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Monday, July 4, 2016

गिटार मास्‍टर हैं तिग्मांशु : संजय चौहान


हिंदी सिनेमा में बदलाव के प्रणेताओं में तिग्‍मांशु धूलिया का नाम भी शुमार होता है। वह लेखक, निर्देशक, अभिनेता, निर्माता और कास्टिंग डायरेक्‍टर हैं। ‘हासिल’, ‘पान सिंह तोमर’, और ‘साहब बीवी और गैंग्‍स्‍टर’ जैसी उम्‍दा फिल्‍में तिग्‍मांशु धूलिया की देन हैं। तीन जुलाई को तिग्‍मांशु का जन्‍मदिन है। संजय चौहान उनके करीबी दोस्‍त हैं। पेश है तिग्‍मांशु के व्‍यक्तित्‍व की कहानी संजय की जुबानी :
यह कहना गलत नहीं होगा कि तिग्मांशु धूलिया , जिन्हें हम दोस्त प्यार से तीशू कहकर बुलाते हैं, से मेरी मुलाकात बिज्जी (प्रख्यात कहानीकार विजन दान देथा) के जरिए हुई थी। जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय (जेएनयू) से मैंने बिज्जी की कहानियों पर एम फिल की थी। मुंबई आने के बाद मैं टीवी सीरियल लिख रहा था। उन दिनों स्टार बेस्ट सेलर सीरीज के तहत कई निर्देशक अलग-अलग कहानियां कर रहे थे। उनमें से कई आज नामी निर्देशक हो चुके हैं। मसलन श्रीराम राघवन, इम्तियाज अली, अनुराग कश्यप और तिशु। बिज्जी राजस्थान की एक बोली मारवाठी में लिखते थे। उनकी एक कहानी अलेखुन हिटलर के हिंदी अनुवाद अनेकों हिटलर को तिशु ने इसी सीरीज के पर्दे पर कमाल तरीके से उतारा था और मुझे लगा वह बेहद सुलझे व्‍यक्ति है। वरना बिज्जी की कहानी खोजकर पर्दे पर लाने का जोखिम नहीं उठाते।
तिशु से मेरी पहली मुलाकात सडक़ पर हुई थी। ‘हासिल’ फिल्म को रिलीज हुए एक साल से ज्यादा हो चुका था, मुझे वह फिल्म बेहद पसंद आई थी। मुझे लगा था कि सुधीर मिश्रा की ‘ये वो मंजिल तो नहीं’ के बाद छात्र राजनीति पर इससे बेहतरीन फिल्म नहीं बन सकती है। हम दोनों की पहली मुलाकात भी बड़ी दिलचस्‍प रही है। मैं मुंबई के सात बंग्लो इलाके से गुजर रहा था और वहीं तिशु से टकरा गया। मैंने उनसे कहा ‘हासिल’ कमाल की फिल्म है। वह हौले से मुस्कुराए शुक्रिया कहा और हम अपनी-अपनी राह हो लिए। तब तक शायद वह यह सुन-सुन कर बोर हो चुके होंगे और उन्होंने संवाद की जरुरत नहीं समझी होगी। मुझे भी कुछ बुरा नहीं लगा। 
उसके बाद तिशु की फिल्म ‘चरस’ आई और मैं बहुत दुखी हो गया। मुझे लगा यार उन्हें क्या हुआ है? ‘हासिल’ के बाद वही शख्स ऐसी फिल्म बना सकता है। वर्षो बाद जब हम अच्छे दोस्त हो चुके थे हमारी इस बात पर बहस हो गई थी। वह मानने को तैयार नहीं थे कि ‘चरस’ खराब फिल्म थी। शायद उनकी कल्पना की फिल्म और बनी फिल्म की दूरी बहुत ज्यादा हो गई थी और अभी भी उनके दिमाग में वही फिल्म चल रही थी जो उन्होंने संजोयी थी।
तिशु से सीधे-सीधे परिचय उस वक्त हुआ जब मैं के सेरा सेरा प्रोडक्शन हाउस के लिए फिल्म लिख रहा था और उसी कंपनी के लिए तिशु एक और फिल्म निर्देशित करने वाले थे। तब बात हुई नंबरों की अदला-बदली हुई। एक दिन तिशु का फोन आया। हम मिले। तिशु ‘घायल’ फिल्म का सीक्वेल सोच रहे थे। उन्होंने कहा साथ मिलकर लिखते हैं। मेरी पहली प्रतिक्रिया थीतुम खुद इतने उम्दा लेखक हो, मेरी क्या जरूरत?  उन्होंने कहा करते हैं मिलकर। हम लोग चार बार मिले। कहानी आगे नहीं बढ़ी और बात वहीं रह गई।
फिर लगभग दो साल बाद फिर तिशु का फोन आया। हम मिले और तिशु ने एक अखबार में छपा ‘पान सिंह तोमर’ पर लिखा एक पेज का लेख साझा किया। यह स्पष्ट था कि न तो गूगल न विकिपीडिया पर इसकी कोई जानकारी थी। इसलिए गहन रिसर्च की जरूरत होगी, लेकिन प्रोड्यूसर यूटीवी स्पॉट ब्वॉय इसके लिए तैयार था। तब दो साल की रिसर्च और एक साल स्क्रिप्ट लिखने के दौरान तिशु को नजदीक से जानने का मौका मिला।
और जब ‘पान सिंह तोमर’ बन के अटकी रही तब हमने तय किया किया कि एक ऐसी फिल्म बनाई जाए जिसके रिलीज के लिए किसी की बाट न जोहनी पड़े। मेरी पसंदीदा फिल्मों में से एक फिल्म ‘साहब बीबी और गुलाम’ है, जिसे मैंने हजारों बार देखा होगा। मुझे लगा आज के टाइम कोई साहब वैसा साहेब नहीं, बीवी वैसी नहीं जो अय्याश पति के चरणों में पड़ी रहे और गुलाम तो कोई नहीं । हिंदी फिल्मों के रामू काका कब के गुजर गए। यह आइडिया मैंने तिग्मांशु को सुझाया सबको पसंद आया और मैं पहला डाफ्ट लिखने बैठ गया। हम दोनों ने उसमें रंग भरे और वह ‘साहब बीवी और गैंग्‍स्‍टर’ फटाफट बनकर तैयार हुई और हिट हुई। उसकी सफलता ने पान सिंह तोमर की रिलीज के दरवाजे खोल दिए। बाकी की कहानी सभी को पता है। शायद बहुत कम लोगों को पता होगा कि इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ते हुए तिशु और उनके दोस्तों का एक बैंड था, जिसमें तिशु गिटार बजाया करते थे। अक्सर कई शाम वह गिटार उठाते और गाने की महफिल जम जाती।
बहरहाल, अगर आपको उनके नजदीक जाना है तो खाने का शौकीन होना बहुत जरूरी है। तिशु खाने पीने के बेहद शौकीन है। वह विभिन्न डिश, उसके बनाने की विधि और बारीकियों पर घंटों बातें कर सकते हैं। वह खुद भी बेहतरीन कुक हैं। मुझे लगता है कि आज के दौर में मुकम्मल कहानी कहने और गढऩे वाले बेहतरीन निर्देशकों में से तिशु एक हैं। जन्मदिन पर मैं उन्हें ढेर सारी शुभकामनाएं देता हूं।
स्मिता श्रीवास्‍तव

Friday, February 7, 2014

फिल्‍म समीक्षा : बबलू हैप्‍पी है

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
शहरों की दौड़ती-भागती जिंदगी में युवक-युवतियों की बड़ी उलझन और समस्या प्यार, संबंध और समर्पण है। हर संबंध के लिए गहरी समझदारी के साथ परस्पर विश्वास अनिवार्य है। पसंद और आकांक्षाएं भी एक सी हों तो रिश्तों के पनपने के लिए समान भूमि मिल जाती है। यह फिल्म दिल्ली के कुछ युवक-युवतियों के जरिए प्यार और समर्पण तलाशती हुई एक ऐसे मुकाम पर पहुंचती है, जहां सच के आभास से डर पैदा होता है ओर उसके एहसास से प्रेम और विश्वास जगता है।
जतिन और तमन्ना की शादी होने वाली है। शादी से पहले जतिन दोस्तों के साथ पहाड़ों की सैर को निकलता है। तमन्ना को भी एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में पहाड़ों पर जाना है। तय होता है कि दोनों वहां मिलेंगे। तमन्ना तुनकमिजाज और पजेसिव किस्म की युवती है। वह जतिन को कभी कुछ कहने का मौका नहीं देती। हमेशा उलाहने और डांट से ही उनकी मुलकातें खत्म होती हैं? जतिन समर्पित प्रेमी की तहर हमेशा उसकी सुनता रहता है। पहाड़ों के सफर में उसके साथ हैरी और रोहन भी है। उनकी अपनी समस्याएं हैं। यात्रा की रात बैचलर पार्टी में जतिन की मुलाकात नताशा से हो जाती है। उन्हें सुधि नहीं रहती। नशे की हालत वे हमबिस्तर हो जाते हैं। बाद में भी नताशा से मुलाकातें होती हैं। नजदीकियां बढ़ती हैं। इसके साथ ही उसकी दुविधा बढ़ती जाती है। एक रहस्य गाढ़ा होता है। उनकी मौज-मस्ती और मुश्किलों के बीच कहानी बढ़ते-बढ़ते एक ऐसे मोड़ पर पहुंचती है, जहां जतिन स्तब्ध होने के साथ लाचार दिखता है। उसी लाचारी में उसे प्रेम का एहसास होता है।
नीला माधब पांडा और लेखक संजय चौहान ने फिल्म में समाज के एक जरूरी और गंभीर मुद्दे को खूबसूरती से पिरोया है। इंटरवल तक अनुमान नहीं रहता कि पिल्म उद्देश्यपूर्ण मोड़ लेगी। लगता ही नहीं कि साधारण सी लग रही युवा समूह की उलझनों की कहानी में सार्थक पेंच आ जाएगा। नीला माधब पांडा अपने उद्देश्य में सफल होते हैं। इस मकसद तक पहुंचने में उन्होंने नाहक प्रचलित फॉर्मूला का इस्तेमाल किया है। मीका सिंह का आइटम सॉन्ग और बंजारा डांस फिल्म के भाव के लिहाजा से अनावश्यक पैबंद लगते हैं।
फिल्म का गीत-संगीत प्रयोगधर्मी और प्रभावशाली है। गीतकार प्रतीक मजूमदार और संगीतकार बिशाख-कनीश ने मधुर गीत-संगीत संयोजन किया है। कलाकारों में नताशा की भूमिका निभा रही अभिनेत्री एरिका फर्नाडिस अपने किरदार की वजह से याद रह जाती हैं। साहिल आनंद और सुमित सूरी अपनी भूमिकाओं के संग न्याय करते हैं।
'बबलू हैप्पी है' साधारण और सहज रूप एक जरूरी मुद्दे को रोचक तरीके से फिल्म में ले आती है। यही इस फिल्म की खासियत है। इस मकसद और प्रयास के लिए लेखक संजय चौहान और निर्देशक नीला माधब पांडा की सराहना करनी होगी। प्रस्तुति में कुछ कमियों और अनावश्यक चतुराई का आभास होता है। उद्देश्य की वजह से उसे अनदेखा किया जा सकता है।
अवधि-114 मिनट
*** तीन स्‍टार

Monday, April 1, 2013

nandita dutta in conversation with sanjay chauhan

sanjay chouhanचवन्‍नी के पाठकों के लिए संजय चौहान का यह इंटरव्‍यू डियर सिनेमा से लिया गया है।

From stealing his sister’s money to watch films in Bhopal to winning awards for Best Screenplay for Paan Singh Tomar-which also won the National Award for Best Film 2012-Sanjay Chouhan has come a long way. His impressive portfolio includes Saheb Biwi aur GangsterI am Kalaam and Maine Gandhi ko Nahi Maara. Chouhan’s experience in the Hindi film industry spans an era when he was blatantly given DVDs to copy to a time when he won the Filmfare and Screen awards for his original screenplay on the life of an athlete who turned bandit.
Chouhan gives a lowdown on the fate of writers of Hindi films then and now, and some useful tips for aspiring writers wanting to break into the industry:
Content driven films have been in the limelight at all mainstream award functions this year; you won the Screen and Filmfare awards for Paan Singh Tomar. How do you think the role of a screenwriter has transformed in this scenario?
I will put this in perspective. There was a time when the emphasis was on writing; you take any writer whether it is Abrar Alvi or Ahmad Abbas. These writers were respected a lot. There was also a director – writer combination. Then came an era when Salim Khan and Javed Akhtar came together and wrote films. This brought in a phenomenal change and created a platform for writers. After they split, very few writers could match up to their mark. Thus began the worst period of Hindi film writing, called the DVD writing. They gave you a DVD and you had to just copy that scene by scene, not even sparing a train or a bus accident in the given film. It was very convenient. I recall an interview with Javed Akhtar where he said that when he went to a producer and narrated a story, the producer said, “Darling your script is very good, but there has been no film made on this earlier.”
They gave you a DVD and you had to just copy that scene by scene, not even sparing a train or a bus accident in the given film. It was very convenient. I recall an interview with Javed Akhtar where he said that when he went to a producer and narrated a story, the producer said, “Darling your script is very good, but there has been no film made on this earlier.”
Then came Sony Pictures and madeSaawariyan. Sony’s entry was followed by the entry of Disney Pictures and 20th Century Fox. These Hollywood studios started setting up shops here and that purified our lives. As a writer, I am very thankful to them. Because they started monitoring what kind of films we are making. If we copied their films, they would send notices. So now the producers who blatantly copied DVDs became ready to spend money on scripts. They would rather spend 10-15 lakhs on an original script than pay crores of rupees to these studios to copy their scripts. Now they started looking for content, for story and simultaneously for a secret formula. They went to South India, picked up the hit films that are quite popular and remade them in Hindi. In another 3-4 years this too will reach a saturation point.
Content driven films came in 2-3 years back, but emphasis was not so much on writing. It was more on who is the hero. The belief was that if there is a good hero, the film will do well but then films with big names started failing left, right and centre. I think only Salman Khan has a real fan following. His films are able to earn crores despite being bad films. Right now it’s working like that, I can’t predict the future.
So the producers and heroes sit back and wonder what to do. I don’t think Akshay Kumar would have done a Special 26 three years back. As for his other film Oh My God! that entered the 100 crore club, who is the hero of the film? Paresh Rawal. Who is Paresh Rawal? He is a fifty year old guy. But the content of the film worked. So they must have also realized that if there is content, it is worth a try. Similarly, Aamir Khan does all kinds of content driven films, be it 3 Idiots or Talaash. If you see the Filmfare nominations this year, you will see that content driven films like Vicky Donor,ShanghaiKahaaniGangs of Wasseypur and Paan Singh Tomar stood strong. I think the time has come for content driven films and this has brought in a lot of responsibility on us to create that kind of content.
What you are saying is that a majority of Hindi films are still copies of Southern hits?
Yes. We have to understand that the Hindi film industry… and the moment we call it an industry, it’s commerce not art. And everyone who is putting crores of rupees into a project, the first thing that comes to their mind is that you are not doing charity but investing in a business. So he/she wants to know whether it will give returns or not. But when the producer sees that this south Indian film has done good business, it has the formula, it has the ingredients, it is well scripted, for example, Ghajini had an amazing screenplay; they go for it. Now because the producer makes money through these films, he / she has the chance to make a Paan Singh Tomar. The same studio makes Barfi! as well as Dabangg.
saheb
Still from Saheb Biwi aur Gangster
Producers go for security; they go where they get their investments back. Even if you or I take that seat, we will ask for that. If the content is strong and risk is less, the project is taken up. If you make a film of 60 crores, then you spend another 30 to 40 crores on print and publicity and it becomes a 100 crore film. So it’s a huge loss if the film fails.
At the same time content driven films are being recognized. Do you think now writers are getting their due?
When Paan Singh Tomar was ready but was not getting released, it was a frustrating period for us. We were all confused about what to do. Then Tigmanshu said we will make a small budget film, in 40 lakhs. We will not charge our fee and when the film is made we will take our shares.
पूरा इंटरव्‍यू पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें....

Monday, March 18, 2013

डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी से अजय ब्रह्मात्‍मज की बातचीत (वीडियो बातचीत )

2 मार्च 2013 को मुंबई में डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी से मैंने उनके निर्देशक होने से लेकर सिनेमा में उनकी अभिरुचि समेत साहित्‍य और सिनेमा के संबंधों पर बात की थी। मेरे मित्र रवि शेखर ने उसकी वीडियो रिकार्डिंग की थी। उन्‍होंने इसे यूट्यूब पर शेयर किया है। वहीं से मैं ये लिंक यहां चवन्‍नी के पाठकों के लिए दे रहा हूं। आप का फीडबैक इस नए प्रयास को आंकेगा और बताएगा कि आगे ऐसे वीडियो किस रूप में  पेश किए जाएं। पांच किस्‍तों की यह बातचीत एक साथ पेश है...यह बातचीत संजय चौहान के सौजन्‍य से संपन्‍न हुई थी। दोनों मित्रों को धन्‍यवाद !
पहली किस्‍त
http://www.youtube.com/watch?v=K3vsQGenAyo

दूसरी किस्‍त 
http://www.youtube.com/watch?v=eBSsvIr6VN4

तीसरी किस्‍त 
http://www.youtube.com/watch?v=fzwnPNjigbE

चौथी किस्‍त 
http://www.youtube.com/watch?v=imvxn8VMDwc

पांचवीं किस्‍त 
http://www.youtube.com/watch?v=_JkdqS1XkWM

Monday, February 18, 2013

चवन्नी भर तो ईमानदारी बची रहे-संजय चौहान


-अजय ब्रह्मात्मज
    संजय चौहान भोपाल से दिल्ली होते हुए मुंबई आए। दिल्ली में जेएनयू की पढ़ाई के दिनों में उनका संपर्क जन नाट्य मंच से हुआ। कैंपस थिएटर के नाम से उन्होंने जेएनयू में थिएटर गतिविधियां आरंभ कीं। पढ़ाई पूरी करने के बाद आजीविका के लिए कुछ दिनों अध्यापन भी किया। मन नहीं लगा तो पत्रकारिता में लौट आए। लंबे समय तक पत्रकारिता करने के बाद टीवी लेखन से जुड़े। और फिर बेहतर मौके की उम्मीद में मुंबई आ गए। सफर इतना आसान नहीं रहा। छोटी-मोटी शुरुआत हुई। एक समय आया कि फिल्मों और टीवी के लिए हर तरह का लेखन किया। कुछ समय के बाद तंग आकर उन्होंने अपनी ही पसंद और प्राथमिकताओं को तिलांजलि दे दी। सोच-समझ कर ढंग का लेखन करने के क्रम में पहले ‘मैंने गांधी को नहीं मारा’ आई। उसके बाद ‘आई एम कलाम’ से एक पहचान मिली। पिछले साल ‘साहब बीवी और गैंगस्टर’ एवं ‘पान सिंह तोमर’ से ख्याति मिली। इन फिल्मों के लिए उन्हें विभिन्न पुरस्कार भी मिले। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में प्रतिष्ठा बढ़ी।
- कुछ सालों पहले आप ने फैसला किया था कि अब गिनी-चुनी मन की फिल्में ही करेंगे। आखिरकार उस फैसले ने आप को पहचान और प्रतिष्ठा दी?
0 मेरे ख्याल में वह सही फैसला था। यह ऊपर से आया कोई दबाव नहीं था। मुझे अपने मन की फिल्में लगन से करनी थीं। इत्तफाक हुआ कि इस तरह की फिल्में मिलीं और प्रशंसित हुईं। दर्शकों ने उन्हें पसंद किया। अगर चालू किस्म की फिल्मों से जुड़ा रहता तो संख्या बढ़ जाती। पैसे कमा लेता। उन्हें दर्शक नहीं देखते। पुरस्कारों की ज्यूरी की नजर नहीं पड़ती। आप देखें कि इन छोटी-बड़ी फिल्मों के पीछे का थॉट बहुत खास था। - कहते हैं कि फिल्म इंडस्ट्री में पहचान और कामयाबी से सभी का नजरिया बदल जाता है। ऐसा कुछ दिख रहा है क्या?
0 बिल्कुल, मैं इसे महसूस कर रहा हूं। ‘साहब बीवी और गैंगस्टर’ के संवादों की तारीफ हुई तो लोगों का नजरिया और मिलने का अंदाज बदल गया। मुझे एक नई दुनिया में प्रवेश मिला। ‘पान सिंह तोमर’ बहुत जमीनी फिल्म थी। बॉयोपिक थी और एक अनजान व्यक्ति पर थी, फिर भी सभी ने उसे सराहा। अपने यहां बॉयोपिकऊब पैदा करते हैं। दर्शक उन से अटैच नहीं हो पाते। ‘पान सिंह तोमर’ के बाद मुझे अनेक कॉल आए। कुछ लोगों ने तो किताबें भिजवायीं। वे चाहते थे कि मैं उन जीवनियों पर काम करूं। सभी को लगा कि मैं अच्छा रायटर हूं। साथ काम करने के मुझे अनेक प्रस्ताव मिले। उन दिनों अपनी व्यस्तता की वजह से मैंने थोड़ा समय मांगा तो वे इंतजार करने के लिए भी  तैयार मिले।
- कुछ नाम बताएंगे?
0 सबसे पहले इंदर कुमार का फोन आया था। पिछले मार्च में उनसे बात हुई थी। फिर दीया मिर्जा ने एक बॉयोपिक की बात की। अनुराग कश्यप भी एक बॉयोपिक चाहते थे। फिलहाल उस पर काम चल रहा है। व्यक्ति और फिल्म का नाम अभी नहीं बता सकता। इन सभी के फोन अपनी तरफ से आए। शायद ऐसा पहले नहीं होता। मुझे संपर्क करना पड़ता। बताना पड़ता।
-पहचान और प्रतिष्ठा के बावजूद अभी आप को वे पैसे नहीं मिले, जो एक कमर्शियल फिल्म से मिल जाते हैं। नया रायटर दुविधा में रहता है कि वह कौन सी राह चुने। प्रतिष्ठा हासिल करे या पैसे कमाए?
0 मुझे लगता है इस मामले में सभी की व्यक्तिगत वजहें होती हैं। अगर किसी को ‘राउडी राठोड़’ लिखने में मजा आता है तो उसे वही लिखना चाहिए। वे ‘पान सिंह तोमर’ की संवेदनशीलता नहीं अपना पाएंगे। आरंभ में सभी को कम पैसे मिलते हैं। हिट या तारीफ होने के बाद पैसे बढ़ते हैं। अभी भी कुछ रायटर हैं, जो विदेशी फिल्मों को तोड़-मरोड़ कर लिखने में आनंद लेते हैं। शायद उनकी वैसी मानसिकता होगी। ऐसे लेखकों को किसी का जीवन सुनाएं या कोई किताब पढऩे के लिए दें तो हो सकता है कि उनकी समझ में ही न आए।
- ज्यादातर नए लेखक सरवाइवल का बहाना लेकर चालू किस्म की फिल्में करते रहते हैं। उनकी पहचान नहीं बन पाती। आप की तरह मन का फैसला लेना नए रायटर के लिए शायद संभव न हो?
0 यह तो उन्हें तय करना होगा। मुंबई में अगर नए लेखक हैं तो 20-25 हजार का मासिक खर्च आएगा ही। अगर फायनेंसियल सपोर्ट नहीं है तो पहला काम हर महीने इतना धन जुटाना है। नए रायटर को ढंग से पैसे भी नहीं मिलते। अलर्ट रहने की जरूरत है और इसी भीड़ में अपनी पहचान बनती है। हो सकता है कई बार अच्छा काम मुफ्त में करना पड़े।
- अगर मैं आपकी बात पूछूं तो यह सफर कैसा रहा? और फिर कैसे पहचान बनी या राह मिली?
0 मैंने ‘बिग ब्रदर’, ‘करम’ और ‘राइट या रौंग’ जैसी फिल्में भी लिखी हैं, लेकिन उनके साथ सुधीर मिश्र की ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ से भी जुड़ा रहा। बहुत ही कम पैसे में मैंने ‘मैंने गांधी को नहीं मारा’ लिखी। इस सफर में कई दफा समझौते करने पड़े। मुझे भी एक डीवीडी की कॉपी करनी पड़ी।
- कभी डर नहीं रहा कि मेरे नाम पर धब्बा लग जाएगा?
0 बिल्कुल नहीं। मेरा मानना है कि आप जितना लिखेंगे, उतना निखरेंगे। दर्शक आप की अच्छी फिल्में ही याद रखते हैं। साधारण और बुरी फिल्में भूल जाते हैं। कितने लोगों को याद है कि मैंने ‘सिसकियां’ भी लिखी है। सभी को ‘मैंने गांधी को नहीं मारा’ याद है। कमर्शियल फिल्मों के बीच अपनी ईमानदारी की चवन्नी भी बची रहे तो ठीक है। ऐसा न हो कि पूरी तरह से भ्रष्ट हो जाएं। बेहतर काम के लिए समझौते करना बुरी बात नहीं है। यों समझें कि आग का दरिया है और डूब के जाना है। मैंने ‘आई एम कलाम’ को कम पैसों में तीन महीने दिए, लेकिन उसका परिणाम देख लें। इस चुनाव में परिवार का सपोर्ट बहुत जरूरी है। कुछ महीने सिर्फ दाल-रोटी खानी पड़ सकती है।
- फिल्म लेखन का परिवेश अभी कैसा है?
0 अच्छी बात है कि दूसरी तरह की फिल्में पसंद की जा रही हैं। मेरी राय में विदेशी कंपनियों और कारपोरेट हाउस के आने से फर्क पड़ा है। फॉरेन स्टूडियो भारत आ गए हैं। इन वजह से डीवीडी की चोरियां रुकी है। अब महेश भट्ट और अब्बास-मस्तान भी राइट खरीद कर नकल कर रहे हैं। चोरी रुकने से ही दक्षिण की फिल्मों का हिंदी में चलन बढ़ा है। मौलिक और नई कहानियों की मांग बढ़ी है। मेरा मानना है कि ‘एक था टायगर’, ‘राउडी राठोड़’और ‘बोल बच्चन’ जैसी फिल्में भी दर्शकों को चाहिए। उनकी कामयाबी से इंडस्ट्री में रवानी आती है। गंभीर फिल्ममेकर भी एक हिट फिल्म चाहता है।
- जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में जावेद अख्तर को तीन ही युवा लेखक-निर्देशक दिखे - आदित्य चोपड़ा, करण जौहर और फरहान अख्तर। वे मौलिकता और विविधता का रोना रो रहे थे?
0 मुझे नहीं मालूम कि किस संदर्भ में उन्होंने ऐसा वक्तव्य दिया। आप स्वयं देखें कि नई फिल्में नए कथ्य और शिल्प के साथ आ रही हैं। सिनेमा का नया विश्व आया है। जावेद साहब उन तीन को नजदीक से जानते हैं। तीनों फिल्म इंडस्ट्री के हैं। फिल्मों में वास्तविक बदलाव छोटे शहरों से आए लेखक और निर्देशक कर रहे हैं । अगले दास सालों में यह आमद और बढ़ेगी। थोड़ा वक्त लगेगा, भेड़चाल होगी, लेकिन उनके बीच ही नई चीजें सामने आएंगी। बाहर से आए फिल्ममेकर की जड़ें गहरी हैं। उनकी कहानियां जमीनी और सहज हैं। ठीक है कि उनकी फिल्में 100 करोड़ नहीं कमा रही हैं, लेकिन जब इतिहास लिखा जाएगा तो उनका ही उल्लेख होगा। इतिहास में 100 करोड़ और 200 करोड़ की कमाई नहीं देखी जाएगी। पिछले साल की ही फिल्में देख लें। आप दोबारा किन फिल्मों को देखना चाहेंगे?
- क्या एक्टर को स्क्रिप्ट की समझ होती है?
0 बहुत कम होती है। मजेदार तथ्य है कि इक्का-दुक्का एक्टर ही स्क्रिप्ट पढ़ते हैं। सब सुनते हैं। हिंदी फिल्मों में नैरेशन और स्टोरी सीटिंग की लंबी परंपरा है। अब चूंकि वे सालों से कहानियां सुनते आ रहे हैं, इसलिए पुराने अनुभवों के आधार पर ही नई फिल्में चुनते हैं। नए विषय पर फिल्म करने की हिम्मत कम एक्टर दिखाते हैं। स्क्रिप्ट पढ़ कर ज्यादातर एक्टर फिल्म नहीं समझ पाते।
- स्क्रिप्ट लेखन में सबसे बड़ा बदलाव क्या आया है?
0 अभी सेट या लोकेशन पर लिखने का चलन कम हो रहा है। हर फिल्म को लिखने के लिए दो-चार महीने का समय दिया जा रहा है। पहले रायटर को सेट पर सीन सुना दिया जाता था और वह फट से डायलॉग लिख देता था। ज्यादातर हिंदी फिल्मों का लेखन डायलॉग पर निर्भर करता है।
- हां, कहानी किसी की, स्क्रिप्ट किसी की और डायलॉग किसी और के  ़ ़ ़ ऐसा क्यों है?
0 हिंदी फिल्मों में इसके खास कारण हैं। पहले पंजाब, बंगाल और दक्षिण से निर्माता-निर्देशक आए। उनके पास आइडिया थे, लेकिन वे उन्हें हिंदी में नहीं लिख सकते थे। इस वजह से स्क्रिप्ट रायटर और डायलॉग रायटर की मांग बढ़ी। आज भी कई मशहूर लेखक और निर्देशक अंग्रेजी में लिखते हैं। उनकी लिखी फिल्मों का हिंदी में अनुवाद किया जाता है। इस वजह से संवाद में हिंदी की रवानी नहीं होती। हिंदी फिल्मों में मुहावरों का प्रयोग कम होता जा रहा है। देसी शब्दों और लहजों की कमी है।
- आप की पृष्ठभूमि हिंदी की है। हिंदी में अनेक लेखक चाहते हैं कि वे स्वयं फिल्में लिखे या उनकी कृतियों पर फिल्में बने। इस दबी इच्छा के बावजूद वे फिल्म लेखन को दोयम दर्जे का मानते हैं। ऐसा विरोधाभास क्यों है?
0 इस विरोधाभास की जड़ें हिंदी समाज में हैं। लेखकों को ईश्वर सदृश माना जाता है,जबकि फिल्मों को घटिया विधा माना जाता है। हर हिंदी लेखक साहित्य अकादेमी और ज्ञानपीठ पुरस्कार चाहता है। साथ में पैसों और ख्याति के लिए फिल्में भी करना चाहता है। हिंदी साहित्य की यह स्थिति है कि मशहूर लेखकों को भी प्रति पुस्तक 10-12 हजार से ज्यादा नहीं मिलते, जबकि फिल्मों में पारिश्रमिक लाखों में है। मेरी सलाह है कि हिंदी लेखकों को डिफेंस मैकेनिज्म छोडक़र फिल्म लेखन में उतरना चाहिए। सबसे पहले वे फिल्मी लेखन की इज्जत करें और इसके शिल्प को सीखें। अगर कोई फिल्मकार आपकी पुस्तक ले रहा है तो आजादी दें। मैं काशीनाथ सिंह की तारीफ करूंगा। उन्होंने ‘काशी का अस्सी’ का अधिकार डॉ ़ चंद्रप्रकाश द्विवेदी को देने के बाद स्क्रिप्ट में कोई हस्तक्षेप नहीं किया। मैंने सुना है कि ‘मोहल्ला अस्सी’ बहुत ही सारगर्भित और मनोरंजक फिल्म बनी है।

Tuesday, September 11, 2012

संग संग: संजय चौहान और सरिता चौहान

संघर्षो के बीच बढ़ता रहा प्यार
स्क्रिप्ट राइटर  संजय चौहान का करियर  शुरू हुआ था पत्रकारिता से। धीरे-धीरे टीवी की दुनिया में और फिर बॉलीवुड में उन्होंने कदम बढाए। उनकी चर्चित फिल्में, पान सिंह तोमर, आई एम कलाम, साहब-बीबी और गैंगस्टर हैं। चित्रकार सरिता से उनकी मुलाकात 20 साल पहले जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली में हुई थी। सरिता की कूची और संजय की कलम की जुगलबंदी जल्दी ही हो गई और दोनों ने मुलाकात के दो वर्ष बाद ही शादी कर ली। रचनात्मकता, रिश्तों की शुरुआत और रोज्ाी-रोज्ागार के संघर्ष को लेकर उनसे हुई लंबी बातचीत।
दिल्ली-भोपाल मेल
संजय :  मैं भोपाल का हूं और सरिता दिल्ली की ठेठ पंजाबी। हमारी लव स्टोरी में ट्रेजिक एंगल था कि यहां कोई विरोधी नहीं था। लोग उम्मीद से हमें देखते थे। उन्हें लगता था कि हम दोनों समझदार हैं, परिवार का भरण-पोषण तो कर ही लेंगे। सरिता के एक मामा को अलबत्ता कुछ आपत्ति थी। पंजाबी शादी में मामा का होना ज्ारूरी होता है, लिहाज्ा उन्हें मनाने के लिए काफी पापड बेलने पडे। मैं लगभग बेरोज्ागार था उस समय, लेकिन इनके घर वालों को इससे कोई फर्क नहीं पडता था।
सरिता :  हां, संजय बेरोज्ागार  थे और मेरी पेंटिंग्स से इतना पैसा नहीं आता था कि घर चल सके। शादी के बाद हमने मिल कर इनकी नौकरी के लिए कोशिशें शुरू कीं। दो-एक जगह काम किया तो अच्छा नहीं लगा। फिर पत्रकारिता में आए। कुछ प्रतिष्ठित मीडिया हाउसेज्ा  में काम किया। लिखना इनका शौक था तो लगा कि रचनात्मक क्षेत्र में ही काम करें तो बेहतर होगा।
काम, शौक और नौकरी
संजय :  पत्रकार तो मैं 11वीं कक्षा के बाद ही बन गया था। कॉलेज  के दिनों में एक राष्ट्रीय समाचार-पत्र के परिचर्चा कॉलम में लोगों के विचार इकट्ठा करता था। फिर उसी संस्थान में नौकरी मिल गई। काम के साथ पढाई करना मुश्किल हुआ तो मैंने ग्रेजुएशन  प्राइवेट किया। उसी दौरान मध्य प्रदेश कला परिषद में नौकरी मिली। उसकी पत्रिका की प्रिंटिंग के सिलसिले में मुझे बार-बार मुंबई जाना होता था। भोपाल के भारत भवन का शुरुआती दौर बहुत समृद्ध रहा है। कुमार गंधर्व जैसे लोग यहां परफॉर्मेस दिया करते थे। नीलम महाजन और उदय प्रकाश जैसे लोगों से मैं भारत भवन में ही मिला। ये सब कहते थे कि मुझे पढाई जारी रखनी चाहिए। मैं जेएनयू से हिंदी साहित्य पढना चाहता था। उदय प्रकाश ने मुझे प्रोत्साहित किया। इस तरह जेएनयू से एम.फिल किया, फिर टीचिंग शुरू की। यहीं से फिर पत्रकारिता की भी शुरुआत हुई।
सरिता : मैंने संजय से कहा कि मुझे भी पेंटिंग में आगे बढना है तो संजय ने कहा कि इसे प्रोफेशनली करो। इसके बाद मैंने दिल्ली की कुछ आर्ट गैलरीज्ा  में प्रदर्शनियों की शुरुआत की। हमारी ज्िांदगी  आसान नहीं थी। लेकिन तकलीफ जैसा कोई एहसास नहीं था। दिल्ली में हमारे घर के ऊपर एक कमरा ख्ाली था तो मैंने उसे ही स्टूडियो बनाया और काम शुरू कर दिया। यहीं हमारी बेटी सारा भी दुनिया में आई। आय का कोई नियमित स्रोत नहीं था। मेरे पेरेंट्स नोएडा शिफ्ट हो गए, जबकि मुझे शो के सिलसिले में दिल्ली आना-जाना पडता था। पर उनके कारण मुझे भी नोएडा शिफ्ट होना पडा। तभी हम दोनों ने निर्णय लिया कि संजय को मुंबई जाकर िकस्मत आज्ामानी  चाहिए। पेरेंट्स  ने आर्थिक तौर पर काफी संभाला। यह हमारा निर्णय था कि हमें क्रिएटिव  फील्ड में रहना है, तो किसी से शिकायत नहीं कर सकते थे।
संजय : इसी बीच टीमवर्क  फिल्म्स नामक प्रोडक्शन  कंपनी से एक काम मिला। तरुण तेजपाल ने मुझे टीमवर्क  के संजय रॉय  और मोहित चड्ढा से मिलवाया। मुझे ओ.आर.एस. घोल की स्क्रिप्ट लिखने को कहा गया। सच बताऊं तो मज्ा आया। एक स्क्रिप्ट लिखी तो उन्होंने  दो-तीन और लिखवा लीं। इसके बाद एक चैनल के लिए आइडिया मांगा। धारावाहिक लिखने के बाद मुझे लगा कि इस फील्ड में करियर शुरू कर सकता हूं। तब मैं एक पत्रिका में काम कर रहा था, बॉस को काम के बारे में बताया तो उन्होंने कहा कि कुछ समय छुट्टी लेकर नए काम को देख लूं। वहां बात न बने तो वापस आ जाऊं। ख्ौर,  थोडी दुविधा और थोडी हिम्मत के साथ मैं आगे बढा।
पेशे की पशोपेश
सरिता :  अच्छी-भली नौकरी छोडने का संजय का फैसला लोगों को अजीब लग सकता था, पर मुझे नहीं लगा। मुझे पता है कि शौक को जीविका बनाना मुश्किल है। हमारे रिश्ते में अच्छी बात रही कि हमने एक-दूसरे को कभी कुछ करने से रोका नहीं। संजय ने हमेशा मेरा उत्साह बढाया। संजय मुंबई आ गए। मेरा मन दिल्ली में नहीं लगता था। धीरे-धीरे परिवार का दबाव भी बढा कि इतने लंबे समय तक अलग-अलग रहना ठीक नहीं है। इस तरह वर्ष 2001 में हम मुंबई आए। सारा को यहां सेटल होने में बहुत वक्त लगा, क्योंकि उसकी परवरिश जॉइंट  फेमिली  में हुई थी। दिल्ली के पांच हजार फीट के घर से निकलकर मुंबई के 1बीएचके फ्लैट में एडजस्ट करना मुश्किल था। शुरू में उत्साह कम हुआ, लेकिन मैंने यहां पहली एकल प्रदर्शनी की तो उत्साह बढा। कुछ दोस्त बने तो लगा कि यहां रहा जा सकता है।
संजय :  मुंबई आकर मैं सबसे पहले पुराने दोस्तों से मिला। एक दोस्त ने सिद्धांत सिनेविज्ान  के मालिक मनीष गोस्वामी को मेरा बायोडाटा दिया। उन्हें सुप्रीम कोर्ट के केसेज्ा  को लेकर कहानियों की ज्ारूरत थी। शुरुआत में उन्हीं के फ्लैट में रहा। बहुत मदद की उन्होंने मेरी।
पेरेंटिंग के सबक
संजय:  सरिता का चेहरा बहुत पारदर्शी है। वह अपने एक्सप्रेशन नहीं छिपा पाती हैं। इनके इसी चेहरे से मुझे प्यार हुआ था। सारा के आने के बाद हम दोनों के जीने के मायने ही बदल गए हैं। जब छोटी थी तो हम बचते थे एक-दूसरे से बहस करने से। लेकिन अब जब वह बडी हो गई है तो हम खुल कर एक-दूसरे से बहस करते हैं। झगडे हमारे बीच कभी नहीं हुए हैं। बच्चे सबको जीना सिखा देते हैं। सारा के आने के बाद से मेरे पेरेंट्स  के प्रति भी मेरा नज्ारिया  बदल गया। मैंने उनकी कीमत समझी और मां को फोन करके अपने हर बुरे बर्ताव के लिए उनसे माफी भी मांगी। सचमुच पिता बनने के बाद ही पेरेंट्स की भूमिका का एहसास होता है। बच्चे जिम्मेदारी लेना सिखा देते हैं।
जिदगी को मिली धूप
संजय :  मुझे याद है कि मैंने अपने दोस्त अश्विनी चौधरी की पहली फिल्म धूप लिखी। हम ओम पुरी  साहब को कहानी सुनाने गए। वे अपने कमरे में चले गए। बाद में जब हम उनके कमरे में गए तो वहां चारों ओर टिशू पेपर्स  मिले। उन्होंने कहा, अरे कितना रुलाओगे? मेरे लिए इससे बडा सम्मान नहीं हो सकता। इस तरह फिल्मों के लिए स्क्रिप्ट राइटिंग शुरू हुई।
सरिता : मैं शूटिंग में संजय के साथ नहीं जाती, मुझे पसंद नहीं है। लेकिन आई एम कलाम के लिए जब फिल्मफेयर अवार्ड मिला तो मैं इनके साथ थी। वह दिन मेरे लिए बेहद ख्ास था। संजय मंच पर अवॉर्ड ले रहे थे और मैं दर्शकों के बीच बैठी इन्हें देख रही थी। यह एहसास बहुत बडा था मेरे लिए।
दुर्गेश सिंह

Thursday, August 30, 2012

लेखकों के सम्‍मान की लड़ाई

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
आजकल जितने टीवी चैनल, लगभग उतने अवार्ड। ये अवार्ड टीवी सीरियल और शो में उल्लेखनीय काम कर रहे कलाकारों, लेखकों, तकनीशियनों और निर्माता-निर्देशकों को दिए जाते हैं। याद करें कि क्या आपने किसी टीवी अवार्ड समारोह में किसी लेखक को पुरस्कार ग्रहण करते देखा है? न तो किसी लेखक का नाम याद आएगा और न ही उनका चेहरा, जबकि टीवी और फिल्म का ब्लू प्रिंट सबसे पहले लेखक तैयार करता है।
फिल्मों के अवार्ड समारोह में अवश्य लेखकों को पुरस्कार लेते हुए दिखाया जाता है। टीवी के लेखकों को यह मौका नहीं दिया जाता। क्यों..? टीवी लेखकों का एक समूह मुंबई में यही सवाल पूछ रहा है। उनके संगठन ने सदस्य लेखकों का आवान किया है कि वे अपने सम्मान के लिए पुरस्कार समारोहों का बहिष्कार करें। वे अपने नाम से दिए जाने वाले पुरस्कारों को ठुकरा दें। उनकी अनेक शिकायतें हैं। पुरस्कारों के लिए नामांकित लेखकों को समारोहों में बुला तो लिया जाता है, लेकिन उन्हें पुरस्कार ग्रहण करने के लिए मंचपर नहीं बुलाया जाता। उन्हें रिहर्सल के दौरान ही पुरस्कार देते हुए शूट कर लिया जाता है और आग्रह किया जाता है कि पुरस्कार समारोह की शाम भी उसी कपड़े में आएं। अगर कभी मंच पर बुलाया भी जाता है तो उन्हें पुरस्कार देने के लिए किसी नामचीन हस्ती को नहीं चुना जाता। इतना हो भी गया तो पुरस्कार समारोह के प्रसारण से लेखकों का फुटेज काट दिया जाता है। लेखकों ने इस अपमानजनक स्थिति को बदलने का बीड़ा उठा लिया है। हाल में दो लेखकों के नाम पुरस्कारों की भी घोषणा हुई, लेकिन उन्हें समारोह में बुलाना उचित नहीं समझा गया। लेखकों को संदेश दिया गया कि उनकी ट्रॉफी उनके घर भिजवा दी जाएगी। आत्मसम्मान के धनी उन लेखकों ने पुरस्कार लेने से ही मना कर दिया।
इस साल फिल्मफेयर अवार्ड समारोह में आई ऐम कलाम के लेखक ने पुरस्कार ग्रहण करने के बाद चुटकी ली थी। उन्होंने कहा था कि उनकी पत्नी ने तो यह समझ कर उनके साथ शादी की थी कि लेखक हैं तो क्रिएटिव व्यक्ति होंगे। मुझे आज पता चला कि मैं टेक्नीकल आदमी हूं। लेखन एक क्रिएटिव प्रॉसेस है, लेकिन अवार्ड समारोहों ने उसे टेक्निकल कैटेगरी में डाल दिया है। गलत पहचान की पीड़ा बहुत तकलीफदेह होती है। संजय चौहान ने अपनी चुटकी में जिस दर्द को बयां किया था, वही दर्द टीवी लेखकों को भी है। उनकी मांग है कि लेखकों को कहानी, संवाद और पटकथा के लिए अलग-अलग पुरस्कार दिए जाएं। उनके पुरस्कार को निर्देशन के पुरस्कार की तरह का सम्मान मिले। वास्तव में यह सम्मान की लड़ाई है, जिसमें वे एकजुट होते नजर आ रहे हैं। पिछले दिनों मुंबई में फिल्म राइटर्स एसोसिएशन के मानद महासचिव कमलेश पांडे ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया।
गौर किया जाए तो टीवी हो या फिल्म.., दोनों ही माध्यमों में लेखक की भूमिका बुनियादी होती है। वही नींव रखता है, जिसके ऊपर मनोरंजन की इमारत खड़ी की जाती है। लेखकों की महती भूमिका के बावजूद उन्हें अपने योगदान की तुलना में कभी सम्मान नहीं मिला। सलीम-जावेद की हिट जोड़ी एक जमाने में अवश्य प्रभावशाली रही, लेकिन वे अपवाद ही बन कर रह गए। आज भी यदा-कदा कुछ लेखकों का नाम बताया और पोस्टर पर लिखा जाता है। ज्यादातर फिल्मों और टीवी शो में लेखकों के नाम क्रेडिट रोल में चलते हैं। फिल्म या टीवी शो के प्रचार में उनकी भूमिका गौण मानी जाती है। गीतकार तो फिर भी चर्चा में आ जाते हैं, लेकिन लेखक गुमनाम ही रह जाता है। अपने किरदारों को उनका वाजिब हक दिलाने में कामयाब लेखक अपने हक की लड़ाई में अभी तक हारते ही रहे हैं। वक्त आ गया है कि मनोरंजन जगत में उनके महत्व को नए सिरे से आंका जाए। उन्हें क्रेडिट और उचित सम्मान दिया जाए। साथ ही पुरस्कार समारोहों में भी उन्हें समुचित प्रतिष्ठा मिले। अभी यह आवाज टीवी के लेखकों ने उठाई है। कल फिल्म के लेखक भी जगेंगे..।

Thursday, March 15, 2012

चौंका दिया पान सिंह तोमर ने

-अजय ब्रह्मात्‍मज

इन दिनों ऐसी फिल्में कम आती हैं, जिन्हें दर्शक लपक लेते हैं। पिछले 2 मार्च को रिलीज हुई तिग्मांशु धूलिया की फिल्म पान सिंह तोमर को दर्शकों ने पसंद किया और अपना लिया। दर्शकों ने यह जता दिया कि वे सिर्फ आइटम सॉन्ग या आक्रामक प्रचार न होने पर भी फिल्मों को पसंद करते हैं।

। उनकी इस पसंद की जानकारी दूसरे दिन मिलती है। पहले दिन तो उन्हें पता भी नहीं रहता कि शुक्रवार को आ रही फिल्म कैसी है? पान सिंह तोमर की ही बात करें तो इस फिल्म के निर्माता यूटीवी को भरोसा नहीं था। उन्होंने लगभग तय कर लिया था कि वे अपना नुकसान नहीं बढ़ाएंगे। फिल्म बन जाने के बाद भी घाटे की आशंका से फिल्में डिब्बे में डाल दी जाती हैं।

उन्हें दर्शकों तक पहुचने ही नहीं दिया जाता। पान सिंह तोमर दो साल पहले बन कर तैयार हो चुकी थी। विभिन्न इंटरनेशनल फेस्टिवलों में इसे दर्शकों ने सराहा भी था, लेकिन यूटीवी के अधिकारियों को लग रहा था कि अभी के माहौल में दर्शक इसे पसंद नहीं करेंगे। पान सिंह तोमर नामक डाकू के जीवन में किसे इंटरेस्ट होगा? ऊपर से कोई बिकाऊ स्टार मेन लीड में नहीं है तो दर्शक भला क्यों देखने आएंगे?

सारी आशंकाओं को पान सिंह तोमर ने निराधार साबित कर दिया। रिलीज होने के बाद इस फिल्म को दर्शकों ने उस फिल्म से अधिक प्यार दिया, जिसे इंडस्ट्री की नामचीन हस्तियों का समर्थन हासिल था। यही दुर्लभ मौका था। आजकल दर्शक अप्रत्याशित परिणामों से चौंका रहे हैं। दर्शकों को इस बात से कोई मतलब नहीं रहता कि कोई फिल्म कितनी मुश्किलों से बनी है या उसकी रिलीज में क्या अड़चनें थीं? उन्हें तो पर्दे पर चल रही फिल्म से मतलब होता है।

गौर करें तो पान सिंह तोमर की भाषा में बुंदेली टच था। मल्टीप्लेक्स के दर्शकों के लिए इग्लिश सब-टाइटिल के साथ इसे रिलीज किया गया था। मुझे नहीं लगता कि उत्तर भारत के दर्शकों को बुंदेली लहजे की हिंदी समझने में कोई दिक्कत हुई होगी। इरफान एक ऐसे ऐक्टर हैं, जो बिना संवादों के भी दर्शकों से कम्युनिकेट करते हैं। पान सिंह तोमर में ऐसे कई दृश्य हैं, जहां बगैर शब्दों के ही इरफान बोलते नजर आते हैं। उन्होंने आंखों और संकेतों से भावों को अभिव्यक्त किया है।

यह फिल्म अपने देसीपन की वजह से आम दर्शकों से जुड़ी। फिल्म की कहानी कायदे से ग्वालियर भी नहीं पहुंच पाती, जबकि उसी हफ्ते रिलीज हुई दूसरी फिल्म दर्शकों लंदन, पेरिस और न्यूयार्क की सैर करवा रही थी। दर्शकों को चमक-दमक पसंद है, लेकिन उन्हें अपने गांव-कस्बों का धूसर और माटी सना रंग भी पसंद है। इस फिल्म की रिलीज में हो रही देरी से इरफान और तिग्मांशु धूलिया दोनों ही उदास और परेशान थे। बता दूं कि यह पान सिंह तोमर तिग्मांशु की ही साहब बीवी और गैंगस्टर से पहले बन कर तैयार हो चुकी थी। इस फिल्म में माही गिल के काम से प्रभावित होकर तिग्मांशु ने उन्हें साहब बीवी और गैंगस्टर दी थी। भविष्य में तिग्मांशु पर रिसर्च करने वालों को कैसे बताया जाएगा कि उनकी पहले की फिल्म बाद में रिलीज हुई। इरफान ने खुद को समझा लिया था। रिलीज के बाद दर्शकों के प्रतिसाद को देखकर उन्होंने कहा कि कुछ फिल्में उन व्यंजनों की तरह होती हैं, जो बन जाने के बाद भी तुरंत नहीं परोसी जातीं। उन्हें चूल्हे से उतारने के बाद भी सिझाया या दम दिया जाता है। उसके बाद ही उनका सही स्वाद मिलता है।

अभी पान सिंह तोमर के अनेक दावेदार निकल आए हैं। यकीन करें कि अगले साल पुरस्कार मिलने पर यूटीवी के अधिकारी इस फिल्म के बारे में बड़ी-बड़ी बातें करेंगे। वे बताएंगे कि कैसे वे बेहतर सिनेमा के लिए कोशिश कर रहे हैं और पान सिंह तोमर के लिए उन्होंने क्या-क्या किया?

Thursday, March 1, 2012

यूं लिखी गई पान सिंह तोमर की पटकथा-संजय चौहान

रिकार्डधारी एथलीट से बागी और फिर डाकू बने पान सिंह तोमर की कहानी जानने के लिए करीब डेढ़ साल तक मध्य प्रदेश के ग्वालियर, भिंड, मुरैना सहित कई शहरों की खाक छाननी पड़ी थी हमें

तिग्मांशु धूलिया जब मिले तो उनके पास सिर्फ संडे मैग्जीन में छपी एक रिपोर्ट थी, जिसमें पान सिंह तोमर के धावक और बागी होने का एक लेख था। हमारे पास एक और सूचना थी कि उनके गांव का नाम भिड़ौसा है। ग्वालियर के नजदीक के इस गांव के अलावा और कोई जानकारी नहीं मिल पा रही थी। गूगल भी मदद में बेकार था और दौड़ के धावकों के नाम तक किसी खेल एसोसिएशन से नहीं मिल रहे थे।

सबसे पहले हमलोग उनके गांव गए। परिवार के बारे में पता चला, लेकिन कहां है, ये नहीं मालूम हो पा रहा था। चंबल में पुश्तों तक दुश्मनी चलने की बात सच लगी। कोई बताने को तैयार नहीं था। क्या पता दुश्मन के लोग पता करना चाह रहे हों?

पूर्व बागी मोहर सिंह से एक सरकारी गेस्ट हाउस में बात करते समय वहां के चौकीदार ने उस गांव का नाम बताया, जहां पान सिंह तोमर और उनके गैंग का एनकाउंटर हुआ था। उस गांव के लोगों से थोड़ी सूचना मिली। पुलिस वालों, पूर्व बागियों से मिलने का सिलसिला महीनों चलता रहा। मुंबई से दिल्ली, दिल्ली से रोड के जरिए ग्वालियर, मुरैना, भिंड, धौलपुर के सफर ऐसे होते थे, जैसे हम मुंबई में एक मोहल्ले से दूसरे मोहल्ले को निकल रहे हों। बंगाल रेजीमेंट, रूड़की और स्पो‌र्ट्स एकेडमी, पटियाला के चक्कर अलग लगाने पड़े। धीरे-धीरे सूचनाएं मिलने लगीं और एक कहानी नजर आने लगी, लेकिन परिवार वालों से अभी तक मुलाकात नहीं हो पाई थी। तीन महीनों की जद्दोजहद के बाद पान सिंह तोमर के बेटे से मुलाकात हुई। फिर जानकारियां पुख्ता होती गई।

इस पूरे शोध में डेढ़ साल लग गए, लेकिन उसका फायदा यह हुआ कि पटकथा लिखने में समय नहीं लगा। चूंकि मैं भोपाल से हूं और बुंदेलखंड की बोली से अच्छी तरह वाकिफ हूं, इसलिए संवाद लिखने में भी दिक्कत नहीं हुई। हां, मैंने इस बात का ख्याल रखा कि ऐसे देशज शब्दों का ज्यादा उपयोग न हो, जिसे दूसरी बोली-भाषा वाले न समझ सकें।

इरफान और विपिन शर्मा के अलावा ज्यादातर कलाकार मंच के हैं, इसलिए संवाद अदायगी में दिक्कतें नहीं आई। हां, माही गिल चूंकि पंजाब से हैं, इसलिए संवाद समझने में उनकी थोड़ी मदद करनी पड़ी। वह भी तेजी से मिट्टंी के रंग में रंग गई।

चंबल के बीहड़ों में शूटिंग आसान नहीं थी। न मेकअप वैन वहां जा सकती थी और न आराम के साज-ओ-सामान, लेकिन सबको नशा था एक अच्छी फिल्म बनाने का, सो सबने दिल लगाकर काम किया। इतनी अच्छी फिल्म से जुड़ना मेरे लिए गर्व की बात है।

[संजय चौहान ने 'पान सिंह तोमर' का लेखन किया है। उन्हें 'आई एम कलाम' की कहानी के लिए 2011 के फिल्मफेयर पुरस्कार से भी नवाजा गया है।]

Friday, September 16, 2011

अब बीवी रोती-बिसूरती नहीं है-तिग्‍मांशु धूलिया


-अजय ब्रह्मात्‍मज

साहब बीवी और गैंगस्टर ़ ़ ़ इस फिल्म का नाम सुनते ही गुरुदत्त अभिनीत साहब बीवी और गुलामकी याद आती है। 1962 में बनी इस फिल्म का निर्देशन अबरार अल्वी ने किया था। इस फिल्म में छोटी बहू की भूमिका में मीना कुमारी ने अपनी जिंदगी के दर्द और आवाज को उतार दिया था। उस साल इस फिल्म को चार फिल्मफेअर पुरस्कार मिले थे। यह फिल्म भारत से विदेशी भाषा की कैटगरी में आस्कर के लिए भी भेजी गई थी। इस मशहूर फिल्म के मूल विचार लेकर ही तिग्मांशु धूलिया ने साहब बीवी और गैंगस्टरकी कल्पना की है।

तिग्मांशु धूलिया के शब्दों में, ‘हम ने मूल विचार पुरानी फिल्म से ही लिया है। लेकिन यह रिमेक नहीं है। हम पुरानी फिल्म से कोई छेड़छाड़ नहीं कर रहे हैं। साहब बीवी और गैंगस्टरसंबंधों की कहानी है, जिसमें सेक्स की राजनीति है। यह ख्वाबों की फिल्म है। जरूरी नहीं है कि हर आदमी मुख्यमंत्री बनने का ही ख्वाब देखे। छोटे ख्वाब भी हो सकते हैं। कोई नवाब बनने के भी ख्वाब देख सकता है।

इस फिल्म में गुलाम की जगह गैंगस्टर आ गया है। उसके आते ही यह आंसू और दर्द की कहानी रह जाती है। यह क्राइम और थ्रिलर है, जिसमें सारे किरदार अपने-अपने लाभ के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। तिग्मांशु कहते हैं, ‘वक्त बदल गया है। अब छोटी बहू आंसू नहीं बहाती। बहू का मिजाज बदल गया है। वह अपनी जिंदगी की कमियों के लिए रोती नहीं है। उसे हासिल करना चाहती है। इस चाहत में उसे गैंगस्टर का इस्तेमाल करने में भी हिचक नहीं होती। मैंने अपनी फिल्म को छोटे शहर में रखा है। मैंने किरदारों का पूरा एटीट्यूड बदल दिया है।

वे आगे बताते हैं, ‘मूल फिल्म में अकेलापन है। मेरी फिल्म का परिवेश देखेंगे तो इस अकेलेपन का एहसास होगा। वीराने में एक हवेली है। उसमें कुछ लोग रहते हैं, जिन्हें एक-दूसरे से कोई मतलब नहीं है। कहते ही हैं कि खाली दिमाग शैतान का अड्डा ़ ़ ़ तो अकेला आदमी अपनी परेशानियों से उबरने के लिए अजीब सी हरकतें करता है। मेरी फिल्म की बीवी रोती नहीं है। वह अपना हक लेना जानती है। हक लेने के लिए वह कुछ भी कर सकती है। भूतनाथ यहां पर गैंगस्टर है। नवाब साहब का काम कुछ अलग सा है।

साहब बीवी और गैंगस्टरमें आठ गाने हैं। इन दिनों युवा फिल्मकार अपनी फिल्मों में गाने डालने से बचते हैं। तिग्मांशु की सोच अलग है। वे हिंदी फिल्मों की इस शैली पर फख्र करते हैं, ‘हम गानों का क्यों न इस्तेमाल करें। मैंने साहब बीवी और गैंगस्टरमें आठ गाने रखे हैं। उन्हें अलग-अलग म्यूजिक डायरेक्टर ने संगीतबद्ध किया है। बहुत ही अच्छे और खूबसूरत गाने हैं। दो गाने तो गैरफिल्मी किस्म के हैं। एकअमित स्याल का गीत है। मजेदार बात है कि अमित स्याल की प्रेमिका ने उसे छोड़ दिया। उस गम में उसने गाना लिख दिया। और फिर एक सीडी भी बना दिया। वह इस गाने को गाता रहता है ़ ़ ़ बिछुडऩे की बातें हैं गाने में। मैंने उस गाने को इस फिल्म में रखा। इसी प्रकार सुनील भाटिया का एक गाना है। एक सूफियानी कव्वाली भी है।एक जुगनी भी है।

कलाकारों के चुनाव की बात पूछने पर तिग्मांशु धूलिया स्पष्ट करते हैं, ‘मेरा मानना है कि फिल्में फेल नहीं होतीं। उनका बजट फेल होता है। इस फिल्म में मैं स्टार सिस्टम को भेदना चाहता था। मैंने माही गिल को इस फिल्म का ऑफर दिया। वह जल्दी ही तैयार हो गई। जिमी शेरगिल से मेरा पुराना संबंध है। वे भी राजी हो गए। गैंगस्टर के रोल के लिए रणदीप हुडा को बुलाया। मैंने इस फिल्म को सीमित बजट में बनाया। मैंने पहली बार एलेक्सा कैमरा इस्तेमाल किया।

छोटी फिल्मों की मार्केटिंग और कलेक्शन के सवाल पर तिग्मांशु को गुस्सा आ जाता है। वे पूछते हैं, ‘80 करोड़ की किसी फिल्म के कलेक्शन से मेरी फिल्म की तुलना ट्रेड पंडित क्यों करते हैं? मेरी फिल्म तो 20 प्रतिशत बिजनेश कर भी अपनी कमाई कर लेती है। भाई 4-5 करोड़ के बिजनेश से भी मैं फायदे में आ जाता हूं, लेकिन ट्रेड पंडित लिखते और बताते हैं कि फलां छोटी फिल्म फ्लॉप हो गई। मेरा कहना है कि फिल्मों के टिकट रेट के साथ हिट-फ्लॉप का पैमाना भी बदलना होगा। इस बार देखना है कि क्या होता है?’The

Saturday, August 6, 2011

फिल्‍म समीक्षा : आई एम कलाम

आई एम कलाम: सबक देती छोटू की जिंदगीअच्छी फिल्मों का कोई फार्मूला नहीं होता, फिर भी एक उनमें एक तथ्य सामान्य होता है। वह है विषय और परिवेश की नवीनता। निर्देशक नीला माधव पांडा और लेखक संजय चौहान ने एक निश्चित उद्देश्य से आई एम कलाम के बारे में सोचा, लिखा और बनाया, लेकिन उसे किसी भी प्रकार से शुष्क, दस्तावेजी और नीरस नहीं होने दिया। छोटू की यह कहानी वंचित परिवेश के एक बालक के जोश और लगन को अच्छी तरह रेखांकित करती है।

मां जानती है कि उसका बेटा छोटू तेज और चालाक है। कुछ भी देख-पढ़ कर सीख जाता है, लेकिन दो पैसे कमाने की मजबूरी में वह उसे भाटी के ढाबे पर छोड़ जाती है। छोटू तेज होने केसाथ ही बचपन की निर्भीकता का भी धनी है। उसकी एक ही इच्छा है कि किसी दिन वह भी यूनिफार्म पहनकर अपनी उम्र के बच्चों की तरह स्कूल जाए। उसकी इस इच्छा को राष्ट्रपति अबदुल कलाम आजाद के एक भाषण से बल मिलता है। राष्ट्रपति कलाम अपने जीवन के उदाहरण से बताते हैं कि लक्ष्य, शिक्षा, मेहनत और धैर्य से कुछ भी हासिल किया जा सकता है। कर्म ही सब कुछ है। उस दिन से छोटू खुद को कलाम कहने लगता है। उसकी दोस्ती रजवाड़े केबालक रणविजय सिंह से होती है। दोनों एक-दूसरे से सीखते हैं और खुश रहते हैं। ढाबे में ही काम कर रहे लपटन को छोटू पसंद नहीं है। एक दिन छोटू पर चोरी का इल्जाम लगता है। मासूम छोटू की ईमानदारी पर कोई विश्वास नहीं करता। कहानी नाटकीय और एक अंश में फिल्मी मोड़ लेती है। अंत में हम उसे रणविजय सिंह के साथ स्कूल बस में देखते हैं।

थोड़ी देर के लिए यह दूर की कौड़ी लग सकती है कि होटल बने पैलेस में चाय और खाना पास के ढाबे से आता है। फिल्म में इसकी वजह बतायी गयी है। इस एक भेद को मान लें तो किरदारों की विश्वसनीयता फिल्म से जोड़ती है। भाटी, लपटन, लूसी, छोटू और राजा का परिवार ़ ़ ़ सभी एक-दूसरे से गुंथ जाते हैं। छोटू की जिद्द हमें अपने साथ कर लेती है और हम चाहने लगते हैं कि उसे भी पढ़ने का मौका मिलना चाहिए।

छोटू के रूप में हर्ष मयूर ने स्वाभाविक अभिनय किया है। हर्ष को इस साल ही सर्वोत्तम बाल कलाकार का नेशनल पुरस्कार मिल चुका है। दूसरे बालक के रूप में हसन साद का योगदान बराबरी का है। भाटी के रूप में गुलशन ग्रोवर अपनी अनियमित भूमिका में अच्छे लगते हैं। इसी प्रकार लूसी की भूमिका में फ्रांसीसी अभिनेत्री बिट्रिस ओड्रिक्स का चुनाव सही है। यह फिल्म अपने कथ्य और उद्देश्य में महत्वपूर्ण होने के साथ ही रोचक और सरस है। फिल्म की संवेदना हमें आह्लादित करती है।

रेटिंग- **** चार स्टार

Sunday, October 19, 2008

अहंकार नहीं है सनी में -संजय चौहान


फिल्म धूप से मशहूर हुए संजय चौहान ने सनी देओल के लिए कई फिल्में लिखी हैं। सनी के जन्मदिन (19 अक्टूबर) पर संजय बता रहे हैं उनके बारे में॥

सनी देओल से मिलने के पहले उनके बारे में मेरे मन में अनेक बातें थीं। दरअसल, मीडिया और लोगों की बातों से ऐसा लगा था। उनसे मेरी पहली मुलाकात बिग ब्रदर के समय हुई। फिल्म के निर्देशक गुड्डू धनोवा के साथ मैं उनसे मिलने गया था। पुरानी बातों की वजह से सनी केबारे में मैंने धारणाएं बना ली थीं। औरों की तरह मैं भी मानता था कि वे गुस्सैल और तुनकमिजाज होंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पहली मुलाकात में ही वे मुझे बहुत मृदु स्वभाव के लगे। यह सच है कि वे बहुत मिलनसार नहीं हैं, क्योंकि वे शर्मीले स्वभाव के हैं। दूसरे, उनके बारे में मशहूर है कि वे सेट पर समय से नहीं आते हैं। मैंने बिग ब्रदर की शूटिंग के दौरान पाया कि वे हर स्थिति में बिल्कुल समय से सेट पर आ जाते थे। फिल्म की शूटिंग के दौरान मैंने पाया कि वे काम के समय ज्यादा लोगों से नहीं मिलते। अपना काम किया, शॉट दिया और अपने स्थान पर चले गए। वैसे, मैंने यह भी कभी नहीं देखा कि उन्होंने सेट पर आए किसी मेहमान को झिड़क दिया हो या किसी ने ऑटोग्राफ या फोटोग्राफ के लिए रिक्वेस्ट की हो, तो उसे नखरे दिखाए हों। उनकी प्यारी मुस्कराहट सिर्फ पर्दे पर ही नहीं, वास्तविक जिंदगी में भी आपका दिल जीत लेती है।
बाद में गुलाबी और गुरुदक्षिणा लिखते समय उन्हें और करीब से देखने-समझने का मौका मुझे मिला। ये दोनों फिल्में अभी नहीं बनी हैं। मैं बताना चाहूंगा कि वे सिर्फ अपने किरदार या भूमिका के बारे में ही नहीं सोचते हैं, बल्कि वे दूसरे किरदारों में भी दिलचस्पी उतनी ही लेते हैं। फिल्म के खलनायक या दूसरे चरित्रों के प्रति भी वे उतने ही शिद्दत से सोचते हैं। गुरुदक्षिणा के एक लंबे दृश्य के अंत में उन्हें केवल दो संवाद बोलने हैं। उन्होंने यह पूछा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि मैं कम बोल रहा हूं। जैसे ही उन्हें उनके दो संवाद के महत्व के बारे में बताया गया, उन्होंने थोड़ी देर सोचा और कहा दैट्स कैरेक्ट। ज्यादातर ऐक्टर में यह गुण नहीं पाया जाता, क्योंकि ज्यादातर ऐक्टर अपने रोल और सीन को लेकर परेशान रहते हैं। मैं कहूंगा कि उन्हें स्क्रिप्ट की अच्छी समझ है। सच तो यह है कि वे उसे डिटेल में समझते हैं। हालांकि उनकी फिल्में देखते समय इसका अहसास नहीं होता है। उनके बारे में यह गलत धारणा बन गई है कि वे अपने रोल पर अधिक ध्यान नहीं देते, लेकिन मेरा मानना है कि रोल को लेकर उनकी समझ जबरदस्त है। फिल्म करते समय अगर आप उनकी समझ या सोच से सहमत नहीं हैं और तार्किक तरीके से उन्हें बताते हैं, तो वे अपनी सोच और राय बदलने के लिए तैयार जो जाते हैं। यह बड़ी बात है। उनमें रत्ती भर भी अहंकार नहीं है। वे पूरी फिल्म के बारे में सोचते हैं।
शायद कम लोग ही जानते हैं कि सनी बहुत ही टेक्नोसेवी भी हैं। घड़ी, कंप्यूटर और कार के बारे में उन्हें नई जानकारी रहती है। वे लोगों से इस बारे में घंटों बातें कर सकते हैं। उनके लैपटॉप में सारे नए सॉफ्टवेयर और प्रोग्राम मौजूद मिलेंगे और वे उनका इस्तेमाल किसी सिद्धहस्त जानकार की तरह करते हैं। मैं उनके व्यक्तित्व के एक पहलू के बारे में बताना चाहूंगा। लोगों ने कुछ फिल्मों में उन्हें दाढ़ी के साथ देखा होगा। क्या लोगों को मालूम है कि उन सभी फिल्मों में उनकी असली दाढ़ी थी। उन फिल्मों के लिए वे दाढ़ी बढ़ाते हैं। वे कभी नकली दाढ़ी नहीं लगाते। उनका मानना है कि चाहे जितने अच्छे तरीके से दाढ़ी चिपकाई जाए, वे दिख जाती हैं और फिर आपकी दाढ़ी नहीं है, तो उसका असर चेहरे के एक्सप्रेशन पर पड़ता है। सच तो यह है कि अपने रोल के प्रति ऐसा समर्पण कम कलाकारों में दिखता है। हां, सनी में एक कमी है। वे मीडिया प्रेमी नहीं माने जाते। शायद यह देओल परिवार में है। इन दिनों ऐक्टर जिस प्रकार मीडिया का इस्तेमाल करते हैं, वैसा सनी नहीं करते। उनमें बेसिक ईमानदारी है। वे कहते हैं कि हमें काम करना चाहिए, क्योंकि काम बोलता है। मुझे लगता है कि उन्हें इस तरफ ध्यान देना चाहिए। चूंकि वे अपनी तरफ से कोई सफाई नहीं देते और न ही खुद के बारे में आक्रामक तरीके से बताते हैं, इसलिए उनके बारे में बन चुकी धारणाएं खत्म नहीं हो पातीं!
काम में उनकी संलग्नता ऐसी रहती है कि वे सुबह छह बजे भी आपको तरोताजा मिलेंगे और पूरी भागीदारी के साथ बातचीत करेंगे। मैंने अभी उनके लिए राइट या रॉन्ग लिखी है। इसमें सनी बिल्कुल नए अंदाज में दिखेंगे। ऐसे रोल में लोगों ने उन्हें पहले कभी नहीं देखा है।