिता से उसकी रोज बक-झक होती है, लेकिन वह कभी पिता का निरादर नहीं करती। पिता की वजह से उसे कई बार झेंपना भी पड़ता है। यहां तक कि पिता उसकी जिंदगी के भेद भी उन अपरिचितों के बीच खोल देते हैं, जो पीकू के संभावित पति हो सकते हैं। पीकू अपनी सोच और धारणाओं में स्पष्ट है। अगर किसी लड़के ने सत्यजित राय की फिल्में नहीं देखी हैं और वोट नहीं डालता तो वह उसके लायक नहीं है। पीकू के पिता भास्कोर कब्जियत के मरीज है। वे रोगभ्रमी(हाइपोकॉन्ड्रियक) हैं। पूरी फिल्मर में सभी किरदारों के बीच कब्जियत और शौच की ही बातें चलती रहती हैं, लेकिन उन बातों में शहर, समाज और चरित्रों के साथ हमारे समय का सच भी उद्घाटित होता रहता है। एक किरदार राणा चौधरी भी हैं, जो संयोग से इस परिवार के करीब आते हैं। उनकी मौजूदगी से इस बंगाली परिवार की मामूली समस्या को नया आयाम और जीवन मिलता है।         
                     जूही चतुर्वेदी की लेखनी और शूजीत सरकार की निर्देशकीय कल्पना ने बाप-बेटी की इस मामूली कहानी को दर्शनीय बना दिया है। पर्दे पर अमूमन ऐसे दृश्य नहीं रचे जाते। फिल्मों में तो शौच और भोजन चरित्रों की रोजमर्रा जिंदगी में आते ही नहीं हैं। जूही और शूजीत की जोड़ी ने वर्जित विषय को रोचक तरीके से पेश किया है। उन्होंने 'विकी डोनर' में भी यह करतब दिखाया था। 'पीकू' सहज और सरल फिल्मी है। शूजीत सरकार बहुत खूबसूरती से सभी चरित्रों को दृश्यों में मनमानी करने देते हैं। हर दृश्य में चरित्रों के बीच अद्भुत सामंजस्य दिखता है। नाटकीयता हावी नहीं होती। घर के अंदर के दृश्योंं में स्वाभाविकता है। ऐसा नहीं लगता कि इस घर की दीवारे प्लाई की बनी हैं। हिंदी फिल्मों में घर इतने भव्य और डिजाइनदार होते हैं कि नकली होने के साथ सेट का एहसास देते हैं। फिल्म के आर्ट डायरेक्ट और कॉस्ट्यूम डिजायनर ने कहानी के अनुरूप परिवेश और वेशभूषा पर ध्यान दिया है। हां, फिल्म का संगीत थीम के साथ संगत नहीं बिठा पाया है। गीतों के बोल में भास्कोर, पीकू और राणा की मनोदशा नहीं उभर सकी है। 
         शूजीत सरकार को हिंदी फिल्मों में सक्रिय उच्च कोटि के तीन कलाकार मिले हैं। अमिताभ बच्चन को हम ने इस रूप में कभी नहीं देखा है। वे 'लवेबल आल्ड मैन' के रूप में जुचते हैं। भास्कोर के किरदार को उन्होंने आत्मसात कर लिया है। यों उनकी बंगाली मिश्रित हिंदी कुछ संवादों में पटरी से उतर जाती है, लेकिन वे हाव-भाव और बॉडी लैंग्वेज से खटकने नहीं देते। उन्होंने भास्कोर के मिजाज के ओर-छोर को सही तरीके से पकड़ा है। दीपिका पादुकोण अपनी पीढ़ी की समर्थ अभिनेत्री हो चुकी हैं। पीकू के लिए आवश्यक सादगी और ऊर्जा लेकर वह आई हैं। इरफान की सहज मौजूदगी चमत्कार करती है। वे हर दृश्य को रोशन कर देते हैं। उनकी संक्षिप्त मुस्कराहट अनेक बार चल रहे दृश्य का अर्थ और अभिप्रेत बदल देती है। बुघन की लगभग खामोश भूमिका में बालेंदु सिंह बालु ध्यान खींचते हैं। शेष भूमिकाओं में भी कलाकार कुद न कुछ जोड़ते हैं। अवधिः 125 मिनट (

Thursday, April 23, 2015

दीपिका और प्रियंका का मुकाबला नृत्य


-अजय ब्रह्मात्मज
याद है, संजय लीला भंसाली की ‘देवदास’ में ‘डोला रे डोला’ गीत विशेष आकर्षण बन गया था। इस गाने में पारो और चंद्रमुखी दोनों ने अपने पांवों में बांध के घुंघरू और पहन के पायल मनोहारी नृत्य किया था। ‘देवदास’ में ऐश्वर्या राय और माधुरी दीक्षित के युगल नृत्य को बिरजू महाराज ने संजोया था। संजय लीला भंसाली की फिल्मों की भव्यता की एक विशेषता सम्मोहक और शास्त्रीय नृत्य भी होती है। अपनी फिल्मों में उन्होंने सभी अभिनेत्रियों को नृत्य में पारंगता दिखाने के मौके दिए हैं। पिछली फिल्म ‘गोलियों की रासलीला ़ ़ ऱामलीला’ में दीपिका पादुकोण को ‘ढोल बाजे’ गाने में अपना हुनर दिखाने का अवसर मिला तो सिर्फ एक गाने ‘राम जाने’ में आई प्रियंका चोपड़ा भी पीछे नहीं रहीं। अब ‘बाजीराव मस्तानी’ दीपिका पादुकोण और प्रियंका चोपड़ा का युगल नृत्य दिखेगा। इसे रेमो फर्नांडिस निर्देशित कर रहे हैं।
    ‘बाजीराव मस्तानी’ में दीपिका पादुकोण मस्तानी की भूमिका निभा रही हैं। प्रियंका चोपड़ा बाजीराव की पत्नी काशीबाई की भूमिका में हैं। इन दिनों दोनों इस फिल्म के युगल नृत्य की शूटिंग कर रही हैं। दीपिका और प्रियंका ने पिछले दिनों रोजाना छह-छह घंटे इस नृत्य के अभ्यास किए। प्रियंका ने तो ट्विट भी किया था कि वह रिहर्सल से निढाल हो जाती थीं। संजय लीला भंसाली के लिए विख्यात है कि वे अपनी फिल्मों के दृश्यों और नृत्यों में बारीकियों पर बहुत ध्यान देते हैं। सब कुछ परफेक्ट और वैसा ही होना चाहिए,जैसा उन्होंने सोच रखा है। वे कलाकारों को कोई छूट और मोहलत नहीं देते। भले ही अनगिनत रीटेक लेने पड़ें। उनकी सभी अभिनेत्रियों के पास इस परफेक्शन की जिद के अनेक किस्से हैं। नृत्य में पारंगत दोनों अभिनेत्रियां दीपिका और प्रियंका इस बार अपने प्रिय निर्देशक की क्रिएटिव डिमांड को पूरी करने की कोशिश में लगी हैं। जानकार बताते हैं कि कंक्रीट फर्श पर निरंतर अभ्यास से उनके पांव में छाले पड़ जाते हैं।
    ‘बाजीराव मस्तानी’ 18वीं सदी के पूर्वार्द्ध में महाराष्ट्र के छत्रपति शाहू राजे के पेशवा यानी प्रधानमंत्री थे। कुशल योद्धा बाजीराव अपनी जिंदगी में हर युद्ध में विजयी रहे। काशीबाई उनकी पहली पत्नी थीं। बाद में मस्तानी उनकी जिंदगी में आईं। इस फिल्म में बाजीराव के साथ काशीबाई और मस्तानी भी अहम चरित्र हैं। संजय लीला भंसाली ने दोनों के युगल नृत्य की कल्पना की है। उस समय के मुताबिक यह नृत्य लावणी और शास्त्रीय नृत्य का मेल होगा। रेमो डिसूजा इसे संजय लीला भंसाली की दूसरी फिल्मों के यादगार नृत्यों की तरह भव्य और रम्य बनाना चाहते हैं। अपनी इस चुनौती के लिए उन्होंने सरोज खान का आदर्श सामने रखा है। मुंबई में इस हफ्ते सोमवार से इस गीत-नृत्य की शूटिंग आरंभ हुई,जो 12 दिनों तक चलेगी।
    दीपिका पादुकोण और प्रियंका चोपड़ा दोनों ही जी-जान से संजय लील भंसाली की पेश की चुनौती और कसौटी पर खरी उतरने की कोशिश कर रही हैं। देखना रोचक होगा कि इस बाद पायल और घुंघरू की संगत की खनक कितनी असरदार होती है?

Tuesday, October 28, 2014

खुद के प्रति सहज हो गई हूं-दीपिका पादुकोण



-अजय ब्रह्मात्मज
    शाह रुख खान के साथ दीपिका पादुकोण की तीसरी फिल्म है ‘हैप्पी न्यू ईयर’। सभी जानते हैं कि उनकी पहली फिल्म ‘ओम शांति ओम’ शाह रुख खान के साथ ही थी। दूसरी फिल्म ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ के समय तक दीपिका पादुकोध की स्वतं। पहचान बन चुकी थी। ‘हैप्पी न्यू ईयर’ में उनकी लोकप्रियता और बढ़ गई है। अगर शाह रुख के समकक्ष मानने में आपत्ति हो तो भी इतना तो कहा ही जा सकता है कि वह कम भी नहीं हैं।
    बहरहाल,तीनों फिल्मों की बात चली तो दीपिका ने कहा,‘पिछली दो फिल्मों में ज्यादा गैप नहीं है,इसलिए कमोबेश समान अनुभव रहा। ‘ओम शांति ओम’ के समय मैं एकदम नई थी। उस फिल्म को मैंने उतना एंज्वॉय नहीं किया था,जितना मैं आज करती हूं। पहली फिल्म के समय घबराहट थी। पहली बार शाह रुख और फराह के साथ काम कर रही थी। उसके पहले कभी फिल्म सेट पर नहीं गई थी। हर चीज मेरे लिए नई थी। ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ और ‘हैप्पी न्यू ईयर’ के बाद मैं शाह रुख के साथ ज्यादा कंफर्टेबल हूं। अब मैं उन्हें को-स्टार नहीं मानती। वे मेरे अच्छे दोस्त हैं। मैं जानती हूं कि कभी उनकी जरूरत पड़ी तो वे मेरे साथ रहेंगे। ऐसी दोस्ती हो तो फिल्में आसान हो जाती हैं। केमिस्ट्री और कंफर्ट बढ़ जाता है। इस बार फराह भी थीं। मुझे ‘ओम शांति ओम’ की याद आ रही थी। उस समय फराह ने मुझे खूब डांटा और सिखाया। इस बार उन्होंने कहा कि मैं अच्छी एक्ट्रेस हो गई हूं। सब कुछ अपने आप कर लेती है। फराह मानती हैं कि मैंने सीखा है।’
    दीपिका के अभिनय और प्रेजेंस में निखार की बात करें तो उसकी शुरुआत ‘दम मारो दम’ से होती है। इस फिल्म के आयटम गीत ‘ऊंचे से ऊंचा बंदा’ में दीपिका पहली बार प्रज्वलित हुईं। अभिनय की उनकी लौ को सभी ने महसूस किया। इस फिल्म के बाद उनका करिअर रोशन हुआ। अब वह चमक रहा है। दीपिका ने सहमति जाहिर की,‘ मैं आप की राय से सहमत हूं। उस गीत में जो झलक थी, ‘कॉकटेल’ में वह निखर गया। वैरोनिका के कैरेक्टर को सही ढंग और संदर्भ में निभा सकी। कई सारे फैक्टर एक साथ काम किए। मुझे भी लगता है कि वहां से मेरे अंदर कंफीडेंस आया। उसके पहले परफारमेंस करते हुए कई बातें दिमाग में चलती रहती थीं। अपने बारे में शंकाएं कम हो जाएं और अपनी अपीयरेंस को लेकर आप कंफीडेंट हों तो वह पर्दे पर दिखता है।’ दीपिका अपने कद को लेकर बहुत परेशान रहती थीं। अब उनकी झिझक खत्म हो गई है। वह कद ही विशेषता बन कर अभिनेत्री के रूप में उनका कद बढ़ा रहा है। दीपिका ने आगे जोड़ा,‘बिल्कुल सही आब्जर्वेशन है आप का। मैं तो कहूंगी कि जो फिल्में नहीं चलीं,उनसे मुझे सीखने का मौका मिला। अपनी कमियां नजर आईं। अपनी असफलता से मुझे लाभ ही हुआ। करिअर के बारे में सही फैसले लेने की समझ आई। मैं फिल्मी परिवार से नहीं हूं। फिल्में करते-करते ही मैं खुद के प्रति सहज हो गई हूं। अभी दुविधा नहीं रहती। हो या ना कह देती हूं। रिस्क लेने के लिए भी तैयार हूं।’
    हिंदी फिल्मों की अभिनेत्रियों की इमेज और रोल में काफी बदलाव आए हैं। दीपिका ने अपने अनुभवों से बताया,‘पहले की अभिनेत्रियों को एस्पीरेशनल रोल मिलते थे। दर्शकों में महिलाएं उनकी तरह होना चाहती थीं। अभी की अभिनेत्रियों की भूमिकाओं में दृष्टिकोण बदल गया है। कुछ फिल्मों में उनका शरीर ही दिखाया जाता है। बाकी  सामान्य तौर पर हमारे किरदारों में दर्शक खुद को देख सकते हैं। ‘कॉकटेल’ और ‘ये जवानी है दीवानी’ उदाहरण हैं। ‘ ़ ़ ऱामलीला’ और ‘हैप्पी न्यू ईयर’ के किरदार लार्जर दैन लाइफ होते हैं।’ दीपिका इस धारणा से सहमत नहीं होती कि हिंदी फिल्मों में हीरोइनों को सेक्स सिंबल के तौर पर ही पेश किया जाता है। उन्होंने स्पष्ट कहा,‘यह डायरेक्टर पर डिपेंड करता है। मेनस्ट्रीम फिल्मों में भी अब रियल किरदार दिखने लगे हैं।’ ‘हैप्पी न्यू ईयर’ में बार डांसर मोहिनी का किरदार निभा रही हैं दीपिका पादुकोण। अपने किरदार के बारे में उन्होंने बताया,‘मोहिनी अपने डांस को कला मानती है। फिल्म में अभिषेक मेरा परिचय बाकी किरदारों से करवाते हैं। मैं उन्हें डांस सिखाती हूं। वल्र्ड चैंपियनशिप के लिए तैयार करती हूं।’ इस किरदार के लिए दीपिका ने मराठी लहजे पर मेहनत की। पिछली चार-पांच फिल्मों से उनके संवादों में लहजे की भिन्नता दिख रही है। दीपिका को अपनी फिल्मों के सारे किरदारों के नाम तक याद हैं। उन्होंने इसका राज खोला,‘ये सभी किरदार अलग-अलग हैं,इसीलिए याद हैं। अगर एक जैसे रोल करने लगूंगी तो शायद नाम और किरदार याद न रहें।’

Friday, September 12, 2014

फिल्‍म समीक्षा -फाइंडिंग फैनी

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
 सबसे पहले यह हिंदी की मौलिक फिल्म नहीं है। होमी अदजानिया निर्देशित फाइंडिंग फैनी मूल रूप से इंग्लिश फिल्म है। हालांकि यह हॉलीवुड की इंग्लिश फिल्म से अलग है, क्योंकि इसमें गोवा है। गोवा के किरदारों को निभाते दीपिका पादुकोण और अर्जुन कपूर हैं। इन्हें हम पसंद करने लगे हैं। यह इंग्लिश मिजाज की भारतीय फिल्म है, जिसे अतिरिक्त कलेक्शन की उम्मीद में हिंदी में डब कर रिलीज कर दिया गया है। इस गलतफहमी में फिल्म देखने न चले जाएं यह हिंदी की एक और फिल्म हैं। हां, अगर आप इंग्लिश मिजाज की फिल्में पसंद करते हैं तो जरूर इसे इंग्लिश में देखें। भाषा और मुहावरों का वहां सटीक उपयोग हुआ है। हिंदी में डब करने में मजा खो गया है और प्रभाव भी। कई दृश्यों में तो होंठ कुछ और ढंग से हिल रहे हैं और सुनाई कुछ और पड़ रहा है। यह एक साथ इंग्लिश और हिंदी में बनी फिल्म नहीं है। इन दिनों हॉलीवुड की फिल्में भी डब होकर हिंदी में रिलीज होती हैं, लेकिन उनमें होंठ और शब्दों को मिलाने की कोशिश रहती है। फाइंडिंग फैनी में लापरवाही झलकती है।
गोवा के एक गांव पाकोलिम में फाइंडिंग फैनी की किरदार रहते हैं। विधवा सास-बहू साथ में रहती हैं। फर्दी पोस्टमास्टर हैं और पेड्रो पेंटर है। इनके बीच सैवियो है, जो सालों बाद गांव लौटा है। उनके एकांतिक जीवन मे कोई हलचल नहीं है। अचानक एक सुबह फर्दी को अपना पुराना प्रेम पत्र मिलता है, जो 46 साल पहले उसने अपनी प्रेमिका फैनी को लिखा था। उसे पता चलता है कि फैनी उसके प्यार को जान ही नहीं सकी। एंजी उसकी उदासी खत्म करने के लिए सैवियो की मदद लेती है। तय होता है कि वे पांचों फैनी की तलाश में जाएंगे। इस यात्रा में हम गोवा देखते हैं और उन किरदारों के अतीत में भी प्रवेश करते हैं। सभी की जिंदगी में खालीपन है। पता चलता है कि ऐन वक्त पर दिल की बात नहीं कहने से सभी प्रेमविहीन जिंदगी जी रहे हैं। फिल्म के आखिर में सभी को अपनी फैनी यानी मोहब्बत मिल जाती है।
होमी अदजानिया ने गोवा के पृष्ठभूमि के इन किरदारों की निजी विसंगति में हास्य पैदा किया है। उनकी नोंक-झोंक और छींटाकशी में विनोद है। होमी इन किरदारों के माहौल और मूड को अच्छी तरह से चित्रित करते हैं। उन्हें उम्दा कलाकारों से भरपूर सहयोग मिला है। पंकज कपूर और नसीरुद्दीन शाह ने वैसे इस से बेहतर परफारमेंस से हमें चकित किया है। डिंपल भी अपनी छोटी भूमिकाओं में प्रभावित करती रही हैं। फाइंडिंग फैनी वास्तव में दीपिका पादुकोण और अर्जुन कपूर के लिए उल्लेखनीय हैं। दोनों ने मिले मौके के हिसाब से मेहनत की और अपनी अदाकारी से संतुष्ट किया है।
हिंदी फिल्मों के आम दर्शक फाइंडिंग फैनी का अपेक्षित आनंद नहीं उठा सकेंगे। फिल्म की भावभूमि उनके लिए नई और अपरिचित है।
अवधि: 105 मिनट
**1/2

Saturday, May 24, 2014

फिल्‍म समीक्षा : कोचडयान


तकनीक और टैलेंट का उपयोग
-अजय ब्रह्मात्मज


    चेन्नई, हैदराबाद और मुंबई ़ ़ ़ फिल्म निर्माण के हर केंद्र में मसाला एंटरटेनमेंट पर जोर है। अगर आप के पास पापुलर स्टार हैं तो किसी प्रकार के प्रयोग की जरूरत ही नहीं महसूस होती। रजनीकांत की बेटी सौंदर्या आर अश्विन ने ‘कोचडयान’ में इस सुरक्षा कवच को तोड़ दिया है। उन्होंने परफारमेंस कैप्चरिंग तकनीक में सुपरस्टार रजनीकांत को लेकर ‘कोचडयान’ का निर्देशन किया है। यहां रजनीकांत अपने अंदाज और स्टाइल में हैं,लेकिन एनिमेटेड रूप में। धैर्य, मेहनत और सोच से बनाई गई यह फिल्म भारतीय फिल्मों के इतिहास में एक नई पहल है। पहली कोशिश की हिम्मत की तारीफ होनी ही चाहिए। सौंदर्या ने ‘कोचडयान’ में तकनीक और टैलेंट का सही उपयोग किया है।
    सौंदर्या आर अश्विन ने स्पष्ट किया था कि यह एक काल्पनिक कहानी है। कोचडयान और उनके बेटों राणा और धर्मा को लेकर गुंथी हुई कहानी में राष्ट्रप्रेम और प्रजाहित पर जोर दिया गया है। परिवेश के मुताबिक दो राष्ट्रों कलिंगपुर और कोट्टायपट्टनम के द्वेष और कलह के बीच राणा के योद्धा व्यक्तित्व,राजनीति और राष्ट्रप्रेम को भव्य तरीके से चित्रित किया गया है। राजकुमारी वदना से प्रेम की कहानी साथ चलती है।
    फिल्म मुख्य रूप से तकनीक पर आधारित है। कलाकारों की मेहनत पर्दे पर नहीं दिखती, क्योंकि तकनीक के माध्यम से उन्हें एनिमेटेड किरदारों में बदल दिया गया है। संभव है कुछ दर्शक जेम्स कैमरून की फिल्म ‘अवतार’ की तुलना में ‘कोचडयान’ को निम्न और कमजोर पाएं, लेकिन कमियों के बावजूद इस फिल्म का महत्व कम नहीं होता। भारतीय फिल्मों में यह पहली कोशिश है। रजनीकांत, दीपिका पादुकोण, जैकी श्रॉफ और अन्य कलाकारों के सहयोग से सौंदर्या का सपना साकार हुआ है। फिल्म के आरंभ में अमिताभ बच्चन की उक्ति ‘कोचडयान के पहले और बाद का सिनेमा’ अतिशयोक्ति लग सकती है, लेकिन इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि रजनीकांत जैसे लोकप्रिय स्टार के साथ सौंदर्या ने उल्लेखनीय प्रयोग किया है। ऐसे प्रयोग के लिए लोकप्रिय स्टार का होना जरूरी था।
    फिल्म के रंग को लेकर एक सवाल हैं? क्या इसे रंगीन और चमकदार रखने में कोई तकनीकी दिक्कत थी। फिल्म का सलेटी और गाढ़ा रंग कुछ दृश्यों के बाद आंखों को भारी लगने लगता है। इस फिल्म का पूर्ण आनंद ‘3 डी’ में ही लिया जा सकता है। रजनीकांत के प्रशंसकों के लिए उनके मैनरिज्म, चाल-ढाल और डांस का ‘कोचडयान’ में उपयोग किया गया है। फिल्म के विषय और परिवेश के मुताबिक तलवार उछल कर हाथ में आ जाती है। हां,नृत्यों के एनीमेशन में पूरी लचक नहीं आ सकी है, लेकिन युद्ध के व्यापक दृ़श्यों में रोमांच बढ़ता है। ‘कोचडयान’ में गानों की संख्या ज्यादा लगती है। हर भाव के गीत एक के बाद एक आने से ड्रामा कम होता है।
    ‘कोचडयान’ सौदर्या आर अश्विन के क्रिएटिव साहस का सफल परिणाम है। इस फिल्म को देखना अलग किस्म के नए सिनेमाई अनुभव से गुजरना है।
अवधि - 120 मिनट
*** 1/2 साढ़े तीन स्टार


Sunday, January 5, 2014

निडर हो गई हूं-दीपिका पादुकोण


जन्मदिन विशेेष
(5 जनवरी 1986 को पैदा हुई दीपिका पादुकोण ने हिंदी फिल्मों में कामयाबी का नया कीर्तिमान स्थापित किया है। ऐसी कामयाबी के बाद अभिनेत्रियों की चाल और सोच टेढ़ी हो जाती है। दीपिका में भी परिवत्र्तन आया है। अब वह अधिक संयत,समझदार और सचेत हो गई हैं। वह देश के पॉपुलर अभिनेताओं के समकक्ष दिख रही हैं।)
-अजय ब्रह्मात्मज
    हाल ही में  दीपिका पादुकोण ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के अपने परिचितों, दोस्तों और शुभचिंतकों को एक पंचतारा होटल में आमंत्रित किया। वह अपनी कामयाबी को सभी के साथ सेलिब्रेट कर रही थी। इस अवसर पर फिल्म इंडस्ट्री के महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों ने उपस्थिति दर्ज की। निस्संदेह दीपिका हीरोइनों की कतार में सबसे आगे आ खड़ी हुई हैं। छह साल पहले फराह खान की फिल्म ‘ओम शांति ओम’ से धमाकेदार शुरुआत करने के बाद कुछ फिल्मों में दीपिका की चमक फीकी हुई। आदतन आलोचकों और पत्रकारों ने उन्हें ‘वन फिल्म वंडर’ की संज्ञा दे दी। कहा जाने लगा कि फिर से उन्हें किसी शाहरुख खान की जरूरत पड़ेगी। निराशा के इसी दौर में दीपिका का प्रेम टूटा। असफलता के इस अकेलेपन को उन्होंने किसी खिलाड़ी की तरह अभ्यास के तौर पर लिया। वह लौटीं। उन्होंने जबरदस्त तरीके से कामयाबी और मौजूदगी दोनों दर्ज की। ‘कॉकटेल’ के बाद वह लगातार प्रशंसा और सफलता हासिल कर रही हैं। दूसरी समकालीन अभिनेत्रियों से दीपिका इस लिहाज से अलग और उल्लेखनीय हैं कि वह निकट अतीत की तमाम फिल्मों में निर्णायक किरदारों में रही हैं।
    जोखिम की जिद 
निरंतर कामयाबी से मिली चौतरफा तारीफ के बावजूद दीपिका पादुकोण संयत , संतुलित और समझदार हैं। स्पष्ट शब्दों में वह कहती हैं, ‘सफलता से निडर होने की शक्ति मिलती है। सफलता के बाद दो चीजें होती है। सफलता बनाए रखने के लिए या तो आप सोच-समझ कर फिल्में चुनते हैं या फिर आप रिस्क लेने के लिए तैयार रहते हैं। मैंने दूसरा विकल्प चुना है। मुझे लगता है कि मैं नई कोशिशें कर सकती हूं। फिल्में सफल हों या असफल, लोग तारीफ करें या निंदा ... मुझे कम से कम संतोष रहेगा कि मैंने कुछ नया किया।’ अपनी सफलता को स्वीकार करती हुई वह आगे कहती हैं, ‘2013 मेरे लिए बहुत ही अच्छा साल था। आगे के बारे में ज्यादा सोचा नहीं है। मैं हमेशा अपने काम से खुश रहना चाहती हूं। कभी कैलकुलेट कर कोई फिल्म साइन नहीं की।’
    आते रहेंगे उतार-चढ़ाव 
100 करोड़ क्लब में दीपिका पादुकोण समेत अनेक अभिनेत्रियां हैं। इन फिल्मों को दोबारा देखें तो सहज एहसास होगा कि अपनी फिल्मों में दीपिका की बड़ी साझेदारी है। दूसरी अभिनेत्रियों की तरह वे केवल शो पीस नहीं हैं। यह महज संयोग नहीं हो सकता कि हर फिल्म में हम दीपिका के किरदार को महसूस करने के साथ उन्हें याद रखते हैं। इस मजबूत मौजूदगी के बारे में पूछने पर वह बताती हैं, ‘फिल्में साइन करते समय मैं इतना कुछ नहीं सोच पाती। मुझे लगता है कि कुछ फिल्में बन जाती हैं। हां, इधर फिल्में करते समय सही फील होने लगता है। पिछली तीन फिल्मों में ‘ये जवानी है दीवानी’, ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ और ‘ .. ऱाम-लीला’ में यह एहसास गहरा रहा। अपने प्रशंसकों को स्पष्ट कर देना चाहती हूं कि भविष्य में मेरी कुछ फिल्में असफल हो सकती हैं और कुछ में मेरा काम आप को नापसंद हो सकता है। वास्तव में यह एक जर्नी है। उतार-चढ़ाव तो चलते रहेंगे। देखें तो असफल फिल्मों में भी मेरे रोल और किरदार दमदार रहे हैं। अभी मुझे लगने लगा है कि अपने किरदार के साथ पूरी फिल्म पर ध्यान देना चाहिए। फिल्म अच्छी लगनी चाहिए’ दीपिका अपनी असफल फिल्मों में ‘ब्रेक के बाद’, ‘कार्तिक कॉलिंग कार्तिक’ और ‘लफंगे परिंदे’ की याद दिलाती हुई कहती हैं कि ये फिल्में भी मुझे प्रिय हैं।
   हर फिल्‍म की दिल से 
 ‘ये जवानी है दीवानी’ और ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ में दीपिका पादुकोण रणबीर कपूर और शाहरुख खान के समकक्ष रहीं। ‘राम-लीला’ में लीला (दीपिका पादुकोण) राम (रणवीर सिंह) पर हावी दिखती हैं। दीपिका बता नहीं पातीं कि दर्शकों ने लीला को क्यों इतना पसंद किया। वह पलट कर पूछती हैं, ‘आप लोग बताएं। मैंने तो सफल-असफल दोनों फिल्मों में समान लगन से काम किया। समझ में नहीं आता कि तब क्या बुरा था और अब क्या अच्छा है। लोगों की तारीफें जरूर अच्छी लगती है। ‘.. ऱाम-लीला’ में पहली बार मुझे लगा कि मैंने अभिनय नहीं किया है। यह संजय सर का अप्रोच रहा। समय के साथ दर्शकों को लीला की बोल्डनेस और पहलकदमी अच्छी लगी। दर्शकों की स्वीकार्यता बढ़ गई है। कुछ लोगों ने मुझे कहा कि दस साल पहले ऐसे किरदार को अश्लील कहा जाता। लीला कहीं न कहीं आज की औरत को प्रतिबिंबित करती है। समाज में महिलाएं आगे बढ़ कर फैसले ले रही हैं। दर्शकों से लीला का कनेक्ट बना,इसीलिए उन्हें मेरा परफारमेंस में पसंद आया।’
   बदल रही है यथास्थिति 
 दीपिका स्वीकार करती हैं कि अपने काम की वजह से उनका एक्सपोजर और एक्सपीरियेंस हमउम्र लड़कियों से अधिक और विविध है। अपने अनुभव के आधार पर वह समाज में लड़कियों की बढ़ी हिस्सेदारी के बारे में कहती हैं, ‘विकास के साथ लड़कियों की भूमिकाएं बदल रही हैं। अब वे नेतृत्व कर रही हैं। लड़कियों में जागरुकता आई है। शिक्षा से उनका आत्मविश्वास बढ़ा है। सभी जानते हैं कि हमारा देश पुरुष संचालित रहा है। स्त्रियों के आगे आने से समाज में यथास्थिति बदल रही है। पुरुषों की तरफ से आक्रामक प्रतिक्रियाएं हो रही है। पुरुषों का एक तबका इस बदलाव से सहज नहीं है। मुझे तो लगता है कि अभी स्त्रियों को अपनी क्षमता का एहसास होने लगा है। हम सभी क्षेत्रों में देख रहे हैं कि मौका या चुनौती मिलने पर वे सार्थक प्रदर्शन कर रही हैं। अगर महिलाएं शक्तिशाली हो रही हैं तो प्रतिक्रिया में बलात्कार तो नहीं ही होना चाहिए। यह शर्म की बात है। जाहिर होता है कि हमारा समाज अभी पूरी तरह से शिक्षित नहीं है।’
 
परिवार का प्रेरक संबल 
  पॉपुलर अभिनेताओं की तरह दीपिका पादुकोण भी फिल्मों में सैलरी और शेयर पर काम करने लगी हैं। हिंदी फिल्मों के बड़े स्टार इन दिनों अपनी फिल्मों के मुनाफे में शेयरिंग लेने लगे हैं। उन्हीं के तर्ज पर दीपिका ने भी ‘फाइंडिंग फैनी’ इन शर्तों के साथ साइन किया है। इस उपलब्धि के बारे में पूछने पर वह सकुचा जाती हैं। कहती हैं, ‘यह तो आप निर्माताओं से पूछें। सभी फिल्मों में ऐसा नहीं होगा। अगर कोई फिल्म मुझे पसंद हो और उसके निर्माता शेयरिंग के लिए तैयार हों तो क्यों नहीं।’ दीपिका अपनी सफलता का श्रेय अपनी टीम के साथ पैरेंट्स को देती हैं। वह बताती हैं, ‘पिछले दो सालों में मैं परिवार के साथ रहने का समय नहीं निकाल सकी। फिर भी मम्मी-पापा ने कभी कोई शिकायत नहीं की। हमेशा की तरह प्रोत्साहित किया। उनका यह संबल मुझे प्रेरित करता है। और हां, सबसे बड़ा श्रेय दर्शकों को मिलना चाहिए।’
    फिल्म इंडस्ट्री के बाहर से आई दीपिका पादुकोण आज कामयाबी के शीर्ष पर हैं। इस फील्ड में आने वाली लड़कियों को वह सलाह देती हैं, ‘यह इंडस्ट्री बहुत अच्छी जगह है, लेकिन सबकुछ इतना आसान नहीं है। कड़ी मेहनत, समर्पण और त्याग के साथ काम करना पड़ता है।’
   



Sunday, December 22, 2013

इंपैक्‍ट 2013 : अमिताभ बच्‍चन,दीपिका पादुकोण,कपिल शर्मा

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
अमिताभ बच्चन
    ब्लॉग, ट्विटर, फेसबुक ... सोशल मीडिया के लोकप्रिय माध्यमों का बखूबी इस्तेमाल करते हैं अमिताभ बच्चन। हर माध्यम की प्रति उनकी संलग्नता उल्लेखनीय है। इन माध्यमों के जरिए प्रशंसक और पाठक लोकप्रियता के शीर्ष पर एकाकी बैठे अमिताभ बच्चन के विचारों, अनुभवों और दैनंदिन जीवन की गतिविधियों से परिचित होते हैं। अगर आप उनका ब्लॉग फॉलो करें तो पाएंगे कि रात के बारह बजे के बाद ही यह अपडेट होता है। कभी दो बजे तो कभी चार बजे,जब भारत सो रहा होता है तो दिन भर की सक्रियताओं का सार बताते हुए वे दार्शनिक अभिभावक, मित्र और परिवार के सदस्य के रूप में नजर आते हैं। बिना नागा 2070 दिनों से वे रोजाना लिख रहे हैं। वर्चुअल दुनिया के पाठकों के लिए उन्होंने नया शब्द गढ़ा है -एक्सटेंटेड फैमिली (विस्तारित परिवार)। इस परिवार को अभी वे खुद के निकट पाते हैं। यह परिवार भी उन्हें अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा मानता है। ट्विटर  (74 लाख से अधिक),फेसबुक (76 लाख से अधिक) और ब्लॉग (76 लाख से अधिक) मिलाकर उनके विस्तारित परिवार की संख्या 2 करोड़ से ज्यादा है। अनुशासन, समर्पण और नियमितता से उन्होंने अटूट रिश्ता बना लिया है। किसी समय मीडिया और अमिताभ बच्चन की परस्पर उदासीनता से वे अकेले और दूर हो गए थे। अब सोशल मीडिया ने उन्हें सभी के करीब ला दिया है। वे मुक्त, स्वतंत्र और मुखर हो गए हैं।
दीपिका पादुकोण
    वह पहले खुलीं, फिर खिलीं और अब खिलखिलाने लगी हैं। एक अंतराल के बाद हिंदी फिल्मों की किसी अभिनेत्री को ऐसी सफलता मिली है। लगातार पांच फिल्मों की कामयाबी और सभी फिल्मों में मजबूत मौजूदगी से दीपिका पादुकोण ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के नायकों का सम्मान, दर्जा और मुकाम हासिल कर लिया है। अभिनय में उनकी आंखें अनकहा भी कह जाती हैं। उनकी प्रतिभा नए परवाज भर रही हैं। दीपिका पादुकोण 21वीं सदी की प्रतिनिधि कामकाजी लडक़ी है। परिवार के समर्थन से मुंबई में अपनी जगह बना चुकी दीपिका पादुकोण दृढ़, निडर और प्रयोगशील हैं। पांच साल पहले तक फिल्म इंडस्ट्री में रिश्तों को रहस्य बना कर रखने का रिवाज था। दीपिका खुलेआम रणबीर से जुड़ी और जब अलग हुईं तो भी चटकने के बावजूद उनकेरिश्ते में गांठ नहीं पड़ी। द्वंद्वहीन दीपिका ने रणबीर कपूर के साथ 2013 की एक कामयाब फिल्म ‘ये जवानी है दीवानी’ दी। खेल भावना से ओत-प्रोत दीपिका ने करिअर की आरंभिक हार से सीखा और फिल्मी दुनिया के सभी गुर सीखे। आज वह समकालीन अभिनेत्रियों में सबसे आगे नजर आ रही हैं - काम, कामयाबी और कारोबार - हर लिहाज से। कैमरे के सामने उनकी झिझक मिट गई है। निर्देशक उनकी खूबियों का उभार रहे हैं। अपनी हर फिल्म में वह अभिनय के नए आयाम उद्घाटित कर रही हैं। उज्जला और प्रकाश की बेटी दीपिका की दमक और धमक बढ़ती ही जा रही है।

कपिल शर्मा
    टीवी पर लतीफेबाजी, हंसी-मजाक और हाजिरजवाब से कपिल शर्मा ने अद्वितीय ख्याति हासिल कर ली है। अभी शायद ही कोई फिल्म या स्टार हो, जो उनके शो पर आने को आतुर नहीं हो। कपिल शर्मा ने अपने शो को फैमिली ड्रामा और थिएटर के तत्वों से जोडक़र नया स्वरूप दिया है। विदूषक के रूप में सिद्धू की मौजूदगी दर्शकों को हंसने के लिए विवश करती है। कपिल स्वयं भावहीन चेहरे के साथ नुकीली टिप्पणियां करते हैं, वह कई बार गुदगुदाने के साथ घायल भी करता है। पारिवारिक पृष्ठभूमि से बचपन में मिले अनुभवों को ही उन्होंने आरंभ में अपना विषय बनाया। पंजाब के सिपाही लाला रोशन लला और शमशेर सिंह की बातों का देसीपन दर्शकों को भा गया था। पिछले पांच सालों में कपिल शर्मा ने कामेडी नाम से जुड़े सभी शो के पुरस्कार जीते और सफलता एवं प्रसिद्धि के शीर्ष पर बैठ गए। कपिल शर्मा की खासियत सटीक और धाराप्रवाह बोलना। किसी भी स्थिति को मजाकिया बना देने की सलाहियत उन्हें दर्शकों का प्रिय बनाती है। अच्छी बात है कि वे अपने लतीफों, जवाबों, टिप्पणियों और छींटाकशी में अमूमन अश्लील, फूहड़ और भोंडे नहीं होते हैं। हां, कई बार सामने खड़ा व्यक्ति असावधान हो तो तिलमिला या डगमगा सकता है।


Friday, November 15, 2013

फिल्‍म समीक्षा : गाेलियों की रासलीला राम-लीला

भावावेग की प्रेमलीला 
-अजय ब्रह्मात्‍मज

ऐन रिलीज के समय फिल्म का नाम इतना लंबा हो गया। धन्य हैं 'राम-लीला' टाइटल पर आपत्ति करने वाले ... बहरहाल, ' ...राम-लीला' विलियम शेक्सपियर के मशहूर नाटक 'रोमियो-जूलियट' पर आधारित फिल्म है, इसीलिए इस प्रेम कहानी के शीर्षक में पहले पुरुष का नाम आया है। एशियाई प्रेम कहानियों में स्त्रियों का नाम पहले आता है, 'हीर-रांझा', 'लैला-मजनू', 'शीरीं-फरिहाद', 'सोहिनी-महिवाल' आदि। संजय लीला भंसाली ने 'रोमियो-जूलियट' की कहानी को गुजरात के रंजार में स्थापित किया है, जहां सेनाड़ा और रजाड़ी परिवारों के बीच पुश्तैनी दुश्मनी चल रही है। इन परिवारों के राम और लीला के बीच प्रेम हो जाता है। 'रोमियो-जूलियट' नाटक और उस पर आधारित फिल्मों की तरह ' ...राम-लीला' भी ट्रैजिक रोमांस है।
संजय लीला भंसाली सघन आवेग के निर्देशक हैं। उनकी फिल्मों में यह सघनता हर क्षेत्र में दिखाई देती है। खास कर किरदारों को गढ़ने और उनके भावात्मक संवेग की रचना में वे उत्तम हैं। उनके सामान्य दृश्य भी गहरे और परतदार होते हैं। रंग, दृश्य, ध्वनि और भाषा से वे विषय के अनुरूप वातावरण तैयार करते हैं। संजय हिंदी फिल्मों के लोकप्रिय पारंपरिक रूपकों का सुंदर इस्तेमाल करते हैं। उन्हें अपनी सौंदर्य दृष्टि से निखारते हैं। उनमें नवीनता लाते हैं। ' ...राम-लीला' घोर पारंपरिक फिल्म है। कहानी, चरित्र, कथानक और घटनाओं में किसी अन्य ट्रैजिक रोमांस के शिल्प का ही पालन किया गया है, लेकिन प्रस्तुति की भव्यता और कलाकारों की अभिनय प्रवीणता से उनमें नए आयाम जुड़ जाते हैं। संजय लीला भंसाली की ' ़ ़ ़ राम-लीला' रंगीन, भव्य, चमकदार और रोचक है।
फिल्म के प्रमुख चरित्र राम और लीला के रूप में रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण की केमिस्ट्री ओर एनर्जी पहले फ्रेम से ही जाहिर हो जाती है। संजय ने दोनों चरित्रों की एंट्री पर खास ध्यान दिया है। हिंदी फिल्मों के पारंपरिक दर्शकों के लिए नायक-नायिका की एंट्री खास महत्व रखती है। एंट्री की बाजी जीतने के बाद संजय ने उनके प्रेम, भिड़ंत और विद्वेष की मोहक दृश्य-संरचना की है। रणवीर सिंह ने राम को भावनात्मक उफान की पूरी उर्जा के साथ पर्दे पर पेश किया है। बस कहीं-कहीं संवाद अदायगी में उनकी आवाज मार खाती है। दीपिका पादुकोण तो सौंदर्य की बेफिक्र अभिव्यक्ति हो गई हैं। उनका गहन आत्मविश्वास नृत्य, दृश्य, संवाद अदायगी और भावाभिव्यक्ति में दिखाई देता है। संजय ने इस बार उनकी आंखों के साथ चपलता और खामोशी का सार्थक उपयोग किया है। दीपिका की प्रतिभा के ये नए आयाम ' ... राम-लीला' में प्रकट हुए हैं। लापरवाह लहराती, भागती और फिर पलटकर देखती दीपिका की मादकता 'हम दिल दे चुक सनम' की ऐश्वर्या राय की याद दिला देती है।
सहयोगी कलाकारों में सुप्रिया पाठक का चरित्र एकआयामी है, लेकिन उन्होंने अपनी प्रतिभा से उसे मोहक रंग दिया है। उनकी निष्ठुरता कंपा देती है। गुलशन देवैया और रिचा चढ्डा इस फिल्म की उपलब्धि हैं। राम और लीला की तरह उनके चरित्र को खुले तरीके से विकसित होने का मौका नहीं मिला है, फिर भी वे मिले दृश्यों में प्रभावशाली हैं। उन्होंने अपने चरित्रों को ढंग से समझा और पेश किया है। अभिमन्यु सिंह समेत दूसरे कलाकार अपनी भूमिकाओं से फिल्म में कुछ जोड़ते हैं और नाटकीयता को गाढ़ा करते हैं।
' ...राम-लीला' भाषाविदों के लिए अध्ययन योग्य है। रंजार की स्थानीय भाषा में अंग्रेजी का घुलना और भाषा प्रवाह में निरंतर सुनाई पड़ना सचमुच शोध और विश्लेषण का विषय है। ' ...राम-लीला' के प्रमुख किरदार स्थानीय रंग-ढंग में होने के बावजूद इंग्लिश व‌र्ड्स का धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं। और हां, ' ...राम-लीला' के कथानक में मोबाइल फोन की भी बड़ी भूमिका है। घटनाओं के जोड़, मोड़ और तोड़ में उसका उपयोग हुआ।
फिल्म के नृत्य-गीत सम्मोहक हैं। नृत्य निर्देशकों ने उन्हें भव्य तरीके से संजोया और पेश किया है। रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण की मेहनत और संगत रंग लाई है। गीतों के बोल और संगीत की मधुरता के योग से गीत-नृत्य फिल्म का आकर्षण बढ़ाते हैं। फिल्म का छायांकन नयनाभिरामी है।
संजय लीला भंसाली की फिल्मों में अभी तक बमुशिकल थप्पड़ की आवाज तक आती थी। इस बार तो गोलियों की रासलीला है। भरपूर एक्शन के बावजूद रोमांस गुम नहीं होता। किरदारों और कलकारों का समुचित भावावेग '...राम-लीला' को मनोरंजक प्रेमलीला में बदल देता है।
***1/2 साढ़े तीन स्‍टार 
अवधि - 157 मिनट

Monday, October 21, 2013

खिली और खिलखिलाती दीपिका पादुकोण


-अजय ब्रह्मात्मज
    दीपिका पादुकोण ने पीछे पलट कर नहीं देखा है, लेकिन हमें दिख रहा है कि वह समकालीन अभिनेत्रियों में आगे निकल चुकी हैं। दौड़ में शामिल धावक को जीत का एहसास लक्ष्य छूने के बाद होता है, लेकिन होड़ में शामिल अभिनेत्रियों का लक्ष्य आगे खिसकता जाता है। दीपिका पादुकोण के साथ यही हो रहा है। ‘चेन्नई एक्सप्रेस’  की अद्वितीय कामयाबी ने उन्हें गहरा आत्मविश्वास दिया है। वह खिल गई हैं और बातचीत में उनकी खुशी खिलखिलाहट बन कर फूट पड़ती है। अक्तूबर की उमस भरी गर्मी में दोपहर की मुलाकात चिड़चिड़ी हो जाती है। फिर भी तय समय पर दीपिका से मिलना है, क्योंकि शूटिंग, डबिंग और प्रोमोशन के बीच उन्हें यही वक्त मिला है। वह जुहू स्थित सनी सुपर साउंड में ‘राम-लीला’ की डबिंग कर रही हैं।
    थोड़े इंतजार के बाद मुलाकात होती है। उनकी परिचित मुस्कान और गर्मजोशी से संबोधित ‘हेलो’ में स्वागत और आदर है। बात शुरू होती है ‘राम-लीला’ से ़ ़ ़ वह इस फिल्म के प्रोमो और ट्रेलर में बहुत खूबसूरत दिख रही हैं। बताने पर वह फिर से मुस्कराती हैं और पलकें झुका कर तारीफ स्वीकार करती हैं। करिअर और फिल्म के लिहाज से ‘राम-लीला’ के बारे में बताती हैं, ‘हर हीरोइन का यह ख्वाब है कि वह संजय सर के साथ काम करे। ‘खामोशी’ से लेकर ‘गुजारिश’ तक में उनकी हीरोइनों के परफारमेंस की तारीफ हुई है। मनीषा कोईराला, ऐश्वर्या राय, माधुरी दीक्षित, रानी मुखर्जी, सोनम कपूर सभी उनकी फिल्मों में खास लगी हैं। उनकी फिल्मों की हीरोइनों सालों तक दर्शकों की स्मृति में रहती हैं। ‘राम-लीला’ के ऑफर से मैं खुश, उत्साहित और घबराई हुई थी। मैं जानती थी कि वे किसी हड़बड़ी में फिल्म नहीं बनाते। समय सीमा तो रहती होगी, लेकिन उसका दबाव शूटिंग में नहीं रहता। वे एक्टर को पूरी आजादी देते हैं। एक्टर को प्रोत्साहित करते है और सपोर्ट करते हैं। उनकी बारीकियों में प्यार होता है। इस फिल्म का अनुभव किसी सुनहरे सपने के साकार होने की तरह मुझे याद रहेगा।’
    संजय लीला भंसाली की यह खासियत है। उनकी फिल्मों में हीरोइनें अपनी प्रचलित इमेज से अलग दिखती हैं। वे हर हीरोइन की प्रतिभा का कोई छिपा और अनछुआ आयाम खोज निकालते हैं। सहज जिज्ञासा होती है कि दीपिका में उन्होंने क्या खास खोज निकाला? फिल्म रिलीज होने पर हम सभी यह देख लेंगे, फिर भी खुद अभिनेत्री से उसे जान लेना अलग मायने रखता है। दीपिका इस राय से सहमति जाहिर करती हैं, ‘आप मुझे ‘राम-लीला’ में बिल्कुल नए रंग-ढंग में देखेंगे। शुटिंग के दरम्यान वे हमेशा कहते रहे कि मैं बहुत नाजुक दिखती हूं, लेकिन इमोशनली बहुत स्ट्रांग हूं। मेरी इन खूबियों को उन्होंने किरदार में ढाला है। और भी कई पहलू हैं, जो आप पर्दे पर देखें तो अच्छा। मैं खुद अंजान थी अपनी पर्सनैलिटी के उन पहलुओं से ़ ़ ़ लीला मेरी ही तरह नाजुक और मजबूत है।’
    ‘राम-लीला’ की नायिका लीला है। संजय लीला भंसाली के नाम के मध्य में आया यह नाम उनकी मां का है। संजय ने अपने इंटरव्यू में कहा था कि अपनी मां का नाम पेश कर रहा हूं तो पूरी सावधानी बरतूंगा। दीपिका क्या सोचती हैं लीला के बारे में? ‘लीला अपनी शर्तों पर जीती है। निर्भीक स्वभाव की लीला केवल अपनी मां की सुनती है। दूसरों को कान तक नहीं देती। प्यार के मामले में कंजर्वेटिव है,’ संक्षेप सा जवाब देती हैं दीपिका। फिल्म के प्रोमो में दीपिका गुजरात के कास्ट््यूम में दिख रही है। वर्तमान समय की वर्किंग वीमैन की तरह दीपिका भी आम जिंदगी में जींस-टीशर्ट या शर्ट पहनना पसंद करती हैं। ऐसे में कॉस्ट्यूम की वजह से क्या फर्क आता है किरदार में? वह स्पष्ट करती हैं, ‘साडिय़ां तो मैंने ‘ओम शांति ओम’ और ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ में भी पहनी हैं। इस फिल्म का कास्ट्यूम गुजराती है। कपड़े और गहने पहनने से एक्टर का आधा काम आसान हो जाता है। फिल्म का लुक टेस्ट और रिहर्सल भी हम कास्ट््यूम में करते हैं। फील से फीलिंग्स आती है। कास्ट्यूम धारण करते ही स्टायल अलग हो जाती है। ’
    बतौर एक्टर संजय की संगत के बारे में दीपिका दो टूक शब्दों में बताती हैं, ‘संजय सर के साथ कुछ भी आसान नहीं रहता। फिल्म देखते समय सब कुछ सहज लग सकता है। मैंने महसूस किया कि स्क्रिप्ट को वे निराले अंदाज से सीन में ट्रांसफार्म कर देते हैं। उन्हें हर सीन में ‘मैजिक’ चाहिए। वे डायरेक्ट करते समय सीन समझाने के बाद यही कहते हैं कि बस, अब मैजिक पैदा कर दो। जादू हो जाए। बतौर एक्टर हमें सोचना पड़ता है। कई बार तो 15-20 टेक के बाद भी वे कुछ नया करिश्मा चाहते हैं। उनकी शूटिंग में दिल-दिमाग और शरीर निचुड़ जाता है। मुश्किल होने के बावजूद यह मेरे लिए लर्निंग एक्सपीरिएंस भी रहा। ‘राम-लीला’ ने मेरा रेंज बढ़ा दिया है। मुझे पता चला है कि मैं और क्या-क्या कर सकती हूं?’
    हीरोइनों की होड़ में आगे निकल रही दीपिका पीछे पलट कर देखना उतना जरूरी नहीं मानतीं। खिलाड़ी मानसिकता की दीपिका अपना दर्शन समझाती हैं, ‘जिंदगी में पीछे मुड़ कर कभी-कभी ही देखना चाहिए। हमेशा फोकस आगे की तरफ हो। सफलता को बहुत सीरियसली नहीं लेना चाहिए। आगे क्या करना है? मैं खिलाड़ी रह चुकी हूं। जानती हूं कि जीत और हार को लेकर रुक नहीं सकते। तारीफ अच्छी लगती है। मैंने बुरा वक्त भी देखा है, इसलिए अच्छे वक्त को खूब एंज्वॉय कर रही हूं। डेढ़ दो साल से सब कुछ अच्छा चल रहा है। नया करने की चाहत बढ़ गई है। कुछ करते समय पेट में तितलियां उडऩी चाहिए। मुझे आराम का काम नहीं चाहिए। काम घबराहट दे तो मजा है।’ अभी कुछ ऐसा आ रहा है क्या? दीपिका अपनी आगामी फिल्मों के बारे में बताती हैं, ‘फराह खान की ‘हैप्पी न्यू ईअर’ कर रही हूं। उसमें मुंबई की बार डांसर हूं। इम्तियाज अली की फिल्म करूंगी रणबीर के साथ ़ ़ ़’
    गौर करेंगे कि दीपिका के चेहरे की चमक-दमक बढ़ गई है। वह इनका राज खोलती हैं, ‘मैं खुश हूं अपने काम को लेकर ़ ़ ़ लोगों के प्यार और तारीफ से यह खुशी बढ़ जाती है। उम्मीद करती हूं कि यह जारी रहे।’ ग्रामीण पारंपरिक सोच में कहते हैं लड़कियां शादी के बाद खूबसूरत हो जाती हैं? क्या हम कह सकते हैं कि दीपिका की फिल्मों से शादी हो गई है? ‘अरे वाह, इतने खूबसूरत तरीके से आपने बात कही। शादी ही हुई है। फिलहाल मेरी जिंदगी फिल्मों तक सीमित है। मेरा कोई पर्सनल लाइफ नहीं है। परिवार के सदस्यों से भी भेंट नहीं हो पाती। मैं रीडिंग, डबिंग, शूटिंग, मीटिंग, इंटरव्यू यहां तक कि फिल्म के प्रोमोशन में भी खुश रहती हूं।’ दीपिका को सबसे ज्यादा खुशी किस रूप में मिलती है -- स्टार, एक्टर या दीपिका? सवाल खत्म होते ही दीपिका बताती हैं, ‘बेटी के रूप में सबसे ज्यादा खुशी होती है। मम्मी-पापा की लाडली दीपिका। जब घर जाती हूं तो वे जो प्यार-दुलार मिलता है। यहां तो मैं अकेली रहती हूं। परिवार में रहने पर मैं निश्चिंत रहती हूं। वह मेरी सबसे बड़ी खुशी है। उसके बाद काम ़ ़ ़’
    काम में एक फर्क बना हुआ है। आज भी हीरोइनों से अधिक तवज्जो और बाकी सबकुछ हीरो को मिलता है। क्या दीपिका कभी इस फर्क से परेशानी नहीं महसूस करतीं? हिंदी फिल्मों का इतिहास भी हीरो के नामों के साथ लिखा जाता है। दीपिका कुछ सोचती हैं, ‘मैंने क्या इस तरह से नहीं सोचा। अपने पारिश्रमिक की किसी और से तुलना नहीं की। पता भी नहीं करती। मैं अपने काम और पारिश्रमिक से खुश हूं। जिंदगी में हम सभी कुछ ज्यादा चाहते हैं। मैं भी चाहती हूं। अच्छी फिल्में, अच्छे डायरेक्टर, बड़ा काम, बड़ा नाम ़ ़ ़़ इन इच्छाओं के साथ अपने वर्तमान से खुश हूं। मैं चाहूंगी कि अंत में लोग मुझे एक बेहतर इंसान के तौर पर याद करें। कोई यह न कहे कि हीरोइन तो अच्छी थी,लेकिन ़ ़ ़। मेरी याद में लेकिन न लगे।’
    ‘राम-लीला’ को दीपिका के प्रशंसक क्यों देखें? आखिर इसमें क्या कुछ मिलेगा उन्हें? दीपिका हंसते हुए कहती हैं, ‘मैं पचास विशेषताएं बता सकती हूं। फिलहाल यही कहूंगी, ‘यह संजय लीला भंसाली की फिल्म है, जिन्होंने ‘हम दिल दे चुके सनम’, ‘देवदास’ जैसी ऐतिहासिक फिल्में बनायी थीं। यह कलरफुल, वायबेंट और फील गुड फिल्म है। मेरे और रणवीर के परफारमेंस के लिए देखें। हमारी केमिस्ट्री अच्छी है। यह आप को खुद की प्रेमकहानी लगेगी।’

Friday, August 9, 2013

फिल्‍म समीक्षा : चेन्‍नई एक्‍सप्रेस

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
रोहित शेट्टी और शाहरुख खान की फिल्म 'चेन्नई एक्सप्रेस' इस जोनर की अन्य फिल्मों की तरह ही समीक्षा से परे हैं। ऐसी फिल्मों में बताने, समझने और समझाने लायक गुत्थियां नहीं रहतीं। फिल्म सरल होती हैं और देश के आम दर्शकों से सीधा संबंध बनाती हैं। फिल्म अध्येताओं ने अभी ऐसी फिल्मों की लोकप्रियता के कारणों को नहीं खोजा है। 'चेन्नई एक्सप्रेस' आमिर खान की 'गजनी' और रोहित शेट्टी की 'गोलमाल' से हुई धाराओं का संगम है। यह एंटरटेनिंग है।
रोहित शेट्टी की फिल्मों में उदास रंग नहीं होते। लाल, गुलाबी, पीला, हरा अपने चटकीले और चटखीले शेड्स में रहते हैं। कलाकारों के कपड़ों से लेकर पृष्ठभूमि की प्रापर्टी तक में यह कंटीन्यूटी बनी रहती है। सारे झकास रंग होते हैं और बिंदास प्रसंग रहते हैं। 'चेन्नई एक्सप्रेस' में पहली बार शाहरुख खान और रोहित शेट्टी साथ आए हैं। शुक्र है कि रोहित शेट्टी ने उन्हें अजय देवगन जैसे सीक्वेंस नहीं दिए हैं। अजय और रोहित की जोड़ी अपनी मसखरी में भी सौम्य बनी रहती है। यहां कोई बंधन नहीं है। हास्य दृश्यों में शाहरुख खान अपनी सीमाओं की वजह चेहरे को विकृत करते हैं। शाहरुख खान यहां अपने अंदाज और आदतों के साथ मौजूद हैं। अपनी ही फिल्मों के रेफरेंस से वे किरदार में कामेडी के रंग डालते हैं।
दर्शकों की सुखद और सुंदर अनुभूति के लिए दीपिका पादुकोण हैं। दक्षिण भारतीय शैली की साड़ियों और श्रृंगार में वह खूबसूरत लगती हैं। दीपिका का आत्मविश्वास बढ़ा है। उनकी लंबाई अब आड़े नहीं आती। कई दृश्यों में तो वह इसका फायदा उठाती हैं। 'चेन्नई एक्सप्रेस' में दीपिका पादुकोण ने संवादों को खास लहजा दिया है। फिल्म में वह कई बार टूटता है। अगर लहजे की एकरूपता बनी रहती तो प्रभाव बढ़ जाता।
रोहित शेट्टी की फिल्मों का धूम-धड़ाका, हंसी-मजाक, एसएमएस लतीफे और अतार्किक सीक्वेंस हैं। मजेदार तथ्य है कि उनकी फिल्मों में इसकी कभी या अधिकता खलती नहीं है। दरअसल, उनकी फिल्में टाइम पास का एक मजेदार पैकेज होती हैं। रोहित शेट्टी ने अपने दर्शकों को पहचान लिया है और वे अपनी शैली को निखारने के साथ मजबूत करते जा रहे हैं। उनके इस्टाइल को समझने और परखने की जरूरत है।
'चेन्नई एक्सप्रेस' में चालीस प्रतिशत संवाद तमिल में हैं, कुछ दृश्य बगैर संवाद के चलते हैं। भावनात्मक और नाटकीय दृश्यों में कुछ संवादों को समझाया गया है। अपने प्रवाह में बाकी फिल्म समझ में आ जाती है। तमिल रहन-सहन, भाषा और लैंडस्केप भी 'चेन्नई एक्सप्रेस' में है। लेखक-निर्देशक ने सावधानी बरती है कि कहीं से भी आक्रमण या मजाक न हो। नॉर्थ-साउथ डिवाइड को यह फिल्म विचित्र तरीके से कम करती है। रोहित शेट्टी ने अप्रत्यक्ष तरीके से हिंदी दर्शकों को तमिल माहौल से जोड़ा है।
रोहित शेट्टी ने 'चेन्नई एक्सप्रेस' से यह भी साबित कर दिया है कि उनकी ऐसी फिल्मों में भाषा और संवाद की बड़ी भूमिका नहीं होती। एक्शन-रिएक्शन से भरपूर ड्रामा में बेसिक इमोशन रहते हैं, इसलिए बगैर कहे या बताए ही सब कुछ समझ में आता है। हालांकि फिल्म में शाहरुख ने दीपिका को मिस सबटाइटल नाम भी दिया है, लेकिन उनकी उपयोगिता खाने में नमक की तरह है।
'चेन्नई एक्सप्रेस' शाहरुख खान और दीपिका के पिता की शाब्दिक भिड़ंत महत्वपूर्ण है। यहां शाहरुख खान और दीपिका बेटियों के पक्ष में लंबी तकरीर करते हैं। इस प्रसंग में दीपिका के पिता एक शब्द भी नहीं बोलते। उन्होंने दीपिका की कलाई मुट्ठी में कस ली है। यह एक भाव ही उनके विचार को जाहिर कर देता है।
ईद के मौके पर आम दर्शकों के लिए यह शाहरुख खान और रोहित शेट्टी की ईदी है। 
अवधि- 143 मिनट 
*** तीन स्‍टार

Saturday, January 5, 2013

दीपिका पादुकोण से अजय ब्रह्मात्‍मज की बातचीत


-अजय ब्रह्मात्मज

- 2012 आप के लिए बहुत अच्‍छा रहा। 'काकटेल’ हिट रही। अभी किस मूड में हैं आप?
0 फिलहाल तो मैं ‘कॉकटेल’ का सक्सेस एंज्वाय कर रही हूं। प्रमोशन के समय हमने सबको कहा था कि मेरे लिए यह बहुत स्पेशल फिल्म है। मैं बहुत ही खुश हूं कि लोगों को फिल्म अच्छी लगी। मेरा परफारमेंस अच्छा लगा। मैंने ‘कॉकटेल’ में बहुत मेहनत की थी। उस रोल के लिए प्रेपरेशन करना पड़ा। बहुत रिहर्सल भी की मैंने। फिलहाल तीन फिल्मों पर फोकस कर रही हूं। शाहरूख खान के साथ ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ कर रही हूं।रणगीर कपूर के साथ  ‘ये जवानी है दीवानी’ लगभग पूरी हो गई है। संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘रामलीला’ की शटिंग आरंभ हो गई है।
- ‘रेस 2’ भी पूरी हो गई होगी?
0 ‘रेस’ पूरी हो गई है और अब डबिंग कर रही हूं उस फिल्म की। कल ही हमलोगों फिल्म का लोगो ऑन लाइन लांच किया। दीवाली के दिन प्रोमो लांच हुआ। 25 जनवरी को फिल्म रिलीज होगी। ‘रेस 2’ मेरी अगली रिलीज है। ‘कॉकटेल’ के बाद यह नेक्सट फिल्म होगी और पहली बार मैं एक्शन थ्रिलर फिल्म कर रही हूं। पहली बार मैं अब्बास-मस्तान जी के साथ काम कर रही हूं तो मैं बहुत ही एक्साइटेड हूं।
- ‘कॉकटेल’  देखते हुए बार-बार महसूस हो रहा था कि दीपिका में कांफिडेंस के साथ निखार आया है?
0 जी, थोड़ा सा कांफिडेंस लोगों को नजर आया ‘कॉकटेल’ में। मुझे भी महसूस हुआ,इसलिए शायद लोगों को मेरी परफारमेंस अच्छी लगी। मैंने हमेशा यही कहा है कि इस इंडस्ट्री को और फिल्म मेकिंग के प्रोसेस को समझने में मुझे काफी वक्त लगा,क्योंकि मैं इस इंडस्ट्री से नहीं हूं। न ही मेरे कोई रिलेटिव हैं। ऐसा भी नहीं कि मैं मुंबई से हूं। बहुत सारे एडजस्टमेंट करने पड़े। बहुत कुछ सीखना पड़ा। मैं आसानी से हार नहीं मानती। खिलाड़ी की बेटी हूं। मैं जो भी करती हूं, अच्छे से करना चाहती हूं। फिल्म इंडस्ट्री के तरीकों को थोड़ा समझ पाई हूं।
- और अब अच्छी तरह से एंज्वाय कर रहे हो ऐसा लग रहा है साफ।
0 कैमरे के सामने बिल्कुल एंज्वाय करती हूं। मैं ज्यादा सोचती नहीं हूं। मैं एंज्वाय करती हूं।
- ‘कॉकटेल’ के क्लाइमैक्स को लेकर मुझे कुछ दिक्कत थी।  वेरोनिका जैसी इडीपेंडेंट किरदार के कैरेक्टर को थोड़ा चेंज करना पड़ता है। गौतम के प्रेम को जीतने के लिए ऑर्थाेडोक्स लडक़ी की तरह रोल प्ले करना पड़ता है। मैं दीपिका पादुकोण ़ ़ ़आज की आजाद और कामकाजी लडक़ी से जानना चाहता हूं कि क्या किरदार के व्यक्तित्व में आया वह बदलाव सही था?
0 देखिए मैं पर्सनली विलीव करती हूं कि ़ ़ ़ पर्सनली मैं यह मानती हूं कि यू शूड नॉट चेंज फॉर एनी वडी, यू शूड बी योरसेल्फ ़ ़ ़किसी और के लिए खुद का नहीं बदलना चाहिए। हम जैसे हैं,वैसे ही रहें। अपनी पर्सनैलिटी में विश्वास करें। जब प्यार होना है तो वह हो ही जाएगा। मैं जरूर कहूंगी कि किसी को चेंज नहीं होना चाहिए। यह कहना बहुत ही आसान पर मैं जानती हूं कि बहुत सारे ऐसे लोग हैं,जो प्यार में आकर बदलते हैं। पर्सनैलिटी में थोड़ा चेंज आता है। फिर भी सैद्धांतिक रूप से यही कहूंगी कि लड़कियों को नहीं बदलना चाहिए।
- बिल्कुल ़ ़ ़इस विषय पर दूसरे मत भी हो सकते हैं। फिलहाल, ‘चेन्नई एक्सप्रेस’, ‘रामलीला’, ‘ये जवानी है दीवानी’ के बारे में क्या-क्या बता सकती हैं कुछ भी?
0 मैं सिर्फ यह कह सकती हूं कि ‘रामलीला’ और ‘ये जवानी है दीवानी’ दोनों  लव स्टोरी है। ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ रोमांटिक कामेडी है। तीनों फिल्म में मेरा कैरेक्टर बहुत ही अलग है। ‘रामलीला’ में मैं गुजराती कैरेक्टर प्ले कर रही हूं। ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ में तमिल लडक़ी का रोल प्ले कर रही हूं। ‘ये जवानी है दीवानी’ का जो कैरेक्टर है,वह बहुत ही मॉडर्न लडक़ी है। कैरेक्टर,लुक और कैरेक्टराइजेशन के हिसाब से तीनों कैरेक्टर बहुत ही अलग हैं। मेरे लिए बहुत ही   चैलेंजिंग है,क्योंकि मैं तीनों फिल्मों पर एक साथ काम कर रही हूं।
- फिल्मों में आ जाने के बाद आप किसी स्टेट या किसी एक इलाके के नहीं रह जाते, फिर भी मैं दीपिका से जाना चाहूंगा कि वह खुद को कहां की मानती हैं?
0 मैं लोगों के दिलों में रहना चाहती हूं। वही मेरा ठिकाना और पहचान है।
- यह तो बहुत अच्छा जवाब हुआ। मैं फिर से पूछता हूं कि दीपिका पादुकोण की सही पहचान क्या है?
0 मैं अपने आपको हिंदुस्तानी मानती हूं। लोग कहते हैं कि मैं मॉडर्न हूं। इस जमाने की लडक़ी हूं। मेंटली, इमोशनली, कल्चरली मैं बहुत ट्रेडिशनल हूं। मेरा एक बहुत ही सिंपल अपब्रिंगिंग रहा है। मैं खुद को इंडियन मानती हूं। मैं यह नहीं सोचती हूं कि मैं कहां से हूं, मेरा थॉट प्रोसेस क्या है? मैं मानती हूं कि मैं इंडियन हूं सब से पहले। भारतीय संस्कूति और परंपरा का मुझे गर्व है। मैं लोगों का प्यार चाहती हूं और उनके दिलों में रहना चाहती हूं। यही मैं चाहती हूं।
 जिस तरह से आप कैरियर पर ध्यान दे रही हैं और अच्छी फिल्में करती जा रही हैं़ ़  इसमें आपके उम्र के लड़कियों के लिए जो जरूरी चीजें मानी जाती हैं- प्रेम और शादी। इन दिनों करिअर वीमेन इन्हें निश्चित समय के लिए दरकिनार कर देती हैं। क्या ऐसा ही कुछ है दीपिका के साथ?
0 जी, बिल्कुल। फिलहाल तो मैं अपने काम पर फोकस कर रही हूं और अपनी फैमिली को बहुत मिस करती हूं। मेरा एक ही रीग्रेट कि मैं अपनी फैमिली के साथ ज्यादा टाइम शेयर नहीं कर सकती। पर आज मैं जहां हूं,वहां बहुत खुश हूं। जितना मुझे मिला है, जितना मुझे लोगों ने दिया है, उन से मैं बहुत खुश हूं। मैं मेहनत करती रहूंगी। प्यार-शादी  ़ ़ ़फिलहाल इनके बारे में मैं नहीं सोच रही हंू।
- फिल्मों के अलावा और क्या इंटरेस्ट हैं?
0 फिल्मों के अलावा मुझे स्पोर्टस में बहुत इंटरेस्ट है। मेरा एक चैरिटी        ऑर्गनाइजेशन है  ़ ़ ़ओलम्पिक का गोल क्वेस्ट। उस से बहुत सारे हमारे इंडियन स्पोर्टसमेन जुड़े हुए हैं ़ ़ ज़ैसे मेरे पिता जी है, लिएंडर पेश हैं, विश्वनाथन आनंद और गीत सेठी हैं। हम सब इस ऑर्गनाइजेशन के फाउंडर हैं और हम अपकमिंग टैलेंट को स्पोर्ट करते हैं अलग-अलग फील्ड से। चाहे बैडमिंटन हो, बॉक्सिंग, राइफल शूटिंग हो या कोई और गेम। हमने गगन नारंग, साइना नेहवाल और विजय कुमार को सपोर्ट किया। इन सभी एथलीट को हम जरूरत की सारी चीजें मुहैया कराते हैं। हम चाहते हैं कि वे ओलम्पिक में अच्छा प्रदर्शन कर लौटें। इस बार जब वे पुरस्कार लेकर आए तो लोगों के लिए बहुत ही प्राउड मूवमेंट रहा। उनकी जीत में हमारा थोड़ा कंट्रीब्यूशन रहा। अभी हम 2016 के ओलम्पिक के लिए काम कर रहे हैं।
- एक्टिंग के अलावा किसी और आर्ट फॉर्म को आपने सीखा है या सीखना चाहती हैं?
0 कह सकती हूं कि म्यूजिक में मेरा ज्यादा इंटरेस्ट है। जब भी अच्छा गाना सुनती हूं तो डाउनलोड करती हूं। दोस्तों के आय पॉड से गाने लेती हूं। मेरे पास बहुत सारे अलग-अलग किस्म के गाने हैं। इसके अलावा स्कूल के दिनों में ड्राइंग और पेंटिंग करती थी। अभी मुझे वक्त नहीं मिलता। एक इच्छा है कि मैं कोई भी इंस्ट्रूमेंट बजाना सीखूं। गिटार और पियानो मेरे ध्यान में हैं। जैसे ही थोड़ा वक्त मिलेगा मैं इसकी कोशिश करूंगी।
- इस साल आपको कौन सी फिल्में अच्छी लगीं?
0  मुझे अपनी फिल्म ‘कॉकटेल’ सबसे ज्यादा अच्छी लगी। इसके अलावा मैंने भरोसेमंद लोगों से ‘इंग्लिश विंग्लिश’ के बारे में सुन रखा है। अभी तक देख नहीं पाई हूं। मुझे अनुराग बसु की ‘बर्फी’ बहुत अच्छी लगी।
- ऐसा लग रहा है कि फिल्मों में हीरोइनों को अब ज्यादा महत्व दिया जा रहा है। वे सिर्फ शो पीस या सौंग-डांस के लिए ही नहीं ली जा रही हैं। आपकी ‘कॉकटेल’ भी एक उदाहरण है।
0 फिलहाल मैं इस विषय पर पूरे अधिकार के साथ कुछ नहीं कह सकती। अभी मैं जो भी स्क्रिप्ट चुन रही हूं उसमें अपने रोल पर ध्यान देती हूं। वह कैरेक्टर मुझे एक्साइट करे । सिर्फ गाना गाने या डांस करने के लिए मैं फिल्म नहीं कर सकती। मुझे लगता है कि फिल्म की कहानी में मेरे किरदार का कंट्रीब्यूशन होना चाहिए।
- आप ढेर सारे प्रोडक्ट एंडोर्स कर रही हैं। क्या उन्हें स्वीकार करने के पहले आप उनकी गुणवत्ता परखती हैं?
0 अभी मैं नौ प्रोडक्ट का एंडोर्समेंट कर रही हूं। मैं हर प्रोडक्ट और ब्रांड की जांच-पड़ताल करती हूं। ऐसा नहीं है कि जो ऑफर आ गया उसे एक्सेप्ट कर लिया। जरूरी है कि मैं उस ब्रांड के साथ रिलेट करूं।
- अपनी उम्र की लड़कियों के लिए क्या संदेश देंगी? वे कैसे आपकी तरह कामयाब हों?
0 जैसा कि एक सवाल के जवाब में मैंने कहा कि हमें नहीं बदलना चाहिए। अपनी पर्सनैलिटी पर गहरा विश्वास होना चाहिए। आप जो हैं, उस पर अडिग रहें। खुद पर यकीन करें। सिंपल ़ ़ ़









Friday, July 13, 2012

फिल्‍म समीक्षा : कॉकटेल

Review : cocktail 

दिखने में नयी,सोच में पुरानी 

-अजय ब्रह्मात्‍मज

होमी अदजानिया निर्देशित कॉकटेल की कहानी इम्तियाज अली ने लिखी है। इम्तियाज अली की लिखी और निर्देशित फिल्मों के नायक-नायिका संबंधों को लेकर बेहद कंफ्यूज रहते हैं। संबंधों को स्वीकारने और नकारने में ढुलमुल किरदारों का कंफ्यूजन ही उनकी कहानियों को इंटरेस्टिंग बनाता है। कॉकटेल के तीनों किरदार गौतम, वेरोनिका और मीरा अंत-अंत तक कंफ्यूज रहते हैं। इम्तियाज अली ने इस बार बैकड्रॉप में लंदन रखा है। थोड़ी देर के लिए हम केपटाउन भी जाते हैं। कहानी दिल्ली से शुरू होकर दिल्ली में खत्म होती है।
गौतम कपूर आशिक मिजाज लड़का है। उसे हर लड़की में हमबिस्तर होने की संभावना दिखती है। वह हथेली में दिल लेकर चलता है। लंदन उड़ान में ही हमें गौतम और मीरा के स्वभाव का पता चल जाता है। लंदन में रह रही वेरोनिका आधुनिक बिंदास लड़की है। सारे रिश्ते तोड़कर मौज-मस्ती में गुजर-बसर कर रही वेरोनिका के लिए आरंभ में हर संबंध की मियाद चंद दिनों के लिए होती है। एनआरआई शादी के फरेब में फंसी मीरा पति से मिलने लंदन पहुंचती है।
पहली ही मुलाकात में उसका स्वार्थी पति उसे दुत्कार देता है। बेघर और बेसहारा हो चुकी मीरा को वेरोनिका का सहारा मिलता है। लंदन में कितनी आसानी से सबकुछ हो जाता है। वेरोनिका और मीरा साथ रहने लगते हैं। अपनी भिन्नता की वजह से दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। वे अपनी जिंदगी से संतुष्ट हैं। इस बीच मीरा के कहने पर गौतम को सबक सिखाने के लिए वेरोनिका उसकी चाल ही उस पर आजमाती है। गौतम को वेरोनिका का अंदाज पसंद आता है। असमर्पित रिश्ते में यकीन रखने वाले दोनों मौज-मस्ती के लिए साथ रहने लगते हैं। मीरा उनके साथ एडजस्ट करती है। अरे हां, गौतम की मां और मामा भी हैं।
मां दिल्ली में रहती हैं और मामा लंदन में। मामा का ही दिलफेंक मिजाज भांजे को मिला है। मां बेटे की शादी के लिए परेशान हैं। न जाने कब हिंदी फिल्मों की माताएं बेटे-बेटियों की शादी की चिंता से मुक्त होंगी? वह बेटे को समझाने के लिए लंदन पहुंच जाती हैं। मां को खुश करने के लिए गौतम संभावित बहु के रूप में मीरा का परिचय करवाता है। कुछ दिनों के लिए भिड़ायी गयी यह तरकीब रिश्तों के नए मायने उजागर करती है। तीनों मुख्य किरदारों के स्वभाव और सोच में परिव‌र्त्तन आता है। लव और इमोशन का कंफ्यूजन आरंभ होता है, जो अंत तक जारी रहता है। थोड़ा खिंच भी जाता है।
सैफ ऐसे खिलंदड़े और दिलफेंक आशिक की भूमिका में जंचते हैं। उन्होंने दिल चाहता है से लेकर लव आज कल तक में निभाई भूमिकाओं में से थोड़ा-थोड़ा याद कर कॉकटेल के गौतम को भी निभा दिया है। कुछ दृश्यों में वे बहुत अच्छे हैं तो कुछ में दोहराव की वजह से बहुत बुरे भी लगे हैं। उन्हें लगता होगा कि वे परफॉर्म कर रहे हैं,जबकि वे बोर करने लगते हैं। दीपिका पादुकोण भी बिगड़ी हुई लड़की का किरदार निभाने के अनुभव बटोर चुकी हैं। यहां उनमें थोड़ा और निखार दिखाई देता है। खास कर छूट जाने, अकेले पड़ने और प्रेमरहित होने के एहसास, भाव और दृश्यों में वह प्रभावशाली लगी हैं। इस फिल्म में उन्हें चरित्र के मुताबिक आकर्षक कॉस्ट्यूम भी मिले हैं।
वेरोनिका को उन्होंने बहुत अच्छी तरह जीवंत किया है। सीधी-सादी मीरा के किरदार में पहली बार पर्दे पर आई डायना पेंटी में आत्मविश्वास है। वह अपने किरदार के साथ न्याय करती हैं। बोमन ईरानी और डिंपल कपाडि़या के किरदार घिसेपिटे हैं, इसलिए उनके अभिनय में नयापन भी नहीं है। रणदीप हुडा का चरित्र अविकसित रह गया है। कॉकटेल हिंदी फिल्मों की पीढि़यों पुरानी सोच को फिर से स्थापित करती है। दीपिका पादुकोण जैसी आधुनिक लड़की को कथित भारतीय नारी में तब्दील करने की कोशिश लेखक-निर्देशक के वैचारिक दायरे को जाहिर करती है। एक-दूसरे के लिए त्याग कर रही लड़कियों के व्यवहार को देख कर हंसी आती है। क्या ऐसा नहीं हो सकता था कि वेरोनिका और मीरा के बीच एक अंडरस्टैंडिंग बनती और दोनों लात मार कर गौतम को अपनी जिंदगी और घर से बाहर निकाल देतीं। यह फिल्म हर हाल में गौतम यानी नायक के फैसलों को उचित ठहराती चलती है। फिल्म के कुछ संवाद अंग्रेजी में हैं। हिंदीभाषी दर्शकों को दिक्कत हो सकती है।
अवधि - 146 मिनट
** 1/2 ढाई स्टार

Monday, May 21, 2012

चार तस्‍वीरें : दीपिका पादुकोण




दीपिका पादुकोण काकटेल फिल्‍म में लाल बिकनी पहने समुद्रतट पर लेटी हैं। क्‍या सिर्फ इन तस्‍वीरों की वजह से आप फिल्‍म देखेंगे ?

Sunday, November 27, 2011

फिल्‍म समीक्षा देसी ब्‍वॉयज

देसी ब्वॉयज: फीका एंटरटेनमेंट-अजय ब्रह्मात्‍मज

न्यूयार्क के फिल्म स्कूल से निर्देशन की पढ़ाई कर चुके डेविड धवन के बेटे रोहित धवन ने देसी ब्वॉयज की फिल्म के चारों मुख्य कलाकारों को स्क्रिप्ट के नाम पर क्या सुनाया होगा? और फिर स्क्रिप्ट सुनने-समझने के बाद हां करने के लिए मशहूर कलाकारों को इस स्क्रिप्ट में क्या उल्लेखनीय लगा होगा। पुरूषों का अंग प्रदर्शन, स्ट्रिपटीज, पोल डांस, लंदन, ट्रिनिटी कॉलेज, नायिकाओं के लिए डिजायन कपड़े, दो-तीन गाने और संजय दत्त का आयटम अपीयरेंस.. देसी ब्वॉयज में यह सब है। बस कहानी नहीं है,लेकिन इमोशनल पंच हैं। मां-बेटा, बाप-बेटी, दोस्त, टीचर-स्टूडेंट के अनोखे संबंधों के साथ जब जीरो दिया मेरे भारत ने सरीखा राष्ट्रप्रेम भी है। ऐसा लगता है कि रोहित धवन और उनके सहयोगी लेखक मिलाप झावेरी को पुरानी हिंदी फिल्मों के जो भी पॉपुलर (घिसे पिटे पढ़ें) सीन याद आते गए, उनकी चिप्पी लगती चली गई।

ऊपरी तौर पर यह दो दोस्तों निक और जेरी की कहानी है। मंदी की वजह से दोनों की बदहाली शुरू होती है। मजबूरी में वे पुरूष एस्कॉर्ट का काम स्वीकार करते हैं, लेकिन अपनी नैतिकता के दबाव में कुछ रूल बनाते हैं। निक की प्रेमिका राधिका को उनकी करतूतों का पता चलता है तो वह स्वाभाविक तौर पर नाराज होती है और नारी अस्मिता और दर्प से जुड़े कुछ सवाल भी पूछ बैठती है। दूसरी नायिका तान्या बारह सालों के बाद उस लड़के से मिलती है, जिस पर कॉलेज में उसका दिल आया था। तब वह मोटी थी और जेरी ने उस पर ध्यान नहीं दिया था। फिर से वह प्रेम जागता है और कैंपस-क्लास में हम दोनों केअनोखे प्रेम की बानगी देखते हैं। सचमुच रोहित धवन अपनी पहली फिल्म में फोकस नहीं कर पाए हैं कि उन्हें क्या और किस रूप में कहना है? अनेक पॉपुलर डायरेक्टर का प्रभाव दिखता है। सबके प्रभाव मे देसी ब्वॉयज कंफ्यूज फिल्म लगती है।

अक्षय कुमार और जॉन अब्राहम आकर्षक दिखते हैं। उनके बीच की केमिस्ट्री भी जमती है, लेकिन उनके पास किरदार और कहानी ही नहीं है। नाचते-गाते, घूंसा मारते,कसरती बदन दिखाते और एक्शन दृश्यों में वे अच्छे लगते हैं, लेकिन यह सब टुकड़ों-टुकड़ों में ही भाता है। ऐसी फिल्मों में नायिकाएं सिर्फ शोपीस होती हैं। इस काम को दीपिका पादुकोण और चित्रांगदा सिंह ने बखूबी निभाया है। चित्रांगदा सिंह पहली कमर्शियल फिल्म के जोश में हैं। संजय दत्त अपने आयटम अपीयरेंस और संवादों से कुछ दर्शकों को अवश्य लुभएंगे। फिल्म का टायटल गीत ही याद रह जाता है।

फिल्म के अंत में देसी ब्वॉयज के सीक्‍वल का संकेत दे दिया गया है।

रेटिंग- ** दो स्टार