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Tuesday, February 11, 2020

सिनेमालोक : कोरियाई सिनेमा के 100वें साल में पैरासाइट का रिकॉर्ड


सिनेमालोक
कोरियाई सिनेमा के 100वें साल में पैरासाइट का रिकॉर्ड 
-अजय ब्रह्मात्मज
कल 52 में एकेडमी का अवार्ड का सीधा प्रसारण था. दुनिया के सबसे चर्चित और प्रतिष्ठित अवार्ड पर सभी फिल्मप्रेमियों की निगाहें लगी रहती हैं. एकेडमी अवार्ड मिलना गौरव की बात मानी जाती है. यह ऐसी पहचान है, जिसे विजेता तमगे की तरह पहनते और घर दफ्तर में सजाते हैं. इस अवार्ड के नामांकन सूची में आ जाना भी गुणवत्ता की कसौटी पर खरा उतरना माना जाता है. मुख्य रूप से अमेरिका में बनी अंग्रेजी फ़िल्में ही पुरस्कारों की होड़ में रहती हैं. गैरअंग्रेज़ी फिल्मों के लिए विदेशी भाषा फिल्म की श्रेणी है. हॉलीवुड के नाम पर दुनिया भर में वितरित हो रही मसालेदार फिल्मों से अलग सिनेमाई गुणों से भरपूर ऐसी फिल्मों का स्वाद सुकून, शांति और विरेचन देता है. फिल्मप्रेमी एकेडमी अवार्ड से सम्मानित फिल्मों के फेस्टिवल करते हैं. टीवी चैनलों पर इनके विशेष प्रसारण होते हैं. ग्लोबल दुनिया में भारत के फिल्मप्रेमियों की जिज्ञासा भी ऑस्कर से जुड़ गई हैं.
इस साल कोरियाई फिल्म ‘पैरासाइट’ को चार ऑस्कर मिले हैं. सर्वश्रेष्ठ फिल्म, सर्वश्रेष्ठ निर्देशक, सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म और सर्वश्रेष्ठ मौलिक पटकथा के लिए मिले पुरस्कारों के साथ ‘पैरासाइट’ ने एकेडमी अवार्ड का नया रिकॉर्ड स्थापित किया है. दक्षिण कोरिया की किसी फिल्म को पहली बार पुरस्कृत पहचान मिली है पिछले साल कान फिल्म फेस्टिवल में श्रेष्ठ फिल्म का अवार्ड मिलने के बाद से ‘पैरासाइट’ देश-विदेश में अपने सीमित प्रदर्शनों से ही व्यापक चर्चा पा रही है. भारत में थियेटर में रिलीज हुई यह पहली कोरियाई फिल्म है. बड़े शहरों में अभी तक फिल्म के शो चल रहे हैं. भारत में ‘पैरासाइट’ के वितरक इंपैक्ट्स को चाहिए कि वे इसे कस्बों और छोटे शहरों तक ले जाएं.
‘पैरासाइट’ पूंजीवादी देश में असामान विकास से प्रभावित दो परिवारों की कहानी है. पार्क संपन्न परिवार है और किम विपन्न परिवार है. अगर मुंबई का उदाहरण लें तो कह सकते हैं कि किम परिवार धारावी जैसे इलाके में रहता है और पार्क परिवार कोलाबा या मालाबार हिल में.  दोनों परिवारों के घरों में बोंग जून हो का कैमरा प्रवेश करता है. एक ही शहर में आर्थिक भिन्नता की वजह से दो किस्मों और तरीके से जी रहे परिवारों की यह कहानी मिलती और टकराती है. इस मिलन और टकराहट में विसंगतियां उभर कर दिखती हैं. एक परिवार के लिए बारिश आनंद की चीज है तो दूसरे परिवार के लिए यह भारी तबाही लेकर आती है. देश के अनेक शहरों में मालदार और मलिन बस्तियों में मौसम के असर को हम देखते रहे हैं. बोंग जून हो ने कोरिया में सार्थक दृश्यबंधों,संवादों और चरित्रों के जरिए संपन्नता और विकास की विडंबना को उकेरा है.
इस साल ऑस्कर में 4 पुरस्कारों से के साथ बोंग जून हो ने कोरिया के लिए प्रतिष्ठित सम्मान हासिल किया है. यह साल कोरियाई सिनेमा का सौवां साल है. बोंग जून हो ने अपने इंटरव्यू में बार-बार कहा कि मेरे लिए यग सुंदर संयोग है कि मेरी फिल्म कोरियाई सिनेमा के सौवें साल के मौके पर इंटरनेशनल पहचान बना रही है. फिल्म लिखते और बनाते समय मेरे दिमाग में ऐसी कोई बात नहीं थी, लेकिन यह सुखद संयोग खुशी दे रहा है. आप गौर करेंगे कि बोंग जून हो अपने इंटरव्यू और इंटरेक्शन में मुख्य रूप से कोरियाई भाषा का प्रयोग करते हैं. वे अपनी बात रखने में सफल रहते हैं. भारतीय और खासकर हिंदी फिल्मकारों के लिए यह एक सबक हो सकता है. हम सभी जानते हैं कि विदेश तो क्या देश में ही हिंदी फिल्मकार हिंदी बोलने से परहेज करते हैं. उनकी फिल्मों के पोस्टर तक हिंदी में नहीं आते.
फिलहाल हम यह सपना संजो सकते हैं कि जल्दी ही कोई भारतीय फिल्मकार भी बोंग जून हो की तरह एकेडमी अवार्ड हासिल कर देश की फिल्म निर्माण की समृद्ध परंपरा को इंटरनेशनल पहचान दिलाएगा. भारतीय फिल्मकार 21वीं सदी में नए प्रयोग कर रहे हैं और क्रिएटिव आकाश का विस्तार कर रहे हैं.