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मामूली लोग होते हैं मेरे किरदार -सुभाष कपूर

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-अजय ब्रह्मात्‍मज मैंने ‘फंस गए रे ओबामा’ खत्‍म करने के समय ही ‘गुड्डू रंगीला’ की स्क्रिप्‍ट लिखनी शुरू कर दी थी। बात ढंग से आगे नहीं बढ़ रही थी तो मैंने उसे छोड़ दिया और ‘जॉली एलएलबी’ पर काम शुरू कर दिया था। उस फिल्‍म को पूरी करने के दौरान ही मुझे ‘गुड्डू रंगीला’ का वैचारिक धरातल मिल गया। उसके बाद तो उसे पूरा करने में देर नहीं लगी। मैं स्क्रिप्‍ट जल्‍दी लिखता हूं। पत्रकारिता की मेरी अच्‍छी ट्रेनिंग रही है। समय पर स्‍टोरी हो जाती है। ‘ग़ुड्डू रंगीला’ के निर्माण में अमित साध के एक्‍सीडेंट की वजह से थोड़ी अड़चन आई,लेकिन फिल्‍म अब पूरी हो गई है। मुझे खुशी है कि मैं अपने काम से संतुष्‍ट हूं। जरूरी है वैचारिक धरातल मेरे लिए फिल्‍म का वैचारिक धरातल होना जरूरी है। आप मेरी फिल्‍मों में देखेंगे कि कोई न कोई विचार जरूर रहता है। मैं किसी घटना या समाचार से प्रेरित होता हूं। उसके बाद ही मेरे किरदार आते हैं। ‘गुड्डू रंगीला’ की शुरूआत के समय मेरे विचार स्‍पष्‍ट नहीं थे। यह तो तय था कि हरियाणा की पृष्‍ठभूमि रहेगी और उसमें खाप पंचायत की भी उल्‍लेख रहेगा। अटकने के बाद मैंने आधी-अधूरी स्क्रिप्‍ट छोड़ दी …