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Saturday, July 4, 2009

दरअसल:दुविधा में संजय दत्त की आत्मकथा


-अजय ब्रह्मात्मज

चुनाव की सरगर्मी के बाद संजय दत्त ने नेता का चोला उतार दिया है। वे इन दिनों गोवा में अजय देवगन की फिल्म ऑल द बेस्ट की शूटिंग में बिजी हैं। इस दौरान उन्होंने खुद को आंका। कार्यो को निबटाया और दोस्तों के साथ बैठकें कीं। वे अजय को छोटे भाई मानते हैं। यही वजह है किफिल्म की योजना के मुताबिक उन्होंने एक शेड्यूल में शूटिंग खत्म की। सभी जानते हैं कि संजय की फिल्म उनकी उलझनों की वजह से खिंच जाती हैं।
संजय लगते एकाकी हैं, लेकिन उनका जीवन एकाकी हो ही नहीं सकता! उनके दोस्त उन्हें नहीं छोड़ते। शायद उन्हें भी दोस्तों की जरूरत रहती है। यह अलग बात है कि उनके दोस्त बदलते रहते हैं। उनके दोस्तों की सूची सीमित है। उनके कुछ स्थायी दोस्त हैं, जिनसे वे कभी-कभी ही मिलते हैं, लेकिन वे दोस्त ही उनके भावनात्मक संबल हैं। अपनी जिंदगी की उथल-पुथल में उन्होंने दोस्तों को परखा है। वे उन पर भरोसा करते हैं। संजय सरीखे व्यक्ति भावुक और अलग किस्म से संवेदनशील होने के कारण भरोसे में धोखा भी खाते हैं। वे ऐसे धोखों से कुछ नहीं सीखते। वे फिर भरोसा करते हैं। पिछले दिनों चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने देश के सुदूर इलाकों का दौरा किया। बिहार, उत्तर प्रदेश और बंगाल के पिछड़े क्षेत्रों में गए और वहां के लोगों की जिजीविषा से प्रभावित होकर लौटे। अपनी क्षणिक मुलाकातों में ही उन्हें लगा कि गांव के लोग छल-कपट नहीं जानते। वे सीधे और ईमानदार हैं। उन्होंने महसूस किया कि शहरों में रहते हुए हम देश की वास्तविकता से परिचित नहीं हो पाते। देश और समाज के बारे में उनके खयाल बदले हैं। वे देश की सेवा जिम्मेदारी के साथ करना चाहते हैं। गोवा में उन्होंने अपनी आत्मकथा लिखने की इच्छा प्रकट की। उन्होंने कहा, मैं अपने जीवन के अनुभव और प्रसंग के बारे में लिखना चाहता हूं। लेखन में खुद की अक्षमता स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा, मैं किसी लेखकया पत्रकार के साथ मिलकर यह काम करना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि कोई मुझसे बात करे और मेरे शब्दों में सब कुछ लिखे। वे खुद से जुड़े प्रसंगों पर भी लिखना चाहते हैं, लेकिन मानते हैं कि दूसरों के बारे में साफ-साफ नहीं लिखा जा सकता, अगर पूरी तरह से सच्ची बात लिख दूंगा या बता दूंगा, तो दूसरों की मुश्किलें बढ़ जाएंगी। सवाल उठता है कि क्या ऐसा रक्षात्मक लेखन से उनके जीवन के बारे में लोग समझ पाएंगे?
संजय का जीवन सामान्य नहीं रहा है। उन्होंने कगार की जिंदगी जी है। अपनी भूल और नासमझ हरकतों से वे विवादों में उलझे। हालांकि उनका नाम बम कांड से अलग हो चुका है, लेकिन आ‌र्म्स एक्ट वाले मामले से वे मुक्त नहीं हुए हैं। निजी जिंदगी में उनके संबंध बनते-बिगड़ते रहे हैं। उनके प्रशंसक और फिल्म अध्येता उनके बारे में ज्यादा से ज्यादा जानना चाहते हैं। संजय पत्रकारों से खुलकर बात नहीं करते। अपने द्वंद्व और दुविधाओं की वजह से वे अपनी बातचीत में असहज और चौकस रहते हैं। कम बोलते हैं और उनकी बातें अस्पष्ट रहती हैं। ऐसे तिलिस्मी और रहस्यपूर्ण व्यक्ति की जीवनी या आत्मकथा निश्चित ही रोचक होगी। यदि वे ईमानदारी से अपनी मनोदशा, मानसिकता और अनुभव के बारे में विस्तार से लिखें, तो लोग उन्हें और उनके दौर को अच्छी तरह समझ पाएंगे।

Friday, July 11, 2008

फ़िल्म सामीक्षा : महबूबा

पुराना रोमांस और त्याग
-अजय ब्रह्मात्मज
अफजल खान की फिल्म महबूबा शैली, शिल्प, विषय और प्रस्तुति- हर लिहाज से पुरानी लगती है। और है भी। हालांकि फिल्म के हीरो संजय दत्त और अजय देवगन आज भी पापुलर हैं, लेकिन उनकी आठ साल पुरानी छवि कहीं न कहीं दर्शकों को खटकेगी। फिल्म की हीरोइन मनीषा कोईराला आज के दर्शकों के मानस से निकल चुकी हैं। पापुलर किस्म की फिल्मों के लिए उनका टटका होना जरूरी है। फिल्म बासी हो चुकी हो तो उसका आनंद कम हो जाता है।
फिल्म की कहानी वर्षा उर्फ पायल (मनीषा कोईराला) पर केंद्रित है। उसके जीवन में श्रवण धारीवाल (संजय दत्त) और करण (अजय देवगन) आते हैं। संयोग है कि श्रवण और करण भाई हैं। ऐसी फिल्मों में अगर हीरोइन के दो दीवाने हों तो एक को त्याग करना पड़ता है या उसकी बलि चढ़ जाती है। महबूबा में भी यही होता है। यहां बताना उचित नहीं होगा कि मनीषा के लिए संजय दत्त बचते हैं या अजय देवगन।
महबूबा भव्य, महंगी और बड़ी फिल्म है। फिल्म के बाहरी तामझाम और दिखावे पर जो खर्च किया गया है, उसका छोटा हिस्सा भी अगर कथा-पटकथा पर खर्च किया गया होता तो फिल्म मनोरंजक हो जाती। चूंकि फिल्म का विषय और शिल्प लगभग एकदशक पुराना है, इसलिए महानगरों में इसे दर्शक नहीं मिलेंगे। कस्बे और छोटे शहरों में यह फिल्म दर्शकों को पसंद आ सकती है। महबूबा हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का पर्याय बन चुकी बॉलीवुड श्रेणी की फिल्म है। अब ऐसी फिल्में नहीं बनतीं।
महबूबा में मनीषा को कुछ अच्छे दृश्य मिले हैं। उन दृश्यों में उन्होंने अभिनय क्षमता का परिचय दिया है। संजय और अजय का काम साधारण है। फिल्म की फोटोग्राफी अवश्य आकर्षित करती है। अशोक मेहता कैमरे से कमाल करते हैं और साधारण दिखने वाली वस्तुओं में भी चमक पैदा कर देते हैं। बुडापेस्ट के सौंदर्य को उन्होंने बहुत अच्छी तरह शूट किया है। अफसोस है कि एक साधारण फिल्म में उनका यह योगदान निरर्थक ही रहेगा।

Tuesday, February 12, 2008

मान्यता की माँग में सिन्दूर

मान्यता की माँग में सिन्दूर देख कर कई लोगों को हैरत हो रही होगी.दुबई से मुम्बई आई एक सामान्य सी लड़की की आंखों में कई सपने रहे होंगे.इन सपनों को बुनने में हमारी हिन्दी फिल्मों ने ताना-बाना का काम किया होगा.तभी तो वह मुम्बई आने के बाद फिल्मों में पाँव टिकने की कोशिश करती रही.उसे कभी कोई बड़ा ऑफर नहीं मिला.हाँ,प्रकाश झा ने उसे 'गंगाजल'में एक आइटम गीत करने का मौका दिया।
मान्यता ने वहाँ से संजय की संगिनी बनने तक का सफर अपनी जिद्द से तय किया।

गौर करें कि यह किसी भी सामान्य लड़की का सपना हो सकता है कि वह देश के सबसे चर्चित और विवादास्पद फिल्म ऐक्टर की की संगिनी बने.चवन्नी बार-बार संगिनी शब्द का ही इस्तेमाल कर रहा है.इसकी भी ठोस वजह है.अभी मान्यता को पत्नी कहना ठीक नहीं होगा.संजय दत्त के इस भावनात्मक उफान के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता.कल को वे किसी और के साथ भी नज़र आ सकते हैं.दोनों की शादी का मकसद सिर्फ साथ रहना है.दोनों दो सालों से साथ रह ही रहे थे.दवाब में आकर संजय ने भावनात्मक उद्रेक में शादी की बात मान ली।

चवन्नी इसे मान्यता के दृष्टिकोण से बड़ी उपलब्धि के तौर पर देख रहा है.जिस लड़की का आइटम गीत भी लोगों ने नज़रंदाज कर दिया था.आज वह देश के सभी अख़बारों के प्रथम पेज कि खबर.हर अखबार में उसकी तस्वीर छपी है.क्या उसने सोच-समझकर इस रिश्ते की पहल की होगी?कहते लड़कियां भवन में फैसले नहीं लेतीं.वे पहले फिसला लेटी हैं,और फिर भावनाओं में फँस जाती हैं।

मान्यता और संजय की दोस्ती और रिश्तों की बात करें तो संजय के एक निर्माता दोस्त ने बाबा से मनु की मुलाक़ात करवाई थी.ऐसी मुलाकातें आम है.संजय जैसे ऐक्टर की ज़िंदगी में आई ऐसी लड़कियों की गिनती नहीं की जाती.लेकिन पहली मुलाक़ात में ही कुछ ऐसा टंका भिड़ा कि मान्यता संजय के करीब आती गयी और संजय के पुराने दोस्त छूटते गए.यहाँ तक कि परिवार में भी मान्यता का पद और कद बढ़ता गया.वह संजय की बहनों प्रिय और नम्रता की नाखुशी के बावजूद संजय दत्त की हमसफ़र बनी रही।

मान्यता ने सब कुछ हासिल किया.यह संजय की तीसरी शादी है तो मान्यता की चौथी शादी है.मान्यता ने आज सब कुछ हासिल कर लिया है.उसकी यह यात्रा किसी परिकथा की तरह ही है.हाँ,किसी दिन वह बताये तो रोचक कहानी सुनने को मिलेगी.

Saturday, September 8, 2007

हारे (सितारे) को हरिनाम

कोई कहीं भी आए.जाए... चवन्नी को क्या फर्क पड़ता है? इन दिनों संजय दत्त हर प्रकार के देवतओं के मंदिरों का दरवाजा खटखटा रहे हैं. उन्हें अमर्त्य देवताओं की सुध हथियार मामले में फंसने और जेल जाने के बाद आई. आजकल तो आए दिन वे किसी न किसी मंदिर के चौखटे पर दिखाई पड़ते हैं और हमारा मीडिया उनकी धार्मिक और धर्मभीरू छवि पेश कर खुश होता है. हाथ में बध्धी, माथे पर टीका और गले में धार्मिक चुनरी डाले संजय दत्त से सभी को सहानुभूति होती है. उन पर दया अ।ती है. चवन्नी को लगता है कि संजय दत्त इन धार्मिक यात्राओं से अपने मकसद में कामयाब हो रहे हैं. अगोचर देवता तो न जाने कब कृपा करेंगे? संसार के गोचर प्राणियों की धारणा है कि बेचारा संजू बाबा नाहक फंस गया. उसने जो अवैध हथियार रखने का अपराध किया है, उसकी सजा ज्यादा लंबी होती जा रही है.
चवन्नी ने गौर किया है कि कानून की गिरफ्त में अ।ने के बाद संजू बाबा ने अपनी हिंदू पहचान को मजबूत किया है. उन्होंने मुसलमान दोस्तों से एक दूरी बनाई और सार्वजनिक स्थलों पर नजर आते समय हिंदू श्रद्धालु के रूप में ही दिखे. बहुत लोगों को लग सकता है कि यह कौन सी बड़ी बात हो गई. बड़ी बात है... इस देश के बहुसंख्यक के साथ जुड़ना या अल्पसंख्यक पहचान कायम करना हमारी सामाजिक अस्मिता का हिस्सा बनता जा रहा है. सलमान खान कोर्ट में पेशी के समय कटोरी छाप सफेद टोपी पहन लेते हैं. संजय दत्त अपनी पेशियों के समय ललाट पर लाल-काला टीका लगा लेते हैं.
किसी की श्रद्धा और अ।स्था पर सवाल नहीं उठाया जा सकत।, लेकिन अ।स्थाओं का सार्वजनिक प्रदर्शन हो और उसके पीछे कोई निहित मंशा हो तो चवन्नी चौंकता है.. क्या वजह है कि अचानक तीर्थाटन में रुचि बढ़ गई फिल्मी हसितयों की... अमिताभ बच्चन दिन-रात मंदिरों के फेरे लगाते रहते हैं, संजय दत्त का हम जिक्र कर ही रहे हैं, बाकी सब भी निजी और सार्वजनिक तौर पर भगवान की शरण में माथा टेकते हैं. चवन्नी सोचता है कि जब ऐसे कामयाब लोग धर्मभीरू और अंधविश्वासी हो सकते है तो इनको अपना आदर्श मानने वाले बेचारे दर्शक और अ।मजन क्या सोचते और करते होंगे?