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मायानगरी के दिल में धड़क रही दिल्‍ली - मिहिर पांड्या

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मिहिर ने यह लेख मेरे आग्रह पर फटाफट लिखा है। मिहिर ने शहर और सिनेमा पर शोधपूर्ण कार्य और लेखन किया है। फिल्‍मों के प्रति गहन संवेदना और समझ के साथ मिहिर लिख रहे हैं और अच्‍छा लिख रहे हैं। 
-मिहिर पांड्या 
दिल्ली पर बीते सालों में बने सिनेमा को देखें तो दिबाकर बनर्जी का सिनेमा एक नया प्रस्थान बिन्दु नज़र अाता है। लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा में दिल्ली के एकाधिकार के मज़बूत होने का भी यही प्रस्थान बिन्दु है, जिसके बाद दिल्ली को केन्द्र में रखकर बनने वाली फ़िल्मों की बाढ़ अा गई। इसके पहले तक दिल्ली शहर की हिन्दी सिनेमा में मौजूदगी तो सदा रही, लेकिन उसका इस्तेमाल राष्ट्र-राज्य की राजधानी अौर शासन सत्ता के प्रतीक के रूप में होता रहा। राजकपूर द्वारा निर्मित पचास के दशक की फ़िल्म 'अब दिल्ली दूर नहीं' में वो अन्याय के खिलाफ़ अाशा की किरण बन गई तो सत्तर के दशक में यश चोपड़ा की 'त्रिशूल' में वो नाजायज़ बेटे के पिता से बदले का हथियार। इस बीच 'तेरे घर के सामने' अौर 'चश्मेबद्दूर' जैसे अपवाद भी अाते रहे जिनके भीतर युवा अाकांक्षाअों को स्वर मिलता रहा।
लेकिन दिबाक…

'हैदर' वो है जिसने उम्मीद नहीं छोड़ी है -मिहिर पांड्या

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-मिहिर पांड्या ये दिल्ली में सोलह दिसंबर के बाद के हंगामाख़ेज दिन थे। अकेलेपन के दड़बों से निकल इक पूरी पीढ़ी सड़क पर थी। उम्मीद के धागे का अन्तिम सिरा था हमारे हाथों में अौर एक-दूसरे का हाथ थामे हम खड़े थे, दिन भीड़ भरे चौराहों पर अौर रातें शहर की सुनसान सड़कों पर निकल रही थीं। ऐसे ही एक गुनगुनी धूप वाले दिन जब हमें लोहे की गाड़ी में भरकर अाये पुलिसिया जत्थे ने कनॉट प्लेस से ठेल दिया था अौर हम ढपली की थाप पर जंतर-मंतर की अोर बढ़ रहे थे, नेतृत्वकारी लड़कियों ने नारे छोड़ फिर वही अपनी पसन्द की टेक उठा ली थी… बाप से लेंगे अाज़ादी, खाप से लेंगे अाज़ादी.. अरे हम क्या चाहते – अाज़ादी… “अाज़ादी” की वो टेक जिसे कुछ समय पहले कश्मीर के नौजवान ने ज़िन्दा किया था। वो नौजवान जिसने उसका घर घेरकर बैठी सशस्त्र सेना का सामना हाथ में उठाए पत्थर से किया। वो ‘अाज़ादी’ जिसका हासिल जितना सार्वजनिक पटल पर कठिन है, उससे कहीं ज़्यादा घर की चारदीवारी के भीतर मुश्किल है। ‘अाज़ादी, क्यूंकि गुलामी की रात जितनी अंधेरी होती है स्वतंत्रता का सपना उतना ही मारक तीख़ा होता है। श्रीनगर के लाल चौक पर खड़े…

सुपरहिट फिल्म के पांच फंडे

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-मिहिर पांड्या
पिछले दिनों आई फिल्म बॉडीगार्ड को समीक्षकों ने सलमान की कुछ पुरानी सफल फिल्मों की तरह ही ज्यादा भाव नहीं दिया और फिल्म को औसत से ज्यादा रेटिंग नहीं मिली लेकिन फिल्म की बॉक्स-ऑफिस पर सफलता अभूतपूर्व है। दरअसल ऐसी फिल्मों की सफलता का फॉर्म्युला उनकी गुणवत्ता में नहीं, कहीं और है। क्या हैं वे फॉर्म्युले, फिल्म को करीब से देखने-समझने वालों से बातचीत कर बता रहे हैं मिहिर पंड्या :
नायक की वापसी
हिंदी फिल्मों का हीरो कहीं खो गया था। अपनी ऑडियंस के साथ मैं भी थियेटर में लौटा हूं। मैं भी फिल्में देखता हूं। थियेटर नहीं जा पाता तो डीवीडी पर देखता हूं। सबसे पहले यही देखता हूं कि कवर पर कौन-सा स्टार है? किस टाइप की फिल्म है? मैं देखूंगा उसकी इमेज के हिसाब से। हिंदी फिल्मों का हीरो वापस आया है। हीरोइज्म खत्म हो गया था। ऐक्टर के तौर पर मैं भी इसे मिस कर रहा था। मुझे लगता है कि मेरी तरह ही पूरा हिंदुस्तान मिस कर रहा होगा। कहीं-न-कहीं सभी को एक हीरो चाहिए।
- सलमान खान, हालिया साक्षात्कार में।
ऊपर दी गई बातचीत के इंटरव्यूअर और वरिष्ठ सिने पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज सलमान के घर के बाहर अभी नि…