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फिल्‍म समीक्षा : बाजीराव मस्‍तानी

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-अजय ब्रह्मात्‍मज कल्‍पना और साक्ष्‍य का भव्‍य संयोग
      यह कहानी उस समय की है,जब मराठा साम्राज्‍य का ध्‍वज छत्रपति साहूजी महाराज के हाथों में लहरा रहा था और जिनके पेशवा थे बाजीराव वल्हाड़। तलवार में बिजली सी हरकत और इरादों में हिमालय की अटलता,चितपावन कुल के ब्राह्मनों का तेज और आंखों में एक ही सपना... दिल्‍ली के तख्‍त पर लहराता हुआ मराठाओं का ध्‍वज। कुशल नेतृत्‍व,बेजोड़ राजनीति और अकल्‍पनीय युद्ध कौशल से दस सालों में बाजीराव ने आधे हिंदुस्‍तान पर अपना कब्‍जा जमा लिया। दक्षिण में निजाम से लेकर दिल्‍ली के मुगल दरबार तक उसकी बहादुरी के चर्चे होने लगे।        इस राजनीतिक पृष्‍ठभूमि में रची गई संजय लीला भंसाली की ऐतिहासिक प्रेमकहानी है ‘बाजीराव मस्‍तानी’। बहादुर बाजीराव और उतनी ही बहादुर मस्‍तानी की यह प्रेमकहानी छोटी सी है। अपराजेय मराठा योद्धा बाजीराव और  बुंदेलखंड की बहादुर राजकुमारी मस्‍तानी के बीच इश्‍क हो जाता है। बाजीराव अपनी कटार मस्‍तानी को भेंट करता है। बुंदेलखंड की परंपरा में कटार देने का मतलब शादी करना होता है। मस्‍तानी पुणे के लिए रवाना होती है ताकि बाजीराव के साथ रह सके। यहां…

फिल्‍म समीक्षा : तमाशा

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-अजय ब्रह्मात्‍मज प्रेम और जिंदगी की नई तकरीर इम्तियाज अली ने रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण जैसे दो समर्थ कलाकारों के सहारे प्रेम और अस्मिता के मूर्त-अमूर्त भाव को अभिव्‍यक्ति दी है। सीधी-सपाट कहानी और फिल्‍मों के इस दौर में उन्‍होंने जोखिम भरा काम किया है। उन्‍होंने दो पॉपुलर कलाकारों के जरिए एक अपारंपरिक पटकथा और असामान्‍य चरित्रों को पेश किया है। हिंदी फिल्‍मों का आम दर्शक ऐसी फिल्‍मों में असहज हो जाता है। फिल्‍म देखने के सालों के मनोरंजक अनुभव और रसास्‍वादन की एकरसता में जब भी फेरबदल होती है तो दर्शक विचलित होते हैं। जिंदगी रुटीन पर चलती रहे और रुटीन फिल्‍मों से रुटीन मनोरंजन मिलता रहे। आम दर्शक यही चाहते हैं। इम्तियाज अली इस बार अपनी लकीर बदल दी है। उन्‍होंने चेहरे पर नकाब चढ़ाए अदृश्‍य मंजिलों की ओर भागते नौजवानों को लंघी मार दी है। उन्‍हें यह सोचने पर विवश किया है कि क्‍यों हम सभी खुद पर गिरह लगा कर स्‍वयं को भूल बैठे हैं? वेद और तारा वर्तमान पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं। परिवार और समाज ने उन्‍हें एक राह दिखाई है। उस राह पर चलने में ही उनकी कामयाबी मानी जाती है1 जिंदगी का यह ढर्रा चाहता …

तलाश है खुद की ‘तमाशा’: इम्तियाज अली

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-अजय ब्रह्मात्मज
    प्रेम, भावना और संबंध के संवेदनशील फिल्मकार इम्तियाज अली इन दिनों ‘तमाशा’ पूरी करने में व्यस्त हैं। तकनीकी बारीकियां हासिल करने की सुविधाएं बढऩे से फिल्म के पोस्ट प्रोडक्शन में भी निर्देशक की तल्लीनता बढ़ जाती है। रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण की ‘तमाशा’ में इम्तियाज अली ने प्रमुख किरदारों को बिल्कुल नए अंदाज में पेश किया है। 21 वीं सदी के दूसरे दशक की इस प्रेम कहानी में स्वयं की खोज के साथ समाज भी है।
-क्या है ‘तमाशा’?
‘बाचीजा-ए-अतफाल है दुनिया मेरे आगे. होता है शब-ओ-रोज तमाशा मेरे आगे’ कह लें या ‘दुनिया रंगमंच है और हम एक्टर हैं। अपनी भूमिकाएं निभा रहे हैं।’ हमेशा यह एहसास होता है कि यह जिंदगी एक खेल है, तमाशा है। हमारे इर्द-गिर्द जो चल रहा है, वह सच है कि माया है, हमें पता नहीं। शायरों, कवियों, दार्शनिकों ने अपने-अपने समय पर हमें समझाने की कोशिश की है। ऐसा कहते हैं कि सारी दुनिया की कहानियां एक जैसी होती हैं।
    मेरी फिल्म में शिमला का एक बच्चा है। उसकी कहानियों में रुचि है, वह पैसा चुरा कर कहानी सुनने एक किस्सागो के पास रहता है। शिमला में ही एक किस्सागो रहता …

परिवार की रीढ़ है मां : दीपिका पादुकोण

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-अजय ब्रह्मात्मज
    दीपिका पादुकोण की शुजीत सरकार निर्देशित ‘पीकू’ रिलीज हो चुकी है। इम्तियाज अली निर्देशित ‘तमाशा’ की शूटिंग समाप्ति पर है। इन दिनों वह संजय लीला भंसाली की ‘बाजीराव मस्तानी’ की शूटिंग कर रही हैं। इसकी शूअिंग के सिलसिले में वह फिल्मसिटी के पास ही एक पंचतारा होटल में रह रही हैं। समय बचाने के लिए यह व्यवस्था की गई है। दीपिका पिछले दिनों काफी चर्चा में रहीं। ‘माई च्वॉयस’ वीडियो और डिप्रेशन की स्वीमृति के बारे में बहुत कुछ लिखा और बताया गया। दीपिका थोड़ी खिन्न हैं,क्योंकि सोशल मीडिया और मीडिया पर चल रहे विमर्श ने उसे अलग परिप्रेक्ष्य में रख दिया है। दीपिका देश की अन्य हमउम्र लड़कियों की तरह स्वतंत्र हैं। मिजाज की कामकाजी लड़की हैं। उन्हें परिवार से बेहद प्यार है। इधर मिली पहचान की वजह से वह अपनी फिल्मों के चुनाव और एक्टिंग के प्रति अधिक सचेत हो गई हैं। उन्हें इसके अनुरूप तारीफ भी मिल रही है।
    ‘पीकू’ देख चुके दर्शकों को दीपिका के किरदार के बारे में मालूम होगा। पीकू के बारे में दीपिका के विचार कुछ यूं हैं, ‘वह कामकाजी लड़की है। अपने परिवार का भी ख्याल रखती है। अपने पिता से…

फिल्‍म समीक्षा : पीकू

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-अजय ब्रह्मात्‍म्‍ाज  **** चार स्‍टार  कल शाम ही जूही और शूजीत की सिनेमाई जुगलबंदी देख कर लौटा हूं। अभिभूत हूं। मुझे अपने पिता याद आ रहे हैं। उनकी आदतें और उनसे होने वाली परेशानियां याद आ रही हैं। उत्तर भारत में हमारी पीढ़ी के लोग अपने पिताओं के करीब नहीं रहे। बेटियों ने भी पिताओं को अधिक इमोशनल तवज्जो नहीं दी। रिटायरमेंट के बाद हर मध्यीवर्गीय परिवार में पिताओं की स्थिति नाजुक हो जाती है। आर्थिक सुरक्षा रहने पर भी सेहत से संबंधित रोज की जरूरतें भी एक जिम्मेदारी होती है। अधिकांश बेटे-बेटी नौकरी और निजी परिवार की वजह से माता-पिता से कुढ़ते हैं। कई बार अलग शहरों मे रहने के कारण चाह कर भी वे माता-पिता की देखभाल नहीं कर पाते। 'पीकू' एक सामान्य बंगाली परिवार के बाप-बेटी की कहानी है। उनके रिश्ते को जूही ने इतनी बारीकी से पर्दे पर उतारा है कि सहसा लगता है कि अरे मेरे पिता भी तो ऐसे ही करते थे। ऊपर से कब्जियत और शौच का ताना-बाना। हिंदी फिल्मों के परिप्रेक्ष्य में ऐसी कहानी पर्दे पर लाने की क्रिएटिव हिम्मत जूही चतुर्वेदी और शूजीत सरकार ने दिखाई है। 'विकी डोनर' के बाद एक बार फिर द…

दीपिका और प्रियंका का मुकाबला नृत्य

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-अजय ब्रह्मात्मज
याद है, संजय लीला भंसाली की ‘देवदास’ में ‘डोला रे डोला’ गीत विशेष आकर्षण बन गया था। इस गाने में पारो और चंद्रमुखी दोनों ने अपने पांवों में बांध के घुंघरू और पहन के पायल मनोहारी नृत्य किया था। ‘देवदास’ में ऐश्वर्या राय और माधुरी दीक्षित के युगल नृत्य को बिरजू महाराज ने संजोया था। संजय लीला भंसाली की फिल्मों की भव्यता की एक विशेषता सम्मोहक और शास्त्रीय नृत्य भी होती है। अपनी फिल्मों में उन्होंने सभी अभिनेत्रियों को नृत्य में पारंगता दिखाने के मौके दिए हैं। पिछली फिल्म ‘गोलियों की रासलीला ़ ़ ऱामलीला’ में दीपिका पादुकोण को ‘ढोल बाजे’ गाने में अपना हुनर दिखाने का अवसर मिला तो सिर्फ एक गाने ‘राम जाने’ में आई प्रियंका चोपड़ा भी पीछे नहीं रहीं। अब ‘बाजीराव मस्तानी’ दीपिका पादुकोण और प्रियंका चोपड़ा का युगल नृत्य दिखेगा। इसे रेमो फर्नांडिस निर्देशित कर रहे हैं।
    ‘बाजीराव मस्तानी’ में दीपिका पादुकोण मस्तानी की भूमिका निभा रही हैं। प्रियंका चोपड़ा बाजीराव की पत्नी काशीबाई की भूमिका में हैं। इन दिनों दोनों इस फिल्म के युगल नृत्य की शूटिंग कर रही हैं। दीपिका और प्रियंका ने पि…

तमाशा में दीपिका पादुकोण

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खुद के प्रति सहज हो गई हूं-दीपिका पादुकोण

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-अजय ब्रह्मात्मज
    शाह रुख खान के साथ दीपिका पादुकोण की तीसरी फिल्म है ‘हैप्पी न्यू ईयर’। सभी जानते हैं कि उनकी पहली फिल्म ‘ओम शांति ओम’ शाह रुख खान के साथ ही थी। दूसरी फिल्म ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ के समय तक दीपिका पादुकोध की स्वतं। पहचान बन चुकी थी। ‘हैप्पी न्यू ईयर’ में उनकी लोकप्रियता और बढ़ गई है। अगर शाह रुख के समकक्ष मानने में आपत्ति हो तो भी इतना तो कहा ही जा सकता है कि वह कम भी नहीं हैं।
    बहरहाल,तीनों फिल्मों की बात चली तो दीपिका ने कहा,‘पिछली दो फिल्मों में ज्यादा गैप नहीं है,इसलिए कमोबेश समान अनुभव रहा। ‘ओम शांति ओम’ के समय मैं एकदम नई थी। उस फिल्म को मैंने उतना एंज्वॉय नहीं किया था,जितना मैं आज करती हूं। पहली फिल्म के समय घबराहट थी। पहली बार शाह रुख और फराह के साथ काम कर रही थी। उसके पहले कभी फिल्म सेट पर नहीं गई थी। हर चीज मेरे लिए नई थी। ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ और ‘हैप्पी न्यू ईयर’ के बाद मैं शाह रुख के साथ ज्यादा कंफर्टेबल हूं। अब मैं उन्हें को-स्टार नहीं मानती। वे मेरे अच्छे दोस्त हैं। मैं जानती हूं कि कभी उनकी जरूरत पड़ी तो वे मेरे साथ रहेंगे। ऐसी दोस्ती हो तो फिल्में आसान ह…

फिल्‍म समीक्षा -फाइंडिंग फैनी

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-अजय ब्रह्मात्‍मज  सबसे पहले यह हिंदी की मौलिक फिल्म नहीं है। होमी अदजानिया निर्देशित फाइंडिंग फैनी मूल रूप से इंग्लिश फिल्म है। हालांकि यह हॉलीवुड की इंग्लिश फिल्म से अलग है, क्योंकि इसमें गोवा है। गोवा के किरदारों को निभाते दीपिका पादुकोण और अर्जुन कपूर हैं। इन्हें हम पसंद करने लगे हैं। यह इंग्लिश मिजाज की भारतीय फिल्म है, जिसे अतिरिक्त कलेक्शन की उम्मीद में हिंदी में डब कर रिलीज कर दिया गया है। इस गलतफहमी में फिल्म देखने न चले जाएं यह हिंदी की एक और फिल्म हैं। हां, अगर आप इंग्लिश मिजाज की फिल्में पसंद करते हैं तो जरूर इसे इंग्लिश में देखें। भाषा और मुहावरों का वहां सटीक उपयोग हुआ है। हिंदी में डब करने में मजा खो गया है और प्रभाव भी। कई दृश्यों में तो होंठ कुछ और ढंग से हिल रहे हैं और सुनाई कुछ और पड़ रहा है। यह एक साथ इंग्लिश और हिंदी में बनी फिल्म नहीं है। इन दिनों हॉलीवुड की फिल्में भी डब होकर हिंदी में रिलीज होती हैं, लेकिन उनमें होंठ और शब्दों को मिलाने की कोशिश रहती है। फाइंडिंग फैनी में लापरवाही झलकती है। गोवा के एक गांव पाकोलिम में फाइंडिंग फैनी की किरदार रहते ह…

फिल्‍म समीक्षा : कोचडयान

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तकनीक और टैलेंट का उपयोग -अजय ब्रह्मात्मज


    चेन्नई, हैदराबाद और मुंबई ़ ़ ़ फिल्म निर्माण के हर केंद्र में मसाला एंटरटेनमेंट पर जोर है। अगर आप के पास पापुलर स्टार हैं तो किसी प्रकार के प्रयोग की जरूरत ही नहीं महसूस होती। रजनीकांत की बेटी सौंदर्या आर अश्विन ने ‘कोचडयान’ में इस सुरक्षा कवच को तोड़ दिया है। उन्होंने परफारमेंस कैप्चरिंग तकनीक में सुपरस्टार रजनीकांत को लेकर ‘कोचडयान’ का निर्देशन किया है। यहां रजनीकांत अपने अंदाज और स्टाइल में हैं,लेकिन एनिमेटेड रूप में। धैर्य, मेहनत और सोच से बनाई गई यह फिल्म भारतीय फिल्मों के इतिहास में एक नई पहल है। पहली कोशिश की हिम्मत की तारीफ होनी ही चाहिए। सौंदर्या ने ‘कोचडयान’ में तकनीक और टैलेंट का सही उपयोग किया है।
    सौंदर्या आर अश्विन ने स्पष्ट किया था कि यह एक काल्पनिक कहानी है। कोचडयान और उनके बेटों राणा और धर्मा को लेकर गुंथी हुई कहानी में राष्ट्रप्रेम और प्रजाहित पर जोर दिया गया है। परिवेश के मुताबिक दो राष्ट्रों कलिंगपुर और कोट्टायपट्टनम के द्वेष और कलह के बीच राणा के योद्धा व्यक्तित्व,राजनीति और राष्ट्रप्रेम को भव्य तरीके से चित्रित किया…

निडर हो गई हूं-दीपिका पादुकोण

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जन्मदिन विशेेष
(5 जनवरी 1986 को पैदा हुई दीपिका पादुकोण ने हिंदी फिल्मों में कामयाबी का नया कीर्तिमान स्थापित किया है। ऐसी कामयाबी के बाद अभिनेत्रियों की चाल और सोच टेढ़ी हो जाती है। दीपिका में भी परिवत्र्तन आया है। अब वह अधिक संयत,समझदार और सचेत हो गई हैं। वह देश के पॉपुलर अभिनेताओं के समकक्ष दिख रही हैं।)
-अजय ब्रह्मात्मज
    हाल ही में  दीपिका पादुकोण ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के अपने परिचितों, दोस्तों और शुभचिंतकों को एक पंचतारा होटल में आमंत्रित किया। वह अपनी कामयाबी को सभी के साथ सेलिब्रेट कर रही थी। इस अवसर पर फिल्म इंडस्ट्री के महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों ने उपस्थिति दर्ज की। निस्संदेह दीपिका हीरोइनों की कतार में सबसे आगे आ खड़ी हुई हैं। छह साल पहले फराह खान की फिल्म ‘ओम शांति ओम’ से धमाकेदार शुरुआत करने के बाद कुछ फिल्मों में दीपिका की चमक फीकी हुई। आदतन आलोचकों और पत्रकारों ने उन्हें ‘वन फिल्म वंडर’ की संज्ञा दे दी। कहा जाने लगा कि फिर से उन्हें किसी शाहरुख खान की जरूरत पड़ेगी। निराशा के इसी दौर में दीपिका का प्रेम टूटा। असफलता के इस अकेलेपन को उन्होंने किसी खिलाड़ी की तरह अभ्यास…

इंपैक्‍ट 2013 : अमिताभ बच्‍चन,दीपिका पादुकोण,कपिल शर्मा

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-अजय ब्रह्मात्‍मज  अमिताभ बच्चन
    ब्लॉग, ट्विटर, फेसबुक ... सोशल मीडिया के लोकप्रिय माध्यमों का बखूबी इस्तेमाल करते हैं अमिताभ बच्चन। हर माध्यम की प्रति उनकी संलग्नता उल्लेखनीय है। इन माध्यमों के जरिए प्रशंसक और पाठक लोकप्रियता के शीर्ष पर एकाकी बैठे अमिताभ बच्चन के विचारों, अनुभवों और दैनंदिन जीवन की गतिविधियों से परिचित होते हैं। अगर आप उनका ब्लॉग फॉलो करें तो पाएंगे कि रात के बारह बजे के बाद ही यह अपडेट होता है। कभी दो बजे तो कभी चार बजे,जब भारत सो रहा होता है तो दिन भर की सक्रियताओं का सार बताते हुए वे दार्शनिक अभिभावक, मित्र और परिवार के सदस्य के रूप में नजर आते हैं। बिना नागा 2070 दिनों से वे रोजाना लिख रहे हैं। वर्चुअल दुनिया के पाठकों के लिए उन्होंने नया शब्द गढ़ा है -एक्सटेंटेड फैमिली (विस्तारित परिवार)। इस परिवार को अभी वे खुद के निकट पाते हैं। यह परिवार भी उन्हें अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा मानता है। ट्विटर  (74 लाख से अधिक),फेसबुक (76 लाख से अधिक) और ब्लॉग (76 लाख से अधिक) मिलाकर उनके विस्तारित परिवार की संख्या 2 करोड़ से ज्यादा है। अनुशासन, समर्पण और नियमितता से उन्हों…

फिल्‍म समीक्षा : गाेलियों की रासलीला राम-लीला

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भावावेग की प्रेमलीला  -अजय ब्रह्मात्‍मज
ऐन रिलीज के समय फिल्म का नाम इतना लंबा हो गया। धन्य हैं 'राम-लीला' टाइटल पर आपत्ति करने वाले ... बहरहाल, ' ...राम-लीला' विलियम शेक्सपियर के मशहूर नाटक 'रोमियो-जूलियट' पर आधारित फिल्म है, इसीलिए इस प्रेम कहानी के शीर्षक में पहले पुरुष का नाम आया है। एशियाई प्रेम कहानियों में स्त्रियों का नाम पहले आता है, 'हीर-रांझा', 'लैला-मजनू', 'शीरीं-फरिहाद', 'सोहिनी-महिवाल' आदि। संजय लीला भंसाली ने 'रोमियो-जूलियट' की कहानी को गुजरात के रंजार में स्थापित किया है, जहां सेनाड़ा और रजाड़ी परिवारों के बीच पुश्तैनी दुश्मनी चल रही है। इन परिवारों के राम और लीला के बीच प्रेम हो जाता है। 'रोमियो-जूलियट' नाटक और उस पर आधारित फिल्मों की तरह ' ...राम-लीला' भी ट्रैजिक रोमांस है। संजय लीला भंसाली सघन आवेग के निर्देशक हैं। उनकी फिल्मों में यह सघनता हर क्षेत्र में दिखाई देती है। खास कर किरदारों को गढ़ने और उनके भावात्मक संवेग की रचना में वे उत्तम हैं। उनके सामान्य दृश्य भी गहरे और परतद…

खिली और खिलखिलाती दीपिका पादुकोण

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-अजय ब्रह्मात्मज
    दीपिका पादुकोण ने पीछे पलट कर नहीं देखा है, लेकिन हमें दिख रहा है कि वह समकालीन अभिनेत्रियों में आगे निकल चुकी हैं। दौड़ में शामिल धावक को जीत का एहसास लक्ष्य छूने के बाद होता है, लेकिन होड़ में शामिल अभिनेत्रियों का लक्ष्य आगे खिसकता जाता है। दीपिका पादुकोण के साथ यही हो रहा है। ‘चेन्नई एक्सप्रेस’  की अद्वितीय कामयाबी ने उन्हें गहरा आत्मविश्वास दिया है। वह खिल गई हैं और बातचीत में उनकी खुशी खिलखिलाहट बन कर फूट पड़ती है। अक्तूबर की उमस भरी गर्मी में दोपहर की मुलाकात चिड़चिड़ी हो जाती है। फिर भी तय समय पर दीपिका से मिलना है, क्योंकि शूटिंग, डबिंग और प्रोमोशन के बीच उन्हें यही वक्त मिला है। वह जुहू स्थित सनी सुपर साउंड में ‘राम-लीला’ की डबिंग कर रही हैं।
    थोड़े इंतजार के बाद मुलाकात होती है। उनकी परिचित मुस्कान और गर्मजोशी से संबोधित ‘हेलो’ में स्वागत और आदर है। बात शुरू होती है ‘राम-लीला’ से ़ ़ ़ वह इस फिल्म के प्रोमो और ट्रेलर में बहुत खूबसूरत दिख रही हैं। बताने पर वह फिर से मुस्कराती हैं और पलकें झुका कर तारीफ स्वीकार करती हैं। करिअर और फिल्म के लिहाज से ‘राम-…

फिल्‍म समीक्षा : चेन्‍नई एक्‍सप्रेस

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-अजय ब्रह्मात्‍मज  रोहित शेट्टी और शाहरुख खान की फिल्म 'चेन्नई एक्सप्रेस' इस जोनर की अन्य फिल्मों की तरह ही समीक्षा से परे हैं। ऐसी फिल्मों में बताने, समझने और समझाने लायक गुत्थियां नहीं रहतीं। फिल्म सरल होती हैं और देश के आम दर्शकों से सीधा संबंध बनाती हैं। फिल्म अध्येताओं ने अभी ऐसी फिल्मों की लोकप्रियता के कारणों को नहीं खोजा है। 'चेन्नई एक्सप्रेस' आमिर खान की 'गजनी' और रोहित शेट्टी की 'गोलमाल' से हुई धाराओं का संगम है। यह एंटरटेनिंग है। रोहित शेट्टी की फिल्मों में उदास रंग नहीं होते। लाल, गुलाबी, पीला, हरा अपने चटकीले और चटखीले शेड्स में रहते हैं। कलाकारों के कपड़ों से लेकर पृष्ठभूमि की प्रापर्टी तक में यह कंटीन्यूटी बनी रहती है। सारे झकास रंग होते हैं और बिंदास प्रसंग रहते हैं। 'चेन्नई एक्सप्रेस' में पहली बार शाहरुख खान और रोहित शेट्टी साथ आए हैं। शुक्र है कि रोहित शेट्टी ने उन्हें अजय देवगन जैसे सीक्वेंस नहीं दिए हैं। अजय और रोहित की जोड़ी अपनी मसखरी में भी सौम्य बनी रहती है। यहां कोई बंधन नहीं है। हास्य दृश्यों में शाहरुख खा…

दीपिका पादुकोण से अजय ब्रह्मात्‍मज की बातचीत

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-अजय ब्रह्मात्मज

- 2012 आप के लिए बहुत अच्‍छा रहा। 'काकटेल’ हिट रही। अभी किस मूड में हैं आप?
0 फिलहाल तो मैं ‘कॉकटेल’ का सक्सेस एंज्वाय कर रही हूं। प्रमोशन के समय हमने सबको कहा था कि मेरे लिए यह बहुत स्पेशल फिल्म है। मैं बहुत ही खुश हूं कि लोगों को फिल्म अच्छी लगी। मेरा परफारमेंस अच्छा लगा। मैंने ‘कॉकटेल’ में बहुत मेहनत की थी। उस रोल के लिए प्रेपरेशन करना पड़ा। बहुत रिहर्सल भी की मैंने। फिलहाल तीन फिल्मों पर फोकस कर रही हूं। शाहरूख खान के साथ ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ कर रही हूं।रणगीर कपूर के साथ  ‘ये जवानी है दीवानी’ लगभग पूरी हो गई है। संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘रामलीला’ की शटिंग आरंभ हो गई है।
- ‘रेस 2’ भी पूरी हो गई होगी?
0 ‘रेस’ पूरी हो गई है और अब डबिंग कर रही हूं उस फिल्म की। कल ही हमलोगों फिल्म का लोगो ऑन लाइन लांच किया। दीवाली के दिन प्रोमो लांच हुआ। 25 जनवरी को फिल्म रिलीज होगी। ‘रेस 2’ मेरी अगली रिलीज है। ‘कॉकटेल’ के बाद यह नेक्सट फिल्म होगी और पहली बार मैं एक्शन थ्रिलर फिल्म कर रही हूं। पहली बार मैं अब्बास-मस्तान जी के साथ काम कर रही हूं तो मैं बहुत ही एक्साइटेड हूं।
- ‘कॉकटेल’ …

पांच तस्‍वीरें : चेन्‍नई एक्‍सप्रेस

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फिल्‍म समीक्षा : कॉकटेल

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दिखने में नयी,सोच में पुरानी-अजय ब्रह्मात्‍मजहोमी अदजानिया निर्देशित कॉकटेल की कहानी इम्तियाज अली ने लिखी है। इम्तियाज अली की लिखी और निर्देशित फिल्मों के नायक-नायिका संबंधों को लेकर बेहद कंफ्यूज रहते हैं। संबंधों को स्वीकारने और नकारने में ढुलमुल किरदारों का कंफ्यूजन ही उनकी कहानियों को इंटरेस्टिंग बनाता है। कॉकटेल के तीनों किरदार गौतम, वेरोनिका और मीरा अंत-अंत तक कंफ्यूज रहते हैं। इम्तियाज अली ने इस बार बैकड्रॉप में लंदन रखा है। थोड़ी देर के लिए हम केपटाउन भी जाते हैं। कहानी दिल्ली से शुरू होकर दिल्ली में खत्म होती है। गौतम कपूर आशिक मिजाज लड़का है। उसे हर लड़की में हमबिस्तर होने की संभावना दिखती है। वह हथेली में दिल लेकर चलता है। लंदन उड़ान में ही हमें गौतम और मीरा के स्वभाव का पता चल जाता है। लंदन में रह रही वेरोनिका आधुनिक बिंदास लड़की है। सारे रिश्ते तोड़कर मौज-मस्ती में गुजर-बसर कर रही वेरोनिका के लिए आरंभ में हर संबंध की मियाद चंद दिनों के लिए होती है। एनआरआई शादी के फरेब में फंसी मीरा पति से मिलने लंदन पहुंचती है। पहली ही मुलाकात में उसका स्वार्थी पति उसे दुत्क…

चार तस्‍वीरें : दीपिका पादुकोण

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दीपिका पादुकोण काकटेल फिल्‍म में लाल बिकनी पहने समुद्रतट पर लेटी हैं। क्‍या सिर्फ इन तस्‍वीरों की वजह से आप फिल्‍म देखेंगे ?

फिल्‍म समीक्षा देसी ब्‍वॉयज

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-अजय ब्रह्मात्‍मजन्यूयार्क के फिल्म स्कूल से निर्देशन की पढ़ाई कर चुके डेविड धवन के बेटे रोहित धवन ने देसी ब्वॉयज की फिल्म के चारों मुख्य कलाकारों को स्क्रिप्ट के नाम पर क्या सुनाया होगा? और फिर स्क्रिप्ट सुनने-समझने के बाद हां करने के लिए मशहूर कलाकारों को इस स्क्रिप्ट में क्या उल्लेखनीय लगा होगा। पुरूषों का अंग प्रदर्शन, स्ट्रिपटीज, पोल डांस, लंदन, ट्रिनिटी कॉलेज, नायिकाओं के लिए डिजायन कपड़े, दो-तीन गाने और संजय दत्त का आयटम अपीयरेंस.. देसी ब्वॉयज में यह सब है। बस कहानी नहीं है,लेकिन इमोशनल पंच हैं। मां-बेटा, बाप-बेटी, दोस्त, टीचर-स्टूडेंट के अनोखे संबंधों के साथ जब जीरो दिया मेरे भारत ने सरीखा राष्ट्रप्रेम भी है। ऐसा लगता है कि रोहित धवन और उनके सहयोगी लेखक मिलाप झावेरी को पुरानी हिंदी फिल्मों के जो भी पॉपुलर (घिसे पिटे पढ़ें) सीन याद आते गए, उनकी चिप्पी लगती चली गई।ऊपरी तौर पर यह दो दोस्तों निक और जेरी की कहानी है। मंदी की वजह से दोनों की बदहाली शुरू होती है। मजबूरी में वे पुरूष एस्कॉर्ट का काम स्वीकार करते हैं, लेकिन अपनी नैतिकता के दबाव में कुछ रूल बनाते हैं। निक…