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दरअसल : रमन राघव के साथ अनुराग कश्‍यप

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-अजय ब्रह्मात्‍मज अनुराग कश्‍यप ने ‘ बांबे वेलवेट’ की असफलता की कसक को अपने साथ रखा है। उसे एक सबक के तौर पर वे हमेशा याद रखेंगे। उन्‍होंने हिंदी फिल्‍मों के ढांचे में कुछ नया और बड़ा करने की कोशिश की थी। मीडिया और फिल्‍म समीक्षकों ने ‘बांबे वेलवेट’ को आड़े हाथों लिया। फिल्‍म रिलीज होने के पहले से हवा बन चुकी थी। तय सा हो चुका था कि फिल्‍म के फेवर में कुछ नहीं लिखना है। ‍यह क्‍यों और कैसे हुआ? उसके पीछे भी एक कहानी है। स्‍वयं अनुराग कश्‍यप के एटीट्यूड ने दर्जनों फिल्‍म पत्रकारों और समीक्षकों को नाराज किया। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री और फिल्‍म पत्रकारिता में दावा तो किया जाता है कि सब कुछ प्रोफेशनल है,लेकिन मैंने बार-बार यही देखा कि ज्‍यादातर चीजें पर्सनल हैं। व्‍यक्तिगत संबंधों,मान-अपमान और लाभ-हानि के आधार पर फिल्‍मों और फिल्‍मकारों का मूल्‍यांकन होता है। इसमें सिर्फ मीडिया ही गुनहगार नहीं है। फिल्‍म इंडस्‍ट्री का असमान व्‍यवहार भी एक कारक है। कहते हैं न कि जैसा बोएंगे,वैसा ही काटेंगे। बहरहाल, ‘बांबे वेलवेट’ की असफलता को पीछे छोड़ कर अनुराग कश्‍यप ने ‘रमन राघव 2.0’ निर्देशित की है। इसमें …

फिल्‍म समीक्षा : जुबान

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एहसास और पहचान की कहानी -अजय ब्रह्मात्‍मज दिलशेर बच्‍चा है। वह अपने पिता के साथ गुरूद्वारे में जाता है। वहां पिता के साथ गुरूवाणी और सबद गाता है। पिता बहरे हो रहे हैं। उनकी आवाज असर खो रही है। और वे एक दिन आत्‍महत्‍या कर लेते हैं। दिलशेर का संगीत से साथ छूट जाता है। वह हकलाता है। हकलाने की वजह से वह दब्‍बू हो गया है। उसे बचपन में ही गुरचरण सिकंद से सबक मिलता है कि वह खुद के भरोसे ही कुछ हासिल किया जा सकता है। वह बड़ा होता है और दिल्‍ली आ जाता है। दिल्‍ली में उसकी तमन्‍ना गुरदासपुर के शेर गुरचरण सिकंद से मिलने और उनके साथ काम करने की है। गुरचरण सिकंद खुद के भरोसे ही आज एक बड़ी कंपनी का मालिक है। कभी उसके रोजगारदाता ने उस पर इतना यकीन किया था कि उसे अपनी बेटी और संपत्ति सौंप गया। इरादे का पक्‍का और बिजनेस में माहिर गुरचरण को अपना बेटा ही पसंद नहीं है। वह उसे चिढ़ाने के लिए दिलशेर को बढ़ावा देता है। बाप,बेटे और मां के संबंधों के बीच एक रहस्‍य है,जो आगे खुलता है। गुरचरण सिकंद कुटिल मानसिकता का व्‍यावहारिक व्‍यक्ति है। दिलशेर में उसे अपना जोश और इरादा दिखता है। अपनी पहचान की तलाश में भटकते दि…

फिल्‍म समीक्षा : मसान

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-अजय ब्रह्मात्‍मज          बनारस इन दिनों चर्चा में है। हिंदी फिल्मों में आरंभ से ही बनारस की छवियां भिन्न रूपों में दिखती रही हैं। बनारस का आध्यात्मिक रहस्य पूरी दुनिया को आकर्षित करता रहा है। बनारस की हवा में घुली मौज-मस्ती के किस्से यहां की गलियों और गालियों की तरह नॉस्टैलजिक असर करती हैं। बनारस की चर्चा में कहीं न कहीं शहर से अनजान प्रेमी उसकी जड़ता पर जोर देते हैं। उनके विवरण से लगता है कि बनारस विकास के इस ग्लोबल दौर में ठिठका खड़ा है। यहां के लोग अभी तक ‘रांड सांढ सीढी संन्यासी, इनसे बचो तो सेवो कासी’ की लोकोक्ति को चरितार्थ कर रहे हैं। सच्चाई यह है कि बनारस भी समय के साथ चल रहा है। देश के वर्त्तमान प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र है बनारस। हर अर्थ में आधुनिक और समकालीन। प्राचीनता और आध्यात्मिकता इसकी रगों में है।             नीरज घेवन की ‘मसान’ इन धारणाओं को फिल्म के पहले फ्रेम में तोड़ देती है। इस फिल्मा के जरिए हम देवी, दीपक, पाठक, शालू, रामधारी और झोंटा से परिचित होते हैं। जिंदगी की कगार पर चल रहे ये सभी चरित्र अपनी भावनाओं और उद्वेलनों से शहर की जातीय, लैंगिक और आर्थिक असम…