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Tuesday, November 5, 2019

सिनेमालोक : अब की पति पत्नी और वो


सिनेमालोक
अब की पति पत्नी और वो
-अजय ब्रह्मात्मज
41 साल पहले 12 मई 1978 में आई बीआर चोपड़ा की फिल्म ‘पति पत्नी और वो’ की रीमेक 6 दिसंबर 2019 को रिलीज होगी. सामाजिक विषयों पर गंभीर और उत्तेजक फिल्मों के निर्देशन-निर्माण के लिए मशहूर बीआर चोपड़ा ने अपनी मुख्य शैली से विक्षेप लेकर ‘पति पत्नी और वो’ का निर्माण और निर्देशन किया था. आज के दर्शकों को मालूम नहीं होगा कि इसे हिंदी के प्रसिद्ध लेखक कमलेश्वर ने लिखा था. कमलेश्वर ने पुरुष के जीवन में पत्नी के अलावा वो की कल्पना से इस कॉमिक सिचुएशन की फिल्म सोची थी. सामाजिक सच्चाई तो यही है कि समाज में ऐसे किस्से’सुनते को मिलते रहते हैं और वो की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है.
कमलेश्वर ने पुरुष की फितरत के रूप में वो की कल्पना की थी. मूल फिल्म में पहले एक एनिमेशन आता है, जिसमें आदम और हव्वा को दिखाया गया है. आदम और हव्वा निषिद्ध सेव खाते हैं और उनके अंदर कामेच्छा जगती है. इसकी वजह से उन्हें स्वर्ग से निकालकर धरती पर धकेल दिया जाता है. कहते हैं आदम और हव्वा धरती पर रहते हैं और कभी-कभी उनकी जिंदगी में वह निषिद्ध फल वो की तरह आ ही जाता है. फिल्म की शुरुआत किशोर कुमार की आवाज में आदम-हव्वा की कहानी के गीत से होती है, जो आज के संजीव कुमार(रंजीत चड्ढा) और विद्या सिन्हा(शारदा चड्ढा) के परिचय साथ पूरी होती है. साइकिल की टक्कर से दोनों में प्यार होता है. शादी होती है और एक बच्चा भी हो जाता है. दोनों की शादीशुदा जिंदगी अच्छी चल रही है. इस बीच रंजीत का प्रमोशन होता है. उन्हें एक सेक्रेटरी रंजीता कौर(निर्मला देशपांडे} मिल जाती है. इसके बाद सारे समीकरण बदलते हैं और हास्यास्पद स्थितियां बनती हैं.
2019 की ‘पति पत्नी और वो’ कानपुर शिफ्ट हो गई है. अब पति का नाम चिंटू उर्फ़ अभिनव त्यागी(कार्तिक आर्यन) हो गया है. उनकी पत्नी वेदिका त्यागी(भूमि पेडणेकर) हैं और वो के रूप में तपस्या सिंह(अनन्या पांडे) आती हैं. शहर कानपुर होने से परिवेश और पृष्ठभूमि बदली है. 2019 की कहानी होने से काल बदल गया है चिंटू त्यागी पिता के दबाव में रहता है और शहर में ही छोटी-मोटी नौकरी कर लेता है. मूल फिल्म में रंजीत चड्डा का दोस्त अब्दुल करीम दुर्रानी(असरानी) है. रीमेक में भी पति चिंटू त्यागी का दोस्त मुसलमान है. उसका नाम रिज़वी(अपारशक्ति खुराना) हो गया है. वह वास्तव में चिंटू त्यागी का फ्रेंड,फिलोस्फर और गाइड है.
मूल फिल्म कमलेश्वर ने लिखी थी. रीमेक फिल्म के निर्देशक मुदस्सर अजीज ने लिखी है. मुदस्सर की फिल्मों में गजब की कॉमिक टाइमिंग और पंच लाइनें रहती है. रीमेक का ट्रेलर देख चुके पाठक मानेंगे कि इस बार आज के हिसाब से पंच लाइनें हैं और उनमें कानपुर का लहजा भी है. मुदस्सर अज़ीज़ ने कार्तिक आर्यन के लुक पर मेहनत की है. कार्तिक आर्यन के बाल ‘शॉकड’ स्टाइल में बिखरे और खड़े रहते हैं. इस फिल्म में मांग निकालकर करीने से संवारे गए हैं. कुछ-कछ ‘रब ने बना दी जोड़ी’ के सीधे-सादे शाह रुख खान की याद आती है. मुदस्सर की भाषा पर अनोखी पकड़ है, जो इस फिल्म के संवादों में झलकती है. हालांकि अभी ट्रेलर ही आया है, लेकिन उम्मीद बनती है कि कुछ हल्का-फुल्का मजेदार  मनोरंजन मिलेगा.
फिल्म की घोषणा के समय मुझे भी लगा था कि संजीव कुमार की भूमिका कार्तिक आर्यन कैसे निभा पाएंगे? लेकिन ट्रेलर से यूं लगा कि मुदस्सर अज़ीज़ ने फिल्म की थीम तो ‘पति पत्नी और वो’ की ही रखी है, लेकिन प्रस्तुति पूरी तरह बदल दी है. उसे आज के मिजाज और अंदाज में ढाला है. हाँ,ट्रेलर में रंजीत और शारदा का बिटवा नहीं दिखा है. हो सकता है, उसे गायब ही कर दिया गया हो. कार्तिक आर्यन के साथ भूमि पेडणेकर पत्नी और अनन्या पांडे वो की भूमिका में हैं. मूल फिल्म के गीत रीक्रिएट नहीं किए गए हैं. पता चला कि चिंटू त्यागी ‘ठंडे ठंडे पानी’ से गुनगुनाते रहते हैं.
बीआर चोपड़ा की बहू रेणु चोपड़ा और पोते जोनी चोपड़ा ने रीमेक का निर्माण किया है.



Tuesday, October 29, 2019

सिनेमालोक : बड़े सितारों की चूक


सिनेमालोक
बड़े सितारों की चूक
-अजय ब्रह्मात्मज
पिछले हफ्ते आई साजिद नाडियाडवाला की  फिल्म 'हाउसफुल 4' ने दर्शकों और समीक्षकों को निराश किया. इसकी वजह से फिल्म का कारोबार अपेक्षा से बहुत कम रहा. निर्माता को उम्मीद थी की दिवाली के मौके पर रिलीज हो रही यह फिल्म पहले 3 दिनों में ही 100 करोड़ का आंकड़ा पार कर लेगी. ट्रेड पंडितों का अनुमान था कि पहले दिन ही फिल्म का कारोबार 25 से 35 करोड़ के बीच होगा. अक्षय कुमार  समेत तीन अभिनेताओं और कृति ससैनन समेत तीन अभिनेत्रियों की यह फिल्म रिलीज के पहले से तहलका मचा रही थी.  एक गीत 'बाला बाला बाला शैतान का साला' विचित्र नृत्य मुद्राओं की वजह से लोकप्रिय हो गया था.बाला चैलेंज के तहत फिल्म बिरादरी के सदस्य और आम प्रशंसक हास्यास्पद वीडियो सोशल मीडिया पर डाल रहे थे. उन्हें निर्माता रिट्वीट कर रहे थे. यूँ लग रहा था कि फ़िल्म को इस श्रेणी की पुरानी फिल्मों की तरह भारी कामयाबी मिलेगी.
ऐसा नहीं हो सका. अक्षय कुमार की लोकप्रियता से पहले दिन थोड़े दर्शक आये,लेकिन अगले दिन दर्शक ससससससZकम हो गए. कामयाब फिल्मों का एक ट्रेंड है कि शनि और रविवार को उनके कलेक्शन में 20 से 30 प्रतिशत का इजाफा होता है. इस फ़िल्म का कलेक्शन अगले दिन घट गयाससस्वस्स्ज़ज़्ज़और अब बढ़ने की उम्मीद भी नहीं है. बेहतरीन फिल्में तारीफ से दर्शक बटोरती हैं तो बुरी फिल्में निंदा से दर्शकों को आकर्षित नहीं कर पातीं. यही 'हाउसफुल 4' के साथ हुआ. आम दर्शकों के साथ बैठ करफ़िल्में देखने से उनकी प्रतिजरियासमझ में आ जाती हैं. निर्माताओं ने तो सोचा था कि दिवाली का वी ।केंड उनके लिए फायदेमंद होगा.
'हाउसफुल 4' का निर्देशन पहले साजिद खान कर रहे थे। उनके 'मी टू' विवाद में फंसने के बाद फ़िल्म की शूटिंग रोक दी गई थी. कलाकारों में भी फेरबदल हुई थी. बाद में फरहाद - शामजी को ज़िम्मेदारी दी गई. फूहड़ और मज़ाकिया संवादों के लिए मशहूर निर्देशक द्वय को निर्देशन की कागज़ी ज़िम्मेदारी दी गई. यह नहीं बताया गया कि साजिद खान ने कितनी गिलम शूट कर ली थी? और फरहाद - शामजी ने कितना किया? यूँ दबी जुबान में यह भी कहा जा रहा था कि निर्देशन की कमान तो साजिद नाडियाडवाला के हाथों में ही थी. खानापूर्ति के लिए फरहाद-शामजी का नाम दिया गया. इस फ़िल्म की कहानी साजिद नाडियाडवाला की ही है. उन्हें पुनर्जन्म की यह अजीबोगरीब कहानी सूझी,जिसे शूट करने में भारी खर्च भी किया गया. यह बात फैलाई गई कि फ़िल्म की लागत 80 करोड़ ही है. और कलेक्शन पर भी विवाद हुआ कि उसे बढ़ा- चढ़ा कर बताया जा रहा है.
स्थिति जो भी हो,इस तथ्य से इनकार नहीं जिया जा सकता कि अक्षय कुमार औरसजिद नाडियाडवाला सेभरी चूक हुई. जिस मसालेदार युक्ति पर उन्हें विश्वास और भरोसा था,वह काम नहीं आया. पुनर्जन्म जैसी धारणा को इस तरीके से पेश करना दर्शकों के पल्ले नही पड़ा. बाकी कलाकारों की छवि में तो फ़र्क़ नहीं पड़ेगा,लेकिन अक्षय कुमार की लोकप्रियता को बट्टा लाह. उनकी पिछली कुछ फिल्में कंटेंट और राष्ट्रवाद के नारों की वजह से चलीं. अभी के दौर में वे भरोसेमंद स्टार माने जाते हैं. उन्हें यह समझना चाहिए कि छोटी सी चूक के भी परिणाम बड़े होते हैं. उनके पास कुछ बेहतरी  फिल्में हैं. सचमुच उन्हें ऐसी फूहड़ फिल्मों से किनारा कर लेना चाहिए.


Tuesday, October 22, 2019

सिनेमालोक : गांधी के विचारों पर बनेगी फिल्में

सिनेमालोक
गांधी के विचारों पर बनेगी फिल्में
-अजय ब्रह्मात्मज
पिछले दिनों आमिर खान, शाह रुख खान,राजकुमार हिरानी और एकता कपूर समेत फ़िल्म बिरादरी के 45-50 सदस्य प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी से मिले. छन्नू लाल मिश्र और एक-दो शास्त्रीय गायक भी इस मुलाकात में शामिल थे. सेल्फी सक्रिय फ़िल्म बिरादरी ने मुलाकात के बाद सोशल मीडिया पर प्रधान मंत्री के पहल और सुझाव की तारीफ की झड़ी लगा दी. प्रधानमंत्री ने उनके ट्वीट के जवाब दिए और उनके प्रयासों की सराहना की. सभी ने अलग-अलग शब्दों और बयानों में मोदी जी की बात दोहराई और जुछ ने महात्मा गांधी की प्रासंगिकता की भी बात कही। इस साल 2 अक्टूबर से गांधी की 150वीं जयंती की शुरुआत हो चुकी है. सरकार और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने गंफ़ही जयंती पर कोई खास सक्रियता नहीं डिझायी है. खबर तो यह थी कि दो साल पहले ही एक समिति बनी थी,जिसे 150 वीं जयंती की रणनीति तय करनी थी। क्या रणनीति बनी?
बहरहाल, प्रधान मंत्री से फ़िल्म बिरादरी के सदस्यों की मुलाक़ात और विशेष बैठक उल्लेखनीय है. इसका महत्व तब और बढ़ जाता है,जब हम देखते हैं कि कुछ सालों पहले भक्तों के निशाने पर आएआमिर खान और शाह रुख खान इस बैठक में मौजूद रहे. उन्होंने मोदी जी के साथ सेल्फ़ी निकाली. उस सेल्फी में मोदी जी मुस्कुरा रहे थे. शायद भक्तों तक यह संदेश गया हो कि नाम से खान दोनों लोकप्रिय कलाकार गद्दार और देशद्रोही नहीं हैं. खान के अलावा फिल्म बिरादरी के महिला सदस्यों(कलाकार और निर्माता) ने अलग से प्रधान मंत्री के साथ तस्वीरें और सेल्फी लीं. एकता कपूर ने महिला सशक्तिकरण की पहचान की बात की,जिसे बाद में स्वयं प्रधान मंत्री ने रिट्वीट कर दोहराया. याद होगा कि फ़िल्म बिरादरी और प्रधान मंत्री की मुलाकातें लगातार खबरें बन रही हैं.हालांकि यह पता नहीं चल पा रहा है कि उनके प्रभाव और प्रेरणा से क्या नई गतिविधियां आरम्भ हुई हैं?
इस बार की मुलाक़ात से भगवा भक्तों और खान द्वय के प्रशंसकों को आश्चर्य भी हुआ. कहीँ कोई और कारण या दबाव तो काम नहीं कर रहा? यह भी हो सकता है कि भाजपा के दूसरी बार सत्ता में आने से विरोधी और आलोचनात्मक आवाज़ों को लग रहा हो कि सरकार और प्रधान मंत्री के साथ रहने में ही भलाई है. यह भी हो सकता है कि भाजपा की तरफसे ऐसी कोशिशें हो रही हों. गौर कर सकते हैं कि इस बार की मुलाक़ात में कोई घोर समर्थक कलाकार नहीं दिखा. एक कंगना रनोट ही थीं,जो पूरी तरह से समर्थन में बोलती नज़र आती है. किसी भी आशंका या स्किम से परे हम तो यही उम्मीद करेंगे कि फ़िल्म बिरादरी गांधीवाद की फिल्मी अभिव्यक्ति को लेकर मुखर हो.
पहले प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू से लेकर नरेन्द्र मोदी तक सत्ता और फ़िल्म बिरादरी की नज़दीकियों को ध्यान से देखा जा सकता है. फिल्मों में नेहरू युग का व्यापक प्रभाव रहा है. खास कर राज कपूर की लोकप्रिय गिल्मों में...उस दौर के बाकी फिल्मकारों ने भी देश के नव निर्माण की कहानियां दिखाईं. सामंती सामजिक सोच और सरंचना को प्रेम के बहाने तोड़ा. आज़ादी के बाद के रूढ़ियों में जकड़े समाज में प्रेम बाद प्रतिरोध था. शास्त्री जी के आह्वान पर मनोज कुमार ने 'जय जवान,जय किसान' की थीम पर फ़िल्म बनाई और भारत कुमार के नाम से मशहूर हुए.
गांधीवाद पर फिल्में बनाने बेहतर है. विश्व शांति और भाईचारे के लिए यह ज़रूरी है. अभी तो 'राष्ट्रवाद के नवाचार' के फैशन में जबरदस्ती फिल्मों में नारेबाजी चल रही है. संकीर्णता और असहिष्णुता के प्रकोप में गांधीवाद से प्रेरित फ़िल्में विकल्प बन सकती है. दो-चार भी बन जाएं तो काफी है. राजकुमार हिरानी ने नामाकन पेश किया,जिसमें गांधी के विचारों के बीज शब्दों की बात की. पर्दे पर उन्हें लोकप्रिय सितारों ने पेश किया।

Tuesday, October 15, 2019

सिनेमालोक : मामी फिल्म फेस्टिवल


सिनेमालोक
मामी फिल्म फेस्टिवल
-अजय ब्रह्मात्मज  
मामी (मुंबई एकेडमी ऑफ मूवी इमेजेज) के नाम से मशहूर मुंबई का इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल पिछले 20 सालों में फिल्मों के चयन, प्रदर्शन और विमर्श से ऐसे मुकाम पर आ गया है कि देश भर के सिनेप्रेमी सात दिनों के लिए मुंबई पहुंचते हैं. देश में और भी इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल हैं. छोटे शहरों और कस्बों से लेकर मीडिया घरानों तक के अपने-अपने फेस्टिवल चल रहे हैं और कमाल है कि सभी इंटरनेशनल हैं. इनके आयोजन और लोकप्रियता से बढ़ती फिल्मों की समझदारी के बावजूद देश में ‘वॉर’ और ‘कबीर सिंह’ जैसी हिंदी फिल्में अपार कामयाबी हासिल कर लेती हैं.
पिछले सालों में देश-विदेश की बेहतरीन फिल्में देखने का सिलसिला बढ़ा है. लेकिन हम या तो विदेशियों को सिखा-बता रहे हैं या उनसे ही सीख-समझ रहे हैं. देश की भाषाओँ में बनी फिल्मों की हमें खास जानकारी नहीं रहती. मुझे लगता है कि फिलहाल देश में एक राष्ट्रीय यानि कि नेशनल फेस्टिवल की जरूरत है. सूचना प्रसारण मंत्रालय के अधीन कार्यरत फिल्म निदेशालय और एनएफडीसी पुणे स्थित राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार की मदद से पहल कर सकते हैं. हाल ही में चीन के फिंगयाओ इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में भारत के ‘नया सिनेमा’ पर केन्द्रित आयोजन हुआ. यहां दिखाई गई फिल्मों के साथ बड़े पैमाने पर भारतीय फिल्मों के फेस्टिवल आयोजित किए जा सकते हैं. सिनेमा की लोकप्रियता और स्वीकृति को देखते हुए जरूरी हो गया है.
मामी ने पिछले कुछ सालों में रूप और स्वरूप बदला है. अनुपमा चोपड़ा और किरण राव के आने के बाद पिछले पांच सालों में मुंबई की हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के  लोकप्रिय चेहरे इससे जुड़े. इनके जुड़ाव से आम युवा दर्शक फिल्म फेस्टिवल के प्रति आकर्षित हुआ है. इस पर बहस हो सकती है कि वर्तमान प्रबंधन समिति की कार्यशैली फेस्टिवल की प्रकृति के अनुकूल है या नहीं? मामी मेला और मास्टर क्लास में हिंदी और मुख्य भारतीय भाषाओं के परिचित चेहरों को बुलाने से उन्हें देखने-सुनने के लिए भीड़ उमड़ती है. उनमें से कुछ बेहतरीन फिल्मों के देखने के के साथ सुधि और सिद्ध दर्शकों में बदलते हैं. दर्शकों को जुटाने और उन्हें कलात्मक बेहतरीन फिल्मों के प्रति संवेदनशील बनाने का यह तरीका सही है.
पिछले रविवार को मुंबई के बालगंधर्व रंगमंदिर में आयोजित मूवीमेला एक आकर्षक आयोजन था. इस मेले के चार सेशन में दीपिका पादुकोण, राधिका मदान, मृणाल ठाकुर, अनन्या पांडे, जान्हवी कपूर, अविनाश तिवारी, श्रीराम राघवन, कोंकणा सेन शर्मा, अमर कौशिक, सिद्धार्थ आनंद, अमित शर्मा, मेघना गुलजार, आलिया भट्ट, करीना कपूर खान और करण जौहर शामिल हुए. आलिया भट्ट और करीना कपूर खान से करण जौहर ने सवाल किए. बाकी सभी सेशन अनुपमा चोपड़ा और राजीव मसंद ने संचालित किए. यह आयोजन दर्शकों को शहद चटाने की तरह था. मीठे आयोजन के बाद के सात दिनों के फेस्टिवल में हर विधा और रस की कलात्मक फिल्में दिखाई जाएंगी. पिछले 20 सालों में मैंने देखा है कि यह फेस्टिवल व्यवस्थित होने के साथ ही दर्शकों के अनुकूल हुआ है.
मामी समेत हमारे देश के अधिकांश फेस्टिवल सितंबर के बाद होते हैं. तब तक सनडांस, लोकार्नो, कान,बर्लिन.वेनिस,टोरंटो,बुशान,पेइचिंग आदि शहरों में फेस्टिवल हो चुके होते हैं. नतीजा यह होता है कि इन फेस्टिवल में दिखाई और चर्चित हो चुके फिल्में ही आ पाती हैं. हां, कभी-कभी कोई नई फिल्म वर्ल्ड प्रीमियर के लिए मिल जाती है, लेकिन अधिकांश फिल्में किसी और फेस्टिवल से होकर यहां पहुंचती हैं. फिर भी दर्शकों के लिए राहत और खुशी की बात होती है कि उन्हें चर्चित फिल्में मुंबई में देखने को मिल जाती हैं. मामी में भारत में बनी फिल्मों को भी प्रतिनिधित्व और पुँरास्कर मिलने लगा है. उत्सुकता और भागीदारी बढ़ी है. भारतीय कलाकारों और फिल्मकारों की निगाहें भी मामी पर टिकी रहती हैं.
लेकिन...मामी समेत तमाम भारतीय फिल्म फेस्टिवल में पिछले सालों में अंग्रेजी का बोलबाला बढ़ा है. सब कुछ अंग्रेजी में ही दिखाया-बताया जाता है. विडंबना यह है कि हिंदी फिल्मों में सक्रिय कलाकारों और फिल्मकारों की भी पहली भाषा अंग्रेजी हो चुकी है. भारत में आयोजित फिल्म फेस्टिवल भारत के गैरअंग्रेजी भाषी दर्शकों की बिल्कुल परवाह नहीं करते. हिंदीभाषी इलाकों में महत्वाकांक्षी कलाकारों और फिल्मकारों को लंबा संघर्ष करना पड़ता है. मालूम नहीं, कोलकाता और तिरुअनंतपुरम के फेस्टिवल में स्थानीय भाषाओं का प्रयोग किया जाता है या नहीं? मुंबई में तो सब कुछ अंग्रेजी में ही चल रहा है.
बहरहाल, मामी में इस साल 53 देशों की 49 भाषाओं में 190 फिल्में प्रदर्शित होंगी.


Tuesday, October 8, 2019

सिनेमालोक : अपने-अपने अमिताभ


सिनेमालोक
अपने-अपने अमिताभ 
पिछले 50 सालों में अमिताभ बच्चन ने ‘सात हिंदुस्तानी’(1969) से लेकर ‘बदला’(2019) तक के फिल्मी सफर में हर रंग,भाव,विधा और शैली की फिल्मों में काम किया है. ‘जंजीर’ से मिली एंग्री यंग मैन की छवि उनके साथ ऐसी चिपकी की उसने उनकी एक्टिंग के अन्य आयामों को धूमिल कर दिया. ‘एंग्री यंग मैन’ की छवि की फिल्मों को जबरदस्त लोकप्रियता मिली. उन्हें बार-बार देखा गया,उन लिखा गया. देश की सामाजिक और राजनीती हलचलों से जोड़ कर उन पर विमर्श हुआ. हिंदी फिल्मों के इतिहास का यह महत्वपूर्ण अध्याय है और उसके अमिताभ बच्चन नायक हैं. आने वाले सालों में भी उनकी चर्चा चलती रहेगी.
पिछले 50 वर्षों में अमिताभ बच्चन ने अनेक पीढ़ियों का मनोरंजन किया है. उन्हें प्रभावित किया है और अपना मुरीद बना दिया है. मंचों और टीवी शो में सबसे ज्यादा उनकी नकल की जाती है. आवाज को भारी कर उनके मशहूर संवाद बोलते ही हर प्रशंसक खुद में अमिताभ बच्चन को महसूस करता है...हें. वास्तव में यह एक महान अभिनेता के अभिनय की सरलता है कि कोई भी उसके नकल कर लेता है. अमिताभ बच्चन प्रशिक्षित अभिनेता नहीं है. उन्होंने स्कूल के दिनों में जितना थिएटर किया था, उतना अनगिनत लोग करते हैं. उल्लेखनीय है कि फिल्मों में आने का इरादा करने के बाद उन्होंने खुद को कैसे संवारा. आरंभिक नकार के बाद भी डटे रहे और फिर कुछ ऐसा संयोग बना कि वे सभी के चहेते बन गए. उनकी लोकप्रियता का यह आलम था कि पिछली सदी में उन्हें ‘वन मैन इंडस्ट्री’ और ‘मिलेनियम स्टार’ के खिताब दिए गए.
हर प्रशंसक और दर्शक के अपने अमिताभ हैं. उन्हें उनकी कुछ फिल्में ज्यादा पसंद हैं.देश के हर फिल्म प्रेमी दर्शक की पसंदीदा फिल्मों की फेहरिस्त दूसरों से अलग होगी. उनमें 8-10 फिल्मों की समानता मिल सकती है, लेकिन सुधि दर्शकों के फेहरिस्त अलहदा मिलती है. उनकी बातें करो तो वे अपने पसंद की फिल्मों की वजह बताने के साथ तारीफ करने लगते हैं. मेरे एक मित्र को अमिताभ बच्चन की ‘नमक हलाल’ सबसे ज्यादा पसंद है. कारण है फिल्म में एक के बाद एक हंसोड़ प्रसंगों का होना. अमिताभ बच्चन ने हरियाणवी अंदाज़ पकड़ते हुए ठेठ देसी मुहावरों का बेहद प्रभावशाली इस्तेमाल किया है. सहर आये एक गंवाई की नैतिकता उसे ऊंचा स्थान दे जाती है. अमिताभ बच्चन कॉमिकल फिल्मों में अपने खिलंदड़े अंदाज से खूब गुदगुदी लगाते हैं. वास्तव में हिंदी पर उनकी पकड़ से यह संभव हुआ है. वह लहजे की लोच,ठहराव और बारीकियों को समझते हैं और हर शब्द को उसके अर्थ के साथ ध्वनित करते हैं.
अगली छुट्टियों में मौका निकाल कर आप हृषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में आए उनकी फिल्मों को किसी भी क्रम में देख लें. उन फिल्मों में एक अलग अमिताभ बच्चन मिलते हैं. ‘आनंद’, ‘नमक हराम’,’मिली’,’अभिमान’,’चुपके चुपके’,’बेमिसाल’ और ‘जुर्माना’ में उनके अभिनय के विविध आयामों को देखा और समझा जा सकता है. प्रकाश मेहरा और मनमोहन देसाई की तरह हृषिकेश मुखर्जी ने उनकी छवि को बार-बार नहीं भुनाया. वे अपनी हर फिल्म में उन्हें एक अलग अंदाज में पेश करते रहे. कुछ पाठक चौंक सकते हैं कि अमिताभ बच्चन ने सबसे ज्यादा फिल्में हृषिकेश मुखर्जी के साथ की हैं. हम इस धारणा में रहते हैं कि यह श्रेय प्रकाश महरा और मनमोहन देसी को जाता है.
उम्र के इस पड़ाव पर भी वे सक्रिय हैं और सचेत तरीके से फिल्मों का चुनाव कर रहे हैं. पिछले डेढ़ दशकों में उन्होंने ज्यादातर युवा और नए निर्देशकों के साथ ही काम किया है. उनकी सक्रियता और स्वीकृति का ही नतीजा है कि उनकी उम्र और शैली के अनुसार भूमिकाएं लिखी जा रही हैं. वे हर फिल्म में एक नया जादू बिखेर देते हैं. ‘कौन बनेगा करोड़पति’ में उनके ओजस्विता,विनम्रता और मृदुलता देखते ही बनती है. उनके आलोचक इसे उनकी एक्टिंग कहते हैं, लेकिन यह सहजता अभिनय में आसानी से नहीं आती. उनके करीबी बताते हैं बताते हैं कि वे अनुशासित तरीके से हर नए प्रोजेक्ट में संलग्न होते हैं. आज के युवा कलाकार को उनकी लगन और तत्परता देख कर चकित रहते हैं.



Thursday, October 3, 2019

सिनेमालोक : कुछ फिल्में गांधी की


सिनेमालोक 
कुछ फिल्में गांधी की 
-अजय ब्रह्मात्मज 
भक्त विदुर (1921) - निर्देशक कांजीलाल राठौड़ ने कोहिनूर फिल्म कंपनी के लिए 'भक्त विदुर' का निर्देशन किया था. फिल्म के निर्माता द्वारकादास संपत और माणिक लाल पटेल थे. दोनों ने फिल्म में क्रमशः विदुर और कृष्ण की भूमिकाएं निभाई थीं. इस फिल्म में विदुर ने गांधी टोपी और खद्दर धारण किया था. यह मूक फ़िल्म दर्शकों को भा गई थी. इतनी भीड़ उमड़ी थी कि पुलिस को लाठीचार्ज भी करना पड़ा. इस फिल्म को ब्रिटिश सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया था. आदेश में लिखा था, 'हमें पता है कि आप क्या कर रहे हैं? यह विदुर नहीं है, यह गांधी है और हम इसकी अनुमति नहीं देंगे.' 'भक्त विदुर' भारत की पहली प्रतिबंधित फ़िल्म थी.
महात्मा गांधी टॉक्स(1931) – अमेरिका की फॉक्स मूवीटोन कंपनी ने गांधी जी से बातचीत रिकॉर्ड की थी. इसके लिए वे बोरसाद गांव गए थे. गांधी जी की आधुनिक तकनीकी चीजों में कम रूचि थी, फिर भी उन्होंने इसे रिकॉर्ड की अनुमति दी. वैसे उन्होंने कहा भी कि ‘मैं ऐसी चीजें पसंद नहीं करता, लेकिन मैंने खुद को समझा लिया है.
महात्मा गांधी 20 वीं सदी का मसीहा(1937) - एक के चेट्टियार ने गांधी जी पर डॉक्यूमेंट्री का निर्माण किया था. इस डॉक्यूमेंट्री में तमिलनाडु के तिरुपुर में सूत कातती 200 महिलाएं नजर आती हैं. पीछे से कर्नाटक के गायक डीके पटेल की आवाज में आडू राति(चरखे को चलने दो) गीत सुनाई पड़ता है. तमिल में बनी इस फिल्म को बाद में तेलुगू और हिंदी में भी डब किया गया. कुल 50000 फीट के फुटेज को एडिट कर 12000 फीट की फिल्म बनी थी.
महात्मा/धर्मात्मा(1935) - वी शांताराम निर्देशित यह फिर मराठी और हिंदी में प्रदर्शित हुई थी. इसमें बालगंधर्व ने अभिनय किया था. संत तुकाराम के जीवन पर आधारित इस फिल्म का शीर्षक अधिकारियों को गांधीजी के संबोधन से मिलता-जुलता लगा था.इसलिए विशेष आदेश देकर फिल्म का शीर्षक बदला गया. वी. शांताराम ने फिर ‘धर्मात्मा’ शीर्षक से इसे रिलीज किया.
गांधी(1982) - रिचर्ड एटनबरो की ‘गांधी’ महात्मा गांधी के जीवन पर सर्वाधिक चर्चित और देखि गयी फिल्म है. भारत सरकार के सहयोग से निर्मित इस फिल्म को देश-विदेश में प्रशंसा मिली. महात्मा गांधी के सत्य और अहिंसा के प्रयोगों को समेटती यह फिल्म  स्वतात्न्त्रता आन्दोलन की भी झलक देती है. शीर्षक चरित्र महात्मा गांधी इस आंदोलन के प्रभावी नेता के रूप में दिखते हैं. गांधी के व्यक्तित्व-कृतित्व को समझने के लिए यह बेहतरीन फिल्म है. इसमें गांधी की भूमिका गुजराती मूल के बेन किंग्सले ने निभाई थी. इसे ऑस्कर के कई पुरस्कार मिले थे.
द मेकिंग ऑफ महात्मा(1996) - निर्देशक श्याम बेनेगल की ‘द मेकिंग ऑफ महात्मा’ गांधी के महात्मा बनने की कहानी है. दक्षिण अफ्रीका में गांधी के 20 वर्षों के प्रवास और अनुभवों को समेटती यह फिल्म बताती है कि कैसे एक महत्वाकांक्षी बैरिस्टर ने ज़ुल्म और शोषण के खिलाफ आवाज उठाई और महसूस किया कि उन्हें भारत में आकर देश के आजादी के लिए काम करना चाहिए. दक्षिण अफ्रीका में ही गांधीवादी मूल्यों और सिद्धांतों के बीज पड़े थे. युवा गांधी की भूमिका राजित कपूर ने निभाई थी.
गांधी माय फादर(2017) - फिरोज फिरोज खान निर्देशित ‘गांधी माय फादर’ गांधी और उनके बेटे हरिलाल के तनावपूर्ण संबंध की कहानी है. इस फिल्म में हम देखते हैं कि देश की आजादी के आंदोलन का नेतृत्व कर रहा शखस  अपने सिद्धांतों और मूल्यों की वजह से गलतफहमी का शिकार होता है. ऐसा लगता है कि गांधी हरिलाल के लिए आदर्श पिता नहीं थे..  पारिवारिक द्वंद्व में फंसे गांधी का मानवीय पहलू नज़र आता है. जहाँ वे एक कमज़ोर,विवश और लाचार पिता के रूप में दिखते हैं.
इन सभी फिल्मों के अलावा कुछ ऐसी भी फिल्में हैं, जिनमें फोकस गांधी पर नहीं है, वे इन फिल्मों में सहयोगी और खास चरित्र के रूप में दिखते हैं. ‘द लीजेंड ऑफ भगत सिंह’, ‘डॉ बाबासाहेब आंबेडकर’, ‘सरदार’, ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस – द फॉरगोटन हीरो’ और वीर सावरकर जैसी फिल्मों में हम उन्हें एक अलग छवि में देखते हैं. इन फिल्मों के लेखको और निर्देशकों ने गांधी से संबंधित पॉपुलर शिकायतों का इस्तेमाल किया है. ‘मैंने गांधी को नहीं मारा’, ‘लगे रहो मुन्ना भाई’, ‘रोड टू संगम’ और ‘गांधी टू हिटलर’ में गांधी के आदर्शों और प्रयोगों का प्रासंगिक उपयोग हुआ है.
महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के मौके पर आप इन फिल्मों को खोज कर देख सके तो फिल्मों के माध्यम से उन्हें अच्छी तरह समझ सकेंगे.


Thursday, September 26, 2019

सिनेमालोक : क्या ‘गली ब्वॉय’ से ऑस्कर में ‘अपना टाइम आएगा’?

सिनेमालोक 
क्या ‘गली ब्वॉय’ से ऑस्कर में ‘अपना टाइम आएगा’? 
-अजय ब्रह्मात्मज 
ऑस्कर के लिए ‘गली ब्वॉय’ भेजने की घोषणा हो चुकी है. 92 वे ऑस्कर के लिए हुई इस घोषणा से निर्देशक जोया अख्तर और फिल्म के मुख्य कलाकार रणवीर सिंह व् आलिया भट्ट बेहद उत्साहित हैं. रणवीर सिंह बता रहे हैं कि वह हिंदी फिल्मों का झंडा बुलंद किए रहेंगे. आलिया भट्ट को उम्मीद है कि बर्लिन फिल्म फेस्टिवल से आरंभ हुई ‘गली ब्वॉय’ की यात्रा ऑस्कर के मुकाम तक पहुंचेगी. इसे इंटरनेशनल दर्शकों की सराहना मिल रही है. फिल्म यूनिट के सांग कुछ और उत्साही भी मान रहे हैं कि ‘गली ब्वॉय’ से ऑस्कर में ‘अपना टाइम आएगा’.
सच कहूं तो ‘गली ब्वॉय’ नामांकन तक भी पहुंच पाए तो काफी होगा. इस तरह यह ‘मदर इंडिया’(1958), सलाम बॉम्बे’(1989) और ‘लगान’(2001) के बाद पुरस्कार के लिए नामांकित भारत की चौथी फिल्म हो जाएगी. फिलहाल मुझे इसकी भी संभावना कम लगती है. ना तो मैं निराशावादी हूं और ना ही मुझे ‘गली ब्वॉय’ की गुणवत्ता पर शक है. यह भारितीय शैली की फिल्म है. मेरी राय में फिल्मों की श्रेष्ठता और गुणवत्ता का ऑस्कर मापदंड अलग है. भारत की फिल्में उस मापदंड पर खरी नहीं उतरातीं. यही कारण है कि साल दर साल की कोशिशों के बावजूद कोई भी ऑस्कर पुरस्कार भारत नहीं पहुंचा है. अभी तक कोई भी फिल्म इस योग्य नहीं मानी गई है. हां, निजी तौर पर कुछ प्रतिभाएं जरूर पुरस्कृत हुई है.
इस साल ऑस्कर में भेजने के लिए 28 फिल्मों पर विचार किया गया. निर्देशक अपर्णा सेन की अध्यक्षता में गठित समिति ने ‘गली ब्वॉय’ को भेजने के योग्य समझा. जिनकी फिल्म नहीं चुनी गई है, उन्हें शिकायत हो सकती है. ऐसे फैसलों से सभी खुश नहीं होते. असली कवायद घोषणा के बाद शुरू होती है. ऑस्कर की होड़ में कई औपचारिकताएं पूरी करनी होती हैं. निर्णायक मंडल के सदस्य फिल्म देखें, इसके लिए जबरदस्त लॉबिंग की जाती है. इस प्रक्रिया में पैसे खर्च होते हैं. फिल्म का निर्माता समर्थ हुआ तो ठीक है. अन्यथा चंदा बटोरने का काम शुरू होता है. कई बार ऐसा लगता है कि इस कोशिश में सभी की ऊर्जा व्यर्थ खर्च होती है और शून्य नतीजा रहता है. हम ना जाने क्यों ऑस्कर ग्रंथि से नहीं निकल पा रहे हैं? वास्तव में हमें ऑस्कर की परवाह नहीं करनी चाहिए. हम अपनी फिल्मों की सामान्य गुणवत्ता में सुधार करें और उन्हें अन्य उपलब्ध प्लेटफार्म के जरिए विदेशी दर्शकों तक पहुंचाएं. यह हो भी रहा है. आप गौर करें तो पाएंगे कि पिछले 10 सालों में इंटरनेशनल मंच पर भारतीय फिल्मों की मौजूदगी  बढ़ी है.
सोशल मीडिया का विचरण करने पर एस लगता है कि एक जमात की राय में यह फिल्म भी मुंबई के ‘स्लम’ पर केंद्रित होने की वजह से ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ की तरह जूरी का ध्यान खींचेगी. देश में एक तबका यही मानता रहा है कि भारत की गरीबी, बदहाली और दुर्दशा पर बनी फिल्में विदेशी निर्णायकों को अच्छी लगती हैं. यह विदेशियों की ग्रंथि हो सकती है. हमारे लिए यह गौरव की बात नहीं है कि हम अपनी फटेहाली के प्रदर्शन से ताली की उम्मीद करें. भारतीय समाज के यथार्थ को दर्शाती फिल्मों का अपना एक महत्व है. ऐसी फिल्में बनती रहनी चाहिए, लेकिन उन्हें दिखा कर वाहवाही की उम्मीद करने के पीछे कोई तुक नहीं है.
बतौर दर्शक हम अच्छी फिल्मों का समर्थन करें. देश के अंदर होने वाले अवार्ड में ऐसी फिल्मों को प्रतिष्ठा मिले. एक जागृति फैले तो धीरे-धीरे बेहतरीन फिल्मों की संख्या बढ़ेगी. हमें अपनी फिल्मों की शैली और परंपरा का निर्वाह  करते हुए ही फिल्मों के विकास व विस्तार पर ध्यान देना चाहिए. पिछले दो दशकों में आये युवा फिल्मकार विदेशी निर्देशकों से कुछ ज्यादा ही प्रभावित हैं. वे उनकी फिल्म की नकल में अपने कथ्य को भी बिगाड़ देते हैं. हमें जरूरत है कि हम देश के श्रेष्ठ फिल्मकारों की फिल्मों के गुणों को अपनाएं और उन्हें 21वीं सदी के अनुरूप बनाएं. भारतीय फिल्मों की खास शैली बनी रहे. देश के दर्शकों का मनोरंजन और संवर्धन हो. हम ऑस्कर की फिक्र में क्यों दुबले हों या उछलने लगें?

Tuesday, September 17, 2019

सिनेमालोक : थिएटर से आए एक्टर


सिनेमालोक
थिएटर से आए एक्टर
पारसी थियेटर के दिनों से फिल्मों में थिएटर से एक्टर आते रहे हैं. आज भी एनएसडी, बीएनए और अन्य नाट्य संस्थाओं और समूहों से एक्टरों की जमात आती रहती है. ड्रामा और थिएटर किसी भी एक्टर के लिए बेहतरीन ट्रेनिंग ग्राउंड हैं. ये कलाकारों को हर लिहाज से अभिनय के लिए तैयार करते हैं. थिएटर के  प्रशिक्षण और अभ्यास से एक्टिंग की बारीकियां समझ में आती हैं. हम देख रहे हैं कि हिंदी फिल्मों में थिएटर से आये एक्टर टिके हुए हैं. वे लंबी पारियां खेल रहे हैं. लोकप्रिय स्टारों को भी अपने कैरियर में थिएटर से आये एक्टर की सोहबत करनी पड़ती है. लॉन्चिंग से पहले थिएटर एक्टर ही  स्टारकिड को सिखाते, दिखाते और पढ़ाते हैं,
आमिर खान चाहते थे कि उनके भांजे इमरान खान फिल्मों की शूटिंग आरंभ करने से पहले रंगकर्मियों के साथ कुछ समय बिताएं. वे चाहते थे कि लखनऊ के राज बिसारिया की टीम के साथ वे कुछ समय रहें और उनकी टीम के साथ आम रंगकर्मी का जीवन जियें. फिल्मों में आ जाने के बाद किसी भी कलाकार/स्टार के लिए साधारण जीवन और नियमित प्रशिक्षण मुश्किल हो जाता है. अपनी बातचीत में आमिर खान ने हमेशा ही अफसोस जाहिर किया है कि अपनी लोकप्रियता की वजह से वह देश के विभिन्न शहरों के रंगकर्मियों और संस्कृतिकर्मियों के साथ बेहिचक समय नहीं बिता पाते. उनके पास साधन और सुविधाएं हैं, इसलिए अपनी हर फिल्म की खास तैयारी करते हुए वे संबंधित प्रशिक्षकों को मुंबई बुला लेते हैं. उनके साथ समय बिताते हैं. आमिर को कभी रंगमंच में विधिवत सक्रिय होने का मौका नहीं मिला, लेकिन उन्होंने कोशिश जरूर की थी.
एक्टर होने का मतलब सिर्फ नाचना, गाना और एक्शन करना नहीं होता, फिल्मों में एक्टर के परीक्षा उन दृश्यों में होती है, जब वे अन्य पात्रों के साथ दृश्य का हिस्सा होते हैं, क्लोजअप और मोनोलॉग में हाव-भाव और संवाद के बीच सामंजस्य और संतुलन बिठाने में उनके प्रतिभा की झलक मिलती है, पिछले 10-20 सालों की फिल्मों पर गौर करें तो पाएंगे कि फिल्मों में थिएटर से आये एक्टरों की आमद बढ़ी है. पारसी थियेटर,इप्टा,एनएसडी,एक्ट वन, अस्मिता और दूसरे छोटे -बड़े थिएटर ग्रुप से एक्टर फिल्मों में आते रहे हैं. पृथ्वीराज कपूर, बलराज साहनी, ओम शिवपुरी, प्यारे मोहन सहाय, मनोहर सिंह, सुरेखा सीकरी, अनुपम खेर,परेश रावल, नीना गुप्ता, ओम पुरी, इरफान, मनोज बाजपेयी, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, रघुवीर यादव और राजपाल यादव जैसे कलाकारों की लम्बी फेहरिश्त तैयार की जा सकती है. इन सभी की मौजूदगी ने गहरा प्रभाव डाला है.
21वीं सदी में फिल्मों का अभिनय बिल्कुल बदल चुका है. अब स्टाइल से अधिक जोर नेचुरल होने पर दिया जा रहा है. कलाकारों के ऑर्गेनिक एक्सप्रेशन की मांग बढ़ रही है. निर्देशक थिएटर से आए एक्टर से अपेक्षा करते हैं कि वे कुछ नया करेंगे. उनकी वजह से फिल्मों में जान आ जाती है. एक थिएटर एक्टर ने बहुत पहले बताया था कि उनके जैसे एक्टर ही किसी फिल्म के स्तंभ होते हैं. स्टार तो दमकते कंगूरे होते हैं. फिल्में उन पर नहीं टिकी रहती है, लेकिन चमक-दमक के कारण वे ही दर्शकों की निगाह में रहते हैं. फिल्मों की सराहना और समीक्षा में सहयोगी कलाकारों के योगदान पर अधिक बल और ध्यान नहीं दिया जाता. सच्चाई तो यह है कि सहयोगी भूमिकाओं में सक्षम कलाकार हों तो फिल्म के हीरो/स्टार को बड़ा सहारा मिल जाता है. सहयोगी कलाकारों का सदुपयोग करने में आमिर खान सबसे होशियार हैं. ‘लगान’ के बाद उनकी हर फिल्म में सहयोगी कलाकारों की खास भूमिका रही है.
थिएटर से आये एक्टर ने हिंदी फिल्मों की एक्टिंग बदल दि है. यकीन ना हो तो कुछ दशक पहले की फिल्में देखें और अभी की फिल्में देखें. तुलना करने पर आप पाएंगे कि थिएटर एक्टरों के संसर्ग में आने के बाद मेनस्ट्रीम फिल्मों के स्टार की शैली और अभिव्यक्ति में गुणात्मक बदलाव आ जाता है. इसके अलावा एक और बात है. आम पाठक और दर्शक नहीं जानते होंगे कि किसी भी नए कलाकार/स्टारकिड की ट्रेनिंग के लिए थिएटर से आये एक्टर को ही हायर किया जाता है. शूटिंग आरंभ होने से पहले वे इन्हें प्रशिक्षित करते हैं. संवाद अदायगी से लेकर विभिन्न इमोशन के एक्सप्रेशन के गुर सिखाते हैं. वे उनकी प्रतिभा सींचते और निखारते हैं.


संडे नवजीवन : हिंदी दर्शक.साहो और प्रभास


संडे नवजीवन
हिंदी दर्शक.साहो और प्रभास
-अजय ब्रह्मात्मज
एस राजामौली की फिल्म बाहुबली से विख्यात हुए प्रभास की ताजा फिल्म साहो’  को दर्शकों-समीक्षकों की मिश्रित प्रतिक्रिया मिली है. यह फिल्म अधिकांश समीक्षकों को पसंद नहीं आई, लेकिन फिल्म ने पहले वीकेंड में 79 करोड़ से अधिक का कलेक्शन कर जता दिया है कि दर्शकों की राय समीक्षकों से थोड़ी अलग है. ‘साहो’ का हिंदी संस्करण उत्तर भारत के हिंदी दर्शकों के बीच लोकप्रिय हुआ है. अगर यह फिल्म तेलुगू मलयालम और तमिल में नहीं होती. पूरे भारत में सिर्फ हिंदी में रिलीज हुई होती तो वीकेंड कलेक्शन 100 करोड़ से अधिक हो गया होता. वैसे तेलुगू,हिंदी,तमिल और मलयालम का कुल कलेक्शन मिला दें तो फिल्म की कमाई संतोषजनक कही जा सकती है.
बाहुबली के बाद प्रभास देश भर के परिचित स्टार हो गए. फिर साहो’ की घोषणा हुई और एक साथ चार भाषाओं में इसके निर्माण की योजना बनी. तभी से दर्शकों का उत्साह नजर आने लगा था. इस फिल्म के निर्माण के पीछे एक अघोषित मकसद यह भी रहा कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में प्रभास के प्रयाण को सुगम बनाया जाए. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से जैकी श्रॉफ और श्रद्धा कपूर को इसी उद्देश्य से फिल्म में जोड़ा गया. बड़े पैमाने पर बन रही इस फिल्म के एक्शन की चर्चा पहले से आरंभ हो गई थी. रिलीज के समय प्रभास और श्रद्धा कपूर की रोमांटिक छवि आई तो कन्फ्यूजन हो गया. खुद प्रभास ने भी रिलीज के समय प्रमोशन के दौरान लगातार इसकी लागत और एक्शन पर हुए खर्च की बात की. सभी दर्शक जानते हैं कि 350 करोड़ की लागत से बनी इस फिल्म में 150 करोड़ तो सिर्फ एक्शन पर खर्च हुआ है. यह अलग मुद्दा है कि क्या अधिक लागत से फिल्म बेहतरीन हो जाती है?
दर्शकों को यही भ्रम होगा कि ‘साहो’ की लागत 350 करोड़ है. किसी भी इंटरव्यू में न तो प्रभास ने बताया और ना ही किसी पत्रकार ने स्पष्ट किया कि 350 करोड़ में चार भाषाओं में यह फिल्म बनी है. इस हिसाब से प्रति फिल्म लागत 87.5 करोड़ ठहरती है. आजकल थोड़ी बड़ी फिल्म के लिए इतनी लागत तो आम बात है. बहरहाल, 350 करोड़ की लागत से बनी यह फिल्म प्रभास की ‘बाहुबली’ की लोकप्रियता का सहारा लेकर रिलीज की गई. दर्शकों को ‘बाहुबली 1-2’ के प्रभास याद रहे. उन्होंने इस फिल्म के हिंदी संस्करण को समर्थन दिया. हिंदी में यह फिल्म मेट्रो शहरों और मल्टीप्लेक्स से अधिक छोटे शहरों और सिंगल स्क्रीन में चल रही है. इसके बावजूद यह नहीं कहा जा सकता कि हिंदी फिल्मों इन्दुस्त्र खुली बाँहों से प्रभास का स्वागत करने के लिए तैयार है.
बहुत पीछे ना जाएँ तो भी याद कर लें कि तेलुगू फिल्म इंडस्ट्री से चिरंजीवी, नागार्जुन और पवन कल्याण ने हिंदी फिल्मों में पहले दस्तक दी है. इनमें चिरंजीवी और नागार्जुन की खास पहचान भी बनी है, लेकिन इनमें से कोई अभी तक हिंदी दर्शकों के बीच तमिल फिल्म इंडस्ट्री के स्टार रजनीकांत और कमल हसन जैसी ऊंची लोकप्रियता नहीं छू सका. बाद में रामचरण और राना डग्गुबाती भी हिंदी फिल्मों में आए. तेलुगू समेत सभी दक्षिण भारतीय भाषाओं के फेमस कलाकार अपनी लोकप्रियता और प्रतिष्ठा के विस्तार के लिए हिंदी फिल्मों में कदम रखते हैं. इससे उन्हें अखिल भारतीय पहचान मिलती है. उम्मीद थी कि प्रभास के आगमन की धमक हिंदी फिल्म इंडस्ट्री महसूस करेगी, लेकिन ऐसा कोई हंगामा नहीं हुआ. फिल्म की रिलीज से पहले या बाद में प्रभास की किसी हिंदी फिल्म की घोषणा नहीं हुई है. ‘साहो’ से उनकी लोकप्रियता में कोई खास इजाफा भी नहीं हो सका. ‘बाहुबली’ से मिली पहचान ही बनी हुई है.
वास्तव में ‘बाहुबली’ के पहले प्रभास को बड़ी कामयाबी नहीं मिली थी. सन 2002 में वह ‘ईश्वर’ में दिखे थे, लेकिन उस फिल्म पर किसी का ध्यान नहीं दिया था. तीसरी फिल्म ‘वर्षम’ से उन्हें थोड़ी पहचान मिली. इस फिल्म से ‘बाहुबली’ तक के सफर में प्रभास की सफलता का अनुपात कम ही रहा है. उनकी एक फिल्म हिट हो जाती थी और फिर अगली हिट के पहले तीन-चार फिल्में फ्लॉप हो जाती थीं. हां, एक अच्छी बात रही कि उनकी हिट फिल्मों ने हमेशा नए रिकॉर्ड बनाए. तेलुगू के मशहूर डायरेक्टर एस राजामौली और पूरी जगन्नाथ के साथ कुछ फिल्मों में उन्हें बड़ी कामयाबी मिली. उन्हीं दिनों उनकी फिल्म ‘डार्लिंग’ आई थी. इस फिल्म में उनका किरदार दर्शकों को इतना पसंद आया कि उन्होंने प्रभास को ‘डार्लिंग स्टार’ का नाम दे दिया. तेलुगू फिल्म इंडस्ट्री में लोकप्रिय मेल स्टारों को ‘मेगा पावर स्टार’,’स्टाइलिश स्टार’ और ‘पॉवर स्टार’ जैसे नाम मिले हैं. प्रभास को ‘डार्लिंग स्टार’ के नाम से लोग जानते हैं.
कह सकते हैं कि 10 जुलाई 2015 से प्रभास की जिंदगी और फिल्म कैरियर में बड़ा बदलाव आया. ‘बाहुबली - द बिगिनिंग’ रिलीज़ हुई और प्रभास की राष्ट्रीय पहचान की शुरुआत हुई. इस फिल्म ने प्रभास के धैर्य और त्याग की भी परीक्षा ली थी. एस राजामौली ने उन्हें निर्देश दिया था कि ‘बाहुबली’ के दोनों भाग प्रदर्शित होने तक वे कोई और फिल्म नहीं करेंगे और ना श्री व् लुक में कोई बदलाव करेंगे. इन दोनों फिल्मों के निर्माण में 5 साल लगे. फिल्म इंडस्ट्री में जहां हर शुक्रवार को स्टार के भाग्य और भविष्य बदल जाते हैं, वहां प्रभास ने 5 सालों का समय सिर्फ एक फिल्म के लिए समर्पित कर दिया था. इस समर्पण का उन्हें भरपूर लाभ मिला. वह राष्ट्रीय पहचान के साथ उभरे. याद करें तो ‘साहो’ की घोषणा के समय से ही हिंदी के दर्शकों के बीच उनके प्रयास और अवतार को देखने इंतजार बढ गया था.
‘साहो’ के प्रमोशन के दौरान प्रभास ने संकेत तो दिया था कि मुंबई के दो-तीन निर्माताओं के साथ हिंदी फिल्मों के लिए बातें चल रही हैं,लेकिन निर्माताओं या फिल्मों के नाम नहीं बताये थे. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का अनोखा रिवाज है. किसी बड़ी संभावना की भनक लगते ही निर्माता नए सितारों से मिलने-मिलाने लगते हैं. उनसे नए प्रोजेक्ट की सहमति ले लेते हैं. उन्हें एडवांस और साइनिंग के तौर पर एक राशि भी दे दी जाती है. संभावना को सफलता मिली तो सब कुछ आरंभ हो जाता है, अन्यथा निर्माता पुरानी संभावना को भूल जाते हैं. अभी तक तो प्रभास की किसी फिल्म की अधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन ट्रेड विशेषज्ञ बताते हैं कि हिंदी या तेलुगू फिल्म का कोई निर्माता द्विभाषी पर विचार कर सकता है. ‘सहो’ का ही सन्दर्भ लें तो यह फिल्म हिंदी से बेहतर कमाई तेलुगू में कर रही है. दो भाषाओं के दर्शकों के बीच लोकप्रिय स्टार पर कोई भी निर्माता दांव लगाने को तैयार हो जायेगा.
‘बाहुबली’ में प्रभास के हिंदी संवाद शरद केलकर ने डब की थी. ‘साहो’ में उन्होंने अपने संवाद खुद बोले. उनकी हिंदी में तेलुगू का लहजा है.. जैसे कमल हसन की हिंदी में तमिल का लहजा रहता है. दर्शकों को इससे अधिक फर्क नहीं पड़ता बशर्ते उनका मनोरंजन हो रहा हो. प्रभास ने ‘साहो’ में सही उच्चारण के साथ हिंदी बोलने के लिए डायलॉग कोच भी रखा था. कमाल अहमद ने उनकी मदद की थी. अब यह देखना रोचक होगा कि हिंदी फिल्मों के उभरते लोकप्रिय सितारों के बीच प्रभाव हिंदी फिल्मों के आकाश में कैसे अपनी जगह बना पाते हैं?


Tuesday, September 10, 2019

सिनेमालोक : करण देओल की लॉचिंग


सिनेमालोक
करण देओल की लॉचिंग
-अजय ब्रह्मात्मज
अगले हफ्ते सनी देओल के बेटे और धर्मेंद्र के पोते करण देओल की पहली फिल्म ‘पल पल दिल के पास’ रिलीज होगी. इसका निर्माण और निर्देशन खुद सनी देओल ने किया है. शुरू में खबर आई थी कि इम्तियाज अली या राहुल रवैल इस फिल्म का निर्देशन करेंगे, लेकिन सनी देओल ने बेटे की लॉचिंग की कमान किसी और को नहीं सौंपी. जब उनसे पूछा गया कि किसी और को निर्देशन की जिम्मेदारी क्यों नहीं दी तो उनका जवाब था कि मैं खुद निर्देशक हूं. सच्ची, इस तथ्य से कौन इंकार कर सकता है, लेकिन यह बात तो जहन में आती है कि सनी देओल निर्देशित फिल्मों का क्या हश्र हु? पुत्रमोह में सब कुछ अपनी मुट्ठी में रखना हो तो कोई भी कारण, प्रश्न या तर्क समझ में नहीं आएगा,
इस फिल्म के ट्रेलर और गानों से यह एहसास तो हो रहा है कि ‘पल पल दिल के पास’ खूबसूरत लोकेशन पर बनी फिल्म है’ इस फिल्म की शूटिंग के लिए पूरी यूनिट ने दुर्गम घाटियों की चढ़ाई की. करण देवल और सहर बांबा ने मुश्किल स्टंट किए. फिल्म एक्शन और रोमांस से भरपूर है. कोशिश है कि दादा धर्मेंद्र और पिता सनी देओल की अभिनय छटा और छवि के साथ करण देओल को पेश किया जाए. सनी देओल ने नयनाभिरामी लोकेशन के साथ दिल दहला देने वाले एक्शन को जोड़ा है. यह फिल्म दादा-पिता के भाव और अंदाज को साथ लेकर चलती है. ट्रेलर में ही दिख रहा है कि करण देओल को भी पिता की तरह चीखने के दृश्य दिए गए हैं. फिलहाल ढाई किलो का मुक्का तो नहीं दिख रहा है,लेकिन मुक्का  है और उसकी गूंज भी सुनाई पड़ती है.
‘पल पल दिल के पास’ टाइटल धर्मेंद्र की फिल्म ‘ब्लैकमेल’ के गीत से लिया गया है’ इस गीत में राखी और धर्मेंद्र के रोमांटिक खयालों के दृश्य में अद्भुत आकर्षण है’ पहाड़ी लोकेशन पर शूट किए गए इस गीत में धर्मेंद्र के प्यार को शब्द दिए गए हैं. उसी रोमांस को दोहराने और धर्मेंद्र के साथ जोड़ने के लिए फिल्म का टाइटल चुना गया. इस फिल्म का नाम सुनते ही धर्मेंद्र का ध्यान आता है. उनके साथ करण देओल का रिश्ता उनकी लोकप्रियता को ताजा कर देता है. सनी देओल ने सोच-समझकर ही यह रोमांटिक टाइटल चुना है. वे अपने पिता से मिली विरासत से बेटे को रुपहले पर्दे पर जोड़ रहे हैं. करण देओल के प्रति जो भी उत्साह बनाया वह सिर्फ और सिर्फ धर्मेंद्र और सनी देओल की वजह से है. रिलीज होने के बाद पता चलेगा कि यह फिल्म दर्शकों के दिल के पास टिकती है या नहीं?
हिंदी फिल्मों में नेपोटिज्म की चर्चा जोरों पर है. यही सच्चाई है कि स्टार और डायरेक्टर अपने बच्चों के लिए प्लेटफार्म बनाते रहेंगे. सामंती समाज के हिंदी दर्शक दादा और पिता से बेटे को सहज ही जोड़ लेते हैं. हिंदी फिल्मों में आए और आ रहे आउटसाइडर ईर्ष्या करते रहें और भिन्नाते रहें. नेपोटिज्म का सिलसिला चलता रहेगा. आने वाले सालों में और भी स्टारकिड लॉन्च किए जाएंगे. उनकी लॉचिंग को वाजिब ठहराने की कोशिश भी की जाएगी. इस सिलसिले और तरकीब के बावजूद हमें या नहीं भूलना चाहिए कि दर्शक आखिरकार खुद फैसला लेते हैं और चुनते हैं. उन्होंने सनी देओल को प्यार दिया लेकिन बॉबी देओल को भूल गए. कपूर खानदान और सलमान खान के परिवार में भी हम इसके उदाहरण देख सकते हैं. प्रचार के बाद भी चलता वही है जिसमें सार हो. दर्शक थोथी प्रतिभाओं को उड़ा देते हैं.
‘पल पल दिल के पास’ में सनी देओल ने और भी पुरानी तरकीब इस्तेमाल की है. गौर किया होगा कि फिल्म के मुख्य किरदारों के नाम करण और सहर ही हैं. उनके सरनेम भले ही सिंह और सेठी कर दिए गए हों. ‘बेताब’ में सनी देओल का नाम सनी ही रखा गया था. किरदार को कलाकार का नाम देने के पीछे यही यत्न रहता है कि नए कलाकार का नाम दर्शकों को बार-बार सुनाया और बताया जाए. करण देओल और सहर बांबा अभी पूरे आत्मविश्वास में नहीं दिख रहे हैं. विभिन्न चैनलों पर आये इंटरव्यू में वे दोनों सनी देओल के साथ ही दिखे. हर इंटरव्यू में सनी देओल ही बोलते रहे. करण देओल ने कम बातें कीं और सहर बांबा ने तो और भी कम. ना तो पत्रकारों के पास करण देओल के लिए नए सवाल थे और न करण के जवाबों में कोई नवीनता सुनाई पड़ी.
अब देखना है कि अगले हफ्ते दर्शक क्या फैसला सुना रहे हैं?


Tuesday, September 3, 2019

सिनेमालोक : लागत और कमाई की बातें


सिनेमालोक
लागत और कमाई की बातें
-अजय ब्रह्मात्मज

निश्चित ही हम जिस उपभोक्ता समाज में रह रहे हैं, उसमें कमाई, आमदनी, वेतन आदि का महत्व बहुत ज्यादा बढ़ गया है, काम से पहले दाम की बात होती है, सालाना पैकेज पर चर्चा होती है, जी हां, पहले हर नौकरी का मासिक वेतन हुआ करता था. अब यह वार्षिक वेतन हो चुका है. समाज के इस ट्रेंड का असर फिल्म इंडस्ट्री पर भी पड़ा है. आये दिन फिल्मों के 100 करोड़ी होने की खबर इसका नमूना है. अब तो मामला कमाई से आगे बढ़कर लागत तक आ गया है. निर्माता बताने लगे हैं कि फलां सीन, फला गाने और फला फिल्म में कितना खर्च किया गया?
कुछ महीने पहले खबर आई थी कि साजिद नाडियाडवाला की नितेश तिवारी निर्देशित ‘छिछोरे’ के एक गाने के लिए 9 करोड़ का सेट तैयार किया गया था. फिल्म देखने के बाद ही पता चलेगा कि सेट की वजह से उक्त गाना कितना मनोरंजक या प्रभावशाली बन पाया? फिलहाल 9 करोड़ की लागत अखबार की सुर्खियों के काम आ गई. सोशल मीडिया. ऑनलाइन और दैनिक अखबारों ने इस खबर को प्रमुखता से छापा. मीडिया के व्यापक कवरेज से फिल्म के प्रति जिज्ञासा बढ़ ही गई होगी. जाहिर सी बात है कि सामान्य से अधिक लागत का जिक्र करने से निर्माताओं को फायदा ही होता है,इसलिए वे इस पर जोर देने लगे हैं.

Sunday, September 1, 2019

फिल्म लॉन्ड्री : कैसे और क्यों अपने ही देश में पहचान खोकर हम पराए और शरणार्थी हो गए - संजय सूरी


कैसे और क्यों अपने ही देश में पहचान खोकर हम पराए और शरणार्थी हो गए - संजय सूरी
अजय ब्रह्मात्मज
देखते-देखते 20 साल हो गए. 25 जून 1999 को संजय सूरी कि पहली फिल्म ‘प्यार में कभी कभी’ रिलीज़ हुई थी. तब से वह लगातार एक खास लय और गति से हिंदी फिल्मों में दिख रहे हैं.
संजय सूरी बताते हैं,’ सच कहूं तो बचपन में कोई प्लानिंग नहीं थी. शौक था फिल्मों का. सवाल उठता था मन में फ़िल्में कैसे बनती हैं? कहां बनती हैं? यह पता चला कि फ़िल्में मुंबई में बनती हैं. मुझे याद है ‘मिस्टर नटवरलाल’ की जब शूटिंग चल रही थी तो उसके गाने ‘मेरे पास आओ मेरे दोस्तों’ में हम लोगों ने हिस्सा लिया था. बच्चों के क्राउड में मैं भी हूं. मेरी बहन भी हैं. मैं उस गाने में नहीं दिखाई पड़ता हूं. मेरी सिस्टर दिखाई पड़ती है. मेरी आंख में चोट लग गई थी तो मैं एक पेड़ के पीछे छुप गया था. रो रहा था. श्रीनगर में फिल्में आती थी तो मैं देखने जरूर जाता था. तब तो हमारा ऐसा माहौल था कि सोच ही नहीं सकते थे कि कभी निकलेंगे यहां से...’



संडे नवजीवन : घर-घर में होगा फर्स्ट डे फर्स्ट शो


संडे नवजीवन
घर-घर में होगा फर्स्ट डे फर्स्ट शो
-अजय ब्रह्मात्मज

सिनेमा देखने का शौक बहुत तेजी से फैल रहा है. अब जरूरी नहीं रह गया है कि सिनेमा देखने के लिए सिनेमाघर ही जाएँ. पहले टीवी और बाद में वीडियो के जरिए यह घर-घर में पहुंचा. और फिर मोबाइल के आविष्कार के बाद यह हमारी मुट्ठी में आ चुका है. उंगलियों के स्पर्श मात्र से हमारे स्मार्ट फोन पर फिल्में चलने लगती है. वक्त-बेवक्त हम कहीं भी और कभी भी सिनेमा देख सकते हैं. एक दिक्कत रही है कि किसी भी फिल्म के रिलीज के दो महीनों (कम से कम 8 हफ्तों) के बाद ही हम घर में सिनेमा देख सकते हैं. पिछले दिनों खबर आई कि अब दर्शकों को आठ हफ्तों का इंतजार नहीं करना होगा. अगर सब कुछ योजना के मुताबिक चलता रहा तो बगैर सिनेमाघर गए देश के दर्शक ‘फर्स्ट डे फर्स्ट शो’ देख सकेंगे.
पिछले दिनों जियो टेलीकॉम के सर्वेसर्वा ने अपनी कंपनी की जीबीएम में घोषणा कर दी कि 2020 के मध्य तक वे अपने उपभोक्ताओं को ‘फर्स्ट डे फर्स्ट शो’ की सुविधा दे देंगे. दरअसल, जियो ब्रॉडबैंड की विस्तार योजनाओं की दिशा में यह पहल की जा रही है. दावा है कि पूरी तरह से एक्टिव होने के बाद जियो ब्रॉडबैंड अपने उपभोक्ताओं को बेहिसाब फिल्में देखने की सुविधा देगा. इसमें सबसे बड़ी सुविधा ‘फर्स्ट डे,फर्स्ट शो’ की होगी. हम सभी जानते हैं कि देश में सिनेमाघरों की संख्या लगातार कम हुई है. इससे संबंधित चिंताएं और बहसें तो सुनने को मिलती हैं, लेकिन टूट रहे सिंगल स्क्रीन की भरपाई नहीं हो पा रही है. शहरों में मेट्रो में मल्टीप्लेक्स तो हैं, लेकिन उनके प्रवेश दर(टिकट) इतने महंगे हैं कि आम दर्शक चाहने के बावजूद फिल्में नहीं देख पाते. नतीजा यह होता है कि वे फिल्में देखने के अवैध तरीकों का उपयोग करते हैं छोटे शहरों और कस्बों की तो वास्तविक मजबूरी है. बड़ी से बड़ी फिल्में भी छोटे शहरों और कस्बों में नहीं पहुंच पाती. उन्हें अपने आसपास के जिला शहरों में जाकर फ़िल्में देखनी पड़ती है. जाहिर सी बात है कि यात्रा व्यय की वजह से इन फिल्मों को देखने का खर्च बढ़ जाता है. ऐसी स्थिति में ज्यादातर दर्शक 10-20 रुपयों पायरेटेड फिल्म खरीदते हैं और आपस में बांटकर देखते हैं.
मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु जैसे मेट्रो शेरोन में भी फिल्म की रिलीज के दिन ही लोकल ट्रेन, मेट्रो ट्रेन और पब्लिक ट्रांसपोर्ट में सफर कर रहे शहरी आराम से मोबाइल पर ताजा फिल्में देख रहे होते हैं. वेरोक यह सब चल रहा है. फिर भी निर्माताओं के लिए थिएटर बहुत बड़ा सहारा है. फिल्मों के हिट-फ्लॉप का पैमाना बॉक्स ऑफिस ही है. फिक्की की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक 2018 में भारतीय फिल्मों का कुल कारोबार 175 अरब अमेरिकी डॉलर था, जिसमें से 75% कमाई थिएटर के जरिए आई थी. पिछले कुछ सालों में डिजिटल प्लेटफॉर्म तेजी से बढ़े हैं; दर्शकों की फिल्म देखने की प्रवृत्ति में बदलाव आ रहा है. इसके अलावा कुछ दर्शकों के लिए परदे का आकार ज्यादा मायने नहीं रखता. वे सिंपल मोबाइल के रसीदी टिकट साइज के परदे पर भीफिल्म देखने का आनंद उठा लेते हैं. इन सबके लिए ‘फर्स्ट डे,फर्स्ट शो’ किसी लॉटरी से कम नहीं होगी.
पिछले दिनों पीवीआर, आईनॉक्स और कार्निवाल मल्टीप्लेक्स चेन ने आधिकारिक विज्ञप्ति जारी की. विज्ञप्ति में आसन्न संकट के साथ फिल्मों के सामूहिक दर्शन के आनंद की वकालत की गई है. बताया गया है कि समूह में ही फिल्म देखी जानी चाहिए. थिएटर की तकनीकी सुविधाओं से फिल्म के सौंदर्य, रस, दृश्य, आदि का भरपूर आस्वादन लिया जा सकता है. इन तथ्यों से इंकार नहीं किया जा सकता, लेकिन आभाव में जी रहा दर्शक फिल्म की तकनीकी खूबियों से अधिक दृश्य और संवादों तक ही सीमित रहता है. उनके लिए संवादों के जरिए उद्घाटित हो रही कहानी ही पर्याप्त होती है. सिनेमाघरों में जाकर फिल्में देख रहे दर्शकों में बहुत कम ही मानक प्रोजेक्शन से परिचित होते हैं. मेट्रो से लेकर छोटे शहरों तक में सिनेमाघरों के मालिक प्रोजेक्शन की क्वालिटी में कटौती कर मामूली पैसे बचाते हैं. क्वालिटी से अपरिचित दर्शक खराब साउंड और प्रोजेक्शन से ही आनंदित हो जाता है. कमियों और सीमाओं के बावजूद दर्शक यूट्यूब और दूसरे स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म से प्रसारित शो और फ़िल्में देख कर क्वालिटी के प्रति सजग हो रहे हैं, उनके पास फिल्में देखने की सुविधाएं नहीं पहुंच पा रही हैं. अगर उन्हें फाइबर के जरिए ब्रॉडबैंड के माध्यम से एचडी क्वालिटी की वीडियो और 5.1 ऑडियो सम्पान सिनेमा मिलेगा तो वे क्यों न टूट पड़ेंगे? अब कमाई में कटौती की आशंका बढ़ी है तो मल्टीप्लेक्स मालिकों को दर्शकों की चिंता सताने लगी है. वे उन्हें आनंद के तरीके समझाने और बताने लगे हैं.
असल दुविधा, मुश्किल और चिंता इस बात की होगी कि कितने निर्माता-निर्देशक ‘फर्स्ट डे,फर्स्ट शो’ स्कीम के लिए अपनी फिल्में देने के लिए राजी होंगे? इन फिल्मों के प्रसारण अधिकार का मूल्य निर्धारण कैसे होगा? अभी तक फिल्म के प्रचार, फिल्म के स्टार और फिल्म के कारोबार की संभावना के आधार पर सारी चीजें तय होती रही हैं. अब पहले की तरह टेरिटरी के आधार पर मूल्य निर्धारण नहीं होता. अभी तो केवल कारोबार की संभावना के आधार पर स्क्रीन की संख्या तय की जाती है. यह 500 से 5000 के बीच कुछ भी हो सकती है. प्रतिदिन के कलेक्शन के आधार पर फिल्म के हिट या फ्लॉप का निर्धारण होता है. ‘फर्स्ट डे,फर्स्ट शो’ का अधिकार देने के पहले किस आधार पर पैसे तय किए जाएंगे? अभी तक का घोषित-अघोषित नियम है कि थिएटर रिलीज के 8 हफ्तों के बाद ही टीवी, डिजिटल, वीडियो और सेटेलाइट आदि के प्रसारण अधिकार दिए जाएं. ‘राजमा चावल’ और ‘लव पर स्क्वायर फीट’ जैसी फिल्में सीधे स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म पर आईं. उनके प्रति दर्शकों का उत्साह थोड़ा कम ही दिखा. ओटीटी प्लेटफॉर्म ने अपने मिजाज के अनुरूप वेब सीरीज का मीडियम विकसित कर लिया है. वहां 8 हफ्ते के बाद फिल्में भी आ जाती हैं, जिन्हें दर्शक अपनी सुविधा से देख लेता है, ‘फर्स्ट डे,फर्स्ट शो’ की संभावना नियम, पाबंदी और दूसरों अवरोधों को तोड़ने की एकबारगी उम्मीद    दे दी है. दर्शक हर लिहाज से फायदे में रहेगा. परेशानी प्रदर्शकों की बढ़ रही है और निर्माता असमंजस में है.
मनोरंजन के कारोबारी और विशेषज्ञ कोई राह निकाल ही लेंगे. नई तकनीक को रोका नहीं जा सकता. सिनेमा पर ऐसे अस्थायी संकट आते रहे हैं. टीवी आया तो सिनेमा खत्म हो रहा था. वीडियो सिनेमा के लिए मौत के फंदे की तरह आया था. डिजिटल क्रांति के बाद सिनेमा के दम घुटने की बातें की जाने लगी. फिर भी हम देख रहे हैं कि कारोबारी और दर्शक अपने लिए राह निकाल लेते हैं और सिनेमा सरवाइव कर रहा है. नई संभावना के मध्य यह भी कहा जा रहा है कि अगर फिल्में मिलने में दिक्कतें हुई तो ब्रॉडबैंड कंपनी खुद ही निर्माता-निर्देशकों को फिल्में बनाने का ऑफर देंगी और साल भर का कैटलॉग तैयार कर लेंगी इस विकल्प के बावजूद हम जानते हैं कि भारतीय सिनेमा में रुचि-अभिरुचि फिल्म सितारों और खासकर लोकप्रिय सितारों की वजह से होती है. अगर चोटी के लोकप्रिय स्टारों की फिल्में ‘फर्स्ट डे, फर्स्ट शो’ में उपलब्ध नहीं होंगी तो दर्शक आरंभिक उत्साह के बाद उदासीन हो जाएंगे.
देखना यह है कि मनोरंजन की इस रस्साकशी में कौन विजयी होता है? दर्शक तो हर हाल में फायदे में रहेगा. उसे कम फीस देकर अधिक फिल्में देखने को मिलेंगी. ऊपर से ‘फर्स्ट डे,फर्स्ट शो’ का बोनस मिल गया तो हर शुक्रवार सुहाना और गुलजार हो उठेगा. यह बहुत दूर की संभावना है, लेकिन यह हो भी सकता है कि देश में साप्ताहिक अवकाश का दिन रविवार के बजाय शुक्रवार हो जाए, क्योंकि नई फिल्में शुक्रवार को घर-घर में उपलब्ध होंगी. सिनेमा घर में आ जाएगा तो सिनेमाघर जाने की जहमत कौन उठाएगा?