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Sunday, August 9, 2009

पाकिस्तान से आए हुमायूँ सईद

-अजय ब्रह्मात्मज

पिछले दिनों एक फिल्म आई जश्न। महेश भट्ट की इस फिल्म में शहाना गोस्वामी ने अपने अभिनय से एक बार फिर लोगों को लुभाया। उनके साथ अमन बजाज की भूमिका में लोगों ने एक नए ऐक्टर को देखा। उसने अपने अभिनय से अमन बजाज के निगेटिव रोल को रिअॅल बना दिया। उसका नाम है हुमायूं सईद। हुमायूं करांची के हैं। वे पाकिस्तान के निहायत पापुलर ऐक्टर हैं। एक्टिंग के साथ टीवी प्रोडक्शन में भी उनका बड़ा नाम है। जश्न की रिलीज के वक्त वे भारत आए थे। फिल्म के प्रस्तोता महेश भट्ट से उनकी जानकारी लेने के बाद जब मैंने उनसे संपर्क किया, तो उन्हें ताज्जुब हुआ कि भला उनमें किसी की रुचि क्यों होगी? बहरहाल वे अगले दिन मिले। अपनी बीवी के साथ मुंबई आए हुमायूं के लिए यह खास मौका था, जब भारतीय मीडिया ने उनके काम की तारीफ की। इस तारीफ से उनके हौसले बढ़े हैं। अगर फिल्मों के मौके मिले, तो दूसरी फिल्में भी करेंगे।
हुमायूं पाकिस्तान में बेहद पापुलर हैं। उन्होंने जब जश्न के लिए महेश भट्ट को हां कहा, तो पाकिस्तानी अखबारों में यह खबर फैल गई। कुछ आलोचकों ने लिखा कि देखें हुमायूं को कैसा रोल मिलता है? हुमायूं इस आशंका की पृष्ठभूमि उजागर करते हैं, पाकिस्तानी आर्टिस्ट हिंदुस्तान की फिल्मों से जुड़ना चाहते हैं। पिछले कुछ वर्षो में उन्हें विभिन्न फिल्मों में देखा गया, लेकिन देखकर पाकिस्तान के लोग खुश नहीं हुए, क्योंकि वे ज्यादातर छोटे-मोटे रोल में ही आए। इसी कारण जब भट्ट साहब ने मुझे ऑफर दिया, तो मैंने उनसे पूछा कि रोल अच्छा है न? मैं पाकिस्तानी प्रशंसकों को निराश नहीं कर सकता था। भट्ट साहब का सीधा सा जवाब था, मियां भरोसा रखो। आपको बुलाया है, तो रोल अच्छा ही होगा। फिल्म में अपने काम को मिली सराहना से हुमायूं खुश नजर आए। हालांकि फिल्म के प्रचार में कभी उनके नाम का उल्लेख नहीं किया गया। हुमायूं इस स्थिति से वाकिफ हैं। समझाने के अंदाज में वे कहते हैं, दोनों देशों के बीच अच्छे रिलेशन नहीं हैं। मैं समझ सकता हूं कि क्यों फिल्म के निर्माताओं ने मेरे नाम और काम का प्रचार नहीं किया! नार्मल स्थिति में फिल्म रिलीज हुई होती, तो कुछ और बात होती। हुमायूं चाहते हैं कि दोनों देशों के बीच कलाकारों और फिल्मों का आना-जाना लगा रहे। वे इस मामले में महेश भट्ट की तारीफ करते हैं, भट्ट साहब कुछ वर्षो से पाकिस्तानी टैलेंट को अपनी फिल्मों में मौके दे रहे हैं। इसके अलावा वे खुद पाकिस्तान आते रहते हैं। उन्होंने फिल्मों के जरिए दोनों देशों को करीब लाने की सुंदर कोशिश की है। हम भी ऐसी कोशिश करते हैं। मैंने जब अना टीवी सीरियल बनाया था, तो यहां से राजीव खंडेलवाल और आमना शरीफ को ले गया था। अब दिसंबर में जाऊंगा, तो यहां के नए टीवी कलाकारों को ले जाऊंगा।
हुमायूं बताते हैं कि मैं बचपन से ही हिंदी फिल्में देखता रहा हूं। दोनों देशों के बीच कोई भी सूरत-ओ-हाल हो जाए, लेकिन हमारे मुल्क के लोग हिंदी फिल्में देखना नहीं छोड़ेंगे। उनके लिए हिंदुस्तान का मतलब ही बॉलीवुड है। मैं खुद अमिताभ बच्चन की फिल्में देख कर बड़ा हुआ हूं। उनकी फिल्मों के जरिए हिंदुस्तान से मेरा परिचय हुआ। बचपन की उन यादों को नहीं भूल सकता। हिंदुस्तान हमारे दिल-ओ-दिमाग में किसी ख्वाब की तरह तारी है। आप लोग अपने स्टारों के बार में जितना जानते हैं, किसी पाकिस्तानी की जानकारी उससे कतई कम नहीं होगी। हिंदी फिल्मों के असर का यह आलम है।

Saturday, July 18, 2009

फ़िल्म समीक्षा:जश्न


सपनों और रिश्तों के बीच

-अजय ब्रह्मात्मज


भट्ट कैंप की फिल्मों का अपना एक फार्मूला है। कम बजट, अपेक्षाकृत छोटे और मझोले स्टार, इमोशनल कहानी, म्यूजिकल सपोर्ट, गीतों व संवादों में अर्थपूर्ण शब्द। इस फार्मूले में ही विशेष फिल्म्स की फिल्में कभी कमाल कर जाती हैं और कभी-कभी औसत रह जाती हैं। जश्न कमाल कर सकती है। भट्ट बंधु ने सफलता के इस फार्मूले को साध लिया है। उनकी जश्न के निर्देशक रक्षा मिस्त्री और हसनैन हैदराबादवाला हैं।
जश्न सपनों और आकांक्षाओं की फिल्म है। इसे हर जवान के दिल में पल रहे नो बडी से सम बडी होने के सपने के तौर पर प्रचारित किया गया है। फिल्म का नायक आकाश वर्मा सपनों के लिए अपनों का सहारा लेता है। लेकिन असफल और अपमानित होने पर पहले टूटता, फिर जुड़ता और अंत में खड़ा होता है। सपनों और आकांक्षाओं के साथ ही यह शहरी रिश्तों की भी कहानी है। हिंदी फिल्म के पर्दे पर भाई-बहन का ऐसा रिश्ता पहली बार दिखाया गया है। बहन खुद के खर्चे और भाई के सपने के लिए एक अमीर की रखैल बन जाती है। भाई इस सच को जानता है। दोनों के बीच का अपनापा और समर्थन भाई-बहन के रिश्ते को नया आयाम देता है। सारा आज की बहन है और आकाश भी आज का भाई है। रिश्तों के नंगे सच को लेखक-निर्देशक ने कोमलता से उद्घाटित किया है।
पाकिस्तानी एक्टर हुमायूं सईद ने अमन बजाज के शातिर, स्वार्थी, अहंकारी और लंपट किरदार को प्रभावशाली तरीके से चित्रित किया है। सिर्फ आंखों, होठों और चेहरे के भाव से कैसे दृश्य को खास और अर्थपूर्ण बनाया जा सकता है। हिंदी फिल्मों के ढेर सारे स्टार हुमायूं सईद के निरीक्षण से सीख सकते हैं। चूंकि वे किसी हिंदी फिल्म में पहली बार दिखे हैं, इसलिए किरदार के ज्यादा करीब लगते हैं। शहाना गोस्वामी दृश्य चुरा लेती हैं। सामान्य दृश्यों में भी उनका सहज अभिनय स्वाभाविक लगता है। हालांकि जश्न में सारा का किरदार जटिल नहीं था, पर साधारण किरदार को रोचक बना देना भी तो खासियत है। अध्ययन सुमन को नाटकीय और भावुक दृश्य मिले हैं। वे निराश नहीं करते। उन्हें अपने बालों को निखारने-संवारने पर ध्यान देना चाहिए। वह उनके अभिनय के आड़े आता है।
संगीत फिल्म के थीम के मुताबिक एक संगीतकार की भावनाओं को शब्दों और ध्वनि से व्यक्त करता है। गीतों पर आज की संगीत शैली का पूरा असर है। अध्ययन ने उन गीतों को पर्दे पर जोश और जरूरी एक्सप्रेशन के साथ परफार्म किया है। और अंत में पटकथा और संवाद के लिए शगुफ्ता रफीक की तारीफ करनी होगी। इन दिनों फिल्मों के संवाद दृश्यों को भरने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं। उनमें न तो शब्दों की कारीगरी रह गई है और न भाव की गहराई। शगुफ्ता रफीक के संवादों में रवानी है। वे सटीक, चुस्त और दृश्यों के अनुकूल हैं।
रेटिंग : ***