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Showing posts from March, 2008

हिंदी सिनेमा में हॉलीवुड का इन्टरेस्ट

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-अजय ब्रह्मात्मज हिंदी फिल्मों के ट्रेड पंडित भले ही संजय लीला भंसाली की फिल्म सांवरिया को फ्लॉप घोषित कर चुके हों, लेकिन मुंबई में सक्रिय सोनी पिक्चर्स के अधिकारी इस फिल्म से संतुष्ट हैं और इसीलिए वे आगे भी हिंदी फिल्म के निर्माण के बारे में सोच रहे हैं। सिर्फ सोनी पिक्चर्स ही नहीं, बल्कि हाल-फिलहाल में हॉलीवुड की अनेक प्रोडक्शन कंपनियों ने मुंबई में अपनी सक्रियता बढ़ा दी है और इसीलिए वायाकॉम, डिज्नी, वार्नर ब्रदर्स, सोनी बीएमजी और ट्वेंटीएथ सेंचुरी फॉक्स के अधिकारी हिंदी फिल्मों के निर्माताओं के साथ संभावनाओं पर विचार कर रहे हैं। कहते हैं, इस बार वे निश्चित इरादों और रणनीति के साथ हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की गलियों में घूम रहे हैं।
पिछले दिनों इंटरनेशनल पहचान की अभिनेत्री के इंटरव्यू के लिए प्रतीक्षा करते समय उनसे मिलने आए डिज्नी के अधिकारियों से मुलाकात हो गई। सारे अधिकारी अमेरिका से आए थे। उनके इरादों का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि उनके विजिटिंग कार्ड में एक तरफ सारी जानकारियां हिंदी में छपी थीं। इन दिनों हिंदी फिल्मों के निर्माता-निर्देशकों के विजिटिंग कार्ड में हिंदी का अ भी न…

बॉक्स ऑफिस:२६.०३.२००८

पहली तिमाही की आखिरी फिल्म रेस से ट्रेड पंडितों की उम्मीद पूरी हो गई। इस फिल्म को ओपनिंग अच्छी मिली और पहले तीन दिनों में इसका कारोबार अस्सी प्रतिशत से ऊपर रहा। जनवरी सेमार्च तक आशुतोष गोवारिकर की जोधा अकबर के अलावा किसी और फिल्म का बिजनेस संतोषजनक नहीं रहा था। ऐसे में रेस के कारोबार से इंडस्ट्री में खुशी की लहर आई है। फिल्म के निर्माता रमेश तौरानी ने फिल्म के प्रदर्शन की आक्रामक रणनीति अपनाई। उन्होंने खाली सिनेमाघरों में अपनी फिल्म भर दी। उन्होंने करण जौहर और यश चोपड़ा की तरह फिल्म के अधिकतम प्रिंट जारी किए और पहले तीन दिनों की भरपूर कमाई का पुख्ता इंतजाम किया। सूत्रों के मुताबिक रेस के 1100 से अधिक प्रिंट सिनेमाघरों में चल रहे हैं।
रेस का मल्टीस्टारर होना दर्शकों को सिनेमाघरों में खींचने का अच्छा जरिया बना। सैफ अली खान, अक्षय खन्ना और अनिल कपूर के साथ कैटरीना कैफ और बिपाशा बसु का ग्लैमर काम आया। समीक्षकों ने फिल्म की आलोचना तो की लेकिन एक स्तर तक अब्बास-मस्तान की स्टाइल को सराहा। इस फिल्म को युवा दर्शक मिल रहे हैं। उन्हें इससे फर्क नहीं पड़ता कि फिल्म के सारे किरदार बुरे क्यों हैं?
पि…

आमिर खान का माफीनामा

आमिर खान पिछले दिनों टोरंटो में थे.वहाँ पहुँचने के पहले उन्होंने अपने ब्लॉग के जरिये टोरंटो के ब्लॉगर मित्रों को संदेश दिया था कि आप अपना सम्पर्क नम्बर दें.अगर मुझे मौका मिला तो आप में से कुछ मित्रों को बुलाकर मिलूंगा.इस सुंदर मंशा के बावजूद आमिर खान टोरंटो में समय नहीं निकाल सके.उन्होंने टोरंटो के अपने सभी ब्लॉगर मित्रों से माफ़ी मांगी है,लेकिन वादा किया है कि वे भविष्य में अपने ब्लॉगर मित्रों से जरूर मिलेंगे.टोरंटो के एअरपोर्ट से उन्होंने यह पोस्ट डाली है।
गजनी के नए गेटउप में आमिर खान के कान काफी बड़े-बड़े दिख रहे हैं.आमिर खान ने बताया है कि उन्हें बचपन में बड़े कान वाला लड़का कहा जाता था.बचपन में उनका एक नाम बिग इअर्स (big ears) ही पड़ गया था.

खेमों में बंटी फ़िल्म इंडस्ट्री, अब नहीं मनती होली

-अजय ब्रह्मात्मज
हर साल होली के मौके पर मुंबई की हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में मिथक बन चुकी आरके स्टूडियो की होली याद की जाती है। उस जमाने में बच्चे रहे अनिल कपूर, ऋषि कपूर, रणधीर कपूर से बातें करें, तो आज भी उनकी आंखों में होली के रंगीन नजारे और धमाल दिखाई देने लगते हैं। कहते हैं, होली के दिन तब सारी फिल्म इंडस्ट्री सुबह से शाम तक आरके स्टूडियो में बैठी रहती थी। सुबह से शुरू हुए आयोजन में शाम तक रंग और भंग का दौर चलता रहता था। विविध प्रकार के व्यंजन भी बनते थे। वहां आर्टिस्ट के साथ तकनीशियन भी आते थे। कोई छोटा-बड़ा नहीं होता था। उस दिन की मौज-मस्ती में सभी बराबर के भागीदार होते थे। एक ओर शंकर-जयकिशन का लाइव बैंड रहता था, तो दूसरी ओर सितारा देवी और गोपी कृष्ण के शास्त्रीय नृत्य के साथ बाकी सितारों के फिल्मी ठुमके भी लगते थे। सभी दिल खोल कर नाचते-गाते थे। स्वयं राजकपूर होली के रंग और उमंग की व्यवस्था करते थे। दरअसल, हिंदी सिनेमा के पहले शोमैन राजकपूर जब तक ऐक्टिव रहे, तब तक आरके स्टूडियो की होली ही फिल्म इंडस्ट्री की सबसे रंगीन और हसीन होली बनी रही। उन दिनों स्टार के रूप में दिलीप कुमार और …

रेस: बुरे किरदारों की एंटरटेनिंग फिल्म

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-अजय ब्रह्मात्मज

प्रेम, आपसी संबंध और संबंधों में छल-कपट की कहानियां हमें अच्छी लगती हैं। अगर उनमें अपराध मिल जाए तो कहानी रोचक एवं रोमांचक हो जाती है। साहित्य, पत्रिकाएं और अखबार ऐसी कहानियों से भरे रहते हैं। फिल्मों में भी रोमांचक कहानियों की यह विधा काफी पॉपुलर है। हम इस विधा को सिर्फ थ्रिलर फिल्मों के नाम से जानते हैं। निर्देशक अब्बास मस्तान ऐसी फिल्मों में माहिर हैं। हालांकि उनकी 36 चाइना टाउन और नकाब को दर्शकों ने उतना पसंद नहीं किया था। इस बार वे फॉर्म में दिख रहे हैं।
रणवीर और राजीव सौतेले भाई हैं। ऊपरी तौर पर दोनों के बीच भाईचारा दिखता है, लेकिन छोटा भाई ग्रंथियों का शिकार है। वह अंदर ही अंदर सुलगता रहता है। उसे लगता है कि बड़ा भाई रणवीर हमेशा उस पर तरस खाता रहता है। वह उसके प्रेम को भी उसका दिखावा समझता है। रणवीर घोड़ों के धंधे में है। उसमें आगे रहने की ललक है और वह हमेशा जीतने की कोशिश में रहता है। दूसरी तरफ राजीव को शराब की लत लग गई है। रणवीर की जिंदगी में दो लड़कियां हैं। एक तो उसकी नयी-नयी बनी प्रेमिका सोनिया और दूसरी सोफिया, जो उसकी सेक्रेटरी है। राजीव की नजर सोनिया पर प…

गंजे हो गए आमिर खान

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अपनी नई फ़िल्म 'गजनी' के लिए आमिर खान को गंजा होना था.कल टोरंटो जाने से पहले अपने आवास पर उन्होंने हेयर स्टाइलिस्ट अवाँ कांट्रेक्टर को घर पर बुलाया।बीवी किरण राव और गीतकार प्रसून जोशी के सामने उन्होंने बाल कटवाए और गजनी के लुक में आ गए.आमिर खान ने अपनी फिल्मों के किरदार के हिसाब से लुक बदलने का रिवाज शुरू किया.गजनी में उन्हें इस लुक में इसलिए रहना है कि सिर पर लगा जख्म दिखाया जा सके.आमिर ने फ़िल्म के निर्देशक मुर्गदोस से अनुमति लेने के बाद ही अपना लुक बदला.ऐसा कहा जा रहा है कि 'गजनी'में मध्यांतर के बाद वे इसी लुक में दिखेंगे.

दस साल का हुआ मामी इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल

-अजय ब्रह्मात्मज
हर साल मुंबई में इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का आयोजन होता है। इस साल 7 से 13 मार्च के बीच आयोजित फेस्टिवल में 125 से अधिक फिल्में दिखाई गई। सात दिनों के इस फेस्टिवल में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ी कई नामी हस्तियों ने हिस्सा भी लिया। सबसे सुखद बात यह रही कि कई सक्रिय फिल्मकारों ने दर्शकों, फिल्म प्रेमियों और फिल्मों में आने के इच्छुक व्यक्तियों से आमने-सामने बातें भी कीं। उन्होंने उनके साथ फिल्म निर्माण से संबंधित मुद्दों पर बातें कीं और उनकी जिज्ञासाओं को शांत किया और उसके बाद अपनी विशेषज्ञता शेयर की। मुंबई का मामी फिल्म फेस्टिवल इस मायने में विशेष है कि इसके आयोजन में फिल्म इंडस्ट्री के सदस्यों की भागीदारी रहती है। हालांकि महाराष्ट्र की सरकार आर्थिक मदद करती है, लेकिन फेस्टिवल से संबंधित किसी भी फैसले में कोई सरकारी दबाव और हस्तक्षेप नहीं रहता।
इस फेस्टिवल की कई उपलब्धियां हैं। मशहूर निर्देशक नागेश कुकनूर को पहली बार इसी फेस्टिवल से पहचान मिली। कोंकणा सेन शर्मा इसी फेस्टिवल के जरिए हिंदी निर्माता-निर्देशकों से परिचित हुई थीं। देश-विदेश की कई विख्यात फिल्में पहली बार …

बॉक्स ऑफिस १९.०३.०८

ऐसा लग ही रहा था कि 26 जुलाई ऐट बरिस्ता बाक्स आफिस पर डूब जाएगी। वही हुआ भी। इस फिल्म के हश्र पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। फिल्म पूरे भारत में रिलीज भी नहीं हो सकी थी। फिल्म ट्रेड के एक विशेषज्ञ की राय में निर्देशक मोहन शर्मा ने विषय तो महत्व का चुना था, लेकिन उसके साथ वह न्याय नहीं कर सके। उन्होंने एक संभावना भी खत्म कर दी। उनकी राय में किसी अच्छे विषय पर बुरी फिल्म बन जाए तो निर्माता उस विषय को फिर से छूने में कतराते हैं। ब्लैक एंड ह्वाइट के बारे में सुभाष घई जो भी पोस्टर छपवा और महानगरों की दीवारों पर सटवा रहे हों, सच तो यही है कि बाक्स आफिस पर फिल्म विफल रही। समीक्षकों ने अवश्य तारीफ की, मगर उनकी तारीफों का दर्शकों पर कोई असर नहीं हुआ। वैसे ब्लैक एंड ह्वाइट दिल्ली और महाराष्ट्र में टैक्स फ्री हो चुकी है। उम्मीद है कि दर्शक बढ़ेंगे और फिल्मकारों का नुकसान कम होगा। बाक्स आफिस पर कोई भी प्रतियोगिता नहीं होने से जोधा अकबर के दर्शक ज्यादा नहीं घटे हैं। यह फिल्म सप्ताहांत में दर्शक खींच रही है। इस हफ्ते अब्बास मस्तान की थ्रिलर रेस आ रही है।

चुंबन चर्चा : हिन्दी फ़िल्म

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हिन्दी फिल्मों में चुम्बन पर काफी कुछ किखा जाता रहा है.२००३ में मल्लिका शेरावत की एक फ़िल्म आई थी 'ख्वाहिश'.इस फ़िल्म में उन्होंने लेखा खोर्जुवेकर का किरदार निभाया था.फ़िल्म के हीरो हिमांशु मल्लिक थे.मल्लिक और मल्लिका की यह फ़िल्म चुंबन के कारन चर्चित हुई थी.इस फ़िल्म में एक,दो नहीं.... कुल १७ चुंबन थे। 'ख्वाहिश' ने मल्लिका को मशहूर कर दिया था और कुछ समय के बाद आई 'मर्डर' ने तो मोहर लगा दी थी कि मल्लिका इस पीढ़ी की बोल्ड और बिंदास अभिनेत्री हैं।
१७ चुंबन देख कर या उसके बारे में सुन कर दर्शक दांतों तले उंगली काट बैठे थे और उनकी पलकें झपक ही नहीं रहीं थीं.हिन्दी फिल्मों के दर्शक थोड़े यौन पिपासु तो हैं ही.बहरहाल चवन्नी आप को बताना चाहता है कि १९३२ में एक फ़िल्म आई थी 'ज़रीना',उस फ़िल्म में १७.१८.२५ नहीं .... कुल ८६ चुंबन दृश्य थे.देखिये गश खाकर गिरिये मत.उस फ़िल्म के बारे में कुछ और जान लीजिये।
१९३२ में बनी इस फ़िल्म को ८६ चुंबन के कारण कुछ दिनों के अन्दर ही सिनेमाघरों से उतारना पड़ा था.फ़िल्म के निर्देशक एजरा मीर थे.एजरा मीर बाद में डाक्यूमेंट्री फिल्मों के …

हिन्दी फ़िल्म:महिलायें:वर्तमान दशक

यह दशक अभी समाप्त नहीं हुआ है.अगले दो साल में अभी न जाने किस-किस अभिनेत्री का दीदार होगा और न जाने किसका जादू दर्शकों के सिर चढ़ कर बोलेगा?फिलहाल दीपिका पदुकोन और सोनम कपूर अपने-अपने हिसाब से जलवे बिखेर रही हैं.दोनों एक ही दिन ९ अक्टूबर २००७ को परदे पर आयीं और छ गयीं.दीपिका की पहली फिम 'ओम शान्ति ओम' थी,जिसे फराह खान ने निर्देशित किया था.सोनम के निर्देशक संजय लीला भंसाली हैं.उनकी 'सांवरिया' से सोनम का आगमन हुआ.ऐसा लगता है कि दोनों का सफर लंबा है.हाँ,रास्ते अलग-अलग हैं. अब थोड़ा पीछे चलें.प्रीति जिंटा को शेखर कपूर पेश करने वाले थे.उनकी फ़िल्म नहीं बन सकी.मणि रत्नम की 'दिल से' में प्रीति की झलक दिखी थी.उनकी ज्यादातर फिल्में इसी दशक में आई हैं.इसी दशक में अमृता रावएक सामान्य सी फ़िल्म 'अब के बरस' से आयीं.धीरे-धीरे उनहोंने अपनी तरह की जगह बना ली.हेमामालिनी की बेटी एषा देओलअभी तक कोई मुकाम नही छू सकी हैं.करिश्मा कपूर की बहन करीना कपूर ने जे पी दत्ता की फ़िल्म 'रिफ्यूजी' से धमाकेदार शुरूआत की,लेकिन उनका सफर ठीक नहीं रहा.पिछले साल 'जब वी मेट' …

कामयाबी की कीमत चुकाती करीना कपूर

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कामयाबी की कीमत सभी को चुकानी पड़ती है। इन दिनों करीना कपूर इसी फेज से गुजर रही हैं। दरअसल, जब वी मेट के बाद उनकी जिंदगी हर लिहाज से इसलिए बदल गई, क्योंकि सोलो हीरोइन के रूप में उनकी फिल्म रातोंरात हिट हो गई। इस फिल्म में उनके काम की तारीफ की गई और इसीलिए अब पुरस्कारों की बरसात हो रही है। अभी तक दो बड़े पुरस्कार उनकी झोली में आ चुके हैं और ऐसा माना जा रहा है कि देश-विदेश के सारे पुरस्कार इस बार अकेले करीना कपूर ही ले जाएंगी। पुरस्कारों की बात चलने पर आंतरिक खुशी से उनका चेहरा दीप्त हो उठता है। वे सूफियाना अंदाज में कहती हैं, पुरस्कारों का मिलना अच्छा लगता है। कई बार नहीं मिलने पर भी दुख नहीं होता, लेकिन यदि जब वी मेट के लिए पुरस्कार नहीं मिलता, तो जरूर बुरा लगता। करीना कपूर अभी से लेकर अगले साल के अप्रैल महीने तक व्यस्त हैं, लेकिन उन्होंने सोच रखा है कि समय से सूचना मिल गई, तो वे हर पुरस्कार लेने जाएंगी और कुछ अवार्ड समारोह में परफॉर्म भी करेंगी।
करीना पर इधर बेवफाई का आरोप लगा है। कुछ लोगों की राय में उन्होंने शाहिद कपूर को छोड़ कर अच्छा नहीं किया। वास्तव में करीना के प्रशंसक आज भी सै…

हिन्दी फ़िल्म:महिलायें:आखिरी दशक

पिछली सदी का आखिरी दशक कई अभिनेत्रियों के लिए याद किया जायेगा.सबसे पहले काजोल का नाम लें.तनुजा की बेटी काजोल ने राहुल रवैल की 'बेखुदी'(१९९२) से सामान्य शुरुआत की.'दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे' उनकी और हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री की अभी तक सबसे ज्यादा हफ्तों तक चलनेवाली फ़िल्म है.यह आज भी मुम्बई में चल ही रही है.ऐश्वर्या राय १९९४ में विश्व सुंदरी बनीं और अगला कदम उन्होंने फिल्मों में रखा,उन्होंने मणि रत्नम की फ़िल्म 'इरुवर'(१९९७) से शुरूआत की.आज वह देश की सबसे अधिक चर्चित अभिनेत्री हैं और उनके इंटरनेशनल पहचान है.जिस साल ऐश्वर्या राय विश्व सुंदरी बनी थीं,उसी साल सुष्मिता सेन ब्रह्माण्ड सुंदरी घोषित की गई थीं.सुष्मिता ने महेश भट्ट की 'दस्तक'(१९९६) से फिल्मी सफर आरंभ किया.रानी मुख़र्जी 'राजा की आयेगी बारात' से फिल्मों में आ गई थीं,लेकिन उन्हें पहचान मिली विक्रम भट्ट की 'गुलाम' से.'कुछ कुछ होता है' के बाद वह फ़िल्म इंडस्ट्री की बड़ी लीग में शामिल हो गयीं.इस दशक की संवेदनशील अभिनेत्री ने तब्बू ने बाल कलाकार के तौर पर देव आनंद की फ़िल्म …

हिन्दी फ़िल्म:महिलायें:नौवां दशक

नौवें दशक में आई मधुर मुस्कान माधुरी दीक्षित को दर्शक नहीं भूल पाये हैं.धक्-धक् गर्ल के नाम से मशहूर हुई इस अभिनेत्री ने अपने नृत्य और अभिनय से सचमुच दर्शकों की धड़कनें बढ़ा दी थीं.राजश्री कि १९८४ में आई 'अबोध' से उनका फिल्मी सफर आरंभ हुआ.उनकी पॉपुलर पहचान सुभाष घई की 'राम लखन' से बनी.'तेजाब'के एक,दो ,तीन.... गाने ने तो उन्हें नम्बर वन बना दिया.माधुरी की तरह ही जूही चावला की १९८४ में आई पहली फ़िल्म 'सल्तनत' पर दर्शकों ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया.हाँ,१९८८ में आमिर खान के साथ 'कयामत से कयामत तक' में वह सभी को पसंद आ गयीं.श्रीदेवी की 'सोलवा सावन' भी नहीं चली थी,लेकिन १९८३ में जीतेन्द्र के साथ 'हिम्मतवाला' में उनके ठुमके भा गए .पद्मिनी कोल्हापुरे कि शुरूआत तो देव आनंद की 'इश्क इश्क इश्क' से हो गई थी,लेकिन उन्हें दर्शकों ने राज कपूर की 'सत्यम शिवम् सुन्दरम' से पहचाना.इस फ़िल्म में उन्होंने जीनत अमन के बचपन का रोल किया था.इस दशक की अन्य अभिनेत्रियों में अमृता सिंह,मंदाकिनी,किमी काटकरआदि का उल्लेख किया जा सकता है.

उम्मीदों पर पानी फेरती 26 जुलाई..

-अजय ब्रह्मात्मज
फिल्म का संदर्भ और बैकड्राप सिनेमाघरों में दर्शकों को खींच सकता है। आप पूरी उम्मीद से सिनेमा देखने जा सकते हैं लेकिन, अफसोस कि यह फिल्म सारी उम्मीदों पर पानी फेर देती है। 2005 में मुंबई में आई बाढ़ को यह फिल्म असंगत तरीके से छूती है और उस आपदा के मर्म तक नहीं पहुंच पाती।
घटना 26 जुलाई, 2005 की है। उस दिन मुंबई में बारिश ने भयावह कहर ढाया था। चूंकि घटना ढाई साल ही पुरानी है, इसलिए अभी तक हम सभी की स्मृति में उसके खौफनाक दृश्य ताजा हैं। मुंबई के अंधेरी उपनगर में स्थित एक बरिस्ता आउटलेट में चंद नियमित ग्राहक आते हैं। बाहर वर्षा हो रही है। वह तेज होती है और फिर खबरें आती हैं कि भारी बारिश और बाढ़ के कारण शहर अस्त-व्यस्त हो गया है। टीवी पर चंद फुटेज दिखाए जाते हैं। इसी बरिस्ता में राशि और शिवम भी फंसे हैं। एक फिल्म लेखक हैं। एक सरदार दंपती है। दो-चार अन्य लोगों के साथ बरिस्ता के कर्मचारी हैं। इनके अलावा कुछ और किरदार भी आते हैं। फिल्म में बैंक डकैती, एड्सग्रस्त महिला, खोई हुई बच्ची का प्रसंग आता है। रात भर की कहानी सुबह होने के साथ समाप्त हो जाती है। हम देखते हैं कि राशि और …

अजय देवगन की परीक्षा!

-अजय ब्रह्मात्मज
आमिर खान के समान ही अजय देवगन के बारे में भी यही कहा और सुना जाता रहा है कि वे निर्देशन में दखलंदाजी करते हैं। सेट पर और सेट के बाहर डायरेक्टर के साथ ही उनका ज्यादा समय गुजरता है। दरअसल, करियर के आरंभ से अभिनेता अजय देवगन ने निर्देशक की कुर्सी के पास ही अपनी कुर्सी रखी और फिल्म निर्देशन की बारीकियों को सीखने-समझने की कोशिश करते रहे। इसलिए अगर यू मी और हम उनके निर्देशन में आ रही है, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
उल्लेखनीय है कि अजय देवगन एक जमाने के स्टंट मास्टर और फिर ऐक्शन डायरेक्टर रहे वीरू देवगन के बेटे हैं, जिन्होंने सुनील दत्त की फिल्म रेशमा और शेरा से अपना फिल्मी जीवन आरंभ किया। पापा की देखादेखी अजय देवगन जब बड़े हो रहे थे, तो उनकी आंखों में भी फिल्मी सपने तैर रहे थे। इसीलिए उन्होंने अपने पिता के साथ काम आरंभ कर दिया था और शौकिया तौर पर वीडियो कैमरे से कुछ शूटिंग भी कर लेते थे। इच्छा तो थी कि फिल्म के हीरो बनें, लेकिन प्रश्न यह उठता है कि स्टारों के इस माया प्रदेश में कौन ऐक्शन डायरेक्टर के सामान्य चेहरे के बेटे को तरजीह देता? इसीलिए अजय देवगन का ध्यान कैमरे के प…

आमिर खान से अजय ब्रह्मात्मज की बातचीत

आमिर खान से लंबी बातचीत। दो साल पहले हुई यह बातचीत कई खास मुद्दों को छूती है.

- आमिर आप लगातार चर्चा में हैं। अभी थोड़ा ठहरकर देखें तो आप क्या कहना चाहेंगे?

0 सच कहूं तो मैं कंफ्यूज हूं। मैं अपने इर्द-गिर्द जो देख रहा हूं। मीडिया में जिस तरह से रिपोर्टिग चल रही है। टेलीविजन और प्रेस में जो रिपोर्टिग चल रही है, जिस किस्म की रिपोर्टिग चल रही है, जिस किस्म का नेशनल न्यूज दिखाया जा रहा है उससे मैं काफी कंफ्यूज हूं कि यह क्या हो रहा है हम सबको। हम किस दौर से गुजर रहे हैं। झूठ जो है, वह सच दिखाया जा रहा है। सच जो है, वह झूठ दिखाया जा रहा है। जो चीजें अहमियत की नहीं हैं, वह नेशनल न्यूज बनाकर दिखायी जा रही है। लोगों की जिंदगी नेशनल न्यूज बनती जा रही है। समाज के लिए जो महत्वपूर्ण चीजें हैं, उन्हें पीछे धकेला जा रहा है। यह सब देखकर मैं हैरान हूं, कंफ्यूज हूं।- आप फिल्म इंडस्ट्री से हैं, आपने बहुत करीब से इसे जिया और देखा है। अभी के दौर में एक एक्टर होना कितना आसान काम रह गया है या मुश्किल हो गया है?0 जिंदगी अपने मुश्किलात लेकर आती है। हर करियर में अपनी तकलीफें और मुश्किलात होती हैं। एक एक्टर …

हिन्दी फिल्म:महिलायें:आठवां दशक

आठवां दशक हर लिहाज से खास और अलग है.श्याम बेनेगल ने १९७४ में 'अंकुर' फ़िल्म में शबाना आज़मी को मौका दिया.उनकी इस कोशिश के पहले किसी ने सोचा नहीं था कि साधारण नैन-नक्श की लड़की हीरोइन बन सकती है.मशहूर शायर कैफी आज़मी की बेटी शबाना ने साबित किया कि वह असाधारण अभिनेत्री हैं.उनके ठीक पीछे आई स्मिता पाटिल ने भी दर्शकों का दिल जीता.हालांकि हेमा मालिनी को राज कपूर की फ़िल्म 'सपनों का सौदागर' १९६८ में ही मिल चुकी थी,लेकिन १९७० में देव आनंद के साथ'जॉनी मेरा नाम' से हेमा के हुस्न का ऐसा जादू चला कि आज तक उसका असर बरकरार है.एक और अभिनेत्री हैं इस दौर की,जो उम्र बढ़ने के साथ अपना रहस्य गहरा करती जा रही हैं.जी हाँ,रेखा के ग्लैमर की घटा 'सावन भादो' से छाई.अमिताभ और रेखा की जोड़ी ने इस दशक में दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया.अपने अलग अंदाज और अभिनय के लिए सिम्मी गरेवाल जानी गयीं.सफ़ेद कपडों में वह आज भी टीवी पर अवतरित होती हैं तो दर्शक उनकी मृदुता के कायल होते हैं.१९७३ में राज कपूर की 'बॉबी' से आई डिंपल कपाडियापहली फ़िल्म के बाद ही राजेश खन्ना के घर में गायब हो गय…

बॉक्स ऑफिस १२.०३.२००८

चवन्नी चैप पर बॉक्स ऑफिस का नया सिलसिला जारी हो रहा है.कोशिश रहेगी कि हर हफ्ते इसे यहाँ प्रकाशित किया जाए.अजय ब्रह्मात्मज नियमित रूप से हफ्तावार यह बॉक्स ऑफिस जागरण में लिखते हैं,वहीं से साभार यह यहाँ पोस्ट होगा.चवन्नी मानता है के ब्लॉग के पाठक और अखबार के पाठक एक होने के साथ ही अलग-अलग भी होते हैं।फीकी रही ब्लैक एंड ह्वाइटसुभाष घई की ब्लैक एंड ह्वाइट को खाली मैदान मिला था। फिल्म का विशेष प्रचार भी किया गया था। इसके बावजूद बॉक्स ऑफिस पर यह उम्मीद के मुताबिक सफल साबित नहीं हुई। हालांकि इस फिल्म में नए अभिनेता अनुराग सिन्हा और अनुभवी अनिल कपूर के अभिनय की तारीफ जरूर हुई।
सुभाष घई ने इस फिल्म में अपनी शैली बदली थी और सीमित बजट में रियलिस्टिक फिल्म बनाने की कोशिश की थी। एक ट्रेंड पंडित के मुताबिक कमर्शियल फिल्ममेकर को रियलिस्टिक फिल्म बनाने के बारे में सोचना ही नहीं चाहिए। ऐसे में वे न घर के रह पाते हैं और न घाट के। ब्लैक एंड ह्वाइट का पहला दिन बुरा रहा। समीक्षकों की तारीफ के बाद शनिवार और रविवार को दर्शक बढ़े। फिर सोमवार से दर्शकों की संख्या में गिरावट दिखी। इधर दिल्ली में इस फिल्म को टैक…

हिन्दी फ़िल्म:महिलायें:सातवां दशक

क्या आप ने आयशा सुलतान का नाम सुना है?चलिए एक हिंट देता है चवन्नी.वह नवाब मंसूर अली खान पटौदी की बीवी है.जी,सही पहचाना-शर्मिला टैगोर.शर्मीला टैगोर को सत्यजित राय ने 'अपु संसार' में पहला मौका दिया था.उन्होंने सत्यजित राय के साथ चार फिल्मों में काम किया,तभी उन पर हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री की नज़र पड़ी.शक्ति सामन्त ने उन्हें 'कश्मीर की कली' के जरिये हिन्दी दर्शकों से परिचित कराया.जया भादुड़ी की पहली हिन्दी फ़िल्म 'गुड्डी' १९७१ में आई थी,लेकिन उन्हें सत्यजित राय ने 'महानगर' में पहला मौका दिया था.दारा सिंह की हीरोइन के रूप में मशहूर हुई मुमताज की शुरूआत बहुत ही साधारण रही,लेकिन अपनी मेहनत और लगन से वह मुख्य धारा में आ गयीं.राजेश खन्ना के साथ उनकी जोड़ी जबरदस्त पसंद की गई.साधना इसी दशक में चमकीं.नाजी हुसैन ने आशा पारेख को 'दिल देके देखो' फ़िल्म १९५९ में दी,लेकिन इस दशक में वह लगातार उनकी पाँच फिल्मों में दिखाई पड़ीं.वह हीरोइन तो नही बन सकीं,लेकिन उनकी मौजूदगी दर्शकों ने महसूस की.हेलन को कोई कैसे भूल सकता है?उनके नृत्य के जलवों से फिल्में कामयाब होती थीं.इसी …

पेन उठाओ,बॉलीवुड हिलाओ

यह एक मौका है.अगर आप को लगता है कि आप की किसी कहानी पर फ़िल्म बन सकती है और आप को कोई जरिया नहीं मिल रहा हो किसी फ़िल्म निर्माता या स्टार तक पहुँचने का तो आप मिर्ची मूवीज के इस अभियान और खोज में शामिल हो सकते हैं.आपको १००० से ३००० शब्दों में अपनी कहानी लिखनी है और इनके पास भेज देनी है.आप की कहानी के निर्णायक होंगे अज़ीज़ मिर्जा और कमलेश पण्डे.इस प्रतियोगिता या खोज में प्रथम को १० लाख रुपये,द्वितीय को ५ लाख रुपये और तृतीय को ३ लाख रुपये का पारितोषिक मिलेगा.उन कहानियो पर स्क्रिप्ट लिखी जायेगी और फिर फ़िल्म भी बनेगी.इन तीन विजेताओं के अलावा ५० लेखकों को पांच-पाँच हजार के पुरस्कार मिलेंगे.तो यह मौका है आप के लेखक बन जाने का.आप ज्यादा जानकारी के लिए मिर्ची मूवीज लिंक पर जाएं.या फिर उन्हें mirchimovies@indiatimes.com पर लिखें।
जी इस प्रतियोगिता में हिन्दी या अंग्रेज़ी में कहानी भेजी जा सकती है.

हिन्दी फ़िल्म:महिलायें:छठा दशक

देश की आज़ादी बाद के इस दशक को हिन्दी फिल्मों का स्वर्णकाल माना जाता है.पिछले दशक में आ चुकी नरगिस और मधुबाला की बेहतरीन फिल्में इस दशक में आयीं.आज हम जिन निर्देशकों के नाम गर्व से लेते हैं,वे सब इसी दशक में सक्रिय थे.राज कपूर,बिमल राय,के आसिफ,महबूब खान,गुरु दत्त सभी अपनी-अपनी तरह से बाज़ार की परवाह किए बगैर फिल्में बना रहे थे।
इस दशक की बात करें तो शोभना समर्थ ने अपनी बेटी नूतन को 'हमारी बेटी' के साथ पेश किया.नूतन का सौंदर्य अलग किस्म का था.उन्हें 'सीमा' के लिए फ़िल्मफेयर अवार्ड मिला.१९६३ में आई 'बंदिनी' में कल्याणी की भूमिका में नूतन ने भावपूर्ण अभिनय किया.इसी दशक में दक्षिण से वैजयंतीमाला आयीं.वह प्रशिक्षित नृत्यांगना थीं.उनके लिए फिल्मों में डांस दृश्य रखे जाने लगे.वह काफी मशहूर रहीं अपने दौर में.कहते हैं राज कपूर ने निम्मी को सबसे पहले महबूब खान की 'अंदाज' के सेट पर देखा था,उन्होंने तभी 'बरसात' में निम्मी को छोटी सी भूमिका दी थी.उन्हें यह नाम भी राज कपूर ने ही दिया था.महबूब खान की प्रयोगशीलता गजब की थी.उन्होंने पश्चिम की फिल्मों प्रभावित हो…

शाहरुख़ खान ने पढी कविता

शाहरुख़ खान ने समर खान की फ़िल्म 'शौर्य' के लिए एक कविता पढी है.इसे जयदीप सरकार ने लिखा है।

शौर्य क्या है?
शौर्य क्या है?
थरथराती इस धरती को रौंदती फौजियों के पलटन का शौर्य
या सहमे से आसमान को चीरता हुआ बंदूकों की सलामी का शौर्य
शौर्य क्या है?
हरी वर्दी पर चमकते हुए चंद पीतल के सितारे
या सरहद का नाम देकर अनदेखी कुछ लकीरों की नुमाईश
शौर्य क्या है?
दूर उड़ते खामोश परिंदे को गोलियों से भून देने का एहसास
या शोलों की बरसातों से पल भर में एक शहर को श्मशान बना देने का एहसास
शौर्य क्या है?
बैठी हुई आस में किसी के गर्म खून सुर्ख हो जाना
या अनजाने किसी जन्नत की फिराक में पल-पल का दोज़ख हो जाना
बारूदों से धुन्धलाये इस आसमान में शौर्य क्या है?
वादियों में गूंजते किसी गाँव के मातम में शौर्य क्या है?
शौर्य क्या है?
शयद एक हौसला,शयद एक हिम्मत......
मजहब के बनाये दायरे को तोड़कर किसी का हाथ थाम लेने की हिम्मत
गोलियों के बेतहाशा शोर को अपनी खामोशी से चुनौती देने की हिम्मत
मरती-मारती इस दुनिया में निहत्थे डटे रहने की हिम्मत
शौर्य
आने वाले कल की खातिर अपनी कायनात को आज बचा लेने की हिम्मत
शौर्य क्या है?

हिन्दी फ़िल्म:महिलायें:पांचवा दशक

पांचवे दशक की शुरूआत बहुत अच्छी रही.महबूब खान ने १९४० में 'औरत' नाम की फ़िल्म बनाई.इस फ़िल्म को ही बाद में उन्होंने 'मदर इंडिया' नाम से नरगिस के साथ बनाया.'औरत' की सरदार अख्तर थीं.उन्होंने इस फ़िल्म के पश्चात् महबूब खान के साथ शादी कर ली थी.इस दौर में फिल्मों में पीड़ित नायिकाओं की अधिकता दिखाई देती है.इसके अलावा फिल्मों के सवक होने से नाच-गाने पर जोर दिया जाने लगा.ऐसी अभिनेत्रियों को अधिक मौके मिले]जो नाच और गा सकती थीं.खुर्शीदने 'भक्त सूरदास'(१९४३) ,'तानसेन'(१९४३) और 'पपीहा रे'(१९४८) से दर्शकों को झुमाया.देश के बँटवारे के बाद खुर्शीद पाकिस्तान चली गयीं.एक और मशहूर अभिनेत्री और गायिका ने पाकिस्तान का रूख किया था.उनका नाम नूरजहाँ था।महबूब खान के 'अनमोल घड़ी'(१९४६) के गीत आज भी कानों में रस घोलते हैं.भारत में उनकी आखिरी फ़िल्म दिलीप कुमार के साथ 'जुगनू' थी.खुर्शीद और नूरजहाँ तो पाकिस्तान चली गयीं,लेकिन सुरैया ने यहीं रहम का फैसला किया. वजह सभी जानते हैं.हालांकि उनकी मुराद पूरी नहीं हो सकी.सुरैया की पहली फ़िल्म 'ताजमहल&…

सीरियस विषय पर सेंसिबल फिल्म है क्रेजी-4 : जयदीप सेन

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-अजय ब्रह्मात्मज
राकेश रोशन अपने वादे पर अटल रहे। कृष की शूटिंग के दौरान उन्होंने अपने सहायक जयदीप सेन से वादा किया था कि वह उन्हें एक फिल्म निर्देशित करने के लिए देंगे। उन्होंने कृष से खाली होते ही नयी फिल्म की योजना बनायी और उसकी जिम्मेदारी जयदीप सेन को सौंपी। राकेश रोशन की कंपनी फिल्मक्राफ्ट की यह पहली फिल्म होगी, जिसे कोई बाहरी निर्देशक निर्देशित कर रहा है।
जयदीप सेन को फिल्म इंडस्ट्री में ज्यादातर लोग राजा सेन के नाम से जानते हैं। राजा ने सालों पहले एनआर पचीसिया के साथ फिल्मों की यात्रा आरंभ की। तब वह अपराधी फिल्म बना रहे थे और राजा उर्फ जयदेव सेन उसमें प्रोड्क्शन एसिस्टैंट थे। उसके बाद हैरी बावेजा, राज कंवर और मुकुल आनंद के साथ काम करने के पश्चात जयदीप सेन ने अपने दोस्त और डायरेक्टर चंदन अरोड़ा की सलाह पर राकेश रोशन से मुलाकात की। राकेश रोशन उन दिनों कृष की शूटिंग आरंभ करने जा रहे थे और एक सक्षम सहायक की तलाश में थे। यहां यह उल्लेख जरूरी होगा कि दिल्लगी में जयदीप सेन एक्टर-डायरेक्टर सनी देओल के एसोसिएट थे।
जयदीप सेन के शब्दों में, जब चंदन ने मुझे राकेश जी से मिलने की सलाह दी तो मैं…

...और कितने देवदास

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-अजय ब्रह्मात्मज शरत चंद्र चंट्टोपाध्याय की पुस्तक देवदास 1917 में प्रकाशित हुई थी। उनकी यह रचना भले ही बंगला और विश्व साहित्य की सौ महान कृतियों में स्थान नहीं रखती हो, लेकिन फिल्मों में उसके बार-बार के रूपांतर से ऐसा लगता है कि मूल उपन्यास और उसके किरदारों में ऐसे कुछ लोकप्रिय तत्व हैं, जो आम दर्शकों को रोचक लगते हैं। दर्शकों का यह आकर्षण ही निर्देशकों को देवदास को फिर से प्रस्तुत करने की हिम्मत देता है।
संजय लीला भंसाली ने 2002 में देवदास का निर्देशन किया था। तब लगा था कि भला अब कौन फिर से इस कृति को छूने का जोखिम उठाएगा? हो गया जो होना था।
सन् 2000 के बाद हिंदी सिनेमा और उसके दर्शकों में भारी परिवर्तन आया है। फिल्मों की प्रस्तुति तो बदल ही गई है, अब फिल्मों की देखने की वृति और प्रवृत्ति में भी बदलाव नजर आने लगा है। पिछले आठ सालों में जिस तरह की फिल्में पॉपुलर हो रही हैं, उनके आधार पर कहा जा सकता है कि दुख, अवसाद और हार की कहानियों पर बनी फिल्मों में दर्शकों को कम आनंद आता है। एक समय था कि ऐसी ट्रेजिक फिल्मों को दर्शक पसंद करते थे और दुख भरे गीत गाकर अपना गुबार निकालते थे। एकाध अपवाद…

हिन्दी फ़िल्म:महिलायें:चौथा दशक

चौथे दशक के क्रांतिकारी फिल्मकार थे वी शांताराम .उनहोंने १९३४ में 'अमृत मंथन' नाम की फ़िल्म बनाई थी और हिंदू रीति-रिवाजों में प्रचलित हिंसा पर सवाल उठाये थे.१९३६ में बनी उनकी फ़िल्म'अमर ज्योति' में पहली बार नारी मुक्ति की बात सुनाई पड़ी.इस फ़िल्म की नायिका दुर्गा खोटे थीं.यह फ़िल्म वेनिस के इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल में भी दिखाई गई थी.१९३१ में आर्देशर ईरानी की पहली बोलती फ़िल्म 'आलम आरा' आई थी.इस फ़िल्म की हीरोइन जुबैदा थीं.जुबैदा देश की पहली महिला निर्माता और निर्देशक बेगम फातिमा सुल्ताना की बेटी थीं.इस दौर की हंटरवाली अभिनेत्री को कौन भूल सकता है?नाडिया ने अपने हैरतअंगेज कारनामों और स्टंट से सभी को चकित कर दिया था. उनका असली नाम मैरी एवंस था.'बगदाद का जादू','बंबईवाली','लुटेरू ललना' और 'पंजाब मेल' जैसी फिल्मों से उन्होंने अपना अलग दर्शक समूह तैयार किया.एक तरफ नाडिया का हंटर चल रहा था तो दूसरी तरफ़ रविंद्रनाथ ठाकुर की पोती देविका रानी का फिल्मों में पदार्पण हुआ.उन्होंने बाद में हिमांशु राय से शादी कर ली.दोनों ने मिलकर बांबे टॉकीज …

हिन्दी फ़िल्म:महिलायें:तीसरा दशक

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ललिता पवार कानन देवी आज ८ मार्च है.पूरी दुनिया में यह दिन महिला दिवस के तौर पर मनाया जाता है.चवन्नी ने सोचा कि क्यों न सिनेमा के परदे की महिलाओं को याद करने साथ हीउन्हें रेखांकित भी किया जाए.इसी कोशिश में यह पहली कड़ी है.इरादा है कि हर दशक की चर्चित अभिनेत्रियों के बहाने हम हिन्दी सिनेमा को देखें.यह एक परिचयात्मक सीरीज़ है।

तीसरा दशक

सभी जानते हैं के दादा साहेब फालके की फ़िल्म 'हरिश्चंद्र तारामती' में तारामती की भूमिका सालुंके नाम के अभिनेता ने निभाई थी.कुछ सालों के बाद फालके की ही फ़िल्म 'राम और सीता' में उन्होंने दोनों किरदार निभाए।इस दौर में जब फिल्मों में अभिनेत्रियों की मांग बढ़ी तो सबसे पहले एंगलो-इंडियन और योरोपीय पृष्ठभूमि के परिवारों की लड़कियों ने रूचि दिखाई.केवल कानन देवी और ललिता पवार ही हिंदू परिवारों से आई थीं.उस ज़माने की सबसे चर्चित अभिनेत्री सुलोचना थीं.उनका असली नाम रूबी मेयेर्स था.कहा जाता है कि उनकी महीने की कमाई …

ब्लैक एंड ह्वाइट:दुनिया और भी रंगों में जीती और मुस्कराती है

-अजय ब्रह्मात्मज


चलिए पहले तारीफ करें शोमैन सुभाष घई की। उन्होंने अपनी ही लीक छोड़कर कुछ वास्तविक सी फिल्म बनाई है। आतंकवाद को भावुक दृष्टिकोण से उठाया है। उनकी शैली में खास बदलाव दिखता है, चांदनी चौक की रात और दिन के दृश्यों में उन्होंने दिल्ली को एक अलग रंग में पेश किया है। सुभाष घई की इस कोशिश से दूसरे फार्मूला फिल्मकार भी प्रेरित हों तो अच्छी बात होगी।


नुमैर काजी (अनुराग सिन्हा) नाम का युवक अफगानिस्तान से भारत आता है। वह जेहादी है, उसका मकसद है दिल्ली के लाल किले में बम विस्फोट। उसे चांदनी चौक के निवासी गफ्फार नजीर के गुजरात के दंगों में उजड़ गए भाई के बेटे की पहचान दी गई है। अपने मकसद को पूरा करने के लिए नुमैर के पास हैं महज 15 दिन। दिल्ली में उसकी मदद के लिए कई लोगों का इंतजाम किया जाता है।
नुमैर काजी की मुलाकात उर्दू के प्रोफेसर राजन माथुर (अनिल कपूर) से हो जाती है। राजन को नुमैर से सहानुभूति होती है। नुमैर सहानुभूति का फायदा उठाता है और उनके दिल और घर दोनों में अपनी जगह बना लेता है। उन्हीं के साथ रहने लगता है। राजन माथुर की फायरब्रांड बीवी रोमा (शेफाली शाह) पहले उसे पसंद नहीं करत…

बारबरा मोरी:पहला परिचय

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राकेश रोशन की कंपनी फिल्मक्राफ्ट 'काइट्स' नाम की फ़िल्म बना रही है.इस फ़िल्म के निर्देशक अनुराग बासु हैं.अनुराग बासु की 'गैंगग्स्टर' और 'मेट्रो' मशहूर फिल्में रही हैं.अनुराग बासु ने सीरियल निर्देशन से शुरूआत की थी.उन्हें फ़िल्म निर्देशन का पहला मौका महेश भट्ट ने दिया.फ़िल्म थी 'साया' ,जो बुरी तरह फ्लॉप हुई थी.लेकिन महेश भट्ट ने हिम्मत नहीं हरी.दोनों ने एक और फ्लॉप फ़िल्म बनाई.उस फ़िल्म की समाप्ति के समय अनुराग बासु को ब्लड कैंसर हो गया था.पत्नी की सेवा और अपने आत्मबल से वह इस जानलेवा बीमारी की गिरफ्त से बाहर आया.भट्ट कैंप से बहर आकर उनहोंने 'मेट्रो' बनाई.यह फ़िल्म खूब पसंद की गई.उसके बाद ही राकेश रोशन ने उन्हें अपनी कंपनी की फ़िल्म बनने के लिए निमंत्रित किया।
यह तो तय था कि फ़िल्म के हीरो रितिक रोशन होंगे,लेकिन फ़िल्म की कहानी के लायक हीरोइन नहीं मिल पा रही थी.अनुराग ने राकेश रोशन से कहा कि क्यों न हॉलीवुडकी हीरोइनों में से चुना जाए.राकेश रोशन ने अनुराग को खुली छूट दी.कई सारी हीरोइनों से मिलने के बाद आखिरकार अनुराग बासु ने बारबरा मोरी को पसंद कि…

बारबरा मोरी:रितिक रोशन की नई हीरोइन

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बारबरा मोरी रितिक रोशन की नई हीरोइन हैं.उरुग्वे की बारबरा मोरी रितिक रोशन के साथ अनुराग बासु के निर्देशन में 'काइट्स' फ़िल्म में काम करेंगी.इसके निर्माता राकेश रोशन ही हैं.बारबरा मोरी ke बारे में विशेष जानकारी कल सुबह पढ़ें.


फिल्मों में वैचारिकता

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-अजय ब्रह्मात्मज

कला और व्यावसायिक फिल्मों के बीच की दीवार अब ढह चुकी है, क्योंकि धीरे-धीरे कला फिल्मों के दर्शक और निर्देशक सिकुड़ते जा रहे हैं। दरअसल, समय के दबाव के कारण ही उनकी रुचि में बदलाव आया है और सच तो यह है कि अब वह दौर भी नहीं है, जब कला और व्यावसायिक सिनेमा के पार्थक्य को महत्व दिया जाता था! कला फिल्मों की टीम अलग होती थी और व्यावसायिक फिल्मों का अलग संसार था। कला फिल्मों को मिल रहा सरकारी संरक्षण बंद हो चुका है। आश्चर्य की बात तो यह है कि छोटे-मोटे निर्माता भी अब कला फिल्मों में धन निवेश नहीं करते!
कला फिल्मों का सीधा रिश्ता है वैचारिकता और सामाजिकता से। हिंदी सिनेमा के इतिहास पर नजर डालें, तो हम पाएंगे कि कला फिल्मों का उद्भव घनघोर व्यावसायिकता के दौर में हुआ था। दरअसल, हिंदी फिल्मों की समृद्ध परंपरा में एक ऐसा मोड़ भी आया था, जब मुख्य रूप से प्रतिहिंसा और बदले की भावना से प्रेरित फिल्में ही बन रही थीं। सलीम-जावेद में से जावेद अख्तर ने बखूबी उस दौरान लिखी अपनी फिल्मों को समाज की बौखलाहट से जोड़ दिया, लेकिन अमिताभ बच्चन को लेकर बनी प्रमुख फिल्मों का विश्लेषण करने पर हम यह…