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Friday, July 17, 2009

दरअसल:फिसलन भी है कामयाबी

६०० वीं पोस्ट...आप सभी को धन्यवाद।

-अजय ब्रह्मात्मज


स्कूल के दिनों में कहीं पढ़ा था, मैं नियम पर चलता हूं, इसलिए रोज नियम बदलता हूं। जिस दिन जो करने का मन हो, वैसा ही नियम बना लो। कहने के लिए हो गया कि नियमनिष्ठ हैं और मन मर्जी भी पूरी हो गई। अपने फिल्म सितारों के लिए कुछ वैसी ही बात कही जा सकती है। कभी कोई फिल्म फ्लॉप होती है, तो सितारे कहते हैं, फिल्म नहीं चल पाई, लेकिन मेरे काम की सराहना हुई। फिर फिल्म बुरी होने के बावजूद हिट हो जाए, तो सितारों के चेहरे पर मुस्कराहट आ जाती है और उनका बयान होता है, समीक्षक कुछ भी लिखें, दर्शकों ने फिल्म पसंद की है न? हिट और फ्लॉप दोनों ही स्थितियों में खुद को संतुष्ट करते हुए दर्शकों को मुगालते में रखने की यह कोशिश स्टारडम का हिस्सा हो गया है। सितारे अपने इस अंतर्विरोध को समझते हैं, लेकिन यह स्वीकार नहीं कर पाते कि उनसे भूल हुई है।
अक्षय कुमार आज कल ऐसे ही अंतद्र्वद्व और संशय से गुजर रहे हैं। चांदनी चौक टू चाइना और 8-10 तस्वीर के फ्लॉप होने के बाद उनकी कमबख्त इश्क हिट हुई है। अगर तीनों फिल्मों की तुलना करें, तो किसी को भी श्रेष्ठ फिल्म की श्रेणी में नहीं डाल सकते, लेकिन कमबख्त इश्क का स्तर और नीचे है। इसमें स्त्री और पुरुषों को लेकर जिस प्रकार से गालियां दी गई हैं और संवाद में सीधे-सीधे अश्लील भावार्थ डाले गए हैं, उनकी वजह से यह फिल्म साधारण से भी नीचे चली गई है। यह अलग बात है कि फिल्म का हश्र अक्षय की पिछली दोनों फ्लॉप फिल्मों की तरह नहीं हुआ। फिल्म चली है। फिल्म के प्रमुख वितरक और ट्रेड विश्लेषकों की बात मानें, तो यह बड़ी हिट साबित होगी। फिल्म के कलेक्शन और आय पर अभी ट्रेड सर्किल एकमत नहीं हैं। तय नहीं है कि यह कितनी बड़ी हिट है। फिर भी अक्षय के फिसलते करियर को कमबख्त इश्क से एक जीवन मिल गया है।
जाहिर-सी बात है कि अक्षय उत्साह में हैं। वे और उनके करीबी फिल्म की खराबियों और कमजोरियों पर बिल्कुल गौर नहीं कर रहे हैं। उनकी नजर तो बॉक्स ऑफिस कलेक्शन पर लगी है। अक्षय ने बयान देना आरंभ कर दिया है, मेरे लिए बॉक्स ऑफिस और दर्शक खास महत्व रखते हैं। दर्शक मेरी जैसी फिल्मों से खुश होंगे, मैं वैसी ही फिल्में करता रहूंगा। ऐसी सोच और कामयाबी किसी भी स्टार को फिसलन ही देती है। यह लोकप्रियता आखिरकार गुमनामी की अंधेरी सुरंग में समाप्त होती है। याद करें, तो अमिताभ बच्चन, धर्मेद्र और विनोद खन्ना जैसे सितारों की लोकप्रियता के दौर में जीतेंद्र ने एक अलग छवि और फिल्मों से अपनी मजबूत जगह बना ली थी। अक्षय भी वैसी ही स्थिति में हैं। लोकप्रिय और प्रचलित हीरो से अलग किस्म की फिल्मों से उन्होंने यह लोकप्रियता हासिल की है। इसमें लंबा वक्त लगा है। अब वे अपनी कामयाबी को बनाए रखने के लिए आजमाए हुए टोटकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। फूहड़, अश्लील और निम्नस्तरीय फिल्मों से कामयाबी मिलती है, तो वही सही, लेकिन अक्षय को याद रखना चाहिए कि वर्तमान की कामयाबी और लोकप्रियता भविष्य में तभी ठोस छवि और पहचान देती है, जब कुछ उल्लेखनीय और सार्थक फिल्में करियर की झोली में हों। अन्यथा सितारा डूबते ही सब कुछ गुम हो जाता है।
मालूम नहीं कि अक्षय के मन में भविष्य का यह संशय कभी पैदा होता है या नहीं? हिंदी फिल्मों में सफलता एक दुर्ग का निर्माण करती है, जिसके चौकीदार चापलूस और मतलबी लोग होते हैं। वे अपने स्वार्थ में स्टार को यथार्थ की वास्तविक जानकारी नहीं देते। कमबख्त इश्क की ताजा कामयाबी के बावजूद फिल्म के कॉन्टेंट के कारण अक्षय के वफादार दर्शक निराश हैं। उन्हें डर है कि अक्षय ऐसे परिणामों से भटकते और फिसलते ही जाएंगे।

Thursday, July 9, 2009

दरअसल:न्यूयॉर्क की कामयाबी के बावजूद

-अजय ब्रह्मात्मज

26 जून को रिलीज हुई न्यूयॉर्क को दर्शक मिले। जॉन अब्राहम, कैटरीना कैफ और नील नितिन मुकेश के साथ यशराज फिल्म्स के बैनर का आकर्षण उन्हें सिनेमाघरों में खींच कर ले गया। मल्टीप्लेक्स मालिक और निर्माता-वितरकों के मतभेद से पैदा हुआ मनोरंजन क्षेत्र का अकाल दर्शकों को फिल्मों के लिए तरसा रहा था। बीच में जो फिल्में रिलीज हुई, वे राहत सामग्री के रूप में बंटे घटिया अनाज के समान थीं। उनसे दर्शक जिंदा तो रहे, लेकिन भूख नहीं मिटी। ऐसे दौर में स्वाद की बात कोई सोच भी नहीं सकता था।
न्यूयॉर्क ने मनोरंजन के अकाल पीडि़त दर्शकों को सही राहत दी। भूख मिटी और थोड़ा स्वाद मिला। यही वजह है कि इसे देखने दर्शक टूट पड़े हैं। मुंबई में शनिवार-रविवार को करंट बुकिंग में टिकट मिलना मुश्किल हो गया था। साथ ही कुछ थिएटरों में टिकट दोगुने दाम में ब्लैक हो रहे थे।
ट्रेड सर्किल में न्यूयॉर्क की सफलता से उत्साह का संचार नहीं हुआ है। ट्रेड विशेषज्ञों के मुताबिक यशराज फिल्म्स को न्यूयॉर्क से अवश्य फायदा होगा, क्योंकि यह अपेक्षाकृत कम बजट की फिल्म है। अगले हफ्तों में आने वाली फिल्मों की लागत ज्यादा है और उन्हें ऊंचे मूल्यों पर बेचा गया है। कमबख्त इश्क और लव आज कल का उदाहरण लें, तो इसे वितरक कंपनी ने फिल्म इंडस्ट्री में आए उफान के दिनों में ऊंचे मूल्य देकर खरीदा था। चौतरफा मंदी के इस दौर में वितरक अभी मुनाफे की उम्मीद नहीं कर सकते। अगर लागत भी निकल आए, तो बड़ी बात होगी। वैसे खबर है कि दोनों ही फिल्मों के निर्माता ने तय रकम से कम राशि लेने में इस शर्त के साथ राजी हो गए हैं कि अगर फिल्में सफल हो गई, तो उन्हें तय रकम दे दी जाएगी। ट्रेड विशेषज्ञों की राय में मुनाफे की संभावना कम है।
सप्ताहांत के तीन दिनों में सिने प्रेमी और वीकएंड आउटिंग के शौकीन दर्शकों की भीड़ रहती है। महंगे टिकट से उन्हें दिक्कत नहीं होती। सप्ताहांत में पहले दिन फिल्म देखने का रोमांच खर्च पर हावी रहता है। ट्रेड सर्किल में माना जाता है कि किसी भी फिल्म के हिट या फ्लॉप की परीक्षा सोमवार से आरंभ होती है। अगर सोमवार को दर्शकों का प्रतिशत नहीं गिरा, तो फिल्म के हिट होने की संभावना रहती है। निर्माता, वितरक और अब प्रदर्शक भी सोमवार के बाद के दिनों में दर्शकों को सिनेमाघरों में खींचने के प्रयास में रहते हैं। अगर सप्ताह के अंत में फिल्म हिट हो गई, तो सोमवार के बाद भी दर्शक मिलते हैं, अन्यथा दर्शकों की संख्या में अचानक गिरावट आती है। एक तरीका यह हो सकता है कि मल्टीप्लेक्स के टिकट दर सोमवार से गुरुवार के बीच कम कर दिए जाएं। अगर सप्ताहांत के तीन दिनों में टिकट दर सौ रुपए है, तो सोमवार से गुरुवार तक उसे घटा कर 60 से 75 रुपए के बीच रखा जाए। ऐसा सोचा और कहा जा रहा है कि घटे दर पर दर्शक आ सकते हैं।
फिल्मों के चलने या न चलने का समीकरण किसी की समझ में नहीं आता। पहले की तरह निर्माता-निर्देशकों की उंगलियां अब दर्शकों की नब्ज पर नहीं हैं, इसलिए वे दर्शकों का मिजाज नहीं समझ पाते। हालांकि प्रचार और अन्य तरीकों से दर्शकों को झांसा देने की कोशिश की जाती है, लेकिन दर्शक होशियार हो गए हैं। फिल्म इंडस्ट्री के लोग ही कहते हैं कि दर्शक फिल्मों को सूंघ लेते हैं। आप चाहे जितना प्रचार और विज्ञापन दे लें। दर्शक फिल्म रिलीज होने के पहले से मन बना चुका होता है। केवल पांच से दस प्रतिशत दर्शक ही फिल्म की समीक्षा या प्रदर्शन से प्रभावित होकर मन बदलते हैं। ऐसी स्थिति में निर्माता, वितरक और प्रदर्शक निश्चित हिट की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?

Tuesday, May 20, 2008

खप जाती है एक पीढ़ी तब मिलती है कामयाबी

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री समेत हर इंडस्ट्री और क्षेत्र में ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे। हजारों- लाखों उदाहरण हैं। एक पीढ़ी के खपने और होम होने के बाद ही अगली पीढ़ी कामयाब हो पाई। आजकल मनोवैज्ञानिक और अन्य सभी कहते हैं कि बच्चों पर अपनी इच्छाओं और सपनों का बोझ नहीं लादना चाहिए। लेकिन हम अपने आसपास ऐसे अनेक व्यक्तियों को देख सकते हैं, जिन्होंने अपने माता या पिता के सपनों को साकार किया।

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में ऐसे कई उदाहरण हैं। हाल ही में 'हाल-ए-दिल' के म्यूजिक रिलीज के समय फिल्म के निर्माता कुमार मंगत मंच पर आए। उन्होंने कहा कि मैं कुछ भी बोलने से घबराता हूं। लेकिन आज मैं खुद को रोक नहीं पा रहा हूं। आज मैं अवश्य बोलूंगा। उन्होंने समय और तारीख का उल्लेख करते हुए बताया कि 1973 में मैं आंखों से सपने लिए मुंबई आया था। इतने सालों के बाद मेरा वह सपना पूरा हो रहा है। मेरी बेटी अमिता पाठक फिल्मों में हीरोइन बन कर आ रही है। अमिता पाठक के पिता कुमार मंगत हैं। लंबे समय तक वे अजय देवगन के मैनेजर रहे। इन दिनों वे बिग स्क्रीन एंटरटेनमेंट के मालिक हैं और कई फिल्मों का निर्माण कर रहे हैं।

आप लोगों को शायद मालूम हो कि अनिल कपूर और बोनी कपूर के पिता सुरेन्द्र कपूर कभी गीता बाली के सचिव थे। बोनी कपूर की फिल्म के आरंभ में सबसे पहले गीता बाली की ही तस्वीर आती है। सुरेन्द्र कपूर सचिव से प्रोड्क्शन में आए और फिर प्रोड्यूसर बन गए। आज उनके बेटे कामयाब हैं। उनकी पोती सोनम कपूर ने कपूर परिवार के वारिस रणवीर कपूर के साथ काम किया।

नरगिस, मीना कुमारी, मधुबाला की मां ने जिंदगी खपा दी अपनी बेटियों का भविष्य संवारने और अपने सपनों को निखारने में। निश्चित ही इस संदर्भ में और भी कई नाम गिनाए जा सकते हैं। संभव है कि कुछ के बारे में आप जानते हों। प्लीज बताएं ... हम उन लोगों को सादर याद करें, जिन्होंने अपनी मेहनत का नतीजा अगली पीढ़ी को दिया। खेत उन्होंने जोते, बीज उन्होंने डाले, फसल उन्होंने बोयी ... और फसल काटी अगली पीढ़ी ने ...