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Showing posts from July, 2015

फिल्‍म समीक्षा - दृश्‍यम

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-अजय ब्रह्मात्‍मज             मलयालम, कन्नड, तेलूगु और तमिल के बाद ‘दृश्यम’ हिंदी में आई है। हिंदी में इसे दृश्य कहा जाएगा। संस्कृत मूल के इस शब्द को ही हिंदी के निर्माता-निर्देशक ने शीर्षक के तौर पर स्वीकार किया। भाषिक मेलजोल और स्वीकृति के लिहाज से यह उल्लेखनीय है। निर्माता ने फिल्म में इसे ‘दृष्यम’ लिखा है। यह गलत तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन हिंदी में प्रचलित नहीं है। इन दिनों अधिकांश निर्माता फिल्मों के पोस्टर हिंदी में लाने में रुचि नहीं लेते। लाते भी हैं तो रिलीज के समय दीवारों पर चिपका देते हैं। तब तक फिल्मों के नाम गलत वर्तनी के साथ पत्र-पत्रिकाओं में छप रहे होते हैं।               हिंदी में बनी ‘दृश्यम’ में अजय देवगन और तब्बू हैं। दोनों उम्दा कलाकार हैं। तब्बू ने हर बार अपनी अदाकारी से दर्शकों को सम्मोहित किया है। ‘दृश्यम’ में पुलिस अधिकारी और मां की द्विआयामी भूमिका में वह फिर से प्रभावित करती हैं। दृश्यों के अनुसार क्रूरता और ममता व्यक्त करती हैं। अजय देवगन के लिए विजय सलगांवकर की भूमिका निभाने का फैसला आसान नहीं रहा होगा। पिछली कुछ फिल्मों ने उनकी छवि सिंघम की बना दी है। इ…

फिल्‍म समीक्षा : मसान

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-अजय ब्रह्मात्‍मज          बनारस इन दिनों चर्चा में है। हिंदी फिल्मों में आरंभ से ही बनारस की छवियां भिन्न रूपों में दिखती रही हैं। बनारस का आध्यात्मिक रहस्य पूरी दुनिया को आकर्षित करता रहा है। बनारस की हवा में घुली मौज-मस्ती के किस्से यहां की गलियों और गालियों की तरह नॉस्टैलजिक असर करती हैं। बनारस की चर्चा में कहीं न कहीं शहर से अनजान प्रेमी उसकी जड़ता पर जोर देते हैं। उनके विवरण से लगता है कि बनारस विकास के इस ग्लोबल दौर में ठिठका खड़ा है। यहां के लोग अभी तक ‘रांड सांढ सीढी संन्यासी, इनसे बचो तो सेवो कासी’ की लोकोक्ति को चरितार्थ कर रहे हैं। सच्चाई यह है कि बनारस भी समय के साथ चल रहा है। देश के वर्त्तमान प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र है बनारस। हर अर्थ में आधुनिक और समकालीन। प्राचीनता और आध्यात्मिकता इसकी रगों में है।             नीरज घेवन की ‘मसान’ इन धारणाओं को फिल्म के पहले फ्रेम में तोड़ देती है। इस फिल्मा के जरिए हम देवी, दीपक, पाठक, शालू, रामधारी और झोंटा से परिचित होते हैं। जिंदगी की कगार पर चल रहे ये सभी चरित्र अपनी भावनाओं और उद्वेलनों से शहर की जातीय, लैंगिक और आर्थिक असम…

मेनस्ट्रीम स्पेस में ही कुछ कहना है- कबीर खान

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-अजय ब्रह्मात्‍मज
कबीर खान हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के अनोखे निर्देशक हैं। उनकी मेनस्ट्रीम फिल्मों में कंटेंट की पर्याप्त मात्रा रहती है। वे खुद को राजनीतिक रूप से जागरूक और सचेत फिल्मकार मानते हैं। उनकी फिल्में सबूत हैं। इस बार वे ‘बजरंगी भाईजान’ लेकर आ रहे हैं। उन्होंने झंकार के लिए अजय ब्रह्मात्मज से बातचीत की  ¸ ¸ ¸

-‘बजरंगी भाईजान’ में बजरंगी का सफर सिर्फ भावनात्मक है या उसका कोई राजनीतिक पहलू भी है?
भारत-पाकिस्तान का संदर्भ आएगा तो राजनीति आ ही जाएगी। मेरी कोशिश रहती है कि फिल्मों का संदर्भ रियल हो। मैं मेनस्ट्रीम सिनेमा में रियल बैकड्रॉप की कहानी कहता हूं। बिना राजनीति के कोई इंसान जी नहीं सकता। मुझे राजनीतिक संदर्भ से हीन फिल्में अजीब लगती हैं। राजनीति से मेरा आशय पार्टी-पॉलिटिक्स नहीं है। ‘बजरंगी भाईजान’ में स्ट्रांग राजनीतिक संदर्भ है।
-पहली बार किसी फिल्म इवेंट में आप के मुंह से ‘पॉलिटिक्स ऑफ द फिल्म’ जैसा टर्म सुनाई पड़ा था?
मेरे लिए वह बहुत जरूरी है। अपने यहां इस पर बात नहीं होती। समीक्षक भी फिल्म की राजनीति की बातें नहीं कहते। मैं फिल्म में कोई भी कमी बर्दाश्त कर सकता हूं। फि…

मन कस्‍तूरी रे - वरुण ग्रोवर

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बनारस की पृष्‍ठभूमि पर वरुण ग्रोवर का यह गीत कबीर की जमीन पर सारगर्भित तरीके से 'मसान' की थीम की अभिव्‍यक्ति है। पहली बार इसे सुनने के बाद ही मुझे वरुण के प्रयास और अभ्‍यास ने प्रभावित किया था। चंद शब्‍दों में भावों की यह उलटबांसी प्रशेसनीय है। हिंदी फिल्‍मों के गीतों की परंपरा में पंडित इसे जहां स्‍थान दे,फिलहाल यह हमारे समय की मुखर और भावपूर्ण अभिव्‍यक्ति है। इसे संगीत से इंडियन ओसन ने सजाया है। धन्‍यवाद वरुण... अल्‍लाह काे न मानते हुए भी मुहावरे में कहें तो 'अल्‍लाह करे ज़ोर-ए-क़लम और ज्‍यादा.....'  मुखड़ा 
पाट ना पाया मीठा पानी  ओर-छोर की दूरी रे  मन कस्तूरी। 
Even the purest of things, river water, Couldn't bridge the gap of this side and that side.
मन कस्तूरी रे जग दस्तूरी रे बात हुयी ना पूरी रे  मन कस्तूरी रे। 
Heart is like kasturi, in this ritualistic world And it doesn't get a closure ever. 
खोजे अपनी गंध ना पावे  चादर का पैबंद ना पावे 
Searches for own essence, but can't find it Can't find the paiband  for the torn chaadar of existence
बिखरे-बि…

फिल्‍म समीक्षा : बजरंगी भाईजान

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-अजय ब्रह्मात्‍मज  सलमान खान की ‘बजरंगी भाईजान’ को देखने के कई तरीके हो सकते हैं। पॉपुलर स्टार सलमान की फिल्में समीक्षा से परे होती हैं। खरी-खोटी लिखने या बताने से बेहतर होता है कि फिल्मों की अपील की बातें की जाएं। सलमान खान की खास शैली है। एक फॉर्मूला सा बन गया है।  ‘वांटेड’ के बाद से उनकी फिल्मों में इसी का इस्तेमाल हो रहा है। निर्देशक बदलते रहते हैं, लेकिन सलमान खान वही रहते हैं। बात तब अलग हो जाती है, जब उन्हें राजनीतिक रूप से सचेत निर्देशक कबीर खान मिल जाते हैं। मनोरंजन के मसाले मेे मुद्दा मिला दिया जाता है। स्वाद बदलता है और फिल्म का प्रभाव भी बदलता है। कबीर खान ने बहुत चालाकी से सलमान की छवि का इस्तेमाल किया है और अपनी बात सरल तरीके से कह दी है। इस सरलता में तर्क डूब जाता है। तर्क क्यों खोजें? आम आदमी की जिंदगी भी तो एक ही नियम से नहीं चलती। ‘बजरंगी भाईजान’ बड़े सहज तरीके से भारतीय और पाकिस्तानी समाज में सालों से जमी गलतफहमी की काई को खुरच देती है। पॉपुलर कल्चर में इससे अधिक की उम्मीद करना उचित नहीं है। सिनेमा समाज को प्रभावित जरूर करता है, लेकिन दुष्प्रभाव ही ज्यादा दिखते हैं…

दरअसल : मोहल्‍ला अस्‍सी पर मचा विवाद

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-अजय ब्रह्मात्‍मज                                                                                          पिछले कुछ समय से ‘मोहल्‍ला अस्‍सी’ के अनधिकृत फुटेज को लेकर विवाद चल रहा है। किसी शरारती ने कुछ दिनों पहले फिल्‍म के कुछ दृश्‍यों को जोड़ कर यूट्यूब पर रिलीज कर दिया। उसे देख कर अनेक संगठन और अन्‍य हिमायती उठ खड़े हुए। सभी की आपत्ति है कि फिल्‍म के इस फुटेज में जिस तरह से गालियों का इस्‍तेमाल हुआ है,उससे धार्मिक भावनाओं को ठेस लगती है। बयान भी आए कि मनोरंजन के नाम पर धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ नहीं करने दिया जाएगा। मामले की त‍ह में गए बिना सभी बयान औ फैसले दे रहे हैं। सबसे पहले बात कि यी फुटेल अनधिकृत है। यह डायरेक्‍टर की सहमति के बगैर रिलीज हुआ है। जांच एजेंसियों को पता करना चाहिए कि यह कहां से और क्‍यों अपलोड किया गया है ? अभी बगैर सांप देखे सभी लाठी पीट रहे हैं। कुछ लोगों को हल्‍ला मचाने और सुर्खियों में आने का मौका मिल गया है। कायदे से पूरे मामले की गहन जांच होनी चाहिए कि यह फुटेज किस ने अपलोड किया ? इस फुअे ज को ट्रेलर समझने की भूल कर रहे लोगों को भी देखना और समझना चाहिए कि कि…

खुद पर हमेशा रखना चट्टान सा भरोसा -करीना कपूर खान

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-अजय ब्रह्मात्‍मज  -क्या कुछ है ‘बजरंगी भाईजान’ और जाहिर तौर पर क्या निभा रही हैं आप?
फिल्म के साथ सबसे रोचक बात तो यह है कि सलमान के संग फिर से काम कर रही हूं। ‘बॉडीगार्ड’ सफल रही थी। आम जनता भी काफी उत्साहित है कि हम दोनों साथ आ रहे हैं। फिल्म की यूएसपी कबीर खान भी हैं। मैंने पहले कभी उनके संग काम नहीं किया। वह बड़ा रोचक अनुभव रहा। मेरा किरदार बड़ा मजेदार है। वह चांदनी चौक के एक स्कूल में टीचर है। वह कैसे सलमान के किरदार से मिलती है? कैसे एक बच्ची उनकी जिंदगी में आती है? दोनों फिर कैसे उसे उसके घर पहुंचाते हैं, वह सब कुछ फिल्म में है।
- बाकी फिल्म में गाने-वाने तो होंगे ही?
हां, पर वे सब जरा हटकर हैं। ऐसे नहीं कि लंदन में प्रेमी-प्रेमिका नाच-गाना कर रहे हैं।
-और वह टीचर कैसी है? साड़ी वाली या..?
नहीं, यंग और मॉडर्न। टिपिकल चांदनी चौक वाली। वह लुक और फील तो आएगा।
- .. लेकिन दिल्ली वाली लड़कियों का रोल तो आपने पहले भी किया है?
यह वाली बड़ी मैच्योर है। पहले थोड़े बबली, चर्पी किस्म की लड़की का किरदार निभाया था। ‘जब वी मेट’ वाला तो बिल्कुल अलग ही मामला था। हां, उसे लोग मेरा सिग्नेचर रोल कहते हैं, मगर इ…