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Saturday, September 17, 2016

फिल्‍म समीक्षा : राज रीबूट




डर नहीं है हॉरर में

-अजय ब्रह्मात्‍मज
विक्रम भट्ट की राज श्रृंखला की अगली कड़ी है राज रीबूट। पहली से लेकर अभी तक इन सभी हॉरर फिल्‍मों में सुहाग की रक्षा के इर्द-गिर्द ही कहानियां बुनी जाती हैं। विक्रम भट्ट के इस फार्मूले में अब कोई रस नहीं बचा है। फिर भी वे उसे निचोड़े जा रहे हैं। राज रीबूट में वे अपने किरदारों को लकर रोमानिया चले गए हैं। रोमानिया का ट्रांसिल्‍वेनिया ड्रैकुला के लिए मशहूर है। एक उम्‍मीद बंधती है कि शायद ड्रैकुला के असर से डर की मात्रा बढ़े। फिल्‍म शुरू होते ही समझ में आ जाता है कि विक्रम भट्ट कुछ नया नहीं दिखाने जस रहे हैं।
रेहान और शायना भारत से रोमानिया शिफ्ट करते हैं। रेहान अनचाहे मन से शायना की जिद पर रोमानिया आ जाता है। पहली ही शाम को दोनों अलग-अलग कमरों में जाकर सोते हैं। हमें सूत्र दिया जाता है कि रेहान के मन में कोई राज है,जिसे वह बताना नहीं चाहता। उधर शायना के रोमानी ख्‍वाब बिखर जाते हैं। वह इस राज को जानना चाहती है। रोमानिया में वे जिस महलनुमा मकान में रहते हैं,वहां कोई आत्‍मा निवास करती है। पहले चंद दृश्‍यों में ही आत्‍मा का आगमन हो जाता है। खिड़की खुलती है। हवा आती है। पर्दे फड़फड़ाते हैं और लैपटॉप का एक कोना में खून लगा होता है। बाद में उस लैपटॉप से खून बहने लगता है। है न नयापन। ऐसे और भी नई बातें हैं। जब फिल्‍म की नायिका के शरीर में भूत प्रवेश कर जाता है तो वह अंग्रेजी बोलने लगती है और धड़ल्‍ले से एफ अक्षर से बनी गालियां देन लगती है। विक्रम भट्ट मल्‍टीप्‍लेक्‍स के अंग्रेजीदां दर्शकों के लिए यह भुतहा फिल्‍म लेकर आए हैं। क्‍योंकि देश में सिंगल स्‍क्रीन और कस्‍बों के आम दर्शक तो अंग्रेजी समझते नहीं हैं।
इस फिल्‍म में दक्षिण से आई नई अभिनेत्री कृति खरबंदा है। उन्‍होंने सौंपा गया काम निभा लिया है। अब मेकअप का वह क्‍या करतीं? भूत से आवेशित होने के बाद उनके चेहरे को ढंग से कुरूप नहीं किया गया है। कोई खौफ नहीं होता...न तो उनकी आवाज से और न ही अंदाज से। पति और सुहाग के रक्षक के रूप में गौरव अरोड़ा हैं। उन्‍हें कुछ नाटकीय दृश्‍य मिले हैं। अपने तई उन्‍होंने मेहनत भी की है,लेकिन वे प्रभावित नहीं कर पाते। फिल्‍म के कलाकारों में इमरान हाशमी का आकर्षण है। इस बार वे ग्रे शेड के साथ हैं।
बाकी विक्रम भट्ट ने हॉरर फिल्‍मों में घिसपिट चुके दृश्‍यों को ही दोहराया है। इमारत पर दीवारों के सहारे चढ़ जाना। हवा में तैरना। घर के सामानों का खिसकना। घर में अचानक कुछ दिखना। अभी तो बैकग्राउंड साउंड की बदलती ध्‍वनियों से पता चल जाता है कि कुछ होगा। लग रहा था कि पलंग में बंधी भूत से आवेशित नायिका पलंग को लेकर ही खड़ी हो जाएगी,लेकिन विक्रम भट्ट ने ऐसा नहीं दिखाया।
विक्रम भट्ट की हॉरर फिल्‍में अब बिल्‍कुल नहीं डरा रहीं।
अवधि- 127 मिनट
डेढ़ स्‍टार *1/2

Friday, July 29, 2016

लकी नंबर है 13 - कृति खरबंदा

 --प्राची दीक्षित

फिल्म जगत को भट्ट कैंप से समय –समय पर सितारे मिलते रहे हैं। इमरान हाशमी, जॉन अब्राहम और बिपाशा बसु इसकी ताकीद करते रहे हैं। इस कड़ी में अगला नाम कृति खरबंदा का जुड़ रहा है। उस कैंप की सफल फ्रेंचाइजी ‘राज’ की तीसरी किश्त राज रीबूट से कृति हिंदी फिल्मों में डेब्यू कर रही हैं। इससे पहले वे साउथ की फिल्में करती रही हैं। उनकी प्रतिभा से प्रभावित हो विशेष फिल्म्स ने उनके संग तीन फिल्मों का करार भी किया है।



राज ने बनाया जिम्मेदार

कृति बताती हैं , 2009 में मैंने साउथ फिल्म इंडस्ट्री से अपना करियर शुरू किया। मेरा मकसद हिंदी सिनेमा में जुड़ना नहीं था। मैं कुछ साल एक्टिंग कर शादी करना चाहती थी, लेकिन वक्त ने मेरी दिशा बदल दी। मुकेश भट्ट ने साउथ की फिल्मों में मेरा काम देखा था। उन्होंने एक दिन मुझे मिलने के लिए बुलाया। हमारी मुलाकात हुई। हमने जीवन, मुंबई और अध्यात्म की बातें की। एक हफ्ते बाद मुझे इस फिल्म का प्रस्ताव मिल गया। मुझे लगा की राज रीबूट में मैं पैरलल लीड में हूं। पर उन्होंने कहा कि यह महिला प्रधान फिल्म है। यह बिना ऑडिशन के मेरी झोली में आ गिरी। इस फिल्म में मुझे चैलेंजिग तरीके से डेब्यू करने का मौका दिया था। पहली फिल्म से खुद को साबित करने का मौका कम एक्ट्रेस को मिलता है। इस फिल्म ने मुझे खुद के प्रति जिम्मेदार बनाया है। मैं खुद पर पहले से अधिक भरोसा करने लगी हूं। साउथ की फिल्मों में भाषा मेरे लिए बाधा नहीं रही, पर वहां पर सीन करते समय सारा फोकस डायलॉग पर होता था। हिंदी मेरी भाषा है। इस वजह से राज रीबूट के दौरान मेरा ध्यान भाषा नहीं इमोशन पर था। ऐसा महसूस हो रहा है कि मैं अपने घेरे से बाहर आकर उड़ रही हूं।







शाह रूख मेरे अंकल

अपने शुरुआती सफऱ के बारे में उन्होंने कहा, चार साल की उम्र में मैंने पहली दफा कैमरा फेस किया। मैंने टीवी एड से अपने करियर की शुरुआत की। मेरी पहली कमाई पांच सौ रुपए थी। मेरे परिवार के लिए यह बड़ी बात थी। मेरी मां हमेशा मुझसे एक बात कहती है कि जीवन में ऐसा कुछ करों की लोगों को सुनाने के लिए कहानी मिल जाएं। इस वजह से जीवन के हर मोड़ पर पागलपंथी जरूरी है। मां ने कभी मॉडलिंग को मेरे पढ़ाई के बीच नहीं आने दिया। मां मेरे जरिए केवल अपना शौक  पूरा करना चाहती थी। मुझे भी एक्टिंग से ज्यादा लगाव नहीं था। मैं खुद को टीवी पर देख कर खुश हो जाती थी। स्कूल में मेरी बहन से किसी लड़की ने बचपने में पूछा कि कृति टीवी में आती है। क्या आप सब शाह रुख खान के रिश्तेदार हैं। मेरी बहन ने तुरंत कह दिया कि शाह रुख खान हमारे अंकल हैं। पूरे स्कूल में यह बात तेजी से फैल गई। मजाक में कही गई बात को लोगों ने सच मान लिया। खैर, इस प्रोफेशन में गंभीर ना होने के बावजूद मुझे कई बड़े मौके मिले। कॉलेज में ही मैंने कई बड़े ब्रांड के साथ काम किया। सिनेमेटोग्राफर    राजीव मेनन के बैनर के साथ छह टीवी एड किए। इसके जरिए मुझे आसानी से साउथ फिल्म इंडस्ट्री में एंट्री मिली।











13 है लकी मैस्कट
कृति के जीवन में तेरह नंबर का बड़ा महत्व है। वह बताती हैं, ‘कई लोग 13 नंबर को अशुभ मानते हैं। मेरे लिए तेरह नंबर शुभ है। मैंने अपनी पहली साउथ फिल्म तेरह तारीख को साइन की थी। और पहली हिंदी फिल्म राज रीबूट भी तेरह तारीख को ही साइन की। यहां तक की राज रीबूट  का पहला टीज़र भी तेरह तारीख को रिलीज़ हुआ।  इस तरह तेरह नंबर से मेरा करियर  जुड़ा हुआ है। राज रीबूट के समय मैं थोड़ा घबरा गई थी।  इस फिल्म को साइन करते वक्त मैंने सोचा कि एक हॉरर फिल्म को मैं तेरह तारीख को साइन कर रही हूं। लेकिन फिर मैंने महसूस किया है कि नंबर केवल नंबर होता है जब तक आप उसे महत्व नहीं देते हैं। इसके बाद तेरह नंबर को लेकर मेरा वहम हमेशा के लिए निकल गया। वैसे तेरह नंबर को खतरा मानते हैं। अब मैं राज रिबूट से फिल्म इंडस्ट्री में लोगों के लिए खतरा बनकर आ रही हूं। 




बोल्ड सीन से परहेज

कृति ने कहा, केवल बोल्ड कंटेंट प्रस्तुत करने के लिए फिल्में नहीं बनाई जाती हैं। इंटरनेट ने हमारी सोच का विस्तार किया है। अब लोग कंटेंट आधारित फिल्में देखना पसंद करते हैं। राज रीबूट में कई किसिंग सीन हैं। पर मैं किसिंग सीन को बोल्ड नहीं मानती हूं। किसिंग सीन अब आम बात है। भारतीय टीवी शो पर भी किसिंग सीन शामिल किए जा रहे हैं। राज रीबूट की स्क्रिप्ट में किसिंग सीन का प्लाट जरूरी था। यह फिल्म त्रिकोण प्रेम कहानी है। यह फिल्म रिश्तों और भावनाओं से जुड़ी है। मुझे किसिंग सीन से कोई समस्या नहीं है। पर हां, जबरदस्ती के बोल्ड सीन से मैं दूर रहना चाहूंगी। बहरहाल, इस फिल्म में इमरान हाशमी और गौरव अरोड़ा मेरे साथ हैं। इमरान अनुभवी कलाकार हैं। गौरव की यह दूसरी फिल्म है। इमरान से मुझे काफी सीखने को मिला।गौरव के साथ मुझे अपने काम में एक स्तर आगे जाने का मौका मिला। विक्रम सर बेहतरीन निर्देशक हैं। वह एक दोस्त की तरह सेट पर रहते थे। वह एक्टर को अपनी भावनाओं को प्रस्तुत करने का मौका देता हैं। इस फिल्म की शूटिंग रोमानिया में हुई। रोमानिया ठंडा शहर है। घने कोहरे के कारण सौ किलोमीटर तक कोई दिखाई नहीं पड़ता था। ऐसे में इस फिल्म की शूटिंग करना मेरे लिए भयानक अनुभव रहा।





Friday, April 17, 2015

फिल्म समीक्षा : मिस्टर एक्स

स्टार: डेढ़ स्टार
विक्रम भट्ट निर्देशित इमरान हाशमी की 'मिस्टर एक्स' 3डी फिल्म है। साथ ही एक नयापन है कि फिल्म का नायक अदृश्य हो जाता है। यह नायक अदृश्य होने पर भी अपनी प्रेमिका को चूमने से बाज नहीं आता, क्योंकि पर्दे पर इमरान हाशमी हैं। इमरान हाशमी की कोई फिल्म बगैर चुंबनों के समाप्त नहीं होती। विक्रम भट्ट 3डी तकनीक में दक्ष हैं। वे अपनी फिल्में 3डी कैमरे से शूट भी करते हैं, लेकिन इस तकनीकी कुशलता के बावजूद उनकी 'मिस्टर एक्स' में कथ्य और निर्वाह की कोई नवीनता नहीं दिखती। फिल्म पुराने ढर्रे पर चलती है।

रघु और सिया एटीडी में काम करते हैं। दोनों अपने विभाग के कर्मठ अधिकारी हैं। एक-दूसरे से प्रेम कर रहे रघु और सिया शादी करने की छट्टी ले चुके हैं। उन्हें बुलाकर एक खास असाइनमेंट दिया जाता है। कर्तव्यनिष्ठ रघु और सिया पीछे नहीं हटते। वे इस असाइनमेंट में एक कुचक्र के शिकार होते हैं। स्थितियां ऐसी बनती हैं कि दोनों एक-दूसरे के खिलाफ हो जाते हैं। अदृश्य हो सकने वाला नायक अब बदले पर उतारू होता है।

वह स्पष्ट है कि कानून उसकी कोई मदद नहीं कर सकता, इसलिए कानून तोडऩे में उसे कोई दिक्कत नहीं होती। बदले की इस भिड़ंत के बीच कुछ नहाने के दृश्य हैं, जहां अदृश्य नायक अपनी नायिका को चूमता है। इस मद में अच्छी रकम खर्च हुई होगी। महंगे चुंबन हैं 'मिस्टर एक्स' में। भट्ट कैंप की फिल्म है तो जब-तब गाने भी सुनाई पड़ते हैं। दर्शक अनुमान लगा सकते हैं कि कब गना शुरू हो जाएगा।

दर्शक इस फिल्म की पूरी कहानी का अनुमान लगा सकते हैं। सब कुछ प्रेडिक्टेबल और सरल है। महेश भट्ट और विशेष फिल्म्स की फिल्मों का एक पैटर्न बन चुका है। कभी कढ़ाई सुघड़ हो जाती है तो दर्शक फिल्म पसंद कर लेते हैं। 'मिस्टर एक्स' से ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती। इमरान हाशमी का जादू बेअसर हो चुका है।
फिल्म में उनका किरदार ढंग से लिखा भी नहीं गया है। सिया की भूमिका में अमायरा दस्तूर कमजोर हैं,जबकि उन्हें कुछ अच्छे दृश्य मिले हैं। अरूणोदय सिंह अपनी मौजूदगी से प्रभावित नहीं काते। उन्हें अभी तक अभ्यास की जरूरत है। तिवारी की छोटी भूमिका में आया कलाकार अपनी बेवकूफियों में अच्छा लगता है।

भट्ट कैंप की फिल्मों का संगीत कर्णप्रिय होने की वजह से लोकप्रिय होता है। इस बार वह मधुरता नहीं है। पॉपुला सिंगर अंकित तिवारी भी निराश करते हैं। वे एक ही तरीके से गाने लगे हैं या उनसे वैसी ही मांग की जाती है? दोनों ही स्थितियों में उन्हें सोचना चाहिए।

और हां, इस फिल्म में हर किरदार भारद्वाज को भरद्वाज क्यों बुलाता है? उ'चारण की और भी गलतियां हैं। फिल्म में भट्ट साहब ने शीर्षक गीत में आवाज दी है। बेहतर होगा कि वे ऐसे चमत्कारिक दबावों से बचें। कृष्ण, गीता और रघु व सिया के प्रतीकात्मक नाम...सब फिजूल रहा।
अवधि- 132 मिनट

Friday, September 13, 2013

फिल्‍म समीक्षा : हॉरर स्‍टोरी

Horror storyआ डर मुझे मार
-अजय ब्रह्मात्‍मज
किसी प्रकार की कोई गलतफहमी नहीं रहे, इसलिए विक्रम भट्ट ने फिल्म का नाम ही 'हॉरर स्टोरी' रख दिया। डरावनी और भुतहा फिल्में बनाने में विशेषज्ञता हासिल कर चुके विक्रम भट्ट ने इस बार खुद को लेखन और निर्माण तक सीमित रखा है। निर्देशन की जिम्मेदारी आयुष रैना की है।
सात दोस्त हैं। उनमें से एक अमेरिका जा रहा है। उसकी विदाई की पार्टी चल रही है। पार्टी को इंटरेस्टिंग बनाने के लिए सातों दोस्त पब में मिली एक टीवी खबर को फॉलो करते हुए उस होटल में जा पहुंचते हैं, जिसे भुतहा माना जाता है। वहां कई रहस्य छिपे हैं। रहस्य जानने का रोमांच उन्हें वहां खींच लाता है। होटल में घुसने के बाद उन्हें एहसास होता है कि गलती हो गई है। वे होटल में कैद हो जाते हैं और फिर एक-एक कर मारे जाते हैं। माया की भटकती दुष्ट आत्मा उन्हें परेशान कर रही है। बचने की उनकी कोशिशें नाकाम होती रहती हैं।
हॉरर फिल्मों में पहले से जानकारी रहती है कि भूत या आत्मा और जीवित व्यक्तियों के बीच फिल्म खत्म होने तक संघर्ष चलता रहेगा। लेखक, निर्देशक और तकनीशियन अगर खूबी के साथ थ्रिल बरकरार रखें तो फंसे व्यक्तियों के खौफ से अजीब किस्म का मनोरंजन होता है। 'हॉरर स्टोरी' एक हद तक इसमें सफल रहती है। विक्रम भट्ट और आयुष रैना ने 'हॉरर स्टोरी' को सेक्स और संगीत की गलियों में नहीं भटकने दिया है। उन्होंने साफ-सुथरी हॉरर स्टोरी रची है, जो थोड़ा कम डराती है।
फिल्म के अधिकांश कलाकार नए हैं। खौफ जाहिर करने की उनकी अदाओं में नवीनता है। तभी कलाकारों को समान अवसर दिया गया है। सभी ने परफॉर्म करने की अच्छी कोशिश की है। सीमित साधनों में इतने कलाकारों को मौका देना भी एक सराहनीय कदम है। 'हॉरर स्टोरी' निराश नहीं करती। डरावनी कहानियों के शौकीन आनंदित हो सकते हैं।
अवधि: 90 मिनट

Friday, September 7, 2012

फिल्‍म समीक्षा : राज 3

Review : Raaz 3 

डर के आगे मोहब्बत है 

-अजय ब्रह्मात्मज  

 अच्छी बात है कि इस बार विक्रम भट्ट ने 3डी के जादुई प्रभाव को दिखाने के बजाए एक भावनापूर्ण कहानी चुनी है। इस कहानी में छल-कपट, ईष्र्या, घृणा, बदला और मोहब्बत के साथ काला जादू है। काला जादू के बहाने विक्रम भट्ट ने डर क्रिएट किया है, लेकिन दो प्रेमी (खासकर हीरो) डर से आगे निकल कर मोहब्बत हासिल करता है।

कल तक टॉप पर रही फिल्म स्टार सनाया शेखर अपने स्थान से फिसल चुकी हैं। संजना कृष्ण पिछले दो साल से बेस्ट एक्ट्रेस का अवार्ड ले रही हैं। सनाया किसी भी तरह अपनी खोई हुई पोजीशन हासिल करना चाहती है। पहले तो भगवान और मंत्र के जरिए वह यह कोशिश करती है। सफल नहीं होने पर वह काला जादू और तंत्र के चक्कर में आ जाती है। काला जादू राज-3 में एक तरकीब है डर पैदा करने का, खौफ बढ़ाने का। काला जादू के असर और डर से पैदा खौफनाक और अविश्वसनीय दृश्यों को छोड़ दें, तो यह प्रेमत्रिकोण की भावनात्मक कहानी है। फिसलती और उभरती दो अभिनेत्रियों के बीच फंसा हुआ है निर्देशक आदित्य अरोड़ा। वह सनाया के एहसानों तले दबा है। वह पहले तो उसकी मदद करता है, लेकिन काला जादू के असर से संजना की बढ़ती तकलीफ और अकेलेपन से उसे अपने अपराध का एहसास होता है। वह संजना से प्रेम करने लगता है, उसे बचाने के लिए वह आत्माओं की दुनिया में भी प्रवेश करता है। वह अपनी संजना को बचा कर ले आता है।
विक्रम भट्ट ने सनाया को खलनायिका के तौर पर पेश किया है। वह फिसल रही प्रतिष्ठा हासिल करने के लिए युक्ति अपनाती है। नाम और शोहरत के आगे वह रिश्तों और मोहब्बत का भी ख्याल नहीं करती। हमें बीच में पता चलता है कि संजना और कोई उसकी सौतेली बहन है। सनाया सिर्फ उसकी तरक्की से ही नहीं जल रही है। उसके दिल और दिमाग में बचपन में पिता के बंटे प्यार की खलिश भी है। शुरू में हमें सनाया से सहानुभूति होती है, लेकिन उसकी करतूतों से पता चलता है कि वह दुष्ट औरत है। फिर संजना की बेचारगी हमें उसका हमदर्द बना देती है। इस हमदर्दी में हीरो भी उसके साथ आता है, इसलिए राज-3 की कहानी भावनात्मक रूप से छूती है।
बिपाशा बसु ने सनाया के ग्रे शेड को अच्छी तरह उभारा है। अभिनय की उनकी सीमाओं के बावजूद विक्रम भट्ट ने उनसे बेहतरीन काम लिया है। नयी अभिनेत्री ईशा गुप्ता उम्मीद जगाती हैं। उन्होंने अपने किरदार के डर को अच्छी तरह चित्रित किया है। इन दोनों के बीच पाला बदलते इमरान हाशमी जंचे हैं। इमरान हाशमी के अभिनय में निखार आया है।
विक्रम भट्ट ने दोनों हीरोइन के साथ लंबे चुंबन दृश्यों को रखकर इमरान हाशमी के दर्शकों को खुश रखने की कोशिश की है। बिपाशा बसु के साथ के अंतरंग दृश्यों के पीछे भी यही उद्देश्य रहा होगा।
तीन स्टार
अवधि-136 मिनट

 

Monday, August 27, 2012

दो तस्‍वीरें : बिपाशा बसु


बिपाशा बसु की दोनों तस्‍वीरें राज 3 से ली गई हैं। इस पफल्‍म में वह ढलती उम्र की अभिनेत्री की भूमिका में हैं। कहते हैं कि विक्रम भट्ट ने उनका किरदार अमीषा पटेल से प्रेरित होकर गढ़ा है। कभी अमीषा और विक्रम गहरे दोस्‍त थे।

Friday, May 11, 2012

फिल्‍म समीक्षा : डेंजरस इश्‍क

जन्म-जन्मांतर की प्रेमकहानी 

जन्म-जन्मांतर की प्रेमकहानी

-अजय ब्रह्मात्‍मज
च्छी है 21 वीं सदी। जन्म-जन्मांतर से मिलने के लिए भटकती आत्माओं का मिलन हो जाता है। अधूरे प्रेम और पुनर्जन्म के साथ विक्रम भट्ट ने रहस्य भी जोड़ दिया है। यह फिल्म एक प्रकार से करिश्मा कपूर की रीलांचिंग या दूसरी पारी की शुरूआत है। करिश्मा कपूर को यह जाहिर करने का अच्छा मौका मिला है कि वह हर प्रकार की भूमिकाएं निभा सकती हैं। उन्होंने संजना और उसके पूर्वजन्म के किरदारों को पूरे इमोशन और आवेग के साथ निभाया है।
ऐसी प्रेमकहानियां फैंटेसी ही होती हैं। देश की श्रुति परंपरा और पुराने साहित्य मैं पुनर्जन्म और भटकती आत्माओं के अनेक किस्से मिलते हैं। कुछ रोचक और मनोरंजक फिल्में भी बनी हैं। डेंजरस इश्क उसी श्रेणी की फिल्म है। मुमकिन है कि मल्टीप्लेक्स के दर्शक ऐसी कहानी की अवधारणा से ही बिदके,लेकिन छोटे शहरों,कस्बों और देहातों में यह फिल्म पसंद की जा सकती है। विक्रम भट़ट रोचकता बनाए रखने की कोशिश करते हैं। पिछले जन्मों की कहानियों को एक-एक कर उन्होंने लेखक की मदद से गूंथा है। हर जन्म की घटनाओं और वियोग में नाटकीयता का प्रभाव एक सा नहीं बन पाया है।
विक्रम भट्ट की खासियत है मेलोड्रामा का संतुलित उपयोग ़ ़ ़इस बार उन्हें करिश्मा कपूर की मदद मिली है। फिल्म पूरी तरह से करिश्मा के कंधों पर है। दूसरे चरित्रों को विकसित नहीं करने से रोचकता टूटती है।फिल्म में जन्मों के साथ पीरियड,परिवेश और भाषा की भिन्नता दिखाई पड़ती है। निश्चित ही यह कला निर्देशक जयंत देशमुख और संवाद लेखक गिरीश धमीजा का के उचित योगदान से संभव हुआ है। निधि यशा और मनीष मल्होत्रा ने पीरियड के हिसाब से वेशभूषा तैयार की है। अगर स्क्रिप्ट चुस्त होती तो फिल्म ज्यादा रोचक हो जाती।
डेंजरस इश्क करिश्मा कपूर के प्रति आश्वस्त करती है। अन्य भूमिकाओं में रजनीश दुग्गल सामान्य हैं। पिछले जन्म के किरदारों में रवि किशन और आर्य बब्बर अधिक प्रभावशाली हैं। रजनीश दुग्गल के छोटे भाई की भूमिका में रुसलान मुमताज अपनी संक्षिप्त भूमिका के साथ न्याय करते हैं। सालों बाद दिखीं ग्रेसी सिंह का ग्रेस बरकरार है। उनकी एक प्रेजेंस है। फिल्म के गीत मधुर और कर्णप्रिय हैं। हां,समझ में नहीं आया कि 3 डी के बगैर इस फिल्म में क्या कमी रह जाती? . डी अतिरिक्त आकर्षण नहीं बन पाया है।
-अजय ब्रह्मात्मज
** दो स्टार

Sunday, May 8, 2011

फिल्‍म समीक्षा : हांटेड

3  डी के साथ विक्रम भट्ट का जादू हांटेड0 हांटेड हिंदी में बनी पहली 3डी फिल्म है। 3ड ी की वजह से दृश्यों में गहराई नजर आने लगती है। मसलन अगर दो दीवारें हों तो आगे और पीछे की दीवार के बीच की दूरी भी समझ में आती है। इसकी वजह से फिल्म देखने का आनंद बढ़ जाता है। 3डी एक तकनीक है, जिसका इस्तेमाल फिल्म शूट करते समय या पोस्ट प्रोडक्शन में भी किया जा सकता है। हांटेड के दृश्यों की कल्पना 3डी तकनीक को ध्यान में रख कर की गई है।

0 हिंदी फिल्मों के दर्शकों के लिए 3 डी का मतलब फिल्म देखते समय यह एहसास होना भी है कि पर्दे से कोई चीज निकली और सीधे उन तक आई। जैसे तीर चलें तो दर्शक बचने के लिए अपना सिर झटक लें। 2डी से 3डी बनाई गई फिल्मों में एक दो ऐसे दृश्य रखे जाते थे। हांटेड में ऐसे कई दृश्य हैं, कई बार तो लगता है कि पर्दे से बढ़ा हाथ हमारे चेहरे को छू लेगा।

0 हांटेड का आनंद लेने के लिए जरूरी है कि आप भूत-प्रेत और आत्माओं के साथ हिंदी फिल्मों पर भी विश्वास करते हों। अगर वैज्ञानिक सोच, तर्क और कार्य-कारण संबंध खोजेंगे तो हॉरर फिल्मों की फंतासी और हांटेड का मजा किरकिरा हो जाएगा। हॉरर फिल्में पूरी तरह से काल्पनिक और अतार्किक होती हैं। कई हिंदी फिल्में भी ऐसी होती हैं।

0 हांटेड में एक भुतहा घर है, जिस में एक दुष्ट आत्मा ने एक मासूम आत्मा को अपने कब्जे में रख लिया है। अस्सी सालों से मासूम आत्मा की चीख सुनाई पड़ती रहती है, जिसकी वजह से उस घर की कीमत घट सकती है या खरीदार भाग सकता है।

0 आधुनिक युवक रेहान को पहले इस कहानी पर विश्वास नहीं होता, लेकिन उस घर में रात बिताने पर वह खुद अलौकिक अनुभवों से गुजरता है। वह इस कहानी की तह में जाता है तो उसे अतीत की सच्ची कहानी मालूम होती है। एक सूफी संत की सलाह पर मासूम आत्मा को मुक्त कराने की जिम्मेदारी वह अपने ऊपर लेता है। यहां से फिल्म में दिलचस्पी बढ़ती है, क्योंकि जीवित इंसान और दुष्ट आत्मा की भिड़ंत का रोमांच जागता है। 0 हांटेड में 3 डी तकनीक के साथ ही डर, ड्रामा और डायरेक्शन का थ्री डी भी है। विक्रम भट्ट की खूबी है कि अपनी हॉरर फिल्मों को वे जुगुप्सा की हद तक नहीं ले जाते हैं। विकृत चेहरे नहीं ले आते और न ही फिल्मों के हत्या और खौफ के वीभत्स दृश्य रखते हैं। इन सभी से परहेज करते हुए दर्शकों के लिए डर क्रिएट करने की चुनौती को विक्रम भट्ट सफलता से निभा ले जाते हैं। हांटेड में 3डी के साथ विक्रम भट्ट के निर्देशन का भी जादू है। इस विधा की फिल्मों में वे निरंतर आगे बढ़ रहे हैं।

0 फिल्मों में व‌र्त्तमान और अतीत का ट्रांजिशन बेझटके होता है। विक्रम भट्ट की 1920 में भी पीरियड क्रिएट किया गया था। हांटेड में भी उन्होंने खूबसूरती के साथ अस्सी साल पहले के समय को क्रिएट किया है। वेशभूषा, गाडि़यां, उपयोग के दूसरे सामानों में पीरियड का ध्यान रखा गया है।

0 3डी से युक्त होने के बावजूद विक्रम भट्ट डराने के पारंपरिक तरीकों का उपयोग करते हैं जैसे चीख, चिल्लाहट, दरवाजों की किर्र-किर्र, बिजली गुल होना, आत्माओं का अचानक प्रकट होना और पाश्‌र्र्व संगीत का तेज होना आदि। हॉरर फिल्मों की यह सब जरूरी मान लिया गया है और विक्रम भट्ट भी उन्हें नहीं छोड़ पाते। क्यों?

0 महाअक्षय चक्रवर्ती ने रेहान की भूमिका को सही ढंग से जीने की कोशिश की है, फिर भी एक्सप्रेशन में अभी वे खुद को नहीं साध सके हैं। बतौर अभिनेता उन्हें और मेहनत करनी होगी। टिया बाजपेयी अवश्य प्रभावित करती हैं। अदृश्य आत्मा के साथ के उनके संघर्ष में की गई मेहनत सफल रही है। इस फिल्म को वास्तव में आरिफ जकारिया और अचिंत कौर ने संभाला है। उन दोनों का काम शानदार है।

0 हॉरर फिल्मों में अमूमन परिचित और मशहूर कलाकार सीधे शब्दों में स्टार नायक-नायिका के तौर पर क्यों नहीं चुने जाते? अगर किसी हॉरर फिल्म के हीरो-हीरोइन पॉपुलर स्टार हो तो दर्शकों का डर और इंटरेस्ट दोनों बढ़ेगा।

0 और हां, हॉरर फिल्मों का संगीत मधुर होता है। हांटेड ने इसका निर्वाह किया है।

रेटिंग- *** तीन स्टार

Monday, February 7, 2011

हमारा काम सिर्फ मनोरंजन करना है: विक्रम भट्ट

हमारा काम सिर्फ मनोरंजन करना है: विक्रम भट्ट-अजय ब्रह्मात्‍मज

आपका जन्म मुंबई का है। फिल्मों से जुडाव कैसे और कब हुआ?

मेरे दादाजी का नाम था विजय भट्ट। वे प्रसिद्ध प्रोडयूसर-डायरेक्टर रहे हैं। हिमालय की गोद में, गूंज उठी शहनाई, हरियाली और रास्ता बैजू बावरा जैसी बडी पिक्चरें बनाई। मेरे पिता प्रवीण भट्ट कैमरामैन थे। मैं डेढ साल की उम्र से ही फिल्म के सेट पर जा रहा था। अंकल अरुण भट्ट डायरेक्टर व स्टोरी राइटर थे, पापा कैमरामैन थे तो दादा डायरेक्टर। घर में दिन-रात फिल्मों की चर्चा होती थी। बचपन से फिल्म इन्फॉर्मेशन और ट्रेड गाइड पत्रिकाएं देखता आ रहा हूं घर में। ऐसे माहौल में फिल्मों से इतर कुछ और सोचने की गुंजाइश थी ही कहां। हालांकि मेरे चचेरे भाई फिल्मों से नहीं जुडे। मुझे शुरू से यह शौक रहा। कहानियां सुनाने का शौक मुझे बहुत था।

सुना है कि कॉलेज के दिनों में आपने और बॉबी देओल ने मिलकर फिल्म बनाई थी?

तब केवल सोलह की उम्र थी मेरी। मैंने निर्देशन दिया और बॉबी ने एक्ट किया।

कब फैसला किया कि डायरेक्टर ही बनना है, एक्टर नहीं?

सात साल का था, तभी फैसला कर लिया था कि डायरेक्टर ही बनूंगा। इतनी कम उम्र में करियर का फैसला कम ही लोग करते हैं शायद। तभी से डायरेक्टर बनने की धुन सवार हो गई थी।

क्या वजह हो सकती है इसकी?

पता नहीं, ठीक-ठीक बताना मुश्किल होगा। मुझे कहानी सुनाने में आनंद मिलता है। मैं डायरेक्टर बना कहानियां सुनाने के लिए.. अलग-अलग कहानियां। लेकिन फिर इस फिल्मी सफर में मैं कहीं खो गया। कहानियां बताना ही बंद कर दिया मैंने, जबकि डायरेक्टर का पहला काम कहानी सुनाना ही है। अब यह काम मैं फिर से कर रहा हूं। मुझे स्कूल के दिनों में काफी सजा मिलती थी। उनसे बचने के लिए कहानियां गढता था।

कैसे स्टूडेंट थे आप?

सामान्य स्टूडेंट था। कोई कमाल का स्टूडेंट नहीं था। लगता था कि नंबर पाने के लिए क्यों पढाई करो। उतना ही पढो कि अगली क्लास में चले जाओ और टीचर और पेरेंट्स से डांट न सुननी पडे। सच कहूं तो पढाई से ज्यादा मेरा मन किस्से-कहानियों में लगता था।

किस्से सुनाना, झूठ बोलना, ये-वो कुछ भी गढना..?

किस्से नहीं, कहानियां सुनाना। संयोग ऐसा था कि मेरे सभी दोस्त सुनते थे। सभी को लगता था कि विक्रम राइटर बनेगा। उसका मन इसी में लगता है। लेकिन सीरियस लिटरेचर की तरफ मेरा ध्यान नहीं था। गुजराती होने के कारण सामान्य साहित्यिक संस्कार जरूर मिले थे।

सेल्यूलाइड पर कहानी लिखना ही फिल्म है। कई मायने में उससे जटिल और बडा काम है। अन्य विधाएं भी जुडती हैं। ट्रेनिंग कैसे की आपने?

सबसे पहले मैं जुडा मुकुल आनंद साहब से, उनका असिस्टेंट बना, तब सिर्फ चौदह साल का था। वे कानून क्या करे बना रहे थे। वह उनकी भी पहली फिल्म थी। उनके साथ मैं छह-सात साल रहा। पढाई भी साथ में चल रही थी। अग्निपथ में मैं उनका चीफ असिस्टेंट था। अग्निपथ के बाद मैंने उन्हें छोड दिया। फिर मैंने शेखर कपूर के साथ काम किया।

कौन सा प्रोजेक्ट था वह?

उनके तीन प्रोजेक्ट थे तब, जो बदकिस्मती से नहीं बन सके। सनी देओल और जैकी श्राफ के साथ हम दुश्मनी कर रहे थे। टाइम मशीन पर भी काम चल रहा था, जो बीच में ही बंद हो गई। बॉबी देओल की फिल्म बरसात थी। बरसात बाद में राजकुमार संतोषी ने पूरी की। फिर दो सालों तक उनके साथ कुछ न कुछ करता रहा। उसके बाद महेश भट्ट साहब के साथ रहा दो साल। उनसे फिल्म के इमोशन की बारीकियां सीखीं। कुल मिला कर मैं तकरीबन ग्यारह सालों तक असिस्टेंट रहा। उसके बाद मुकेश जी ने ब्रेक दिया जानम में। जानम के बाद मदहोश, गुनहगार और बंबई का बाबू आई। किस्मत ऐसी थी कि मेरी चारों फिल्में फ्लॉप हो गई। काम मिलना ही बंद हो गया। मुकेश जी ने एक दिन वापस बुलाया। हिम्मत बंधाई और एक किस्म से मुझे नया जन्म दिया। मैंने फरेब बनाई। उसके बाद अच्छा दौर चला। गुलाम, कसूर, राज और आवारा पागल दीवाना में कामयाबी मिली। उसके बाद फिर एक डरावना दौर भी आया, जब पांच-छह पिक्चरें नहीं चलीं।

भट्ट साहब के साथ किन फिल्मों में आप उनके असिस्टेंट थे?

हम हैं राही प्यार के और जुनून। दोनों ही फिल्मों का अनुभव अच्छा रहा।

मैंने सुना था कि आमिर खान ने आपको गुलाम फिल्म दिलवाई थी। उस समय भट्ट साहब से निर्देशन के मसले पर उनका झगडा हुआ था?

नहीं, गुलाम मुझे भट्ट साहब ने ही दिलवाई। आमिर खान के साथ उनका झगडा कभी नहीं हुआ था। आमिर ने उन्हें कहा कि आप फिल्म को पूरा समय दें। और भट्ट साहब का जवाब था कि गुलाम मेरी जिंदगी की अहम पिक्चर नहीं है। फिर उन्होंने कहा कि हमारी कंपनी में दो डायरेक्टर हैं। एक विक्रम भट्ट और दूसरी तनूजा चंद्रा। आप दोनों में से किसके साथ काम करना चाहते हैं? चूंकि आमिर ने मेरे साथ पहले हम हैं राही प्यार के में काम किया था और मैंने मदहोश बनाई थी उनके भाई फैजल खान के साथ, तो वे मुझे अच्छी तरह जानते थे। उन्होंने कहा कि मैं विक्रम भट्ट के साथ काम करूंगा। गुलाम मुझे मिल गई।

आपके गुरु मुकुल आनंद, शेखर कपूर और महेश भट्ट हुए। तीनों अलग-अलग किस्म के फिल्ममेकर हैं। तीनों की विशेषताएं आपमें आई हैं या आप अलग लीक पर भी चले?

मुकुल आनंद से मैंने टेक्निकल चीजें सीखीं। कैमरा प्लेसिंग, लाइटिंग, ब्लॉक वगैरह..। लेकिन कहानी बनाना मैंने शेखर कपूर के साथ सीखना शुरू किया। महेश भट्ट जी ने मुझे और सिखाया, उनका प्रभाव मुझ पर सबसे ज्यादा है। कुछ लोग मुझे उनका विस्तार मानते हैं।

मेरा सीधा सवाल है कि और कौन-कौन से डायरेक्टर हैं, जिनसे आप प्रभावित रहे? इन तीनों के अलावा भी तो कुछ लोग होंगे?

बात हो रही थी किसी से। उन्होंने पूछा कि आप के फेवरिट डायरेक्टर कौन हैं? मेरा जवाब था, कोई नहीं। हर डायरेक्टर की ही कुछ फिल्में हैं, जो मुझे अच्छी लगती हैं। मुझे लगता है कि हर डायरेक्टर कुछ अच्छा काम करता है तो कुछ बुरा करता है। कपोला की गॉडफादर और ड्रैकुला मुझे पसंद हैं। लेकिन उनकी वन फ्रॉम द हार्ट पसंद नहीं है। भट्ट साहब की सारांश, अर्थ, काश, जख्म, तमन्ना, हम हैं राही प्यार के जैसी फिल्में पसंद हैं, कुछ फिल्में पसंद नहीं हैं। डेविड धवन की शोला और शबनम, कुली नंबर वन, बीवी नंबर वन अच्छी लगी। लेकिन कुछ फिल्में अच्छी नहीं लगीं। जब कोई अच्छा काम देखता हूं तो महसूस होता है कि मैं कितना पीछे रह गया। जे.पी. दत्ता की बॉर्डर देखता हूं तो लगता है कि क्या सचमुच कोई इतनी मेहनत कर सकता है? रामगोपाल वर्मा की सरकार देखता हूं। इतनी नई टेक्नीक के साथ, ऐसी नई फोटोग्राफी के साथ वे फिल्म लेकर आए कि मुझे ईष्र्या होती है। ऐसे लोग मुझे प्रेरित करते हैं।

आपकी ट्रेनिंग फिल्म के सेट पर हुई। क्या कभी इंस्टीटयूट जाने या ट्रेनिंग करने का खयाल नहीं आया? चौदह साल की उम्र में ही आपको मौका मिल गया। अगर कोई बाहर से आना चाह रहा हो तो वह क्या करे?

मुझे लगता है कि यहीं सीखना बेहतर है। कहते हैं, यहां सेटअप बनाना जरूरी है। फिल्म टेक्नीक तो आदमी सीख जाता है। उससे इंडस्ट्री नहीं चलती। इंडस्ट्री के उतार-चढाव कैसे हैं? लोग कैसे हैं? उनसे कैसे बर्ताव होना चाहिए या करना चाहिए? कैसे उठना-बैठना चाहिए? यह सब भी सीखना बहुत जरूरी है।

मैं कहूं कि यहां काम करने से ज्यादा आपको काम निकालना आना चाहिए?

बिलकुल। काम निकालना आता है तो आप काम कर सकते हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में ही नहीं, हर बिजनेस में यह जरूरी है। जब तक आप फिल्म न बना लें, डायरेक्टर नहीं बन सकते। थ्योरी जान लेने से क्या होता है?

पहली फिल्म जानम का सेटअप कैसे तैयार हुआ? याद करके बताएं?

पूजा बचपन की दोस्त हैं। मेरे डैडी ने हमेशा महेश भट्ट साहब की पिक्चरें की हैं। राहुल भी दोस्त था। सेटअप बन गया। फिर मदहोश के लिए ताहिर साहब ने मुझे बुलाया। मैं हम हैं राही प्यार के पर काम कर रहा था। उन्हें लगा कि मैं डायरेक्टर बन सकता हूं। आमिर ने भी ग्रीन सिग्नल दिया तो काम मिल गया।

जानम के लिए पहले दिन एक्शन बोला तो मन में क्या चल रहा था?

वास्तव में उसके पहले मैंने भट्ट साहब के लिए काफी शूटिंग की थी। वे सीन देकर जाते थे। गाना हो या एक्शन, भट्ट साहब व्यस्त होते तो मुझसे ही करने को कहते। इस तरह थोडा-बहुत हाथ साफ करने का मौका मिला। जानम की बात करूं तो वर्ली में सत्यम थिएटर हुआ करता था। उसकी कार पार्किग में पहले दिन की मेरी शूटिंग थी। जिंदगी का पहला दिन। पूजा और राहुल रॉय थे उसमें। कार पार्क में एक सीन शूट किया हम लोगों ने। अच्छी तरह याद है। अब सोचता हूं कि कितना बुरा काम किया था हमने।

रिग्रेट फील करते हैं?

कई रिग्रेट हैं, हर रोज ही कुछ न कुछ रिग्रेट करता हूं। लेकिन इंडस्ट्री में आना रिग्रेट नहीं करता। मैंने कई गलतियां की हैं। खुशनसीब हूं कि इसके बावजूद यहां हूं। मुमकिन है कि यहां कोई मुझे पसंद करता है और मेरे लिए फिल्मों का इंतजाम कर देता है। काम मिल ही जाता है।

जो नए लडके आ रहे हैं, उनके लिए क्या कहेंगे आप? अगर उन्हें डायरेक्टर बनना हो तो?

यही कहूंगा कि हर फिल्म ऐसे बनाओ, जैसे पहली फिल्म बना रहे हो। मार्केट के प्रेशर से कभी मत डरो। जो फिल्म बनानी है वही बनाओ। क्योंकि यहां किसी को भी कुछ नहीं मालूम। जो पंडित या समीक्षक हैं, उन्हें भी कुछ नहीं मालूम है। इसलिए अपने दिल की और अपने सोच की पिक्चर बनाओ।

लेकिन ब्रेक कैसे मिले? पहली फिल्म किए बगैर आपको कोई दूसरी फिल्म नहीं देगा?

मैं यह मानता हूं कि हर डायरेक्टर एक नया एंगल लेकर आता है लाइफ का। उसके अनुभव व सोच अलग होते हैं। अब सोचिए कि इंडस्ट्री क्या करती है? हर नई सोच को हमारी यह फिल्म इंडस्ट्री अपने हिसाब से ढालने की कोशिश करती है। ऐसे में नया तो बचता ही नहीं। नए आदमी को नया काम करने दो, तभी तो बात बनेगी।

अगर मैं पूछूं कि आपने या आपकी पीढी ने हिंदी सिनेमा में क्या कंट्रीब्यूट किया तो क्या कहेंगे?

मुझे लगता है कि मेरे सारे कलीग्स ने बहुत अच्छा काम किया है। खासतौर पर आदित्य चोपडा, करण जौहर, सूरज बडजात्या और राम गोपाल वर्मा ने, जो मेरे सीनियर हैं। संजय गुप्ता ने टेक्नीक में काफी अलग-अलग चीजें की हैं। मेरी पीढी ने जितने सुपर स्टार डायरेक्टर देखे हैं, शायद किसी और पीढी ने नहीं देखे होंगे।

फिर बार-बार ये क्यों कहा जाता है कि 50-60 का दौर था ?

ये सब कहने की बातें हैं। लोग हमेशा पुराने को याद करते हैं। मुझे भी बचपन की फिल्में अच्छी लगती हैं। मुझे भी अमित जी की फिल्में नमकहलाल, शोले, और दीवार बहुत अच्छी लगती हैं। मुझसे दस साल छोटे चचेरे भाई को अमर अकबर एंथोनी अच्छी लगती है। कहता है, ऐसी फिल्में क्यों नहीं आतीं अब? जबकि उसके लिए 50-60 का दौर एक इतिहास की तरह ही है। मुझे लगता है कि आदमी हमेशा अपनी जवानी की फिल्मों को याद रखता है। क्योंकि उनसे वह सर्वाधिक प्रेरित होता है। उनसे खुद को जोडता है। मुझे भी युवावस्था में देखी फिल्में अब तक याद हैं और मैं भी सोचता हूं कि अब ऐसी फिल्में क्यों नहीं बनतीं?

क्या शूटिंग करते समय आपको दर्शकों का खयाल रहता है?

ये तो सोचना ही होता है कि अमुक सीन करेंगे तो दर्शक हंसेंगे या ये करेंगे तो दर्शक पसंद नहीं करेंगे। दर्शकों के टेस्ट को तो दिमाग में रखना ही पडता है। एक फार्मूले में रहते हुए ही अलग काम कर सकते हैं। सबसे जरूरी है, दर्शकों का मनोरंजन हो।

शिक्षा या संदेश नहीं होना चाहिए?

शिक्षा और संदेश के लिए किताबें हैं और डिस्कवरी चैनल है। टिकट लेकर कोई पढने क्यों आएगा? मनोरंजन के साथ सबक या सोच मिल जाए तो यह अलग बात है। शायद हम भी यही कर रहे हैं। फिल्में किसी को उत्तेजित कर सकती हैं, उन्हें पल भर के लिए दुनियादारी से दूर कर सकती हैं। हम लोग विशुद्ध एंटरटेनर हैं, हमें मनोरंजन ही करना है, बस और कुछ नहीं।


Friday, March 19, 2010

फिल्‍म समीक्षा : शापित

डराने में सफल 

-अजय ब्रह्मात्‍मज

हिंदी में बनी डरावनी फिल्में लगभग एक जैसी होती हैं। किसी अंधविश्वास को आधार बनाकर कहानी गुंथी जाती है और फिर तकनीक के जरिए दर्शकों को चौंकाने की कोशिश की जाती है। साउंड इफेक्ट से दृश्यों का झन्नाटेदार अंत किया जाता है और हम अपेक्षित ढंग से अपनी सीट पर उछल पड़ते हैं। विक्रम भट्ट अपनी डरावनी फिल्मों में कुछ अलग करते हैं और दर्शकों में डर पैदा करने में सफल होते हैं।

शापित में अमन अपनी प्रेमिका काया के परिवार को मिले पुराने शाप को खत्म करने के लिए आत्मा की तलाश में निकलता है। इस खोज में डॉ ़पशुपति उसके साथ हैं। पता चलता है किएक दुष्ट आत्मा सदियों पहले दिए अभिशाप की रक्षा कर रही है। उस आत्मा की मुक्ति के बाद ही शाप से मुक्त हुआ जा सकता है। चूंकि अमन और काया के बीच बेइंतहा प्यार है, इसलिए अमन हर जोखिम के लिए तैयार है।

विक्रम भट्ट ने स्पेशल इफेक्ट से दृश्यों को डरावना बनाने के साथ उनके पीछे एक लॉजिक भी रखा है। अपनी खासियत के मुताबिक उन्होंने मुख्य किरदारों की प्रेमकहानी में दुष्टात्मा को विलेन की तरह पेश किया है। अतीत में लौटने केदृश्य सुंदर हैं। विक्रम ने पीरियड गढ़ने और उन्हें फिल्मांकित करने में अपनी दक्षता दिखाई है। कला निर्देशक से उन्हें इस फिल्मांकन में भरपूर सहयोग मिला है।

पहली फिल्म के लिहाज से आदित्य नारायण निराश नहीं करते। उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ अमन के किरदार को निभाया है। कद-काठी में हिंदी फिल्मों के हीरो की प्रचलित छवि से अलग होने के बावजूद आदित्य नारायण अपने अभिनय से प्रभावित करते हैं। नयी अभिनेत्री श्वेता अग्रवाल निराश करती हैं। दोनों के बीच आवश्यक केमिस्ट्री पैदा नहीं हो पाई है। छोटी भूमिका में भी शुभ जोशी पर ध्यान जाता है।

*** तीन स्टार

Saturday, February 28, 2009

दरअसल:बन रही हैं डरावनी फिल्में

-अजय ब्रह्मात्मज

हालिया रिलीज भट्ट कैंप की मोहित सूरी निर्देशित फिल्म राज-द मिस्ट्री कंटीन्यूज को 2009 की पहली हिट फिल्म कही जा रही है। इस फिल्म ने इमरान हाशमी और कंगना रानावत के बाजार भाव बढ़ा दिए। भट्ट कैंप में खुशी की लहर है और सोनी बीएमजी भी मुनाफे में रही।
उल्लेखनीय है कि सांवरिया और चांदनी चौक टू चाइना में विदेशी प्रोडक्शन कंपनियों को नुकसान हुआ था। ट्रेड पंडित राज-द मिस्ट्री कंटीन्यूज की सफलता का श्रेय पुरानी राज को देते हैं। इसके अलावा, हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में यह धारणा काफी मजबूत हो रही है कि डरावनी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर अच्छा बिजनेस करती हैं।
सन 2008 में रामगोपाल वर्मा की फिल्म फूंक और विक्रम भट्ट की 1920 ने ठीकठाक कारोबार किया। इसके पहले रामू की भूत भी सफल रही, लेकिन उसकी कामयाबी से प्रेरित होकर बनी दूसरी डरावनी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर लुढ़क गई। पिछले साल फूंक को पसंद करने के बाद विक्रम भट्ट आशंकित थे कि शायद दर्शकों को 1920 पसंद न आए। दरअसल, उन्हें यह लग रहा था कि कुछ ही हफ्तों के अंतराल पर आ रही 1920 को दर्शक नहीं मिलेंगे, लेकिन उनकी आशंका निराधार निकली। रजनीश दुग्गल और अदा शर्मा जैसे नए कलाकारों के बावजूद 1920 चली। इसकी सफलता ने विक्रम भट्ट से चिपकी फ्लॉप डायरेक्टर की बदनामी दूर की। इस फिल्म की सफलता से जोश में आए विक्रम भट्ट ने तत्काल नई फिल्म शापित की घोषणा कर दी। शापित के जरिए वे गायक उदित नारायण के बेटे आदित्य नारायण और नई अभिनेत्री श्वेता को लॉन्च कर रहे हैं।
विक्रम भट्ट ने शापित की शूटिंग आरंभ कर दी है। इन दिनों फिल्मिस्तान में एक बंगले का सेट लगा कर वे आदित्य और श्वेता के साथ इसकी शूटिंग कर रहे हैं। डरावनी फिल्मों के प्रति अपने आकर्षण और उसके बाजार के संदर्भ में विक्रम कहते हैं, मैं स्वयं डरपोक किस्म का व्यक्ति हूं, इसलिए मुझे बहुत डर लगता है। मैं अकेले में डरावने विचारों से घिरा रहता हूं और डरावनी कहानियां बुनता रहता हूं। फिल्में बना कर मैं अपने डर को अभिव्यक्ति देता हूं। रही दर्शकों की बात, तो मुझे लगता है कि डर के साथ जुड़ा रोमांच दर्शकों को आकर्षित करता है। डरने में भी एक आनंद है। बचपन में डरावनी कहानियां पढ़ते या सुनते समय आप दादी-नानी या मां-पिता को भींच लेते हैं, लेकिन पूरी कहानी सुने बगैर नहीं सोते! फिल्म देखते समय कुछ वैसा ही रोमांच होता है। शापित विक्रम की डरावनी फिल्मों की ट्रायलॉजी की तीसरी और आखिरी फिल्म होगी। उसके बाद वे नए सिरे से डरावनी फिल्में निर्देशित करेंगे।
डरावनी फिल्मों के प्रति दर्शकों के रुझान को देखते हुए परसेप्ट पिक्चर कंपनी ने डरावनी फिल्मों के निर्माण में एकमुश्त राशि निवेश करने का फैसला किया है। फिलहाल उन्होंने पांच फिल्मों की घोषणा की है। प्रियदर्शन के निर्देशन में गर्रर.. इस सीरीज की पहली फिल्म होगी। इसमें प्रियदर्शन एक शेर और उसके शिकार की खौफनाक कहानी चित्रित करेंगे। परसेप्ट पिक्चर कंपनी जल्दी ही 888, 13, मुंबई और वहम का निर्माण करेगी। शैलेन्द्र सिंह मानते हैं कि डरावनी फिल्मों का बाजार है। कम्प्यूटर तकनीक के विकास और स्पेशल इफेक्ट की संभावना से डरावनी फिल्मों में डर पैदा करना ज्यादा आसान हुआ है। उदाहरण के लिए प्रियदर्शन की फिल्म में शेर को एनिमेशन के जरिए तैयार किया जाएगा। फिल्मों के ट्रेड पंडित मानते हैं कि अगर आने वाली डरावनी फिल्में सफल हुई, तो हिंदी फिल्मों में फिर से सातवें दशक का वह दौर आ सकता है, जब बड़े फिल्मकार और स्टार्स भी डरावनी फिल्मों का हिस्सा बनते थे। डरावनी फिल्में मुख्यधारा की मनोरंजक फिल्में मानी जाती थीं।
याद करें, तो वो कौन थी, मेरा साया और मधुमती जैसी फिल्मों में हमने दिलीप कुमार, मनोज कुमार, साधना और वैजयंतीमाला जैसे सितारों को देखा है। मुमकिन है कि आज के पॉपुलर सितारे भी डरावनी फिल्मों की तरफ रुख करें!