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Saturday, November 30, 2013

पटना सिने परिवेश : सैयद एस तौहीद

सैयद एस तौहीद का यह लेख मुझे बहुत पहले मिल गया था। पोस्‍ट नहीं कर पाया था। पटना शहर के सिने परिवेश पर उन्‍होंने रोचक तरीके से लिखा है। हम सभी को अपने शहरों और कस्‍बों के बारे में लिखना चाहिए। सब कुछ इतनी तेजी से बदल रहा हैं कि हम खुद ही भूल जाएंगे पते,ठौर-ठिाने और किस्‍से...इन सब के साथ भूलेंगी यादें।

पटना सिने वातावरण से गुजरा दौर बडे व्यापक रूप से ओझल होने की कगार पर है।

आधुनिक समय की धारा में गुजरा वक्त अपनी ब्यार खो चुका है। नए समय में सिनेमा का जन-सुलभ वितरण अमीरों के शौक में बदलता जा रहा है। राजधानी के बहुत से सिंगल-स्क्रीन सिनेमाघर परिवर्तन एवं तालाबंदी के दौर से गुजररहे हैं। परिवर्तन की रफ्तार में यह इतिहास ‘आधुनिकता’ व बाजारवाद के लिए जगह बना रहा है । अतीत जो अब भी उस समय की याद लिए नगर में कहीं सिमटा पडा था। आज वह गुजरे वक्त की जुस्तजु को फिर भी हवा देता है । सबसे पहले बुध मार्ग के उजड चुके ‘पर्ल’ का जिक्र करना चाहिए। कहा जाता है कि यह अस्सी के उत्तरार्ध में तालाबंदी के अंधेरे में डूब गया। रेलवे स्टेशन करीब जबरदस्त लोकेशन पर इसे स्थापित किया गया था। संचालन के कुछ ही वर्षों के भीतर तालाबंदी का साया पड गया। एक विश्लेषण के मुताबिक सिनेमाघर पर बंदी का कारण पर्याप्त लाईसेंस का न होना समझ आता है। फिर वितरकों के साथ व्यावसायिक अराजकता का मामला एवं स्वामित्व बडा कारण है। भूमि विवाद एवं फिल्मों के प्रदर्शन पर स्टे भी बडी समस्या है। पर्ल की किस्मत का साया पटना के सभी पुराने सिनेमाघरों पर पड चुका है । इस समय
राजधानी के अनेक लोकप्रिय छविग्रह किसी न किसी वजह से दैनिक सिनेमाई गतिविधियों से महरूम हैं। अब वहां फिल्मों का प्रदर्शन नहीं होता, आज की तारीख में अप्सरा से लेकर अशोक तक के परदे पर कोई मंजर नहीं आता। दर्शक हितों के मददेनजर लोकप्रिय छविग्रहों का एक के बाद एक बंद हो जाना बडी बात है। आधुनिक बदलाव के वजह से नए समय में पुरानी दरों का मनोरंजन शुल्क लगभग समाप्त है। अब छविग्रहों में फिल्म का मजा लेना हर किसी के बस में नहीं। विशेषकर हर तरफ का मारा गरीब आदमी एक बडे शहर में सिनेमा का टिकट नहीं ले सकता। गांव में ढंग का सनेमा होता नहीं ।गांव-कसबे से पलायन कर नगर-महानगर में आए आदमी के पास स्वस्थ मनोरंजन का विकल्प नहीं है। घर पर गुजारा हो जाने लायक रोजगार नहीं कि वापस लौट आएं। मोबाइल में लोड फिल्म उसे सिनेमाघर का मजा नहीं दे सकती। त्वरित व आसान तरीके से मनोरंजन का सामान मुहय्या कराने वाला बाजार गरीब आदमी से विशेष सरोकार नहीं । हां,स्वस्थ मनोरंजन का दायित्त्व रेडियो जरूर निभा रहा है । किंतु सिने अनुभव में भागीदारी का दायरा सामुदायिक सेवा से खरीद सेवा में बदल चुका है । सिनेमाघरों के परंपरागत प्रारूप में बदलाव से ‘सभी को मनोरंजन’ देने की मुराद पर चर्चा नहीं । हाशिए के लोग हर जगह उपेक्षा के शिकार होते रहे। कहना होगा कि यह तक़रीबन हर जगह देखा जाता है ।
                 एक समय में राजधानी का गौरव कहा जाने वाला बडे लोगों का हाल ‘अशोक’ फिल्हाल संक्रमण काल से गुजर रहा है । आज इसकी जमीन पर एक महत्त्वकांक्षी योजना का काम चल रहा है। । पाटलीपुत्र
                         राजेन्द्र नगर का वैशाली सिनेमा पर भी संकट के बादल हैं । कुछ ही समय पहले जबरदस्त प्रयास के साथ पुनरूत्थान की सांसे ले सका था । किंतु फिर से गुमनाम पटरी पर खडा है। आस-पास के दर्शकों के लिए अब विकल्प के तौर पर वीणा सिनेमा ही उपलब्ध है । भोजपुरी फिल्मों की चाहत रखने वाले लोगों के
लिए यह खास है। वीणा में पोपुलर बाम्बे सिनेमा (हिंदी सिनेमा) की फिल्मों का प्रदर्शन तकरीबन रूका पडा है । इस तरह हिंदी फिल्म के दर्शकों को विकल्प की तलाश करनी होगी। लेकिन सिनेमा अनुभव का भागीदार होना अब एक पूंजी का सवाल है। नए समय में आधुनिक छविग्रहों का सेवा शुल्क बढ जाने से फिल्म देखना अमीरों की ठसक हो गया है । विशेष कर मल्टीपलेक्स के जमाने में हाशिए का मनोरंजन अधिकार एक दीवास्वपन है। वह समय अब नहीं रहा जब सिनेमा हर वर्ग की पहुंच में था। सिनेमा से आम आदमी के गायब हो जाने का असर परदे के दूसरी ओर भी नजर आने लगा है । छविग्रहों की दीर्घा से गरीब आदमी का गायब हो जाना खटकता है । अब ज्यादातर सिनेमाघरों में आसान शुल्क वाली श्रेणी खत्म हो गयी है। यह कम दाम पर लोगों को अच्छी फिल्में दिखाने की क़ुव्वत रखती थी । अमीर मल्टीपलेक्स में गरीब आदमी का स्वागत करने वाली स्पेशल-फ्रंट-रियर दीर्घा की अवधारणा नहीं होती। उसकी चमक गरीब आदमी को बहुत असहज कर सकती है । परंपरागत सिंगल स्क्रीन छविग्रहों की तालाबंदी एवं बदलाव की नयी ब्यार में हाशिए के आदमी का सवाल खारिज सा लगता है। स्तरीय मनोरंजन सेवाएं आसान दरों पर मुहय्या कराने का स्वपन धूमिल है । आधुनिक कीमत के प्रकाश में एक साधारण आदमी ‘पाइरेटेड सीडी’ की सीमित दुनिया में गुमराह होने को आमदा नजर आता है । कहना जरूरी है कि उस बाजार की निरंतरता में चिंताजनक परिणाम देखने को मिलेंगे ।
राजधानी की सिने-दर्शक परम्परा फिल्मों के प्रदर्शन में सहायक बनी । यह चलन सिनेमाघरों से विकसित हुआ । यह सभी पटना सिने संस्कृति के महत्त्वपूर्ण पड़ाव कहे जा सकते हैं । गांधी मैदान से सटे नगर के तीन
मुख्य सिनेमा हाल: मोना-रिजेंट-एल्फिसटन क्षेत्र में सिने दर्शन को परिभाषित करते थे । दर्शक जब कभी इस दिशा मे आता, तो एक अनजाने मोहपाश में स्वयं को बंधा पाता । मोना से कुछ ही पहले एल्फिसटन टाकिज का भवन है,जोकि फिलवक्त परिवर्तन काल से गुजर रहा है । इस टाकिज में भोजपुरी फिल्मों का प्रेमियर होता था। क्षेत्रीय सर्कल में यह टाकिज काफी लोकप्रिय रहा । सिने टाकिज त्रयी में तीसरी कड़ी रेजेंट सिनेमा है। रेलवे स्टेशन के करीब बना वीणा आस-पास के दर्शको के लिए वर्षो से एक विकल्प रहा है । लेकिन अब वीणा में ग्रेड- वन फिल्में न के बराबर रिलीज़ होती हैं । पटना से सटे दानापुर के छविग्रह राजधानी सिने संसार को विस्तार देने के प्रयास में हैं । यहां पर टिकट की कीमत नगर के सिनेमाघरों से कम है । लेकिन वहां जाने को बडी फुर्सत की दरकार है।
                       वर्त्तमान हालात में पर्व त्योहार- सांस्कृतिक संस्कारों तथा परंपरागत विधान से गरीब तबका छूटता दिख रहा । हाशिए के लोगों को सुरक्षित करने के लिए भोजपुरी फिल्म मनोरंजन को गलत रूप से कुंठाओं से मुक्ति का मार्ग करार दिया जाता है। आरंभिक भोजपुरी फिल्मों के संदर्भ में बात ठीक थी। किंतु वो बात अब के भोजपुरी सिनेमा पर लागू नहीं होती । हाशिए के आदमी का मनोरंजन अधिकार इससे आगे निर्धारित होना चाहिए । एक सांस्कृतिक जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाने की जरूरत है। उसे स्तरीय फिल्में दिखाने का अवसर उपलब्ध कराया जाए। बदलाव की धारा में छविग्रहों की परंपरागत अवधारणा मिटने से सिनेमा का शौकीन गरीब तबक़ा भयावह कुंठाओं की गिरफ्त में है। हाशिए के हित में सिनेमा का सामुदायिक स्वरूप बरकरार रखना चाहिए। केवल भोजपुरी फिल्में दिखाने से काम नहीं चल सकता । उन्हें अच्छी भोजपुरी व हिंदी फिल्में दिखाने का इंतजाम होना चाहिए । उन्हें सकारात्मक मनोरंजन का आदि बनाना होगा। फिर वो शायद मानसिक हित-अहित का अवलोकन स्वतंत्र होकर कर सकेंगे । यह एक बडे सामाजिक संघर्ष की दिशा में एक पहल होगी । आगे और भी पहल की जरूरत पड सकती है । हमें इस दिशा में विचार करना होगा । फिल्हाल ऐसा नहीं हो रहा और यह लोग भ्रमित दिशाओं की ओर मोड दिए जा रहे हैं। सिनेमा से जुडे लोगों ऊपर समाज को जोडने का महत्ती दायित्व है। आधुनिकता व बाजार की इकानामी में काम थोडा मुश्किल जरूर है, किंतु असंभव नहीं ।  लेकिन क्या हाशिए को कुछ अधिकार मुहय्या कराने के ऊपर सोंचा भी जाता है?
कालोनी के नजदीक चालू अत्याधुनिक शापिंग माल में राज्य का पहला मल्टीपलेक्स स्थापित हो जाने से कंशट्रक्शन क्षेत्र में बहुत रश हो गया है। उदाहरण की विराट भव्यता दोहराव को प्रेरित करती है । अशोक सिनेमा की जमीन पर भी बहुमंजिला इमारत का निर्माण हो रहा है । जिसमें एक मल्टीपलेक्स की भी योजना है। विगत कुछ वर्षों से राजधानी में पुराने ठिकानों को जमींदोज कर देने की एक मुहिम सी चली है । परिवर्तन यह कहानी चाण्क्य एवं एलिफिस्टन के साथ भी फिट बैठती है । नगर का हर परिवर्तित (मिटा हुआ भी) पता एक बडी कहानी का हिस्सा है। विकास की कहानी के भूले-बिसरे किरदारों में इनका नाम भी जोडा जा सकता है। मंजर से जो हट तो गए लेकिन यादों में अब भी हैं। बदलाव की ब्यार में परंपरा की बात पुरानी मालूम पडे लेकिन फिर भी वह वक्त याद आता है । छविग्रहों के पुराने भवन को ध्वस्त कर नए भवन का निर्माण हो रहा है। एलिफिस्टन के पुराने भवन को हटा कर नए युग में प्रवेश की नींव पड चुकी है। संचालन रोके जाने समय यह भोजपुरी फिल्मों का सिनेमाहाल था । हो सकता है कि आगामी समय में इस चलन में विस्तार हो । बहरहाल फिलवक्त तो यह साफ नहीं कि नियमित प्रदर्शन कब तक बहाल हो सकेगा। एक्जिविशन रोड पर ‘अप्सरा’ तालाबंदी भी इसी संकट से जूझ रहा है । जिस समय से यहां फाटक बंद हुआ, तब से एक इंच भी सकारात्मक बदलाव सामने नहीं आया । नगर के एक नामचीन छविग्रह की वर्त्तमान हालात देखकर  एक मिटे हुए नाम का आभास होता है । जिस प्रांगण में दर्शकों का जमावडा हुआ करता था, अब एक परिंदा भी बमुश्किल दिख जाए । कह सकते हैं कि खंडहर में तब्दील होने को है । तालाबंदी के गुमनाम अंधेरे में जाने बाद एक गुमनाम विषय है।