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Friday, March 24, 2017

मामूलीपन की भव्यता बचाने की जद्दोजहद : अनारकली ऑफ आरा


मामूलीपन की भव्यता बचाने की जद्दोजहद : अनारकली ऑफ आरा

-विनीत कुमार


अविनाश दास द्वारा लिखित एवं निर्देशित फिल्म “अनारकली ऑफ आरा” अपने गहरे अर्थों में मामूलीपन के भीतर मौजूद भव्यता की तलाश और उसे बचाए रखने की जद्दोजहद है. इसे यूं कहे कि इस फिल्म का मुख्य किरदार ये मामूलीपन ही है जो शुरु से आखिर तक अनारकली से लेकर उन तमाम चरित्रों एवं परिस्थितियों के बीच मौजूद रहता है जो पूरी फिल्म को मौजूदा दौर के बरक्स एक विलोम ( वायनरी) के तौर पर लाकर खड़ा कर देता है. एक ऐसा विलोम जिसके आगे सत्ता, संस्थान और उनके कल-पुर्जे पर लंपटई, बर्बरता और अमानवीयता के चढ़े प्लास्टर भरभरा जाते हैं.

 एक स्थानीय गायिका के तौर पर अनारकली ने अपनी अस्मिता और कलाकार की निजता( सेल्फनेस) को बचाए रखने के लिए जो संघर्ष किया है, वह विमर्श के जनाना डब्बे में रखकर फिल्म पर बात करने से रोकती है. ये खांचेबाज विश्लेषण के तरीके से कहीं आगे ले जाकर हर उस मामूली व्यक्ति के संघर्ष के प्रति गहरा यकीं पैदा करती है जो शुरु से आखिर तक बतौर आदमी बचा रहना चाहता है. पद और पैसे के आगे हथियार डाल चुके समाज और हारे हुए लोकतंत्र के बीच जो कुछ भी बचा रह जाता है, वह इस फिल्म की क्लाईमेक्स है जिससे गुजरे बिना महसूस नहीं किया जा सकता.

वैसे तो फिल्म की पूरी कथा आरा( बिहार) की अनारकली के इर्द-गिर्द घूमती है जिसमे दर्शक सीन-दर-सीन गुजरने के बीच एक स्तर पर आकर इत्मिनान हो सकते हैं कि किसी दृश्य, संवाद या फिर घटना में गहरे न धंसने पर भी मौटे तौर पर कहानी हाथ से कहीं नहीं जा रही, उसे आगे पकड़ लिया जाएगा. लेकिन कहानी के स्तर पर दिखते इस इकहरेपन के बावजूद इसकी परिधि इतनी बड़ी है कि इसमे विश्वविद्यालय जैसी जगह वीसी के लिए अय्याशी आ अड्डा, थाना पुलिसिया जुल्म और ऐय्याशी का सबसे रेगुलर ठिकाना और कोर्ट-कचहरी मोहल्ले की गप्प-शप में तब्दील कर दिए जाने के तौर पर बहुत साफ दिखाई देते हैं.

फिल्म प्रोमोशन के दौरान इससे जुड़ा कोई भी व्यक्ति, यहां तक कि स्वयं लेखक अविनाश दास, अनारकली के चरित्र को जीती हुई स्वरा भास्कर रंगीला की भूमिका में रहे पंकज त्रिपाठी या सत्ता के एक्सटेंशन वीसी बने संजय मिश्रा ने कहीं इस बात का दावा पेश नहीं किया कि यह फिल्म ढहते लोकतंत्र और सबकुछ महसूस किए जाने के बावजूद तालाबंद जुबान के खिलाफ रचनात्मक प्रतिरोध है. लेकिन पूरी फिल्म में इसका प्रभाव इतना गहरा है कि आपको एक ही साथ एक-एक दृश्यों को लेकर कई स्तर पर पाठ करने की जरुरत पड़ सकती है.

आरा की अनारकली अपने “नो” को पिंक की तरह पंचलाइन में तब्दील नहीं करती. ये नो उसकी गायकी से चलते हुए उसके जीवन में शामिल रहती है. यही कारण है कि फिल्म देखने से पहले ही फिल्म की कहानी के बासी हो जाने और चैरिटेबल माइंड सेट में आकर देखने की संभावना से पूरी तरह बच जाती है. अनारकली से  लेकर अनवर तक अपनी चौतरफा अस्त-व्यस्त जिंदगी के बीच दिमागी स्तर पर इतने व्यवस्थित हैं कि अपने भीतर के कलाकार को, आदमी होने की शर्तों को और प्रतिरोध के स्वर को बचाए रख पाते हैं.

ऐसे दौर में जब एक कलाकार, कलाकारी छोड़कर बाकी सबकुछ कर रहा हो, वीसी छोड़िए, यूनिवर्सिटी का एक प्राध्यापक पढ़ाने के अलावा बाकी सब कर रहा हो, पुलिसिया महकमे के लोग कानून-व्यवस्था को दुरुस्त बनाए रखने के बजाय उसे दीमक की तरह चाटने में लगे हों, पत्रकार खबरों के लिए गांव-मोहल्ले-गलियों में नहीं, चौड़े शीशेवाली गाड़ियों में घूम रहे हों, यह फिल्म अपने पेशे के प्रति गहरी आस्था पैदा करती है. फिल्म की ताकत इस बात में है कि जिस अनारकली को केन्द्रीय चरित्र के तौर पर शामिल किया है, उसकी प्रतिबद्धता अपने काम, अपने पेशे को लेकर इस हद तक है कि उसके लिए कला और जीवन, आत्मसम्मान और जीवकोपार्जन, प्रतिरोध और जीवन मूल्य दो अलग-अलग चीजें नहीं है. यही कारण है कि सिनेमा हॉल से निकलने के बाद दर्शकों को अनारकली चरित्र में महानता की तलाश करने के बजाय अपने आसपास से चटकती चीजों को तलाशने के लिए बेचैन करती हैं…कुछ और नहीं तो इस कड़ी में वो जितना अपने को मामूलीपन के करीब ला पाती हैं, उससे कई गुना ज्यादा सत्ता के बाकी के कल-पुर्जे की फर्जी भव्यता को उतारकर रख देती हैं. वो हमें इस सिरे से भी सोचने पर मजबूर करती है कि हर बात का समाधान दिल्ली नहीं है और बहुत संभव है कि समाधान का शहर अपना छूटा हुआ शहर हो.

सेल्फी के इस दौर में जहां सरकार से लेकर मोबाईल कंपनियां तक इस देश को सेल्फीस्तान में तब्दील कर देने पर आमादा हैं, ऐसे में स्वाभाविक है कि मामूलीपन की भव्यता बचाए रखनेवाले लोग अल्पमत में होंगे. इन अल्पमत के लोगों पर एक ही साथ कई स्तर की जिम्मेदारी होगी. फिल्म में इन जिम्मेदारियों को भाषा के स्तर पर निभाते हुए दिखाया गया है. ऐसे में हम इसके संवादों पर, गानों की पंक्तियों पर द्विअर्थी होने की स्टिकर चस्पाकर आगे नहीं बढ़ सकते. कडाही आपका, अब आप इसमे पूरी तलिए या हलुवा बनाइए, आपकी मर्जी जैसे संवाद एकबारगी तो जरुर सेक्सुअलिटी के कोने से मतलब निकालने का भ्रम पैदा करते हैं लेकिन “हम कौनो सती-सावित्री नहीं है लेकिन इसका इ मतलब नहीं है कि हम गानेवालों को कौनो, कभियो बजा देगा ” जैसे संवादों का स्थायी प्रभाव इतना गहरा है कि एक झटके में ये पूरा वाक्य सर्काज्म में तब्दील हो जाता है. 

इसी क्रम में फिल्म के गीत और उनमे प्रयोग किए शब्दों पर गौर करें तो जो पंक्तियां, जो शब्द मनोरंजन के स्तर पर जितनी सहजता से पेश आते हैं, प्रभाव के स्तर पर उतना ही झकझोरते हैं. व्यावसायिक मंचों की तरह इनका विभाजन “रिवेंज सांग” के रूप में न भी करें तो इसके गीत अपने नायकत्व ( हीरोईक प्रेजेंस) के साथ मौजूद रहते हैं. आप महसूस कर सकेंगे कि एक कथा लेखन और निर्देशन अविनाश दास ने किया है और दूसरा संगीत निर्देशक रोहित शर्मा ने. और तब कहानी, संवाद, अभिनय, गढ़ी गई परिस्थितियों और गीतों का एक क्रम बनता हुआ दिखाई देता है कि मामूलीपन की भव्यता को बचाए रखनेवाले लोग, उसके लिए जीनेवाले लोग और उसकी कद्र करनेवाले लोग अल्पमत में हैं लेकिन सुंदर पक्ष ये है कि अपनी लगातार जद्दोजहद के बीच ये सबके सब एकरेखीय होकर आपस में मिल जाते हैं. ऐसे में बाहरी स्तर की जो विविधता दिखाई देती है और लगता है दिल्ली के तिवारीजी का भला आरा से आई अनारकली के साथ क्या पटरी बैठेगी, टीनएजर अनवर अपनी उम्र के बाकी लुक्का लोगों से अलग कैसे हो सकता है, फिल्म अपनी बुनावट में एक खूबसूरत और राजनीतिक स्तर पर परफेक्ट कथा के जरिए ये क्रम तैयार करने में सफल होती है. आप चाहें तो कह सकते हैं कि ये सिर्फ सिनेमाई स्तर का पोएटिक जस्टिस नहीं, जीवन के बहुत करीब से होकर गुजर जानेवाली घटना है.

Monday, February 16, 2015

बहुमत की सरकार की आदर्श फिल्म: दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे 3

विनीत कुमार ने आदित्‍य चोपड़ा की फिल्‍म दिलवाले दुल्‍हनिया ले जाएंगे पर यह सारगर्भित लेख लिखा है। उनके विमर्श और विश्‍लेषण के नए आधार और आयाम है। चवन्‍नी के पाठकों के लिए उनका लेख किस्‍तों में प्रस्‍तुत है। आज उसका तीसरा और आखिरी अंश...

-विनीत कुमार 
फेल होना और पढ़ाई न करना हमारे खानदान की परंपरा है..भटिंडा का भागा लंदन में मिलिनयर हो गया है लेकिन मेरी जवानी कब आयी और चली गयी, पता न चला..मैं ये सब इसलिए कर रहा हूं ताकि तू वो सब कर सके जो मैं नहीं कर सका..- राज के पिता
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मुझे भी तो दिखा, क्या लिखा है तूने डायरी में. मुझसे छिपाती है, बेटी के बड़ी हो जाने पर मां उसकी मां नहीं रह जाती. सहेली हो जाती है- सिमरन की मां.

फिल्म के बड़े हिस्से तक सिमरन की मां उसके साथ वास्तव में एक दोस्त जैसा व्यवहार करती है, उसकी हमराज है लेकिन बात जब परिवार की इज्जत और परंपरा के निर्वाह पर आ जाती है तो मेरे भरोसे की लाज रखना जैसे अतिभावनात्मक ट्रीटमेंट की तरफ मुड़ जाता है. ऐसा कहने औऱ व्यवहार करने में एक हद तक पश्चाताप है लेकिन नियति के आगे इसे स्वाभाविक रूप देने की कोशिश भी.

पहले मुझे लगता था औरत औऱ मर्द में कोई अंतर नहीं होता है. बड़ी होती गई तो लगा कितना बड़ा झूठ है. औरत को वादा करने का भी हक नहीं है. – सिमरन की मां.

हृदय परिवर्तन का यह चक्र राज के पिता के मामले में बिल्कुल आखिर में दिखाई देता है. जो राज से बिल्कुल अलग सिमरन को बिना शादी के ले जाने में यकीन रखते हैं लेकिन राज की इस बात से आगे चलकर सहमत होते हैं कि ऐसा करना ठीक नहीं है. इन सबके बीच सिमरन का सीधे-सीधे कहीं भी हृदय तो नहीं होता बल्कि इन सबके बीच वो अकेली ऐसी चरित्र है जिसका कि परिवेश और परिस्थितियों के बदलते जाने के अनुरूप ही व्यवहार और सोच के स्तर पर बदलाव आते जाते हैं. हम दर्शकों को ये कहीं ज्यादा स्वाभाविक लगता है लेकिन गौर करें तो बाकी चरित्रों का हृदय परिवर्तन और  सिमरन का स्वाभाविक स्तर पर दिखता बदलाव दरअसल सारे संदर्भों को उस एकरेखीय दिशा की ओर ले जाने की कोशिश है जिससे कि स्थायित्व को एक मूल्य के रूप में प्रस्तावित किया जा सके.

इधर मिथिलेश कुमार त्रिपाठी के बयान और 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए की गई केम्पेनिंग पर गौर करें तो पूरा जोर स्थितियों में बदलाव से कहीं ज्यादा हृदय परिवर्तन को लेकर है. होने और महसूस करने के बीच की रेखा को पाटने से है. त्रिपाठी जहां ये मानते हैं कि युवाओं को ये समझाया जाना बेहद जरूरी है कि कौन सा सिनेमा उनके लिए बेहतर और जिससे कि सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों का विकास हो सकेगा तो एक तरह से हृदय परिवर्तन के प्रति यकीन जाहिर कर रहे होते हैं कि जो परिवेश निर्मित है और जिन परिस्थितियों के साथ युवा इन सबसे जुड़ा है, इससे कटकर तेजी से बदलने शुरु हो जाएंगे. फर्क सिर्फ इतना है कि फिल्म में जहां सबकुछ भावनात्मक और बहुत हुआ तो परिवार की लाज की दुहाई देकर किया गया, सरकार ये काम राजनीतिक स्तर पर करेगी. इसी क्रम में अगर अच्छे दिन आनेवाले हैं की पैकेजिंग शामिल कर लें तो नागरिक के बीच से सिरे से उस राजनीतिक तर्क को गायब कर देना है जिससे तहत वो पूरी प्रक्रिया को समझना चाहती है. प्रक्रिया का लोप सिनेमा में भी है और बहुमत की इस सरकार में भी शायद यही कारण है कि यह बीजेपी के लिए आदर्श सिनेमा का नमूना बन पाती है. नम्रता जोशी शाहरूख खान पर स्वतंत्र रूप से लिखते हुए इस फिल्म के संदर्भ में यह बात विशेष रूप से रेखांकित करती है कि यह फिल्म जाति और दूसरे उन सर्किट के साथ छेड़छाड़ नहीं करती जो कि आमतौर पर प्रेम कहानियों में हुआ करते हैं तो इसका एक आशय यह भी है कि सिनेमा उस प्रक्रिया का सिरे से लोप कर देती है जहां परस्पर विरोधी तत्वों के टकराने और उनके बीच भारतीय परंपरा एवं संस्कार के फॉर्मूले को फिट करने में भारी दिक्कत होती. यही पर आकर ये फिल्म कथानक के लगातार धाराप्रवाह प्रसार के बावजूद सामाजिक संदर्भों के स्तर पर न केवल सपाट लगने लग जाती है बल्कि उस सुविधाजनक परिवेश की निर्मिति की तरफ बढ़ती जान पड़ती है जिनसे निम्न मध्यवर्ग और काफी हद तक मध्यवर्ग को टकराए बिना प्रेम की तरफ बढ़ना संभव ही नहीं है. इनमे जाति, सामाजिक अन्तर्विरोधों के साथ-साथ साधन के स्तर की जद्दोजहद भी शामिल है. ये फिल्म लगभग इन सबसे मुक्त है बल्कि जिस तरह से अंत में चौधरी बलदेव सिंह का हृदय परिवर्तन होता है, खलनायक से भी मुक्त फिल्म बन जाती है. स्वाभाविक भी है कि जब पूरा जोर सारे संदर्भों को एकरेखीय करने की हो तो फिर खलनायक के होने की संभावना अपने आप ही खत्म हो जाती है..इस खलनायक को दूसरे हल्के संस्करण  विरोधी के रूप में देखें तो भी शून्य की ही स्थिति बनेगी.

यहां तक तो एक स्थिति साफ बनती दिखाई देती है कि प्रेम कहानी के भीतर भी पारिवारिक ढांचे को बचाए जाने, विवाह संस्था में गहरा यकीन रखने और भौगोलिक स्तर पर हिन्दुस्तान से दूर रहने के बावजूद, परिस्थितियों के बदलते जाने पर भी नास्टैल्जिया के तहत ही सही मिट्टी से गहरा लगाव रखने संबंधी जो संदर्भ इस फिल्म में शामिल किए गए वो हमारी मौजूदा बहुमत सरकार की सांस्कृतिक राष्ट्रवादी राजनीति के एजेंड़े के बेहद अनुकूल है..लेकिन इसके अलावा जो दो और कारण है इसे संक्षेप में ही सही देखा जाना चाहिए. एक तो राज मल्होत्रा जैसे एक ऐसे चरित्र का होना जिसकी मौजूदगी और संवाद राजनीति के इस रूप के प्रति लोगों को बिना मोरेल पुलिसिंग के भावनात्मक स्तर पर जुड़ने के लिए प्रेरित करती जान पड़ती है. ये अलग बात है कि इसी से प्रेरित होकर जब दूसरे के लिए मोरेल पुलिसिंग का काम शुरु होता है तो वो पितृसत्ता की उसी जकड़बंदी में जाकर छटपटाने लगती है, जैसा कि दक्षिणपंथी राजनीति के व्यावहारिक प्रयोग में बहुत ही स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं. हमने पहले भी कहा कि इस फिल्म में राज एक ऐसा चरित्र है जो सेल्फ ट्यून्ड है जिसे अलग से बताने की जरूरत नहीं पड़ती कि स्विटरजरलैंड की जमीन पर अकेली लड़की के साथ रात गुजारने पर क्या नहीं करनी चाहिए ?

मैं एक हिन्दुस्तानी हूं और जानता हूं कि एक हिन्दुस्तानी लड़की की इज्जत क्या होती है.- राज

पूरी फिल्म में प्रेम के दौरान सेक्स के आसपास के दृश्य कहीं नहीं है और जहां इसकी संभावना बनती दिखाई भी देती है तो उसे या तो गर्दन के छूम लेने को ही परिणति के रूप में अंतिम रूप दे दिया जाता है या फिर इसकी संभावना को एक हिन्दुस्तानी लड़की का शादी के पहले तक, हिन्दुस्तानी लड़के द्वारा रक्षा करने के घोषित कर्तव्य के रूप में परिवर्तित कर दिया जाता है. ये वो मूल्य हैं जो पूरी फिल्म को एक ही साथ पारिवारिक और राज जैसे चरित्र को गृहास्थिक भारतीय के रूप में स्थापित करती है. ये वो मासूम चरित्र है जो जीवन में अफेयर चाहे जितनी बार कर ले, प्यार अपनी इच्छा से कर लेकिन बाकी सबकुछ अभिभावक की सहमति और विधान के बाहर जाकर नहीं करेगा. हां ये जरूर है कि इसी बीच जब आप फिल्म के इस गाने जरा सा झूम लू मैं, न रे बाबा न, आ तुझे चूम लूं मैं की पंक्तियों पर गौर करते हैं तो लगता है कि स्वाभाविक इच्छा और संस्कार के बीच एक अजीब की रस्साकशी लगातार चल रही है और इन सबके बीच सिमरन मैं चली बनके हवा गाते हुए एक ऐसी लड़की हो जाती है जिसके लिए मेंहदी लगा के रखना, डोली सजा के रखना, लेने तूझे ओ गोरी, आएंगे तेरा सजना गाना ज्यादती है. तब आप इस सिरे से भी सोच सकते हैं कि क्या एक महीने के लिए स्विटरजरलैंड की सिमरन की अवधि बढ़ा दी जाती तो वो हाइवे( 2014) की वीरा हो जाती. वो वीरा जिसकी हाइवे पर वक्त बिताने की इच्छा कुछ और सेकण्ड बिताने की है, मिनट और घंटे की भी नहीं..सिमरन के लिए महीने की अवधि बढ़ाए जाने की सद्इच्छा और वीरा की चंद सेकण्ड हाइवे की हवा के बीच बिताने की इच्छा क्या दो अलग-अलग समयगत परिवेश का सच है या फिर उस दृष्टिकोण का जिसके अठारह साल बीत जाने के बावजूद बहुमत की सरकार वहीं से आदर्श सिनेमा के तत्व खोजती है, 2014 की इस फिल्म से नहीं ? देने को दलील दी जा सकती है कि ऐसा होने से प्रेम का बेहद ही लिमिटेड वर्जनऔर वो भी संपादित रूप हमारे सामने उभरकर आता है लेकिन यही तो वो तत्व है जोइनके लिए इस फिल्म को प्रेम कहानी के होने के बावजूद परिवार के इर्द-गिर्द, उसके सदस्यों के बीच का बनाती है..आप चाहें तो इसे प्रेम में सामाजिकता की स्थापना कह सकते हैं जबकि इस सामाजिकता के बीच ही बन के हवाचलने की सिमरन की चाहत गायब हो जाती है. दरअसल प्रेम के इस रूप को फिल्म इतनी जूम इन करके फैलाती है कि उसके भीतर बाकी की चीजें खासकर जो सिमरन के सिरे से मैगनिफाई करके देखे जाने की जरूरत है, धुंधली या गायब हो जाती है जबकि वीरा उसे अठारह साल बाद शिद्दत से सहेजने लग जाती है. बन के हवा की आशंका का शमन एक और बड़ा कारण है जो फिल्मों की अंबार के बीच मिथिलेश कुमार त्रिपाठी को उदाहरण के रूप में याद रह जाता है.

एक तो ये स्थिति है जहां राज और उसके बहाने घूमनेवाली पूरी कहानी बहुमत की सरकार की सांस्कृति राष्ट्रवाद के घोषणपत्र के रूप में काम करती जान पड़ती है लेकिन दूसरी स्थिति इस फिल्म का वो परिवेश और स्वयं राज मल्होत्रा का वो ब्रांड कॉन्शस अंदाज है जो कि सरकार की आर्थिक नीति के लिए सांकेतिक रूप में ही सही आदर्श बनकर आते हैं. सांस्कृतिक अध्ययन पद्धति के इस तर्क में न भी जाएं कि संस्कृति कोई स्थिर या जड़ चीज नहीं है बल्कि जीवन प्रवाह का हिस्सा है जिसका निर्धारण जीवन सापेक्ष है तो भी ये सवाल बचा रह जाता है कि इंग्लैंड और स्विटजरलैंड में हिन्दुस्तानी दिल लेकर घूमते रहने के बावजूद क्या ये संभव है कि हम इसी इरादे के साथ स्वदेशी वस्तुओं और संसाधनों के बीच घूमे ?

मूलतः प्रकाशित- संवेद, सिनेमा विशेषांक 2014 


 

Sunday, February 15, 2015

बहुमत की सरकार की आदर्श फिल्म: दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे 2

विनीत कुमार ने आदित्‍य चोपड़ा की फिल्‍म दिलवाले दुल्‍हनिया ले जाएंगे पर यह सारगर्भित लेख लिखा है। उनके विमर्श और विश्‍लेषण के नए आधार और आयाम है। चवन्‍नी के पाठकों के लिए उनका लेख किस्‍तों में प्रस्‍तुत है। आज उसका दूसरा अंश... 

-विनीत कुमार
 ऐसा करके फिल्म ये दर्शकों का एक तरह से विरेचन करती है कि प्रेम तो अपनी जगह पर ठीक है लेकिन उस प्यार को हासिल करके आखिर क्या हो जाएगा जिसकी स्वीकृति अभिभावक से न मिल जाए.( छार उठाए लिन्हीं एक मुठी, दीन्हीं उठाय पृथ्वी झूठी)  इस संदर्भ को फिल्म समीक्षक नम्रता जोशी इस रूप में विश्लेषित करती है कि ये फिल्म दरअसल इसी बहाने दो अलग-अलग मिजाज,रुझान और पृष्ठभूमि की पीढ़ी के बीच सेतु का काम करती है. यही पर आकर पूरी फिल्म लव स्टोरी होते हुए भी प्रेमी-प्रेमिका का अभिभावकों के साथ निगोसिएशन की ज्यादा जान पड़ती है और इसी निगोएसिशन के बीच जो स्थितियां और संदर्भ बनते हैं वो अपनी बहुमत की सरकार के आदर्श सिनेमा की परिभाषा के बेहद करीब जान पड़ती है और तब राज वह युवा नहीं रह जाता जिसे अलग से संस्कारित करने की जरूरत रह जाती है बल्कि वह ऐसे नायक के रूप में सामने होता है जो सेल्फ ट्यून्ड है-
मैं तुम्हें यहां से भगाकर या चुराकर लेने नहीं आया हूं. मेरी पैदाईश भले ही इंग्लैंड में हुई हो लेकिन हूं हिन्दुस्तानी, मैं तुम्हें दुल्हन बनाकर लेने आया हूं

सिमरन से राज का कहा गया ये संवाद असल में उस हर हिन्दुस्तानी का वक्तव्य है जो कि फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी की समझदारी के साथ जीता है. ये वो कमिटमेंट है जो मुल्क परिवेश और परिस्थितियों के बदल जाने की स्थिति में भी बरकरार रहते हैं. लगातार बदलती स्थितियों और परिवेश के बीच भी जो चीजें नहीं बदलती, जिनमे स्थायित्व बरककार रहता है, वह भारतीय होने का मजबूत सबूत है, फिल्म इसे तत्परता के साथ स्थापित करती चलती है. हां, ये जरूर है कि सांस्कृतिक अध्ययन पद्धति के हिसाब से कोई इस फिल्म का अध्ययन करना चाहे तो कई स्तरों पर फैले झोल अपने-आप सामने चले आते जाएंगे. इधर राज की ओर से कहें गए ऐसे संवादों की पूरी श्रृंखला है जिसका अगर स्वतंत्र अध्ययन किया जाए तो लगेगा कि ये फिल्म प्रवासी भारतीय की घोषणापत्र है. एक प्रवासी भारतीय को किस मानसिक बुनावट के साथ अपनी जिंदगी जीनी चाहिए, उसका खांका इस फिल्म में शामिल है. वैसे तो फिल्म की ओपनिंग शॉट्स से गौर करना शुरु करें जहां एक भारतीय मुल्क का व्यापारी चौधरी बलदेव सिंह पिछले 22 सालों से लंदन की जमीन पर दूकान चला रहे हैं उतने ही समय से दूकान खोलते ही केले में खोंसकर अगरबत्ती जलाने का काम कर रहे हैं, दर्शकों को बताने के लिए काफी है कि एक भारतीय होने का क्या अर्थ होता है..कैसे कुछ चीजें चाम के साथ इस तरह जुड़ी होती है कि आप इससे अपने को अलग नहीं कर सकते. इसके साथ ही अपने को परिभाषित करने के क्रम में अपने देश से कट जाने की कसक इस भारतीय को नास्टैल्जिया की तरफ ले जाती है, वो इस बात का संकेतक है कि अगर स्थायित्व न भी बचा सकें तो नास्टैल्जिया ही वो चीज है जिससे परिस्थिति और स्थायित्व के बीच की दरार को पाटा जा सकता है. लेकिन लंदन की इसी जमीन पर बिंदास जी रहा राज जिसे इन्टरवल के पहले तक आप भारतीय कहकर दांव नहीं लगा सकते, वो चौधरी बलदेव सिंह की वायनरी बनकर भी कहीं ज्यादा भारतीय होने का सबूत पेश कर जाता है.चौधरी बलदेव सिंह के साथ-साथ धर्मवीर मल्होत्रा( राज के पिता) इसी स्थायित्व के लिए अपने बेटे को वो जिंदगी जीने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, जिससे वे खुद वंचित रह गए. मजाक में ही सही लेकिन ये कम दिलचस्प नहीं है कि वो इसके लिए अपने पुश्तों के अनपढ़ और फेल हो जाने को अपने परिवार की परंपरा का हिस्सा मानकर ऐसा करने पर राज को शाबाशी तक देते हैं..इस नाकारात्मकता में स्थायित्व का अतिरेक तो है लेकिन ऐसे कई प्रसंग इस फिल्म में शामिल हैं जिसकी दिशा बदले जाने या उघाड़ने से शायद इतनी स्वीकार्य नहीं हो पाती और न ही इस बहुमत की सरकार के लिए आदर्श बन पाती जितनी की अब है. ध्यान रहे, ये सब फिलहाल फिल्म द्वारा कुछ संकेतों और संवादों के इर्द-गिर्द फिक्स कर दिए जाने को लेकर है, बात बिल्कुल वैसी ही है या नहीं, इस पर आगे....

इस तरह स्थायित्व का भाव तो है कि जो मौजूदा बहुमत की सरकार को आकर्षित करती है लेकिन इससे कहीं ज्यादा दूसरा भाव हृदय परिवर्तन का है. इस पूरी फिल्म में हृदय परिवर्तन फिल्म की अन्तर्कथा के रूप में हर थोड़ी दूर जाने के बाद मौजूद है. उपरी तौर पर यह एक अन्तर्विरोध के रूप में दिखाई देता है कि एक तरफ तो परिस्थितियों,परिवेश और स्थितियों के बदले जाने के बावजूद भी स्थायित्व मूल भाव के रूप में बल्कि मूल्य के रूप में मौजूद है तो फिर दूसरी तरफ व्यक्ति/चरित्र के स्तर पर हृदय परिवर्तन कैसे संभव है ? लेकिन इसकी प्रक्रिया में उतरते ही बहुत स्पष्ट हो जाता है कि ये हृदय परिवर्तन भी दरअसल उसी स्थायित्व को हासिल करने या बनाए रखने के लिए है. दिलचस्प है कि इसमे इतनी अधिक विविधता और बारीकी है कि सबकुछ हमें बेहद स्वाभाविक लगता है और कमोवेश ये लगभग सभी प्रमुख चरित्रों को लेकर है.

चौधरी बलदेव सिंह का हृदय परिवर्तन हमें बहुत साफ दिखाई देता है. भारतीय होने के प्रमाणों के साथ अपने संस्कारों और उसूलों के प्रति प्रतिबद्ध शख्स का हृदय परिवर्तन मानवीयता की उस छौंक से शुरु होती है जहां निर्धारित समय पर दूकान बंद करने के बाद कुछ भी नहीं बेच सकते लेकिन सिरदर्द होने पर उसी राज को दवाई दे सकते हैं..सुरक्षा और संस्कार के सींकचे से सिमरन को कभी बाहर नहीं जाने देनेवाला ये पिता अपनी बेटी की भगवत-भक्ति से प्रसन्न और निश्चिंत होकर महीने भर के लिए स्वीटजरलैंड की ट्रिप के लिए भेज सकता है. पूरी फिल्म में ये हृदय परिवर्तन इस बारीकी से की गई है कि खुलेपन की तरफ तेजी से बढ़ता दर्शक इस आदर्श भारतीय की जिद के आगे उसके संस्कारों को नजरअंदाज न कर दे ऐसे में जहां-जहां इसकी आशंका दिखाई देती है, उसके पहले ही हृदय परिवर्तन अनुकूलन पैदा करने के लिए कर दिया जाता है. लेकिन सिमरन की मां का हृदय परिवर्तन या कहें तो व्यवहार इससे ठीक विपरीत है. सिमरन की मां और राज के पिता फिल्म के शुरुआती हिस्से में लगभग एक ही ध्रुव पर दिखाई देते हैं कि जो बिंदास और खुलेपन की जिंदगी जीने से महरूम रह गए, वो जिंदगी अपने बच्चों को देंगे. 


 क्रमश: 
मूलतः प्रकाशित- संवेद, सिनेमा विशेषांक 2014 


बहुमत की सरकार की आदर्श फिल्म: दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे

विनीत कुमार ने आदित्‍य चोपड़ा की फिल्‍म दिलवाले दुल्‍हनिया ले जाएंगे पर यह सारगर्भित लेख लिखा है। उनके विमर्श और विश्‍लेषण के नए आधार और आयाम है। चवन्‍नी के पाठकों के लिए उनका लेख किस्‍तों में प्रस्‍तुत है। आज उसका पहला अंश...


-विनीत कुमार


हर सप्ताह ढेर सारी फिल्में रिलीज होती हैं लेकिन उनमे बमुश्किल ऐसी चीजें होती है जिनसे कि भारतीय कला और संस्कृति का प्रसार हो सके. हमारी कोशिश होगी कि हम सिनेमा के माध्यम से भारतीय संस्कृति और सामाजिक मूल्यों को बढ़ावा दें, ऐसी फिल्मों को हर तरह से प्रोत्साहित करें जिसमे आर्थिक सहयोग भी शामिल है. हमने इस पर काम करना भी शुरु कर दिया है. दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे जैसी फिल्म जिसकी कहानी भारत की महान परिवार परंपरा के इर्द-गिर्द ही घूमती है की हमें और जरूरत है.- मिथिलेश कुमार त्रिपाठी, राष्ट्रीय संयोजक, कला एवं संस्कृति प्रकोष्ठ, भारतीय जनता पार्टी

1995 में रिलीज हुई फिल्म दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे के संदर्भ में यह कम दिलचस्प वाक्या नहीं है कि साल 2014 में बहुमत की सरकार बनाने जा रही  पार्टी इसे अपनी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की राजनीति के न केवल अनुकूल मानती है, आदर्श उदाहरण के रूप में देखती है बल्कि सिनेमा को लेकर अपनी समझदारी के लिए इसे बतौर घोषणापत्र के रूप में पेश करती है. ऐसी ही फिल्मों को आर्थिक सहयोग सहित अन्य सभी स्तरों पर प्रोत्साहित करने की बात करती है. इस आर्थिक सहयोग में यह बात अपने आप शामिल है कि ऐसी फिल्मों के साथ बाम्बे से लेकर फना जैसी स्थिति कभीपैदा नहीं की जाएगी.  एक तरह से भविष्य में पूर्ण बहुमतवाली सरकार और लोकतंत्र के बीच दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे जैसी फिल्में बनती हैं तो उन्हें उन सभी स्तरों पर संरक्षण प्राप्त होंगे, जिनके अभाव में कई दूसरी फिल्में दर्शकों की पसंद-नापसंद की प्रक्रिया से गुजरे बिना ही अंतिम निर्णय यानी प्रतिबंध तक पहुंचा दी जाती है. बहरहाल..


इस दिलचस्प वाक्ये के साथ उतना ही दिलचस्प सवाल है कि क्या दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे एक ऐसी फिल्म है जो भाजपा की दक्षिणपंथी सांस्कृतिक राष्ट्रवादी रुझानों को तुष्ट करती है और 18 साल की उम्र पार कर चुकी इस फिल्म पर इस बयान के बाद यह कम खतरा नहीं है कि आगे इसे इसी रूप में विश्लेषित किया जाएगा ? इस फिल्म से एक-एक करके ऐसे रेशे निकाले जाएंगे जिसका कि समय-समय पर बीजेपी ने अपनी घोषणापत्र में और इनके प्रवक्ता ने अलग-अलग संदर्भ मसलन परिवार, विवाह, प्रेम, संस्कृति और समाज को लेकर जो कुछ कहा है, मिलान किया जाएगा. ऐसा होता है तो बीजेपी के लिए फिर भी सुविधाजनक स्थिति होगी कि उसे बिना किसी लागत, मेहनत और रचनात्मक स्तर पर संघर्ष किए एक ऐसी फिल्म मिल जाएगी जिसकी लोकप्रियता देश और दुनियाभर में कई स्तरों पर निर्धारित मानकों को लांघ जाती है. लेकिन इस फिल्म के लिए यह कम बिडंबनापूर्ण स्थिति नहीं होगी कि जो बात यह बेहद तरलता की स्थिति तक लाकर दर्शकों को संप्रेषित करती है, उनका विश्लेषण बेहद ही शुष्क और बयानों की शक्ल में कर दिया जाएगा जिसका कि इस फिल्म से सीधा-सीधा नाता न भी रहा हो.


 लेकिन यह भी है कि ठीक लोकसभा चुनाव 2014 के परिणाम घोषित होने के चौबीस घंटे के भीतर ही बहुमत की सरकार बनाने जा रही पार्टी बीजेपी के कला एवं संस्कृति प्रकोष्ठ के संयोजक ने सिनेमा संबंधी अपनी रणनीति को लेकर इस फिल्म को जिस रूप में शामिल किया, कम से कम सिनेमा और पब्लिक स्फीयर के संदर्भ में इसे काटकर नहीं देखा सकता है. यहां बीजेपी की सिनेमा संबंधी रणनीति, सिनेमा के माध्यम से राष्ट्रवाद, संस्कार और मूल्योंका प्रसार संबंधी परिवर्तनकामी दृष्टिकोण के विस्तार में न भी जाएं और फिलहाल सिर्फ इसकी इस सिरे से चर्चा करें कि आखिर एक ऐसी फिल्म जो न केवल बनाए जाने की नीयत में विशुद्ध लव स्टोरी है जिसकी चर्चा न केवल दर्जनों फिल्म समीक्षकों द्वारा बार-बार की जाती रही है बल्कि स्वभाव से बेहद संकोची औरफिल्म की अपार सफलता के बावजूदइंटरव्यू के नाम पर मीडिया के आगे शर्माते रहे स्वयं फिल्म के निर्देशक आदित्य चोपड़ा द्वारा भी इसके केन्द्र में लव स्टोरी ही बताया जाता है और दर्शक-प्रभाव तो इसी रूप में हैं ही फिर इसमे ऐसा क्या है कि बीजेपी इसे आदर्श फिल्म के रूप में देखती है, आगामी फिल्म के लिए नमूना मानती है ? क्या बीजेपी प्रेम और प्रेम कहानी को लेकर उसी रूप में उदार है जैसा कि फिल्म के अंत तक आते-आते चौधरी बलदेव सिंह( सिमरन के पिता) हो जाते हैं जिन्हें अपनी पारिवारिक परंपरा और संस्कारों के आगे इस बात पर ज्यादा गहरा यकीन होता है किउसकी बेटी कोइस लड़के( राज) से ज्यादा और कोई प्यार नहीं कर सकता.दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे अगर बीजेपी के लिए आदर्श फिल्म का नमूना है तो इसका मतलब है कि वो न केवल सिनेमा में बल्कि समाज में भी प्रेम को भी उसी रूप में स्वीकार करती है, उसे प्रोत्साहित करती है और उसकी इच्छा है कि ऐसी फिल्में युवाओं के बीच प्रेम को जीवन का अंतिम सत्य( मानुष प्रेम भए बैकुंठी) के रूप में प्रस्तावित करे. ऐसा सचमुच है क्या ?


यदि ऐसा होता तो इस फिल्म के रिलीज होने के बारह साल बाद परोमिता बोहरा को मोरलिटी टीवी एंड द लविंग जिहाद जैसी डॉक्यूमेंटरी फिल्म बनाने की जरूरत नहीं पड़ती. मेरठ के पार्क में अपनी भावनाओं का इजहार कर रहे प्रेमी युगल को पुलिस जितनी बेरहमी से डंडे मारकर भगाती है, मीडिया जिनमे प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों शामिल हैं, जिस बेहयापन के साथ इस पर अश्लीलता का मुल्लमा चढ़ाने के लिए तत्पर होता है, उतने ही अमानवीय होकर बजरंग दल जैसे संस्कृति रक्षक इन पर टूट पड़ते हैं. वो इन पर हमला करके, इन्हें कुचलकर संस्कृति और भारतीय परंपरा हो हर हाल में बचाना चाहते हैं..बजरंग दल जैसे संस्कृति रक्षक की दमन की हद तक मोरेल पुलिसिंग सिर्फ वेलेंटाइन डे या किसी एक सिनेमा को लेकर स्थिर नहीं हो जाती बल्कि सेंसर बोर्ड, संबंधित संस्थाओं की ओर से अनुमोदित कर दिए जाने के बावजूद रूटीन वर्क के रुप में जारी रहती है. यह सच है कि तकनीकी रूप से बीजेपी को बजरंग, शिव सेना या राम सेना जैसे संगठन और पार्टी का पर्याय के रूप में नहीं देखा जा सकता( समय-समय पर पार्टी स्वयं इससे अपने को अलग करती आयी है) लेकिन संस्कृति,परंपरा, प्रेम और स्त्री-पुरुष संबंधों को लेकर जो नजरिया इनका है, बीजेपी ने उससे कोई अलग उदाहरण पेश नहीं किया है. मिथिलेश कुमार त्रिपाठी ने सिनेमा और संस्कृति को लेकर जो बयान दिया, उसके बाद द संडे गार्जियन में तनुल ठाकुर को जो इंटरव्यू दिया, उसमे भी स्पष्ट है कि ट्रीटमेंट के स्तर पर भले ही पार्टी की मुलायमियत होगी और वो बजरंग दल या शिव सेना जैसा कुछ नहीं करेगी लेकिन जिस सिनेमा ने सामाजिक मूल्यों का ह्रास करने, पाश्चात्य संस्कृति को बढ़ावा देने का काम किया है, इसे दुरुस्त किया जाएगा और युवाओं को हर हाल में शिक्षित किया जाएगा कि कौन सी फिल्म उनके लिए बेहतर है और कौन सी नहीं. खैर वापस डीडीएलजे की लव स्टोरी और बीजेपी द्वारा इसे आदर्श सिनेमा बनाए जाने की तरफ लौंटें....


क्या सीधे-सीधे ये कहा जा सकता है कि बीजेपी को डीडीएलजे की प्रेम कहानी से कोई लेना-देना नहीं है बल्कि इस प्रेम कहानी के इर्द-गिर्द जो संरचना खड़ी होती है, उसका मोह उनके प्रति ज्यादा है. ये संरचना कहानी के बढ़ने के साथ ध्वस्त होने की आशंका और फिर आगे चलकर संरक्षित रह जाने के जश्न के बीच की है. सतही तौर पर ही सही लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि ये एक ऐसी कहानी है जिसका गाढ़ापन प्रेम को लेकर है लेकिन जिसकी पूरी शर्तें परिवार को बचाए रखने की है और ऐसे में ये शर्तें स्थायित्व को मूल्य के रूप में प्रस्तावित करती है. पूरी फिल्म में इस स्थायित्व के कई संस्करण बनते नजर आते हैं और जिसकी शुरुआत राज और सिमरन की प्रेम कहानी शुरु होने से पहले ही हो जाती है जहां राज अपने बिंदास और खुलेपन स्वभाव के बीच सिमरन के आगे स्वीकार करता है कि उसे अफयेर तो कई लड़कियों के साथ हुआ है लेकिन जिंदगी में प्यार पहली बार हुआ है.


जाहिर है इस प्यार को स्थायित्व तभी मिलेगा जबकि इसे शादी की शक्ल दी जाए और विवाह संस्था में यकीन रखने का मतलब है परिवार की उस नींव को और मजबूती देना जिसकी कामना भारतीय समाज में की जाती रही है. प्रेम की अंतिम परिणति विवाह है, पूरी फिल्म इसे जिस तरलता के साथ स्थापित करती है, उससे एक ही साथ दर्शकों को अपने से बांधने और स्थायित्व को मूल्य के रुप में प्रस्तावित करने का काम साथ-साथ हो जाता है. 1995 का वह भारतीय समाज जहां प्रेम और प्रेम विवाह की स्वीकार्यता मध्यवर्ग तक एक सामान्य घटना के रूप में स्वीकृत नहीं हुई हो, जो कि इसके बिना पर ऑनर किलिंगजैसे लेबल के साथ हत्या तक जा पहुंचती हो, ऐसे में प्रेम विवाह को पारंपरिक/एरेंज मैरेज की शक्ल में परिवर्तित करना, परस्पर विरोधी मिजाज के अभिभावकों के लिए स्वीकार्य बनाना, कम युगांतकारी कदम नहीं माना जाएगा. शायद यही कारण है कि जो राज बीयर जैसी मामूली चीज के लिए अपने भावी ससुर से हिन्दुस्तानी होकर इंग्लैंड की जमीन पर झूठ बोलता है वही राज अपने इस प्रेम को एरेंज मैरिज की शक्ल तक इंतजार करने की स्थिति तक आते-आते पंजाब की जमीन पर अपना लिया जाता है. एरेंज मैरिज का मतलब प्रेम में भले ही वो मिजाज से मजनूं हो जाए लेकिन संस्कार से दामाद के रुप में स्वीकार न कर लिए जाने तक सबकुछ बर्दाश्त करेगा, वह इसके लिए उन अभिभावकों के विरोध में नहीं जाएगा जिसने उसके प्रेम( यहां सिमरन) को पाल-पोसकर बढ़ा किया है. आदित्य चोपड़ा भी निजी तौर पर यही मानते हैं.



 क्रमश: 
मूलतः प्रकाशित- संवेद, सिनेमा विशेषांक 2014 

Wednesday, April 16, 2014

इरशाद कामिल : विभाग के बदले बॉलीवुड जाने का मतलब

चवन्‍न्‍ाी के पाठकों के लिए विनीत कुमार का विशेष आलेख। इसे रचना सिंह के संपादन में निकली दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय की हस्‍तलिखित पत्रिका हस्‍ताक्षर से लिया गया है।                                          

-विनीत कुमार 
ये, येsss  हो तुम, जिसकी लिखी चीजें छापने से संपादक मना कर दिया करते हैं. असल में तुम यही हो,वह इरशाद कामिल नहीं जिसकी तारीफ लोग करते हैं.  मेरी पत्नी, पत्रिकाओं से अस्वीकृत रचनाएं खासकर पहल और उस पर ज्ञानरंजन की चिठ्ठियां दिखाते हुए अक्सर कहती है. ऐसा करके खास हो जाने के गुरुर में जीने से रोकती है. वो तो फिल्मफेयर और रेडियो मिर्ची से मिले अवार्ड से कहीं ज्यादा इन अस्वीकृत रचनाओं और न छापने के पीछे की वजह से लिखी ज्ञानरंजन और दूसरे संपादकों के खत ज्यादा संभालकर रखती है. उनका बस चले तो ड्राइंगरुम में अवार्ड की जगह इन्हें ही सजाकर रक्खे ताकि दुनिया जान सके कि असल में इरशाद कामिल है क्या और उसकी हैसियत क्या है ? 
तब इरशाद के गिलास का रंग बदला नहीं था. हम गिलास के आर-पार सबकुछ साफ देख पा रहे थे और साथ ही उन्हें भी. उत्साह और मुस्कराहट के साथ एक के बाद एक घटनाओं की चर्चा करते इरशाद. तो यही हैं इरशाद कामिल..मन सात संमदर डोल गया( चमेली 2004), आंखो जो मेरी आंखो में है ( सोचा न था 2005), सड्डा हथ, एत्थे रख( रॉकस्टार 2011), आओगे जब तुम ओ साजना, अंगना फूल खिलेंगे (जब बी मेट 2007), हुआ चारो ओर शहनाई शोर, जो मेरी ओर तू निकला( रांझणा, 2013) के गीतकार.  लेकिन ये हमसे अपने गीतों पर बात न करके खालिस उस साहित्यिक दुनिया की बात क्यों कर रहे हैं जो इरशाद क्या किसी भी ऐसे शख्स के लिए एक समय के बाद वो छूटी हुई गली हो जाती है जो उसमे या तो नास्टॉल्जिया ढूंढता है या फिर कोई गहरी कसक जिससे छिटककर  टीवी और सिनेमा के पर्दे के व्याकरण( जाहिर है, शब्दों और बैलेंस शीट दोनों के संतुलन) में उलझकर, फंसकर रह जाता है. आखिर हमने भी तो अपने आसपास दर्जनों ऐसे दोस्त देखे हैं जिनके हाथों में एमए, एम.फिल् के दिनों में अंधेरे में या सूखा बरगद की प्रति हुआ करती थी और जो वर्चुअल स्पेस की दुनिया से बिल्कुल दूर थे, हम जैसों के दवाब और उपहास में कभी आ भी जाते तो वहां भी नामवर सिंह और रामविलास शर्मा पर लेख खोजने लग जाते और न मिलने पर झल्लाकर छोड़ देते- ये तुम्हारे इन्टरनेट की दुनिया बिना इनलोगों के डब्बा है, मुबारक हो तुम्हें ही ये कीबोर्ड की किचिर-पिचिर और फिर से उसी हार्डकॉपी की साहित्यिक दुनिया में लौट जाते.
 लेकिन अब मिलिए तो जरा इन दोस्तों से..हर बीस मिनट में उंगलियां स्मार्टफोन की टच स्क्रीन पर होती है और दो घंटे के लिए भी मनकंट्रोल डॉट कॉम नहीं देखा तो असहज हो जाने लगते हैं. हर बात के पीछे फेसबुकिए गॉशिप घुस आते हैं या फिर घुमा-फिराकर उसी न्यूजरुम की डायलॉग मार देते हैं- अच्छा लेखन वही है, जो चैनल की बैलेंस शीट मजबूत करे.

इस माहौल से अभ्यस्त बहसतलब 2013 के लिए मुंबई से आए इरशाद कामिल से महिपालपुर( गुडगांव) के होटल में जब हमारी पहली और अब तक की आखिरी मुलाकात हुई तो लगा कि इस शख्स के लिए भी साहित्य और कविताओं पर बात करना टेस्ट चेंजर या सिनेमा इन्ड्स्ट्री की उठापटक के बीच कॉमिक रिलीफ से ज्यादा कुछ भी नहीं है और इस बात से इसलिए भी आश्वस्त हुआ जा सकता था कि हमने बातचीत के दौरान ये जाहिर कर दिया था कि हम जितने लोग आपसे घिर हैं, ज्यादातर हिन्दी साहित्य से ही एमए हैं. मिहिर,सुमन, खुद मैं और अविनाश( मोहल्लालाइव) जैसे लोग साहित्य के डिग्रीधारी न होते हुए भी समझ और अभिव्यक्ति में जिस तरह हम जैसों को लजाते और ललकारते आए हैं, इरशाद को हुलकाने( उत्साहित करने) के लिए हमसे ज्यादा जरुरी थे. इधर सिनेमा अध्ययन में लगे प्रकाश के रे की बातचीत के बीच में से अचानक खासकर साहित्य और राजनीति के लेकर मुद्दों को हथिया लेने की कलाकारी कब असरदार नहीं हुआ करती है और आचार्यत्व के अंदाज में खोद-खोदकर पूछने की रंगनाथ सिंह का अंदाज के बीच इरशाद अपने स्वाभाविक आदिम उत्साह और साहित्यिक परिचर्चा से अपने को रोक नहीं पा रहे थे. इससे पहले मैंने कभी किसी ऐसे शख्स को साहित्य पर इतनी तल्लीनता से बात करते हुए नहीं सुना था जो दिन-रात उस व्यावसायिक सिनेमा के बीच जीता हो, उनकी शर्तों के बीच से विचारों और शब्दों की आवाजाही करने की कोशिश करता हो जो कामर्स से बुरी तरह डरे हुए हैं और उनका वो डर गीतकार, पटकथा लेखक की शैली और अंदाज बदलने पर आमादा रहता हो. हां, पटकथा लेखक संजय चौहान( पान सिंह तोमर) की पूरी बातचीत में जरुर एक प्रोफेसर का इत्मिनान और गंभीरता है. तब मुझे बिल्कुल पता नहीं था कि इरशाद के साथ वो कौन सा असर काम कर रहा था कि बीच-बीच में घड़ी देखने , नीचे मेरे एक दोस्त इंतजार कर रहे हैं, मैं सुबह के लिए लेट हो जाउंगा के बीच भी एक के बाद एक कविता, गजल पहले के लिखे वो हिस्से सुनाते रहे जिसके बारे में उन्होंने बार-बार कहा- आप इन सबकी कॉपी मत कीजिएगा क्योंकि मैं ही अपनी चीजों की चोरी करता रहता हूं. लोगों को ( इशारा साहित्य के लोगों की तरफ था) तो ये चीजें काम की लगती नहीं इसलिए मैं ही अपने पुराने लिखे को अब अपने गीतों में, स्क्रिप्ट में इस्तेमाल करता हूं. सच कहूं तो मैं जो आपको सुना रहा हूं न वो कुछ भी नया नहीं है. नया है तो बस ये कि आप सब इसे इतना गौर से, दिल से सुन रहे हैं.

 माहौल कुछ ऐसा बना था कि जिस चीज की जरुरत हो, जो लोग इरशाद के इंतजार में होटल की लॉबी में बैठे इंतजार कर रहे हों, सबों को यहीं ले आओ, बुला लो लेकिन खुद कोई कहीं नहीं जाएगा. रामकुमार सिंह( भोभर फिल्म के निर्माता-निर्देशक) तो इस माहौल में इतने उत्साहित थे कि अगर उनकी बातों पर हमने यकीन कर लिया होता तो मुंबई के लिए फ्लाईट भी होटल के कमरा संख्या 106 में आ लगती. हां इस दौरान दुष्यंत कुमार जरुर हॉस्टल के उस बच्चे की तरह थोड़े कटे-कटे और हल्के घबराए से थे जिसके कमरे में बाकी के वो दोस्त फुल-टू-मस्ती कर रहे हों लेकिन उसे सुबह उठकर ही परीक्षा देने जाना हो. दुष्यंत को अगली ही सुबह हिन्दू कॉलेज में स्वरचित कहानी पाठ के लिए जाना था. बहरहाल

इरशाद अपनी पूरी बातचीत में साहित्यिक पत्रिकाओं में रचनाएं भेजने और अस्वीकृत कर दिए जाने के प्रसंग को कुछ ज्यादा ही गंभीरता और गाढ़ेपन के साथ याद कर रहे थे. खासकर ज्ञानरंजन की वो चिठ्ठियां जिसमे उनके न छापने का जिक्र किया होता. रहा नहीं गया और तब मैंने पूछ ही लिया- आपको पहल में न छपना इतना परेशान करता है, वो भी तब जबकि न जाने कितने लोग आपकी कलम के दीवाने हैं, आपसे एक मुलाकात को लॉटरी समझते हैं और दिनर थै-थै करके घूमते फिरते हैं. क्या फर्क पड़ता है पहल में न छपने से ? सच कहूं तो असल में पहल में छपना मेरी जिद है, कुछ-कुछ उसी तरह की जिद जैसे क्लास की बाकी लड़कियां तो मुझे पसंद करती हैं लेकिन वो नहीं करती जिसे कि मैं करता हूं. वो चीज बड़े होने के बावजूद आपके भीतर तक अटकी रहती है लेकिन कई बार लगता है मेरी इस जिद से कहीं ज्यादा मुझे न छापने की ज्ञानरंजन की ज्यादा बड़ी जिद है. लेकिन मैं अब भी समय निकालकर उन्हें अपनी रचनाएं भेजता हूं और मुझे लगता है कि एक न एक दिन ऐसा तो आएगा ही जहां मेरी इस जिद के आगे उनकी जिद मान जाएगी. मेरी पत्नी ये सब देखती रहती है और उसने समझ लिया है कि पहल में न छपने को मैं किस तरह से लेता हूं. तभी तो मैंने आपको पहले कहा न कि वो मुझे इन्हीं अस्वीकृत रचनाओं को दिखाकर मुझे बताती रहती है कि मैं क्या हूं  ?

ये कहां मिलेगा कि मैं एक के बाद एक अपनी कविताएं सुनाता जा रहा हूं और आप सुनते जा रहे हैं. यहां तो आलम है कि पिछले दिनों जब मेरी किताब समकालीन हिन्दी कविताः समय और समाज आयी तो अशोक वाजपेयी ने कहा कि अब सिनेमा के लोग भी कविता पर किताब लिखने लगे हैं. लेकिन साहब, सच बात तो ये है कि मैं सिनेमा और साहित्य के बीच पुल बनने आया हूं. मैं सिनेमा में इसलिए गया कि मैं उसमे साहित्य को बचा सकूं-

मैं वो हूं जिसके खून में, खुद्दारी और जिद बहे / मेरे साथ चल मेरी शर्त पर, चल न सके तो न सही
इस बेखुदी दौर की मैं आखिरी उम्मीद हूं/ ये शर्त एक सच्चाई है, कोई न पढ़े तो न सही.

देर शाम शुरु हुई बातचीत जो कि आगे आधी रात तक चली के दौरान इरशाद ने साहित्य और सिनेमा के अन्तर्संबंधों को लेकर जो कुछ भी कहा और पहली ही मुलाकात के बाद उनके प्रति मेरी जो अतिरिक्त दिलचस्पी पैदा हुई और तब से उन पर लिखे, उनकी कही लगभग हर बातों से गुजरने की कोशिश करने के क्रम में मैंने महसूस किया कि नहीं, इस शख्स के लिए सिनेमा के बहाने साहित्य को शामिल करना या फिर हम जैसे साहित्यिक कक्षाओं के कार्डधारी के बीच सिनेमा को लगभग साइड करके साहित्य पर बात करना कॉमिक रिलीफ का हिस्सा नहीं है बल्कि एक किस्म की धुन है जिसे कक्षाओं में पढ़ाते हुए हम जैसे सिकंस( सिलेबस कंटेंट सप्लायर) एकाधिकार से और इससे छिटककर न्यूजरुम में शिफ्ट हुए लोग लोकोक्ति और मुहावरे की शक्ल में कि साहित्यिक ज्ञान छांटने से यहां नहीं चलेगा, ये चौबीस गुना सात का न्यूज चैनल है जिसे रिक्शेवाले से लेकर कंपनी के सीइओ तक देखते हैं, अपनी भाषा बदलो अक्सर या तो मार देते हैं, पनपने नहीं देते या फिर नजरअंदाज करते जाते हैं. जाहिर है, ये दोनों ही स्थितियां क्रमशः अकादमिक और मीडिया उद्योग की पैदाईश है. एक में जहां अपनी जागीर होने का इत्मिनान है तो दूसरे में अतिरिक्त सतर्कता के नाम पर साहित्यिक समझ को मीडिया के लिए गैरजरुरी और कबाड़ करार देने की नासमझी. इरशाद की बातों और गीतकार के रुप में उनके काम से गुजरने पर इन दोनों से अलग जो स्थिति बनती है वो कम दिलचस्प और उपर के इन दोनों पेशे में लगे लोगों के लिए गौर करने लायक नहीं है.
देखिए, बात बहुत साफ है..मैं साहित्य को सिनेमा के उपर थोपना नहीं चाहता. मैं जानता हूं कि सिनेमा आम आदमी( तब आप का गठन नहीं हुआ था) का माध्यम है. आज से पचास साल पहले का जो सिनेमा है वो उस समय के लोगों के हिसाब से था और आज जो फिल्में बन रही हैं, वो आज के लोगों के हिसाब से है. अब मैं इस दौर में जिस भाषा का इस्तेमाल कर रहा हूं वो न तो कोई इल्म है और न ही कोई खिचड़ी भाषा है. पहले लोगों की जुबान खालिस उर्दू-हिन्दुस्तानी थी तो सिनेमा में भी वैसा ही था..अब नहीं है, उसमे अंग्रेजी आ गयी है तो हमारे गीतों में भी है और मैं फिर कह रहा हूं कि ये कोई इल्म नहीं, जरुरत है.[1]

 इरशाद भाषा के सवाल पर राज्यसभा टीवी के गुफ्तगू कार्यक्रम में इरफान के सवालों का जो कि खुद भी भाषा बरतने में बेहद गंभीर हैं और आकाशवाणी के एफएम गोल्ड के जमाने से ही अपनी इस खासियत के लिए मशहूर रहे हैं जवाब दे रहे होते हैं. इसी क्रम में इरफान ने जब कुन फाया कुन( रॉकस्टार, 2011) की एक पंक्ति जब कहीं पे कुछ नहीं था, नहीं था. वही था, वही था में भी के प्रयोग को लेकर सवाल करते हैं और एक तरह से व्याकरणिक दोष करार देते हैं. ऐसे में इरशाद का बिल्कुल ही सपाट अंदाज में जवाब होता है - जिन लोगों को ये भी की गड़बड़ी लगती है, माफ कीजिएगा उन्हें ये लाइन समझ में ही नहीं आयी. उसके बाद  जब कहीं पे कुछ भी नहीं भी, नहीं था की व्याख्या करते हैं जिसे कि इरफान आखिर तक सिनेमेटोग्राफी के लिहाज से भी गैरजरुरी बताते हैं. [2]थोड़े वक्त के लिए हम इस भी की बहस में पड़ने के बजाय इस सिरे से सोचें कि इरशाद इसकी व्याख्या के लिए जिन औजारों का इस्तेमाल करते हैं वो क्या है ? इरफान इस तरह की गड़बड़ियों को हो सकता के अंदाज में व्यावसायिकता के दवाब का हिस्सा मान लेने की छूट दे देते जिसे कि आमतौर पर इन्डस्ट्री का आदमी सहजता से स्वीकार कर लेता है लेकिन नहीं, इरशाद अपने तर्क में उत्प्रेक्षा, वक्रोक्ति, दृष्टांत अलंकारों की जो परिभाषा और लक्षण हम सब पढ़ते आए हैं, उन खिड़कियों से इसे देखने-समझने की बात करते हैं.

 हिन्दी साहित्य का एक छात्र जो बॉलीबुड के मुकाम पर जा पहुंचा हो( हालांकि वो स्वयं इसे पड़ाव ही मानता है) लेकिन शब्दों की व्याख्या के क्रम में अब भी उन्हीं औजारों, उन्हीं तालिम को पुरजोर तरीके से शामिल करता हो जिसे कि हम साहित्य पढ़ते-पढ़ाते हुए भी मध्यकालीन काव्य के व्याख्याकारों के मतलब की चीज करार देकर चलता कर जाते हैं, इससे सुखद और गर्व करने की चीज क्या हो सकती है ? इरशाद कामिल पर लट्टू होने, अंधभक्त और पक्षधर होने के लिए किसी भी हिन्दी-उर्दू-पंजाबी के साहित्य के छात्र के लिए इतना काफी नहीं है कि वो बॉलीबुड इन्डस्ट्री जो कि अपनी पूरी बिजनेस पैटर्न में बेहद क्रूर है, में घुसकर साहित्य के लिए लड़ रहा है, ठेल-धकेलकर उसके लिए जगह बना रहा है. आपको हैरानी नहीं होती कि भाषा और खासकर हिन्दी के इतने हिमायती तो हम-आप भी नहीं होते जो हिन्दी बचाने के नाम पर ही वित्तकर्म में सक्रिय हैं. ये अलग बात है कि हम ज्यादातर उनके बीच हिन्दी बचाने की कोशिश में हैं जो स्वयं हिन्दी से बचना चाहते हैं. लेकिन इस सपाट पक्षधरता के बीच जो दूसरी स्थिति है वो कहीं ज्यादा संश्लिष्ट और गहरी है जिससे गुजरकर ही हम ये बेहतर समझ पाते हैं कि आखिर इरशाद कामिल जैसे गीतकार को सिनेमा में साहित्य की छौंक क्यों जरुरी लगती है और उस छौंक की सामग्री आती कहां से है ?
कुछ न हुए तो न सही/ कुछ न हुए तो न सही/ कुछ न रहे तो न सही
मेरी सोच ने तेरे हुस्न के सोलह सिंगार कर दिए/ अब मुझसे रूठ के सनम/ तू न सजे तो न सही
ले फूल तुझको कह दिया/ ले चांद भी कह देते हैं/ अब भी तेरी रुठी नजर अगर न हंसे तो न सही
  xxx             xxx               xxx               xxx            xxx           xxx              xxx
 इक पेड हमने प्यार का / कामिल लगाना है जरुर
फल आ गए तो ठीक है/ वो न फले तो न सही.

इम्तियाज की पहली फिल्म सोचा न था( 2005) का ये गाना असल में मेरी एक गजल का हिस्सा है जिसे कि मैं मुशायरे में सुनाया करता था. इक पेड वाली लाइन को हमने सोचा न था में स्टार्ट की लाइन बनायी थी जिसे कि इम्तियाज ने कहा कि इसमे तुम्हारा घटिया सा नाम आ रहा है, इसको हटाओ. तो इसे हम ऐसा करते हैं, इस तरह से कर देते हैं- इक पेड़ हमने प्यार का मिल के लगाया था कभी. इम्तियाज के लिए ये अब ये परफेक्ट था और इसमे फिर भी मेरा नाम का मिल  यानी कामिल आ जा रहा था. इरशाद जब ये संस्मरण हमें सुना रहे होते हैं तो रेडियो मिर्ची पर दिए इंटरव्यू[3] से कहीं ज्यादा शरारती मुस्कराहट कमरे में चारों तरफ फैल जा रही थी.
मुझे हमेशा से ये बात चुभती रही है कि हिन्दी सिनेमा में गीतों पर जो काम हो रहा है, वो उस धारा का काम नहीं है जो साहिर लुधियानवी, मजरुह साहब जैसे लोगों के बीच से विकसित हुई थी. ऐसा नहीं था कि उनके गीतों में कॉमर्स नहीं था लेकिन वो कामर्स होते हुए भी लिटरेचर था, साहित्य था. अब साहिर साहब की ये पंक्तियां देखिए-  ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनियां/ ये इंसान के दुश्मन समाजों की दुनियां/ ये दौलत के भूखे रवाजों की दुनियां/ये दुनियां अगर मिल भी जाये तो क्या है या फिर मजरुह सुल्तानपुरी साहब की- हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह/ हम हैं मता-ए-कुचा-ओ-बाजार की तरह/ उठती है हर निगाह खरीदार की तरह. असल में हुआ ये कि जब मैं इन्डस्ट्री में आने की सोच रहा था तो देखा कि सिनेमा से साहित्य का नमक निकल गया है. कुछ आड़ी-तिरछी तुकबंदी कर ली और हो गया गीत. ये इन्डस्ट्री की बदकिस्मती है कि सबके सब डायरेक्टर म्यूजिकल नहीं है, प्रोड्यूसर को संगीत की अच्छी समझ नहीं है और ये जो गाना पास करने वाली बात है न......[4] इरशाद को जो शिकायत सिनेमा में संगीत और साहित्य की समझ को लेकर रही है, गौर करें तो वो शिकायत मुख्यधारा मीडिया से अलग नहीं है. जिस पर तुर्रा ये कि बड़ी आसानी से पल्ला झाड़ लिया जाता है कि जैसा और जो लोग देखना चाहते हैं, हम वही दिखा-सुना रहे हैं. यानी मीडिया व्यवसाय का वाणिज्य-व्याकरण जिसे सही करार दे रहा है, उसे छोड़कर व्याकरण और संवेदना और रचनात्मकता के दवाब को भला कैसे महसूस किया जा सकता है ? एफ एम चैनलों की भाषा के संदर्भ में हम भाषा निवेश का मामला है, लगातार टिप्पणी करते आए हैं. न्यूज मीडिया बिजनेस में तो सरोकार फिर भी वक्त-वेवक्त थोड़ी दूर ही सही, पीछा करने लग जाता है लेकिन व्यावसायिक सिनेमा के गीत तो कई बार छुट्टा-सांड की तरह आइटम सांग और समय की मांग के नाम पर कूलट्रैक बनकर कानों और डांस फ्लोर पर कब्जा जमा लेते हैं. ऐसे में इरशाद के फिल्मी गीतों में साहित्य की मांग और ज्यादा नहीं तो नमक के माफिक घोलने की कोशिश कम मुश्किल काम नहीं है. भाषा- व्याकरण के बूते वाणिज्य-व्याकरण से टकराना वैसे भी कोई हंसी-खेल है क्या ?

लेकिन अच्छी बात है कि इरशाद के पास इस बात की खूबसूरत इल्म है कि व्यावसायिकता की अटारी पर चढ़कर, उनकी शर्तों को ध्यान में रखते हुए साहित्यिक तर्क के साथ कैसे जिया जाए, रचा जाए. उनके ही शब्दों में- काम तो सभी कर रहे हैं लेकिन काम को आगे कितना ले जा रहा है,चल तो सभी रहे हैं, कोई सीधी सड़क पर तो कोई कोल्हू के बैल की तरह, असल बात तो यही है. अपने काम को लेकर उनका कहा अक्सर ध्यान आता है- मैं जब गीतों पर काम कर रहा होता हूं, जाहिर है किसी न किसी प्रोड्यूसर-डायरेक्टर के लिए तो कई बार साथ बच्चे होते हैं और मैं उन्हें बस इतना कहता हूं- मैं भी अपना होमवर्क कर रहा हूं. साहब, ये जो मेरा आप काम देख रहे हैं न, उनमे से नब्बे फीसद हिस्सा वही होमवर्क है लेकिन जो दस फीसद बचा है, उसी के लिए ये होमवर्क करता रहता हूं. जिस दिन ये अनुपात उलट जाए न तो ये इरशाद कामिल धरती की गति बदलकर रख देगा. आप जिसे कामयाबी कहते हैं, वो दरअसल एक पड़ाव है क्योंकि लिखने की ललक कभी खत्म नहीं होती और आगे चलता चला जाता हूं..ये लिखना ही सबकुछ है, आप इसे मन हो तो कामयाबी कह लीजिए, शोहरत. लेकिन मेरे लिए तो बस लिखने की चाहत है जिसके लिए इरशाद कामिल आपके बीच है.
हिन्दी के किसी अकादमिक बल्कि कहिए कि परीक्षोपयोगी सवाल की तरह प्रतिपादित न भी करें कि इरशाद कामिल मूलतः कवि हैं या फिर सिनेमा उद्योग के गीतकार( हालांकि इरशाद खुद को पहले कवि और तब गीतकार मानते हैं.[5] संदेश शांडिल्या( चमेली 2003, और तब इम्तियाज अली की पहली फिल्म सोचा न था( 2005)  के संगीत पर काम कर रहे थे, इम्तियाज अली से उनका परिचय बतौर एक कवि करवाया, न कि एक गीतकार के रुप में. कारवां के लिए अक्षय मनबानी से हुई बातचीत में शांडिल्या ने यहां तक कहा कि- इस सिनेमा इन्डस्ट्री को एक शायर, एक कवि मिल गया) तो भी उनसे हुई अनौपचारिक बातचीत और विभिन्न माध्यमों के लिए दिए इंटरव्यू से गुजरते हुए स्पष्ट है कि ये शख्स अपने को पहले साहित्यकार, कवि कहलाना पंसद करता है. न केवल पसंद करता है बल्कि भीतर की बेचैनी, छटपटाहट है कि साहित्य के लोग उन्हें बतौर इस रुप में स्वीकार करें. लंबे समय से पहल और ज्ञानरंजन को लेकर आशिक की जिद इसी नतीजे के रुप में नजर आती है और यहीं से एक सवाल जिस पर कि गंभीरता से बात होनी चाहिए कि क्या जो लोग घोषित तौर पर बल्कि विधि-विधान( साहित्यिक पत्रिकाओं या हिन्दी विभाग से जुड़कर) से लेखन कर रहे हैं, साहित्यकार होने का सुख हासिल कर सकते हैं और बाकी के लोग, बाहरी लोग हैं ? ये बहस सिर्फ इरशाद कामिल जैसे किसी एक शख्सियत तक सीमित नहीं है बल्कि इसका एक सिरा पॉपुलर बनाम अभिजात्य की उस बहस में दोबारा जाकर खुलती है जहां लोकप्रियता, उद्योग के बीच( सिनेमा और मीडिया) की व्यावसायिक रचनात्मकता खारिज न किए जाने के बावजूद भी हाशिए पर धकेल दी जाती है. ये

कितना हास्यास्पद है कि साहित्य की कक्षाओं में हमारे जैसे हजारों सिकंस( सिलेबस कंटेंट सप्लायर) साहित्य के बीच हमेशा एक ऐसी चौड़ी सड़क तैयार करने की कोशिश करते हैं जो धक्का-मुक्की करके, चाहे किसी भी तरह मीडिया, सिनेमा और रोजगारोन्मुख दूसरे क्षेत्र की तरफ खुल जाए और ऐसा करने के लिए हम मजबूर भी हैं क्योंकि पाठ्यक्रम निर्माताओं ने यह मान लिया है कि हिन्दी और साहित्य तभी बचेगा जबकि बाजार की चकाचौंध के बीच इसकी आंखें चुंधिआने के बजाए आसानी से एडजेस्ट कर जाए..ऐसा करते-करते हम कितनी हिन्दी, कितना साहित्य और कितना शब्दों में अन्तर्निहित विचारों को बचा पाते हैं, ठीक-ठीक मालूम नहीं लेकिन एक शख्स जो खुलेआम शब्दों और विचारों को लेकर बैलेंस शीट पर दौड़ लगाते हुए भी यह कहता कि अगर आप शब्दों के जरिए विचारों तक पहुंचते हैं तो वो कामर्स है और अगर विचारों के जरिए शब्दों तक पहुंचते हैं तो कला और साहब मेरे लिए इस अर्थ में गीत भी कला है, साहित्य है. रॉकस्टार में मैंने गीत के नाम पर जो कुछ भी किया, वो साहित्य है..तो हिन्दी का लोकवृत्त और उनके पुरोधा सिनेमावाला की स्टीगर चिपकाने से बाज नहीं आते. हम परीक्षाओं में अक्सर झक्क मारकर किसी सिनेमा शो के लिए, रेडियो के लिए छात्रों को स्क्रिप्ट लिखते देखते हैं जिनके परिचय पत्र पर आनर्स इन हिन्दी टंकित है, ऐसे में इरशाद कामिल के तर्क और उनका काम ध्यान आता है और लगता है कि उनके इस दावे और यकीन को सही संदर्भ में विस्तार देने की जरुरत है.

कोई दुराव-छुपाव नहीं. जो शख्स विज्ञान की पढ़ाई से बचने के लिए दो दिन कहकर महीनों शिमला में इसलिए जाकर अटक जाता है कि उसे वहां साहित्यिक और नाटकीय गतिविधियों में जाने का मौका मिलता है और इसी शर्त पर मालेरकोटला( पंजाब) वापस आता है कि उसे साहित्य में स्नातक और परास्नातक करने की इजाजत मिल जाएगी, वही पीएचडी/ डॉक्टरेट के वक्त अपने सुपरवाइजर के सामने बिल्कुल सादे ढंग से आग्रह करता है- मुझे  अपनी पीएचडी बिना ज्यादा हील-हुज्जत के जल्दी से जल्दी खत्म करनी है. सिर्फ इसलिए कि मुझे लाइफ में बड़े-बड़े काम करने हैं, ये पीएचडी मैं टीचर-वीचर बनने के लिए नहीं कर रहा हूं......मेरे पास माल ही कुछ और है.[6]

 जब तक रचनात्मकता की पुख्ता जमीन तैयार नहीं हो जाती या फिर करिअर में कम से कम उतना हासिल नहीं हो जाता कि बुरे से बुरे वक्त चाहे कश्मीरी गेट के रिफ्यूजी और बौद्ध कैंप में गुजराने न पड़ जाएं, डिग्रीधारी हो जाने में ही भलाई है. इस बुनियादी समझ के साथ ही इरशाद ने दि ट्रिब्यून और जनसत्ता की नौकरी भी की और उसी से बचाए पैसे से दिल्ली का ये सफर भी जो कि जाहिर है तकलीफदेह होते हुए भी अन्नू कपूर के सुहाना सफर( बिग 92.7 एफ एम) का कभी भी हिस्सा बन सकता है..ये एक अजीब किस्म का अन्तर्विरोध लग सकता है कि अकादमिक स्तर पर साहित्य को जिस लगाव से पढ़ना शुरु किया, उसे पीएचडी तक आते-आते औपचारिकता में निबटा देने का अंदाज समझ की किस दिशा की ओर ले जाता है ? लेकिन अकादमिक दुनिया के भीतर साहित्यिक शुष्कता को महसूस करें और आखिर तक आते-आते यानी डॉक्टरेट तक जिस कर्मकांड का हिस्सा बनता नजर आता है, तब लगता है कि इरशाद कामिल अपने वक्त की पेंदी में छिपी बिडंबना को कितनी तल्खी से पहचान पा रहे थे. और फिर साहित्य और कविता को लेकर जो तरलता है, जो व्यावसायिक रचनात्मकता की जमीन पर आकर भी अपनी तासीर बचाए रखता है, उसके लिए कितना तर्कसंगत फैसला है.
इरशाद कामिल और उनके काम पर लिखने का सबसे बेहतर और लोकप्रिय तरीका एक तो ये हो सकता है कि उन्होंने हमसे और बाकी दूसरे साक्षात्कार में जो बातें कही है, उनकी गद्य शक्ल देते हुए, बीच-बीच में सोचा न था, चमेली, रॉकस्टार, अजब प्रेम की गजब कहानी, जब बी मेट, रांझणा और फटा पोस्टर निकाला हीरो जैसी फिल्मों के गीतों की चार पंक्तियां शामिल करते हुए विश्लेषण कर दिए जाएं. ये शैली और कौशल हमे हिन्दी साहित्य की कक्षाओं में आज से बारह-चौदह साल बल्कि उससे भी पहले मिला है. ये बेहद ही परिचित और लगभग अनिवार्य शैली है और इधर किसी गीतकार पर लिखी चीजें पॉपुलिस्ट राइटिंग का हिस्सा बने, इससे पहले ही अकादमिक टच मिल जाएगी. थोड़ी कोशिश करें तो उनके तमाम गीतों का संदर्भ भी मिल जाएगा और इसमे खुद इरशाद भी हमारी मदद करते नजर आते हैं- तुमसे ही दिन होता है/सुरमई शाम आती है/हर घड़ी सांस भरती है/जिंदगी कहलाती है/ तुमसे ही ( जब बी मेट 2007) को लेकर इरशाद का निजी अनुभव है कि जब एयरपोर्ट पर उन्हें एक साध्वी से मुलाकात होती है और पता चलता है कि इन्होंने ही ये गीत लिखी है तो वो बताती हैं कि इस गीत वो रोज सुबह प्रार्थना में गाती हैं. उपर की तरफ हाथ उठाते हुए इरशाद बताते हैं कि वो इस गीत को उस ईश्वर से जोड़कर देखतीं हैं जिसके लिए भक्तिकाव्य धारा से लेकर अभी भी न जाने कितने गीत,शब्द और
अभिव्यक्ति है. उनके लिए इस गीत में कहीं भी आदित्य( शाहिद कपूर) और गीत( करीना कपूर) का रोमांस नहीं है.

हिन्दी सिनेमा के गीतों के मौजूदा चलन पर गौर करें तो एक के बाद एक लगातार ऐसे गाने न केवल फिल्म रिलीज होने के दर्जनों दिन पहले से वाया टेलीविजन हमारी ड्राइंगरुम में, एफएम रेडियो के जरिए पब्लिक स्फीयर में पसर जाते हैं बल्कि एक स्वतंत्र परिवेश निर्मित करते हैं. जितनी कोफ्त आपको सिनेमा की कहानी से गुजरने के बाद जिस सिचुएशन पर ये गाने फिल्माए जाते हैं से होती है, उससे कहीं ज्यादा उस परिवेश से कि लोहड़ी, होली का  मैं तो तंदूरी मुर्गी हूं यार, कटका ले सइंया अल्कोहल से”,  लक ट्वंटी वेट कुडी दा, फोर्टी सेवन वेट कुडी दा या फिर लुंगी डांस जैसे गानों से क्या रिश्ता बनता है ? ऐसे में आप न केवल सिनेमा की पटकथा के साथ गीतों के संदर्भ को लेकर सोचते हैं बल्कि जीवन परिवेश को भी शामिल करके विचार करते हैं. इरशाद कामिल के गीत इनके लिए भी संदर्भ पैदा करते हैं. इरशाद के गीतों की सबसे बड़ी ताकत भी यही है कि वो हमारे जीवन के बीच के संदर्भों को ढूंढ लाते हैं. उनकी यही बात उन्हें सिनेमा की दुनिया का थॉटफुल राइटर[7] बनाता है. यानी जितना गीतों का सिनेमा में संदर्भ है, उतना ही जीवन में और शायद यही कारण है कि सड्डा हत्थ, एत्थे रक्ख( रॉकस्टार, 2011) को लेकर वो ये कह पाते हैं कि इसमे मेरा हक, मेरी मांग भी शामिल है और ये मांग जाहिर है सिनेमा और उनके गीतों में साहित्य की मौजूदगी है.

ऐसे में प्रगतिवादी काव्यधारा और प्रगतिशील काव्य का विश्लेषण करने में अभ्यस्त रहे( जाहिर है परीक्षोपयोगी और अब छात्रोपयोगी) हम जैसे सिंकस की आंखें चमक जाती है कि जो बातें हमने शमशेर के लिए, जो व्याख्या हमने नागार्जुन की कविताओं के लिए करते आए बल्कि पहले से किए गए को आगे बूफे सिस्टम की प्लेट की तरह आगे पास करते आए हैं कि कवि ने जीवन में रोटी की मांग की तरह ही कविता और भाषा की मांग की है या फिर इनकी कविता में भाषा का देशज रुप उसी तरह से शामिल है जिस तरह से लोटे की पेंदी में गांव की मिट्टी चिपकी होती है तो इससे इरशाद को सही-सही श्रद्धावश सम्मान देने की जमीन तैयार होती नजर आती है. इरशाद जब ये कहते हैं कि उन्होंने अपने गीतों की भाषा मालेरकोटला के रंगरेज, कुली, चाय बेचनेवाले,रिक्शे-ठेलेवाले के बीच से लाकर इस्तेमाल किया है तो बहुत संभव है कि अकथ कहानी प्रेम की शक्ल में कबीर की छाया खोजने लग जाएं और उनकी ही परंपरा का विकास स्थापित करने में सहूलियत हो. यह सब जानते हुए कि मध्यवर्ग/निम्न मध्यवर्ग  से आए किसी भी साहित्य और मीडिया के छात्र के लिए इस समाज से गुजरना एक्सक्लूसिव नहीं है. लेकिन

इन सबके बीच आप उस व्यावसायिकता के दवाब का क्या करेंगे, खुद इरशाद कामिल की उस स्वीकारोक्ति का क्या करेंगे जिसे वो बेहद ही सहज अंदाज में स्वीकार करते हैं कि मैं जो कुछ भी कर रहा हूं वो मेरे रोज का होमवर्क है. उस नोट करने की मनाही का क्या करेंगे जब वो हमें कहते हैं कि मैं आपके सामने कुछ भी नया नहीं कह रहा हूं बल्कि पहले से वो कहीं न कहीं मौजूद है. मैं तो बस अपने ही पुराने लिखे की चोरी कर रहा हूं. यानी साहित्यिक मिजाज और रुझान से लिखी चीजों का व्यावसायिक धरातल पर उपयोग और ऐसा करते हुए उनका पहले का लिखा संदर्भ-कोश बनता नजर आता है, उसका भी. मेरे ख्याल से इरशाद सहित बाकी के लोगों का लिखा साहित्य इसी संदर्भ-कोश के बनने की प्रक्रिया के प्रति नए सिरे से समझ पैदा करने की मांग करता है[8] जहां देशभर में खोमचे की शक्ल में क्रिएटिव और मीडिया राइटिंग के नाम पर दूकान चलाने से लेकर शॉपिंग मॉल जैसी दैत्याकार बिल्डिंगों में संस्थान चलानेवाले लोग समझ नहीं पा रहे हैं और पूरी ताकत से अपने छात्र-ग्राहकों को नहीं समझने देने के लिए रोक रहे हैं. दूसरी तरफ हम जैसे सिकंस जिनके पास साहित्य के उन्नयन के लिए बाकायदा परमिट और चालान मिली हुई है, दम ठोककर साहित्य के साथ सेवा जोड़ देते हैं लेकिन ये समझाने में नाकाम रहे हैं कि साहित्य की कक्षाओं में व्यावहारिक और रोजगारोन्मुख कौशल की जो सड़क बनाने की कोशिश करते हैं, उसमे दरअसल अभिव्यक्ति की सहजता गायब है, खुद को व्यक्त करने की छटपटाहट नहीं है. व्यावसायिक स्तर की सफलता भी कहीं न कहीं फार्मूला लेखन और मशीनी पाठ से कहीं ज्यादा इस बात पर निर्भर करता है कि हम अपने भीतर की स्वाभाविकता के साथ कैसा सलूक करते हैं..

 महिपालपुर के होटल के उस कमरे में इरशाद सहित मेरे बाकी दोस्तों के गिलास का रंग बदलने लगा था. लेकिन शागिर्दी और गुफ्तगू का नशा कितना गहरा होता है और उनके आगे रंग-बिरंगे पानी से भरे गिलास कितने निरीह जान पड़ते हैं, इसे साफ महसूस कर पा रहा था. इरशाद छूटना नहीं चाह रहे थे और हम थे कि छोड़ना नहीं चाह रहे थे. अविनाश की पीपर- सॉल्ट( काली मिर्च-नमक) टिप्पणी जारी थी- इरशाद भाई, आप अपने बारे में इतना कुछ मत बताइए, ये ब्लॉगर-पत्रकार सब हैं, लिख देंगे सब जाकर इन्टरनेट पर..लेकिन इरशाद इस बात से लापरवाह दोहराते जा रहे थे-
उठे हुए निगाह से भला क्या जान सकोगे/ इबारत है जिंदगी, हम अखबार नहीं हैं.   


संदर्भ एवं टिप्पणी

[1] गुफ्तगूः इरशाद कामिल, राज्यसभा टीवी, यूट्यूब वीडियो अपलोडेड, 27 जनवरी 2012
[2] वही
[3] शेयर सम ऑफ योर एक्सपीरिएंसेंज फ्रॉम योर फर्स्ट मूवी के सवाल पर इरशाद कामिल का जवाब. रेडियो मिर्ची 98.3 एफ एम. यूट्यूब वीडियो अपलोडेड, 25 अक्टूबर 2011
[4]  गुफ्तगूः इरशाद कामिल, राज्यसभा टीवी, यूट्यूब वीडियो अपलोडेड, 27 जनवरी 2012

[5]  इरशाद कामिल है क्या, ये मैं सबको बताना चाहता हूं. वो गीतकार तो है ही लेकिन एक कवि है, शायर है और एक इरशाद कामिल वो है जो बहुत रिवेलियन नेचर का है. रेडियो मिर्ची 98.3 एफ एम. यूट्यूब वीडियो अपलोडेड, 25 अक्टूबर 2011

[6] समथिंग टू सिंग अवाउटः अक्षय मनबानी, 1 सितंबर 2013, कारवां, दिल्ली प्रेस
[7] If you listen to the songs you will get to know what time ‘Main kya hoon’ is based in. Who says all these things? It’s the new generation, so it's based in 2009. What we did was work on the language used. Saif plays a Sikh so we have used a Punjabi accent and Punjabi words. Today youngsters use a lot more English so we've used that as well
. ये बात प्लैनेट रेडियो सिटी के लिए सौमिता सेनगुप्ता को दिए इंटरव्यू में इरशाद ने भाषाई प्रयोग को लेकर अपनी रणनीति स्पष्ट करते हुए कही . इंटरव्यू का शीर्षक है- ए थॉटफुल राइटर,
[8] हर शब्द का एक रुह होती है, हर शब्द का एक इतिहास होता है. उस इतिहास को जाने बिना और उस रुह को समझे बिना उसका इस्तेमाल कर लिया जाए तो उस तरह का असर नहीं छोड़ पाता जिस तरह का असर उसे छोड़ना चाहिए. ये इश्क मिजाजी से इश्क हकीकी तक का सफर है. रेडियो मिर्ची 98.3 एफ एम, यूट्यूब अपलोडेड, 25 अक्टूबर 2011
9. When other lyricists just play around with all those mera dil tere liye kind of rhyme and meter, lyricist Irshad Kamil uses Hindi, Urdu and Punjabi words to give a distinct flavour to his songs. Because his songs have worked even when the films didn’t, we think Irshad is the Next Big Thing. नेक्सट बिग थिंगः मीट वर्डस्मिथ इरशाद कामिल. सोमेन मिश्रा, सीएनएन-आइबीएन, 18 जनवरी 2008